भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

उनकी हार नई है न अपनी जीत नई

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मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE

Communist Party of India
CENTRAL OFFICE
Ajoy Bhavan, Phones(91-11)23235546,23235099, 23235058
15 Indrajit Gupta Marg, New Delhi.110002 Fax (91-11) 23235543
e-mail: :cpiofindia@gmail.com

General Secretary: A.B. Bardhan
27th April 2010

Press Release

The Central Secretariat of the Communist Party of India has issued the following statement to the press:


CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE
SUCCESS OF THE HARTAL

The Communist Party of India congratulates the people of all over the country who have responded to the call of Hartal against high prices and in protest against Government’s failure to take any steps for bringing down the high prices.

The Party expresses its grateful thanks to all the 13 Parties who have done everything to make the Hartal a success and also to other Parties who came out in support of the Hartal. This is a vivid example of the common man’s indignation and discontent, and the success owes it to the united action of all who made it their common cause. Even now the UPA Government should take this into account and take the necessary steps which the Left and other Parties have all along been proposing.

This is not the end of the struggle. The Parties will meet soon on a date which will be fixed after consultations to decide the next step which they together will take to force the hands of the Government.



(Kshetra Panda)
Office Secretary
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भारत बंद पर सहयोग के लिए जनता का शत शत नमन

लेफ्ट पार्टिओं के साथ-साथ ९ अन्य दलों द्वारा महंगाई के खिलाफ आज बंद के आह्वान पर पूरा उत्तर प्रदेश बंद रहा। लखनऊ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कैसरबाग स्थित कार्यालय से भाकपा कार्यकर्ता जुलूस में बंद करते हुए निकले और लोक दल के कार्यालय पर लोक दल, इंडियन जस्टिस पार्टी, लोक जन शक्ति पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हो गए और जुलूस ने विधान सभा के सामने होते हुए हजरतगंज की तरफ बढ़े जहाँ पर पुलिस ने बैरिकेड लगा कर रोकने का प्रयास किया। कुछ समय तक प्रदर्शनकारियों और पुलिस में धक्का मुक्की हुई। उसके बाद प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर पोलिस लाइन ले जाया गया। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेता थे भाकपा राज्य सचिव डॉ गिरीश, लोक दल के अध्यक्ष राम आसरे वर्मा, इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष काली चरण, एल जे पी की चित्रा सिंह, भाकपा के मंत्रिपरिषद सदस्य विश्व नाथ शास्त्री, कार्यकारिणी सदस्य अरविन्द राज स्वरुप, प्रदीप तिवारी, सदरुद्दीन राणा, सुरेन्द्र राम आदि.
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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

वर्कला राधाकृष्णन का निधन

खास खबर ने आज छापा है :
तिरूवनंतपुरम। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के वयोवृद्ध नेता वर्कला राधाकृष्णन का सोमवार सुबह निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे।
पार्टी के एक अधिकारी ने बताया कि राधाकृष्णन को पिछले सप्ताह अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। रविवार को उनकी हालत बिग़ड जाने पर उन्हें तिरूवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के आईसीयू ले जाया गया जहां सोमवार सुबह उन्होंने दम तो़ड दिया। उनका अंतिम संस्कार सोमवार रात करीब 9.30 बजे होगा। राजनीति में राधाकृष्णन के केरियर की शुरूआत वर्ष 1952 में ग्राम परिषद के प्रमुख के रूप में हुई। वह 1980 से 1996 तक केरल विधानसभा के सदस्य रहे। 1987 से 1991 के दौरान वह विधानसभा अध्यक्ष थे। वर्ष 1998 से वह चिरयांकीझु लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
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कल अजमेर बंद का ऎलान

http://www.pressnote.इन ने आज छपा है
26 Apr, 2010 08:14 AM अजमेर। महंगाई के खिलाफ 27 अप्रेल को भारत बंद के समर्थन में वाममोर्चा समर्थक दलों ने अजमेर बंद का ऎलान किया है। बंद की तैयारियों को लेकर अजमेर-मेरवाडा गण परिषद अध्यक्ष सज्जनसिंह चौधरी की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गई। जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रमेश टेलर, फारवर्ड ब्लाक के धर्मेंद्र लालवानी, जन ??ा दल के घनश्यामसिंह राठौड, जनता दल 'यू' के सी।पी। कोली, समाजवादी विचार मंच के अब्दुल सलाम कुरैशी, बहुजन समाज पार्टी के दयाशंकर राठौडिया, अजमेर-मेरवाडा गण परिषद से अजयपाल, एमएमटी वर्कर्स यूनियन के हरिभाई शर्मा, असंगठित मजदूर एकता यूनियन के के। प्रवीण, सीपीएम के दिनेश गौड, आर।सी. गुप्ता ने भाग लिया। दवाई की दुकानों, दूध-सब्जी विके्रताओं और शिक्षण संस्थाओं को बंद से अलग रखा गया है।
http://www.pressnote.in/hindi/readnews.php?id=76680
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भारत बंद कल

प्रभात खबर ने आज छपा है :
नयी दिल्ली : वामपंथी पार्टियों तथा राष्ट्रीय जनता दल समेत 13 दलों की दिल्ली इकाइयों के नेताओं ने महंगाई के विरोध में कल (मंगलवार) आयोजित भारत बंद की तैयारियों के सिलसिले में आज यहां बातचीत की. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की दिल्ली इकाई के प्रवक्ता ने बताया कि 13 पार्टियों की दिल्ली शाखा ने कल होने वाले राष्ट्रव्यापी बंद की तैयारियां शु कर दी है. जो पार्टियां कल के भारत बंद में शामिल हो रही हैं उनमें माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल, तेलुगू देशम पार्टी, अखिल भारतीय फ़ारवर्ड ब्लॉक, रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल (एस), लोक जनशक्ति पार्टी, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्न्ोत्र कड़घम, इंडियन नेशनल लोक दल और असम गण परिषद पार्टी भी शामिल हैं. गौरतलब है कि इन 13 गैर कांग्रेसी एवं गैर भाजपाई राजनीतिक दलों ने महंगाई के विरोध में कल संसद में कटौती का प्रस्ताव लाने की भी घोषणा की है. माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा कि आवश्यक वस्तुओं खाद्य, डीजल व उर्वरक आदि के मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इसके विरोध में यह बंद आयोजित किया जा रहा है. राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने कहा कि तीसरा मोर्चा एकजुट है और 27 अप्रैल को वह संसद में कटौती का प्रस्ताव लाकर सरकार को घेरेगा. उन्होंने कहा कि सरकार की गलत नीतियों के कारण ही देश में महंगाई बढ़ी है जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.
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Anti-price hike strike fixed on April 27

The Sanghai Express published today :
Imphal, April 25 2010: The nation-wide strike being planned by Opposition political parties in protest against escalating price of essential commodities would be joined by the working class of Manipur, said national Secretary of Communist party of India L Sotinkumar.Speaking to newspersons at the irabot Bhavan office of the CPI today, Sotinkumar said the day-long general strike planned for April 27 would be joined by employees/workers of State-based banks, LIC, medical representatives, pharmacists, women vendors, drivers, rickshaw pullers and employees of some flight services.Contending that budgetary provisions of the Congress-led UPA Government is anti-poor, the CPI functionary also alleged that rather than take a holistic look on the negative points being pointed out by Left parties against the Central Government's economic policy, the Communist parties are being projected in poor light.Informing that the strike centred around cessation of economic activities would be held from 6 am till 4 pm, he also disclosed that in continuation of the protest against hike in prices of essential commodities Left parties would insist on a cut motion discussion on the issue.The cut motion with support of 13 opposition political organisations would proposed for a voice vote failing which the entire opposition MPs are ready to stage a walk-out, Sotinkumar maintained.Joining the media briefing, CPI state Secretary Sarat Salam confided that the cut motion would have the support of 278 MPs.All India Forward Block secretary Kh Gyaneswor and RSP secretary N Ratan were also presented at the briefing.
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Even Indian diaspora not free of caste bias, says Raja


The Hindu today published the following news :


डी. Raja, National Secretary of the Communist Party of India (CPI), said that the caste system and untouchability are deep rooted even among the Indian diaspora.


He was speaking at the State conference of the CPI at Chidambaram near here on Saturday to mark the birth anniversary of B.R. Ambedkar.
In an era of neo-liberalism, Dalits were put to hardship and the new economic policy had worsened their plight. Mr. Raja said that communists were fighting social ills and if Ambedkar were alive, he would have associated with the communists because he had striven to create a casteless society.
State Secretary of the CPI, D. Pandian, said that caste had become inalienable from birth to death. Even after conversion, it would not fade away.
Horrendous crimes were committed in the name of “honour killings” to do away with youngsters who married ignoring caste delineations.
Unless a genuine social transformation occurred, it was difficult to eradicate untouchability, he said.
Veteran communist leader R. Nallakannu deplored the double-tumbler system and denial of entry to temples that still existed in Tamil Nadu.
Mr. Nallakannu said that the Dalits could not wage a solitary battle; they had to align with like-minded organisations.
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Bharat Bandh against price rise tomorrow


http://www.mynews.in/ ने निम्न समाचार प्रकाशित किया है :


New Delhi: Delhi units of 13 parties, including Communist Party of India (CPI) and Rashtriya Janta Dal (RJD), met here today to discuss the nationwide strike against price rise tomorrow।


''Delhi chapter of 13 parties met today to intensify preparations for the nationwide strike which is on April 27,'' a CPI, Delhi, spokesperson said.
Workers and activists of CPI, CPI (Marxist), RJD, Samajwadi Party (SP), Rashtriya Lok Dal (RLD), Telugu Desam Party (TDP), All India Forward Bloc (AIFB), Revolutionary Socialist Party (RSP), Janta Dal (Secular), Lok Janshakti Party (LJP), All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK), Indian National Lok Dal (INLD) and Asom Gana Parishad (AGP) will take out a procession tomorrow in various parts of Delhi to protest the rising prices of essential commodities.
''The procession is to spread the message that the Government's failure to control hoarding, black marketing and future trading in grains is the root cause of continuous rise in prices of essential commodities,''the spokesperson added.
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मई दिवस की चुनौतियां

मई दिवस काम के घंटे कम करने के संघर्षों की प्रारंभिक घटनाओं से संबंधित है। हर साल की पहली मई शिकागो में सन् 1885 की मई के रक्रंजित प्रथम सप्ताह की उन घटनाओं की याद दिलाती है। मजदूरों की मांग थी काम के घंटे कम किये जायें और आठ घंटे काम के, आठ घंटे परिवार के और आठ घंटे आराम के माने जाये। बाद के दिनों में तकनीकी विकास के फलस्वरूप कार्यदिन और भी कम करने की मांग उठने लगी। कई कार्यालयों में साप्ताहिक छुट्टी और काम के घंटे और भी कम किये गये। भारत के 5वें श्रम सम्मेलन में साप्ताहिक छुट्टी के साथ सप्ताह में 48 घंटे तय किये गये। लेकिन अब यह सब बीते दिनों की बात हो गयी। 60 और 70 के दशक के वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद उल्टी गंगा बहने लगी। वैज्ञानिक तकनीकी उपकरण के अविष्कार के बाद आशा की जाती थी कि मजदूरों के कार्य हल्के होंगे, खतरनाक काम आसान होंगे और नये रोजगार के अवसर बढे़गे, किन्तु इन सभी आशाओं पर तुषारापात हो गया और तमाम अपेक्षाओं के प्रतिकूल नियोजकों ने कार्य दिवस अत्यधिक बढ़ा दिये हैं तथा कार्यदशा बद से बदतर किये है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति की उपलब्धियों को पूंजीपतियों ने हाथिया लिया हैं और उनका इस्तेमाल वे अपने वर्ग स्वार्थ में करते हैं।भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के अधिनस्थ वी वी गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान ने नोएडा और गुडगांव में अत्याधुनिक तकनीकी के बीपीओ (बिजनेस प्रोसेसिंग आउटसोर्सिंग) और कालसेंटरांे में कार्यरत आधुनिकतमपरिधानों में सजे-सवरें शूटेड-बूटेड नवकार्य-संस्कृति के कर्मचारियों (दरअसल इन्हें कर्मचारी पुकारा जाना पसंद नहीं) की कार्यदशा का अध्ययन किया है। संस्थान के शोधकर्ता िवद्धानों ने विस्तृत छानबीन के बाद अपने तथ्यपूर्ण शोधगं्रथ में उजागर किया है कि कॉल सेंटरों में काम करने वालों की कार्यस्थिति प्राचीन रोम के गुलाम जैसी है। इन्हें प्रतिदिन प्रायः दस घंटे (और ज्यादा भी) बंदी अवस्था में काम करना पड़ता है। इससे नाना प्रकार की नयी शारीरिक एवं मानसिक बीमारियां परिलक्षित हो रही है। आईसीआईसीआई जैसी बैंकिंग कारोबार में भी काम करनेवालों के घंटे निर्धारित नहीं है और इन्हें 10 घंटे और इससे ज्यादा भी रोजाना काम करना पड़ता है। यह अलग-थलग अकेली घटना नहीं है।मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग में ठेकाकरण, आउटसोर्सिंग और पीसरेट सिस्टम चल पड़ा है, जहां काम के घंटे निर्धारित नहीं है। उत्पादन प्रक्रिया में मूलचूल बदलाव आया है। कारखानों की भीड़भाड़ कम करके ‘लीन मॉडल’ अपनाया जा रहा है, जिसमें कुछेक अतिकुशल मजदूरों को कार्यस्थल में बुलाकर शेष काम ठेके पर बाहर वहां भेज दिये जाते हैं, जहां किसी प्रकार का श्रम कानून लागू नहीं है। अगर नियमानुसार श्रम कानून लागू भी है तो उसके अनुपालन की बाध्यता नही है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद मजदूर वर्ग की अपेक्षाएं थी कि उनके कार्यबोझ कम होंगे, उनके आराम तथा रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वैज्ञानिक उपलब्धियां महाकाय कार्पोरेटियों की चेरी बनकर रह गयी। इसीलिए काम के घंटे कम करने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के सामने प्राथमिक महत्व का है।सन् 1990 में 10 प्रतिशत कर्मचारी कानून सम्मत सामाजिक सुरक्षासुविधाओं के दायरे में आते थे। वह संख्या सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सन् 2000 में सात और 2005 में 5।66 प्रतिशत हो गयी। गैरसरकारी अनुमानों के मुताबिक आज 2010 में महज 5 प्रतिशत कर्मचारियों को कानूनी सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं प्राप्त है। इससे यह तथ्य सिद्ध होते हैं कि सन् 1990 के बाद के वर्षों में कोई तीन करोड़ मजदूर और कर्मचारी कानूनी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर धकेल दिये गये।सामाजिक सुरक्षा संवैधानिक मानवधिकार है, जिसकी खुलेआम हत्या की जा रही है। पूंजीपति नियोजक और राज्य सत्ता के मेलजोल से सुविचारित अर्थनीति अख्तियार की गयी जिसके तहत उत्पादन प्रक्रिया में गैरकानूनी फेरबदल करके लोगों को रोजगार से निकाल बाहर किया जा रहा है। सन् 1991 में घोषित नई आर्थिक नीति स्थायी रोजगार को अस्थायी (टेम्पररी) और आकस्मिक (कैजुअल) बनाता और मजदूरों को टिकाऊ रोजगार तथा भरोसे की आय से वंचित करता है। यह गैरकानूनी प्रतिगामी कदम है जो इतिहास के चक्के को पीछे घुमाने पर अमादा है। औद्योगिक विवादअधिनियम की धारा 9ए एवं मजदूरपक्षी श्रम कानूनों को निष्क्रिय किया गया है। इस तरह काम का घंटा कम करने के साथ जीने लायक पारिश्रमिक और टिकाऊ रोजगार हासिल करने का संघर्ष मजदूर वर्ग के समक्ष दूसरी चुनौती आ खड़ी हुई है।हाल के दिनों में मंदी के नाम पर मजदूरों की छटनी बड़े पैमाने पर की गयी। मंदी, मुक्त बाजार व्यवस्था की देन है। इसका जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति है मजदूर नहीं। जिस कृत्य का जिम्मेदार मजदूर नहीं उसकी मार मजदूर क्यों भुगते? मजदूरों के कंधे पर मंदी का हल बर्दाश्त-ए-काबिल नहीं है। इसीलिए रोजगार की सुरक्षा की तीसरी चुनौती मजदूर वर्ग के सामने दरपेश है।उपभोक्ता सामानों का दाम बढ़ाकर मुनाफा कमाना पूंजीपति वर्ग का अजमाया हुआ हथियार है। मजदूर वर्गीय संघर्षो से हासिल पारिश्रमिक वृद्धि को चीजों के दाम बढ़ाकर पूंजीपति वर्ग वापस छीन लेता है। महंगाई के मुद्दे पर आमजनों के हितों के साथ मजदूर वर्गीय हित अभिन्न रूप से जुड़ा है। मजदूर वर्ग के सामने यह महंगाई चौथी चुनौती है कि मजदूर वर्ग आम जनों के दुखों के साथ एक होकर वर्ग दुश्मनों की पहचान करे और उन्हें शिकस्त देने के लिए एकताबद्ध संघर्ष करे। सभी संकेत बताते हैं कि आनेवाले दिनों में देहात से शहर की ओर और पिछड़े इलाके से उन्नत क्षेत्र की तरफ जाने लायक रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन और भी तेज होगा। इसके साथ ही उद्योग जगत में स्थायी रोजगार से अस्थायी और औपचारिक से अनौपचारिक उत्पादन पद्धति का प्रचलन भी बढ़ेगा। उत्पादन प्रक्रिया में ऐसे बदलाव की रफ्तार अधिकाधिक मुनाफा के निमित्त बढ़ाया जा रहा है। फलतः प्रवासी मजदूरों और अनौपचारिक श्रमजीवियों की बढ़ती तादाद को संविधान प्रदत्त सामाजिक सुरक्षा मुकम्मिल कराने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के समक्ष पांचवी चुनौती है।देश के हर क्षेत्र में कार्पोरेट गवर्नेस का बाजार गर्म है। खुदरा बाजार का कार्पोटीकरण यहां तक कि कृषि क्षेत्र को भी कार्पोरेट के हवाले किया जा रहा है। कार्पोरेट गवर्नेस जिस गति से मजबूत हो रहा है, हमारा लोकतंत्र उसी क्रम में कमजोर हो रहा है। लोकतंत्र और कार्पोरेट सहयात्री नहीं बन सकते। लोकशाही और पूंजीशाही मूल रूप में विपरीतार्थक और परस्पर विरोधी दिशा है।देश की संसद को दरकिनार कर अंतराष्ट्रीय समझौते किये जा रहे हैं। संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत कृषि राज्यों के मामले हैं, किन्तु राज्य विधान सभाओं और पार्लियामेंट की पीठ पीछे विश्व व्यापार संघ के समझौते पर हस्ताक्षर किये गये। सन् 1956 में संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित औद्योगिक प्रस्ताव को नयी आर्थिक नीति की सरकारी घोषणा में खारिज कर दिया गया। मुक्त बाजार व्यवस्था को अपनाकर संविधान में वर्णित उदात्त समाजवादी आदर्शों की तिलांजलि दे दी गयी है। आत्मनिर्भर स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र को साम्राज्यवादी वैश्वीकरण पर निर्भर बना दिया गया है। चंद व्यक्तियों के हाथों में पूंजी का संकेद्रण तेज गति से हो रहा है। विकास का लाभ देश के कुछेक व्यक्तियों तक सीमित है। देश का विशाल बहुमत विपन्न है। देश की संसद में करोड़पतियों ने बहुमत बना लिया है। इसलिए लोकतंत्र के क्षरण को रोकना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करना मजदूर वर्ग के सामने निर्णायक चुनौती है। हमें आर-पार की लड़ाई लड़नी है। तो आइये 2010 के मई दिवस के अवसर पर इन चुनौतियों का सामना करने और आम आदमी के हक में खुशहाल भारत बनाने का सामूहिक संकल्प लें।
- सत्य नारायण ठाकुर
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पॉकेटमार बजट

