भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

भूमंडलीकरण या लोगों को हाशिये पर धकेलना


गौतमबुद्धनगर के साबेरी गांव के भूमि अधिग्रहण को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निरस्त करने के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण तथा बिल्डरों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जुलाई को अपील पर सुनवाई की तथा 6 जुलाई को अपना निर्णय सुना दिया। सुनवाई के दौरान और फिर अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, वे न केवल काबिले तारीफ हैं बल्कि वे उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के साथ-साथ केन्द्रीय सरकार एवं सरमायेदारों के लिए भूमि अधिगृहीत करने वाली राज्य सरकारों के लिए आईना हैं। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी एवं न्यायमूर्ति ए.के.गांगुली की खंड पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति को जनविरोधी बताते हुए आपात उपबंध के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि विकास के नाम पर वह कर क्या रही है? किसानों की खेतिहर जमीन मल्टीप्लेक्स और मॉल बनाने के लिए अधिगृहीत की जा रही है जो आम आदमी की पहुंच से दूर हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर सरकार नहर या पुल बनाने के लिए जमीन अधिगृहीत करती तो समझ आता लेकिन यहां तो जमीन मॉल, होटल और टाउनशिप के लिए ली गयी है।

बिल्डरों द्वारा लगाये गये ब्रोशरों पर टिप्पणी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्पॉ, स्विमिंग पूल, आयुर्वेदिक मसाज, हेल्थ क्लब वाले ये फ्लैट क्या गरीबों के लिए बन रहे हैं? जिनकी जमीने ली गयीं हैं वे क्या इन्हें खरीद पायेंगे? सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अन्य राज्यों में भी यही बदतर हालात हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों की भूमि अधिग्रहण नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकारें इस कानून एवं इन नीतियों को दमन यंत्र की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल किया आखिर भूस्वामी किसानों को क्या मिला - मुकदमेंबाजी और लाठियां। पुरूष जेल गये और महिलाओं से दुवर््यवहार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि जमीन किसान की मां होती है। इस टिप्पणी को बहुत गंभीरता से लिये जाने की जरूरत है, इसके गहन निहितार्थ हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि एक किसान से जमीन लेने पर सिर्फ उसी के जीवन यापन का साधन नहीं जाता। इसके भी बहुत गंभीर अर्थ हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे टिप्पणी की कि किसानों को मिलता है थोड़ा सा मुआवजा जिसे वह मुकदमेबाजी में खर्च करता है।

बिल्डरों के वकीलों ने दलील देने की कोशिश की कि किसानों ने मुआवजा ले लिया है तो सर्वोच्च न्यायालय ने फिर सवाल किया कि अगर वे मुआवजा नहीं लेते तो उनके पास और क्या विकल्प था? सरकारें उनकी जमीने हड़प कर उन्हें गुलाम बना रही है। ये ‘भूमंडलीकरण’ (ग्लोबलाईजेशन) नहीं है बल्कि ‘लोगों को हाशिये पर धकेलना’ (मार्जिनलाइजेशन) है। सरकार किसानों को हाशिये पर डाल रही है। ये किसी विपक्षी दल के आरोप नहीं सरकारों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ की टिप्पणियां हैं, इसलिए इनकी अपनी गंभीरता है।

अगले दिवस अपना फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ ने भूमि उपयोग को औद्योगिक से आवासीय करने पर ग्रेटर नोएडा अधिकरण पर बिल्डरों के साथ सांठगांठ करने का आरोप लगाते हुए उस पर रू. 10.00 लाख का जुर्माना भी ठोंक दिया जिसे गरीब वादकारियों की मदद करने पर खर्च किया जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार पर कानून के अधीन अपने अधिकारों के भ्रष्ट दुरूपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून के ‘अत्यावश्यक’ प्राविधानों को किसी जन हित में नहीं बल्कि बिल्डर्स को फायदा पहुंचाने के इरादे से उपयोग किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की भी नोटिस ली कि इंडस्ट्रियल टाउनशिप के लिए अधिगृहीत कुल भूमि के 60 फीसदी का उपयोग अब तक नहीं किया जा सका है।

