भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

बिना शीर्षक के कुछ बातें

उत्तर प्रदेश के चुनाव चल रहे हैं। जब तक यह अंक सुधी पाठकों तक पहुंचेगा चुनाव खत्म हो चुके होंगे और जनता परिणामों का इंतजार कर रही होगी। फिर शुरू होगा परिणामों की समीक्षा का एक दौर और सरकार बनाने के लिए सम्भवतः जोड़-तोड़ का खेल। फिर आम जनता के बीच शायद एक लम्बी खामोशी? हमें इस खामोशी को तोड़ना होगा।
अभी साल भर भी नहीं हुआ है जब मीडिया भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल के लिए स्वयंभू सिविल सोसाइटी द्वारा चलाये गये आन्दोलन को चौबीसों घंटे दिखा रहा था या छाप रहा था। हमने तब भी मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े किये थे। इस आन्दोलन के समय जनता के मध्य गुस्सा था भ्रष्टाचार के खिलाफ और महंगाई के खिलाफ। उस गुस्से का इज़हार जनता को इस चुनाव में करना चाहिए था। यह इज़हार हुआ कि नहीं इसकी हकीकत तो 6 जून को ही पता चलेगी परन्तु मीडिया ने इन चुनावों से मुद्दों के अपहरण में जो भूमिका अदा की है, उसकी पड़ताल भी होनी ही चाहिए। सभी समाचार पत्रों एवं समाचार चैनलों पर केवल उन चार पार्टियों का प्रचार होता रहा जिन्होंने भ्रष्टाचार से कमाये गये अकूत पैसे में से कुछ सिक्के मीडिया को भी दे दिये थे। केवल इन्हीं दलों के प्रवक्ताओं को बुला-बुलाकर उन मुद्दों पर बहस की गयी जो मुद्दे चुनावों में होने ही नहीं चाहिए थे।
प्रदेश में वामपंथी दल अपने सहयोगी जनता दल (सेक्यूलर) के साथ लगभग सौ से अधिक सीटों पर चुनाव मैदान में थे। समाचार पत्रों ने इन दलों के प्रत्याशियों के प्रचार को प्रमुखता से छापने की तो बात ही न कीजिए, ‘अन्य’ और ‘संक्षेप’ में भी इन प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार को छापने की जहमत नहीं उठाई। समाचार चैनलों ने परिचर्चाओं में भाकपा नेताओं में से किसी को भी बुलाने की जहमत नहीं की।
प्रदेश के चारों प्रमुख राजनीतिक दल मुद्दों से दूर भागते रहे। ”तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार“ से चुनावी राजनीति का सफर शुरू करने वाली बसपा ”ब्राम्हण शंख बजायेगा, हाथी बढ़ता जायेगा“ और ”चढ़ गुंडों की छाती पर मुहर लगाओ हाथी पर“ के बरास्ते इस चुनाव में ”चढ़ विपक्ष की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर“ आ गयी। भाजपा ने राम मंदिर बनाने का मुद्दा फिर चुनाव घोषणापत्र में शामिल कर लिया। समाजवादी पार्टी का पूरा चुनाव अभियान मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण के इर्द गिर्द घूमता रहा। कांग्रेस सोनिया, राहुल और प्रियंका रोड शो करते रहे, सलमान खुर्शीद और बेनी बाबू मुसलमानों के आरक्षण का राग छेड़ते रहे। बहुत दिनों के बाद वामपंथी पार्टियों के उम्मीदवार बड़ी संख्या में चुनाव मैदान में थे। उन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में जनता के मुद्दों को उठाया।
पिछले चुनावों की तुलना में जनता ज्यादा तादात में मतदान केंद्रों तक गयी, यह अच्छी बात है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इन बढ़े मतदान प्रतिशत की हकीकत क्या है। जनता ने चुनाव सुधारों के नाम पर ”राईट टू रिजेक्ट“ की हवा ही निकाल दी। बहुत कम मात्रा में चुनाव आयोग के इस हथियार का इस्तेमाल जनता ने किया। यह दोनों बातें लोकतंत्र के मजबूत होने का संकेत हैं।
- प्रदीप तिवारी
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हमे जरूरत है चुनाव सुधारों की

उम्मीदवाद को अस्वीकार करने (राईट टु रिजेक्ट) का चुनाव आयोग द्वारा जो सुझााव दिया गया है उस पर विचार करते हुए उसका संदर्भ महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका सुझाव असल में कुछ अस्पष्ट सा है। उसके निहितार्थ स्पष्ट नहीं है। किसी चुनाव क्षेत्र में निर्वाचन आयोग जनता से क्या अपेक्षा करता है- वह क,ख,ग या सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार कर दे? यदि मतदाताओं का कुछ प्रतिशत हिस्सा अस्वीकार करने के लिए कहे तो उस प्रतिशत को 50 से अधिक होना चाहिए। उसके बाद भी, मान लें यदि 49 प्रतिशत ने अस्वीकार करने के अपने विकल्प का प्रयोग नहीं किया तो यह एक मुद्दा बन जाता है जिस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
इसमें एक खतरा यह भी है कि चुनाव के बहिष्कार की बात भी बन सकती है। इससे लोकतंत्र को मजबूत करने के लक्ष्य के बजाय, एक विपरीत नतीजा निकल सकता है जो एक अराजकता की दिशा में ले जा सकता है। चुनाव आयोग द्वारा एक तदर्थ किस्म का सुझाव है।
इसके बजाय, समय आ गया है कि देश व्यापक चुनाव सुधारों पर विचार करे। वर्तमान “फर्स्ट पास्ट दि पोस्ट” (जिसे सबसे अधिक मत पड़े उसे जीता हुआ मानने) का तरीका संतृप्ति के स्तर पर पहुंच गया है। यह हमारे जैसे लोकतंत्र में एक हद से आगे सफल नहीं हो सकता। एक संभव तरीका समानुपाती प्रतिनिधित्व की प्रणाली का हो सकता है। इस संबंध में हम अन्य देशों से भी सीख सकते हैं और सबसे बड़े लोकतंत्र में दूसरों से सीखने में कोई हानि नहीं।
“फर्स्ट पास्ट दि पोस्ट” की प्रणाली अब वास्तविकता को नहीं प्रतिबिंबित करती। उदाहरणार्थ, हाल के पंजाब में विधानसभा के चुनाव को लें जहां भारी मतदान हुआ। रिर्पोट थी कि 70 प्रतिशत के लगभग मतदान हुआ। पर काफी संभावना है कि ऐसे उम्मीदवार भी जीतेंगे जिन्हें लगभग 20 प्रतिशत मत ही मिले होंगे। यह हमारी व्यवस्था में एक अंतर्निहित कमजोरी है जिसे समानुपाती प्रतिनिधित्व की प्रणाली दूर कर सकती है। सभी पार्टियों को समान अवसर मिलना चाहिए। यह तब ही संभव है जब सरकार सभी पार्टियों के चुनाव के खर्च अपने ऊपर लेने के लिए राजी हो। जब एनडीए सत्ता में थी तो इन्द्रजीत सेन गुप्ता के नेतृत्व में इस मुद्दे पर विचार करने के लिए एक समिति बनी थी, डा. मनमोहन सिंह भी उस समिति में थे। समिति ने स्टेट फंडिंग (चुनाव का खर्च सरकार करे) की सिफारिश की थी। चुनाव आयोग स्वयं इस संबंध में कोई फैसले नहीं ले सकता है। वह एक स्वतंत्र निकाय है पर उसे भी अपनी शक्तियां संविधान से मिली हैं।
भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। चुनाव ही इसके अकेले स्रोत नहीं है। यह मौजूदा सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर करता है, जब तक उसे न बदला जाये, भ्रष्टाचार जारी रहेगा।
- डी. राजा
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सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

भविष्य के संघर्षों के लिए मार्गदर्शन करेगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं कांग्रेस