यह बजट क्या है? एक छलावा है, ईमानदार की जेब काटकर बेईमानों के पॉकिट में पैसे डालने की कला है। इसीलिए तो उद्योग जगत ने इस कलाबाजी के लिए वाह-वाह कहा तो आम आदमी में त्राहिमाम मचा है।हरेक बजट का एक राजनीतिक दर्षन होता है। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने उस दर्षन का संकेत अपने बजट भाषण के प्रारंभ में ही कर दिया कि बजट का फोकस सार्वजनिक क्षेत्र से हटकर निजी खिलाड़ियों (प्राइवेट एक्टर्स) की तरफ किया गया है और उसमें सरकार की भूमिका सहायक की होगी।असंगठित मजदूरों के लिए अर्जुन सेनगुप्ता कमीषन ने कम से कम 32 हजार करोड़ की सामाजिक सुरक्षा निधि की मांग की थी, किंतु इसके लिए बजट में मात्र एक हजार करोड़ के कोष का प्रावधान किया गया है। यह ऊंट के मुंह में जीरा समान है। बजट में सरकारी अस्पतालों, चिकित्सा एवं षिक्षा के पुराने बजटीय आबंटन पर भी कैंची चलायी गयी है। उपकरणों के बढ़े दामों के मद्देनजर पिछले वर्षों के बजट प्रावधानों के मुकाबले इस बजट में कम रकम आबंटित की गयी है। जीवनोपयोगी सामानों के बढ़ते दामों से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। महंगाई कम करने का कोई ठोस उपाय नहीं किया गया है। उल्टा परोक्ष कर का भार बढ़ाकर जले पर नमक छिड़का गया है।मोटी आयवालों को टैक्स चुकाने में रियायतें दी गयी हैं, वहीं उससे कई गुना ज्यादा परोक्ष कर लगाया गया है, जिससे महंगाई बढ़ेगी ही। इससे भूखों और कुपोषणों की संख्या बढ़ना निष्चित है। कार्पोरेट सेक्टर को मंदी के नाम पर दिया गया प्रोत्साहन पैकेज बंद किया जाना चाहिए था, क्योंकि उसका दुरूपयोग मुनाफा लूटने में किया जा रहा है। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने अपील की थी कि मजदूरों की छंटनी नहीं की जाय? लॉक-आउट और ले-ऑफ रोके जायें, किंतु उद्योग जगत ने इस अपील की पूरी तरह उपेक्षा कर दी। फलतः रोजगार का भारी नुकसान जारी रहा। कार्पोरेट सेक्टर पर नये टैक्स लगाने के बजाय बजट में उन्हें रियायतें दी गयी है। अगर कल्याण योजनाओं के लिए पैसों की कमी है तो उद्योगपतियों पर टैक्स क्यों नहीं लगाये गये, जिन्होंने हाल के दिनों में मोटे मुनाफे कमाये हैं?आयात-निर्यात करनेवाले उद्योगपतियों को नयी रियायतें दी गयी हैं। उनके टैक्सों में नयी छूटें दी गयी है। आयात कर में कटौती की गयी है। विदेषी सामानों के आयात पर लगने वाली कस्टम डयूटी आधी कर दी गयी। फलतः विदेषी माल हमारे घरेलू बाजार में और भी धड़ल्ले से आयेंगे। इसका हमारे कल-कारखानों के उत्पादान पर विपरीत असर अवष्यंभावी है। यह अहसास किया जाना चाहिए कि आयात कर में कटौती करना न केवल विदेषी मालों को आमंत्रण देना है, बल्कि यह देष के अंदर बेरोजगारी का सीधा आयात करना है।जीडीपी बढ़ाकर दो अंकों में करने का लक्ष्य रखा गया है, किंतु जीडीपी का संबंध रोजगार बढ़ाने से नहीं जोड़ा गया है। इस प्रकार की जीडीपी बढ़ने से देष की संपदा कुछेक व्यक्तियों के हाथों में सिमटती जा रही है। यह भारतीय संविधान के उन निदेषक सिद्धातों के विपरीत है, जिसमें धन के कुछेक व्यक्तियों के हाथों में संकेन्द्रण की मनाही की गयी है। जीडीपी को आम जनता की खुषहाली के साथ जोड़ा जाना चाहिए। पूंजीपतियों की खुषहाली और आम आदमी की बदहाली भारतीय संविधान के समाजवादी लक्ष्यों का निषेध है।पेट्रोल-डीजल पर दाम बढ़ाना जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालना है। रेलमंत्री ममता बनर्जी एक तरफ रेल भाड़ा नहीं बढ़ाने की वाहवाही लूट रही है। तो क्या डीजल का दाम बढ़ने से मालभाड़ा नहीं बढ़ेगा? पेट्रोल-डीजल पर दाम बढ़ना परोक्ष कर है, जो सीधे जनता की जेब काटता है। यह महंगाई से पीड़ित जनता के घावों पर नमक छिड़कना है।इससे सभी महसूस करते हैं कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की भूमिका के चलते विष्वमंदी और वित्तीय संकट का असर भारत में कम देखा गया। उम्मीद की जाती थी कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की वित्तीय प्रणाली मजबूत की जायेगी। इस उम्मीद पर पानी फिर गया। बजट के मुताबिक बैंकिंग क्षेत्र में निजी बैंकिंग प्रणाली के नये दरवाजे खोले गये हैं। यह अषुभ संकेत है। इससे हमारी वित्तीय व्यवस्था में विदेषियों का हस्तक्षेप बढ़ेगा।पूर्वी प्रदेषों में हरित कृषि क्रान्ति लाने के लिए चार हजार करोड़ रुपये के विषेष निवेष का षोर मचाया जा रहा है। देष की 65 प्रतिषत आबादी कृषि पर निर्भर है। इसके लिए यह आवंटन भी ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन है। बिहार जैसे राज्य के लिए बाढ़ और सूखा महान आपदा है। इसके समाधान के लिए सम्यक स्थायी जल प्रबंधन की चिर जनाकांक्षा की उपेक्षा की गयी है। इसके बगैर इस क्षेत्र में हरित क्रांति की बात करना थोथा गाल बजाना है। सबसे खतरनाक खेल तो यह है कि कृषि में अमेरिकी कार्पोरेट के प्रवेष के बारे में एक समझौते के मसविदा पर पिछले महीने कैबिनेट ने हरी झंडी दी है। बजट में उन्नत तकनीकी भंडारण और वेस्टेज नियमन के लिये जो धनराषि आबंटन है, वह किसानों के लिये नहीं, प्रत्युत कार्पोरेटियों के लिये है। उसे वास्तविकता में कार्पोरेट सेक्टर ही हथियाएगा। हम आगे देखेंगे यह मसविदा क्या गुल खिलाता है।इसी तरह रेलमंत्री ममता बनर्जी ने पष्चिम बंगाल के आगामीविधानसभा चुनाव के मद्देनजर रेल बजट में चुनावी रंग फंेंट दिया है। वे अपने पिछले साल के रेलबजट का “दृष्य 2020” को भी अदृष्य कर गयीं। तेज रेलगाड़ियों के लायक ट्रैक निर्माण, समुचित सुरक्षा उपाय एवं अन्य अधिसंरचनात्मक (इंफ्राट्रक्चर) निवेष का प्रावधान नहीं किया गया है। रेल चलाने के लिए उन्होंने निजी क्षेत्र को पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट- पार्टनषिप) बुलावा भेजा है और रेलवेबोर्ड को पानी बोतल का कारखाना, इको-फ्रेंडली पार्क बनाने, स्कूल-कालेज और अस्पताल चलाने के काम में लगा दिया है।अब समय आ गया है कि अलग रेल बजट बनाने की औपनिवेषिक परंपरा खत्म की जाय और रेल बजट को सामान्य बजट का हिस्सा बनाया जाय। जब विभागीय रूप में दूरसंचार, डाकतार, उड्डयन, परिवहन, तेल, जहाजरानी, पोट एंड डॉक आदि चल सकते हैं तो रेल क्यों नहीं?वित्त मंत्री प्रणव मुखजी ने आम आदमी का बजट बताकर एक बड़ा झूठ परोसा है। असल में यह बजट पूंजीपतियों को रिझाने के लिए परोसा गया है। अंतर्राष्ट्रीय सट्टेबाजों का अखबार ‘वालस्ट्रीट जर्नल’ वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के नाम पिछले हफ्ता एक खुला पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि “अब आपकी सरकार निडर होकर तथाकथित सामाजिक समावेषिक विकास जैसे वोट बटोरू उपायों से मुक्त होकर सब्सिडी का खात्मा, निवेष को बढ़ावा और आयात-निर्यात सुगम करने के लिए कराधान की बाधा समाप्त कर सकेगी।”प्रतावित बजट प्रावधानों से प्रकट है कि अमेरिकी पूंजीपतियों का प्रतिनिधि अखबार ‘वालस्ट्रीट जनल’ के सुझावों के अनुकूल बजट में बखूबी इंतजाम किये गये हैं। इस बजट में जनता की जेब काटकर पूंजीपतियों की तिजोरी भरी गयी है। यह जनता के लिए एक पॉकेटमार बजट है।
- सत्य नारायण ठाकुर
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World Dance Day: 29th April, २०१० - International Message by Julio Bocca (Argentina)

Dance is discipline, work, teaching, communication. With it we save on words that perhaps others would not understand and, instead, we establish a universal language familiar to everyone. It gives us pleasure, it makes us free and it comforts us from the impossibility we humans have to fly like birds, bringing us closer to heaven, to the sacred, to the infinite.
It is a sublime art, different each time, so much like making love that at the end of each performance it leaves our heart beating very hard and looking forward to the next time.
English translation by Marcia De La Garza (Original in Spanish)
History of World Dance Day – 29th April
In 1982 the Dance Committee of the ITI founded International Dance Day to be celebrated every year on the 29th April, anniversary of Jean-Georges Noverre (1727-1810), the creator of modern ballet. The intention of the «International Dance Day Message» is to celebrate Dance, to revel in the universality of this art form, to cross all political, cultural and ethnic barriers and bring people together with a common language - Dance.
Every year a message from an outstanding choreographer or dancer is circulated throughout the world. The personality is selected by the founding entity of the International Dance Day - the International Dance Committee of the ITI, which collaborates with World Dance Alliance, a Cooperating Member of the ITI.
Together with the World Dance Alliance, ITI and its Dance Committee are celebrating International Dance Day at UNESCO in Paris.




