भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

CPI on Saharanpur incidents

सहारनपुर, शामली की घटनाओं को गंभीरता से ले योगी सरकार: भाकपा लखनऊ- 21 अप्रेल, 2017, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल सहारनपुर और शामली जनपदों को दंगों की आग में झौंकने के भाजपा और उनके सहयोगियों के प्रयास की कड़े शब्दों में निंदा की है. पार्टी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि इस घटना का तटस्थ एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण से विश्लेषण कर कठोर कदम उठायें वरना उन्हीं की पार्टी के सांप्रदायिक और निहित स्वार्थी तत्व उनकी सरकार को बदनाम और विफल बना देंगे. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि न तो यह घटनायें स्वत:स्फूर्त थीं न ही सांप्रदायिक. अल्पसंख्यकों को सबक सिखाने, उन्हें भयभीत करने, उनकी जान और माल को हानि पहुंचाने, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच वैमनस्य पैदा करने और वहां तैनात पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को हठवा कर मनपसंद अधिकारियों को तैनात कराने के उद्देश्य से स्थानीय सांसद, विधायक और अन्य भाजपाइयों द्वारा इन वारदातों को अंजाम दिया गया. सहारनपुर के संवेदनशील सड़क दूधली गांव में भाजपाइयों ने अल्पसंख्यकों को सबक सिखाने और दलितों अल्पसंख्यकों में फूट डालने के उद्देश्य से सात साल से बंद डा. अंबेडकर शोभायात्रा निकालने का प्रयास किया. भाजपाइयों ने अपने इरादों को अंजाम देने को अपने पिट्ठू संगठनों की ओर से यात्रा निकालने की अनुमति लेनी चाही, लेकिन सांप्रदायिक रुप से संवेदनशील इलाकों में किसी नये कार्यक्रम की अनुमति न दिये जाने के शासकीय आदेश के चलते अनुमति नहीं दी गयी. लेकिन फिर भी भाजपाइयों ने गांव से बाहर की भीड़ बुला कर जबरिया यात्रा शुरु कर दी जिसका स्थानीय तौर पर विरोध होना स्वाभाविक था. इसी का बहाना लेकर भाजपाइयों ने स्थानीय सांसद और विधायक के नेत्रत्व में पत्थरबाजी, आगजनी और तोड़ फोड़ की और अल्पसंख्यकों पर एकतरफा हमले बोल दिये. यहां तक कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को भी निशाना बनाया गया. प्रशासनिक अधिकारियों के दबाव में न आने से बौखलाये भाजपाइयों ने कानून हाथ में लेकर एसएसपी आवास पर तोड़ फोड. की, उस पर कब्जा जमा लिया और सांसद ने मीडिया पर घोषणा की कि नये कप्तान के आने तक उन्होने स्वयं कप्तान का चार्ज संभाल लिया है. पुलिस की मौजूदगी में मुख्यमार्ग पर वाहनों को रोक कर अल्पसंख्यकों की पहचान कर उन पर हमले किये गये. अभी भी आग को फैलाने के तमाम प्रयास किये जा रहे हैं. इससे एक दिन पहले पडौसी जिले शामली के थाना भवन में ट्रक से मोटर साइकिल भिड़ जाने की मामूली घटना को लेकर अल्पसंख्यकों के ट्रक को जला डाला और चुन चुन कर दुकानें जलायीं और राहगीरों पर हमले बोले गये. भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने के बाद से भाजपा और उसके संगठनों ने सारी संवैधानिक- सामाजिक मर्यादायें तोड़ दीं हैं और वे अल्पसंख्यकों दलितों और कमजोरों पर एकतरफा हमले बोल रहे हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश को उन्होने सांप्रदायिक उत्पीड़न के जरिये ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बना रखा है जिसके बलबूते वे इस क्षेत्र में अधिकतर लोकसभा और अब विधान सभा की सीटें जीतने में कामयाब रहे हैं. वो आगे भी इसी रणनीति पर चलेंगे. इस बीच स्थानीय पुलिस प्रशासन को दबाव में लेने अथवा अपने मन- मुताबिक अधिकारी तैनात कराने का खेल भी उत्तर प्रदेश में इन दिनों खूब चल रहा है. भाकपा की स्पष्ट राय है कि शांति सद्भाव को पलीता लगाने वाली और कानून व्यवस्था को हाथ में लेकर दलितों अल्पसंख्यकों का लोकतांत्रिक व्यवस्था से विश्वास डिगाने वाली इन वारदातों को शीघ्र ही नहीं रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. सूबे के मुख्यमंत्री को भी इस सबको गंभीरता से लेना होगा. आखिर कानून व्यवस्था को कायम रखने की पहली जिम्मेदारी तो उन्हीं की बनती है. भाकपा ने कानून व्यवस्था, न्याय, शांति और सद्भाव के लिये प्रतिबध्द सभी ताकतों से अपील की कि वे समय रहते इन षडयंत्रों का एकजुट हो जबाव दें. डा. गिरीश
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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