    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की अखिल भारतीय पार्टी कांग्रेस सामान्यतः हर तीसरे साल की जाती है। पार्टी कांग्रेस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सर्वोच्च निकाय है।
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं कांग्रेेस का आयोजन 27 से 31 मार्च 2012 तक पटना में किया जा रहा है। पार्टी कांग्रेस राष्ट्रीय परिषद द्वारा प्रस्तुत राजनैतिक और संगठनात्मक रिपोर्टों पर विचार-विमर्श करेगी, तदनुसार कार्य करेगी; पिछली अवधि में पार्टी के कामकाज की समीक्षा करेगी और वर्तमान स्थिति में पार्टी की कार्यनीतिक लाईन और नीति को तय करेगी।
    राजनैतिक प्रस्ताव और उसके साथ पेश की जाने वाली रिपोर्टें कांग्रेस के समक्ष बुनियादी दस्तावेज होंगे जिनमें उस कार्यनीतिक लाईन और नीति को शामिल किया गया है जिन पर पार्टी वर्तमान अवधि में अनुसरण करेगी। सभी राज्यो की समूची सदस्यता और पार्टी शाखाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग एक हजार डेलीगेट, वैकल्पिक डेलीगेट और पर्यवेक्षक कांग्रेस में भाग लेंगे और इन दस्तावेजों के आधार पर पार्टी कांग्रेस के इन पांच दिनों के दौरान विचार-विमर्श करेंगे।
    पार्टी संविधान के अनुसार, राजनीतिक प्रस्ताव के प्रारूप को पार्टी कांग्रेस के शुरु होने से दो महीने पहले प्रसारित किया जाता है। न केवल कांग्रेस के डेलीगेटों बल्कि पार्टी के सभी सदस्यों को राजनीतिक प्रस्ताव के प्रारूप पर अपने संशोधन एवं सुझाव भेजने का अधिकार है।
    राष्ट्रीय परिषद की 4 से 6 जनवरी 2012 तक हैदराबाद में सम्पन्न मीटिंग ने इस प्रारूप को अंतिम रूप दिया और प्रेस को जारी किया। पार्टी के जो भी लोग इस दस्तावेज को ध्यान से पढ़ना चाहते हैं इसके बारे में उनके सुझावों और आलोचना का स्वागत है और जब डेलीगेट सेशन में इन दस्तावेजों पर विचार-विमर्श किया जायेगा तो उनके विचारों पर समुचित ध्यान दिया जायेगा।
    यह कम्युनिस्ट पार्टी के आंतरिक पार्टी लोकतंत्र का सबूत है, पंूजीवादी पार्टियों से इतर, जहां नेताओं द्वारा पूर्णाधिवेशन में दिये गये सुझावों को उन पार्टियों के वर्तमान नीतिगत बयान माल लिया जाता है।
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में देश को आगे ले जाने के लिए पार्टी की नीति, उसकी रणनीति और कार्यनीति को तय करने में उसकी सभी इकाईयों को हर स्तर के नेतृत्व की सामूहिक समझ शामिल रहती है।
    आज देश की स्थिति की गंभीरता एवं जटिलता और आगे बढ़ने का रास्ता तलाश करने के लिए आम लोगों की गहरी उद्धिनता और जबर्दस्त ललक इस गहन एवं सामूहिक प्रयास की अपेक्षा करती है।
    जैसा कि राजनीतिक प्रस्ताव की प्रस्तावना में ही कहा गया है:
    ‘‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं कांग्रेस एक ऐसे समय हो रही है जब देश अपने एक गंभीरतम संकट का सामना कर रहा है, अर्थव्यवस्था एक गंभीर गिरावट का शिकार हो रही है, मुद्रास्फीति आसमान छू रही है, निवेश कम हो रहा है, औद्योगिक उत्पादन में इतनी गिरावट आ रही है, जितनी पहले कभी नहीं आयी, कृषि विकास ह्वासोन्मुख है, रुपये का विनिमय मूल्य निम्नतम स्तर पर है, मेहनतकश लोगों की आमदनी पर जबर्दस्त हमला हो रहा है, अतिरिक्त रोजगार सृजन घटता जा रहा है, गरीबी बढ़कर नयी ऊंचाईयां छू रही है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, यहां तक कि किसान अपनी फसलों को जला रहे हैं। भारत का यह आर्थिक संकट दो वर्षों में दूसरी बार भूमंडलीय मंदी के एक अन्य दौर-दौरे की पृष्ठभूमिम में जारी है। जनता अभूतपूर्व कठिनाईयों की शिकार हैै।
    ‘‘भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक के बाद दूसरी रिपोर्ट में दोषी ठहरायी गयी यह दागदार सरकार कुछ भी नहीं कर रही है और आम आदमी की अभूतपूर्व तकलीफों के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील है। वह केवल नवउदारवादी नीतियों के लिए पथ प्रशस्त करने में लगी है। यह सरकार आर्थिक संकट को अधिकाधिक संकटपूर्ण बनाते हुए और बेईमान तरीकोें के जरिये सत्ता में बने रहने की कोशिश करते हुए अपने तथाकथित आर्थिक सुधार कार्यक्रम के लिए संसद का अनुमोदन हासिल करने के लिए अक्सर भाजपा से साठगांठ करती रहती है।
    कोई भी याद कर सकता है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद पूंजीपति वर्ग और देश-विदेश में उसके पीछे चलने वाले लोगों ने दावा कर दिया था कि यह इतिहास का अंत है और उन्होंने नव-उदारवाद को विकास के एकमात्र रास्ते के रूप में प्रोजेक्ट किया। उन्होंने जोर देकर कहा कोई अन्य विकल्प है ही नहीं (देयर इज जो आल्टरनेटिव-टिना)। उन्होंने घोषणा कर डाली, मार्क्सवाद मर गया है और समाजवाद विफल हो गया है। वह जो कुछ लिख रहे थे उसकी रोशनाई भी सूखी न थी और वे विजयोत्सव के तौर पर जो शोर मचा रहे थे उसकी आवाज अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि दुनिया एक गहरे और लंबे आर्थिक, वित्तीय एंव मौद्रिक संकट में फंस गयी। इस संकट ने किसी एक देश को नहीं बल्कि विकसित विश्व के सभी देशों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
    राजनीतिक प्रस्ताव के प्रारूप में इस संकट के बारे में, और मेहनतकश लोगों के कंधों पर इसका बोध डालकर पूंजीपति वर्ग जिस तरह इस संकट से पार पाने की कोशिश कर रहा है उसके बारे में सुस्पष्ट, तीक्ष्ण पर सारगर्भित विवेचना की गयी है।
    पर जनता पूंजीवाद के हमले को सिर झुकाकर स्वीकार करने को तैयार नहीं है। जनता इस हमले के विरुद्ध कार्रवाईयों पर उतर रही है। यूरोपीय संघ में, ग्रीस, पुर्तगाल और इटली में लाखों लोग इसके विरुद्ध सड़कों पर उतरे हैं। अमरीका तक में भी ‘‘आक्युपाई वाल स्ट्रीट’’ (वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो) नामक आंदोलन में शामिल लोग पिछले कई महीनों से पूंजीवाद के सबसे बड़े किले पर चढ़ाई कर रहे हैं। वे उस बढ़ती बेरोजगारी और भयानक आर्थिक असमानता के विरुद्ध आवाज बुलंद कर रहे हैं जो पंूजीवादी विश्व के हालात का विशेष लक्षण है। वे इसे ‘‘99 प्रतिशत के संघर्ष’’ का नाम देते हैं।
    यूपीए-दो द्वारा सब कुछ ठीक-ठाक बताने की तमाम कोशिशों के बावजूद भारत भी इस संकट का सामना कर रहा है। नवउदारवाद ने और कार्पोरेट इजारेदारों, ऊंचे पदों पर बैठे नौकरशाहों और शासक पार्टियों के अत्यंत ओछे राजनीतिज्ञों के बीच जो सांठगांठ कायम करता है उसने भ्रष्टाचार को आसमान की ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया है। देश के प्रशासन के हर स्तर पर भ्रष्टाचार है। आम जनता भ्रष्टाचार से हददर्जा पीड़ित और दुखी है। नवउदारवाद की आर्थिक नीतियों और सर्वव्यापक भ्रष्टाचार ने देश के आम लोगों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध सड़कों पर उतार दिया है।
द    वास्तव में, देश के ज्यादातर हिस्सों की जनता के विभ्न्नि तबकें सरकार की नीतियों के चलते उन पर लाद दी गयी मुसीबतों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।
द    वामपंथी एवं जनवादी पार्टियों द्वारा महंगाई के खिलाफ चलाये जा रहे निरंतर आंदोलनों और संघर्षों का असर भैंस के आगे बीन बजाने की तरह हो रहा है। और मानो उन्हें चिढ़ने के लिए तथा इजारेदारों की मदद करने के लिए, सरकार एक के बाद एक ऐसे कदम उठा रही है जो मुद्रास्फीति और महंगाई की आग में घी का काम कर रही है।
द    कई राज्यों में, राज्यों और केंद्र सरकारों द्वारा औद्योगीकरण के लिए, एसईजेड स्थापित करने के लिए, अथवा एक या दूसरे प्रोजेक्ट के नाम पर बड़े पैमाने पर जमीन हथियाने की चालों का किसान जबर्दस्त विरोध कर रहे हैं। हजारों एकड़ जमीन गैर-कृषि उद्देश्यों की भेंट चढ़ गयी है। इनमें से ज्यादातर भू-माफिया या बिल्डर माफियाओं तथा रीयल इस्टेट सट्टेबाजों द्वारा हथिया ली गयी है। इससे लाखों गरीब किसानों, खेत मजदूरों और अपनी आजीविका के लिए भूमि पर निर्भर अन्य लोगों के विस्थापित होने के अलावा और इन्हें पुनः बसाने और पुनः स्थापित करने की कोई उम्मीद भी नहीं है-इससे जरूरी खाद्य उत्पादन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इससे देश पूरी तरह खाद्यान्नों का आयातक बनता जा रहा है। उपनिवेशी दौर के भूमि अधिग्रहण कानून 1884 की जगह एक न्यायपूर्ण और किसान समर्थक भूमि अधिग्रहण कानून लाने का काम आज तक सपना ही बना हुआ है।
द    सरकार की खाद्य सुरक्षा कानून लाने की बातें एक मजाक बन कर रह गयी हैं। इससे लाभ पाने वाले लोगों की श्रेणियों और संख्या के मामले में मनमानेपन से तथा प्रत्येक श्रेणी को दिये जाने वाले सब्सिडी अनाज की मात्रा में मनमानेपन से वास्तव में वे लोग इससे वंचित हो जायेंगे जो कुछ राज्यों में जैसे (केरल, तमिलनाडु में) पहले से बहुत अधिक सब्सिडी पर (अथवा मुफ्त तक) राशन पर रहे हैं।
    जनता के आम सरोकारों के मुद्दों पर तथा अपने जनवादी एवं दशकों पुराने ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमलों के खिलाफ फैक्टरी, आफिसरों और सेवा क्षेत्र के कर्मचारी और मजदूर स्त्री-पुरुष, संगठित एवं असंगठित लाखों लोग दो वर्ष से धिक समय से आंदोलन एवं संघर्ष की राह पर हैं।
    प्रसंगवश, ‘बदलाव’ के नारे के साथ पं.बंगाल में सत्ता में आने वाली ममता बनर्जी सरकार ने अभी हाल ही में बड़ी ढिठाई से यह घोषणा की है कि वह सरकारी दफ्तरों में न तो कर्मचारियों के संगठनों की इजाजत देगी और न ही उन्हें आंदोलन करने देगी।
    मजदूर और कर्मचारी ट्रेड यूनियन आंदोलन के 150 वर्षों से अधिक समय से इस तरह के दमन का सामना करते आ रहे हैं और वे ऐसी धमकियों से चुप बैठने वाले नहीं। केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों और औद्योगिक फेडरेशनों ने सरकार की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ 28 फरवरी को संयुक्त रूप से देशव्यापी हड़ताल का आह्वान दिया है। निस्संदेह इस हड़ताल से अन्य तबकों के आंदोलनों को भी जबर्दस्त प्रेरणा मिलेगी।
द    यूपीए सरकार ने देश के खुदरा व्यापारियों को भी नहीं बख्शा है। अमरीका और वालमार्ट जैसे बड़े बहुराष्ट्रीय खुदरा व्यापारियों के दबाव के आगे घुटने टेकते हुए उसने रिटेल कारोबार में एफडीआई की घोषणा की। भारत में रिटेल श्रंृखला की पहुंच केवल सभी शहरों और नगरों तक ही नहीं है बल्कि सभी गांवों और देश के सभी कोनों में हैं। तकरीबन 4.5 करोड़ लोग रिटेल के काम में लगे हैं जो उनके परिवारों के साथ हमारी जनता के लगभग  14-15 करोड़ लोगों को आजीविका प्रदान करते हैं। सरकार का यह कदम उनमें से अधिकांश को आजीविका से वंचित कर देगा जबकि इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अत्याधिक मुनाफे के दरवाजे खोल देगा। पहली बार ऐसे करोड़ों रिटेल कारोबारियों ने भी 1 दिसंबर 2011 को विरोध के लिए हड़ताल का सहारा लिया। वामपंथी और अन्य पार्टियों तथा यूपीए के सहयोगियों के विरोध के चलते तथा हड़ताल की इस कार्रवाई के चलते सरकार को इस कदम को फिलहाल टालने पर मजबूर होना पड़ा। लेकिन यह केवल अस्थायी राहत है, क्योंकि सरकार ने बाद में किसी अवसर पर एफडीआई लाने की अपनी मंशा की दृढ़ता से घोषणा की है। इससे संघर्ष का एक और मोर्चा ही खुला है।
द    आमतौर पर अपने को किसी भी जन आंदोलन से दूर रखने वाले मध्य वर्ग के तबके भी भ्रष्टाचार को खत्म करने की  मांग के साथ सरकार के खिलाफ खुले आंदोलन में खिंच आये गये हैं। भ्रष्टाचार देश के राष्ट्रीय संसाधनों को सोख ले रहा है, सरकार बड़ी संख्या के लोगों की जेबों को काटकर मुट्ठीभर लोगों की जेबें भर रही है और चौतरफा विकास में बाधा खड़ी कर रही है। भाकपा और वामपंथी पार्टियां लगातार भ्रष्टाचार से पर्दा हटाती रही हैं ओर इसके खिलाफ लड़ती रही हैं। वे इस बुराई को दूर करने के लिए एक मजबूत व कारगर लोकपाल कानून के साथ ही सभी आवश्यक कदमों की मांग कर रही हैं।
द    हम छात्रों के अच्छी शिक्षा के अधिकार के लिए, युवाओं के रोजगार के लिए और महिलाओं के लिंग समानता और सशक्तीकरण के लिए आंदोलनों को भी देख रहे हैं।
    राजनीतिक प्रस्ताव सामाजिक न्याय की जरूरत पर जोर देता है जिससे अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित तबके शेष जनता की बराबरी का दर्जा हासिल कर सकंेगे। केवल इसी के जरिये वास्तविक समावेशी (इंकलूसिव) विकास और चौतरफा प्रगति सुनिश्चित हो सकती है।
    यह प्रस्ताव क्षेत्रीय पार्टियों, उनकी सकारात्मक एवं नकारात्मक विशेषताओं पर विशेष ध्यान देता है तथा आने वाली अवधि में सामाजिक बदलाव लाने के लिए व्यापक जनवादी एकता का निर्माण करने में उनकी भूमिका के महत्व पर जोर देता है।
    राजनीतिक प्रस्ताव इन सभी उभरते संघर्षों और जन आंदोलनों की ओर ध्यान आकर्षित करता है और सत्ता पर काबिज पंूजीपतियों और अर्द्ध-सामंती भूस्वामियों के खिलाफ इन सभी स्वतःस्फूर्त आंदोलनों और संगठित आंदोलनों के बीच समन्वय बनाने एवं उनसे संपर्क साधने की जरूरत को रेखांकित करता है। सही दिशा और स्पष्ट लक्ष्य और सकारात्मक दिशा के अभाव में बहुत-से संघर्ष और आंदोलन गतिरोध और अवरोध का शिकार हो गये हैं फिर चाहे वे कितने भी व्यापक और जुझारू हों।
    इसलिए जरूरत है एक सजग, सक्रिय और मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी की जो वास्तविक हालात की ठोस वास्तविक सच्चाई के अनुरूप मार्क्सवाद-लेनिनवाद की वैज्ञानिक एवं क्रांतिकारी विचारधारा से लैस हो, जरूरत है एक ऐसी पार्टी की जिसका आम जनता से घनिष्ठ संपर्क हो। प्रस्येक वर्ग और जन संगठन में कम्युनिस्टों को ऐसे संघर्षों के जरिये मजदूर-किसान सहमेल का निर्माण करने और जनता के बाकी सभी संघर्षशील तबकों को उनके इर्द-गिर्द लामबंद करने के लिए कड़े प्रयास करने होंगे। उन्हें सत्ता में बने रहने के लिए दो पार्टियों की पूंजीवादी व्यवस्था थोपने के सभी प्रयासों का विरोध करना होगा।
    प्रस्ताव प्रमुख राजीनीतिक एवं सांगठनिक कार्यभार के रूप में भाकपा को मजबूत बनाने का आह्वान करता है। इससे वामपंथी एवं जनवादी एकता को व्यापक बनाने में, सभी जनतांत्रिक शक्तियो की व्यापकतम एकता कायम करने में तथा जनवादी क्रांति के कार्यभार को पूरा करने के लिए नेतृत्व में एक नया वर्ग समीकरण लाने में क्रांतिकारी रूपांतरण में सहायता मिलेगी।
    राजनीतिक प्रस्ताव के अंत में कहा गया है: ‘‘हमारा रास्ता मार्क्सवाद-लेनिनवाद का रास्ता है जो हमारे आंदोलन के अनुभव के आधार पर हमारी अपनी स्थितियों पर लागू किया गया हो।’’
    ‘‘हमारा लक्ष्य समाजवाद बना हुआ है जो हमारे इतिहास से और हमारी विशिष्ट विशेषताओं के साथ विकसित है। पंूजीवाद का अंत तय है। समाजवाद ही एकमात्र विकल्प है।’’
- ए.बी. बर्धन
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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