Circulated by:
Indian People’s Theatre Association (IPTA).
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रविवार, 25 अप्रैल 2010

वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण जिन लोगों की नौकरियाँ चली गईं सरकार ने उनकी मदद के लिए क्या किया - गुरुदास दासगुप्ता

सरकार ने सोमवार को लोकसभा में स्पष्ट किया कि फिलहाल शिक्षित बेरोजगारों को भत्ता देने की उसकी कोई योजना नहीं है। हालाँकि सरकार की देश भर के रोजगार कार्यालयों के आधुनिकीकरण करने की योजना है।
सदन में प्रश्नकाल के दौरान समाजवादी पार्टी के शैलेन्द्र कुमार के सवाल के जवाब में श्रम एवं रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खड्गे ने कहा कि सरकार देश भर के रोजगार कार्यालयों का आधुनिकीकरण करने की योजना बना रही है। पर शिक्षित बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देने का सरकार का फिलहाल कोई कार्यक्रम नहीं है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गुरुदास दासगुप्ता ने सरकार से जानना चाहा कि वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण जिन लोगों की नौकरियाँ चली गईं सरकार ने उनकी मदद के लिए क्या किया। खड्गे ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था के अनुसार जिनकी नौकरी जाती है उन्हें छह महीने का वेतन दिए जाने की व्यवस्था है।
सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है जिसकी सही स्थिति का आकलन करने के लिए क्या सरकार कोई नई एवं अधिक प्रभावी व्यवस्था प्रारंभ करने जा रही है।
खड्गे ने कहा देश में बेरोजगारों की वास्तविक स्थिति का आकलन राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन द्वारा किया जाता है। इसके साथ ही श्रम मंत्रालय हर तीन महीनों में नमूना सर्वेक्षण भी कराता है जिसकी रिपोर्ट समय समय पर मिलती रहती है।
उन्होंने कहा कि नमूना सर्वे पूरी तरह सटीक नहीं माने जाते हैं इसलिए सरकार अभी तक सही आँकड़ों के लिए संगठन की रिपोर्ट पर ही निर्भर रहती है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी नए विकल्प पर भी विचार कर सकती है।
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आईपीएल विवाद की जवाबदेही तय की जानी चाहिए : राजा

दैनिक ट्रिब्यून ने आज छापा है कि :
”पुड्डुचेरी, 24 अप्रैल (वार्ता)। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सचिव डी. राजा ने विवादों में घिरी इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) से जुड़े सभी मामलों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की आज मांग की।
राजा ने यहां संवाददाताओं से कहा कि आईपीएल में लगने वाले धन के श्रोत पर सवालिया निशान लगे हैं और केन्द्र सरकार इस मसले पर निर्णय लेने में ढुलमुल रवैया अपना रही है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार को आईपीएल के पूरे ब्यौरे और केन्द्रीय मंत्रियों के इससे संबंधों का खुलासा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई नहीं जानता कि इस पूरे मामले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और आईपीएल का कौन पदाधिकारी जवाबदेह है और उसकी क्या जवाबदेही है।
उन्होंने कहा कि राजनेताओं के फोन टैप किये जाने की खबरें हैं जो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिक अधिकारों को बड़ा आघात है। इसकी कड़ी भर्त्सना किये जाने की जरूरत है। राजनेताओं के खेल संघों और खेलों से जुड़ाव के बारे में पूछे जाने पर कहा कि उनकी भूमिका अब सवालों के घेरे में आ गयी है।
भाकपा नेता कहा कि पूरी खेल नीति की समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि खेल मंत्रालय की भूमिका को भी पुनर्निधारित करना होगा।“
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इस्तीफे के बाद पहली बार केरल पहुंचे थरूर

एन डी टी वी ने बताया है लोगों को कि :
”इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की कोच्चि फ्रेंचाइजी पर उठे विवाद के बाद विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा देने वाले शशि थरूर शनिवार को जब पहली बार केरल पहुंचे तो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जहां उनका स्वागत किया वहीं उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के कार्यकर्ताओं के विरोध का भी सामना करना पड़ा।
थरूर तिरूवनंतपुरम के सांसद हैं। आईपीएल विवाद के बाद मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद वह पहली बार यहां पहुंचे। वह दोपहर लगभग 12.50 बजे तिरूवनंतपुरम हवाई अड्डे पहुंचे। ......................................................... भाकपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने थरूर का विरोध भी किया। पुलिस ने लगभग 50 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया।“
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brickbats greet Tharoor on Kerala visit

इंडो एशियन न्यूज़ ने आज छापा है कि :
"Waving cricket bats, hundreds of Congress activists gave a roaring welcome to former minister of state for external affairs Shahshi Tharoor as he arrived here Saturday on his first visit to his home state after quitting over the IPL row.
But a smaller group of protesters allied to the Communist Party of India (CPI) held posters of the Congress MP and his friend Sunanda Pushkar, whose links to the Indian Premier League (IPL) Kochi franchise triggered the controversy that has turned into the country's worst sports crisis.
But the police kept the two groups apart. Around 50 opposition activists were arrested.
It was the first time Tharoor, a former senior UN official, returned to Thiruvananthapuram, which he represents in the Lok Sabha, since resigning from Prime Minister Manmohan Singh's government April १८
.................................
................................
As Congress workers sang his praises, members of the CPI's youth wing waved his and his friend Pushkar's posters. Banners carried by them read: "Should Kerala accept Tharoor's behaviour?"
Similar posters were seen pasted in several parts of the Kerala capital."
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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

CPI demands JPC probe into IPL

http://www.mynews.in published the following news today :
Puducherry: Communist Party of India Secretary D Raja, MP, today demanded an enquiry by a Joint Parliamentary Committe into the IPL 'gambling." Addressing a press conference here, he said money was flowing from 'questionable sources' and the Union Governemnt was not firm in taking a decision on the issue. The Centre should come out with an explanation and also connection of Ministers in different ways with IPL.
" No one knows to whom the BCCI and IPL are accountable and what is their accountability," he added.
There was also a report of tapping of telephones of political party leaders, which was a blow to civil rights in a democratic country like India and this needs to be condemned strongly, he added.
To a question on the association of politicians with sports, he said their role has now become questionable. The entire sports policy should be revamped, the role of sports ministry would have to be redefined, the CPI leader.
On the arrest of top brass of the Medical Council of India (MCI), Mr Raja said the governemnt should appoint a special officer to look into the affairs of the MCI and none should be allowed to manipulate the its affairs.
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आईपीएल में इतना सारा पैसा आ कहां से रहा हैं? - गुरूदास दासगुप्ता, राष्ट्रीय सचिव, भाकपा

डेटलाइन इंडिया में आज छपी अंशू सिंह की रिपोर्ट :
नई दिल्ली, 24 अप्रैल- बीसीसीआई और आईपीएल दोनों अपनी खाल बचाने में लगे हुए हैं और अब यह तय किया गया है कि बीसीसीआई के अध्यक्ष शशांक मनोहर आईपीएल के कार्यकारी कमिश्नर बनेंगे जबकि ललित मोदी बीसीसीआई के उपाध्यक्ष बनें रहेंगे। शरद पवार की पहल पर यह समझौता हुआ है और ललित मोदी इस बात पर राजी हो गए हैं कि 26 अप्रैल को आईपीएल गवर्निंग काउंसिल की बैठक को वे अदालत में नहीं ले जाएंगे।
इसके बदले मोदी को बीसीसीआई से निलंबित नहीं किया जाएगा। मगर मोदी इस बात पर अड़े हुए हैं कि वे 26 अप्रैल वाली बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे ताकि निष्पक्ष्तापूर्वक विचार हो सके। बीसीसीआई के भूतपूर्व अध्यक्ष केसी मुथैया इस बीच एक टीम के मालिक एम श्रीनिवासन के बोर्ड का सचिव बने रहने के सवाल पर सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंच गए हैं। उन्होंने सवाल किया है कि बोर्ड का कोई भी सदस्य कैसे किसी फ्रेंचाइज का मालिक हो सकता है? उनका कहना है कि इंडिया सीमेंट एक टीम की मालिक हैं और श्री निवासन के उनसे व्यापारिक और निजी रिश्ते हैं।
उधर सरकार भी बीच का रास्ता खोजती नजर आ रही हैं। सरकार की ओर से अब सूत्रों के जरिए ही सही, ऐलान किया गया है कि सरकार सिर्फ आईपीएल और उसके साथ जुड़ी टीमों के पैसे की जांच करेगी और मैच फिक्सिंग फिलहाल जांच के दायरे में नहीं है। आयकर अधिकारियों ने अपना नाम नहीं छापने के अनुरोध के साथ कहा कि फिलहाल उन्हें मैच फिक्सिंग की जांच करने के आदेश नहीं मिले। वाम मोर्चा भी अब सुर बदल रहा है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरुदास दासगुप्ता ने कहा कि मैंने कभी मैच फिक्सिंग की बात नहीं की मगर सरकार को पता लगाना चाहिए कि इतना सारा पैसा आ कहां से रहा हैं? मैं ललित मोदी पर भी सवाल नहीं कर रहा हूं मगर मेरा सवाल यह है कि शाहरूख खान और शिल्पा शेट्ठी जैसे लोग अचानक क्रिकेट में इतने ज्यादा लीन कैसे हो गए? इनकम टेक्स की रिपोर्ट में ललित मोदी के एक दोस्त पर मैच फिक्सिंग का संदेह जाहिर किया गया है लेकिन इसके बारे कोई विवरण नहीं दिए गए है। यह रिपोर्ट भी इतनी जल्दबाजी में तैयार की गई है कि शाहरूख खान की टीम का नाम कोलकाता नाइट राइडर्स की बजाय कोलकाता रॉयल्स रख दिया गया है। जाहिर है कि यह रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारियों की क्रिकेट में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। नतीजा क्या निकलेगा इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है।
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भाकपा का 6 से 9 मई तक धन एवं अन्न संग्रह अभियान

भाकपा का 6 से 9 मई तक धन एवं अन्न संग्रह अभियान
उठो साथियों, निकलो - पार्टी के लिए धन की व्यवस्था आपको ही करनी है!

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य कार्यकारिणी ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों एवं जन संगठनों के कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि वे 6 से 9 मई तक जनता के व्यापकतम तबकों से पार्टी के लिए धन और अन्न एकत्रित करने के लिए सड़कों पर उतरें। पार्टी के राज्य कार्यालय ने इस हेतु भेजे गये सन्देश में इस अभियान को संगठित करने की सांगठनिक प्राथमिकताओं को चिन्हित करते हुए पार्टी सदस्यों से अपील की है कि -
(1) पार्टी की पूरी की पूरी सदस्यता को अभियान में उतरना है।
(2) पार्टी सदस्यों को कम से कम प्रति सदस्य 10 घरों अथवा दुकानों पर जाकर पार्टी चलाने हेतु धन मांगना है यानी अगर जिले में 5 सौ सदस्य हैं तो हमें कम से कम 5 हजार लोगों से सम्पर्क करना है।
(3) किसी भी पार्टी सदस्य को इस अभियान से छूट नहीं दी गयी है।
(4) अभियान को 9 मई के बाद भी चलाया जा सकता है।
साथियों! पार्टी के विस्तार एवं विकास के लिए पार्टी के सदस्यों द्वारा धन संग्रह अभियान चलाना बहुत जरूरी है। होलटाईमर कार्यकर्ताओं को रखने के लिए और उन्हें जीवनयापन लायक धन देने के लिए धन की जरूरत होती है। पार्टी के कार्यालयों को चलाने के लिए धन की जरूरत होती है। पार्टी के संसाधनों की व्यवस्था भी धन के बिना नहीं होती। आन्दोलन चलाने के लिए और आन्दोलन का प्रचार करने के लिए भी धन की जरूरत होती है। पार्टी को धन की जरूरत है, इसे महसूस कीजिए। इस जरूरत को हम सब मिल कर ही पूरा कर सकते हैं।
साथियों! कम्युनिस्ट पार्टियों के पास इस धन की व्यवस्था के लिए जनता के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हम जिनकी बेहतरी के लिए लगातार संघर्ष करते हैं, उन्हीं से तो हम पैसा मांग सकते हैं। जनता से धन मांगने के लिए पार्टी के सभी सदस्यों को जनता के पास जाना ही होगा, तभी हम अधिक से अधिक संख्या में जनता के व्याकतम तबकों के मध्य पहुंच पायेंगे और तभी हमें पार्टी को चलाने के लिए कुछ धन मुहैया हो सकेगा।
साथियों! भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दूसरों राज्यों के साथी हर साल कम से कम एक बार इस अभियान पर संगठित रूप से निकलते हैं और पार्टी के लिए धन इकट्ठा करते हैं। फिर उत्तर प्रदेश में हम क्यों नहीं निकल सकते? उत्तर प्रदेश के साथी भी निकल सकते हैं, इस बार वे निकलेंगे और धन मांगेंगे।
”पार्टी संगठन“ पर लखनऊ में पिछले साल आयोजित कार्यशाला में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सचिव का. सी.के.चन्द्रप्पन आये थे। उन्होंने विस्तार से उत्तर प्रदेश के पार्टी संगठन की खामियों पर चर्चा करते हुए दूसरे राज्यों के काम करने के तौर-तरीकों की चर्चा की थी। उन्होंने विस्तार से बताया था कि केरल के साथी किस प्रकार लक्ष्य निर्धारित कर साल भर में कम से कम एक बार इस अभियान में उतरते हैं और कितना धन एकत्रित कर लेते हैं। उन्होंने स्पष्ट बताया था कि अभियान के बाद केरल की पार्टी - ब्रांचों से लेकर राज्य तक समीक्षा करती हैं कि हम कितने परिवारों तक पहुंच सके। अगले वर्ष केरल की पार्टी का लक्ष्य यह होता है कि पिछले वर्ष हम जितने घरों तक पहुंचे थे इस बार हम उससे कितना ज्यादा पहुंचने का प्रयास करेंगे।
हमारे जिलों के आगे बढ़े हुए नेतृत्वकारी साथी इस कार्यशाला में उपस्थित थे। उन सबके सामने का. चन्द्रप्पन ने हमारा आह्वान किया था कि हम केरल के अनुभवों से सबक लेते हुए इस अभियान को चलायें, अधिक से अधिक जनता के पास पहुंचने का प्रयास करें।
साथियों! ब्रांचों को सक्रिय करिए, पार्टी के सभी सदस्यों को सक्रिय कीजिए और अभियान के लिए निकल चलिये। किसी के अभियान पर न जाने को बहाना मत बनाईये। आप खुद निकलिये, लौट कर देखना कि कौन नहीं निकला, उसे समझाना कि कुछ नहीं बिगड़ा है, अभी भी वह अपने परिचित 10 घरों पर जाकर पार्टी के लिए धन या अन्न मांग सकता है। कितनों को सड़कों पर हम उतारने में सफल रहे, इसकी मीमांशा अभियान के बाद जरूर कीजिए, कमियों को ढूंढिये और अगले साल के लिए नये संकल्प बुनना अभी से शुरू कर दीजिए।
साथियों! पार्टी के राज्य केन्द्र ने इस अभियान को 9 मई को बन्द करने का निर्देश नहीं दिया है। अमूमन यह देखा जाता है कि आन्दोलनात्मक गतिविधियों में सहभागिता से कुछ साथी बहाने तलाश कर लेते हैं कि शादी-विवाह के कारण नहीं जा सकते, बीमारी के कारण नहीं जा सकते, नौकरी के कारण नहीं जा सकते या किन्हीं और व्यस्तताओं के कारण नहीं जा सकते। लम्बे समय में यह कोई बहाना किसी साथी के पास मौजूद नहीं होगा। आज नहीं निकल सकते तो कल निकलिये, कल नहीं निकल सकते तो परसों निकलिये। सभी साथियों को इस कार्यभार को पूरा करने के लिए निकलना होगा। यह केवल ब्रांच अथवा जिले या राज्य के मंत्री की अकेले की जिम्मेदारी नहीं है। यह जिम्मेदारी पार्टी के एक-एक सदस्य की जिम्मेदारी है जिसे उसे पूरा करना चाहिए।
उठिये साथियों! सब पार्टी के लिए धन मांगने निकलें। जिस तरह हमने लगातार अभियान चलाते रहने का रिकार्ड बनाया है, हम इस अभियान को भी सफल बनायें।

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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

