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सोमवार, 23 मई 2011

पांच विधान सभाओं के चुनाव परिणाम


संचार माध्यम और वामपंथ के जाने-पहचाने विरोधी इस बेबुनियाद बिंदु पर जोर देने के लिए हर किस्म के सिद्धान्त और आक्षेप फैलाने में जुटे हैं कि वामपंथ की चुनाव में पराजय, खासकर पश्चिम बंगाल में पराजय का अर्थ है देश में वामपंथ का खात्मका। यह महज अनर्गल प्रलाप है।

यह सही है कि पश्चिम बंगाल में वामपंथ को एक बड़ा धक्का लगा है। विधान सभा चुनावों में लगातार सात बार की सफलताओं और लगभग साढ़े तीन दशक तक सत्ता में रहने के बाद वामपंथ सत्ता से बाहर हो गया है। पर यह ध्यान में रखना चाहिये कि वामपंथ साढ़े तीन दशक तक लगातार सत्ता में बना रहा जबकि जिस कांग्रेस को स्वाधीनता के बाद से सत्ता पर इजारेदारी थी, उसे दो दशकों से भी पहले जनता का कोप भाजन बनना पड़ा था और 1967 में नौ राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। वाम मोर्चा का लगभग साढ़े तीन दशक तक सत्ता पर बने रहना स्वयं में बहुपार्टी लोकतंत्र के इतिहास का रिकार्ड बन गया है और यह उस समय तक एक रिकार्ड बना रहेगा जब तक वाममोर्चा भविष्य के चुनावी संघर्ष के लिए फिर से अपनी कमर कसता है और नया रिकार्ड स्थापित करता है।

कांग्रेसजन तथ्यों के खंडन-मंडन का मजाक बनाने में हदों को पार कर रहे हैं। सबसे अधिक उपहासास्पद बात तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने कही। उन्होंने चटखारे लेते हुए कहा कि प. बंगाल में वाममोर्चा को पटक कर दो अंकीय आंकड़े पर ला दिया गया है। वह बड़े मजे से भूल गये कि इसी चुनाव में तमिलनाडु विधानसभा में उनकी पार्टी एक ही अंक में सिमट कर रह गयी है जहां कांग्रेस को 294 स्थानों में से मात्र पांच स्थान ही मिले हैं। इसके अलावा केरल में कांग्रेस सत्ता में तो जरूर आ गयी है पर वह नई विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में नहीं आ सकी। यह सम्मान तो वामपंथ की ही पार्टी ने अपने पास बनाये रखा। इसी प्रकार, उन्होंने इस तथ्य को भी नजरंदाज करने की कोशिश की कि उनकी पार्टी से पुडूचेरी में सत्ता छिन गयी है, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लोकसभा के लिए दो उपचुनावों में उन्हें अपमानजनक तरीके से शिकस्त का मुंह देखना पड़ा; और कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में विधानसभा के लिए सभी उपचुनावों में कांग्रेस के हाथ विफलता ही लगी।

पर इस खंडन-मंडन को यही छोड़ते हैं। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों और उनके दूसरे वामपंथी सहयोगियों ने सही ही कहा है कि प. बंगाल में वामपंथ को मिली जबर्दस्त हार के लिए गहन आत्म विश्लेषण, और राजनैतिक, सरकारी और संगठनात्मक - सभी क्षेत्रों में अपने कामकाज की समीक्षा की जरूरत है। स्वाभाविक ही है कि एक सांगोपांग समीक्षा के लिए वामपंथी पार्टियों के नेतृत्वकारी निकायों को कुछ समय की जरूरत होगी क्योंकि संबंधित राज्यों की पार्टी इकाईयों द्वारा समीक्षा इस दिशा में पहला कदम होगा।

इस बीच कुछ बातें सुस्पष्ट हैं। वामपंथ को कुछ बुनियादी मुद्दों - जैसे कि आधारभूत जनता के साथ हमारे संबंधों और जुड़ाव, प्रशासन में पारदिर्शता, सत्ता का अहंकार और कुछ हद तक भ्रष्टाचार जो विभिन्न स्तरों पर हमारे संगठनों में घर कर गया है - पर आत्म निरीक्षण की जरूरत है। जनता के जो तबके इन तमाम तीस वर्षों में हमारा समर्थन करते रहे हैं, इन तमाम बातों के बीच परिवर्तन की भावना को पैदा किया जिसका इस बात अप्रत्याशित रूप में कहीं अधिक एकताबद्ध वाम विरोधी ताकतों ने पूरा दोहन किया है। यदि आंकड़ों को देखें तो यह काफी सुस्पष्ट है कि हर किस्म की वाम विरोधी ताकतों की एकता ने वाम मोर्चा की हार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यह चुनाव वाम मोर्चा और बाकी के मध्य एक दो-धु्रवीय लड़ाई में बदल गया। वाम मोर्चा यद्यपि 62 ही स्थानों पर जीत पाया पर उसे 41 प्रतिशत से थोड़ा अधिक मत प्राप्त हुए।

