भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 16 जनवरी 2010

बैंकों के विलय का विरोध

नयी दिल्लीः लोकसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रबोध पंडा ने स्टेट बैंक आॅफ सौराष्ट्र (रिपील) और स्टेट बैंक आॅफ इंडिया (सबिसिडयरी बैंक्स) संधोधन विधेयक, 2009 का कड़ा विरोध किया।
उन्होंने लोकसभा में प्रधानमंत्री के एक भाषण का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने भूमंडलीय आर्थिक मंदी के संदर्भ में कहा था कि हमारे देश में बैंकिग प्रणाली मजबूत है और हमें अपनी बैंकिंग प्रणाली पर गर्व है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली काफी मजबूत है। उस समय मैंने समझा था कि प्रधानमंत्री हमारे देश की बैकिंग प्रणाली को प्रमाण पत्र दे रहे हैं। लेकिन अचानक 10 जून को अखबारों में यह खबर छपी कि वित्तमंत्री ने बैंकों के सुदृढ़ीकरण के पक्ष में एक बयान दिया। वित्तमंत्री ने कहा था कि सभी बैंकों की प्रतिस्पर्धा का स्तर बढ़ाना तथा वित्तीय अस्थिरता का खतरा कम किया जा सके। ऐसा प्रतीत होता है कि भूमंडलीकरण एवं आर्थिक सुधार नीति का हम चुपचाप अनुसरण कर रहे हैं। हमारे देश के पुराने दृष्टिकोण को चुपचाप बदला जा रहा है।
जहां तक सरकारी बैंकों की बात है, भारतीय स्टेट बैंक हमारे देश का सबसे बड़ा बैंक है। शुरु में उसके सात सहयोगी बैंक थे और अब यदि हम इंदौर बैंक एवं सौराष्ट्र बैंक को छोड़ दें तो उसके पांच सहयोगी बैंक रह जायेंगे। ये बैंक हैं, स्टेट बैंक आॅफ ट्रावनकोर, स्टेट बैंक आॅफ पटियाला, स्टेट बैंक आॅफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक आॅफ मैसूर तथा स्टेट बैंक आॅफ हैदराबाद। पता नहीं सरकार के दिमाग में क्या है। क्या सरकार इन सहायक बैंकों का विलय करना चाहती है? यदि ऐसा है तो उसे स्पष्ट करना चाहिए ताकि सदन में बैंकों के सुधार के बारे में बहस हो सके। समझा जाता है कि निजी बैंकों बड़े पैमाने पर सुदृढ़ीकरण कर रहे हैं। लेकिन हमें पता नहीं कि सरकार उस रास्ते पर चलेगी या नहीं। यह कोई कैबिनेट का विषय नहीं है। यह एक बुनियादी सवाल है। इस पर संसद में ही बहस होनी चाहिए। अभी तक ऐसा नहीं हुआ है।
जहां तक भमंडलीकरण परिस्थिति का सवाल है, अभी क्या स्थिति है? भूमंडलीय स्तर पर बैंकिंग प्रणाली को गंभीर संकट का सामना करना पड़ा है। लेकिन हमें ऐसे संकट का सामना करना नहीं पड़ रहा है और इसका कारण है कि हमारे यहां सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र बैंक काफी अच्छा काम कर रहे हैं। हमारे यहां 30 सार्वजनिक क्षेत्र बैंक हैं और उनकी स्थिति अच्छी है। वे हमारे देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। वे बड़े पैमाने पर लोगों की सेवा कर रहे हैं जिनमें किसान, गरीब एवं अन्य वर्ग के लोग शामिल हैं।
छोटे-छोटे कर्ज लेने वालों की मदद करने के लिए इन बैंकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। विलय के बाद ये बैंक किसानों एवं गरीब लोगों की मदद करने लायक नहीं रह जायेंगे। जिन बैंकों का विलय किया जा रहा है वे कर्ज लेने वालों की किस प्रकार मदद कर पायेंगे? इस पहलू को समझा जाना चाहिए।
यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि पिछले साल अमरीका में बड़े बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के विफल हो जाने के बाद अमरीका ने यह महसूस किया कि छोटे बैंक के प्रबंधन की तुलना में बड़े का प्रबंधन ज्यादा कठिन है। जो बात अमरीकी अधिकारियों की समझ में आयी क्या वह बात हमारी सरकार की समझ में नहीं आ सकती? विलय के असर के कारण ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मंदी की नौबत आयी। केवल यह बात नहीं है कि विलय के कारण मानव संसाधनों का एक यूनिट के रूप में ट्रांसफर हो जायेगा। प्रबंधन का क्या होगा? कर्मचारियों का क्या होगा? कर्ज लेने वालों का क्या होगा? ये सभी पहलू विलय से जुड़े हुए हैं।
मैं सरकार से अनुरोध करना चाहूंगा कि वह इसे हल्के ढंग से नहीं ले। विलय के बारे में पूरी बहस होनी चाहिए और बिना बहस के ऐसा कोई विधयक नहीं लाया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि हजारों बैंक कर्मचारी विलय के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। वे सरकार की इस कारवाई का विरोध कर रहे हैं। वे विलय के बिल्कुल खिलाफ हैं, फिर सरकार इस संबंध में विधेयक लाने की बात क्यों सोच रही है? मैं इसका विरोध करता हूं।
रेलवे के कामकाज का
निजीकरण न किया जाये
नयी दिल्लीः लोकसभा में रेल मंत्रालय की अनुपूरक अनुदान मांगों पर बहस में हिस्सा लेते हुए सीपीआई के सदस्य प्रबोध पंडा ने कहाः
सर्वप्रथम मेरा कहना है कि यह अनुपूरक अनुदान मांग है। यह पूरा बजट नहीं है। अतः विचार-विमर्श की अत्यंत सीमित गुंजाइश है। मुझे अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र के संबंध में कई बातें कहनी है, पर मैं उस पहलू पर नहीं जा रहा हूं। क्योंकि मैं रेलवे की सलाहकार समिति का सदस्य हूं। अतः मैंने तमाम मुद्दे उठाये हैं। रेल मंत्री ने उन मीटिंगों की
अध्यक्षता की थी। अतः वे जानती हैं कि मैंने क्या कहा था। मैंने अनेक बातें कहीं। पिछले बजट भाषण में रेल मंत्री ने कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं की घोषणा की। वासुमत पिं्रटिंग्स, बर्न स्टैंडर्ड और ब्रेथवेट के अधिग्रहण के संबंध में की गयी घोषणाअओं का क्या हुआ? उच्च क्षमता वाले माल डिब्बे के निर्माण एवं आपूर्ति के लिए कोलकाता में मजेरहाट में नयी फैक्टरी के प्रस्ताव की क्या स्थिति है? डालमिया नगर में नयी फैक्टरी की घोषणा का क्या हुआ? नंदीग्राम, लालगढ़ और बेलपहाड़ी तक नयी रेलवे लाइनें बिछाने की घोषणाओं का क्या हुआ? मैं मंत्री महोदय से जानना चाहता हूं कि इन घोषित परियोजनाओं के संबंध में क्या कदम उठाये गये और उनकी क्या स्थिति है? यह सही है कि कुछ परियोजनाएं जो चल रही थी पहले ही काम कर रही हैं। रेलमंत्री को धन्यवाद है कि वे मदद कर रही है और उनका मंत्रालय भी इन परियोजनाओं को निर्धारित समय तक पूरा करने के बारे में मदद कर रहा है। पर अन्य मामले जस के तस हैं।