भारतीय रिजर्व बैंक में महंगाई से निपटने की इच्छा शक्ति नहीं

मुम्बई में 20 अप्रैल को भारतीय रिजर्व बैंक ने वार्षिक मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए ऐसे कोई कदम नहीं उठाये जिससे यह साबित होता कि भारतीय रिजर्व बैंक में महंगाई से निपटने की इच्छा शक्ति है। वार्षिक मौद्रिक नीति की घोषणा के पहले स्टॉक मार्केट गिर रहा था और समाचार माध्यम एवं पूंजीपति वर्ग की संस्थाएं चीख रहीं थीं कि ऋणों पर ब्याज दरें बढ़ जायेंगी और उससे आर्थिक तबाही आ जायेगी। नीति घोषित होते ही शेयर बाजार कुलांचे भरने लगा। यह इंगित करता है कि वांछित सख्ती नहीं की गयी है।भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक दर एवं वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) को यथावत बनाये रखते हुए नगदी आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में केवल 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जबकि रेपो एवं रिवर्स रेपो दरों में भी केवल 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी है। सीआरआर में बढ़ोतरी से बैंकों के पास ऋण देने हेतु उपलब्ध संसाधनों में केवल 12,500 करोड़ रूपये की कमी आयेगी और बैंकों के पास ऋण देने के लिए रकम इससे कहीं कई गुना अभी भी उपलब्ध रहेगी। रेपो एवं रिवर्स रेपो दरों में बढ़ोतरी का बाजार पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा।इस प्रकार भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाये गये कदमों से मंहगाई पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।इस समय जरूरत थी कि भारतीय रिजर्व बैंक सीआरआर और एसएलआर में तीव्र वृद्धि कर बैंकों के पास ऋण हेतु उपलब्ध संसाधनों को बैंकिंग सिस्टम से खींच कर बैंकों के पास तरलता को पर्याप्त कम करता और बैंक दर एवं रेपो-रिवर्स रेपो दरों को भी तेजी से ऊपर लाकर बैंकों का जमाराशियों पर देय ब्याज दर को बढ़ाने का संकेत देता और परिचालन में मुद्रा (मनी इन सर्कुलेशन) को कम करता। परन्तु ऐसा नहीं किया गया है।इस समय महंगाई में विशेष योगदान खाद्य पदार्थों में आई महंगाई का है। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने बयान में यह स्वीकार किया है कि खाद्य पदार्थों की महंगाई दर मार्च 2010 तक 53.3 प्रतिशत थी। बात दीगर है कि यह सरकारी आंकड़ा है और कीमतों में इससे कहीं ज्यादा बढ़ोतरी आम आदमी को भुगतनी पड़ रही है। जिन्सों की कीमतें दो से चार गुना तक बढ़ गयी हैं। जिन्सों का उत्पादन किसान करते हैं परन्तु किसानों को जिन्सों का अभी भी वही मूल्य मिल रहा है जो उन्हें एक-दो साल पहले मिल रहा था। इसके स्पष्ट दो कारण है। पहला खाद्य पदार्थों की सट्टाबाजारी एवं जमाखोरी। इन पर अंकुश लगाने की जरूरत थी। इसके लिए जरूरी था कि खाद्य पदार्थो में सट्टेबाजारी के लिए उपलब्ध धन श्रोतों (जोकि अंततः राष्ट्रीयकृत बैंकों से ऋण एवं सरमायेदारों द्वारा अंधाधुंध मुनाफाखोरी के जरिए उपलब्ध हो रहा है) पर लगाम लगाई जाती। साथ ही खाद्य पदार्थों के लिए दिये जाने वाले गैर-कृषि ऋणों पर लगाम लगाने की भी सख्त जरूरत थी यानी सेलेक्टिव क्रेडिट कंट्रोल उपायों को अमल में लाना चाहिये था। परन्तु इस प्रकार के किसी सख्त कदम की घोषणा नहीं की गयी है।इधर कई सालों से बैंकिंग बिलकुल बदल गयी है। एटीएम और क्रेडिट कार्ड एक तरह से परिचालन में मुद्रा की मात्रा को बढ़ा रहे हैं। आरटीजीएस जैसी मैकेनिज्म से पैसा देश के एक कोने से दूसरे कोने में इतनी तेजी से यात्रा कर रहा है कि बाजार में मुद्रा की उतनी जरूरत ही नहीं है जितनी दस सालं पहले तक होती थी। पहले एक व्यवसायी को दूसरे शहर के व्यवसायी को पैसा भेजने में एक सप्ताह लग जाता था जबकि आज इस पैसे को दिन भर में 5 बार फेंटा जा सकता है यानी यह पैसा एक ही दिन में 6 लोगों के खातों में जमा होकर निकल जाता है।देश के अर्थतंत्र में अंधाधुंध काला धन उपलब्ध है, जो देश में समानान्तर अर्थव्यवस्था चला रहा है। यह काला धन भी अंततः सट्टेबाजी और मुनाफाखोरी में लग रहा है। इस प्रकार किसी अधिकारिक आंकड़े के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक कदम नहीं उठा सकता बल्कि उसे परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए सख्त कदम उठाने चाहिये थे।वार्षिक मौद्रिक नीति घोषित करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने स्वीकार किया कि 2009-10 में केन्द्र सरकार के रू. 2,98,411 करोड़ रूपये के वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को 2,51,000 करोड़ रूपये बाजार से उठाने के लिए नई प्रतिभूतियां जारी करनी पड़ी और वर्तमान वित्तीय वर्ष 2010-11 के वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए बाजार में 3,42,300 करोड़ की प्रतिभूतियों को जारी करना होगा। सरकार काले धन को जब्त कर और सरमायेदारों के बढ़ते मुनाफों पर कर लगा कर इस वित्तीय घाटे को पूरा करने के बजाय बाजार से उधारी पर निर्भर है और इसका भी असर मुद्रास्फीति पर पड़ना लाजिमी है।भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर की यह स्वीकारोक्ति कि ”महंगाई को रोकने के लिए जरूरत पड़ने पर और कदम उठाये जायेंगे“ इस तथ्य की पुष्टि के अलावा कुछ नहीं है कि वांछित सख्ती नहीं दिखाई गयी है।
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आगरा इप्टा के नाटक 'किस्सा एक अजनबी का' का आमंत्रण


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बुधवार, 21 अप्रैल 2010

क्यूबा पर अमेरिकी आतंकवाद के खिलाफ ऑन लाइन हस्ताछर अभियान

Dear comrades and friends: A great media campaign has been unleashed against Cuba . It is not new. For the last 50 years we have had to resist and defeat such campaigns. This time President Obama is using not only CIA and other traditional instruments, but also subservient allies of the right wing in Europe, which have condemned _Cuba in the European Parliament because a common prisoner, disguising as a so called political prisoner carried out a hunger strike, and despite all the help from the Cuban medical institutions he died, thus providing the alibi for this campaign.

While providing some articles for your own understanding of the issue, your are kindly requested to spread the news and to sign in favor of Cuba in the website http://www.porcuba.org/index.php?lang=2



Cuba shall overcome!





Miguel Angel Ramírez

Ambassador

Embassy of the Republic of Cuba in India
tel: 2924 2467/68, 2924 2370
fax: :2924 2369
email: embcuind@del6.vsnl.net.in;
web: http://embacuba.cubaminrex.cu/indiaing


The Cuban Five will return!!!
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी. राजा के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा

"deshbandhu" mein aaj chhapa hai
नयी दिल्ली। केन्द्र ने इलेक्ट्रानिक एवं जैव. चिकित्सकीय कचरे के कारोबार के नियमन और ऐसे कचरे के विकिरण के शिकार लोगों को मुआवजा देने के लिए कानून बनाने की जररत स्वीकार की है और कहा है कि वह जल्द ही आवश्यक कदम उठायेगा।
परमाणु ऊर्जा राज्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण ने राजधानी के मायापुरी कचरा बाजार में कोबाल्ट..60 के विकिरण से 7 लोगों के गंभीर रप से ग्रस्त होने की हाल की एक घटना से उत्पन्न स्थिति पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा एवं कुछ अन्य सदस्यों के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा का उत्तर देते हुए राज्यसभा में उक्त आश्वासन दिया। श्री चह्वाण ने बंदरगाहों..हवाईअड्डों पर रोडियोएक्टिव पदार्थ जांच उपकरण लगाने में देरी की भी बात स्वीकार की. लेकिन कहा कि यह प्रक्रिया तेज की जा रही है और नवाशिव बंदरगाह पर 12 .फुल कंटेनर स्कैनर. जल्द ही तैनाती के लिए तैयार है। वैसे उन्होंने साफ किया कि सात अप्रैल की जिस घटना में सात लोग रेडियो एक्टिव पदार्थ के विकिरण से गंभीर रप से अस्वस्थ हुए हैं. उसका पूरे देश में परमाणु ऊर्जा विभाग के प्रतिष्ठानों या गतिविधियों से कोई ताल्लुक नहीं है और सदस्यों को आश्वस्त किया कि देश सार्वजनिक जीवन में रेडियोधर्मी आपतकाल की किसी भी स्थिति से निबटने की पूरी तरह तैयार है।
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मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

राज्य सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

Tomarrow's Pioneer is reporting :
@While asserting that adequate safeguards would be put in place to prevent a recurrence, the government Tuesday found itself on the defensive in the Rajya Sabha as members across the spectrum questioned how people had been exposed to radiation in Delhi.

The government also admitted to the need for tightening registration procedures for scrap dealers and for a law to compensate victims in an incident of the kind that occurred in the capital's Mayapuri scrap market that has left seven people battling for their lives.

Noting that the Cobalt-60 found in the scrap market "most likely came as scrap from abroad, from which country we do not know", Minister of State in the Prime Minister's Office Prithviraj Chavan said in reply to a calling attention motion raised by D. Raja of the Communist Party of India (CPI): "I wish to assure this house that elaborate equipment in the form of full container scanners is being put in place at all major ports (to ensure that radioactive scrap does not come into the country)."

"All of it has not been deployed. It is being deployed. Why has there been a delay? Two scanners have been installed at Nhava Sheva. Twelve more are in the process of being installed," he said, adding: "The registration of scrap dealers also needs to be strengthened."

Prime Minister Manmohan Singh, who was present in the house, sat silently through the hour-long discussion.

Addressing the concerns of members on the compensation to be paid to victims of the Mayapuri tragedy, Chavan said: "At present there is no law for providing compensation for such accidents. We need to enact a law for this."

Earlier, Chavan said in a statement: "I would like to assure this august house that all possible care is being taken to ensure that the country is prepared to handle any radiological emergency arising in the public domain."

In this context, he noted that the Department of Atomic Energy has organised courses to train front line officers (FLOs) "on the issues of detection, intradiction and response related to radiological incidents.

"The minister's statement is not convincing," Raja said, adding: "The radiation mishap has exposed the unpreparedness and ill preparedness of the nation. There has been a regulatory failure and lack of professional competence."
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सोमवार, 19 अप्रैल 2010

आई पी एल पर लोकसभा में भाकपा

बी बी सी न्यूज़ के अनुसार आज लोकसभा में बहस में भाग लेते हुए :
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के गुरुदास दासगुप्ता ने इस मामले को उठाया और उन्होंने आईपीएल पर प्रतिबंध लगाने की माँग की.
इसके जरिए कालेधन को सफेद किया जा रहा है और इसमें मॉरीशस और दुबई से पैसा लगाया जा रहा है.
गुरुदास दासगुप्ता का कहना था कि आईपीएल से क्रिकेट का नाम बदनाम हो रहा है और इसमें खिलाड़ी सब्जियों की तरह ख़रीदे जाते हैं.
उन्होंने आरोप लगाया कि इसमें खुलेआम सट्टेबाजी चल रही है. उन्होंने आईपीएल की जाँच संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से कराने की माँग की.
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Rememebering Bhagat Singh and Dr. Ambedkar in Begu sarai-Bihar

If one travels around India, one would find many such libraries, which were established during freedom struggle to spread consciousness of national movement against British colonialism Not only libraries, many national schools and colleges were established to provide alternative education with stress on national heritage. Dwarka Dass Library and National college Lahore were some such institutions established during 1920's. Kashi Vidyapeeth Benaras and another in Ahmedabad were also such. In my own town Rampura Phul in Bathinda district of Punjab, Public Library was established by people active in national movement.If any one institution can be given credit my my mental liberation from traditional yokes of thought, I will name Public Library Rampura Phul, though later in life, I have got the chance to know some of the best libraries of the world like Nehru Memorial Museum and Library to Indian Institute of Advanced Study Library Shimla. Marwari Library in Delhi and many more are shining examples of library movement in India.This time I visited Begusarai district of Bihar to deliver lectures on Bhagat Singh and Dr. Ambedkar on 13th and 14th April,These were hot days, but pleasant part of the whole trip was to visit two libraries established by democratic movement. One Viplav Pustkalaya, Godhargaon near Begusarai and another comrade Chandershekhar smark pustkalaya Beehat village near Brauni town, close to Begusarai.While Viplav Pustkalaya(Rebellious Library) in Godhargaon was established in 1986 by Communist Party of India(CPI), so was Com. Chandershekhar memorial library in Beehat recently. On my way back to Patna, saw one such library in Fatuha town established in 1944.Libraries play a major role in spreading consciousness among people in small towns and villages for changing the society.Knowledge is the most effective tool to prepare people for change and libraries provide space for that.For leftist movement in any Asian country, perhaps elsewhere too, establishing libraries and providing good books and infra structure there, is the task of democratic movement.Ghadar party activists established Desh Bhagat yadgar Hall and library in Jalandhar in 1960's. Shiv Verma, close comrade of Bhagat Singh and life convict in that case established Shaheed Smark library in Lucknow in a college and school run by Durga Bhabhi. Thakur Ram Singh another revolutionary comrade of that movement, who passed away at the age of 104 years at Agra recently, established Bhagat Singh memorial library in Agra. Even some good intentioned Police officers established Paash Library in police lines Karnal in Haryana in memory of slain policemen by Khalistanis.At Beehat village in Bhagat Singh memorial function I spoke about Jallianawala Bagh's Khooni Baisakhi(Bloody Baisakhi of 1919), along with talking about Bhagat singh's philosophy of national liberation. I announced there that I am committing my royalty on 10 plus books on revolutionary freedom movement in Hindi, Punjabi and English to these 6-7 libraries established in memory of revolutionaries. It was a simple gathering of five hundred plus ordinary working people of the area, including some women, who listened to me for more than one hour in pin drop silence.They later expressed the desire that they wanted to listen me more. It was my 41st lecture in memory of Bhagat Singh, starting from 2006, 75th martyrdom anniversary of Bhagat Singh. It seems that kind of narrative style I had developed during this period, goes well with the audience in villages, towns and big cities as well.Next day in the same place, I spoke on Dr. Ambedkar memorial function organized by same Student Club of Beehat ,under influence of CPI.Here I spoke on the need of inter caste and inter religious marriages at wide level as task of democratic movement to weed out the poison of casteism and communalism from society, which was the advise of Dr. Ambedkar as well Chandereshwari Singh, President of Bihar AITUC was the spirit behind these functions.Though with CPI, he seems to be quite radical. Photographs of Che Guvera were on display along with Indian revolutionaries photos and he spoke also about Che Guvera feelingly. Shatrughan Prasad, two times CPI member Parliament from the area was also present and in fact, he took me to Viplav Library Godargaon later. He had earlier invited me to Patna in year 2007 or 08 in a big function attended by Com A.B.Bardhan, Gen. Secretary of CPI.In Viplav Library Godhargaon, statue of Bhagat Singh welcomes you at the entry. At the square towards library, a huge full size statue of Chandershekhar Azad has come up recently.In adjoining building, statue of Prem Chand and poet Meera Bai is there.Collection of books and pictures of writers is fantastic in the library. Many eminent personalities have visited this library if far flung area of Bihar. Bihar has better reading habits than all other states of North India and among Hindi or Urdu speaking states.I shall attach some photographs of libraries later to this note or in a separate album.
Posted by Professor Chaman Lal at 5:58 AM
साभार : http://bhagatsinghstudy.blogspot.com/2010/04/rememebering-bhagat-singh-and-dr_18.html
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CPI activists stage protest

In agitation mode: CPI leaders staging a dharna at the foot of Indrakeeladri demanding widening of National Highway-5 to remove bottleneck in Vijayawada on Sunday
The Hindu
VIJAYAWADA: Demanding the construction of a flyover on the national highway at the foot of Indrakeeladri hillock, activists of the Communist Party of India (CPI) on Sunday staged a dharna at Asoka Pillar Centre। Holding placards with slogans demanding the construction of flyover, the activists sat on the road for about an hour.
Addressing the activists, party's city unit president K. Subba Raju said that the infrastructure in the city had not been increased on a par with the population, due to which people were facing a lot of problems. “While the other cities have so many bypass roads, inner and outer ring roads, there are no such facilities in Vijayawada,” he said.
Referring to the traffic at Kanakadurga temple, Mr. Subba Raju observed that it was one of the biggest temples in the State and was witnessing huge pilgrim rush every day. “The traffic on the national highway too is very high and hundreds of heavy vehicles take this road daily,” he said. Stating that traffic jams were becoming the order of the day on the highway abutting Indrakeeladri hillock, he said that construction of a flyover was the only solution to address the ever-increasing traffic problem.
State leader of the All India Trade Union Congress Palla Surya Rao, corporators from the CPI P. Durga Bhavani, G. Koteswara Rao, Ramana Babu, Das Prakash and others were present.
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रविवार, 18 अप्रैल 2010