यह तो सर्वोच्च न्यायालय का अभिमत है लेकिन पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यमों ने इस फैसले को आशियाने के लिए प्रतीक्षारत मध्यमवर्गीय परिवारों पर हमला करार देने की असफल कोशिश की। इस निर्णय में ही सर्वोचच न्यायालय ने बिल्डरों के ब्रोशरों का जिक्र करते हुए तल्ख टिप्पणी की है। क्या इस देश के मध्यम वर्ग का कोई ईमानदार व्यक्ति इन फ्लैटों को खरीदने का ख्वाब देख सकता है? हरगिज नहीं! पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यम पूंजी पर हर हमले पर जनमत अपने पक्ष में बनाने की कोशिश करते हैं। यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि ऐसा करना जनहित में नहीं है। एक बार फिर उन्होंने यह प्रयास किया परन्तु असफल रहे हैं।

पूंजीवाद का जो दंश भारतीय जन-मानस इस समय झेल रहा है, उसमें इस तरह के पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यमों के प्रयास सफल नहीं हो सकते। देश को एक वामपंथी समाचार तंत्र की जरूरत है, जिस पर हमें गौर करना होगा।

- प्रदीप तिवारी
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बी.एड. में प्रवेश - उत्तर प्रदेश सरकार का नया स्कैन्डल


लखनऊ 14 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने उत्तर प्रदेश सरकार पर बी.एड. प्रवेश के नाम पर एक नया स्कैन्डल करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि गैर वित्तपोषित और संसाधन-विहीन संस्थानों को बी.एड. की कक्षाएं चलाने के लिए मान्यता जारी रखने और नई मान्यता दिये जाने के नाम पर सरकार द्वारा शिक्षा माफियाओं से दस लाख पचास हजार रूपये प्रति कालेज लिया गया है तथा उसकी भरपाई कराने के लिए बी.एड. की फीस 51,000/- रूपये तय की गयी है।
लखनऊ के लोग आज भी लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा इसी तरह एक संसाधनविहीन कालेज को बी.एड. कक्षायें चलाने के लिए पिछले साल दी गयी मान्यता के प्रकरण को भूले नहीं हैं।
भाकपा राज्य सचिव ने एक प्रेस बयान में कहा है कि प्रदेश सरकार द्वारा बी.एड. प्रवेश के लिए आज से शुरू हो रही कौंसिलिंग में आरक्षित और अनारक्षित दोनों श्रेणियों में प्रवेश के लिए छात्रों को पूरे साल की फीस रू. 51,000/- का ड्राफ्ट कौंसिलिंग के समय ही जमा कराने की शर्त रख कर प्रदेश के वंचित एवं शोषित तबकों के साथ-साथ मध्यम वर्ग के तमाम विद्यार्थियों को प्रवेश से वंचित रखने का निन्दनीय कार्य किया है जिसके लिए प्रदेश की जनता मायावती सरकार को क्षमा नहीं करेगी। प्रेस बयान में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों तथा सहायता प्राप्त कालेजों में तो शिक्षकों का वेतन भुगतान राजकोष से किया जाता है और उसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी संसाधनों के लिए पैसा मुहैया कराता है, उनके लिए भी रू. 51,000/- की फीस का निर्धारण किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। प्रेस बयान में आगे कहा गया है कि जब लखनऊ विश्वविद्यालय और आई.टी. कालेज स्ववित्तपोषित विज्ञान के कोर्सों (जिसमें प्रयोगशालाओं में महंगे उपकरण तथा रसायनों की व्यवस्था करनी होती है) के लिए बीस-तीस हजार रूपये फीस वसूल करते हैं, तब बी. एड. कक्षाओं के लिए 51,000 की फीस समझ से परे है। भाकपा ने विश्वविद्यालयों एवं डिग्री कालेजों द्वारा मासिक एवं द्विमासिक आधार पर शुल्क जमा करने की व्यवस्था समाप्त कर पूरे साल की फीस प्रवेश के समय ही जमा कराने की कटु निन्दा की है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने माननीय राज्यपाल महोदय जोकि प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलपति भी हैं, तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अपील की है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के इस नए स्कैन्डल की जांच कराने, बी.एड. कक्षाओं का शुल्क घटाने तथा संसाधनविहीन कालेजों की मान्यता रद्द करने के लिए उचित कार्यवाही अविलम्ब करें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस मामले में प्रदेश के बुद्धिजीवी तबके से भी अपील करती है कि वे आगे आयें और प्रदेश के राज्यपाल तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष को उचित पत्र भेजें।
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