मैं अपने चुनाव क्षेत्र से संबंधित दो-तीन बातें रखना चाहता हूं। खड़गपुर में रेलवे के पास बहुत अधिक जमीन है। मैं खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर रेलवे द्वारा बनाये गये और बनाने के लिए रेलवे द्वारा अनुमति दिये गये अधिकृत स्टालों के संबंध में कह रहा हूं। उन्हें बिजली नहीं दी जा रही है। यदि रेलवे इन अधिकृत स्टालों को बिजली देने की स्थिति में नहीं है तो वे पश्चिम बंगाल बिजली बोर्ड को आवेदन करेंगे। उस हालत में रेलवे को उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र देना चाहिए। पर न तो उन्हें बिजली दी जा रही और न ही अनापत्ति प्रमाण पत्र। इतना ही नहीं, मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा और अन्य समय भी कहा, जो समाचार पत्रों में आया है कि वह केटरिंग (खानापान सेवा) नीति पर फिर से विचार करेंगी। रेलवे की वर्तमान केटरिंग नीति गरीब लोगों के पक्ष में नहीं है। बड़ी तादाद में बेरोजगार युवा न केवल साधारण स्टेशनों बल्कि ‘ए’ और ‘बी’ केटेगरी के स्टेशनों पर खाने पीने की चीजें बेचा करते थे। अब उन्हें खदेड़ दिया गया है। वे छोटी-छोटी ट्रालियों से अपना धंधा कर रहे थे, मेरा रेल मंत्री से अनुरोध है कि वे समस्या पर ध्यान दे ताकि ये गरीब बेरोजगार युवा अपनी रोजी-रोटी से वंचित न हों।
वासुदेव आचार्य रेलवे की आचार्य स्थायी समिति के अध्यक्ष थे। पर स्थायी समिति को केवल सिफारिश देने का ही हक है। मेरा कहना है कि यह एक वास्तविक समस्या है। मैं एक अन्य वास्तविक समस्या, जिसे मैं इस सदन में कई बार मंत्री के सामने भी उठा चुका हूं, का जिक्र करना चाहता हूं और वह यह है कि खड़गपुर में 50,000 से अधिक लोग रेलवे की जमीन पर रह रहे हैं। वे कोई आज वहां नहीं रहने लगे। उनका वहां रहना अनधिकृत हो सकता है, पर वे वहां रेलवे जंक्शन पर निर्माण कार्य के लिए आये हैं। रेलवे अधिकारी कभी-कभी उन्हें उस क्षेत्र को खाली करने की धमकी देते हैं। यह एक वास्तविक सामाजिक समस्या है। रेल मंत्री ने कई बार घोषणाएं की हैं कि रेलवे का न केवल प्रशासकीय दायित्व है बल्कि कुछ सामाजिक दायित्व भी हैं। अतः रेल मंत्री को इस समस्या पर गौर करना चाहिए।
अब मैं एक अन्य बात उठाऊंगा जो अन्य सदस्य भी इस सदन में उठा चुके हैं। आज कल रेलवे के विभिन्न कामों को निजी पार्टियों को पहले ही दिया जा चुका है। यह ठीक नहीं। रेलवे देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र संगठन है। हमें रेलवे पर गर्व है। अतः इसका निजीकरण नहीं होना चाहिए। यह एक गंभीर नीतिगत विषय है। इस विषय को रेलमंत्री को गंभीरता से लेना चाहिए। मैं सरकार द्वारा मांगी गयी अनुपूरक अनुदान मांगों पर आपत्ति नहीं कर रहा हूं। पर इन तमाम मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि इन पर ध्यान नहीं दिया जाता तो तमाम घोषणाएं बेकार है, उन्हें राजनैतिक फायदे के लिए किया गया, इसके अलावा अन्य किसी बात के लिए। यही मेरा कहना है।
जनता की सेवा हो
रेलवे का आदर्श
नयी दिल्लीः लोकसभा में रेल मंत्रालय की अनुपूरक अनुदान मांगों पर बहस के दौरान सीपीआई के सदस्य पी. लिंगम ने कहा:
मैं रेलवे को यह कहना चाहता हूं कि जनता की सेवा उसका परम-आदर्श होना चाहिए। उसे सर्वोच्च प्राथमिकता देने की जरूरत है। देश के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जहां तक रेलवे की सेवा और लाभ आज तक नहीं पहुंचे है। एक दीर्घकालीन दृष्टिकोण से रेलवे के नये रूटों की पहचान करनी चाहिए और वहां रेलवे की लाइनें बिछायी जानी चाहिए।
मेरे चुनाव क्षेत्र में वतीरायेरूप्पू सेतूर, शिवगिरि, वासुदेवनाल्लूर और पुलियांगुडी के बरास्ता मदुराई और शेनकोटा तक एक नयी रेलवे लाइन पर विचार किया जाना चाहिए और वहां रेल सेवा चलायी जानी चाहिए।
जनता की लम्बे अरसे से चली आ रही मांग है कि राजपलायम में लेवल क्रासिंग नं. 449 के स्थान पर एक फ्लाईओवर बनाया जाना चाहिए। मेरा रेलवे से अनुरोध है कि नियमों एवं सर्वे के कामों जिनमें बेवजह देरी होती है- का हवाला देने के बजाय जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस परियोजना को हाथ में लेने की कोशिश की जानी चाहिए।
रेलमंत्री नेे पहले इरोड और शेनकोट्टा के बीच एक सवारी गाड़ी चलाने की घोषणा की थी, वह अभी कागजों पर ही है। इसके बजाय इरोड और शेनकोट्टा के बीच एक्सप्रेस टेªन नं. 6609 को एक साप्ताहिक टेªक के रूप में चलाने की बात कह गयी थी, उसे भी बंद कर दिया गया है। मेरा रेल मंत्रालय से अनुरोध है कि उसे एक दैनिक सवारी गाड़ी के रूप में फिर से शुरू किया जाये। कोल्लाम और पुन्नालुर के बीच गेज बदलने का काम बड़े लम्बे अरसे से लम्बित पड़ा है जिससे उस रूट के अनेक कस्बे और गांव वस्तुतः अलग-थलक पड़ गये है, इस काम में तेजी लायी जाये।
सभी रेलवे स्टेशनों पर सेवा सुविधाओं में वृद्धि की जानी चाहिए और उनके बुनियादी ढांचे को बढ़ाया जाना चाहिए। शौचालयों, प्लेटफार्मों और छतों में सुधार किया जाना चाहिए। डिवीजनल रेलवे मैनेजर यथासंभाव ऐसे होने चाहिए जो स्थानीय भाषा को जानते है इसके बिना सेवा और जनता के बीच सही संबंध नहीं बन पाता। अतः मेरा रेल मंत्री से अनुरोध है कि डीआरएम की नियुक्ति में स्थानीय भाषण को जानने वाले लोगों को नियुक्ति करने के पहलू को ध्यान में रखा जाये।
जो स्कीमें और परियोजनाएं लम्बे अरसे से लम्बित पड़ी है। पर्याप्त पैसे से देश अनेक काम में तेजी लायी जानी चाहिए। रेलवे को सुनिश्चित करना चाहिए कि इसकी सेवाओं के निजीकरण की प्रवृत्ति को खत्म किया जाये, रेलवे में खानपान की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जाये।

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डाॅ. रशीद जहाँ और प्रगतिशील आन्दोलन

रशीद जहाँ और प्रगतिशील आन्दोलन एक ही तस्वीर के दो पहलू - कि दोनों को अलग करके देखा नहीं जा सकता, परन्तु यह कहना मुश्किल है कि रशीद जहाँ जो कुछ थीं, उसे प्रगतिशील आन्दोलन ने बनाया, सच यह है कि इस आन्दोलन ने उन्हें एक नया जोश और दृष्टिकोण ज़रूर दिया वर्ना तरक़्क़ीपसन्दी, रौशनख्याली और आजादी तो वह अपनी विरासत में, बल्कि खून में लेकर आयी थीं। उनके पिताा शेख़ अब्दुल्ला न सिर्फ आजाद ख्याल, बल्कि औरतों की शिक्षा के बड़े हामी थे। वह औरतों में जागृति लाने के लिए बाक़ाइदा ‘खातून’ नाम की पत्रिका निकालते थे। अलीगढ़ कालेज में औरतों का विभाग खुलवाने का सेहरा भी उन्हीं के सर जाता है। रशीद जहाँ की माँ वहीद जहाँ बेगम जो आला बी के नाम से मशहूर थीं, उन्होंने मदरसे की बुन्याद में अपने पति की बड़ी मदद की, वह भी औरतों की शिक्षा की बड़ी हामी थीं। आला बी के भी बड़े कारनामे हैं, गरज़कि रशीद जहाँ का पूरा खानदान, ता’लीम, औरतों की शिक्षा, आजादी और रौशनख्याली का बड़ा हामी था। और उनकी हिमायत केवल जबानी न थी, बल्कि अमली सतह पर इसके बड़े कारनामे हैं जिसकी एक अलग तारीख है। ऐसे ही माँ-बाप की बड़ी बेटी थीं रशीद जहाँ, जिन्होंने एक बार खुद कहा था, ”हमने तो जब से होश संभाला, हमारा तो तालीमे-निस्वाँ का ओढ़ना है और तालीमे-निस्वाँ का बिछौना।“