Left Front announces nominees for Kolkata civic polls

Kolkata, April 17 - Mayor Bikash Bhattacharya opted out of the fray as West Bengal's ruling Left Front Saturday released its list of candidates for the May 30 Kolkata civic polls, at which it faces one of its toughest tests after a series of electoral reverses.In an apparent bid to repair its battered image in the 141 Kolkata Municipal Corporation wards, the front has nominated 92 fresh candidates and 65 women, while announcing its candidates for 140 wards. The nominee for ward number 28 will be announced later. 'More than 47 percent of our candidates are women,' announced Left Front chairman Biman Bose. The front, which has been running the board for the last five years, received a setback of sorts with Bhattacharya declining to contest citing personal reasons. Leaders of Left Front major Communist Party of India-Marxist -, who had named him as mayor after the last election, made frantic efforts to persuade the lawyer-turned politician to change his mind realising that the opposition would make a big issue out of his absence. But Bhattacharya stood firm. However, Bose put up a brave face on his absence. 'Before the last elections, he was not even a councillor. After he became a councillor he was elected as mayor for a single term. And he has performed. We have decided not to renominate him as we want to utilise his expertise in legal matters'. Bose declined to name any mayoral candidate, saying the front partners would take a decision after the polls if the combine emerged victorious. That, however, seems an uphill task considering that the opposition candidates had led in a brute majority of the wards in last year's Lok Sabha polls. Apart from the mayor, four mayor-in-council members have also not been renominated. CPI-M candidates would try their luck in 96 wards, followed by Communist Party of India in 14, the Forward Bloc in 11 and the Revolutionary Socialist Party in 10. The minor front partners, including the Rashtirya Janata Dal and the Socialist Party - would fight in the remaining seats.
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इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।
- दुष्यंत कुमार
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राह हारी मैं न हारा

थक गए पथ धूल के
उड़ते हुए रज-कण घनेरे।
पर न अब तक मिट सके हैं,
वायु में पदचिन्ह मेरे।
जो प्रकृति के जन्म ही से ले चुके गति का सहारा।
राह हारी मैं न हारा

स्वप्न-मग्ना रात्रि सोई,
दिवस संध्या के किनारे।
थक गए वन-विहग, मृगतरु -
थके सूरज-चाँद-तारे।
पर न अब तक थका मेरे लक्ष्य का ध्रुव ध्येय तारा।
राह हारी मैं न हारा।
- शील
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ओ दिल्ली वाली ताई! खूब बढ़ाओ महंगाई

ओ दिल्ली वाली ताई!
खूब बढ़ाओ महंगाई
ओ दिल्ली वाली ताई!
तेरे ऊपर जो बैठे हैं
हैं तेरे ही तो भाई््?
दिल्ली वालों को दिखलायेगी
तू कैसे कैसे खेल
क्या हुआ जो इस खातिर
निकले जनता का तेल!
जनता का क्या है
जनता तो है हरजाई!
लूट की आंधी खूब चली है
जो लूट सके सो लूट
खेल तमाशा कोई दिखा कर
कोई अंबानी को देकर छूट।
तुम लूटो दिल्ली को
देश को मनमोहन भाई।
जनता अभी कराहेगी
सौ सौ आंसू अभी बहायेगी
खेतों में, खलिहानों में
हाहाकार मौत अभी मचायेगी!
उम्मीद नहीं दूर तलक
होने को कोई सुनवाई।
पर करवट लेना वक्त कभी जो
छिड़ेगा सड़कों पर संग्राम
भूखी नंगी जनता जब उमड़ेगी
गूंजेगा धनपतियों का त्राहिमाम्
तू भी जब चीखेगी -
”मेरा क्या होगा सांई?“
खूब बढ़ाओ महंगाई
ओ दिल्ली वाली ताई
तेरे ऊपर जो बैठे हैं
हैं तेरे ही तो भाई?
- सुमन्त
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Shashi Tharoor's behaviour unbecoming of a minister – CPI

According to a news published in Today's Times of India on page 7, CPI on Saturday demanded dismissal of Shashi Tharoor. "Tharoor's behaviour is unbecoming of a minister and out of tune with Indian politics". CPI leader Gurudas Dasgupta said.
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शनिवार, 17 अप्रैल 2010

CPI DEMANDS : KERALA GOVERNMENT MUST INITIATE MOVES AGAINST COCA-COLA

CPI DEMANDS : KERALA GOVERNMENT MUST INITIATE MOVES AGAINST COCA-COLA
The Report of the High Power Committee that was set up by the Kerala Government in April 2009 to assess the extent of damages caused by the Coca-Cola plant at Plachimada has come out with its report.

After a thorough scientific assessment of the damages caused to ground water, human health, agricultural live-stock, and labour and livelihood, the Committee has put the estimate to a total of Rs. 216.26 crores.

As usual the multinational Coca-Cola has ignored the Committee. But basing on the principle laid down by the Supreme Court that the 'polluter pays the price', the Kerala Government must follow up the report of its own committee by initiating legal and administrative steps to assess the individual claims and the actual compensation to be decreed. Coca-Cola must be made to pay.

The Communist Party of India recalls the massive agitation that was launched in the entire district of Palakkad against the Coca-Cola plant which compelled the Government to set up the High Power Committee. A similar movement must now be launched to make the Coca-Cola to pay for the damage caused.
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आशावाद

तूफ़ान है
और जड़ों तक काँप रहा है पेड़।
लेकिन उसकी डाल पर बैठे
कवि के लिए
भविष्य उजला है।
क्योंकि वह पेड़ नहीं
उसका काँपना नहीं
तूफ़ान नहीं
बल्कि पत्तों का हरापन
देख रहा है।
- वेणु गोपाल
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मजदूर का जन्म

एक हथौड़े वाला घर में और हुआ !
हाथी सा बलवान,
जहाजी हाथों वाला और हुआ !
सूरज-सा इंसान,
तरेरी आँखों वाला और हुआ !!
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ!
माता रही विचार:
अँधेरा हरने वाला और हुआ !
दादा रहे निहार:
सबेरा करने वाला और हुआ !!
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ !
जनता रही पुकार:
सलामत लाने वाला और हुआ !
सुन ले री सरकार!
कयामत ढाने वाला और हुआ !!
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ !

- केदार नाथ अग्रवाल

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जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा
जो जीवन की आग जला कर आग बना है
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

- केदार नाथ अग्रवाल

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महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में मुस्लिम महिलाओं का लखनऊ में धरना

पुरूषवादी ताकतों द्वारा लोकसभा एवं विधानसभाओं में महिलाओं के लिए बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण विधेयक के खिलाफ जारी मुहिम के खिलाफ महिलाओं के मध्य प्रतिक्रिया अब खुले रूप से सामने आने लगी है। लखनऊ में 15 अप्रैल 2010 को मुस्लिम महिलाओं ने लखनऊ के शहीद स्मारक पर महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में धरना आयोजित किया। भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन का एक बैनर लेकर सैकड़ों महिलाओं ने इस विधेयक को महिलाओं की समानता एवं न्याय के लिए एक शताब्दी से जारी संघर्ष की ऐतिहासिक विजय बताते हुए इसे हर कीमत पर प्राप्त करने के लिए अपनी आवाज को बुलन्द किया। वक्ताओं ने कहा कि यह विधेयक पास होने के बाद ऐसी लोकतंात्रिक प्रक्रिया शुरू होगी जिससे अन्य महिलाओं के साथ साथ मुस्लिम महिलाओं को भी सत्ता में अपनी न्यायपूर्ण हिस्सेदारी मिलेगी। वक्ताओं ने इस विधेयक का विरोध करने वाले राजनेताओं एंव धार्मिक नेताओं को आड़े हाथ लेते हुए कहा यह अन्यायपूर्ण एवं संविधान में निहित भावना का उल्लंघन है। प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करने वाली प्रमुख वक्ता थीं - नाइश हसन, नाज रजा, शहनाज, मुन्नी शरीफ, जहां, बेबी, राबिया, सलमा, सायारा, रहनुमा, हमरून, किश्वर जहां, रूखसाना, नायाब जहां आदि।
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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

हार्वर्ड जिन दिवंगत - उनकी याद में गूगल पर left-n-progressive-group@googlegroups.कॉम की शुरुआत

नाम चामस्की ने एक बार उनके बारे में कहा था - ”उन्होंने एक सम्पूर्ण देश के दृष्टिकोण में बदलाव ला दिया। लाखों लोग जिस नजरिए से इतिहास को देखा करते थे, उसमें रातों-रात तब्दीली आ गई।“ नोम चामस्की की यह उक्ति जिनके बारे में थी, वह हार्वर्ड जिन अब नहीं रहे। 87 साल की उम्र में उनका देहान्त हो गया।जो इतिहास प्रचलन में हुआ करता है, वह शोषकों का इतिहास है। शोषकों के इतिहास को जांचा परखा जाता है, उस पर मन्तव्य दिए जाते हैं। इस काम को करने के लिए ‘निरपेक्षता’ की आड़ ली जाती है, ताकि इतिहास में मेहनतकशों के योगदान को धो ‘पोछ’ डाला जा सके। लेकिन सच्चा इतिहास तो मेहनतकश लिखते हैं। उनके संघर्ष को, उनकी परम्परा को कहां जगह मिलती है इतिहास के पन्नों पर? हम एक एकलव्य की बात करते हैं। हम अगर अपनी चारों ओर नजर दौड़ाएं तो एकलव्यों की अनन्त कतार दिखाई पड़ेगी।हार्वर्ड जिन ने ”ए पीपुल्स हिस्ट्री आफ यूनाइटेड स्टेट्स“ नामक महाग्रंथ की रचना की। जिन बड़े नामों की आभा से अमरीका का इतिहास रौशन था, उन नामों के पीछे केवल मानव हित नहीं वर्ग-स्वार्थ भी थे - इस सच्चाई को उन्होंने उजागर किया, किसी को उन्होंने नहीं बख्शा - चाहे वह क्रिस्टोफर कोलम्बस हों या अब्राहम लिंकन। टामस अल्वा एडिसन हों या थियोडोर रूजवेल्ट। गरीब किसान, मजदूर, दास प्रथा के विरूद्ध जिन्होंने असल लड़ाई लड़ी थी, युद्ध-विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता - हार्वर्ड जिन की लेखनी ने इन्हें इतिहास के रंगमंच पर उचित सम्मान के साथ स्थापित किया।17 साल की उम्र में हार्वर्ड जिन ने पहली बार अमरीकी कम्युनिस्ट पार्टी की रैली में हिस्सा लिया। उनका मानना था कि पूंजीवाद के बारे में मार्क्स का विश्लेषण आज भी प्रासंगिक है। खुद को वह ”मार्क्सवादी“ कहते थे, यद्यपि यह शंका भी उन्हें थी कि मार्क्स शायद उन्हें ”मार्क्सवादी“ न मानते। उन्होंने कभी भी अपनी राजनीति को छुपाने की कोशिश नहीं की। पेशे से अध्यापक हार्वर्ड जिन 1988 में सेवानिवृत हुए यद्यपि उनकी नौकरी बची हुई थी। अन्तिम दिन कक्षा समाप्त होने के 30 मिनट पहले ही उन्होंने छुट्टी घोषित कर दिया - चूंकि उन्हें हड़ताली मजदूरों की ‘पिकेट’ में शामिल होना था। छात्रों से भी उन्होंने आग्रह किया कि उनके साथ चलकर हड़ताली मजदूरों से अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करें।वे अंतिम सांस तक अपनी आस्था पर अड़िग रहे।उनकी स्मृति में हम गुगल पर इस ग्रुप को आज शुरू कर रहे हैं और हमारा प्रयास होगा कि हम अपने उद्देश्य में सफल हों -
सर्वहारा क्रान्ति - जिन्दाबाद!साम्राज्यवाद का नाश हो!
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‘कामरेड’ सिर्फ एक शब्द नहीं!

‘कामरेड’!
सिर्फ एक शब्द नहीं,
बिजली की लाखों रोशनियों को एक साथ जला देने वाला एक स्विच है
जिसे दबाते ही
रंग बिरंगी रोशनियों की एक विश्व-व्यापी कतार जगमगा उठती है!
एक स्विच, जो वाल्ट व्हिटमॅन को मायकोवस्की से
और पाब्लो नेरूदा को नाज़िम हिकमत से मिला देता है,
मॅक्सिम गोर्की, हावर्ड फ़ास्ट और यशपाल के बीच
एक ही प्रकाश-रेखा खींच देता है!

‘कामरेड’!
सिर्फ एक स्विच नहीं, एक चुम्बन है!
एक चुम्बन, जो दो इन्सानों के बीच की सारी दूरियों को
एक ही क्षण में पाट देता है
और वे इसके इच्चारण के साथ ही
एक दूसरे से यों घुलमिल जाते हैं
जैसे युगों के परिचित दो घनिष्ठ मित्र हों!
एक चुम्बन, जो कांगों की नीग्रो मज़दूरिन
और हिन्दुस्तान के अछूत मेहतर को
एक क्षण में लेनिन के साथ खड़ा कर देता है!
एक अदना से अदना इन्सान को
इतिहास बनाने के महान उत्तदायित्व से गौरवान्ति कर जाता है!
‘कामरेड’!
सिर्फ एक चुम्बन नहीं, एक मंच है
जो बोलने वाले और सुनने वाले दोनों को पवित्र कर देता है
एक मंत्र, जिसे छूते ही अलग-अलग देशों, नस्लों, रंगों और वर्गों के लोग
एक दूसरे के सहज सहोदर बन जाते हैं!
एक रहस्यमय मंत्र
जो इन्सान की आज़ादी, बराबरी और भाईचारे के लिए
कुरबान होने वाले लाखों शहीदों की समाधियों के दरवाजे
सबके लिए खोल देता है
और साधारण से साधारण व्यक्ति उनकी महानता से हाथ मिला सकता है!
‘कामरेड’!
दिलों को दिलों से मिलाने वाली एक कड़ी है,
शरीरों को शरीरों से जोड़ने वाली एक श्रंृखला है,
विषमता और भेदभाव के तपते हुए रेगिस्तान का एक मरूद्वीप है
जहां आकर जुल्म और अन्याय की आग में जलते हुए राहगीर
राहत की सांस लेते हैं,
एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं।
(कवि के शीघ्र प्रकाश्य संकलन ‘प्रतिनिधि कविताएं’ में से)
- डा. रणजीत
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भूली बिसरी यादें: लूला से हाल की मुलाकात