CPI on Babari Issue

बाबरी विध्वंस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भाकपा ने स्वागत किया कल्याण सिंह और उमा भारती को न्याय हित में पदों से हठाने की मांग की लखनऊ- 19 अप्रेल 2017, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने बाबरी विध्वंस मामले पर आज सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है. भाकपा ने उन भाजपा नेताओं से सार्वजनिक पद छोड़ने की मांग की है जो इस केस में संलिप्त हैं. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से 25 साल पुराने इस केस में दोषियों को सजा मिलने की उम्मीद जगी है जो उच्च न्यायालय इलाहाबाद के विगत फैसले के चलते धूमिल होगयी थी. यह और भी स्वागत योग्य है कि सर्वोच्च न्ययालय ने मामले की सुनवायी दो साल के भीतर पूरा कर लेने का निर्देश उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ को दिया है. भाकपा राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि इस मामले में न्याय मिलने में पहले ही बहुत देर होचुकी है और इसमें अब और देर नहीं होनी चाहिये. अतएव इस मामले में लिप्त उन व्यक्तियों को जो संवैधानिक पदों पर बैठे हैं न्याय के हित में और नैतिकता के तहत अपने पदों से तुरंत त्यागपत्र देकर अभियोग का सामना करना चाहिये. अपराधिक साजिश में लिप्त किसी भी व्यक्ति का वैसे भी किसी संवैधानिक पद पर बने रहना राष्ट्रहित में नहीं है. श्री कल्यान सिंह ने तो इस अपराध को स्वयं स्वीकार किया था और घटना के अगले दिन 7 दिसंबर 1992 को भीड़ के साथ अयोध्या पहुंच कर नारे लगाये थे- “जो कहा सो किया” और “रामलला हम आयेंगे, मंदिर यहीं बनायेंगे” आदि. उन्होने मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुये विवादित ढांचे की रक्षा करने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश और ढांचे की रक्षा करने को राष्ट्रीय एकता परिषद में स्वयं द्वारा दिये गये आश्वासन का उल्लंघन किया था. इसके लिये सर्वोच्च न्यायलय ने उन्हें एक दिन की सजा भी दी थी. ढांचा गिरते ही सुश्री उमा भारती खुशी के मारे उछल कर श्री आडवानी की पीठ पर चढ गयीं थीं और श्री मुरली मनोहर जोशी तालियां बजा रहे थे. देश का दुर्भाग्य है कि देश के संविधान और उसकी एकता अखंडता को तार तार करने के इरादे रखने वाले लोग आज सता पर काबिज हैं. प्रधानमंत्री श्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह बार बार यह दुहराते रहे हैं कि भाजपा औरों से अलग पार्टी है, एक चरित्रवान और नैतिकता से ओत प्रोत पार्टी है. आज उनके सामने इन दाबों को साबित करने की चुनौती है. अतएव उन्हें चाहिये कि श्री कल्याण सिंह और सुश्री उमा भारती को पदों से मुक्त करने को ठोस कदम उठायें ताकि उनका ससमय और सभी के साथ ट्रायल हो सके; भाकपा ने मांग की है. डा. गिरीश
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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