शिक्षा बुन्यादी शै जरूर है, लेकिन शिक्षा के साथ तबीयत और उस तबीयत को वक्त की मांग और जमाने के तकाजे के साथ मुल्क व मुआशरत और इन्सानियत के हवाले से एक विज़न और फिर मिशन का रूप दे देना बिलकुल अलग और गैरमा’मूली बात है। रशीद जहाँ के साथ और भी लड़कियाँ रही होंगी, खुद उनकी बहनें, लेकिन उनमें कोई रशीद जहाँ न बन सकी। यहीं से अकेलेपन, नाफर्मांनी और सोची-समझी सरकशी व बगावत के सिलसिले शुरू होते हैं। आखिर क्या कारण है कि अभी वह अलीगढ़ में ही थीं और उनकी उम्र चैदह साल की ही थी कि वह बकाइदा मुल्क व कौम से दिलचस्पी लेने लगी और कौमी तहरीक से आकर्षित हुईं। गाँधीजी के करीब हुईं और बाकाइदा खद्दर पहना। इन सब चीजों को उस समय और रौशनी मिली जब 1923 में अलीगढ़ छोड़कर लखनऊ आयीं जहाँ उन्होंने इज़बेला थाबर्न काॅलेज में एडमिशन लिया ताकि वह डाॅक्टरी पढ़ सकें। लखनऊ के लगभग खुले माहौल में उन्हें अलग-अलग किस्म की किताबों पढ़ने का शौक हुआ जिसमें साहित्यिकता खास विषय था। इसी उम्र और इसी जमाने में उन्होंने अंग्रेजी में एक कहानी ‘सलमा’ लिखी जो बाद में उर्दू में भी छपी। 1923 में महज अठारह साल की उम्र और प्रगतिशील आन्दोलन के लगभग तेरह साल पहले लिखी गई कहानी में केवल औरत की लाचारी ही नहीं, बल्कि जागृति का एक पैगाम था। लखनऊ से निकल कर वह देहली आ गयीं, जहाँ वह 1924 से लेकर 1929 तक लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज की छात्रा रहीं। वह केवल डाॅक्टरी की शिक्षा नहीं हासिल कर रहीं थीं, बल्कि समाज के दूसरे पहलूओं पर भी नजर रखती थीं। हमीदा सईदुज़्ज़फर कहती हैं:
”उनका रूज्हान फ़ितरी तौर पर तिब के अमली और समाजी पहलुओं की ओर ज़्यादा था। वह एक मिसाल से वाज़ेह हो जायेगा। वह मेडिकल काॅलेज के चैथे साल की तालबा थीं कि एक नौजवान लड़की अस्पताल के ‘शोबए-अमराजे़-चश्म’ में दाखिल हुई। दरअस्ल उसकी आँखों में कोई ख़राबी नहीं थी, लेकिन उसने अपनी आँखों में कुछ ऐसी चीज़ें डाल ली थीं कि जिनके सबब उसे अस्पताल में दाखिल कर लिया गया था। जल्द ही वह अच्छी हो गयी, लेकिन उसने अस्पताल छोड़ने से इन्कार कर दिया। जब उसे मज्बूर किया गया, तो वह रशीदा के पास आयी और उनसे बताया कि वह किसी तरह घर से भाग कर आयी है और बाप उसे परेशान करता रहता है। अतः उसने तै कर लिया है कि वह अब यहाँ से कहीं और चली जायेगी। उसकी दर्दनाक कहानी सुनकर रशीद इतना मुतस्सिर हुईं कि फ़ौरन ही शाम की गाड़ी में उसे लेकर अलीगढ़ चली आयीं। यहाँ आला बी ने उसे अपनी निगरानी में रखा, यहाँ तक कि वह अपने पैरों पर खड़ी होने के क़ाबिल हो गयी।“
एम.बी.बी.एस. करने के बाद उन्हें जल्द ही सरकारी नौकरी मिल गयी और वह कानपुर, बुलन्दशहर होते हुए लखनऊ में तैनात हुईं। सज्जाद ज़हीर उन दिनों शिक्षा प्राप्ति के लिए लन्दन में रहते थे और छुट्टियों में लखनऊ आये हुए थे, अतः यहीं रशीद जहाँ की मुलाकात सज्जाद ज़हीर, सईदुज़्ज़फ़र, अहमद अली आदि से हुई। यह मुलाकात ‘अंगारे’ के संस्करण और उसके बाद के हादिसात महज इत्तिफाकात न थे, बल्कि इन सब के पीछे नौजवानों के जेहन में परवरिश पाए हुए वे ख्यालात थे जो बचपन से ही उन्हें इन्सानियत के लिए बेचैन किये हुए थे। रशीद जहाँ का यूँ इतनी जल्दी और निडरपन के साथ ‘अंगारे’ के ग्रुप में शामिल हो जाना और दो अहम लेखन के जरिए उसकी छपाई में शामिल होना सब कुछ अपने आप न था, बल्कि इसके पीछे खुद रशीद जहाँ की अपनी व्यक्तिगत सोच व फ्रिक्र, रूज्हान व तबींयत काम कर रही थी। इन दोस्तों से मुलाकात ने उसे और ज्यादा बढ़ावा दिया और वह निडर होकर इस आग में कूद पड़ीं। ‘अंगारे’ के साथ जो हादिसा हुआ और उसकी जो प्रतिक्रिया हुई, उसकी भी अपनी एक तारीख है। लेकिन उसका एक दिलचस्प और अर्थपूर्ण पहलू यह भी है कि सज्जाद ज़हीर, अहमद अली की कहानियों के मुकाबले रशीद जहाँ की कहानियों की धार उतनी तेज न थी, जितनी कि उन्हें कठिनाई पहुँचाने की कोशिश की गई। रशीद जहाँ अँगारे-वाली के खिलाफ फतवे, फैसले और जान से मार डालने की धमकी आदि-आदि।
जाहिर है, इसके पीछे कमजोर व नासमझ लोगों की खराब भावना तो काम कर ही रही थी, सदियों के मर्दाना समाज की झूठी शान व शौकत काम कर रही थी और खोखली सामुदायिक संस्कृति का चुरमुराता हुआ निज़ाम भी हिचकियाँ ले रहा था। रशीद जहाँ शुरू से ही इन पहलुओं पर गौर करती आयी थीं। अच्छी शिक्षा, संस्कार और खुद उन की तबीयत ने उन्हें बेबाक और निडर बना दिया था। अतः वह इस हादिसे से बिल्कुल न डरीं। बेख़ौफ़ होकर घूमती रहीं। हाजरा बेगम लिखती हैं:
”‘अंगारे’ शाए करते समय खुद सज्जाद ज़हीर को अन्दाजा नहीं था कि वह एक नई अदबी राह का संगेमील बन जायेगा। वह ख़ुद तो लन्दन चले गये, लेकिन यहाँ तहलका मच गया। पढ़ने वालों की मुखालफत इस कदम बढ़ी कि मस्जिदों में रशीद जहाँ-अँगारे वाली के खिलाफ वाज़ होने लगे..... फतवे दिये जाने लगे और ‘अंगारे’ जब्त हो गयी। उस वक्त तो वाकिई ‘अंगारे’ ने आग सुलगा दी थी।“
‘अंगारे की छपाई और हँगामा महज़ एक समाजी हादिसा न था। हाजरा बेगम का कहना है:
”आज ‘अंगारे’ पढ़ कर इस तरह ताज्जुब होता है जैसे डी.एच.लाॅरेन्स की किताब ‘वेल आॅफ लवलीनेस’ को पढ़ कर कि किताब ने क़यामत बरपा कर दी थी।“
आखिर कोई बात तो थी कि एक तरफ ‘अंगारे’ के खिलाफ आग सुलग रही थी, तो दूसरी ओर बाबाए-उर्दू मौलवी अब्दुल ह़क उस पर प्रशंसनीय टिप्पणी कर रहे थे। मुंशी दयानारायण निगम ने भी ‘जमाना’ में प्रशंसनीय टिप्पणी की:
”चार नौजवान मुसन्निफों ने, जिनमें एक लेडी डाॅक्टर भी हैं, ‘अंगारे’ नाम से अपने दस किस्सों को किताबी सूरत में शाए किया। इनमें मौजूदा जमाने की रियाकारियों पर रौशनी डालने, मुरव्विजा रस्म व रिवाज की अन्दरूनी खराबियों को बेनकाब करने की कोशिश की गई थी। हमारे नाम-निहाद आला तबके की रोजमर्रा मआशरत के नकायस का मज़ह़का उड़ाया गया था। गो इस मज्मुए का तर्जेबयान अक्सर मकामात पर सूकयाना था, जो मजाक़े-सलीम को खटकता था, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि नौजवाने-आलम ने दुन्या में जो अलमे-बगावत बलन्द कर रखा है, उसी का एक अदना करिश्मा इस किताब की इशारा है।“
‘अंगारे के विरोध में जितना लिखा गया, इसके पक्ष में बहुत कम, लेकिन इसके बावजूद ये कहानियाँ बड़ा काम कर गयीं और उर्दू कहानी के इतिहास में मील का पत्थर बन गयीं।
‘अंगारे’ के पब्लिशर सज्जाद जहीर थे, जिन्होंने कहा था- ‘समाजी रज्अत परस्ती और दकियानूसियत के खिलाफ गुस्सा और हैजान का बेबाकाना इज़्हार था।’ अहमद अली ने भी अगस्त 1934 के ‘साकी’ में एक लेख लिखा था:
”कुछ अर्सा हुआ जब चन्द लोगों ने उर्दू की ज़िन्दगी में शायद पहली मर्तबा सही मज़्मून में ओरिजिनल अफ़साने लिखकर अपने मुल्क की मौजूदा दिमागी, रोेमानी, मुआशरती और अख़्लाक़ी जिन्दगी की असलियत को पेश किया, तो लोगों ने वो हाय-तौबा मचाई कि कुछ अर्सा तक कान पड़ी आवाज तक सुनाई न देती थी, क्योंकि लोगों के कान, आँखें और दिमाग झूठ के आदी हो चुके थे। वे हकीकत की इस इस तेज रौशनी को बरदाश्त न कर सके जो आँखों को चकाचैंध कर देती और दिमाग को हिला देती है।“
प्रोफेसर कमर रईस ने बड़े अच्छे अन्दाज में कहा है:
”यह नई नस्ल ज्यादा सरकश, बेबाक और खुद आगाह थी, मार्क्सिज्म या इश्तेराकियत ने इसे इन्सानी समाज और उसके मसाइल के इदराक व शुऊर की जो सलाहियत दी थी, उसकी बुन्याद साइंसी और अक़्ली तरीके़कार पर थी। हरचन्द कि यह बसीरत जो अभी अपने बिल्कुल इब्तिदाई मर्हले में थी, नौजवानों के जोश में दबी हुई थी। ताहम वे एक रौशन और वाज़ेह शुऊर की तरफ बढ़ रहे थे।“
इन तहरीरों की रौशनी में ‘अँगारे’ की इशाअत और उसकी ऐतिहासिक व साहित्यिक अहमियत का अन्दाजा हो जाता है। जैसा कि कहा गया कि इन तहरीरों की गाज सबसे ज्यादा रशीद जहाँ पर गिरी, लेकिन वह निडर औरत थीं। इन धमकियों और विरोध ने उनकी हिम्मत, फिक्र व नजर को और ज्यादा मजबूती व बढ़ावा दिया और वह अपनी तमाम मसरूफ़ियत के बावजूद अफ़साने लिखती रहीं और इस तरह उनका पहला संग्रह ‘औरत’ 1937 में लाहौर से निकला। लेकिन इससे पहले भी बहुत कुछ हो गया। ‘अंगारे’ के नफरत भरे हंगामों के बीच मुहब्बत का फूल खिला रशीद जहाँ और महमूदुज़्ज़फ़र एक दूसरे के करीब आये और 1934 में शादी कर ली।
‘औरत’ संग्रह में इनकी एक कहानी ‘सौदा’ है जो बेबाक और खतरनाक कहानी है। एक जगह पर इस तरह के वाक्य आते हैं:
”जान! यहाँ बुर्का उतार दो - यहाँ कौन बैठा है?“ उन मर्दों में से एक ने कहा, ”क्यूं प्यारी, एक बोसा दोगी?“ की सख्त आवाज एक अर्सा के बाद मेरे कानों में आयी, ”ए हे हम आये काहे को हैं - तुम लोगे तो हम देंगे।“ एक बुर्कापोश ने जिसकी आवाज बिल्कुल बेहिस और मुर्दा थी, जवाब दिया।
इन वाक्यों से उन औरतों को जिन्हें आज की ज़बान में सेक्स वर्कर कहा जाता है, की तस्वीर सामने आती है। यहां पर उनकी आवाज की बेहिसी और मुर्दनी बड़ी अर्थपूर्ण है और साथ ही बुर्का को लाकर पर्दा की जिस खास सभ्यता का मजाक उड़ाया गया है, उसकी तरफ नंगा इशारा है। और कहानी ज्यादा समझ में भी आती है। इस दौर तक रशीद जहाँ ने इश्तेराकियत को पढ़ जरूर लिया था, लेकिन अनुभव फिर भी सीमित था। हाजरा बेगम ने लिखा है कि वह मजदूर को एक मरीज की हैसियत से ज्यादा जानती थीं, साथ लड़ने वाले दोस्त की तरह नहीं। मार्क्सिज्म की थ्योरी को उन्होंने जरूर पढ़ा था, लेकिन उनको अमलीजामा पहनाने का उन्हें मौका नहीं मिला था। शायद इसीलिये उनकी शुरू की कहानियों में कुछ कमी का एहसास होता है। इस कहानी की नंगी वार्ता इसका उदाहरण है। लेकिन इनकी बाद की कहानियों में इस कमी का एहसास रूख्सत होता जाता है और एक खास किस्म की दार्शनिक मजबूती ही नहीं, फ़न्नी चाबुकदस्ती और दृढ़ किरदारसाजी नजर आने लगती है। ये सब यूं ही नहीं होता, जल्द ही फिक्र व अमल की वह मंजिल आती है, जब वह दोबारा सज्जाद जहीर और उनके दोस्तों से मिलती हैं और बाकाइदा प्रगतिशील आन्दोलन की बुन्याद रखने में बड़ा और अहम रोल अदा करती हैं।
सज्जाद जहीर शिक्षा पूरी करके इलाहाबाद वापस आ चुके थे, लेकिन इससे पहले लन्दन में ही प्रगतिशील लेखक संघ की बुन्याद डाल चुके थे और इसका मेनीफे़स्टो हिन्दुस्तान में अपने खास दोस्तों को भेज चुके थे। महमूदुज़्ज़फ़र और रशीद जहाँ उनके खास दोस्तों में थे। इलाहाबाद में वह फिराक गोरखपुरी और एजाज़ हुसैन से मिले, मेनीफेस्टो पर बात की और संघ का इरादा जाहिर किया। उन्हीं दिनों इलाहाबाद में हिन्दुस्तानी एकेडमी ने हिन्दी, उर्दू भाषाओं की एक कांग्रेस बुलाई जिसमें प्रेमचन्द, जोश, अब्दुल हक, दयानारायण निगम, रशीद जहाँ आदि इलाहाबाद आये, सज्जाद जहीर लिखते हैं:
”रशीद जहाँ अमृतसर से आयी थीं। हम चाहते थे कि इस इज्तिमा के मौके पर अदीबों से हमारी गुफ्तगू और बहसें हो और इनमें वह भी शरीक हों ताकि पंजाब जाकर वह वहाँ के अदीबों से हमारा राबिता काइम कर सकें। अब मुझे याद नहीं कि हम यानी रशीद जहाँ, अहमद अली, फिराक और मैं इस कान्फ्रेंस में आने वाले अदीबों में से किन-किन से मिले और उनसे क्या-क्या बातें हुईं? लेकिन मुंशी प्रेमचन्द से पहली मुलाकात मेरे दिल पर नक़्श है।
रशीद जहाँ जो सही तौर पर हिन्दुस्तानी एकेडमी की मेहमान थीं, इलाहाबाद पहुंच कर संघ के सम्बन्ध में मेज़बान बन गयीं। इस पूरे किस्से का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि अंग्रेजी साहित्य के मर्द उस्ताद अहमद अली ‘अँगारे’ के हंगामे से घबरा कर एकान्त की जिन्दगी बसर कर रहे थे और औरत रशीद जहाँ जो ‘अँगारे’ के हादिसे का सबसे ज्यादा शिकार हुईं, वह बेखौफ व निडर होकर आजादी से आन्दोलन व संघ के मुआमलात में पेश-पेश थीं। इलाहाबाद से ससज्जाद जहीर के घर पर मीटिंग में उनका अहम रोल था, खास तौर से मौलवी अब्दुल हक को बुलाने में उन्हीं का हाथ था। और मौलवी साहब मेनीफेस्टो पर हस्ताक्षर करने वाले पहले व्यक्ति थे और इन्होंने एक बड़े काम का उपदेश भी दिया था - ‘ऐलान शाए’ करने, अन्जुमन बनाने और जल्से करने से ज्यादा जरूरी है कि हम उस अदब की तख्लीक के लिये मेहनत करें जो हमारे नजदीक सही और जरूरी है।’ प्रेमचन्द, जोश और अब्दुल हक के हस्ताक्षर ने पूरे हिन्दुस्तान के अदीबों को संघ के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया। हालात ही कुछ ऐसे थे। वक्त का मिजाज और तेवर भी संघ के हक और पक्ष में था।
जनवरी 1936 में सज्जाद जहीर पंजाब गये तो रशीद जहाँ और मजमूदुज़्ज़फ़र के मेहमान हुए और वहाँ के साहित्यकारों व शाइरों से मुलाकातें कीं। उन मुलाकातों में सब से दिलचस्प मुलाकात फै़ज़ से थी, अतः मुलाकात हुई। खामोश, शर्मीले फैज उन दिनों इस इश्क में मुब्तला थे और इश्किया शाइरी में शराबोर थे। एक दिन रशीद जहाँ ने डांटते हुए कहा, ‘यह क्या मामूली से इश्क में मुब्तला हो, इन्सानों से प्यार करो।’ यह कह कर उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी का मेनीफेस्टो और माक्र्स की किताब थमा दी। फैज ने जब उसे पढ़ा तो फैज का कहना है:
”यह किताब मैंने पढ़ी, बल्कि दो, तीन बार पढ़ी। इन्सान और फितरत, मर्द और मुआशरा, मुआशरा और तबकात, तबके और जराए-पैदावार की किस्म, जराए-पैदावार और पैदावारी रिश्ते, पैदावारी रिश्ते और मुआशरे का इर्तिका, इन्सानों की दुन्या के पेच-दर-पेच और तह-दर-तह रिश्ते-नाते, कद्रें, अकीदे, फिक्र व अमल वगैरह-वगैरह के बारे में यूं महसूस हुआ कि किसी ने इस पुरे खज़ीनए-असरार की कुंजी थमा दी। यूं सोशलिज्म और मार्कसिज्म से अपनी दिलचस्पी की शुरूआत हुई। फिर लेनिन की किताबें पढ़ीं - ये सब कुछ पढ़ कर, सुन कर हमने उस दूसरी तस्वीर में रंग भरने शुरू किये। एक आजाद, गैर तबकाती मुआशरे की तस्वीर - जहाँ कोई सरमायादार नहीं, कोई जागीरदार नहीं और कोई जमींदार नहीं। न कोई आका है, न कोई बन्दा, न कोई तलासे-मआश में सरगर्दा, न फिक्रे-फर्दा में गिरिफ्तार, जहाँ मजदूर, किसान राज करते हैं और हर मुआमला उनकी मर्जी से तय पाता है।“
फैज जो बाद में प्रगतिशील आन्दोलन के सबसे बड़े और प्रसिद्ध शाइर बन कर उभरे, उनको प्रगतिशील फिक्र और आन्दोलन की ओर आकर्षित करने का सेहरा रशीद जहाँ के सर जाता है। बाद में फैज, सज्जाद जहीर, महमूदुज़्ज़फ़र और रशीद जहाँ लाहौर भी गये और वहां के अदीबों, शाइरों से मिले और देखते-देखते उन नौजवानों की गैर मामूली कोशिशों से पंजाब प्रगतिशील अदीबों व शाइरों का बहुत बड़ा केन्द्र बन गया। ‘रौशनाई’ में सज्जाद जहीर लिखते हैं:
”हम खुश और मुत्मईन थे, रशीद फैज को छेड़ रहीं थीं। अब यह हज़रत भी किसी कदर पिघले और बोलने-चालने पर रजामन्द से मालूम हो रहे थे। लेकिन हम में से किसी को यह वहम व गुमान भी नहीं था कि लाहौर की अदब-परवर जमीन पर यह वह पहला लगजीदा कदम है जो बाद को उर्दू अदब के सुनहरे खोशों का अम्बार लगा देगा। चन्द साल के अन्दर-अन्दर यहीं से कृष्णनदर, फैज, बेदी, नदीम कासिमी, मिर्जा अदीब, जहीर काश्मीरी, साहिर लुधियानवी, इब्ने-अन्शा, मख्मूर जालन्धरी, आरिफ अब्दुल मतीन, रहबर, अश्क वगैरह जैसे शाइरों और अदीबों ने तरक्कीपसन्द अदब के अलम को इतना ऊँचा किया कि उसकी दरखशाँ बुलन्दियाँ हमारे वतन के दूसरे हिस्सों के अदीबों के लिए काबिले-रश्क बन गयीं।“
यह सही है कि यह संघ उस समय बना, जब इसकी आवश्यकता थी, लेकिन यह भी सही है कि अगर इन कुछ नौजवानों ने, जिनमें रशीद जहाँ भी थीं, गैर मामूली मेहनत और कमिटमेंट का सुबूत न दिया होता, तो यह पौधा आसानी से बर्ग व बार नहीं ला सकता था। रशीद जहाँ और मजमूदुज़्ज़फ़र के लिये सज्जाद जहीर लिखते हैं:
इन दोनों ने अपनी जिन्दगी का मक़्सद जैसे अपनी ज़ात को भुला कर इन्सानियत को बना लिया था जिसे फारिगुलबाली या खानगी इत्मीनान कहते हैं। वे उनकी किस्मत में नहीं थे। आयंदा जो जमाना आने वाला था, वह महमूद के लिये कैद व बन्द, मेहनत व मशक्कत और कौमी कामों के सिलसिले में फिक्र व तदद्दुद का जमाना था। रशीदा के लिये तवील तनहाइयों, माली मुश्किलात और जिस्मानी कुल्फत का। मगर वह अमृतसर हो या देहरादून या लखनऊ जब भी उनके घर जाओ, तो महसूस होता था कि खुशी वहाँ तैर रही है। ऐसी खुशी जो दो दिलों के मेल और दो दिमागों की हम आहंगी से शफ़्फ़ाफ ठंडे पानी के चश्मे की तरह फूट निकलती है और जो दूसरे अफसुर्दा या गमगीन रूहों को भी सैराब करके उनमें तरन्नुम और बालीदगी पैदा कर देती है।
इन तमाम दिक्कतों और कैफीयतों के बावजूद रशीद जहाँ ने लखनऊ की पहली और ऐतिहासिक कांफ्रेंस के एहतिमाम में बड़ा रोल अदा किया। कान्फ्रेंस का एहतिमाम अपने आप में मुश्किल और पेचीदा काम होता है। और उस समय जब मुल्क व समाज अलग-अलग धारों और गलतफहमियों में घिरे हों, तहरीके-आजादी जोर-शोर से आगे तो बढ़ रही थी, लेकिन नाॅन काॅपरेशन और खिलाफत की तहरीकें, दहशतपसन्द नौजवानों की इंकिलाबी तहरीक, हिन्दू व मुस्लिम फ़सादात ने फ़जा में जहर और अंग्रेजी हुकूमत को मजबूत कर रखा था। ऐसे में किसी नई तहरीक का काइम होना बेहद मुश्किल काम था। उर्दू अदब में यूं भी एक ख्याल आम था कि शाइर को तो बस शाइरी करना चाहिये, सियासत, जलसे, जुलूस आदि से दूर रहना चाहिये। सज्जाद जहीर ने लिखा है:
शुरू-शुरू में तो प्रेमचन्द का यही खयाल था और गालिबन मौलवी अब्दुल हक साहब भी यूँ ही सोचते थे, लेकिन हालात और वाकिआत ने हमें इन ख्यालात में तरमीम करने पर मजबूर किया। 1935 से ’36 के करीब का जमाना हमारे मुल्क के नौजवान दानिश्वरों के लिये बहुत बड़ी जेहनी छान-बीन, खोज, तब्दीलियों और जिन्दगी की नई राहों के दरयाफ्त करने का ज़माना था।
इन हालात में न सिर्फ कांफ्रेंस करना और प्रेमचन्द को अध्यक्षता के लिए तैयार करना, कई भाषाओं के बड़े-बड़े अदीबों का सम्मिलित होना अपने आप में गैर मामूली बात तो थी ही - एक इतिहास लिखा जा रहा था और इस इतिहास को लिखे जाने में रशीद जहाँ का कलम और कदम दोनों काम कर रहे थे। वह लखनऊ गयीं। हाजरा बेगम के साथ मिलकर टिकट बेचती रहीं। चैधरी मुहम्मद रूदौलवी को अध्यक्ष, स्वागत कमेटी बनने पर इन्होंने ही मजबूर किया। एक सेवक की तरह वह कांफ्रेंस के इंतिजाम देखती रहीं। कांफ्रेंस कामयाब हुई और खूब कामयाब हुई। प्रेमचन्द का खुलबा, प्रेमचन्द की नजदीकी, प्रेमचन्द का व्यक्तित्व - इन सबने नौजवानों और खासकर रशीद जहाँ को बेहद आकर्षित किया। कांफ्रेंस के बाद वह उनसे बहुत करीब और बेतकल्लुफ हो गयीं। प्रेमचन्द की मौत से उन पर गहरा असर हुआ। उन्होंने एक उम्दा लेख भी लिखा, जिसमें एक जगह लिखती हैं:
मुझे मुंशी प्रेमचन्द से मिलने का शौक था। बचपन से उनके नाम से वाकफियत थी। प्रेमचन्द इतना बड़ा मुसन्निफ, हमारी कांफ्रेंस का सद्र, हमारी खुशी की कोई इन्तिहा न थी। प्रेमचन्द के आर्ट में एक बेमिसाल चीज - जमाने की तब्दीलियों का असर था। बूढ़ी काकी, सुब्हे-अकबर, बाजारे-हुस्न लिखने का एक वक्त था। जमाना बदला। कांग्रेस आयी। पोलिटिकल जिद्दोजहद और कशमकश के जो नक्शे प्रेमचन्द के यहाँ मिलते हैं, वोह किसी के यहाँ नहीं। आजकल के जवानों में पिछले दस साल के जवानों से फर्क है। उसी तरह अगर आज प्रेमचन्द होते, तो उनके अफसाने भी जमाने के साथ बदलते रहते - हम लोग उनकी मौत से इतने गमगीन हैं, तो उनके देरीना इल्मी और शख्सी दोस्तों और अजीजों के गम का अन्दाजा लगाना मुश्किल है। एक बड़ा और अच्छा मुसन्निफ मर गया। ताजवाब और बेमिसाल शख्सियत भी मुसन्निफ के साथ चली गयी।
कांफ्रेंस के बाद वह देहरादून चली गयीं, जहां वह अदीब कम, सियासी कारकुन ज्यादा बन गयीं। उनकी जिन्दगी कई भागों में बंटी थी। अदीब, डाॅक्टर और सियासी कारकुन। समाजी और अमली काम तो किये ही। लखनऊ में रहने के दौरान उन्होंने अफसाने और ड्रामे भी लिखे। यह जमाना उनकी रचनाओं की ऊँचाई का जमाना था।