30 वर्ष पहले, जुलाई 1980 में, हम मानागुआ (निकारागुआ - अनुवादक) में मिले थे। मौका था सान्दिनिस्ता क्रांति की पहली वर्षगांठ का स्मरणोत्सव। यह मेरे लिबरेशन-थियोलॉजी (मुक्ति धर्मशास्त्र) के अनुनायियों के सम्बन्धों की बदौलत सम्भव हो सका। यह संस्था चिली में शुरू हुई और मैं 1971 में चिली के राष्ट्रपति अलेन्दे (उच्चारण ‘आएंदे’) से मिलने गया।मैंने फ्रिएर वेट्टो से लूला के बारे में काफी सुन रखा था। वह मजदूर नेता थे जिससे वामपंथी ईसाइयों को पहले से ही काफी उम्मीद थीं। वह ब्राजील देश निवासी, धातु उद्योग के एक विनम्र मजदूर, एक दिमागदार और सम्मानित ट्रेड यूनियन नेता थे। ब्राजील में 1960 के दशक तक यांकी साम्राज्यवाद (अमरीकी साम्राज्यवाद - अनुवादक) का सैनिक तानाशाही शासन था जिसने देश को बुरी तरह तबाह कर दिया था। ब्राजील के सम्बंध क्यूबा से तब तक बहुत अच्छे थे जब तक अर्धगोलार्ध में प्रभुत्व रखने वाली शक्तियों ने उन्हें पूरी तरह समाप्त नहीं कर दिया। कई दशक बीतने के बाद धीरे-धीरे हालात सुधर कर यहां तक पहुंचे हैं।हर देश का अपना इतिहास है, हमारे देश ने 1959 की आश्चर्यकारक घटना के बाद काफी मुसीबतें झेलीं - इतिहास के सबसे शक्तिशाली देश के आक्रमण झेले।अतः कैनकुन में हुई हमारी हाल की बैठक में लातिन अमरीकी और कैरिबियन क्षेत्र के देशों का एक समुदाय बनाने के प्रस्ताव असाधारण एवं गौरवशाली समझौता है। यह समझौता उस समय हो रहा है जब विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में है, वातावरण में असमानता के कारण मानव जाति संकट में है तथा हैती की राजधानी पोर्ट ओ-प्रिन्स भूकम्प द्वारा तबाह हो चुका है। हैती महाद्वीप का सबसे गरीब देश है जिसने सबसे पहले गुलामी को समाप्त किया।हैती की समस्याएंमैं यह ‘यादें’ लिख ही रहा था और अभी कुल 6 हफ्ते पहले हैती में 2,00,000 लोगों की मौत की खबरें आईं, उसी बीच चिली में एक और भयानक भूकम्प की खबरें आईं। आर्थिक तौर पर भी यह हैती से अधिक विकसित है; अगर पक्की इमारतें नहीं होती तो शायद चिली के लाखों लोग मर जाते। इस बावत 20 लाख लोगों को नुकसान तथा 15 से 30 बिलियन डालर की हानि होने की रिपोर्ट है। इस विपदा में विश्व के लोगों का जिसमें हम भी शामिल हैं तथा एकजुटता, सहानुभूति चिली की जनता के साथ है। हालांकि जहां तक आर्थिक सहायता और किसी प्रकार की सहायता के मामले में क्यूबा कुछ अधिक करने की हालत में नहीं है। तथापि क्यूबा सरकार अपनी एकजुटता प्रकट करने वालों में पहली थी। हमने अपनी भावनाओं का इजहार उस समय कर दिया था जिस समय संचार व्यवस्था ठप्प पड़ी थी।............ हैती संसार के करोड़ों गरीब लोगों, जिसमें हमारे महाद्वीप के लोग भी अच्छी संख्या में हैं, का पर्याय बन चुका है।अभी जो भूकम्प आया था, उसकी तीव्रता रिचटर स्केल पर 8।8 थी। इसकी तीव्रता उस भूकम्प से अधिक थी जिसने पोर्ट-ओ-प्रिन्स को तहस-नहस कर दिया था। मुझे कानकुन में लिए गए फैसले की असलियत का पता चला और इसे आगे बढ़ाने के प्रयासों में मदद की जरूरत। साम्राज्य और उसके सहयोगी चाहे वे हमारे देशों के अन्दर हो या बाहर, लोगों की इस एकता और स्वतंत्रता के प्रयासों का विरोध करेंगे।लूला से मुलाकातमैं यह बात रिकार्ड में लाना चाहता हूं कि लूला की हाल की यह मुलाकात मेरे लिए महत्वपूर्ण यादगार मुलाकात थी, एक दोस्त के रूप में तथा एक क्रांतिकारी के रूप में। उन्होंने कहा था कि उनके राष्ट्रपति पद का कार्यकाल समाप्त होने वाला था अतः अपने मित्र फिडेल से मिलना चाहते थे। इस वृतान्त से उन्होंने मुझे सम्मान दिया। मैं मानता हूं कि मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। मेरे और उनके बीच में बिरादराना संवाद होते थे, कभी क्यूबा में कभी विदेश में। एक बार मुझे उनके मकान पर जोकि साओ-पौलो में एक साधारण उपनगर में था, मिलने का मौका मिला। यहां वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहते थे। मुझे उस पूरे परिवार के साथ घुलने मिलने का मौका मिला। उनके पड़ोसी उनका बहुत सम्मान करते थे। तब किसको मालूम था कि वे एक दिन उस महान राष्ट्र के राष्ट्रपति होंगे, लेकिन उन्हें बहुत चिन्ता नहीं थी, उनके विरोधियों ने उन्हें दो बार पराजित करवा दिया था। राष्ट्रपति बनने से पहले हुई मुलाकातों के बारे में विस्तार से नहीं कहंूगा। हां 1980 के दशक के मध्य में हम हवाना में लातिन अमरीका के विदेशी ऋण के पीछे माथापच्ची कर रहे थे जो उस समय तक 300 बिलियन डालर तक पहुंच गया था और जिसकी अदायगी एक से अधिक बार कर दी गयी थी। वह जन्मजात जुझारू है।जैसा मैंने कहा कि उनके विरोधियों ने भारी मात्रा में पैसे और मीडिया के समर्थन से उन्हें चुनाव हरवा दिये। उनके करीबी सहायक तथा दोस्त जानते थे कि समय आ गया है जबकि वे वर्कर्स पार्टी और वामशक्तियों के राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनें।जाहिर है कि उनके विरोधियों ने उनकी ताकत का गलत मूल्यांकन किया। उन्होंने सोचा कि वह संसद में अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर पाएंगे। यूएसएसआर समाप्त हो गया था, वे ब्राजील के मुखिया बन कर क्या कर सकेंगे? ब्राजील - वह राष्ट्र जिसके पास अपार सम्पदा है लेकिन विकास थोड़ा, जहां अमीरों और असरदार लोगों का ही बोलबाला है?लेकिन नव-उदारवाद संकट के दौर में था, वेनेजुएला में बोलीवारियन क्रान्ति सफल हो चुकी थी। मेनेम का पतन हो चुका था। पिनोचेर राजनीतिक मंच से अदृश्य हो चुका था। क्यूबा साम्राज्यवाद को टक्कर दे रहा था। लूला उस समय चुनाव जीते जिस समय अमरीका में बेईमानी से बुश जीता, जिसने अपने प्रतिद्वंद्वी एल. गोरे की जीत को चुरा लिया था।यह चुनौती भरे समय की शुरूआत थी। हथियारों की होड़ तथा मिलिट्री औद्योगिक काम्पलेक्स (सैन्य औद्योगिक एकता) की भूमिका और समृद्ध क्षेत्रों से टैक्स घटाना नए अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा उठाये गये पहले कदम थे।आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को उसने युद्धों में जीत अभियान को जारी रखने तथा कत्लेआम और यातना को साम्राज्यवाद के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का बहाना लेकर टाल दिया। गुप्त जेलों से संबंधित घटनाएं जिन्हें छिपा पाना सम्भव नहीं है, वह अमरीका और उसके सहयोगियों के सहअपराध का पर्दाफाश करती हैं।दूसरी तरफ पिछले 8 वर्षों में जब लूला ब्राजील के राष्ट्राध्यक्ष थे, ब्राजील ने धीरे-धीरे समस्याओं से निजात पाना शुरू कर दिया था। ब्राजील का तकनीकी विकास बढ़ रहा था और ब्राजील अर्थव्यवस्था में सुधार और इसका फैलाव बढ़ रहा था। उनके राष्ट्र मुखिया का पहला कार्यकाल बहुत कठिन था लेकिन उन्होंने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया और अनुभव हासिल किया। उनका अथक संघर्ष, मानसिक शान्ति, शान्त स्वभाव और कर्तव्य के प्रति बढ़ती लगन ने उन चुनौती भरे अंतर्राष्ट्रीय हालातों में ब्राजील का जीडीपी दो ट्रिलियन डालर के करीब था और ब्राजील की आर्थिक विकास दर दुनिया के पहले दस देशों की सूची में थी। हालांकि ब्राजील से अमरीका क्षेत्रफल के लिहाज से थोड़ा ही बड़ा हैै पर ब्राजील का जीडीपी अमरीका के जीडीपी का कुल मात्र 12 प्रतिशत है। लेकिन साम्राज्यवादी देश अमरीका विश्व को लूट रहा है और विश्व में एक हजार से अधिक स्थानों पर अपनी सेना को तैनात कर रखा है। 2002 के अंत में मुझे उनके राष्ट्रपति पद पर आसीन होने वाले समारोह को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चावेज भी वहां मौजूद थे। 11 अप्रैल को उनका तख्त पलट दिया गया और उसी वर्ष उन्होंने अमरीका द्वारा सुनियोजित तेल के व्यापार के खिलाफ साजिश का सामना किया। उस दौरान बुश अमरीका के राष्ट्रपति थे। ब्राजील, बोलिवारियन गणतंत्र और क्यूबा के आपसी संबंध मधुर थे।मेरी बीमारीअक्टूबर 2004 में मैं एक दुर्घटना का शिकार हो गया जिस कारण महीनों तक मेरी गतिविधियां स्थगित रहीं। फिर जुलाई 2006 के अंत में मैं गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। इस कारण मैंने पार्टी और देश के मुखिया का पदभार उसी वर्ष 31 जुलाई को छोड़ दिया क्योंकि मुझे लगने लगा था कि मैं अब दायित्व नहीं निभा पाऊंगा।ज्यों ही मेरी हालत में सुधार आया मैंने पढ़ने, लिखने और क्रांति के बारे मंे उपलब्ध सामग्री का अध्ययन शुरू कर दिया और कुछ यादों को छपवाने का विचार बनाया।फिर जब मैं बीमार पड़ा तो मेरे लिए सौभाग्य की बात थी कि लूला जब भी हमारे देश की यात्रा पर आते तो मुझसे जरूर मिलते और हमारी खुलकर बातें होती। मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं उनकी हर बात से सहमत था। मैं उनकी फसलों से जैविर्क इंधन के उत्पादन की योजना से असहमत हूं क्योंकि इससे भुखमरी एक भयंकर रूप ले सकती है।ब्राजील की समस्याएंमैं ईमानदारी से कहना चाहूंगा कि भुखमरी की यह समस्या ब्राजील की देन नहीं है और लूला की तो बिल्कुल नहीं। यह विश्व आर्थिक नीति का एक जरूरी हिस्सा है जो साम्राज्यवाद और उसके अमीर सहयोगियों द्वारा थोपी गयी है। ये मुल्क अपने बाजार के हित की रक्षा हेतु कृषि के उत्पादन पर विशेष रियायतें देकर विश्व के तीसरे देशों से खाद्यान्न आयात स्पर्धा में उन्हें मजबूर करते हैं कि वे इन देशों से औद्योगिक उपकरण खरीदने को मजबूर हों। ये उपकरण जिन देशों में बेचे जाते हैं उन्हें देशों के कच्चे माल तथा ऊर्जा श्रोतों का दोहन कर बनाए जाते हैं तथा गरीबी का कारण सदियों से इन देशों का उपनिवेश बने रहना है। मैं भलीभांति समझता हूं कि अमरीका व यूरोप की अनुचित स्पर्धा और विशेष रियायत के कारण ब्राजील को इथेनौल (ईथाइल अल्कोहल) का उत्पादन करने को बाध्य होना पड़ा है।ब्राजील में नवजात शिशु मृत्युदर 23.3 प्रति हजार है तथा प्रसूति मृत्युदर 110 प्रति हजार है जोकि अमीर औद्योगिक देशों में क्रमशः 5 एवं 15 है। हम इस प्रकार के दूसरे आकड़े भी दे सकते हैं।चुकन्दर से उत्पादित चीनी पर विशेष रियायत देकर यूरोप ने हमारे चुकन्दर से बनने वाली चीनी को यूरोप द्वारा अनुदान दिए जाने के कारण हमारे देश में गन्ने से बनने वाली चीनी को बाजार में बिकने से वंचित कर दिया है। हमारे गन्ना किसान वर्ष के अधिकतर समय काम से वंचित रहते हैं। इस बीच अमरीका ने हमारी बेहतरीन उपजाऊ जमीन छीन ली है और इसकी कम्पनियां चीनी उद्योग की मालिक बन गयी। तब अचानक एक दिन हमें हमारे चीनी कोटे से वंचित कर दिया और हमारे देश की आर्थिक घेराबंदी कर दी ताकि हमारी क्रान्ति और आजादी को समाप्त किया जा सके।अब ब्राजील ने गन्ना, सोयाबीन और अनाज का उत्पादन करने की विधि को विकसित कर दिया है जो अधिकतम उत्पादन देते हैं। एक दिन मैं एक ‘डाकूमेंट्री’ में देख रहा था कि सिएगो डी अविला में 40 हजार हेक्टेयर जमीन पर सोयाबीन की खेती के बाद अन्न एगाएंगे जहां वह पूरे वर्ष उत्पादन कर सकेंगे। मैंने कहा कि वह आदर्श समाजवादी कृषि है जो उच्चकोटि का यांत्रिक है और अत्याधिक उत्पादकता देने वाला है।कैरिबियन देशों में कृषि के लिए सबसे बड़ी समस्या चक्रवात है जो दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं।हमारे देश ने मारियल में एक अत्याधुनिक बन्दरगाह के निर्माण तथा वित्तीय सहायता देने के बावत ब्राजील के साथ एक विस्तारित परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होगी। वेनेजुएला ब्राजील के कृषि उत्पादन तथा तकनीकी का प्रयोग चीनी उत्पादन तथा गन्ने की खोई से ताप-विद्युतीय शक्ति बनाने के उपयोग में ला रहा है। यह एक बहुत ही विकसित यंत्र है और उसका प्रयोग समाजवादी उत्पादन में भी किया जाता है। बोलावियन गणतंत्र में वे गैसोलीन से वातावरण पर होने वाला नुकसान को कम करने के लिए इथोनॉल का प्रयोग कर रहे हैं।पूंजीवाद और प्राकृतिक विनाशपूंजीवाद ने उपभोक्ता समाज को पैदा किया और पैदा किया ईंधन की बर्बादी जिससे पैदा हुआ नाटकीय रूप में मौसम में परिवर्तन। प्रकृति को 400 मिलियन वर्ष लगे उन वस्तुओं को पैदा करने में जिन्हें केवल 2 सदियों से खा रहे हैं। विज्ञान को इस प्रकार की ऊर्जा की खोज करनी है जो आज पेट्रोल से मिलने वाली ऊर्जा का विकल्प बन सके। कोई नहीं जानता यह कितना समय लेगा और इस पर कितनी लागत आएगी। क्या कभी हम उसे पा सकेंगे? कोपेनहेगन में बहस का यह विषय था और यह वार्ता पूर्णरूप से असफल रही।लूला ने मुझे बताया कि जब तक इथेनाल की कीमत गैसोलीन की कीमत का 70 प्रतिशत बैठती है तब तक इथेनॉल तैयार करना फायदेमन्द नहीं है। उन्होंने बताया कि ब्राजील के पास दुनिया में सबसे अधिक जंगल हैं। जंगलों के कटने की दर को धीरे-धीरे 80 प्रतिशत तक कम किया जाएगा।आज ब्राजील के पास समुद्र खोद कर ईंधन/तेल निकालने की विश्व की सबसे बेहतरीन तकनीक है जिसके द्वारा 7000 मीटर से अधिक गहराई से ईंधन प्राप्त किया जा सकता है। 30 वर्ष पहले यह काल्पनिक मालूम होता था।उन्होंने उच्च शिक्षा योजना के बारे में जो ब्राजील अपनाना चाहता है, बताया। इस दिशा में चीन द्वारा उठाये गये कदम की सराहना की। उन्होंने गर्व से बताया कि चीन के साथ उनके देश का व्यापार 40 बिलियन डालर तक पहुंच गया है।एक बात साफ है कि एक धातुकर्मी एक असाधारण और आदरणीय राजनेता बन गया है जिसकी आवाज हर अंतर्राष्ट्रीय बैठक में सुनी जाती है।उन्हें इस बात का गर्व है कि 2016 के ओलम्पिक खेलों के आयोजन हेतु उनके देश को चुना गया है। उनका देश 2014 के विश्व फुटबाल कप की मेजबानी भी करेगा। यह ब्राजील द्वारा परियोजनाओं के परिणाम आधार पर सम्भव हुआ है, जिसमें उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया है।उनकी विश्वसनीयता का एक बड़ा सबूत है कि उन्होंने दुबारा चुनाव लड़ने से इन्कार किया और विश्वास प्रकट किया कि वर्कर्स पार्टी की सरकार आगे जारी रहेगी।वे जो उनकी ख्याति और सम्मान के राजप्रतिनिधि हैं ओर दूसरे जो साम्राज्य की सेवा में हैं, उन्होंने उनके क्यूबा आने की आलोचना की है। ऐसे ही लोगों ने आधी सदी तक क्यूबा के खिलाफ बहुत गलत प्रचार किया। लूला कई वर्षों से यह जानते थे कि हमारे देश में किसी को प्रताड़ित नहीं किया गया, कभी हमने अपने किसी विरोधी को नहीं मरवाया और हमने कीभी भी अपनी जनता से झूठ नहीं बोला। वह यह जानते हैं कि सच्चाई से उनके क्यूबाई मित्रों का अटूट संबंध है।क्यूबा से वह हमारे पड़ोसी हैती में चले गए। हमने हैती के लिए इस दुखद घड़ी में क्या कर सकते हैं, इस विषय पर उनसे खुलकर विचारों का आदान-प्रदान होता रहा। वह जानते हैं कि एक लाख से अधिक भूकम्प पीड़ित हैती निवासी हमारे डाक्टरों द्वारा उपचार पा चुके हैं। मैं जानता हूं उनकी दिली इच्छा हैती के नेक और काफी समय से दुखी लोगों की मदद करना है।मैं ब्राजील के राष्ट्रपति से अपनी यह पिछली न भूलने वाली मुलाकात हमेशा याद रखूंगा और इसे लोगों को बताने में मुझे कोई संकोच नहीं है।