पर इससे हमें इस गलत नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए कि मतदाताओं के कुछ तबकों ने पक्ष नहीं बदला है। सबसे अधिक सुस्पष्ट शिफ्ट है मुस्लिम समुदाय की जो राज्य के कुल मतदाताओं का 27 प्रतिशत हैं। हालांकि वाममोर्चा के विरूद्ध मतदान करने के बाद भी, एक आम मुसलमान यही कहेगा कि केवल कम्युनिस्ट ही हैं जिनकी धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्धता पर उंगली नहीं उठायी जा सकती, पर वाम मोर्चा सरकार ने अपने शासन के इन तमाम वर्षों में उनके जीवन और उनकी सम्पत्ति को जो सुरक्षा प्रदान की है, वही पर्याप्त नहीं है। अन्य लोगों की तरह उन्हें भी विकास के लाभ में हिस्सा मिलने की जरूरत है। दुर्भाग्य से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बार-बार याद दिलाये जाने के बावजूद वाम मोर्चा ने शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और रोजगार जैसी उनकी बुनियादी ललक और आकांक्षाओं की अनदेखी की।

यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसके मामले में सही तरह से जुटने की जरूरत है न केवल उस समय जब हम सत्ता में वाप आते हैं बल्कि अल्पसंख्यकों के बीच हमारे कामकाज के कुल दृष्टिकोण में इस पर ध्यान रखने की और इस दिशा में जुटने की जरूरत है।

इसी प्रकार, उद्योगीकरण के प्रश्न पर पूर्ण, सम्यक एवं गहन सोच-विचार की जरूरत है। नंदीग्राम के समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक कोलकाता में चल रही थी। राष्ट्रीय परिषद ने कृषि योग्य भूमि को बचाने और बेदखल हुए किसानों के पुनर्वास के प्रश्न पर एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया था। हमें उस प्रस्ताव में प्रतिपादित दो बुनियादी बातों पर दृढ़ता से जमे रहना चाहिये। पहली बात - सरकारों के पास बुनियादी ढांचों और जनोपयोगी सेवाओं को खड़ा करने के अलावा अन्य किसी उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहण का अधिकार नहीं होना चाहिए। अन्य सभी उद्देश्यों के लिए बाजार का नियम लागू होना चाहिये। दूसरी बात - उसमें भी, बहुफसली जमीन के अधिग्रहण या खरीदारी से यथासंभव बचा जाना चाहिए। इस प्रश्न पर व्यापक गलतफहमी के कारण यद्यपि हम सत्ता खो चुके हैं, तो भी इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में अन्य अनेक नंदीग्राम और सिंगूर सामने उभर कर आ रहे हैं।

प. बंगाल में वाम मोर्चा का केवल एक ही विकल्प है और वह है एक ऐसा वाम मोर्चा जो अपने कामकाज में कहीं अधिक पारदर्शी और लोकतांत्रिक हो, जिसमें छोटे बड़े सभी भागीदारों की राय को वाजिब महत्व दिया जाये। वाम मोर्चा के घटकों की हिस्सेदारी में उनके प्रभाव की जमीनी वास्तविकता झलकनी चाहिये। वाम मोर्चा की कोई पार्टी अपने को दूसरों से बड़ा समझे इस तरह के रूख से वाम मोर्चा को और कुल मिला कर प. बंगाल की जनता को नुकसान पहुंचेगा। वामपंथ ने घोषित किया है कि वह रचनात्मक और उत्तरदायी विपक्ष की भूमिका अदा करेगा। वह जनता की उपलब्धियों की मजबूती एवं दृढ़ता से रक्षा करेगा पर तृणमूल कांग्रेस की तरह अवरोध और टकराव का रूख नहीं रखेगा। दुर्भाग्य से नये शासक गठबंधन ने इसे सही तरीके से नहीं समझा है। वाम कार्यकर्ताओं और पार्टी दफ्तरों पर हमलों की खबरें लगातार आ रही हैं।