इसी जमाने में उन्होंने चोर, वह, आसिफजहाँ की बहू, छिद्दा की माँ, इफ्तारी, मुजरिम कौन, मर्द औरत, सिफर जैसी उम्दा कहानियां लिखीं और कुछ बहुत अच्छे ड्रामे। अब इन कहानियों में पहले वाली जज्बातियत व जानिबदारियत न थी, बल्कि मजबूती व ताजगी थी और हकीकत भी। ‘सौदा’ जैसी शुरू की कहानियों में नकाब पहने मर्दो के बीच घिरी औरत अब गहरे समाजी शुऊर के हवाले से ‘वह’ का रूप ले चुकी थी। और ड्रामा ‘औरत’ की हिरोइन तो अपने मौलवी शौहर से तेवर के साथ कहती है - ”जरा संभल कर मैं कहती हूं, बैठ जाओ, अगर अपनी इज्जत की खैर चाहते हो, अगर इस बार तुमने हाथ उठाया तो मैं जिम्मेदार नहीं।“ इन कहानियों और ड्रामों को पढ़िये, तो एकतरफा गम व गुस्सा या एहतिजाज नहीं उभरता, बल्कि पूरे समाजी निज़ाम के हवाले से मर्द और औरत के रिश्ते, अमीर और गरीब के बीच की दीवार, भूख-प्यास और जिन्दगी की वह कद्रें जहाँ इंसानियत दम तोड़ रही थी, तभी तो कहानी ‘इफतारी’ में नसीमा का नन्हा बच्चा असलम उससे पूछता है:
”माँ दोज़ख़ क्या होती है?“
”दोजख-! दोजख, वह तुम्हारे सामने ही तो है।“
”कहाँ-?“
”वह नीचे, जहां अन्धा फकीर खड़ा है। जहां वह जुलाहे रहते हैं और जहां वह अंग्रेज रहता है और लोहार भी“
दोजख की आग दरअस्ल भूख की आग है।
ड्रामा ‘काँटे वाला’ के यह डायलाॅग देखिये:
”सांस लेना बगावत है, तो मैं पूछता हूँ, फिर मौत क्या है? यह सब भूख को दबाने के बहाने हैं, लेकिन भूख दबती नहीं, गला दबाने से चीख बन्द नहीं हो जाती, बल्कि और दुगुनी हो जाती है। भूखे की चीख, मरते हुए की चीख - जिंदा आदमियों से ज्यादा भयानक है।“
अब उनकी कहानियों और ड्रामें मेें खराबिये-निज़ाम को बदलने और एक नये अवामी निजाम को बनाने की इच्छा दिखाई देती है। कहानी ‘सिफर’ (जिसके केन्द्रीय पात्र के बारे में यह ख्याल आम है कि वह सज्जाद जहीर का किरदार है) में इस फल्सफे को बड़े सलीके से कहानी की सूरत में पेश किया है। बेचैनी, संघर्ष, भूख-प्यास, खराबी, नाबराबरी, गम व गुस्सा, इश्क व मुहब्बत, किन्तु जीवन का कोई भी तरीका व फल्सफा रशीद जहाँ की कहानियों में बड़ी सादगी और आम बोलचाल की जबान से उभर कर आकर्षक और अर्थपूर्ण अन्दाज में पढ़ने वाले के दिल में जगह बना लेना है। ‘चोर’, ‘वह’ ऐसी कहानियां हैं, जिनके केन्द्रीय पात्र मुद्दतों दिमाग से सवार रहते हैं।
रशीद जहाँ ने कहानियां कम ही लिखीं, लेकिन इन कम कहानियों में भी विषय, पात्र, भाषा की रंगारंगी, फैलाव, संजीदगी और गहराई के खूब-खूब नमूने देखने को मिलते हैं। फिक्र व खयाल, कल्पना व ध्यान के दिलचस्प करिश्मे, समझने और समझाने के अर्थपूर्ण तज्रबे, इंसानी जिन्दगी के बिगड़े हुए और गन्दे चेहरे, बदलते रिश्ते, बदलते हुए मर्द और औरत दिखाई देते हुए मिलेंगे। और जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ किसी किस्म की सड़ांध काम कर रही है, इस हकीकत से भरी तस्वीरें दिखाई देती नजर आयेंगी। जिन पर रशीद जहाँ का साइंसी ज्ञान, दृष्टिकोण और उनके व्यक्तित्व की खास जुर्रत का एक दिलकश रंग व रोगन चढ़ा हुआ नजर आयेगा।
यह एक सच्चाई है कि रशीद जहाँ औरत थीं और इनकी कहानियों का केन्द्र बिन्दु भी औरत ही है, लेकिन इस सिलसिले में उनका बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने सबसे पहले अपने आप को पुराने किस्म की औरतों की लाइन से अपने आप को अलग किया, हद यह है कि अपने से सीनियर औरत-कहानीकारों की लाइन में खड़ा रहना भी पसन्द नहीं किया, क्योंकि उनकी तान अधिकतर औरत की जायज और नाजायज हिमायत और उनकी गैर मामूली बेगुनाही और बेबसी पर टूटती है, जहां औरत सिर्फ बेगुनाह और बेकुसूर है। लेकिन रशीद जहाँ ने सबसे पहले अपनी आँखों से बेकार की हिमायत का पर्दा हटाया और हकीकत की ऐनक लगाई और पूरी ईमानदारी और सच्चाई से उनको देखा, परखा और पूरे इंसाफ और एतिदाल के साथ उन पर कदम उठाया। सिर्फ उनके पक्ष में ही नहीं, बल्कि उनके विरोध में भी। प्रोफेसर कमर रईसा का ख्याल है कि -
तरक्कीपसंद अदीबों में प्रेमचन्द के बाद रशीद जहाँ तन्हा थी, जिन्होंने उर्दू अफसानों में समाजी और इंकिलाबी हकीकत निगारी की रवायत को मुस्तहकम बनाने की सई की।
उर्दू में पहली बार एक इंकिलाबी और साइंसी जेहन रखने वाली खातून ने जिन्दगी को उस तारीखी और मादूदी अवामिल के तनाजुर में देखा, इसलिये उनकी नजर उन पहलुओं पर गई जिन पर न सिर्फ मर्द, बल्कि खातून अफसानानिगारों की रसाई भी नहीं हो सकती थी।
इतनी कम मुद्दत में रशीद जहाँ का यह जेहनी व फितरी विकास मार्कसिज्म के पढ़ने और प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़ाव से ही मुमकिन था। उन्होंने कम लिखा, लेकिन ऐसा लिखा कि आने वाली नस्ल या खासकर औरतों की नस्ल गैर मामूली तौर पर आकर्षित हुई। ऐसे निडर और यादगार कारनामों के कारण वह औरतों की शिक्षा और आजादी का चिन्ह बन गयीं। हाजरा बेगम लिखती हैं:
रशीद जहाँ का कारनामा यह है कि उन्होंने अपनी चन्द कहानियों से अपने बाद लिखने वाली बीसियों लड़कियों और औरतों के दिमागों को मुतास्सिर किया। इस्मत चुग़ताई, रज़िया सज्जाद जहीर, सिद्दीका बेगम और न जाने कितनी मुसन्निफा थीं, जिन्होंने रशीद जहाँ के अफसानों, रशीद जहाँ की जिन्दगी और मसहूरकुन शख्सियत को मशाले-राह समझा और अपनी तहरीर से उर्दू अदब को नई बुलन्दियों पर पहुँचाया।
इस्मत चुगताई के वाक्यों को भी पढ़िये:
गौर से अपनी कहानियों के बारे में सोचती हूँ, तो मालूम होता है कि मैंने सिर्फ उनकी (रशीद जहाँ) बेबाकी और साफगोई को गिरिफ्त में लिया है। उनकी भरपूर समाजी शख्सियत मेरे काबू न आयी, मुझे रेाती-बिसूरती, हराम के बच्चे जनती, मातम करती हुई निस्वानियत से हमेशा नफरत थी। खामखाह की वफा और जुमला खूबियाँ जो मशरिकी औरत का जेवर समझी जाती थीं, मुझे लानत मालूम होती हैं। जज्बातियत से मुझे हमेशा कोफ्त रही है। इश्क में महबूब की जान को लागू हो जाना, खुदकुशी करना और बावेला करना मेरे मजहब में जायज नहीं, यह सब मैंने रशीदा आपा सिखा है। और मुझे यकीन है कि रशीदा आपा जैसी लड़कियाँ सौ लड़कियों पर भारी पड़ सकती हैं।
सच यह है कि अगर रशीद जहाँ न होती, तो प्रगतिशील आन्दोलन की आधी दुन्या अधूरी रह जाती और एक बड़ा इंसानी गोशा अंधेरे में रह जाता। रशीद जहाँ ने अपने छोटे-से कारनामों से सही, उस अंधेरे गोशों को रौशन किया। आज अफसानवी अदब के आस्मान पर ज़किया मुशहदी, निगार अजीम, तरन्नुम रियाज, सर्वत खान, गजाल जैगम जैसी कहानीकार औरतें जगमगा रही हैं। कहीं न कहीं इन सब पर रशीद जहाँ का एहसास और एहसान है। आज जो निसाइयत अर्थात औरतपन और स्त्री संघर्ष का जो आन्दोलन सर उठा रहा है, उसमें भी रशीद जहाँ का खून-पसीना काम कर रहा है।

(प्रो. अली अहमद फ़ातमी)