CPI on Rail accident

रामपुर रेल हादसे पर भाकपा ने चिंता जताई मोदी से रेल मंत्री को तत्काल हठाने की मांग की लखनऊ- 15 अप्रेल 2017, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने आज उत्तर प्रदेश के रामपुर में राज्यरानी एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने पर गहरी चिंता व्यक्त की है. पार्टी ने संतोष जताया कि इत्तफाक ही है कि सात बोगियों के पूरी तरह क्षतिग्रस्त होजाने के बाद भी इस दुर्घटना में अधिक जन हानि नहीं हुयी. सरकार को सभी घायलों के इलाज की समुचित व्यवस्था करनी चाहिये. भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि मोदी जी के शपथ ग्रहण वाले दिन से लेकर आज तक देश में दर्जनों बड़ी रेल दुर्घटनायें होचुकी हैं, जिनमें भारी जन धन की हानि हुयी है. पर आज तक केंद्र सरकार ने इस दिशा में कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया है. दुर्घटना के बाद एक जांच बैठा दी जाती है, मंत्रियों- अफसरों के दौरे होजाते हैं, घटना पर दुख जता दिया जाता है, मुआबजे की घोषणा कर दी जाती है और केंद्र सरकार के नकारापन से ध्यान हठाने को इसमें आतंकवादियों का हाथ होना बता दिया जाता है. मान भी लिया जाये कि ये आतंकवादियों की करतूतें हैं, तो भी तो उसके लिये सरकार ही जिम्मेदार है. मोदी के राज्य में रेलें यमराज की बहिनें बन गयीं हैं. तरह तरह से लोगों की जेब पर डाका डालने के बावजूद न तो सुरक्षा के इंतजाम किये जारहे हैं और न सुविधायें प्रदान की जारही हैं. अब तीन घंटे में रिपोर्ट देने का शिगूफा छोड़ा गया है. इससे यात्रियों का क्या लाभ होगा जो रेल में यात्रा कर जान गंवाने को अभिशप्त हैं. डा. गिरीश ने कहाकि भाजपा जब विपक्ष में हुआ करती थी तो छोटी छोटी रेल दुर्घटनाओं पर रेल मंत्री के स्तीफे की मांग उठाया करती थी. लेकिन साढ़े तीन साल में सैकड़ों लोगों की जान चले जाने और सार्वजनिक संपत्ति के भारी नुकसान के बावजूद आज तक मोदी सरकार ने अपने रेल मंत्री से स्तीफा नहीं मांगा. अब पानी सिर से ऊपर जारहा है, अतएव भाकपा मोदी जी से मांग करती है कि रेल मंत्रीको तत्काल प्रभाव से हठाया जाये. डा. गिरीश
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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

CPI on Local Body elections

बैलट से ही कराये जायें निकाय चुनाव: भाकपा लखनऊ- 13 अप्रेल 2017, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने मांग की है कि आगामी जुलाई से होने वाले निकाय चुनावों को मत पत्रों से ही कराया जाये. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग ने आज यह स्वीकार किया है कि निकाय चुनाव की ईवीएम मशीनें छह साल पुरानी हैं और वे उपयोग के योग्य नहीं रहीं. आयोग ने इस बात की संभावना भी व्यक्त की है कि आगामी निकाय निर्वाचन मत पत्रों के जरिये भी हो सकता है. यह संभावना स्वागत योग्य है. डा. गिरीश ने कहा कि संपूर्ण विपक्ष द्वारा गत विधान सभा चुनावों में ईवीएम के ऊपर संदेह जताया जारहा है और विपक्षी दलों ने इस प्रकरण को केंद्रीय निर्वाचन आयोग और महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष भी उठाया है. इसके प्रयोग के विरुध्द याचिकायें भी दायर की गयीं हैं. ऐसे में निकाय चुनावों में ईवीएम के प्रयोग का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता. डा. गिरीश
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Jaliyaanvaalaa baag

