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बुधवार, 19 सितंबर 2012

केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों का राष्ट्रीय कन्वेंशन

20-21 फरवरी 2013 को राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल का फैसला
नई दिल्ली 4 सितम्बर। आज यहां देश के सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों और मजदूरों एवं कर्मचारियों के स्वतंत्र फेडरेशनों के आह्वान पर तालकटोरा स्टेडियम में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। समूचे देश के संगठित एवं असंगठित मजदूरों एवं कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग 5000 ट्रेड यूनियन नेताओं ने सम्मेलन में हिस्सा लिया और अपने अधिकारों के लिए, सम्मान के साथ जीने के लिए और संप्रग-2 सरकार की जनविरोधी, मजदूर विरोधी नव उदारवादी नीतियों के विरूद्ध अपने संघर्ष को तेज करने का फैसला किया। सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें भारत के मजदूर वर्ग का आह्वान किया गया कि वह सम्मेलन में तय किये गये आन्दोलन कार्यक्रम के लिए आज से ही तैयारियों में जुट जाये। सम्मेलन ने 18-19 दिसम्बर 2012 को पूरे देश में व्यापक स्तर पर कानून तोड़ने और सत्याग्रह/जेल भरो/गिरफ्तारियां देने का कार्यक्रम आयोजित करने, 20 दिसम्बर 2012 को संसद मार्च और उसके बाद 20-21 फरवरी को दो दिन की राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल करने का फैसला किया और भारत के मजदूर वर्ग का आह्वान किया कि अपनी एकता की ताकत के बल पर संघर्ष के इन कार्यक्रमों को पूरी तरह सफल बना कर केन्द्र सरकार को जन विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों को वापस लेने के लिए मजबूर करें।
सम्मेलन में बोलते हुए सभी ट्रेड यूनियनों और स्वतंत्र फेडरेशनों के नेताओं ने इस बात पर गंभीर आक्रोश एवं चिन्ता व्यक्त की कि देश के समूचे ट्रेड यूनियन आन्दोलन द्वारा पिछले तीन सालों में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, धरने-प्रदर्शन, यहां तक कि राष्ट्रव्यापी आम हड़तालों के बावजूद सरकार महंगाई को रोकने, असंगठित क्षेत्र मजदूरों के लिए सभी सामाजिक सुरक्षा अधिकार प्रदान करने, समुचित न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने, बड़े पैमाने पर ठेके पर काम कराने, श्रम कानूनों के व्यापक स्तर पर उल्लंघन और ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले जैसे मजदूर वर्ग के ज्वलंत मुद्दों के सम्बंध में कोई भी सार्थक कदम उठाने को तैयार नहीं है और सरकार अपनी मजदूर विरोधी और पूंजीपति परस्त नीतियों पर आगे बढ़ती ही जा रही है।
सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए एटक महासचिव गुरूदास दासगुप्ता ने कहा कि यह भारत के मजदूर वर्ग के अस्तित्व मात्र की लड़ाई है। मजदूर वर्ग की एकता का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा - ”एकताबद्ध होंगे तो हम जीतेंगे, हमारे बीच फूट रहेगी तो नव उदारवाद जीतेगा। देश पर अमीर और ताकतवर लोग हावी हो गये हैं। देश के लोगों को गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और अन्याय से निजात पाना बाकी है। इसके लिए हमें निरन्तर संघर्ष करना होगा। सम्मेलन में दो दिन की हड़ताल का जो फैसला किया है, उसके लिए हमें अभी से तैयारी में जुट जाना है।
सम्मेलन को सीटू महासचिव एवं राज्य सभा सदस्य तपन सेन, इंटक अध्यक्ष जी. संजीवा रेड्डी, भारतीय मजदूर संघ के महासचिव बी.एन. राय, हिन्दू मजदूर सभा के महासचिव हर भजन सिंह सिद्धू, सेवा नेता मनाली शाह, एआईयूटीयूसी महासचिव कृष्ण चक्रवर्ती, एक्टू महासचिव स्वप्न मुखर्जी, यूटीयूसी महासचिव अशोक घोष, टीयूसीसी महासचिव एस.पी. तिवारी और एलपीएफ महासचिव एम. शन्मुगमे ने सम्बोधित किया और सम्मेलन में मजदूर वर्ग ने जो एकता प्रदर्शित की है, उसकी सराहना करते हुए इस एकता को कायम रखते हुए और बढ़ाते हुए आगे के संघर्षों में जुट जाने की अपील की।
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विश्व रोजगार में डबल डिप-आईएलओ