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प्रगतिशील लेखकों के राष्ट्रीय महासंघ (लखनऊ) का घोषणा पत्र

हम भारत के प्रगतिशील लेखक जो अपने संगठन के स्वर्ण जयन्ती-समारोह के अवसर पर राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के चैथे सम्मेलन में एकत्र हुए हैं, फिर एक बार प्रगतिशील आन्दोलन के महान उद्देश्य के प्रति, जनतंत्र, धर्म निरपेक्षता, विविधता के बीच देश की एकता और समाजवाद के ध्येय के प्रति अपने को समर्पित करते हैं।
हमें इस बात की गहरी चिंता है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आने के चार दशकों के दरम्यान शासक वर्ग और उनकी पार्टी, जिन पर निहित स्वार्थी तत्वों का प्रभुत्व रहा है, उपर्युक्त महान लक्ष्यों को विकसित तो नहीं ही कर सकें, बल्कि उनसे इतना दूर चले गये हैं कि जन-विरोधी और साम्प्रदायिक तत्व तथा क्षेत्रीय संकीर्णतावादी एवं खुली पृथकतावादी शक्तियां हमारे महान देश की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता के ढांचे को तोड़ रही हैं।
हमने राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम की आग में तप कर अपनी व्यापक पहचान बनायी, लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारा शासक-समुदाय एक वैज्ञानिक सांस्कृतिक नीति के अभाव में विभिन्न भाषायी एवं नृवंशी इकाइयों की सक्षम पहचान की आवश्यकताओं की रक्षा करने में असमर्थ साबित हुआ है, जबकि ऐसा करने का आधार हमें स्वधीनतरा-संग्राम से ही मिला था।
आर्थिक और सामाजिक विकास में क्षेत्रीय असमानता, मूल्य-वृद्धि, गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षरता, सामाजिक सुविधाओं के अभाव और जीवन में अनिश्चय की स्थिति ने हमारी मानवतावादी परम्पराओं को दबोच लिया है, क्योंकि शासक वर्ग भ्रष्टाचार की कीचड़ में डूबा हुआ है और मध्य वर्ग को सम्पन्नता के मोहक जाल में फंसाए जा रहा है। प्रतिक्रियावादी, सम्प्रदायवादी और फूटपरस्त ताकतें एवं पुनरुत्थानवादी तथा कट्टरपंथी विचारक भ्रष्ट तरीकों से जन-असंतोष और ऊब का फायदा उठाते हैं और साम्राज्यवादी ताकतों एवं उनके दलालों से उन्हें देश के भीतर तथा बाहर हर प्रकार की मदद मिल रही है।
वे कल्पित पौराणिक अतीत का गौरव गान करते हैं, मनुष्य की हस्ती को रहस्य में ढंक देते हैं, अपने भवितव्य का निर्माण करने की आस्था को वे दबाते हैं, अपने साथ रहने वाले भाइयों के प्रति वे नफरत और विद्वेष पैदा करते और फैलाते हैं। धर्म, वर्ण, जाति, लिंग और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का औचित्य सिद्ध करते हैं और अति दक्षिण तथा अति वाम दोनों ही रूपो में हिंसा की बर्बरतापूर्ण संस्कृति का निर्माण करते हैं। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि भारत के कुछ इलाकों में धार्मिक कट्टरपंथी और वामपंथी अत्यंत सौहार्दपूर्ण गठबंधन से जुड़े हुए हैं।
हमारी जनता में आधुनिकीरण और वैज्ञानिक विकास की जो वाजिब लालसा है, उसका दुरूपयोग निहित स्वार्थी तत्व और उनका सहयोगी साम्राज्यवाद करते हैं। वे ऐसा करने का मौका इसलिए पा लेते हैं कि शासक हमारे देश में तकनीकी और वैज्ञानिक विकास के नाम पर विश्व बैंक और अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सलाह पर भरोसा कर रहे हैं। इससे समय की कसौटी पर खरी उतरी हमारी आर्थिक आत्मनिर्भरता की नीति नष्ट हो रही है और श्रेष्ठ वर्गवाद एवं उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिल रहा है। श्रेष्ठ वर्गवाद समाज पर शासन करने और अब सब कुछ के ऊपर सार्वभौम शक्ति होने क ी अभिजात वर्ग की धारणा को मजबूत बनाता है। इससे मेहनतकश जनता के प्रति बेरुखी और नफरत का भाव पैदा होता है, बावजूद इसके कि वह जनता सामाजिक रूप से पिछड़ी हुई है और गांवों एवं नगरों दोनों जगह सम्पन्न वर्ग की हिंसा की शिकार है। यह आकस्मिक नहीं है कि हाल के वर्षों में आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व सम्पन्न वर्ग ने ही किया।
दुर्भाग्य से, हमारी नयी शिक्षा-नीति भी श्रेष्ठ वर्गवाद की ओर ही उन्मुख है। विचारों के क्षेत्र में उपर्युक्त प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति मनुष्य के अकेलेपन और आधारहीनता की धारणा में होती है, जिसकी नियति होती है स्वयं सूली पर चढ़ने के लिए कंघे पर सलीब लिए चलना। इसके अनुसार मनुष्य इतिहास से नहीं पैदा हुआ है, बल्कि अलग-अलग और निचले क्षणों में रहस्यपूर्ण ढंग से उसने रूप से ग्रहण किया है। साहित्य के क्षेत्र में इस प्रवृत्ति को इस तरह रहस्यपूर्ण बनाया जाता है कि साहित्य-सृजन को सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और जन संघर्षों से तथा उसके कलात्मक रूप को अन्तर्वस्तु से स्वतंत्र कहा जाता है। इस स्थिति में साहित्य का उद्देश्य श्रेष्ठ कलात्मक गुण उपलब्ध करना मात्र समझा जाता है। साहित्य को आदमी के संघर्ष से अलग-थलग कर देने की कोशिश की जा रही है, जिससे निहित स्वार्थियों के हमने और यथास्थिति बनाये रखने की साजिशों के मुकाबले मेहनतकश जतना निरò हो जाए। साहित्य के पश्चिमी पंडित और साम्राज्यवाद के सिद्धांतकार, जो हमेशा कलात्मक सृजन के नये आधार खोजते रहते हैं, ऐसे विचारों को नये-नये रूपों में पेश करके नये लेखकों को प्रगतिशील आन्दोलन से दूर ले जाने की कोशिश करते रहते हैं।
इस पर गौर करना जरूरी है कि इलेक्ट्राॅनिकी के विकास ने संचार माध्यमों में क्रांति कर दी है। लेकिन दुर्योग से उस पर निहित स्वार्थियों और अमरीका के सूचना-साम्राज्य का कब्जा है, जो उपभोक्तावाद के नुकसानदेह व्यवहार का प्रचार करता रहता है। संचार-माध्यमों के लिए आज मानववादी मूल्यों की शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है मनोरंजन। क्योंकि यह उपभोक्ता-सामग्री की बिक्री में मददगार होता है और श्रोताओं को रोजमर्रा की समसयाओं के प्रति संवेदनहीन बना देता है। यह पूंजीवादी मूल्यों को बड़े पैमाने पर फैलाने और मिथ्या चमक-दमक के पीछे दौड़ने का उकसावा देने का सबसे जोरदार माध्यम है। यह बात अब छिपी नहीं है कि धार्मिक कट्टरपंथ से लेकर श्रेष्ठ वर्गवाद और विश्व प्रभुत्ववाद तथा उसके विभिन्न रूपों तक का उदय साम्राज्यवाद से ही हो रहा है।