CPI SHALL PERFORM BETTER IN UTTAR PRADESH THAN PROJECTED BY MEDIA

PERFORMANCE OF COMMUNIST PARTY OF INDIA IN UTTAR PRADESH ASSEMBLY ELECTIONS

 
GENERAL ELECTION YEAR SEATS CONTESTED WON VOTES POLLED %AGE OF VOTES IN STATE %AGE VOTES AT CONTESTED SEATS
1951 43 0 155869 0.93 7.21
1957 90 9 840348 3.83 16.52
1962 147 14 905696 5.08 14.86
1967 96 13 692942 3.23 14.87
1969 106 4 715092 3.05 12.01
1974 40 16 672881 2.45 25.57
1977 29 9 611450 2.57 34.91
1980 155 7 917773 3.55 9.75
1985 161 6 894620 3.04 8.1
1989 68 6 606885 1.56 9.6
1991 44 4 388853 1.04 9.96
1993 37 3 321617 0.64 7.5
1996 15 1 327231 0.59 18.99
2002 5 0 69548 0.13 10.07
2007 21 0 48226 0.09 1.78
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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

गला घोंटा जा रहा है अरब वसंत का

कई प. एशिया और उत्तरी अफ्रीकी देशों में अरब वसंत की शुरूआत की पहली वर्षगांठ के साथ यह साफ है कि अमरीकी साम्राज्यवादी इस क्षेत्र पर अपना दबदबा बनाने के लिये ही नही बल्कि उत्तर एवं पश्चिमी अफ्रीका के बाकी देशों पर भी अपना प्रभुत्व कायम करने के लिये भी इस अरब संत का गला घोंटने पर उतारू हैं। इन क्षेत्रों के अधिकांश देशों में अशांति के लिये सीधे-सीधे अमरीकी जिम्मेदार हैं या फिर अपने गुर्गों को बचा रहे हैं या जनवादी आंदोलनों की सहायता करने की आड़ में अपने हाथ की नयी कठपुतलियों को वहाँ सत्ता में बिठा रहे हैं।
 25 जनवरी को सैकड़ों हजारों लोग मिस्र की राजधानी कैरो के तहरीर चौक पर तथा अलैक्जेंडरिया सहित अन्य शहरों की सड़कों पर जमा हो गये। वे होसनी मुबारक के आतंक के खिलाफ विद्रोह की पहली वर्षगांठ मना रहे थे। होसनी मुबारक को केवल 18 दिन के जन विद्रोह के बाद सत्ता च्युत कर दिया गया था और अब उनके विरूद्ध अत्याचारों के कई मामलों पर और तीन दशकों के कुशासन के लिये कई मुकद्दमें चलाये जा रहे हैं।
 तहरीर चौक पर जमा भीड़ मोटा-मोटी नागरिकों पर सेना के नियंत्रण की फौरी खात्मे की मांग करने वाले युवकों और संसद में व्यापक सफलता पाने वाले राजनीतिक रूपांतरण का जश्न मना रहे इस्लामवादियों के बीच विभाजित थी। मुस्लिम ब्रदरहुड (अखवानुल मुसलमीन) ने, जो लगभग पूरी 20वीं शताब्दी में गैरकानूनी करार रहे, फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी (एफजेपी) के नाम से एक नयी राजनीतिक पार्टी गठित की और हाल में हुए चुनावों में वह अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और अब वह इस्लाम के समर्थक एक अन्य धार्मिक संगठन सलाफिस्ट के साथ बहुमत में है। सलाफिस्ट इस्लाम ने भी उन लोगों का साथ देने की कोशिश की जो कहते हैं कि क्रांति अभी खत्म नहीं हुई हैं। लेकिन व्यापक जमावड़े के बहुमत  ने उन्हें अलग-थलग कर दिया। जिस समय मुख्य तहरीर चौक पर उन नौजवानों का कब्जा था जिन्हें लगता था कि इसका जश्न मनाने वाले लोगों से क्रांति के साथ धोखा दिया, उस समय एफजेपी के समर्थकों को तहरीर चौक के बाहर एक कोने में धकेल दिया गया। मुबारक के सत्ता से बाहर होने के बाद से देश पर शासन कर रही सर्वोच्च सेना परिषद (एससीएएफ) पर तानाशाह हुकूमत की नीतियों को चलाने का आरोप लगाया जा रहा है। नौजवानों ने ट्रैफिक केंद्रो पर कई शिविर भी लगाये हैं और वे कह रहे हैं कि जब तक सशस्त्र सेनाएं सत्ता को संक्रमणकालीन नागरिक सरकार को नहीं सौंपती उनका धरना जारी रहेगा।
 हालांकि एससीएएफ बार-बार यह आश्वासन देती है कि वह फरवरी के तीसरे हफ्ते में राष्ट्रपति के चुनाव संपन्न हो जाने पर सत्ता नागरिक सरकार के हाथों में सौंप देगी, लेकिन युवा पीढ़ी उन पर यकीन करने को तैयार नहीं। दरअसल, यह आम आशंका है कि अमरीकी विदेशी मंत्री हिलेरी क्लिंटन कठपुतली शासन को जारी रखने के लिये सेना और एफजेपी के बीच सौदा कराने में कामयाब हो गयी हैं।
 लोगों को आशंका है कि अखवानुल मुसलमीन को जहां सरकार का गठन करने दिया जायेगा, वहीं असली ताकत राष्ट्रपति के हाथों में बनी रहेगी जिसे सशस्त्र सेना मनोनीत करेगी। स्वाभाविक है कि इस बात से मुबारक के आतंकवादी शासन के खिलाफ लड़ने वाली युवा पीढ़ी हताश है। मीडिया के मुख्य समाचारों में लोगों की यह भावना प्रतिबंबित हो रही है। अधिकांश समाचार पत्रों ने सड़कों पर जनतांत्रिक परिवर्तनों की मांग करते हुए व्यापक जनगण के सड़कों पर उतरने के बाद क्रांति के पुनः उठ खड़े होने की प्रशंसा की। दैनिक अल-शोरोक ने मुख्य शीर्षक ‘क्रांति जारी है’ के अंतर्गत कहा कि लाखों मिस्रवासी ‘‘सैन्य शासन का अंत’’ देखना चाहते हैं और सरकारी दैनिक अल-अहराम तक ने घोषणा की कि ‘‘लोग चाहते हैं कि क्रांति जारी रहे’’। तहरीर चौक पर व्यापक जमा होती भीड़ के एक बड़े चित्र के साथ उसने यह शीर्षक छापा।
 तहरीर चौक के एक कोने में धकेल दिये गये इस्लामीवाद जहां जनवाद की प्रशंसा में नारे लगा रहे थे वहीं, मुख्य भीड़ एससीएएफ के खिलाफ नारे बुलंद कर रही थी और उस पर प्रति क्रांति को चलाने का आरोप लगा रही थी। दोनों ओर ही जनवादी अधिकारों की गूंज थी, वहीं नौजवान रोटी, रोजगार और आर्थिक न्याय की मांग पर ज्यादा जोर दे रहे थे। स्वाभाविक रूप से, दृष्टिकोण में इस अंतर का परिणाम दोनों पक्षों के बीच झड़प था। अगले दिन शुक्रवार (27 जनवरी) को यही देखा गया और वहां उनके बीच झड़प हो गयी।
 शुक्रवार की नमाज के बाद विभिन्न मस्जिदों से हजारों लोग तहरीर चौक की ओर चल पड़े ताकि 25 जनवरी से वहां धरने पर बैठे लोगों के साथ शामिल हो सकें। नमाज के दौरान उनके मुल्लाओ ने अपनी तकरीर में कहा था कि ‘‘क्रांति ने अपने सभी लक्ष्य हासिल नहीं किये हैं’’ और सशस्त्र बल अरब वसंत का गला घोंट रहे हैं। जुम्मे की नमाज के बाद आने वालों में हजारों महिलाएं भी शामिल हो गयीं और वे चाहती थीं कि इस्लामवादी तहरीर चौक के आस-पास की जगह खाली कर दें जिससे टकराव भड़क उठा। यह कुछ हद तक तब शांत हुआ जब एफजेपी वालंटियरों ने अपने अनुयायियों से पीछे हट जाने को कहा क्योंकि लाखों प्रदर्शनकारी आम तौर पर सशस्त्र सेनाओं के खिलाफ थे और एफजेपी को उसी थैली का चट्टा-बट्टा माना जाता है।
 हालांकि अभी तक ऐसी कोई भी संगठित राजनीतिक शक्ति नहीं उभरी है जो जनवादी शक्तियों के साथ असली वर्ग संघर्ष का नेतृत्व करने में सक्षम हों, फिर भी नौजवान ऐसी क्रांति करने पर आमादा लगते हैं जिसके मुख्य नारे रोजगार एवं भोजन जैसे आर्थिक मुद्दों से ज्यादा जुड़ते जा रहे हैं।
 दूसरे देशों में भी स्थिति ऐसी ही लगती है। लीबिया में, जहां नाटों के क्रूर हमले के जरिये तानाशाह मोआमर गद्दाफी की सत्ता को पश्चिमी ताकतों ने उखाड़ फेंका था, पर त्रिपोली में सत्ता में बैठायी गई कठपुतली सरकार अब भी पूरे देश पर नियंत्रण की स्थिति में नहीं है। उसकी सत्ता राष्ट्रीय राजधानी और कुछ ऐसे स्थानों तक सीमित हैं जहां तेल के कुएं हैं। सबसे ज्यादा आबादी वाला खलीद शहर अब भी गद्दाफी के वफादारों के नियंत्रण में है।
 लेकिन अरब जगत के संबंध में सबसे ज्यादा चिढ़ पैदा करने वाला मुद्दा यह है कि सत्ताच्युत और निर्मम तरीके से मार डाले गये तानाशाह के कथित समर्थक स्त्री-पुरूषों को यातनाएं देना जारी है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव-अधिकार से जुडे़ अधिकारियों ने भी नागरिकों के विरूद्ध बढ़ती हिंसा पर चिंता व्यक्त की है। वहां 60 नजरबंदी केंद्र हैं जिनमें 8000 से अधिक नागरिकों को लगातार यातनाएं दी जा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार उच्च आयुक्त नयी पिलये ने कहा है कि गद्दाफी शासन से लड़ने के लिये यूरोप के विभिन्न देशों से मंगाये गये अलग-अलग भूतपूर्व विद्रोही ग्रुपों ने देश भर के सैकड़ों से अधिक नजरबंद कैंपो में हजारों नागरिकों को कैद कर रखा है। उन्होंने प्रेस को बताया कि वहां यातनाएं जारी हैं, अदालतों के फैसलों के बिना ही लोग फांसी पर लटकाये जा रहे हैं, स्त्री-पुरूष दोनों से बलात्कार हो रहा है।’’ पिलये ने कहा कि उन्हें उप-सहारा अफ्रीकी कैदियों की विशेष चिंता है जिन्हें ब्रिगेड अपने आप ही भूतपूर्व तानाशाह गद्दाफी के लिये लड़ने वाला मान लेते हैं।
 अरब टाइम्स के अनुसार, ऐड गु्रप डाक्टर्स विदाउट बोर्डर्स ने लीबिया की मिस्रेट सिटी की जेल में 26 जनवरी को अपना काम बंद कर दिया क्योंकि उन्होने कहा कि वहां इतनी अधिक यंत्रणाएं दी जाती हैं कि कुछ कैदियों को इलाज के लिये केवल इसलिय लाया जाता है ताकि उन्हें आगे की पूछताछ के लायक बनाया जा सकें।  लीबिया में फौजी अराजकता का एक और नतीजा है नाइजीरिया व चाड जैसे उन अन्य अफ्रीकी देशो में हथियारों की तस्करी जहाँ अल-कायदा से जुडे़ धार्मिक कट्टरपंथी मौजूदा शासकों को सत्ता से हटाने में लगे हैं। संयोगवश, यह अमरीका और उसके नाटो सहयोगियों के लिये किसी चिंता का कारण नहीं है क्योंकि उनकी दिलचस्पी तो केवल समूचे क्षेत्र में अपने लिये तेल संसाधनों को बचाने में है।
 एक और ज्वलत बिंदु है यमन जहां का तानाशाह अली अब्दुल्ला सालेह अपने परिवार के साथ न्यू-यार्क भाग गया है। लेकिन देश में आज भी उथल-पुथल मची है। हालांकि आधिकारिक रूप से, यह दावा किया जाता है कि सालेह इलाज के लिये बाहर गया है, लेकिन यह निश्चित है कि वह सऊदी अरब की अगुवाई वाले खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) में नहीं लौटेगा। लेकिन उनके हाथ की दूसरी कठपुतली, सालेह का डिप्टी आवेद राब्वो मंसूर हदी का 24 फरवरी को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के नाटक में सरकार का मुखिया बनना तय है। लेकिन सत्तारूढ़ गुट की सत्ता राजधानी सेना तक सीमित है। सेना के अधिकांश कर्मी और कबीलाई मुखिया उन विद्रोही बलों का हिस्सा बन गये हैं जिनका दक्षिण के ज्यादातर क्षेत्रों पर नियंत्रण है। निश्चय ही सऊदी अरब वालों के लिये यही मुख्य चिंता का विषय होगा क्योंकि इसकी सीमा उनके तेल वाले समृद्ध इलाकों पर पड़ती है। प्रसंगवश, सऊदी अरब का यह तेल समृद्ध इलाका भी पिछले दस महीनों से विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। सऊदी अरब के शासक इस विरोध के लिये ईरान को दोषी ठहराते हैं क्योंकि इस इलाके में शिया मुसलमान बसते हैं।
 दरअसल, जीसीसी के अधिकांश कठपुतली शासनों के लिये ईरान की सच्चाई इतनी खतरनाक है कि वे अपनी आम जनता की साम्प्रदायिक सम्बद्धता के परे कुछ भी देखने को तैयार नहीं। बहरीन जीसीसी देशों में से एक ऐसा देश है जहां ट्यूनीशिया और मिस्र के जनवादी उभार के साथ व्यापक विद्रोह देखने को मिला। आबादी का व्यापक बहुमत शिया है और शासक अल-खलीफा, सुन्नी सम्प्रदाय से हैं। वहां की जनता विद्रोह में उठ खड़ी हुई और दो से अधिक सप्ताह तक पूरे देश को ठप्प कर दिया। जन-उभार का समर्थन करने की बजाय, अमरीका की सरपरस्ती में जीसीसी ने जन-विद्रोह को कुचलने के लिये सशस्त्र सेना भेज दी। सशस्त्र हस्तक्षेप की इस दलील को उचित ठहराया गया कि जन-विद्रोह ईरान का खेल था। कतर और यू ए ई में भी यही चाल अपनायी गयी। वहां भी जनता ने विद्रोह कर दिया था। जीसीसी का सैनिक हस्तक्षेप बहरीन में भी जारी है और वहां लोगों को फांसी पर लटकाया जा रहा है और उन्हें उत्पीड़ित किया जा रहा है। 25 जनवरी को भी 18 वर्षीय एक युवक को विद्रोह में शामिल होने के कारण फांसी पर लटका दिया गया।
 जबकि यमन और बहरीन पर अरब लीग, बल्कि सही कहें तो जीसीसी की नजर है-वहीं सऊदी शासक अब अमरीका और नाटो ताकतों को बुलाने को तैयार है। ताकि असद हुकूमत के खिलाफ उपयुक्त विद्रोह खड़ा करने के अपने सभी प्रयासों के तहत सीरिया में सीधे हस्तक्षेप कर सकें। हालांकि बढ़ते विद्रोह और नागरिकों पर अत्याचारों की खबरें मीडिया में लगातार दी जा रही है, तथ्य यह है कि असद हुकूमत ने अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ मसलों को कमोवेश सुलझा लिया है। इससे अरब लीग इतना कुढ़ गया है कि उसने एक महीने के भीतर 165 संसदीय आब्जर्वर मिशन को वापस बुलाने की घोषण कर दी है। सऊदी शासकों ने सीरियाई राष्ट्रीय परिषद, जो विद्रोहियों का संगठन है, को मान्यता देने की अपनी मंशा की घोषणा कर दी है हालांकि यह संगठन ज्यादातर कागजों पर ही है। कारण यह है कि सीरिया के वास्तविक प्रतिनिधि हस्तक्षेप के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के पास पहुंच गये हैं। यह स्मरण किया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव द्वारा अमरीका और नाटो को लीबिया में हस्तक्षेप की इजाजत दी गयी थी ‘ताकि नागरिकों की रक्षा की जा सके’। इसकी आड़ में लीबिया पर पूर्ण हमला बोल दिया गया। हजारों लोग मारे गये। सीरिया पर भी ऐसे हमले की योजना बनायी जा रही हैं। सऊदी अरब को डर हैं कि असद हुकूमत अरब शासकों की बजाय ईरान के ज्यादा करीब हैं। (शमीम फ़ैज़ी द्वारा मध्य पूर्व से)
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से प्रदीप तिवारी का चुनाव प्रसारण

