भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 22 नवंबर 2011

फासीवाद की ओर बढ़ती मायावती

21 नवम्बर 2011 को देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की विधान सभा में जो कुछ भी हुआ, वह निहायत निन्दनीय है, संविधान की शरेआम बेइज्जती है और लोकतंत्र पर विश्वास रखने वालों के लिए बेहद चिन्तनीय है। विधान सभा में अध्यक्ष ने बिना चर्चा, बिना तर्क 70 हजार करोड़ के लेखानुदान तथा प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव को 16 मिनटों के अन्दर ध्वनि मत से पारित घोषित कर दिया और सत्र को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। देर रात कैबिनेट बाई सर्कुलेशन द्वारा सत्रावसान के प्रस्ताव को राज्यपाल की मंजूरी के लिए राजभवन भेज दिया। अगर यह कहा जाये कि विपक्ष ने भी सदन में सरकार को पूरा सहयोग दिया, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। सपा और भाजपा के सदस्यों ने जिस प्रकार सदन शुरू होते ही वेल में जा कर हंगामा शुरू किया और जिस प्रकार उसे जारी रखा, उसे और कहा भी क्या जा सकता है। इसी अव्यवस्था ने विधान सभा अध्यक्ष को इस प्रकार संसदीय अव्यवस्था को अंजाम देने में मदद की।
संविधान निर्माताओं, जिसमें बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर भी शामिल थे, ने कभी कल्पना तक नहीं की होगी कि उनके द्वारा बनाये जा रहे संविधान को लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी कोई राज्य सरकार इस प्रकार तार-तार कर देगी। अगर उन्हें जरा सा भी अंदाज रहा होता तो वे संविधान में इस प्रकार की अलोकतांत्रिक अव्यवस्था पर काबू पाने के प्राविधान संविधान में जरूर रखते।
लेखानुदान धन विधेयक होता है। उसे सदन से स्पष्ट बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है। धन विधेयक पारित न कराने से सरकार गिर जाती है। विरोधी दल - सपा और भाजपा ने अलग-अलग अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा कर सरकार को स्पष्ट रूप से चुनौती दी थी कि वह विधान सभा में अपना बहुमत साबित करे। उनकी नजर बसपा के असंतुष्ट विधायकों पर थी। सदन में बसपा के 219 सदस्य हैं। सदन में इस समय 8 रिक्त स्थानों के साथ 395 सदस्य हैं। इस प्रकार सरकार को बहुमत साबित करने के लिए अथवा लेखानुदान को पारित कराने के लिए 198 सदस्यों के वोट की जरूरत थी। समाजवादी पार्टी ने राज्यपाल को दिए गए ज्ञापन में टिकट कटने से 40 से अधिक विधायकों के बसपा के साथ न होने का दावा किया था।
संविधान में यह व्यवस्था रखी गयी थी कि विधान सभा की हर साल बैठक कम से कम 100 दिनां तक चलनी चाहिए। बाद में संविधान में परिवर्तन कर इसे 90 दिन कर दिया गया। 1962 में विधान सभा की बैठकें 103 दिनों तक चली थीं। उसके बाद से लोकतंत्र की धज्जियां सरकारों से बिखेरना शुरू कर दिया, शुरूआत में कांग्रेस ने, फिर जनता दल के शासन में, फिर भाजपा, सपा और बसपा के कार्यकालों में बैठकों की संख्या कम से कम होती चलीं गयीं। इस हमाम में प्रदेश के सभी विपक्षी दल नंगे खड़े हैं। बसपा ने तो इस बारे में अति कर दी। इस साल विधान सभा केवल 14 दिनों तक चली। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 2008 में 27 दिन, 2009 में 13 दिन और 2010 में 21 दिन ही चली। इन बैठकों में सदन शायद ही कभी पूरे दिन चला हो। मुलायम सिंह और राज नाथ सिंह के कार्यकालों में भी विधान सभा कभी भी संविधान द्वारा नियत न्यूनतम बाध्यता 90 दिनों के एक तिहाई से ज्यादा नहीं चली। विधान मंडलों के सत्र छोटे से छोटे होते जाना संसदीय लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत हैं। इसके लिए कोई एक नहीं बल्कि प्रदेश के सभी बड़े राजनीतिक दल जिम्मेदार रहे हैं।
लेकिन 21 नवम्बर को जो कुछ भी हुआ, वह पराकाष्ठा है। यह संसदीय लोकतंत्र का गला घोटना है। इसमें तानाशाही ही नहीं वरन् फासीवाद की झलक दिखती है। चुनावों के ऐन बेला पर जनता को अवश्य सोचना चाहिए कि वह जिस पार्टी को मत देने जा रही है, कहीं वह उसके मत देने के अधिकार को ही जब्त करने की ओर तो नहीं बढ़ रही है। विधान मंडलों की घटती सत्र संख्या भी एक गम्भीर मुद्दा बन गया है।
- प्रदीप तिवारी
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उत्तर प्रदेश का विभाजन नहीं होना चाहिये