हमेशा प्रासंगिक रहेगा जलियांवाले बाग कांड में हुआ बलिदान कई घटनायें कालजयी होती हैं. खास काल और खास परिस्थितियों में हुयी ये घटनायें हमें वर्तमान काल और खास परिस्थितियों का मूल्यांकन करने और नई राह तलाशने में मदद करती हैं. जलियांवाला बाग कांड भी ऐसी ही घटनाओं में से एक है. आजादी के आंदोलन में भी इसका विशिष्ट अर्थ था तो आज भी इसका खास मतलब है. यही वजह है कि दो वर्ष बाद सौ वर्ष पूरे करने जारहे इस जघन्य हत्याकांड की यादें आज भी आम हिंदुस्तानी के मन- मस्तिष्क को झकझोर देती हैं. इस घटना ने हमारे इतिहास की समूची धारा को पूरी तरह बदल दिया था. यही वजह है कि आज भी पूरे देश में इस घटना को याद किया जाता है. 13 अप्रेल 1919 को हुये इस जघन्य हत्या कांड का कारण ब्रिटिश हुकूमत द्वारा लाया जारहा वह काला कानून था जिसे रोलट एक्ट के नाम से जाना जाता है. यह कानून आजादी के लिये चल रहे आंदोलन को कुचलने की मंशा से लाया गया था. इस कानून के जरिये अंग्रेजी हुकूमत ने और अधिक अधिकार हड़प लिये थे जिनके तहत वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, बिना मुकदमे के नेताओं को जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी तथा उन पर विशेष ट्रिब्यूनलों में और बंद कमरों में बिना जवाबदेही दिये मुकदमे चला सकती थी आदि. आज न देश पर कोई विदेशी ताकत शासन कर रही है न कोई रोलट एक्ट सामने है. पर देश और समाज को झकझोरने वाले घटनाक्रम आज भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे. भारतीय प्रेस उस समय आजादी के आंदोलन की पक्षधर ताकतों के हाथ में था. वह उपनिवेशी शासन को उखाड़ फैंकने को तत्पर ताकतों की आवाज हुआ करता था. लुटेरी, जनविरोधी और तानाशाह ताकतें जितनी बंदूक की आवाज से नहीं डरतीं जितना कि मुट्ठी तान के खड़े होजाने वाले लुटे- पिटे लोगों की संगठित आवाज से डरती हैं. रोलट एक्ट उसी आवाज को दबाने के लिये प्रेस सेंसरशिप लादने व अन्य दूसरे कदम उठाने को लाया गया था. पर आज हमारे प्रेस और मीडिया का बड़ा भाग लुटी पिटी ताकतों के साथ नही, लुटेरी, जनविरोधी और फासिस्ट इरादों वाली ताकतों के साथ खड़ा है. बिना रोलेट एक्ट के ही किसी को भी देशद्रोही करार देकर जेलों में ठूंसने, भीड़ बना कर किसी को भी झूठा अभियोग लगा कर मार डालने, शासन और संगठित निजी सेनाओं के जरिये युवाओं छात्रों दलितों अल्पसंख्यकों महिलाओं/ युवतियों और प्रतिरोध की आवाज बुलंद करने वाले नेताओं समाज सेवियों बुध्दिजीवियों और मीडियाकर्मियों को प्रताड़ित करने उनकी हत्या करने और उन्हें भयभीत करने का कारोबार बढ़े पैमाने पर चल रहा है. जनविरोधी रोलट एक्ट के विरोधस्वरुप पूरा देश उठ खड़ा हुआ और लोगों ने जगह जगह गिरफ्तारियां दीं. हुकूमत ने आंदोलन को कुचलने के लिये दमन का रास्ता अपनाया. पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं डा. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को अमृतसर मे बिना किसी वजह के गिरफ्तार कर लिया गया. इसके विरोध में एक बड़ा जुलूस निकला. पुलिस ने शांतिपूर्ण जुलूस को रोका और अंतत: भीड़ पर गोलियां चला दीं. दो लोग मारे गये. इससे पूरे पंजाब में उबाल आजाना स्वाभाविक था. इतिहास एक नया मोड़ लेने की दहलीज पर था. नेताओं की गिरफ्तारी और इस गोली कांड के विरोध में बैसाखी के दिन 13 अप्रेल 1919 की शाम को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया. यद्यपि शहर में कर्फ्यू था फिर भी 10- 15 हजार के लगभग लोग बाग में जमा हुये. लोगों को सबक सिखाने के लिये बाग के एकमात्र दरबाजे पर पर पोजीशन लेकर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर ने बिना किसी चेतावनी के गोली चलवा दी. 1,650 राउंड गोलियां चलीं. जान बचाने के लिये तमाम लोग बाग में मौजूद कुयें में कूद गये. एक हजार से ज्यादा स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े जवान शहीद हुये और सैकड़ों की तादाद में घायल हुये. कई बार दमनचक्र उलट परिणाम देता है और दमन के खिलाफ जंग के लिये उत्प्रेरक का काम करता है, यह शासक वर्ग और शासक तबके भूल जाते हैं. जलियांवाला बाग कांड ने देश के लोगों को झकझोर के रख दिया और वे आज़ादी की लड़ाई में और ताकत से जुटने लगे. पंजाब पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा. गांधी जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया जो 1922 आते आते एक ब्रिटिश विरोधी सशस्त्र संघर्ष में बदल गया था. इसी कांड में घायल एक युवक ऊधमसिंह ने अंग्रेजों से इसका बदला लेने की शपथ ली और इस घटना के इक्कीस साल बाद 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हाल में जनरल डायर को पिस्तौल की गोलियों से भून डाला. भगत सिंह और उन जैसे तमाम युवाओं ने इस घटना से उद्वेलित होकर देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिये अपने जीवन को बलिदान करने का सुदृढ- संकल्प लिया. हम सब आज जलियांवाला बाग काण्ड के शहीदों को याद करते हुये मौजूदा शासक वर्ग और शासकों से सवाल करें कि इस इतिहास में उनके लिये कोई सबक छिपा है क्या? डा. गिरीश
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सोमवार, 10 अप्रैल 2017