मतदाता भाइयों और बहिनों,
पिछले बीस-पच्चीस सालों में आपने बारी-बारी से बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा को जिता कर उन्हें प्रदेश में सरकार बनाने का मौका दिया तो केन्द्र में भी सरकार बनाने के अवसर मुहैया कराये। आपने इन पर विश्वास किया परन्तु बार-बार धोखा खाया। सरकार बनाने के बाद इन सभी दलों ने विनाशकारी नई आर्थिक नीतियों को ही लागू किया, जिसमें आम जनता की कोई जगह नहीं है। सरमायेदारों का मुनाफा बढ़ा, उनकी सम्पत्तियों में हजारों गुना की बढ़ोतरी हुई, अपराध बढ़े, भ्रष्टाचार बढ़ा, इन दलों के लखपति नेता करोड़पति हो गये।
आपको क्या मिला? महंगाई बढ़ी। तेल, दाल और चीनी की कीमतों में इन बीस-पच्चीस सालों में कितनी बढ़ोतरी हुई, यह बताने की जरूरत नहीं है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में महीने में दो बार वृद्धि की जाने लगी। महंगाई को संसद में जब-जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मुद्दा बनाकर उठाना चाहा, महंगाई का समर्थन करने के लिए कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा सब एक ओर खड़े हो गये।
बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा ने स्कूलों को दुकान बना दिया। बच्चों को पढ़ाने के लिए जमीन और जेवर बेचने या फिर कर्जा लेने की नौबत आने लगी।
बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा ने सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों पर रोक लगा दी। नौजवान बेरोजगारों की फौज तैयार हो गयी।
कानपुर की सूती मिलों की बंदी से शुरू हुआ कारखाना बंदी का सिलसिला पूरे सूबे में अभी भी जारी है। सार्वजनिक तथा सहकारी क्षेत्र की तमाम चीनी मिलों को बंद कर दिया गया। लाखों मजदूर बेरोजगार हो गये। समाजवादी पार्टी तथा बसपा की सरकारों ने यू.पी. हैण्डलूम कारपोरेशन और कताई मिलों को बंद कर बुनकरों को तबाह कर दिया।
बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा सभी ने अपने-अपने पसंदीदा सरमायेदारों को सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की बहुमूल्य संपत्तियों तथा किसानों की उपजाऊ जमीनों को सौंप दिया।
अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, नर्से नहीं हैं, दवायें नहीं हैं। हिन्दुस्तान के दिल उत्तर प्रदेश को बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा ने मिल कर बीमार बना दिया है। बिजली आती नहीं है। मनरेगा में मिलने वाली पूरी मजदूरी मिलती नहीं है। बिना लिये दिये कोई काम होता नहीं है। किसानों को खाद, बीज, बिजली, पानी सब महंगा मिलता है। उनकी फसलों के वाजिब दाम उन्हें मिलते नहीं। गाहे-बगाहे किसानों की आत्महत्या के समाचार मिलते हैं।
भ्रष्टाचार का आलम यह है कि केन्द्र के कई मंत्री जेल में हैं तो कुछ जेल जाने वाले हैं। बसपा सरकार के कई मंत्रियों को भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण इस्तीफा देना पड़ा। भाजपा ने इनमें से कुछ दागी नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। सपा और बसपा दोनों सरकारों के मुख्यमंत्रियों पर कमाई से ज्यादा सम्पत्ति होने के आरोप हैं। कांग्रेस जांच नामक रिमोट के जरिये सपा और बसपा दोनों को कंट्रोल करती है।
चुनावों के दौर में बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा सभी के नेता हेलीकाप्टरों से उड़-उड़ कर आपके लिए आसमान से तारे तोड़ कर लाने के वायदे कर रहे हैं क्योंकि चुनावों में इन्हें आपके मतों की जरूरत है। इन्होंने इसके पहले के चुनावों में भी इसी तरह के वायदे आपसे किये थे लेकिन सरकार बनाने के बाद आपके लिए कुछ नहीं किया। ये सभी आपके गुनाहगार हैं।
आपको याद होगा कि जब केन्द्र में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से सरकार बनी थी तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दवाब में ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, सूचना का अधिकार कानून और वनवासियों के अधिकारों का कानून जैसे कानून बने थे। महंगाई नियंत्रण में रही थी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ तथा जनता के तमाम तबकों की मांगों को लेकर लड़ाई लड़ती रही है। जगह-जगह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ईमानदार उम्मीदवार खड़े हैं, जिन्हें विजयी बनाकर आप प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा को बदल सकते हैं।
मतदाता भाइयों और बहनों,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपका आह्वान करती है कि -
हंसिया-बाली वाले बटन को दबा कर 16वीं विधान सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराओ;
साम्प्रदायिक, जातिवादी और वंशवादी ताकतों को परास्त करो;
भ्रष्ट, अपराधी तथा माफिया सरगनाओं को विधान सभा में पहुंचने से रोको; तथा
किसान, मजदूर और आम आदमी की बर्बादी की जिम्मेदार आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों को पीछे धकेलो।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भ्रष्टाचार, महंगाई और अपराधों के खिलाफ तथा प्रदेश एवं उसकी जनता के चौतरफा विकास के लिए आपका मत चाहती है। हम एक बार आपसे अपील करते हैं कि इस बार आप हंसिया-बाली वाले बटन को दबा कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मौका दें।
जय हिन्द!
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से अशोक मिश्रा का चुनाव प्रसारण