- फिडेल कास्त्रो

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तीसरा आदमी कौन है

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं --
”यह तीसरा आदमी कौन है ?“
मेरे देश की संसद मौन है।
- धूमिल
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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
- दुष्यंत कुमार
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औरत

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
- कैफ़ी आज़मी
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बुधवार, 14 अप्रैल 2010

क्रांतियां, कम्यून, कम्यूनिस्ट समाज के नाना कला विज्ञान और दर्शन के जीवंत वैभव से समन्वित व्यक्ति मैं

काल,
तुझसे होड़ है मेरी : अपराजित तू-
तुझमें अपराजित मैं वास करूं ।
इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूं
सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो -
कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं- तेरे भी, ओ‘ ‘काल’ ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल !
जो मैं हूं-
मैं कि जिसमें सब कुछ है...
क्रांतियां, कम्यून,
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं ।
मैं, जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है
- शमशेर बहादुर सिंह
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आज सर्वहारा तू ही है

घर-आंगन में आग लग रही ।
सुलग रहे वन -उपवन,
दर दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर- छाजन ।
तन जलता है , मन जलता है
जलता जन-धन-जीवन,
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बंधन ।
दूर बैठकर ताप रहा है,
आग लगानेवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

भाई की गर्दन पर
भाई का तन गया दुधारा
सब झगड़े की जड़ है
पुरखों के घर का बँटवारा
एक अकड़कर कहता
अपने मन का हक ले लेंगें,
और दूसरा कहता तिलभर भूमि न बँटने देंगें ।
पंच बना बैठा है घर में,
फूट डालनेवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

दोनों के नेतागण बनते
अधिकारों के हामी,
किंतु एक दिन को भी
हमको अखरी नहीं गुलामी ।
दानों को मोहताज हो गए
दर-दर बने भिखारी,
भूख, अकाल, महामारी से
दोनों की लाचारी ।
आज धार्मिक बना,
धर्म का नाम मिटानेवाला
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

होकर बड़े लड़ेंगें यों
यदि कहीं जान मैं लेती,
कुल-कलंक-संतान
सौर में गला घोंट मैं देती ।
लोग निपूती कहते पर
यह दिन न देखना पड़ता,
मैं न बंधनों में सड़ती
छाती में शूल न गढ़ता ।
बैठी यही बिसूर रही माँ,
नीचों ने घर घाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

भगतसिंह, अशफाक,
लालमोहन, गणेश बलिदानी,
सोच रहें होंगें, हम सबकी
व्यर्थ गई कुरबानी
जिस धरती को तन की
देकर खाद खून से सींचा ,
अंकुर लेते समय उसी पर
किसने जहर उलीचा ।
हरी भरी खेती पर ओले गिरे,
पड़ गया पाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

जब भूखा बंगाल,
तड़पमर गया ठोककर किस्मत,
बीच हाट में बिकी
तुम्हारी माँ - बहनों की अस्मत।
जब कुत्तों की मौत मर गए
बिलख-बिलख नर-नारी ,
कहाँ कई थी भाग उस समय
मरदानगी तुम्हारी ।
तब अन्यायी का गढ़ तुमने
क्यों न चूर कर डाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

पुरखों का अभिमान तुम्हारा
और वीरता देखी,
राम - मुहम्मद की संतानों !
व्यर्थ न मारो शेखी ।
सर्वनाश की लपटों में
सुख-शांति झोंकनेवालों !
भोले बच्चें, अबलाओ के
छुरा भोंकनेवालों !
ऐसी बर्बरता का
इतिहासों में नहीं हवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

घर-घर माँ की कलख
पिता की आह, बहन का क्रंदन,
हाय , दूधमुँहे बच्चे भी
हो गए तुम्हारे दुश्मन ?
इस दिन की खातिर ही थी
शमशीर तुम्हारी प्यासी ?
मुँह दिखलाने योग्य कहीं भी
रहे न भारतवासी।
हँसते हैं सब देख
गुलामों का यह ढंग निराला ।
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

जाति-धर्म गृह-हीन
युगों का नंगा-भूखा-प्यासा,
आज सर्वहारा तू ही है
एक हमारी आशा ।
ये छल छंद शोषकों के हैं
कुत्सित, ओछे, गंदे,
तेरा खून चूसने को ही
ये दंगों के फंदे ।
तेरा एका गुमराहों को
राह दिखानेवाला ,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।
- शिव मंगल सिंह सुमन
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मां है रेशम के कारखाने में बाप मसरूफ सूती मिल में है

मां है रेशम के कारखाने में
बाप मसरूफ सूती मिल में है
कोख से मां की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है
जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारखानों के काम आयेगा
अपने मजबूर पेट की खातिर
भूक सरमाये की बढ़ाएगा
हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रोशन
खून इसका दिए जलायेगा
यह जो नन्हा है भोला भाला है
खूनीं सरमाये का निवाला है
पूछती है यह इसकी खामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है!
- अली सरदार जाफरी
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सोमवार, 12 अप्रैल 2010

प्रगतिशील लेखक संघ, उ.प्र. का राज्य सम्मेलन सम्पन्न

वाराणसी 23 फरवरी। नज़ीर बनारसी शताब्दी समारोह का आयोजन बनारस में 20, 21 फरवरी 2010 को किया गया। यह आयोजन महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के मानविकी एवं प्रगतिशील लेखक संघ, वाराणसी इकाई के संयुक्त तत्वाधान में किया गया। गांधी अध्ययन पीठ के सभागार में पहले दिन 20 फरवरी 2010 को ‘भारतीय समाज में सह अस्तित्व की चुनौतियां’ विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं शाम को मुशायरा व कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। दूसरे दिन इसी जगह प्रगतिशील लेखक संघ का 9वां राज्य सम्मेलन भी हुआ।समारोह का उद्घाटन प्रख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने किया। नामवर जी ने गंगो जमुनी तहजीब के मशहूर शायर नज़ीर बनारसी को शिद्दत से याद करते हुए उनके रचनाकर्म और आम आवाम से उनके गहरे रिश्ते पर रोशनी डाली। उन्होंने नज़ीर अकबराबादी से लेकर नज़ीर बनारसी तक की काव्य-यात्रा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि समाज में सह अस्तित्व के बिना साहित्य संभव नहीं है। कबीर इसी सह अस्तित्व की बात करते हैं। नजीर बनारसी का संस्मरण सुनाते हुए उनकी शायरी और नज्मों पर अपनी खास राय जाहिर करते हुए नामवर सिंह ने कहा कि नज़ीर की शायरी में बनारस समाया हुआ है और बनारस हिन्दुस्तानी तहजीब का एक बड़ा मुकाम है, इसलिए उन्हें बार-बार पढ़ने को जी करता है। उन्होंने कहा कि नज़ीर साहब हमारी तहजीब और विरासत के अलमबरदार थे। इस खास समय में उन्हें याद करना दरअसल हमारी जरूरत भी है।उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव डा. कमला प्रसाद ने कहा कि नज़ीर बनारसी जैसे बड़े शायर प्रेरणा के श्रोत हैं। हम अपने इन साहित्यकारों के द्वारा ही जनता के उन सारे सवालों और मुश्किलों का हल ढूँढ सकते हैं जिनसे वह आये दिन जूझ रही है। उन्होंने कहा कि आम आदमी की जिन्दगी और उसका सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकार जिस रास्ते से होकर गुजरता है- अगर वह सरोकार व संघर्ष किसी रचनाकार में मौजूद है तो उसे ही जनता अपना मानती है। इस संदर्भ में नज़ीर बनारसी आवामी शायर थे और आवाम के दिल में उनके लिए खास जगह हैं।इस अवसर पर ‘नज़ीर बनारसी की प्रतिनिधि शायरी’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। यह पुस्तक पेपरबैक्स में राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गयी है जिसका सम्पादन श्री मूलचन्द सोनकर ने किया है। पुस्तक लोकार्पण के समय प्रो. नामवर सिंह व प्रो. कमला प्रसाद के साथ प्रलेस के राष्ट्रीय अतिरिक्त महासचिव प्रो. अली जावेद, नजीर बनारसी के ज्येष्ठ पुत्र श्री मो. जहीर और कथाकार काशीनाथ सिंह व श्री शकील सिद्दीकी मंच पर आसीन थे। इसी दौरान प्रलेस वाराणसी इकाई की ओर प्रकाशित नज़ीर बनारसी पर केन्द्रित स्मारिका का भी विमोचन हुआ। उद्घाटन सत्र के प्रारम्भ में स्वागत प्रो. चौथी राम यादव तथा धन्यवाद ज्ञापन काशी विद्यापीठ, मानविकी संकाय के प्रमुख प्रो. अजीज हैदर ने किया। इस सत्र का संचालन डा. संजय श्रीवास्तव ने किया।उद्घाटन सत्र के बाद ‘साझा संस्कृति की विरासत:कबीर से नज़ीर तक’ पहला सत्र शुरू हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रो. कमला प्रसाद, प्रो. अली अहमद फातमी और प्रो. अली जावेद ने की। इस सत्र में श्री शकील सिद्दीकी, प्रो. शाहीना रिजवी, प्रो. राजेन्द्र कुमार, श्री राकेश, श्री शशि भूषण स्वाधीन, श्री विजय निशांत, श्री राजेन्द्र राजन ने अपने विचार व्यक्त किये। इस सत्र का संचालन डा. श्रीप्रकाश शुक्ल तथा धन्यवाद ज्ञापन श्री शिवकुमार पराग ने किया।दोपहर बाद दूसरे सत्र “बहुसंस्कृतिवाद का भारतीय परिप्रेक्ष्य” की अध्यक्षता बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. दीपक मलिक ने की। इस सत्र में विदेश से आये हुए वक्ताओं की विशिष्ट उपस्थिति रही जिससे बहुसंस्कृतिवाद पर काफी गंभीर चर्चा हुई। राहुल सांकृत्यायन पर महत्वपूर्ण कार्य के लिए विख्यात स्वीडेन की प्रो. मारिया जुफेन, फिनलैण्ड से आये आलोचक प्रो. काउहेनन, जर्मनी से आये मार्क्सवादी साहित्यकार प्रवासी भारतीय उज्जवल भट्टाचार्य, वीरेन्द्र यादव, डा. रघुवंश मणि, आलोचक कुमार विनोद, सैयद रजा हुसैन रिजवी ने अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। इस सत्र का संचालन डा. संजय कुमार तथा धन्यवाद ज्ञापन डा. गोरखनाथ ने किया।दिन भर की इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के बाद शाम को नजीर बनारसी की याद में एक मुशायरा व कवि सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता मशहूर अवामी शायर जनाब शफीक बनारसी ने की। इसमें प्रो. अजीज हैदर, प्रो. वशिष्ठ अनूप, डा. कुमार विनोद, डा. निजामुद्दीन, कौशिक रवीन्द्र उपाध्याय, समर गाजीपुरी, बशर बनारसी, वासिक नासिकी, हसन जाफरी, सईद निजामी, अजीज लोहतवी, मोमिन लोहतवी, निजाम बनारसी, रामजी नयन, शंकर बनारसी, सलीम राजा, डा. यू.सी.वर्मा, तौफीक लोहतवी, मूलचन्द सोनकर, जवाहर लाल कौल, रामदास अकेला, परमानन्द श्रीवास्तव, सलाम बनारसी, नरोत्तम शिल्पी, विपिन कुमार सहित तमाम कवियों, शायरों ने अपनी रचनायें सुनाई। संचालन अल कबीर ने और धन्यवाद ज्ञापन जय प्रकाश धूमकेतु ने किया।गांधी अध्ययन पीठ के सभागार में दूसरे दिन प्रगतिशील लेखक संघ, उत्तर प्रदेश का 9वां राज्य सम्मेलन वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की अध्यक्षता में शुरू हुआ। विचार सत्र ‘जनपक्षधरता के दायरे में साहित्य की उपस्थिति’ विषय पर बतौर मुख्य वक्ता प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि साहित्य में सही मायने में लोकतंत्र होता है। उन्होंने कहा कि आज विचारधाराओं के अंत की बात कही जा रही है जबकि देखें तो साहित्य में वैचारिक प्रतिबद्धता रही है। सगुण है तो निर्गुण, उसमें भी सगुण है तो रामभक्ति, कृष्णभक्ति और कहीं नहीं है तो रीतिकाल में चले जाइये। उन्होंने अपने संदर्भ को उठाते हुए कहा कि लोहिया तो मार्क्सवाद विरोधी थे लेकिन उनके समाजवादी संगठन की गोष्ठियों में मैं जाता था क्योंकि लोहिया की पुस्तकों पर चर्चा किसी भी लेखक पर हो रही चर्चा होती थी और मुझे उस लेखक से मतलब था। उन्होंने कहा कि विचारधाराओं की तुलना में जीवन निरन्तर चलता रहता है। उन्होंने महान कवि गेटे का संदर्भ देते हुए कहा कि ”थियरी इज ग्रे एण्ड ट्री आफ लाइफ इज आलवेज ग्रीन“ यानी विचारधारा की तुलना में जीवन हमेशा हरा-भरा और जीवन्त होता है। इसलिए साहित्य में ऐसी ही चीजों को बाकायदे आना चाहिए।प्रो. नामवर सिंह ने प्रगतिशील आन्दोलन की सविस्तार चर्चा करते हुए साहित्य और जनपक्षधरता के मुद्दे को बाकायदा विश्लेषित किया। उन्होंने कहा कि लिखने का काम जितना जिम्मेदारी भरा होता है उतना ही सोचने का प्रसंग भी, इसलिए हमें परिकल्पना और लेखन को संतुलित करने के लिए जनता के बारे में ठीक से राय बनानी चाहिए।अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि आज के दौर में पाठकों के समक्ष कविता की भाषा को लेकर समझ का संकट उत्पन्न हो गया है। वहीं वैश्वीकरण से पनपी अपसंस्कृति व मानवीय संवेदना में ह्रास साहित्य को जनता से दूर कर रहा है। ऐसे में साहित्य को जनता के साथ जोड़कर चलना होगा। साथ ही रचनाओं में जन सामान्य की भाषा का प्रयोग करना होगा। इससे साहित्य का जनपक्ष उभर कर सामने आयेगा। उन्होंने कहा कि जन सामान्य की भाषा को रचना के साथ प्रयोग में लाना चाहिए और आकदमिक व्यवहार को लेकर तकनीकी कठिनाई से हमें बचना चाहिए।दिल्ली विश्वविद्यालय से आये डा. अली जावेद ने कहा कि हिन्दी उर्दू का मसला बराबर गम्भीर होता जा रहा है। हिन्दी में जो कुछ लिखा जा रहा है उसमें मुसलमान लेखक कितने हैं? इतना ही नहीं कथापात्रों में मुस्लिम चरित्र बराबर नहीं दिख रहे हैं, क्या यही हमारे समाज की तस्वीर है? इसलिए साहित्य की जनपक्षधरता पर विचार करते समय इस मसले पर भी हम गौर करें।जर्मनी से आये प्रसिद्ध मार्क्सवादी साहित्यकार उज्जवल भट्टाचार्य ने कहा कि हम जब रचना कर्म कर रहे होते हैं तब भी यह विचार कर लेना चाहिए कि हमारा पाठक उस पर क्या रूख अपना सकता है, इसलिए आत्ममुग्धता से बचिए और बड़ा बनने के लिए लिखने का सपना देखना छोड़ दीजिए। उन्होंने कहा कि बड़ी और महत्वपूर्ण रचनायें यूं ही हो जाती हैं किन्तु अवचेतन में हमारे जनता होगी तभी हमारा रचा हुआ कर्म जनता के लिए होगा।इस सत्र के प्रारम्भ में गोरखपुर से आये वरिष्ठ आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने विषय केन्द्रित आलेख का वाचन किया। इसके बाद राजेन्द्र राजन (बेगूसराय), सैयद रजा हुसैन रिजवी (जमशेदपुर), शशि भूषण स्वाधीन (हैदराबाद), पुन्नी सिंह (ग्वालियर), राकेश (वर्धा), शकील सिद्दीकी, वीरेन्द्र यादव, शहजाद रिजवी, भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश, डा. एम.पी.सिंह (जलेस वाराणसी), डा. मूल चन्द गौतम, डा. नईम, डा. रघुवंश मणि, नरेन्द्र पुण्डरीक, शिशुपाल, सरोज पाण्डेय, लालसा लाल तरंग ने अपने विचार व्यक्त किये। इस सत्र का संचालन डा. आशीष त्रिपाठी एवं आभार ज्ञापन जय प्रकाश धूमकेतु ने किया।इस दौरान राज्य के विभिन्न हिस्सों से आये महत्वपूर्ण साहित्यकारों पंकज गौतम, राम चन्द्र सरस, डा. संतोष भदौरिया, रमाकान्त तिवारी, आनन्द स्वरूप श्रीवास्तव, राजेन्द्र यादव, सुरेन्द्र नायक, उत्तम चन्द, डा. संजय राय, डा. उपेन्द्र श्रीवास्तव, उद्भव मिश्र, डा. चन्द्रभान सिंह यादव, डा. आनन्द तिवारी, डा. सुनील विक्रम सिंह, डा. के.एल.सोनकर, आर.पी.सोनकर, डा. धीरेन्द्र पटेल, बाल कृष्ण राही, गजाधर शर्मा ‘गंगेश’ आदि ने सम्मेलन में सक्रिय हिस्सेदारी की।राज्य सम्मेलन में दोपहर बाद प्रलेस के प्रान्तीय अध्यक्ष कथाकार काशी नाथ सिंह, प्रो. अली जावेद तथा राकेश की अध्यक्षता में सांगठनिक सत्र आरम्भ हुआ। सत्र में प्रलेस के प्रांतीय महासचिव डा. जय प्रकाश धूमकेतु ने अपने कार्यकाल की विस्तृत लिखित रिपोर्ट पेश की। सम्मेलन में अगले सत्र के लिए डा. जय प्रकाश धुमकेतु को कार्यकारी अध्यक्ष एवं डा. संजय श्रीवास्तव को महासचिव निर्वाचित किया गया। इसके अतिरिक्त निम्न कार्यकारिणी चुनी गयी।संरक्षक मंडल: अमर कान्त, डा. परमानन्द श्रीवास्तव, डा. अकील रिजवी, डा. शारिब रूदौलवी, कामता नाथ, डा. काशी नाथ सिंह, नरेश सक्सेना, प्रो. चौथी राम यादव, डा. पी.एन.सिंह, आबिद सुहैल।अध्यक्ष मंडल: वीरेन्द्र यादव, प्रो. अली अहमद फातमी, अजीत पुष्कल, डा. मूल चन्द गौतम, डा. जय प्रकाश धूमकेतु।उपाध्यक्ष मंडल: प्रो. शाहिना रिजवी, मूल चन्द सोनकर, जवाहर लाल कौल ‘व्यग्र’, डा. गया सिंह, डा. उपेन्द्र श्रीवास्तव।सचिव मंडल: शकील सिद्दीकी, डा. रघुवंश मणि, नरेन्द्र पुण्डरीक, शिव कुमार पराग, डा. श्री प्रकाश शुक्ल, डा. तसद्दुक हुसैन, डा. संजय श्रीवास्तव।कार्यकारिणी सदस्य: डा. जितेन्द्र रघुवंशी, राकेश, डा. अनिता गोपेश, डा. मदीउर्रहमान, डा. संजय कुमार, प्रो. राज कुमार, डा. आशीष त्रिपाठी, सिया राम यादव, जगदीश नारायण श्रीवास्तव, स्वप्निल, डा. दया दीक्षित, राजेन्द्र यादव, लालसा लाल तरंग, डा. राम अवध यादव, डा. रमेश कुमार मौर्य, आनन्द स्वरूप श्रीवास्तव, डा. सरोज पाण्डेय, शिशुपाल, डा. राम प्रकाश कुशवाहा, गजाधर शर्मा ‘गंगेश’, शहजाद रिजवी, डा. नईम, उत्तम चन्द, डा. संजय राय, आर.डी.आनन्द, डा. राजेश मल्ल, डा. आर.पी.सोनकर, डा. चन्द्र भान सिंह यादव।आयोजन में मु. खालिद द्वारा नजीर अकबराबादी, नजीर बनारसी, वामिक जौनपुरी, प्रेम चन्द, महमूद दरवेस, फैज अहमद फैज, फिराक गोरखपुरी, धूमिल, अकबर इलाहाबादी, नाजिम हिकमत, नजरूल इस्लाम, केदार नाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह एवं मुक्तिबोध पर बनाये गये कविता पोस्टर विशेष रूप से आकर्षण का केन्द्र रहे। आयोजन स्थल पर राज कमल पकाशन की ओर से पुस्तक विक्रय पटल भी लगाया गया था।(प्रस्तुति: डा. संजय श्रीवास्तव)
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जवाहर लाल कौल ‘व्यग्र’ के कहानी-संग्रह ‘चक्कर’ का लोकार्पण