Press Communique of CPI, U.P.

भाजपा की फासीवादी नीतियों के खिलाफ एकजुट हों धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक एवं वामपंथी ताकतें : भाकपा लखनऊ- 10 अप्रेल 2017, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल ने प्रदेश में होने वाले नगर निकाय चुनावों में बढ़े पैमाने पर उतरने का फैसला किया है. नगर निकायों के माध्यम से जनता की सेवा को प्रतिबध्द भाकपा इन चुनावों में वामपंथी दलों के साथ मिल कर उतरेगी. उपर्युक्त सहित अन्य कई निर्णय यहां संपन्न भाकपा की दो दिवसीय बैठक में लिये गये हैं. बैठक में भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड डी. राजा, सांसद दोनों दिन उपस्थित रहे. बैठक की अध्यक्षता का. गफ्फार अब्बास एडवोकेट ( मथुरा ) ने की. बैठक में लिये गये अन्य प्रमुख फैसलों के बारे में जानकारी देते हुये भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि पूरे प्रदेश में भारत रत्न डा. भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस 14 से 21 अप्रेल तक मनाया जायेगा. इस अवसर पर जाति की विडम्बना को मिटाने, दलितों और कमजोरों के उत्पीडन को समाप्त करने और उनके सामाजिक आर्थिक तथा शैक्षिक उत्थान के रास्ते तलाशने हेतु विचार गोष्ठियां, मीटिंगें तथा अन्य कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे. राज्य काउंसिल बैठक में उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनैतिक स्थिति पर भी गहनता से चर्चा हुयी. राज्य काउंसिल हाल ही में सत्तारुढ सरकार के क्रिया कलापों और उसके मूल्यांकन के लिये कुछ और दिन इंतजार करना चाहती है. लेकिन प्रदेश सरकार के इस अल्प कार्यकाल में कई समस्यायें खड़ी होगयी हैं जिन पर किसी को भी चिंतित होना स्वाभाविक है. इस अवधि में जघन्य अपराध बढे हैं, अपराधी तत्वों के हौसले बरकरार हैं और वह आमजनता ही नहीं पुलिस बलों पर भी हमलाबर हैं. हाल में ही तीन पुलिस कांस्टेबिलों की दुखद हत्या गंभीर मामला है. लूट कत्ल और अन्य अपराध भी बेखौफ तरीके से जारी हैं. लगता है योगीजी का ‘सुपर एक्टिविस्म’ मीडिया में सुर्खियां बटोरने तक सीमित है. भाकपा राज्य काउंसिल ने गरीब आबादियों में शराब के ठेके खोले जाने का विरोध कर रही महिलाओं के उत्पीड़्न, उन पर लाठियां बरसाने और उन पर मुकदमे दर्ज कर आतंकित किये जाने के कदम को अनुचित मानते हुये उसकी आलोचना की है. सरकार के इस कदम से लगता है कि पूर्व की सरकारों की तरह यह सरकार भी शराब माफियाओं के हितों के पोषण में लगी है और और जनता के अच्छे उद्देश्यों के लिये किये जा रहे स्वत:स्फूर्त आंदोलनों को लाठी डंडे के बल पर दबाना चाहती है. मीटबंदी के बारे में भाकपा की राय है कि इसे राजनैतिक उद्देश्यों अर्थात गोरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों पर आक्रमण करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से लागू किया गया है. इसी तरह एंटी रोमियो अभियान के नाम पर आधुनिक दृष्टिकोण रखने वाले युवक युवतियों को उट्पीड़न का शिकार बनाया गया है. किसान कर्जा माफी पर भाकपा ने कहा कि यह एक और धोखा साबित हुआ है और किसानों में भारी निराशा है. हताशा में किसानों की आत्महत्याओं का दौर फिर शुरू हो गया है और बुंदेलखंड में हाल ही में कई किसानों ने आत्महत्या की है. भाकपा चाहती है कि किसानों के समस्त कर्जों को माफ किया जाये