मतदाता भाइयों और बहिनों,
विधान सभा चुनाव अपने पूरे शवाब पर हैं। आकाश पूंजीवादी नेताओं के उड़न खटोलों से गूंज रहा है।
इस चुनावी संग्राम में एक ओर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रदेश के किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, छात्रों-नौजवानों, अल्पसंख्यकों तथा शोषित-पीड़ित आम जनों की ताकत के भरोसे के साथ सिद्धान्तों और जन-संघर्षों की अपार पूंजी के साथ चुनाव मैदान में है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जिसका चुनाव निशान ‘हंसिया-बाली’ है, सत्ता से ज्यादा जनता के मुद्दों और सिद्धान्तों की दावेदार है।
दूसरी ओर सिद्धान्तहीन, मुद्दाविहीन पूंजीवादी राजनैतिक दल ‘स्वर्ग तक सीढ़ी लगा देने’ के मिथ्या वादों और नारों के साथ जातिवादी, साम्प्रदायवादी पहियों पर कारपोरेट घरानों, भ्रष्ट नव धनाढ्यों के काले धन से तैयार किये गये, चमकते-दमकते रथों पर बाहुबलियों, माफिया सरगनाओं, बलात्कारियों, भ्रष्टाचारियों, दलबदलुओं की फौज सजाये, सत्ता के दावेदार है, जिन्होंने कई बार सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेकर विकास के घोड़ों को पूंजीपतियों के महलों की ओर दौड़ाया है।
पूंजीवादी, जातिवादी, साम्प्रदायिक दलों ने अपने घोर जन विरोधी, पूंजीपति परस्त राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों और घृणित कृत्यों से भारतीय लोकतंत्र को गम्भीर रूप से बीमार कर दिया है। विकास के सभी सूचकांकों पर सबसे निचले पायदान पर फिसल कर उत्तर प्रदेश को बीमारू प्रदेशों में लाइलाज मान लिया गया है।
आपको लोकतंत्र तथा बीमार उत्तर प्रदेश का इलाज अपने मतदान से करने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तथा उसके उम्मीदवारों को हंसिया और बाली के चुनाव निशान वाले बटन को दबाकर मतदान करने का हम आपसे अनुरोध करते हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का नारा है - भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को ध्वस्त करो, जातिवाद और जातिवादी राजनीति को पस्त करो, साम्प्रदायवाद-परिवारवाद का नाश करो, गुण्डो, बाहुबलियों तथा अपराधीकरण की राजनीति को शिकस्त दो, लोकतंत्र तथा जनता को मजबूत करो। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में सत्ता का संतुलन दो।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ”सबको शिक्षा, सबको काम“, ”समान काम का समान दाम“, ”महंगाई पर लगे लगाम“, ”रोटी कपड़ा और मकान - मांग रहा है हिन्दुस्तान“ के सैद्धान्तिक नारे और संघर्ष के साथ मैदान में है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पिछली सरकार और वर्तमान सरकार के भ्रष्टाचार, घपलों-घोटालों, चाहे वह 50 हजार करोड़ का खाद्यान्न घोटाला हो, चाहे स्वास्थ्य घोटाला हो, के विरूद्ध और बुन्देलखंड एवं पूर्वान्चल में कई कजार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने, किसानों की बर्बादी, जनता की तबाही के मुद्दों को लेकर संघर्ष की अगुआ पार्टी रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने, लघु ग्रामीण तथा हथकरघा उद्योगों को संरक्षण देने, कृषि को उद्योग का दर्जा देकर, कृषि नीति बनाकर, किसानों और ग्रामीण जनों को संवारने के लिए संघर्षरत है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जिसका चुनाव निशान हंसिया और बाली है, शिक्षा मित्रों, मध्यान्ह भोजन रसोइयों, आशा बहुओं तथा आंगन बाड़ी में कार्यरत वर्कर्स की सेवाओं का स्थायीकरण एवं उचित वेतन की मांग को लेकर संघर्ष कर रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का आपसे विनम्र अनुरोध है कि उत्तर प्रदेश तथा देश को लूट कर कंगाल और समाज को खोखला करने वाले पूंजीवादी दलों, उनके सूरमाओं को इस चुनाव में शिकस्त दें। चुनाव में विजय श्री दिलाने के नियंता बन गये फोर सी - कम्युनल, कास्ट, क्रिमिनल, कैश अर्थात साम्प्रदायिक, जातिवादी, अपराधीकरण की घिनौनी राजनीति तथा काले धन के सहारे सत्ता पाने के नापाक मंसूबों को अपने वोट की ताकत से मटियामेट कर दें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी देश के उन बीस फीसदी लोगों, जिन्होंने सत्ता संरक्षण में काली कमाई से काले धन के पहाड़ खड़े कर लिए हैं, उन पर करारी चोट करने तथा देश की अस्सी फीसदी जनता जो बेहाल है, तंगी, गरीबी, मुफलिसी में जी रही है, के हितों की रक्षा के पक्ष में मतदान करने की अपील करती है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपका आवाहन करती है कि भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार, शोषणकारी व्यवस्था की चूल हिला दें। जातिवादी, साम्प्रदायिक दलों तथा अल्पसंख्यकों को लगातार झांसा देकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की जुगत में लगे दलों के नापाक मंसूबों को खाक में मिला दें। प्रदेश की तकदीर और तस्वीर बदलने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को वोट दें। हंसिया बाली के निशान पर मतदान करें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसका चुनाव निशान आज तक नहीं बदला। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव निशान हंसिया और बाली है। हमारा आपसे विनम्र अनुरोध है कि हंसिया और बाली चुनाव निशान पर आप अपना मतदान करें। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को विजयी बनायें।
धन्यवाद।
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से सदरूद्दीन राना का चुनाव प्रसारण

उत्तर प्रदेश के मतदाता भाइयों और बहिनों,
16वीं विधान सभा के चुनाव का घमासान मचा हुआ है। प्रदेश और देश में भ्रष्टाचार व्याप्त है। सभी राजनैतिक पार्टियां एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियां भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला जैसे न जाने कितने घोटाले यदि कांग्रेस के नाम हैं तो स्पेक्ट्रम घोटाले की शुरूआत भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने ‘पहले आओ-पहले पाओ’ की नीति अपना कर की थी। इस नीति को सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में सरकारों में से किसने अधिक भ्रष्टाचार किया, ये बता पाना कठिन कार्य है।
आपको याद होगा कि वर्ष 2007 में समाजवादी पार्टी के गुण्डा राज और भ्रष्टाचार से प्रदेश की जनता निजात चाहती थी और जब चुनाव की घोषणा हुई तो बहुजन समाज पार्टी ने नारा दिया था कि ”चढ़ गुण्ड़ों की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर“। सपा के भ्रष्टाचार, गुण्डाराज और परिवारवाद से तंग आकर प्रदेश के मतदाताओं ने बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनवाई। सरकार बनते ही नारा बदल गया। बसपा का अघोषित नारा हो गया ”चढ़ दलितों की छाती पर, गुण्डा बैठा हाथी पर“। बसपा सरकार भी सपा सरकार की राह पर चलती रही। आय से अधिक सम्पत्ति का मुकदमा यदि मुलायत सिंह पर चल रहा है तो मायावती पर भी यही मुकदमा चल रहा है। भ्रष्टाचार में ये दोनों एक दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं। सपा-बसपा सरकारें बारी-बारी प्रदेश की जनता को लूटती रहीं। अब देश और प्रदेश में भ्रष्टाचार नहीं हो रहा है बल्कि सरकारी धन की लूट मची हुई है। प्रदेश और देश से भ्रष्टाचार को मिटा दिया जाये तथा कुछ नीतियों में परिवर्तन कर दिया जाये तो प्रदेश में खुशहाली आम जनता को मिल जाये। आम जनता की चिन्ता बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा किसी को नहीं है। भाजपा को ‘फील गुड’, ‘शाइनिंग इंडिया’ एक दशक पहले से दिख रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस को गरीबी दिख ही नहीं रही है। गरीबी का मजाक उड़ाया जा रहा है। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाले योजना आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि गांव में रहने वाले प्रति व्यक्ति की प्रतिदिन की आय 26 रूपया तथा शहर में रहने वाले प्रति व्यक्ति की प्रतिदिन की आय 32 रूपया है तो वह गरीबी की रेखा से ऊपर है। देश की इस हालत पर प्रदेश की जनता बस यही कह रही है:
”अपने चेहरे की लकीरों को छुपाऊं कैसे?
उनके मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आऊं कैसे?
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले यह तय हो कि इस घर को बचाऊं कैसे?“
आप सभी महंगाई से परेशानहाल है। खाने-पीने के सामान का दाम पिछले दो-तीन सालों में कई गुना बढ़ चुका है। डीजल और पेट्रोल के दामों को तो सरकार ही महीने में दो-बार बढ़ा देती है। सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में रिक्त पड़ी जगहों पर नियुक्ति पर सरकारों ने पाबंदी लगा रखी है। स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण प्रदेश की राजधानी में तीन-तीन चिकित्साधिकारियों की हत्यायें हो चुकी हैं।
प्रदेश को बचाने के लिए आम जनता को राहत देने के लिए, गरीबों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए आवश्यकता है कि प्रदेश के मतदाता जाति-पांति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदार प्रत्याशियों को वोट करें। जब प्रदेश के मतदाता भ्रष्टाचार की आंधी में ईमानदार प्रत्याशी को वोट देने का निर्णय लेंगे तो उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी ही दिखाई देंगे। इस विधान सभा चुनाव में यदि मतदाता ईमानदार प्रत्याशी को वोट देने का निर्णय ले लें तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सभी उम्मीदवार विजयी हो जायेंगे। जब तक मतदाता ईमानदार प्रत्याशियों को वोट देने का संकल्प नहीं लेंगे तब तक प्रदेश और देश की सूरत नहीं बदल सकती।
मतदाता भाईयों और बहनों,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के किसी भी एम.एल.ए. एम.पी., कैबिनेट मंत्री या मुख्यमंत्री पर आज तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। इस तथ्य पर मतदाताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रदेश के मतदाताओं से भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ तथा प्रदेश के चौमुखी विकास के लिए वोट देने की अपील करती है। भ्रष्टाचार रहित समाज, शोषित जनता की खुशहाली, प्रदेश के विकास और बेरोजगारों को रोजगार दिलाने और उचित मजदूरी के संघर्ष के लिए हंसिया और बाली वाले बटन को दबाकर कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को अधिक से अधिक संख्या में विजयी बनायें।
मेहनतकश जनता - जिन्दाबाद!
समाजवाद-जिन्दाबाद!
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से आशा मिश्रा का चुनाव प्रसारण

