भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 29 जून 2013

असली माजरा क्या है?---डॉ गिरीश


पेट्रोल की कीमतें फिर बढ़ा दी गईं.जबसे पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण से मुक्त किया गया है तब से यह सवाल बेमानी हो गया है कि इतनी जल्दी फिर बढ़ोत्तरी.इसी माह में यह तीसरी बढ़ोत्तरी है.पहले अन्तराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमतों में वृध्दि को बहाना बनाया जाता था,और अब रूपये के मूल्य में गिरावट को बहाना बनाया जा रहा है.बहाना कोई भी हो इस वृध्दि को भुगतना तो जनता को ही है .उस असहाय जनता को जो पहले से ही कमरतोड़ महंगाई की मार से त्रस्त है.
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जब भी डीजल या पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं राज्य सरकारों को खुद ब खुद इसका लाभ पहुंचता है क्योंकि बढ़ी कीमतों पर स्वतः ही वेट (राज्य का कर )लग जाता है.कई राज्य सरकारों ने इन पर वेट में छूट दे रखी है और वहां की जनता को थोड़ी सी राहत मिली हुई है .लेकिन अपनी उत्तर प्रदेश की सरकार तो हर चीज के दाम बढाने में लगी है तो फिर इन पर ही वेट घटा कर अपनी नाक कैसे कटवा सकती है.शायद इसी लिए सपा ने केंद्र सरकार को समर्थन दे रखा है कि वे वहां बढ़ाते रहें और ये यहाँ उस पर बड़ा टेक्स बसूलते रहें.
एक बात और...दो दशक पहले एक आन्दोलन चल रहा था-मन्दिर निर्माण का .उसी के साथ-साथ वही ताकतें एक और आन्दोलन चला रहीं थीं-निजीकरण का. गला फाड़-फाड़ कर कहा जारहा था कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं,उद्योग चलाना नहीं.सब्सिडी देना नहीं,सार्वजनिक क्षेत्र के लोग काम नहीं करते और वे घाटे में हैं अतः सबका निजीकरण कर देना चाहिये .शायद मन्दिर आन्दोलन तो छतरी था,छुपा एजेंडा यही था.मन्दिर तो बना नहीं लेकिन शिक्षा इलाज उद्योग बैंक बीमा आदि सभी का निजीकरण हो गया और पेट्रोल डीजल गैस सभी नियन्त्रण मुक्त हो गये .अब इसके कुफल जनता भुगत रही है. लेकिन अभी भी बहुतों की समझ में नहीं आरहा कि असली माजरा क्या है?
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