वाराणसी: प्रगतिशील लेखक संघ वाराणसी इकाई तथा सर्जना साहित्य मंच वाराणसी के संयुक्त तत्वाधान में प्रसिद्ध कवि एवं कथाकार जवाहर लाल कौल ‘व्यग्र’ के प्रथम कहानी संग्रह ‘चक्कर’ का लोकार्पण दिनांक 14 फरवरी 2010 को उदय प्रताप महाविद्यालय वाराणसी के पुस्तकालय कक्ष में प्रख्यात कथाकार प्रो. काशी नाथ सिंह की अध्यक्षता में किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध दलित साहित्यकार एवं ‘बयान’ पत्रिका के सम्पादक मोहनदास नैमिशराय की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।समारोह के प्रारम्भ में अपनी कहानियों की रचना-प्रक्रिया के सम्बंध में जवाहर लाल जी ने बताया। अपने उद्घाटन भाषण में डा. राम सुधार ने संकलन की कई कहानियों को संदर्भित करते हुए कहा कि व्यग्र जी के अन्दर एक सफल कहानीकार के बीज हैं। उनकी प्रत्येक कहानी एक सन्देश की तरफ ले जाती है। शायर दानिश जमाल सिद्दीकी का कहना था कि वाराणसी में कहानी के क्षेत्र में प्रो. काशी नाथ सिंह के बाद व्यग्र जी के आगमन से एक नई उम्मीद पैदा होती है। प्रो. चौथी राम यादव ने संग्रह की कहानी ‘औकात’ को रेखांकित करते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज की अस्पृश्यता दलित समाज की सबसे मारक एवं अपमानजनक स्थिति है जिसके कारण वह सवर्णीय चारपाई तो बुन सकता है लेकिन उस पर बैठ नहीं सकता।मुख्य अतिथि नैमिशराय ने कहा कि दलित साहित्यकार एक स्वस्थ समाज की रचना करना चाहता है। जब तक यह स्थिति नहीं आयेगी, दलित लेखन की आवश्यकता बनी रहेगी। ‘चक्कर’ कहानी पर विशेष रूप से चर्चा करते हुए उन्होंने इसे जातिगत दम्भ के अभिव्यक्ति की श्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक कहानी बताया। प्रो. काशी नाथ सिंह ने कहा कि जवाहर लाल जी प्रेम चन्द्र की तर्ज के कथाकार हैं इसलिए उनके यहां प्रेम चन्द का विरोध भी प्रेम चन्द का विकास है। उन्होंने वाराणसी में पुरूष कथाकारों की कमी जाहिर करते हुए व्यग्र को अपना जोड़ीदार बताया। संग्रह की दो कहानियाँ ‘औकात’ और ’डाँगर’ पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कौल जी में इस बात का सेंस है कि कहानी कहाँ से बनती है।आयोजन में डा. संजय कुमार, प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश महासचिव डा. संजय श्रीवास्तव तथा संगम जी विद्रोही ने भी अपने विचार रखे। स्वागत वाराणसी प्रलेस के सचिव डा. गोरख नाथ एवं आभार जलेस के सह सचिव नईम अख्तर ने ज्ञापित किया। संचालन अशोक आनन्द ने किया।(प्रस्तुति: मूल चन्द्र सोनकर)

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रविवार, 11 अप्रैल 2010

दूध, दालों के बढ़ते दाम से खाद्य वस्तुओं की महंगाई १७.70% पर


दूध, दालों के बढ़ते दाम से खाद्य वस्तुओं की महंगाई १७.70% पर

नई दिल्ली: दूध, फलों एवं दालों की बढ़ती कीमतों से 27 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में खाद्य वस्तुओं की महंगाई 17.70 प्रतिशत पर पहुंच गई। इससे
रिजर्व बैंक द्वारा वार्षिक मौद्रिक नीति में दरें बढ़ाए जाने की आशंका बढ़ गई हैं। इससे पूर्व सप्ताह में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 16.35 प्रतिशत पर थी। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी और खाद्य वस्तुओं की महंगाई का दायरा बढ़कर विनिर्मित उत्पादों तक पहुंचाने की आशंका से मार्च में कुल मुद्रास्फीति दोहरे अंक को पार कर जाने की संभावना है। फरवरी में कुल मुद्रास्फीति 9.89 प्रतिशत के स्तर पर थी जिसमें खाद्य एवं गैर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव शामिल है। वार्षिक आधार पर, दालों के दाम 32.60 प्रतिशत, दूध के 21.12 प्रतिशत, फल के 14.95 प्रतिशत और गेहूं के दाम 13.34 प्रतिशत बढ़े। वहीं, साप्ताहिक आधार पर खाद्य वस्तुओं का सूचकांक 0.9 प्रतिशत बढ़ गया क्योंकि इस दौरान समुद्री मछली, दूध, फलों और सब्जियों एवं मसूर की दाल महंगी हुई। बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के उपायों पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं प्रतिनिधियों के साथ ही कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्रियों की आज एक बैठक कर रहे हैं।

साभार : http://hindi.economictimes.indiatimes.कॉम

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काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में', उतरा है रामराज विधायक निवास में

काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नखास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

(अदम गोंडवी )

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आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता



राह कहती,देख तेरे पांव में कांटा न चुभ जाए
कहीं ठोकर न लग जाए;
चाह कहती, हाय अंतर की कली सुकुमार
बिन विकसे न कुम्हलाए;
मोह कहता, देख ये घरबार संगी और साथी
प्रियजनों का प्यार सब पीछे न छुट जाए!
किन्तु फिर कर्तव्य कहता ज़ोर से झकझोर
तन को और मन को,
चल, बढ़ा चल,
मोह कुछ, औश् ज़िन्दगी का प्यार है कुछ और!
इन रुपहली साजिशों में कर्मठों का मन नहीं ठगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!
आह, कितने लोग मुर्दा चांदनी के
अधखुले दृग देख लुट जाते;
रात आंखों में गुज़रती,
और ये गुमराह प्रेमी वीर
ढलती रात के पहले न सो पाते!
जागता जब तरुण अरुण प्रभात
ये मुर्दे न उठ पाते!
शुभ्र दिन की धूप में चालाक शोषक गिद्ध
तन-मन नोच खा जाते!
समय कहता--
और ही कुछ और ये संसार होता
जागरण के गीत के संग लोक यदि जगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!
(शंकर शैलेन्द्र)
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शनिवार, 10 अप्रैल 2010

कृषि में कार्पोरेट को न्यौता

कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में अकस्मात बदले हुए सरकारी रूख से जो चौंकाने वाली बात सामने आयी वह यह कि इसके बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले ही अपनी अमरीका यात्रा के समय वचन दे चुके थे कि वे पश्चिमी देशों के अनुकूल लचीला रवैया अपनायेंगे। इसी तरह जनता का आक्रोश ठंडा करने के लिए सरकार बीटी बैंगन के प्रश्न पर पीछे हट गयी दिखती हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि पर्दे के पीछे अमरीका के साथ इसी दौर में गुपचुप वार्ता भी चलती रही है और निर्णय भी लिये गये हैं।मुखपृष्ठ पर ‘द हिंदू’ दैनिक में छपी खबर (24 फरवरी 2010) के मुताबिक अमरीका के साथ खाद्य सुरक्षा और कृषि में सहयोग का एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग का मसविदा तैयार हुआ है, जिसकी स्वीकृति केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने गत 18 फरवरी को दे दी है। समझौते के अनुसार अमरीकी कंपनियों को भारतीय कृषि क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता सुगम किया जाएगा और कृषि विपणन में निजी निवेश की सरजमीं तैयार करने की अनुकूलता पैदा की जाएगी। इस संबंध में ठोस निर्णय अमरीकी और भारतीय कंपनियों की आगामी परस्पर वार्ताओं में लिया जायेगा। खाद्य सुरक्षा के मामलों में सरकारी स्तर पर और वार्ताएं होंगी। इस मेमोरेंडम आफ अंडरस्टैंडिंग का मसविदा भी नवम्बर 2009 में प्रधानमंत्री की अमरीका यात्रा के दौरान राष्ट्रपति ओबामा के साथ हुई बातचीत में बनी परस्पर सहमति की अग्रेतर कार्रवाई है। बहुराष्ट्रीय अमरीकी कंपनी कारगिल और मोसंतो के काले कारनामों और इनके किसानों के विरोध संघर्षों की याद अभी धूमिल नहीं पड़ी है कि सरकार ने पुराने घाव को फिर ताजा कर दिया है।मसविदे के अनुसार खा़द्य सुरक्षा संबंधी उन्नत तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान और कृषि व्यापार में निजी निवेश की भागीदारी शामिल है। मौसम अनुमान, फसलों का उन्नत उत्पादन/प्रबंधन और विपणन आदि सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जायेगा। जाहिर है, भारतीय कृषि बाजार कब्जाने की यह गंभीर अमरीकी चाल है। इससे भारतीय किसानों को फायदा कुछ भी नहीं मिलने का, किंतु अमरीकी कंपनियां अपनी जरूरत के मुताबिक भारत भूमि को न केवल प्रयोगशाला के रूप में इस्तेमाल करेंगी, बल्कि भारतीय कृषि उत्पादन प्रक्रिया में नाजायज हस्तक्षेप भी करेंगे। भारत पर अमरीकी मार्का कार्पोरेटी कृषि प्रणाली लादी जायेगी और भारत की विकेन्द्रित कृषि व्यवस्था में कार्पोरेट मॉनोपाली का द्वार खुलेगा और परिणामस्वरूप किसान अपने ही खेतों में गुलामी करने को मजबूर होंगे।संसद में प्रस्तुत ताजा बजट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि खुदरा बाजार में विदेशी कंपनियों का द्वार खोल दिया गया है। आयात किये जाने वाले सामानों पर मौजूदा कस्टम ड्यूटी को आधा से भी कम कर दिया गया है। इससे हमारे घरेलू बाजार में विदेशी माल आसानी से आयेंगे और भारतीय मालों के मुकाबले सस्ते बिकेंगे। पर यह सस्ता आगे महंगा पड़ेगा।संसद में प्रस्तुत वर्ष 2010-11 बजट प्रावधानों पर एक नजर डालने से स्पष्ट होता है कि कृषि पर किया गया आबंटन का बड़ा हिस्सा वेस्टेज कम करने और विपणन व्यवस्था पर है। यह आबंटन कृषि में कार्पोरेटी प्रवेश को लक्षित है और इसका इस्तेमाल बड़े पूंजीवाली करेंगे। बड़े व्यापारी अर्थात कार्पोरेट कोल्ड स्टोरेज, मालों की आवाजाही और उन्नत तकनीकी के प्रवेश के नाम पर बजट प्रावधानों को लूटेंगे।अमरीका के साथ किया गया मेमोरंडम ऑफ इंडरस्टैंडिंग भारतीय कृषि व्यवस्था को अमरीकी कंपनियों की मर्जी के हवाले करना है, जिसका दूरगामी विनाशकारी परिणाम अवश्यंभावी है।
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