उत्तर प्रदेश के मतदाता भाइयों और बहिनों,
उत्तर प्रदेश की 16वीं विधान सभा के गठन के लिए चुनावी महासंग्राम हो रहा है। यह चुनाव प्रदेश के भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण है। चुनाव ही तय करेगा कि क्या प्रदेश भ्रष्टाचार, जातिवाद, सम्प्रदायवाद तथा गुण्डों, माफियाओं के आतंक, पुलिस के जुल्मों-सितम, सरकारों की तानाशाही, मंत्रियों, नौकरशाहों की बेशुमार लूट से मुक्त होकर, आम जनों के दुःख-दर्दों को दूर करने वाली, प्रदेश के समग्र विकास के लिए समर्पित सरकार का गठन हो सकेगा?
क्या प्रदेश के किसान, मजदूर, बुनकर, बेरोजगार नौजवान, गरीबी भुखमरी से तंग हजारों लोग आत्महत्या करने पर मजबूत होते रहेंगे? क्या अरबों-खरबों रूपये के सरकारी-सहकारी कारखाने मिट्टी के भाव देशी-विदेशी धन्नासेठों को बेचकर राजनेता और नौकरशाह करोड़ों का कमीशन खाते रहेंगे? क्या बेरोजगारों की लम्बी कतार और लम्बी होगी? क्या शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और शिक्षा पाने के अधिकार से छात्र-छात्राओं को वंचित रहना पड़ेगा?
क्या करोड़ो गरीब यूं ही नारकीय जीवन जीते रहेंगे? क्या गांवों, कस्बों, शहरों के लोग शुद्ध पेय जल के लिए तड़पते रहेंगे? क्या सभी को बिजली और किसान को फसल का लाभकारी मूल्य नसीब होगा? क्या महिलाओं के शोषण-बलात्कार की शर्मनाक घटनायें थमेंगी? क्या बहन-बेटियां दहेज के कारण यूं ही जिन्दा जलायी जाती रहेंगी? क्या विधान मंडलों में उन्हें 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा? इन सभी प्रश्नों का उत्तर आपको अपने वोट के द्वारा तय करना है।
साथियों! वर्तमान और पिछली सरकारों का रवैया सामंती युग के निकृष्टतम रवैये सरीखा रहा है। महिलाओं के विरूद्ध अपराध, हत्या, बलात्कार, अपहरण, छेड़छाड़, दहेज उत्पीड़न, दहेज हत्याओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। युवतियों के चेहरों पर तेजाब फेंक कर जला देने जैसे काण्डों से सरकार का स्याह चेहरा और भी दागदार हुआ है।
बलात्कार और हत्या के मामलों में उत्तर प्रदेश का देश में पहला स्थान है जो किसी भी सभ्य नागरिक, सभ्य समाज और सरकार के लिए अत्यंत शर्मनाक है। पर सरकार ने इस दुखद एवं शर्मनाक घटनाओं पर रंचमात्र भी रंजोगम का इजहार न करते हुये इन्हें रोकने की दिशा में कोई निरोधात्मक उपाय नहीं किये।
देश के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी देश के लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कायम रखने तथा सामाजिक सद्भाव की रक्षा के लिये अनवरत-अनथक संघर्षों में आगे रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रदेश के अर्थतंत्र को मजबूत बनाने के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत बनाने, लघु, ग्रामीण तथा हथकरघा उद्योगों को संरक्षण देने, कृषि को उद्योग का दर्जा देकर, राष्ट्रीय कृषि नीति बनाकर, किसानों और ग्रामीण जनों को संवारने के लिए संघर्षरत है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अन्याय-अत्याचार, दमन और गुण्डा राज के खिलाफ लड़ाई लड़ने में सदा आगे रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शिक्षा मित्रों, मध्यान्ह भोजन रसोइया, आशा बहुओं, आंगनबाड़ी के कार्यरत वर्कर्स की सेवाओं का नियमितीकरण एवं उचित वेतन निर्धारण की मांग को लेकर संघर्षरत है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वृद्धावस्था, विकलांग और विधवा पेंशन की धनराशि में वृद्धि करने और सभी पात्र जनों को मुहैया कराने तथा इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने की लड़ाई लड़ रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शोषणविहीन, समता-समानता पर आधारित समाज एवं राज्य कायम करने के लिए संघर्षरत है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समान शिक्षा, सबको चिकित्सा, शुद्ध पेयजल, सभी को रोजगार, खेत को पानी, निर्बाध बिजली सुनिश्चित कराने के लिए संकल्पबद्ध है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी देश की एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसका चुनाव निशान हंसिया और बाली आज तक बदला नहीं है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जन संघर्षों में तपे-तपाये, कर्मठ, विद्वान, जनता के प्रति समर्पित कम्युनिस्ट नेताओं को विधान सभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बना कर आपकी अदालत में पेश किया है।
हम आपसे पुरजोर, विनम्र अनुरोध करते हैं कि आप अपना फैसला भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पक्ष में दें। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव निशान हंसिया और बाली है। आप हंसिया बाली के चुनाव निशान पर अपना मतदान करें। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को विजयी बनायें।
धन्यवाद!
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से अशोक मिश्र का चुनाव प्रसारण

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से अशोक मिश्र का चुनाव प्रसारण
उत्तर प्रदेश के मतदाता भाइयों और बहिनों,
उत्तर प्रदेश की 16वीं विधान सभा के लिए चुनावी महासंग्राम हो रहा है।
इस महासंग्राम में एक ओर सिद्धान्तहीन, मुद्दाविहीन नारों के साथ जातिवादी, साम्प्रदायवादी पहियों पर कारपोरेट घरानों, भ्रष्ट नवधनाढ्यों के कालेधन से चमकते-दमकते रथों पर बाहुबलियों, माफियाओं, हत्यारों, बलात्कारियों, भ्रष्टाचारियों, दलबदलुओं की फौज सजाये सत्ता के दावेदार है, जिन्होंने कई बार सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेकर विकास के घोड़ों को पूंजीपतियों के महलों की ओर दौड़ाया है।
दूसरी ओर किसानों, मजदूरों, महिलाओं, खेत मजदूरों, छात्रों-नौजवानों, दलितों, अल्पसंख्यचकों और प्रदेश के शोषित-पीड़ित आम जनों के भरोसे के साथ रथहीन, साधनविहीन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सिद्धान्तों और जन संघर्षों की अपार पूंजी के साथ चुनाव मैदान में है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता से ज्यादा मुद्दों और सिद्धांतों की दावेदार है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का इस चुनाव में नारा है - भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को ध्वस्त करो, जातिवाद और जातिवादी राजनीति को पस्त करो, गुण्डों, बाहुबलियों तथा अपराधीकरण की राजनीति को शिकस्त दो, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तथा वाम दलों के हाथों में सत्ता का संतुलन दो।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का आपसे विनम्र अनुरोध है कि प्रदेश को कंगाल और स्वयं को मालामाल, समाज को खोखला करने वाली ताकतों को शिकस्त दें। चुनाव में विजय श्री दिलाने में नियंता बन गये फोर सी - कम्युनल, कास्ट, क्रिमिनल, कैश अर्थात साम्प्रदायिक, जातिवादी, अपराधीकरण की घिनौनी राजनीति तथा कालेधन के सहारे सत्ता सिंहासन पर पहुंचने में लगे राजनैतिक दलों, उनके दलबदलू भ्रष्ट उम्मीवारों के नापाक मंसूबों को अपने वोट की ताकत से मटियामेट कर दें।
जन-आन्दोलनों, जन-संघर्षों में तपे तपाये, अन्याय, अत्याचार, शोषण के विरूद्ध अनवरत मैदान में रहने वाले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कर्मठ उम्मीदवारों को हंसिया और बाली के चुनाव निशान पर मत देकर विजयी बनायें।
साथियों, वर्तमान और पिछली सरकारों का रवैया सामन्ती युग के निःकृष्टतम रवैये सरीखा रहा है, महिलाओं के विरूद्ध अपराध, हत्या, बलात्कार, अपहरण, छेड़-छाड़, दहेज उत्पीड़न, दहेज हत्या, युवतियों के चेहरे पर तेजाब फेंक कर जला देने, सरे आम उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाने जैसे काण्डों से सरकार का दागदार चेहरा और भी काला हुआ है।
दहेज हत्या और बलात्कार के मामले में उत्तर प्रदेश का देश में पहला स्थान रहा है, जो किसी भी सभ्य नागरिक, सभ्य समाज और सरकार के लिए अत्यंत शर्मनाक है, किन्तु वर्तमान और पिछली सरकार ने इस दर्दनाक और शर्मनाक स्थिति पर रंचमात्र भी रंजोगम का इजहार न करते हुये, कोई भी निरोधात्मक उपाय नहीं किये।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समता, समानता मूलक राज्य व्यवस्था और महिलाओं के समान अधिकार तथा विधान मंडलों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की प्रबल पक्षधर है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ‘सबको शिक्षा, सबको काम’, ‘समान काम का समान दाम’, ‘महंगाई पर लगे लगाम, भ्रष्टाचार का हो काम तमाम’, ‘रोटी-कपड़ा और मकान, मांग रहा है हिन्दुस्तान’ के सैद्धान्तिक नारे और संघर्ष के साथ मैदान में है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पिछली सरकार और वर्तमान सरकार के घपलों-घोटालों चाहे वह 50 हजार करोड़ का खाद्यान्न घोटाला हो, के विरूद्ध और बुन्देलखण्ड और पूर्वान्चल में कई हजार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने, किसानों की बर्बादी, आम जनों की तबाही के मुद्दों को लेकर संघर्ष की अगुआ पार्टी रही है।
मित्रों, क्या प्रदेश के किसान, मजदूर, बुनकर, खेत मजदूर, गरीबी-गुरबत से तंग हो हजारों की संख्या में आत्महत्या करने पर मजबूर होते रहेंगे? क्या जनता के करो की कमाई से बने अरबों-खरबों रूपये के सरकारी कारखाने तथा किसानों की कृषि योग्य हजारों-हजार एकड़ भूमि विभिन्न प्रकार के सरकारी बहानों से मिट्टी के भाव से भी सस्ती दर पर देशी-विदेशी धन कुबेरों को बेंच कर करोड़ों का कमीशन खाते रहेंगे? क्या अरबों-खरबों के घोटाले यूं ही होने देंगें?
निश्चय ही आपका उत्तर इसके विरूद्ध होगा। यही हमारा-आपका राष्ट्र धर्म है। चुनाव में इसी धर्म को अंगीकार करते हुये आप अपना मतदान करेंगे तथा प्रदेश की डूबती नैया को कुशल मांझी की तरह किनारे लगाने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को हंसिया और बाली के चुनाव निशान पर मत देंगे।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्र तथा प्रदेश सरकार की अन्यायपूर्ण, घोर जन विरोधी अर्थनीति के विरूद्ध लगातार संघर्ष कर रही है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक और मजबूत बनाने, काम के अधिकार तथा आवास को मौलिक अधिकार का दर्जा दिये जाने के लिए सुसंगत संघर्ष कर रही है।
प्रदेश के अर्थतंत्र को मजबूत बनाने के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने, लघु ग्रामीण तथा हथकरघा उद्योगों को संरक्षण देने, कृषि को उद्योग का दर्जा देकर, राष्ट्रीय कृषि नीति बनाकर किसानों और ग्रामीण जनों को संवारने के लिये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी संघर्षरत है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शिक्षा मित्रों, मध्यान्ह भोजन रसोइयों, आशा बहुओं तथा आंगनबाड़ी में कार्यरत वर्कर्स की सेवाओं का नियमितीकरण एवं उचित वेतन निर्धारण की मांग को लेकर संघर्षरत है।
पार्टी वृद्धावस्था, विकलांग और विधवा पेंशन की धनराशि में वृद्धि करने, सभी पात्र जनों को मुहैया कराने तथा इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने की लड़ाई लड़ रही है।
मित्रों, भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में यह घोर मौका परस्ती, दलबदल और व्यक्तिवादी राजनीति का दौर है। आदर्शों, मान्य स्थापनाओं, सिद्धान्तों, वैचारिक विमर्षों, सामान्य व्यवहारिक नैतिकता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों, मर्यादाओं का मखौल जितना आज के राजनैतिक दौर में उड़ाया जा रहा है, वैसा इसके पहले कभी नहीं हुआ। इस दुखद राष्ट्रघाती कृत्यों में पहला स्थान केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेस और विपक्ष में बैठी भाजपा तथा प्रदेश की जातिवादी पार्टियों का है।
भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, महत्वाकांक्षी उद्योगपतियों, कारपोरेट घरानों, चालाक वित्त व्यवस्थापकों और तस्करों, माफिया सरगनाओं के बीच गहरे सम्बंधों के कारण, प्रदेश की आम जनता के हितों की रक्षा के बजाय, कुछ लाख व्यक्तियों, समूहों, गुटों के हितों की रक्षा की जा रही है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य वामदल अपनी भरपूर ताकत से इनके और इनके राष्ट्रघाती कृत्यों के विरूद्ध टकरा रहे हैं। हम चाहते हैं आप हमारे साथ आयें, इस चुनाव में हम-आप मिलकर इनका मटियामेट कर दें।
देश के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, देश के लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कायम रखने तथा उसे मजबूत बनाने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अनवरत-अनथक संघर्ष में आगे रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी देश के उन बीस फीसदी लोगों, जिन्होंने सत्ता संरक्षण में काली कमाई के काले धन के पहाड़ खड़े कर लिए हैं, उन पर करारी चोट करने तथा देश के अस्सी फीसदी आवाम के हितों की रक्षा के पक्ष में मतदान करने की अपील करती है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव निशान हंसिया बाली पर मतदान करें। जन संघर्षों में तपे-तपाये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कर्मठ, योग्य, ईमानदार प्रत्याशियों को विजयी बनायें। उत्तर प्रदेश में वामपंथ के प्रभाव में चलने वाली सरकार बनायें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपका आवाहन करती है कि अन्याय, अत्याचार, शोषणकारी व्यवस्था की चूल हिला दें। लूट-भ्रष्टाचार का राज मिटा दें। जातिवादी, साम्प्रदायिक दलों और उनके मौसेरे भाइयों तथा अल्पसंख्यकों को झांसा देकर सरकार के गठन में इस्तेमाल करने का मंसूबा बनाने वाले राजनैतिक दलों के नापाक मंसूबों को खाक में मिला दें। प्रदेश की तकदीर-तस्वीर बदलने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को वोट दें। हंसिया-बाली के चुनाव निशान पर मतदान करें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसका चुनाव निशान आज तक नहीं बदला। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव निशान हंसिया और बाली है। मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि हंसिया ओर बाली चुनाव निशान पर आप अपना मतदान करें। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को विजयी बनायें। जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार नहीं हैं, वहां वाम मोर्चा के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करें।
धन्यवाद।
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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश का चुनाव प्रसारण