जैसाकि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अपने चुनाव अभियान में किसानों को भरोसा दिया था. इस कर्जमाफी के लाभ के दायरे में बटायीदार किसानों को भी लाया जाना चाहिये जिन्होने बड़े सूद पर सूदखोरों से कर्जा लिया है. क्षेत्रीय खेत मजदूरों को भी सहायता प्रदान करने का रास्ता निकाला जाना चाहिये. भाकपा राज्य काउंसिल ने अपनी इस मांग को दोहराया है कि नेशनल हाईवेज और स्टेट हाईवेज टोल- टैक्स मुक्त हों. भाकपा का तर्क है कि वाहन खरीद के समय, वाहन रजिस्ट्रेशन कराने के समय उपभोक्ताओं से भारी टैक्स बसूला जाता है और पेट्रोल डीजल पर सड़्क निर्माण के नाम पर विशिष्ट टैक्स ( सेस ) बसूला जाता है तो फिर एक अन्य टैक्स बसूलने का कोई औचित्य नहीं. सिवाय इसके कि यह जनता की बलपूर्वक की जारही सरकारी लूट है. भाकपा ने गत सरकार द्वारा निजी नलकूपों के शुल्क में की गयी लगभग चार गुना वृध्दि को किसानों की जर्जर आर्थिक हालत को और खराब करने वाला बताया और इस संबंधित आदेश को तत्काल रद्द करने की मांग की. भाकपा ने रोड्वेज कर्मचारियों, शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मचारियों पर छह माह तक हड़्ताल न करने की पाबंदी को तानाशाहीपूर्ण कदम बताते हुये इसे तत्काल वापस लेने की मांग की. भाकपा राज्य काउंसिल ने पांच राज्यों के चुनाव परिणामों की भी समीक्षा की. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बारे में राज्य काउंसिल ने कहा कि भाजपा ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे को धार देकर, खुल कर जातीय कार्ड खेलते हुये कल्पना से परे धन बहा कर और मीडिया की एकतरफा पक्षधरता के बल पर इन चुनावों को जीता है. चुनाव आयोग ने मतदान को सात चरणों में फैला कर और अन्य कई कदमों से भाजपा को जीतने में अप्रत्यक्ष रूप से मदद की है. यह लोकप्रिय जनादेश नहीं अपितु, छल बल, घृणित सांप्रदायिक और जातीय विभाजन तथा धन बल से हासिल किया गया बहुमत है जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जबर्दस्त भूमिका निभायी है. पंजाब में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन पूरी तरह समाप्त हो गया, गोआ में भी उसे करारी हार मिली और मणिपुर में भी बहुमत हासिल करने से भजपा पीछे छूट गयी. मगर गोआ और मणिपुर में भाजपा ने सारी मर्यादाओं को ताक पर रख कर राज्यपालों की मदद से और विधायकों को खरीद कर अपनी सरकार बनाई है. यह मोदी लहर नहीं थी जैसे कि दाबे किये जारहे हैं. अब अपने विभाजनकारी एजेंडे को धार देने को भाजपा ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में घनघोर कट्टर चेहरों को कमान सौंपी है. बैठक को संबोधित करते हुये कामरेड डी. राजा ने कहा कि देश, संविधान और जनता को भाजपा और संघ परिवार की फासीवादी नीतियों से भारी खतरा है. इसके मुकाबले के लिये धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और वामपंथी शक्तियों को एक मंच पर लाने की जरूरत है. भाकपा इसके लिये प्रयासरत है और वामपंथी दलों समेत अन्य लोकतांत्रिक दलों से वार्ता जारी है. उन्हें भरोसा है कि ऐसी सभी शक्तियां मौके की नजाकत को पहचानेंगीं और देश हित में योजना बना कर मुद्दों के आधार पर एकजुट होकर काम करेंगी. उन्होने स्पष्ट किया कि इसे चुनावी गठबंधन नहीं समझना चाहिये. डा. गिरीश
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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