उत्तर प्रदेश को बांटकर अलग राज्य बनाने की मांग लगभग 2 दशक से चलती आ रही है। लेकिन कड़वा सच यह है कि इस मांग को जनता का बहुमत समर्थन कभी नहीं मिला। किसी भी हिस्से में कोई बड़ा आन्दोलन भी नहीं चला, सिर्फ बुन्देलखण्ड को छोड़कर जहां जब तक छिटफुट धरने/प्रर्दशन/विचार गोष्ठियां होते रहते हैं।
सच पूछा जाये तो राज्य विभाजन जनता का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिज्ञों द्वारा पैदा किया हुआ एक शिगूफा है, जिसे वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए उछालते रहते हैं। अब ताजा प्रयास बसपा सुप्रीमो मायावती ने किया है। सभी जानते हैं कि वे गत साढ़े चार सालों में हर मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। मायावती इससे आम लोगों का ध्यान बांटना चाहती हैं। पहले धर्म, फिर जाति और अब क्षेत्रीय आधार पर जनता को विभाजित कर पूंजीवादी ताकतें अपने को सत्ता केन्द्र पर काबिज रखना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें राज्य का विभाजन एक अच्छा हथकंडा लगता है।
जहां तक यह तर्क कि क्षेत्रीय विकास के लिए छोटे राज्यों का होना आवश्यक है, एक बेहद भौंडा तर्क है। विकास राज्य सत्ता की इच्छा शक्ति और संसाधनों के सही बंटवारे तथा उसके उपयोग से होता है। छोटे राज्य बना देने मात्र से नहीं। विभाजित राज्यों के अलग-अलग प्रशासनिक ढ़ांचों को खड़ा करने और उन्हें चलाने में भारी धन व्यय होता है, जिससे बुनियादी विकास की धनराशि में कटौती हो जाती है। विकास के लिए आबंटित धन का बड़ा भाग भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
विभाजित होने के बाद नया राज्य बना क्षेत्र यदि पिछड़ा है तो और भी पिछड़ जाता है। उसका अपना राजस्व पर्याप्त होता नहीं। वह अधिकाधिक केन्द्र की सहायता पर निर्भर रहता है। केन्द्र में एवं राज्य में यदि अलग-अलग दलों की सरकारें हों तो टकराव के चलते छोटे राज्य की उपेक्षा ही होती है।
यह कहना कि अलग राज्य बन जाने से औद्योगीकरण बढ़ जाएगा, कतई सच नहीं। आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों के चलते सार्वजनिक क्षेत्र को बेचने की नीतियां चल रही हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र में किसी राज्य में नए उद्योग तो खुलने से रहे। निजी क्षेत्र के उद्यमों को उद्यमी अपनी प्राथमिकता से लगाते हैं। क्षेत्र की जरूरतों के मुताबिक नहीं। उद्योगपतियों को आकर्षित करने को सरकारें किसानों की जमीनों का जबरिया अधिग्रहण करती हैं और उन्हें उद्योगपतियों को सौंप देती हैं। उद्योगपति कुछ दिन उस पर उद्योग चलाते हैं और बाद में जमीन की कीमत बढ़ जाने पर उसे बेच डालते हैं। किसान चंद पैसे पाकर जीवन भर को भूमिहीन हो जाता है।
सबसे बड़ी बात है हाल में बने छोटे राज्यों - उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार चरम पर है। पूंजी ओर पूंजीपतियों, राजनेताओं और दलालों द्वारा संसाधनों की खुली लूट जारी है। आम जनता और शोषित तबकों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत बंटकर कमजोर हो गयी। पूंजीपतियों को छोटे राज्यों के सरकारों को मैनेज करना आसान होता है। दौलत के बल पर वे छोटी विधान सभा के बहुमत को काबू में कर लेते हैं और मनमाने फैसले करा लेते हैं। खनिज, भूमि, वन संपदा और विकास के धन को हड़प कर जाते हैं।
आज उत्तर प्रदेश, जोकि 17 करोड़ की आबादी वाला प्रदेश है, देश की राजनीति में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे उत्तर प्रदेश का हर नागरिक गौरव महसूस करता है। हिन्दू-मुसलिम साझी संस्कृति के तमाम प्रतीक उत्तर प्रदेश के आगोश में हैं। पश्चिम का वाशिंदा बनारस, सारनाथ, गोरखपुर, प्रयाग जाकर अपने को धन्य समझता है तो पूरब के वाशिंदे ताजमहल, मथुरा, झांसी का दीदार करते हैं। यह संयुक्त उत्तर प्रदेश की रंगत है।
उत्तर प्रदेश का बुन्देलखंड, पूर्वांचल एवं मध्य का भू-भाग पिछड़ा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश अपेक्षाकृत अधिक खुशहाल है। उसके द्वारा अदा किए गए राजस्व से इन पिछड़े क्षेत्रों के विकास का पहिया घूमता है। यह प्रदेश के अंदर एक स्वाभाविक समाजवाद है। इसे तोड़कर हम इन अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों को क्यों केन्द्र का मोहताज बनायें? किसी दल या नेता की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के औजार हम क्यों बनें? क्यों हम विभाजन की पीड़ा को अपने ऊपर थोपे? यह सब करने को हम तैयार नहीं हैं - यह उत्तर प्रदेश की जनता का संकल्प है।
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