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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

बुलंदशहर की घटना के असली मुजरिमों को बचाने में जुटी है उत्तर प्रदेश सरकार और उसके मातहत मशीनरी



लखनऊ- उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद में 3 दिसंबर को हुये अराजकता के नाच को जिसमें कि एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या और एक तमाशवीन युवक की दर्दनाक मौत हुयी, के दस दिन बीतने के बाद भी पुलिस और प्रशासन इस पर से रहस्य की चादर हठा नहीं पारहे हैं। उलटे पुलिस और प्रशासन के रवैये से लग रहा है कि वह येन केन प्रकारेण असली अपराधियों जो कि स्पष्टतः संघ गिरोह से संबन्धित हैं, को क्लीन चिट देकर कुछ निर्दोषों और तमाशवीनों को बलि का बकरा बना रहे हैं।
ज्ञातव्य होकि जनपद बुलन्दशहर की स्याना कोतवाली के अंतर्गत महाव गांव के एक किसान के गन्ने के खेत में कुछ म्रत पशुओं के अवशेष खेत मालिक को 3 दिसंबर को सुबह पड़े मिले थे। किसान ने इसकी सूचना स्याना पुलिस को दी तो वह घटनास्थल पर पहुंची और उपस्थित ग्रामीणों को रिपोर्ट लिख कर उचित कार्यवाही करने का आश्वासन भी दिया। ग्रामीण इससे संतुष्ट भी होगये। पर सुनियोजित उद्देश्यों के लिये हिंसा भड़काने को उतारू संघ गिरोह को यह मंजूर नहीं था।
अतएव बजरंगदल के जिलाध्यक्ष और भाजपा के दूसरे आंगिक संगठनों ने वहाँ कथित गोकशी की अफवाहें फैला कर कई गांवों की भीड़ इकट्ठी कर ली। वे म्रत पशुओं के अवशेष एक ट्रेक्टर में डाल कर पुलिस चौकी चिंगरावटी पर ले आए और वहां जाम लगा दिया। संघियों ने अपने उत्तेजक बयानों और नारे बाजी से भीड़ को उकसाया और पथराव शुरू होगया। इस बीच पुलिस को बल प्रयोग भी करना पड़ा। बेहद दुखद है कि संघियों द्वारा लगाई इस आग के चलते स्याना कोतवाली के इंचार्ज की ह्त्या कर दी गयी और एक स्थानीय युवक सुमित भी मारा गया।
ज्यों ज्यों समय व्यतीत होरहा है घटना की परतें और साजिशें सामने आती जारही हैं। बुलंदशर में घटना के कई दिनों पहले से मुस्लिमों का इज़्तजा चल रहा था जिसमें कि अल्पसंख्यकों की भारी भीड़ जुटी थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हिंसा की आग में झौंकने के लिये संघ गिरोह ने इसे एक नायाब मौका समझा। उन्होने ग्रामीण क्षेत्रों में अफवाहें फैलायीं कि मुस्लिमों के समारोह में आए लोगों को गोमांस परोसने के लिये बड़े पैमाने पर गायें काटी जारही हैं। लेकिन आम जनता सच्चाई जानती थी और वह टस से मस नहीं हुयी। उलटे कई ग्रामों में गैर मुस्लिमों ने मुस्लिम समारोह में आये अल्पसंख्यकों को नमाज पढ़ने के लिये मंदिरों और अपने आवासों में जगह दी। इससे संघी बौखला गये।
अपनी साज़िशों को अंजाम देने के लिये संघियों ने पशुओं की खाल उतारने वाले मजदूरों से गन्ने के खेत में म्रत पशुओं के अंग गिरवा दिये और बिना जांच के ही कुछ गरीब मुस्लिमों को गिरफ्तार करने को दबाव बनाया। पर पुलिस इंस्पेक्टर स्याना बिना जांच किए गिरफ्तारी करने को तैयार नहीं थे। इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह दादरी के अखलाक हत्याकांड की जांच से भी जुड़े थे और उन्हें लगातार धमकियाँ भी मिल रहीं थीं।