उत्तर प्रदेश के समस्त मतदाता भाइयों और बहिनों,
देश के सबसे बड़े और राजनैतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की 16वीं विधान सभा के चुनाव का बिगुल बज चुका है।
आप सभी जानते हैं कि केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा थोपे गये भ्रष्टाचार और महंगाई ने आप सभी की कठिनाईयां बेहद बढ़ा दी हैं। इन कठिनाइयों से उबरना है तो बेहद समझ-बूझकर मत का प्रयोग करना है।
मौजूदा सरकार से पहले समाजवादी पार्टी की राज्य सरकार प्रदेश में सत्तारूढ़ थी। वह सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम उपक्रमों को पूंजीपतियों के हाथों बेच रही थी। वह किसानों की जमीनों का जबरिया अधिग्रहण कर अपने चहेते और मददगार उद्योगपतियों को सौंप रही थी। विरोध करने पर किसानों पर दमनचक्र चला रही थी। भ्रष्टाचार चरम पर था, यहां तक कि पुलिस कांस्टेबिलों की भर्ती तक में भारी रकम डकारी गई थी। शिक्षा को परचूनी की दुकान बनाकर बेहद महंगी कर दिया गया था। नये विद्यालयों की मान्यता में भारी भ्रष्टाचार फैला था। राशन प्रणाली ध्वस्त पड़ी थी। शासन-प्रशासन और गुंडे मिल कर काम कर रहे थे जिससे कि कानून-व्यवस्था चरमरा कर रह गई थी।
इन सभी समस्याओं से निजात पाने के लिये 2007 के विधान सभा चुनावों में जनता ने बसपा के पक्ष में जनादेश दिया था और बहुत अर्से बाद प्रदेश में एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार वजूद में आई थी। हर किसी ने सोचा था कि नई सरकार उनकी इन सारी दिक्कतों को दूर करेगी। लेकिन हुआ ठीक इसके उलटा। मौजूदा बसपा सरकार ने भी हर मामले में अपनी पूर्ववर्ती सरकार के पदचिन्हों पर चलना शुरू कर दिया। केन्द्र सरकार और पिछली राज्य सरकार द्वारा चलाई जाती रही आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों को धड़ल्ले से लागू किया जाने लगा। इससे किसानों, मजदूरों, युवाओं, छात्रों, कर्मचारियों, महिलाओं, दलितों, दस्तकारों, बुनकरों, अल्पसंख्यकों की बरबादी शुरू हो गई। इसके विरोध में आवाजें उठीं तो हर आवाज को राज्य सरकार ने लाठी और गोली से दबाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं बसपा सुप्रीमो और उनकी सरकार के तमाम मंत्री धन बटोरने में लगे रहे। पूरे पांच साल एक से एक बड़े घोटालों की पर्तें खुलती चलीं गईं। जनता लुटती रही और अफसर, दलाल और मंत्री मालामाल होते रहे। आज हालत यह है कि डेढ़ दर्जन से अधिक मंत्री लोकायुक्त की जांच के दायरे में हैं तो तमाम विधायकों की अकूत बढ़ती संपत्तियां जनता को भौचक बनाये हुये हैं। किसानों की जमीनें हड़प कर पूंजीपतियों को दे दी गईं। प्रतिरोध करने वाले किसानों पर गोलियां चलाई गईं जिनमें कई किसानों की जानें चली गईं।
मौजूदा शासक दल ने गत चुनाव में नारा दिया था कि चढ़ गुंडों की छाती पर वोट डाल दो हाथी पर। लेकिन सत्ता में आते ही सारे के सारे गुंडे माफिया हाथी पर सवार हो गये और अपराधों और अत्याचार की बाढ़ सी आ गई। सर्वाधिक अत्याचार दलितों और महिलाओं के ऊपर होते रहे। एक दलित वर्ग से आई महिला मुख्यमंत्री की इससे बड़ी असफलता और क्या हो सकती है? अनेकों महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ की तमाम घटनायें हुईं तो कई की तो दुष्कर्म के बाद हत्या तक कर दी गई। इन सारे अपराधों की जड़ में शासक दल के नेता एवं मंत्री थे। हत्या, लूट, चोरी, दहेज हत्यायें, ऑनर किलिंग की तमाम वारदातें अखबारों की सुर्खियां बनती रहीं। खुद राजधानी लखनऊ में तीन-तीन स्वास्थ्य अधिकारियों की हत्यायें सरकार के माथे पर कलंक का टीका हैं। यह सारे कृत्य बसपा की उस कथित ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का परिणाम हैं जिसके तहत इसने तमाम अपराधियों, माफियाओं, दबंगों को टिकिट देकर सत्ता शिखर तक पहुंचाया।
लेकिन जब बसपा इनके कृत्यों से बदनाम होने लगी तो उन्हें पदों से हटाने या टिकिट काट देने का स्वांग रचा गया।
उत्तर प्रदेश की जनता ने यह सब कुछ सपा अथवा बसपा के राज में ही झेला हो ऐसी बात नहीं है। इससे पूर्व भाजपा और कांग्रेस के शासन काल में भी उत्तर प्रदेश की जनता ने ये सारी पीड़ायें झेली हैं।
लगभग ढाई साल पहले हुये लोकसभा के चुनावों के परिणामस्वरूप केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग-2 की सरकार बनी। प्रदेश में सत्तारूढ बसपा और विपक्षी दल सपा दोनों ही इस सरकार का समर्थन करते रहे हैं। महंगाई का सवाल हो या भ्रष्टाचार का मसला ये दोनों ही पार्टियां संसद में संप्रग-2 सरकार के साथ खड़ी दिखीं। इस समर्थन से ताकत हासिल कर केन्द्र सरकार निर्मम तरीके से अपनी आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों को चलाती रही है। सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण निर्बाध रूप से जारी है। गरीब और गरीब हो रहे हैं तो अमीर और अमीर। भारी भरकम भ्रष्टाचारों में सरकार लगातार घिरी रही। बेरोकटोक बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का जीना दूभर बना रखा है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम मनमाने तरीके से बढ़ाये जाते रहे हैं। किसानों की जरूरत की चीजें महंगी बना दी गई हैं जबकि उनके उत्पादों के उचित मूल्य नहीं दिये जा रहे। खाद के संकट  ने किसानों को तबाह बनाये रखा। कर्ज और भुखमरी में डूबे बुन्देलखंड के किसान-मजदूर आत्महत्यायें करते रहे और कांग्रेस व बसपा के आका बुन्देलखंड की बर्बादी पर घड़ियाली आंसू बहाते रहे। केन्द्र की सरकार खुले तौर पर पूंजीपतियों, कार्पोरेट जगत के पक्ष में खड़ी है और गरीबों का खून चूसने का काम कर रही है। इस पाप पर पर्दा डालने के लिये एक युवराज दलितों की झोपड़ियों में जाने का नाटक करते रहते हैं।
यहां यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि जब संप्रग-1 सरकार वामपंथी दलों के समर्थन पर टिकी थी, वामपंथ के कड़े अंकुश के कारण वह यह सब जनविरोधी काम नहीं कर पाई थी। उलटे वामपंथ के दवाब में मनरेगा, सूचना का अधिकार, आदिवासी अधिनियम, घरेलू हिंसा विरोधी अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कानून बनवाये गये थे। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने से सरकार को बार-बार रोका गया था जिससे महंगाई पर अंकुश लगा था। भ्रष्टाचार और घपले होने नहीं दिये गये थे और सार्वजनिक क्षेत्र को बिक्री से बचाया गया था। देश की जनता इन तथ्यों से भलीभांति अवगत है।
केन्द्रीय स्तर पर विपक्ष की मुख्य पार्टी भाजपा है। परन्तु उसकी आर्थिक नीतियां वहीं हैं जो कांग्रेस की। अतएव प्रमुख सवालों पर संसद में वह सरकार से नूराकुश्ती करती नजर आती है। महंगाई और भ्रष्टाचार रोकने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं। भ्रष्टाचार में तो उसके तमाम नेता स्वयं डूबे हैं अतएव उसका भ्रष्टाचार विरोध बेमानी है। सांप्रदायिकता भड़काने वाले उसके तमाम मुद्दों को जनता ने ठुकरा दिया है अतएव अब छद्म तरीकों से साम्प्रदायिक दांव पेंच चलाती रहती है।
उत्तर प्रदेश में ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रदेश में कार्यरत चारों पूंजीवादी पार्टियां अपनी चमक और प्रासंगिकता खो बैठी हैं। सुरक्षित ठिकानों की तलाश में इनके तमाम नेता दलबदल कर रहे हैं। सभी नेताओं के बेटे-बेटियां एवं रिश्तेदार चुनाव मैदान में उतर कर वंशवाद की जड़े मजबूत कर रहे हैं। विधान सभा के पटल पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की सांठगांठ से जनता के अहम सवालों पर चर्चा तक नहीं होती। जातिवाद और साम्प्रदायिकता की इनकी नीतियों ने गरीबों का कोई हित नहीं किया। भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने इनकी बची-खुची जड़ें भी खोखली कर डाली हैं। ऐसे में जनता एक नई राह तलाश रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं वामपंथी दल जनता की इस नई राह के राही हो सकते हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पिछले पांच सालों में जनता के सवालों पर लगातार संघर्ष चलाये हैं। भाकपा ओर उसके कार्यकर्ता भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं। यह सारा देश जानता है। अपनी इन सारी विशेषताओं के साथ भाकपा ने वामपंथी दलों से चुनावी तालमेल किया है। वाम दल प्रदेश में सौ सीटों पर विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हैं। खुद भाकपा 50-52 सीटों पर चुनाव मैदान में है। हम सरकार बनाने का दावा नहीं कर रहे हैं। लेकिन हम मतदाताओं को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि यदि वे भाकपा प्रत्याशियों को विजयी बनाते हैं तो विधान सभा के पटल पर जनता की आवाज बेलाग तरीके से गूंजेगी। जिस तरह हम निरंतर सड़कों पर उतर कर संघर्ष करते हैं वैसा ही संघर्ष विधान सभा के पटल पर भी किया जायेगा। हम संवेदनशील, संघर्षशील और सशक्त वामपंथी विकल्प का निर्माण चाहते हैं ताकि महंगाई और भ्रष्टाचार जैसी विडंबनाओं को पीछे धकेला जा सके। गरीबों को बचाना है और उत्तर प्रदेश को ऊंचा उठाना है तो वामपंथ को मजबूत बनाना ही होगा। भाकपा उत्तर प्रदेश के चहुंतरफा विकास के लिए संघर्ष करेगी, ऐसा हमारा दावा है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब आप सभी का बहुमत हमारे प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान करेगा।
अतएव हम सभी मतदाताओं से अपील करते हैं कि साम्प्रदायिक, जातिवादी और वंशवादी ताकतों को परास्त करें। भ्रष्ट, अपराधी तथा माफिया सरगनाओं को विधान सभा में न पहुंचने दें। किसान, मजदूर एवं आम आदमी की बरबादी की जिम्मेदार - आर्थिक नवउदारवाद की ताकतों को पीछे धकेलने का काम करें। 16वीं विधान सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशियों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में चुनकर भिजवायें। तथा हंसिया बाली वाले चुनाव निशान के आगे वाले बटन को जरूर दबायें।
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सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बबेरू से बसपा प्रत्याशी बृज मोहन कुशवाहा के खिलाफ चुनाव आयोग को शिकायत