साम्राज्यवाद सभी स्वतंत्रता प्रेमी राष्ट्रों को, तोड़-फोड़ के जरिए, अस्थिरीकरण के लिए राजनीतिक-आर्थिक दबाव का उपयोग करके, उनसे नजदीक से नजदीक किसी स्थान पर सैनिक अधे कायम करके और पड़ोसी राष्ट्रों को हथियारबंद होने और एक-दूसरे से लड़ने के लिए उकसा कर, धमकाना चाहता है। साम्राज्यवाद सैनिक गुटतंत्रों को पे्ररित करके सम्बद्ध देश के शासक पर कब्जा कराता है, ताकि वह उक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपने औजार के रूप में उनका इस्तेमाल कर सके, जैसा कि पाकिस्तान और अमरीकी प्रभुत्व के अधीनस्थ अनेक देशों में हुआ है। अमरीकी प्रभुत्व कुबूल करने का मतलब है जनतंत्र का खात्मा। यह जगविदित है कि नस्लवाद, जातिवाद, उपनिवेशवाद आदि जो कलंक आज की दुनिया में मौजूद है, उन्हें अमरीकी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण प्राप्त है।
साम्राज्यवाद अपने अंतिम पतन को रोकने के लिए सैन्यीकरण और हथियारों की होड़ का भी इस्तेमाल करता है। वह इस प्रकार का भ्रम पैदा करता है कि इस नाभकीय युग में सीमित युद्ध किया जा सकता है या यह कि उसने ‘सामरिक प्रतिरक्षा पहल’ के रूप में एक ऐसा हथियार पा लिया है, जो किसी भी नाभिकीय विनाश से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने में समर्थ है।
साम्राज्यवाद ने नाभिकीय हथियार चलाने का अधिकार कम्प्यूटर को सौंप कर मानवता का भवितव्य वास्तव में निर्जीव वस्तु के हाथों के हवाले कर दिया है, जिसका मतलब यह है कि मशीन की गति में छोटी-सी गड़बड़ी हमारे इस भूमंडल को पूरी तरह नष्ट कर दे सकती है।
लेकिन हम प्रगतिशील लेखक इस हालत में भी यह देखकर प्रेरणा पाते हैं कि मेहनतकश जनता हर जगह मानव-मूल्यों के लिए लड़ रही है। वह नए नायक, नए प्रकार का मनुष्य पैदा कर रही है, जो हर जगह हमारे लिए प्रकाश-स्तंभ की तरह डटा रहता है। उसके साथ सम्पर्क से, उसके संघर्ष में शिरकत करके हम उसे ज्यादा अच्छी तरह समझने में समर्थ होते हैं, दुश्मन को पहचान लेते हैं और जटिल सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को समझने की गहरी दृष्टि प्राप्त करते हैं, जिससे हमारे सृजन को नयी चमक और गहराई प्राप्त होती है। इस तरह हम प्रगतिशील लेखक अपनी जनता के साथ रहते हैं, शत्रुतापूर्ण शक्तियों से लड़ते हैं और सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रगति का रास्ता साफ करते हैं।
हमारा परचम साम्राज्यवाद के खिलाफ मजबूती से ऊँचा उठा हुआ है, हम नाभिकीय हथियारों को समाप्त करने और दो विरोधी समाज-व्यवस्थाओं के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए विश्वव्यापी शान्ति आन्दोलन में भाग लेते हुए अपने भविष्य का निर्माण करने के हर राष्ट्र के अधिकार के लिए भी लड़ते रहेंगे।
हमने अपने परचम पर लिखा है- ‘आत्मनिर्भरता’, और हम देश की आर्थिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ बनाने के संघर्ष में शामिल हैं। इसे दबोचने के हर साम्राज्यवादी प्रयत्न का हम पूरी ताकत से विरोध करते हैं, अमरीका और उसके सहयोगी देशों से तथाकथित तकनीक के हस्तान्तरण के नाम पर अधिकाधिक मुनाफे के लिए आर्थिक स्वतंत्रता को तिलांजलि देने के भारत के निहित स्वार्थियों के प्रयत्न का भी हम विरोध करते हैं।
हम आश्वस्त हैं कि भारत में काफी वैज्ञानिक और तकनीकी प्रतिभाएं हैं, इसलिए दूसरे देशों के अनुसंधान का फल अपने देश में लाने के बदले अगर हम अपने अनुसंधान-कार्य का विकास करें तो हम अपने बूते पर अगली सदी में पहुंच सकते हैं।
हमारे परचम पर विचारधारात्मक संघर्ष के अक्षर चमक रहे हैं। हम धार्मिक कट्टरपंथ, जातिवाद, क्षेत्रीय संकीर्णतावाद, सामंतवाद, रूढ़िवाद, श्रेष्ठ वर्गवाद, विश्व प्रभुत्ववाद और उपभोक्तावाद की मानवता विरोधी खतरनाक प्रवृत्तियों एवं विचारों के खिलाफ, उनके विभिन्न दार्शनिक एवं सौन्दर्य शास्त्रीय सिद्धान्तों के खिलाफ संघर्ष की घोषणा करते हैं, क्योंकि वे सिद्धान्त हिंसा और नफरत फैलाते हैं, मनुष्यता के भविष्य के प्रति-खास करके मेहनतकश जनता के प्रति उदासीनता पैदा करते हैं और सर्वाधिकारवादी रूझान को भी जन्म देते हैं। उपर्युक्त प्रवृत्तियां देश में अस्थिरता पैदा करती हैं और उनकी चल जाए तो देश विघटित भी हो सकता है।
हम घोषित करते हैं कि हमारा संघर्ष साम्राज्यवाद की संस्कृति और सूचना-व्यवस्था का खात्मा करने और नई अन्तर्राष्ट्रीय सूचना-व्यवस्था कायम करने और अपने राष्ट्रीय संचार माध्यम के जनतन्त्रीकरण के लिए भी है।
हम घोषित करते हैं कि हम अपने महान देश की सभी भाषाओं की समानता को कुबूल करते हैं और मुक्त और निर्भीक वातावरण में उन सबके विकास के लिए पूरा अवसर और अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सर्वोत्तम के उत्तराधिकारी
हमारी घोषणा है कि हम पूरी मानव जाति की परम्पराओं और सांस्कृतिक उपलब्धियों के सर्वोत्तम अंश के उत्तराधिकारी हैं। हम राष्ट्रीय स्वतन्त्रता और समाजवाद के लिए अपनी जनता के वीरता पूर्ण संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प विशेष रूप से लेेते हैं, हमारा संघर्ष हमेशा इस विराट आन्दोलन का अंग रहा है।
हम घोषणा करते हैं कि अपनी कलात्मक परम्पराओं के अनुसार नये कला-रूपों और अभिव्यक्ति के नए प्रकारों के लिए हमारी खोज जारी है और अपनी कला में ताजगी लाने के लिए हम जनता की जिन्दगी में रोज-ब-रोज व्यवहृत मुहावरों, बिम्बों और रूपकों के विशाल भण्डार का लाभ उठाएंगे।
हम प्रगतिशील लेखक, सभी देशभक्त और जनतांत्रिक लेखकों से आग्रह करते हैं कि इस भीषण संकट की घड़ी में अपनी पूरी कलात्मक क्षमता के साथ एकताबद्ध हों और मानव जाति के विवेक के प्रतिफलित करने वाले प्रगतिशील लेखक आन्दोलन को मजबूत बनाएं। यह आन्दोलन वास्तव में हमारे युग के उस महान आन्दोलन का अंग है, जो विश्व शांति की रक्षा करने, राष्ट्रीय स्वतन्त्रता एवं अखण्डता को सुदृढ़ बनाने, जनतांत्रिक मूल्यों तथा संस्कृति को सुरक्षित रखने और न्यायोचित एवं विवेक संगत समाज व्यवस्था कायम रखने के लिए छिड़ा हुआ है।

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क्रांति के लिए (शंकर शैलेन्द्र)

क्रांति के लिए उठे कदम
क्रांति के लिए जली मशाल

भूख के विरुद्ध भात के लिए
रात के विरुद्ध प्रात के लिए
मेहनती गरीब जात के लिए
हम लड़ेंगे हमने ली कसम - ३

छिन रही हैं आदमी की रोटियां
बिक रही हैं आदमी की बोटियाँ
किन्तु सेठ भर रहे है कोठियां
लूट का ये राज हो ख़तम - ३

गोलियों की गंध में घुटी हवा
हिंद जेल आग में तपा तवा
खद्दरी सफ़ेद कोढ़ की दवा
खून का स्वराज हो ख़तम - ३

जंग चाहते है आज जंगखोर
ताकि राज कर सकें हरामखोर
पर जवान है, जहान है कठोर
डालरों का जोर हो ख़तम - ३

तय है जीत मजूर की, किसान की
देश की, जहान की, अवाम की
खून से रंगे हुए निशान को
लिख गयी है मार्क्स की कलम - 3
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