अब जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या संघियों ने एक तीर से कई निशाने साधने की साजिश की थी? क्या उनका उद्देश्य छत्तीसगड और मध्य प्रदेश के चुनावों में भाजपा की दुर्गति की खबरों के बीच राजस्थान चुनाव से पहले ध्रुवीकरण को अंजाम देने की साजिश रची थी? अथवा लोकसभा चुनावों से पहले पूर्व की भांति  पश्चिमी उत्तर प्रदेश को फिर से हिंसा और हिंसा के जरिये विभाजन पैदा करने का कोई महाषडयंत्र था?
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या ने संघियों के मंसूबे पर पानी फेर दिया। इस हिंसा से पुलिसकर्मियों और आम जनता के बीच योगी सरकार और संघ गिरोह के विरोध में जबर्दस्त गुस्सा था जिसकी चिनगारियों से संघ गिरोह के पंख झुलसते नजर आये। अब कई किस्म की जाँचें बैठा दी गईं हैं। संघ गिरोह के लोगों को बचाने के प्रयास जारी हैं। एक फौजी को हत्यारा साबित करने की कवायद चल रही है। डीजीपी सहित तमाम आला अधिकारी पहले तो संघ परिवार का नाम लेने से बचते रहे और अब संघ परिवार को क्लीन चिट देने को तत्पर जान पड़ते हैं।  पर अब इसका फैसला जनता की अदालत में होना बाकी है, भले ही कार्यपालिका मामले पर कितनी ही लीपापोती क्यों न कर दे।
 भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मण्डल ने उसी दिन हुयी उस घटना पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया था। एक प्रेस बयान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आरोप लगाया था कि समूची घटना के पीछे भाजपा, बजरंग दल और आरएसएस के समर्थकों की साजिश है जो 2019 के चुनावों से पहले दंगा भड़काने, समाज को बांटने और कानून व्यवस्था को भंग करने पर उतारू हैं।
भाकपा का आरोप है कि जनता के बीच पूरी तरह बेनकाब होचुके संघ और भाजपा अब सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने पर उतारू हैं। जगह जगह गोहत्या का नाटक खड़ा कर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जारहा है। धर्मसभा, कमल यात्रा और अन्य कई तरीकों से उन्माद और भय पैदा किया जारहा है। लोकसभा चुनावों से पहले ऐसी तमाम वारदातों को अंजाम देने की साजिश है। कुत्सित राजनैतिक उद्देश्यों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मुजफ्फरनगर की तरह फिर से दंगों की आग में झौंकने का षडयंत्र है।
भाकपा  ने कहाकि योगीजी यूपी में रामराज्य की बातें करते रहे हैं लेकिन वो रामराज्य तो दूर दूर तक नहीं दिखाई देरहा। अब तक उनकी गैर कानूनी सेनाएं अल्पसंख्यकों, दलितों और कमजोरों पर हमले बोल रही थीं, अब उनके निशाने पर पुलिस भी आगयी है। योगीजी और भाजपा को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिये।
भाकपा ने यह भी कहाकि माननीय उच्च न्यायालय को स्वतः संग्यान लेकर जांच के लिये गठित टीमों  की जांच पर निगरानी रखनी चाहिये क्योंकि सत्ता के दबाव में जांच को हत्याकांड से हठा कर कथित गोकशी की ओर मोड़ा जासकता है और संघ गिरोह को क्लीन चिट दी जासकती है।  भाकपा ने लावारिश गायों और सांडों को बाड़ों में बंद करने की मांग भी की है जो न केवल किसानों की फसलें उजाड़ रहें अपितु  तमाम लोगों की जानें भी लेरहे हैं।
भाकपा ने प्रदेश की जनता से अपील की है कि वह प्रदेश को दंगों और विभाजन की आग में झौंकने की भाजपा और संघ की साजिश से सावधान रहें और हर कीमत पर शान्ति बनाए रखें। भाकपा ने शहीद इंस्पेक्टर और म्रतक ग्रामीण के परिवारों को न्याय दिये जाने की मांग भी की है।

डा॰ गिरीश

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