6 फरवरी 2012

मुख्य निर्वाचन अधिकारी
उत्तर प्रदेश
विकास भवन, जनपथ
लखनऊ

महोदय,

    आपको सूचित करना है कि 233-बबेरू विधान सभा क्षेत्र में बसपा प्रत्याशी और उनके प्रचारक हमारी उम्मीदवार श्रीमती गीता सागर के चुनाव को प्रभावित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाया कर चुनाव को गलत तरीके से प्रभावित करने के प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर हम दो बातों का जिक्र कर रहे हैं।
1 -    वे जनता के मध्य अफवाह फैला रहे है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से पैसा लेकर दलितों के वोट काटने के लिए गीता सागर को खड़ा किया है, इसलिए उन्हें वोट न दिये जायें।
2 -     4 फरवरी को मरका गांव में राम लीला देख रहे अस्सी वर्षीय एक व्यक्ति की ठंड लग जाने से मृत्यु हो गयी। उसके परिवार के लोगों को बसपा उम्मीदवार बृज मोहन कुशवाहा और उनके व्यक्तियों के बरगला कर थाने ले गये कि वे थाने में गीता सागर के खिलाफ एफआईआर लिखा दें कि उनकी गाड़ी से टक्कर लगने से उसकी मृत्यु हुई है।
    कृपया इन घटनाओं का संज्ञान लेकर नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट कीजिए।

भ व दी य

कृते राज्य सचिव

प्रति:    मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग, नई दिल्ली
प्रति:    जिला निर्वाचन अधिकारी, बांदा


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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा निजी टी.वी. चैनलों द्वारा पेड न्यूज दिखाने की शिकायत

4 फरवरी 2012
श्री उमेश सिन्हा
मुख्य निर्वाचन अधिकारी
उत्तर प्रदेश
लखनऊ

विषय:    निजी टी.वी. चैनल्स द्वारा पेड न्यूज प्रसारित किये जाने के सम्बंध में

महोदय,

    निर्वाचन आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद तमाम निजी टी.वी. चैनलों द्वारा पेड न्यूज का प्रसारण किया जा रहा है। इसके लिये उन्होंने कई तरीके निकाल रखे हैं। न्यूज के नाम पर कांग्रेस, बसपा, भाजपा एवं सपा के नेताओं के भाषणों का लाइव प्रसारण किया जा रहा है और भाषणों को बार-बार दोहरा कर दिखाया जा रहा है। इसी तरह इन दलों के नेताओं के ऊपर 10-10, 15-15 मिनट के फीचर प्रसारित किये जा रहे हैं। 3 फरवरी को एक राष्ट्रीय चैनल ने श्रीमती प्रियंका गांधी का भाषण सीधे प्रसारित किया और बार-बार दोहराया जबकि वे किसी सार्वजनिक पद पर भी नहीं हैं। इसी तरह इसी दिन एक प्रादेशिक चैनल ने मुख्यमंत्री मायावती का भाषण सीधे प्रसारित किया और उसे कई बार दिखाया। इसी तरह के कई अन्य हथकंडे अपनाये जा रहे हैं।

    यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जो राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त 6 राजनैतिक दलों में से एक है और उत्तर प्रदेश में 51 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, की गतिविधियों को किसी चैनल पर कोई जगह नहीं दी जा रही है।

    इस मामले में हमारे द्वारा पहले भी 24 जनवरी को इसकी शिकायत आपको भेजी गयी थी, जिस पर किसी कार्यवाही की सूचना हमें आज तक प्राप्त नहीं हुई है।

    यह सीधे तौर पर ‘पेड न्यूज’ का मामला है, जिसकी गंभीरता से जांच करा कर कठोर कार्यवाही की जानी चाहिये।

    आशा है कि आप शीघ्र ठोस कदम उठायेंगे।

    सधन्यवाद।

भ व दी य


(डा. गिरीश)
राज्य सचिव

प्रतिलिपि:    मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग, नई दिल्ली।
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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से प्रदीप तिवारी का आकाशवाणी पर चुनाव प्रसारण

उत्तर प्रदेश के मतदाता भाइयों और बहिनों,
हिन्दुस्तान के सबसे बड़े राज्य के विधान सभा चुनाव चल रहे हैं। प्रदेश की दुर्दशा से आप सभी अच्छी तरह से वाकिफ हैं। 21 साल पहले सांसदों को खरीद कर केन्द्र में बनी सरकार ने जिन विनाशकारी आर्थिक नीतियों को शुरू किया था, उसी का नतीजा है कि गलाघोंट महंगाई से हम-आप सभी परेशान हैं। किसान को उसकी फसलों के वाजिब दाम नहीं मिलते और उन्हीं फसलों को बाजार में खरीदने जब हम आप जाते हैं तो दाम इतने बढ़ चुके होते हैं कि अस्सी फीसदी जनता उसकी कीमत अदा करने की हैसियत नहीं रखती। पेट्रोल-डीजल की कीमतों को महीने में दो-दो बार बढ़ाया जा रहा है।
इन्हीं विनाशकारी आर्थिक नीतियों का परिणाम है कि सरकारी खजाने के धन का बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। इस दौर की सरकारें कहती रही हैं कि बच्चों की पढ़ाई और जनता का इलाज उनका सरोकार नहीं है। ये सरकार के काम नहीं हैं। सरकार का काम केवल गवरनेन्स करना है। आखिर यह गवरनेन्स है क्या? इनका गवरनेन्स से मतलब क्या केवल और केवल भ्रष्टाचार है। क्या सरकारों का काम केवल भ्रष्टाचार करना होता है? राष्ट्र की विपुल संपदा को सरमायेदारों को सौंपना होता है? क्या जनता की चिन्ता करना सरकारों का काम नहीं होता? आपने देखा कि राज्य और केन्द्र सरकारों के मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल गये तो कुछ जेल जाने वाले हैं। लेकिन क्या उन्हें सजा मिलेगी? यह सवाल है जिस पर इस चुनावों के दौरान आपको गौर करना होगा।
केन्द्र की कांग्रेसी सरकार 2-जी, 3-जी, एस-बैण्ड, कॉमनवेल्थ गेम्स, आदर्श सोसाइटी सरीखे घोटाले कर रही थी तो भाजपा भी खनन घोटाले में मस्त थी। कारगिल युद्ध के समय भाजपा ने तो ताबूत घोटाला कर डाला था। प्रदेश में पहले सपा और बाद में बसपा की सरकारें सार्वजनिक एवं सहकारी क्षेत्र की अकूत सम्पत्तियों तथा किसानों की उपजाऊ जमीनों को अपने-अपने चहेते सरमायेदारों को सौंपती रहीं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ आपसे आपका कीमती मत चाहती है। हंसिया बाली वाले बटन को दबाकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को इस बार मौका दीजिए।
मतदाता भाइयों और बहिनों!
आज जब उन्हें आपके वोट की दरकार है, तो ‘जो मांगोगे वही मिलेगा’ की तर्ज पर कांग्रेस, बसपा, सपा, भाजपा सब आपको सब कुछ देने की बात कर रहे हैं। विद्यार्थियों को लैपटाप और अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने तक के वायदे किये जा रहे हैं। मत भूलिये ये वही लोग हैं जिन्होंने स्कूलों को कारोबार बना दिया। इन सबने मिलकर बुनकरों तथा दस्तकारों को तबाह कर दिया। यू.पी. हैण्डलूम कारपोरेशन के साथ-साथ प्रदेश की कई दर्जन कताई मिलों को बन्द कर दिया तथा गांधी भंडारों पर मिलने वाली छूट को खतम कर दिया। करघे पर 12-12 घंटे पैर लटका कर कपड़े बुनने वाला बुनकर आज भूखों मर रहा है। भूलने की जरूरत नहीं है कि सरकारी नौकरियों पर रोक किसने लगा रखी है? ठेका प्रथा और आउटसोर्सिंग किसने शुरू कराई।
तमाम जिलों के सरकारी अस्पतालों में एक भी महिला डाक्टर नहीं है। महिलाओं को प्रसव में होने वाली समस्या से किसी को कोई सरोकार नहीं।
भाइयों एवं बहनों! थोड़े वक्त में सभी बातों का जिक्र संभव नहीं है।
मतदाता भाइयों और बहनों!
कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा सभी आपकी गुनाहगार हैं। आपने बारी-बारी से इन सबको मौका दिया और धोखा खाया। आज आपके हाथ में वोट जैसा कीमती हथियार है। जाति-बिरादरी या धर्म के नाम पर मुरौव्वत करने की जरूरत नहीं है। अपने इस हथियार का इस्तेमाल कीजिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपकी समस्याओं को लेकर लगातार लड़ती रही है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का दामन पाक-साफ है। भ्रष्टाचार, महंगाई और अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए तथा उत्तर प्रदेश एवं उसकी जनता के चौतरफा विकास के लिए इस बार आप भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मौका दें, हम वायदा करते हैं कि आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।
मतदाता भाइयों और बहनों,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपसे गुजारिश करती है कि आप सभी अपने बहुमूल्य मत का इस्तेमाल करें। हंसिया-बाली वाले निशान को दबा कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशियों को बड़ी संख्या में विजयी बनायें।
जयहिन्द! जय लोकतंत्र!!
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