केरल में एक बार एलडीएफ तो दूसरी बार यूडीएफ के सत्ता में आने की प्रवृत्ति रही है। इस बार केरल इस प्रवृत्ति को बदल कर इतिहास रचने के कगार पर ही पहुंच गया था। एलडीएफ केवल तीन स्थान कम मिलने के कारण सत्ता से दूर रह गया। दोनों मोर्चों को मिलके मतों का अंतर एक प्रतिशत से भी कम रहा। दोनों के बीच केवल 0.89 प्रतिशत का अंतर रहा। एलडीएफ को श्रेय जाता है कि अपनी सत्ता के पिछले पांच वषों में उसने न केवल पहले से कहीं अधिक पारदर्शी तरीके से शासन किया बल्कि आर्थिक नवउदारवाद की बुराईयों जैसे कि महंगाई, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ध्वंस और भ्रष्टाचार आदि के विरूद्ध भी उसने दृढ़तापूर्वक संघर्ष किया। एलडीएफ ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया, उसके दायरे को बढ़ाया जिससे जनता को महंगाई से बड़ी राहत मिली। हमारे विरोधियों को भी इसकी प्रशंसा करनी पड़ी। इसी प्रकार, पिछले पांच वर्षों में एलडीएफ ने घाटे में चल रहे 38 सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठानों से 33 की जीर्णोद्धार किया और वे मुनाफा कमाने लगे। इससे हजारों लोगों के रोजगार का बचाव हुआ। यूडीएफ के एक पूर्वमंत्री को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा सुनायी जाने और यूडीएफ के एक अन्य पूर्वमंत्री के यौन एवं भ्रष्टाचार घोटाले के पर्दाफाश से न केवल मुख्यमंत्री को निजी तौर पर बल्कि समूचे एलडीएफ को जनता से सराहना मिली। इन बातों के अलावा, एलडीएफ की प्रमुख पार्टियों के बीच (और पार्टियों के स्वयं के अंदर भी) यदि उद्देश्ययुक्त एकता एवं जुड़ाव कुछ और अधिक रहा होता तो उससे वाम मोर्चा को राज्य में दो मोर्चों के एक के बाद दूसरे के सत्ता में आने की आम प्रवृत्ति को रोकने में निश्चय ही कामयाबी मिल सकती थी।

इसी प्रकार तमिलनाडु का जनादेश अत्यंत स्पष्ट है। यह डीएमके के भ्रष्ट पारिवारिक शासन और कांग्रेस जैसे उसके समथर्कों-रक्षकों के विरूद्ध जनादेश है। इसी प्रकार पुडुचेरी की जनता ने एक अपेक्षाकृत ईमानदार एवं सरल व्यक्ति, जिसे कांग्रेस से निकाल दिया गया था, का वरण किया है।

असम में, कांग्रेस को विप्ख की फूट का फायदा मिला। इसके अलावा उल्फा के एक घड़े के साथ वार्ता शुरू कर टिकाऊ शांति एंव स्थिरता का जो भ्रम उसने पैदा किया, उसका भी कांग्रेस ने फायदा उठाया। असम के लोग शांति चाहते हैं। यह केन्द्र सरकार और नई राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वे असंतुष्ट तत्वों के साथ वार्ता की प्रक्रिया तो आगे बढ़ायें, राज्य में शांति को सुनिश्चित करें और सभी जातीय एवं अन्य समस्याओं का समाधान करें।

चुनाव की जीत की वास्तविक एवं काल्पनिक खुशियों और कुछ ताकतों की हार के हल्ले-गुल्ले के बीच इन चुनावों के एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम की अनदेखी नहीं करनी चाहिये। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने 24 स्थानों पर चुनाव लड़ा और 20 स्थान जीते। असम में मुस्लिम संगठन एआईयूडीएफ ने अपने स्थानों को 11 से बढ़ाकर 18 कर लिया। इसी प्रकार भाजपा के साथ गठजोड़ के ममता बनर्जी के संदिग्ध रिकार्ड के बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमानों ने उनका पक्ष लिया। इन प्रवृत्तियों पर सम्यक एवं पूर्ण अध्ययन की जरूरत है।

एक अन्य कारक है निरंतर बढ़ते मध्यम वर्ग के चरित्र और आकांक्षाओं में बदलाव। मध्यम वर्ग यद्यपि अधिकाधिक ‘उपभोक्तवादी’ और ‘कैरियर उन्मुख’ हो रहा है, सब मिला कर वह जनमत निर्माण की एक बड़ी भूमिका का निर्वाह भी कर रहा है। वामपंथ को इन रूझानों एवं कारकों पर और नई पीढ़ी पर ध्यान देना होगा।
- शमीम फैजी




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