CPI ON Farmers Loan

कर्जमाफी: एक बार फिर ठगे गये किसान – भाकपा लखनऊ- 4 अप्रेल 2017, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि उत्तर प्रदेश के किसानों के साथ एक बार फिर धोखा हुआ है और सत्ता में आते ही किसानों के कर्ज माफ करने का प्रधान मंत्री मोदी और अमित शाह का वायदा एक बार फिर जुमला साबित हुआ है. किसानो के कर्जे माफ करने संबंधी उत्तर प्रदेश सरकार के बहु प्रतीक्षित फैसले पर भाकपा की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि भाजपा नेतृत्व ने अपने चुनाव घोषणा पत्र और चुनाव अभियान में सरकार गठन के फौरन बाद लघु और सीमांत किसानों पर बकाया कर्जों को माफ करने का वायदा किया था. लेकिन आज हुयी प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक में केवल 86 लाख किसानों का एक लाख तक का कर्ज माफ किया गया है. इन 86 लाख किसानों का एक लाख से ऊपर वाला कर्ज तथा अन्य करोड़ों किसानों पर लदी कर्ज की भारी धनराशि उनके सामने कठिन समस्या बने रहेंगे. प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों की संख्या 2 करोड़ 43 लाख के करीब है. उत्तर प्रदेश के किसानों की दयनीय हालत को देखते हुये उनके शेष कर्जे भी माफ किये जाने चाहिये और इस तरह की व्यवस्था की जानी चाहिये कि इसका लाभ बटाईदार किसानों और खेतिहर मजदूरों को भी मिले. लेकिन कर्जा माफी एक तात्कालिक राहत हुआ करती है. सरकार को किसान के संकट के पूर्ण समाधान के लिये एक सुगठित किसान नीति तैयार करनी चाहिये. केंद्र और उत्तर प्रदेश में एक ही दल की संपूर्ण बहुमत वाली सरकारों के रहते किसानों को उनसे भारी उम्मीदें हैं. डा. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश
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