जी 20 देशों के नेताओं के शिखर सम्मेलन से ठीक पहले जारी एक कड़े विश्लेषण में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने कहा कि विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था एक नई और गहरी रोजगार मंदी के कगार पर है। इससे विश्वव्यापी आर्थिक बहाली में और अधिक समय लगेगा। इसका असर अनेक देशों पर पड़ सकता है। वहां सामाजिक अशांति उत्पन्न हो सकती है।
    इस नई रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘वर्ल्ड ऑफ वर्क रिपोर्ट 2011: मेकिंग मार्केट्स वर्क फॉर जॉब्स’ (श्रम की दुनिया पर रिपोर्ट 2011ः बाजार को रोजगारो के लिये तैयार करना)। रिपोर्ट कहती है कि एक थकी हुई विश्वव्यापी आर्थिक बहाली ने नाटकीय श्रम से श्रम बाजारों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। वर्तमान प्रवृत्तियों के अनुसार यह विकसित देशों में संकट के पूर्व के दौर के रोजगारों के स्तरों पर पहुंचने में कम से कम पांच साल का समय लेगी, जो कि पिछले वर्ष की रिपोर्ट में दिये पूर्वानुमान से एक वर्ष ज्यादा है।
    ‘‘हम सच्चाई के बिंदु तक पहुंच चुके हैं। रोजगार में एक गहरा गोता खाने से बचने के लिये हमारे पास एक ही चारा है, वह है अवसरों का लाभ उठाना’। यह कहना है, अंतर्राष्ट्रीय श्रम अध्ययन संस्थान के निदेशक रेमंड टौरेस का। टौरेस ने 31 अक्टूबर 2011 को इस रिपोर्ट को जारी किया था।
    यह बताते हुए कि वर्तमान श्रम बाजार पहले से ही एक आर्थिक धीमेपन और रोजगार पर उसके प्रभावों के छह माह के सामान्य चरण की सीमाओं से बंधा हुआ है, रिपोर्ट संकेत देती है कि संकट पूर्व के दौर की रोजगार दरों पर पहुंचने के लिये अगले दो सालों में आठ करोड़ रोजगारों के सृजन की आवश्यकता है। हालांकि वृद्धि में आई हालिया मंदी से पता चलता है कि विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था केवल 50 प्रतिशत रोजगार ही सृजित कर पाई है।
    रिपोर्ट में एक नया सामाजिक अशान्ति सूचकांक भी है जो रोजगारों की कमी के कारण पैदा हुए असंतोष और इस मान्यता के बाद उपजे गुस्से के स्तरों को दिखाता है कि संकट के बोझ का बंटवारा निष्पक्षता से नहीं किया जा रहा है। इससे पता चलता है कि जिन 118 देशों में अध्ययन किया गया है, उनमें से 45 से अधिक देशों में सामाजिक असंतोष का खतरा बढ़ता जा रहा है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं, जैसे यूरोपीय संघ, अरब क्षेत्र और कुछ हद तक एशियाई क्षेत्र में यह स्थिति है। इसके विपरीत उपसहारा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में सामाजिक अशांति का खतरा ठहरा हुआ या काफी कम है।
    अध्ययन दिखाता है कि लगभग दो तिहाई विकसित देशों और उबरते तथा विकासशील देशों में से आधे देशों में हालिया उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि वहां रोजगार दर सुस्त है। इससे इन क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति खराब हो जाती है। वैसे भी विश्वव्यापी बेरोजगारी अपने अब तक के शीर्ष बिंदु पर है, यानी 20 करोड़ से भी ज्यादा बेरोजगार दुनिया में हैं।
    आर्थिक सुस्ती रोजगार परिदृश्य पर विशेष रूप से क्यों ठोस प्रहार कर रही है, रिपोर्ट इसके तीन कारण बताती है: पहला, संकट की शुरुआत की तुलना में उपक्रम आज श्रमिकों को नौकरी पर बरकरार रखने के मामले में कमजोर स्थिति में है। दूसरा, जैसे-जैसे वित्तीय खर्चों में कटौती के उपायों को अपनाने का दबाव बढ़ रहा है, सरकारें नये रोजगार और आय समर्थक कार्यक्रमों को स्वीकार करने या बनाये रखने के प्रति कम उत्सुक हो गई है। सभी क्षेत्रों में अधिकतर लोग उपलब्ध रोजगार की गुणवत्ता से असंतुष्ट हैं। खासकर यूरोपीय संघ में उत्कृष्ट रोजगार का जबर्दस्त अभाव है। इस क्षेत्र में अस्थायी नौकरियों में ही बढ़त देखी गई।
    मध्य और पूर्वी यूरोप और सीआईएस तथा उपसहारा अफ्रीका में रोजगार के प्रति असंतोष सबसे ज्यादा, 70 और 80 प्रतिशत है। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में, जहां पिछले दिनों सामाजिक और राजनैतिक अस्थिरता चरम पर थी, रोजगार के प्रति असंतोष थोड़ा कम, 60 प्रतिशत के करीब है। अलग-अलग देशों में यह अलग-अलग दर्ज की गई है। ईजिप्ट, जोर्डन और लेबनान में वर्ष 2010 में तीन चौथाई लोग अच्छी नौकरियों की उपलब्धता से असंतुष्ट थे।
    विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ग्रीस, इटली, पुर्तगाल, स्लोवेनिया और स्पेन जैसे देशों में समस्या जटिल है। वहां सर्वे में शामिल 70 प्रतिशत से अधिक लोगों ने बताया कि वे रोजगार बाजार से असंतुष्ट हैं।
    संकट के बाद से जिन देशों ने आर्थिक बहाली की दिशा में अच्छा कार्य किया है, जैसे पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया और लैटिन अमेरिका, वहां लोगों में असंतोष कुछ कम है। चीन में 50 प्रतिशत से अधिक लोगों ने असंतोष जताया। इसी तरह लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों, जैसे डोेमिनिक रिपब्लिक, इक्वेडोर, हैती, निकारागुआ और उरुग्वे में 60 प्रतिशत से अधिक लोग रोजगार बाजार से असंतुष्ट हैं।
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