भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

About The Author

Communist Party of India, U.P. State Council

Get The Latest News

Sign up to receive latest news

समर्थक

शनिवार, 10 मई 2014

सरमाये एवं मीडिया का नग्न नृत्य और असहाय चुनाव आयोग

लोक सभा चुनाव के अंतिम दौर का प्रचार आज सायं समाप्त हो जायेगा और इस अंक के पाठकों तक पहुंचने के पहले चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और नई सरकार के गठन की कवायद चल रही होगी। लोक सभा चुनावों के चुनाव परिणामों के बारे में कोई भी टिप्पणी परिणाम आने के बाद ही की जा सकती है लेकिन इस चुनाव के दौरान जिस तरह सरमाये एवं मीडिया ने एक व्यक्ति विशेष को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अभियान चलाया और जिस तरह चुनावों के दौरान धर्म एवं जातियों में मतदाताओं के संकीर्ण ध्रुवीकरण के प्रयास हुए, वह दोनों निहायत चिन्ताजनक है। भारतीय संविधान की आत्मा जार-जार की जाती रही। इस पूरे चुनाव के दौरान मुद्दे गायब रहे, जनता के सरोकार गायब रहे और चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई। जिस विकास की बातें की गईं, उस तरह का विकास पूरे देश में जगह-जगह पिछले 23 सालों में देखने को मिलता रहा है। इस दौर में हर चीज बढ़ती रही है, सरमायेदारों का सरमाया बढ़ता चला गया है और गरीबों की गरीबी बढ़ती चली गई है। महंगाई, बेरोजगारी, दमन, उत्पीड़न, अपराध सब प्रगति के पथ पर बेरोकटोक आगे बढ़ते रहे हैं। नई आर्थिक नीतियों की शुरूआत में नीति नियंताओं और साम्राज्यवादी अर्थशास्त्रियों का दावा था कि सरमायेदारों का सरमाया बढ़ने से टपक-टपक कर पैसा आम जनता तक पहुंचने लगेगा और यह सिद्धान्त ‘ट्रिकल डाउन’ थ्योरी के रूप में जाना गया। 23 साल बीत गये हैं परन्तु ऐसा होता कहीं दिखाई नहीं दिया। ऊपर से नीचे टपकता धन कहीं दिखाई नहीं दिया। उलटे नीचे से उछल कर धन ऊपर वालों की तिजोरियों में जाता रहा।
तीव्र ध्रुवीकरण के लिए नेता अनाप-शनाप बोलते रहे। लम्बे समय तक चुनाव आयोग खामोश रहा। अमित शाह, तोगड़िया, गिरिराज सिंह और बाबा रामदेव सरीखे अन्यान्य के आपत्तिजनक बयानों को लेकर निर्वाचन आयोग पर उदारता बरतने के आरोप लगते रहे। फिर उसने कुछ को नोटिसें और कुछ के खिलाफ एफआईआर लिखाने के निर्देश दिये। शुरूआत में अमित शाह एवं आजम खां के उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने पर पाबंदी लगा दी परन्तु बाद में अमित शाह के माफी मांगने के बाद उन पर लगाया गया प्रतिबंध वापस ले लिया गया। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों किया गया? यदि एक अपराध किया जाता है तो दुनियां के किसी भी कानून में माफी मांग लेने से अपराध की तीव्रता कम नहीं हो जाती। चुनाव आयोग को बार-बार चैलेन्ज किया जाता रहा। कभी आजम खां ने तो कभी मोदी ने संवैधानिक संस्था पर दवाब बनाने के प्रयास किये। वाराणसी में बिना अनुमति मोदी ने रोड शो किया और ध्रुवीकरण के तमाम प्रयास किये। चुनाव आयोग निरपेक्ष भाव से देखता रहा। संवैधानिक संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से चैलेन्ज करना लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है।
विज्ञापनों एवं पेड न्यूज की भरमार रही। इलेक्ट्रानिक मीडिया पूरी तरह और प्रिंट मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा बिका हुआ साफ दिखाई दिया। विज्ञापनों के अलावा खबरों तथा सर्वेक्षणों को इस प्रकार पेश किया गया कि जनता का अधिसंख्यक तबका मानने लगा है कि मीडिया बिका हुआ था। मीडिया की विश्वसनीयता पर अभूतपूर्व प्रश्नचिन्ह लग गया है।
चुनावों के दौरान कई स्थानों पर पैसे के बल पर मतदाताओं के खरीदने के नापाक प्रयास किये जाने के समाचार हैं। कई स्थानों पर बूथ कैपचरिंग की भी घटनायें हुई हैं। आश्चर्य का विषय है कि कई पोलिंग बूथों पर 100 प्रतिशत से अधिक मत पड़ने के समाचार मिले हैं। ऐसा कैसे सम्भव हुआ, इसका कोई उत्तर किसी के पास नहीं है।
सबसे अधिक चिन्ता का विषय यह है कि चुनावों के दौरान मीडिया में वामपंथ को कोई स्थान नहीं मिला। चुनाव सर्वक्षणों में वामपंथ को 20 सीटों के करीब सिमटा दिया गया। चुनाव परिणाम क्या होंगे, इस बारे में कयास लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह अंक पाठकों तक पहुंचते-पहुंचते चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे।
चुनाव परिणाम कुछ भी हों, देश पिछले 23 सालों से जिन आर्थिक नीतियों के रास्ते पर चल रहा है, उसमें बदलाव की कोई भी संभावना नहीं दिखाई दे रही है। अगर तीसरे मोर्चे की भी सरकार बन जाती है, तो उसमें अधिसंख्यक वहीं क्षेत्रीय राजनैतिक दल होंगे जो अपने-अपने राज्यों में जनविरोधी पूंजीवादी आर्थिक नीतियों को अमल में लाते रहे हैं।
इन आर्थिक नीतियों में बदलाव के लिए चुनावों के बाद वामपंथ, विशेषकर भाकपा को अपनी रणनीति में सुधार की दिशा में निर्ममता के साथ आगे बढ़ना होगा। प्रखर जनांदोलनों के जरिये जनता को पंूजीवाद के खिलाफ लामबंद करने की दिशा में हमें आगे बढ़ना होगा।
इस चुनाव के दौरान चुनाव सुधारों की आवश्यकता बहुत ही प्रबलता के साथ महसूस की गई। इस दिशा में प्रखर जनांदोलन समय की मांग है। भाकपा को इसके लिए पहल करनी होगी।
- प्रदीप तिवारी
»»  read more

आकाशवाणी से ९.५.१४ को प्रसारित डॉ.गिरीश का चुनाव प्रसारण.

देश के मतदाता भाइयो और बहिनों, 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव अभियान अपने अंतिम दौर में है। देश की विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं ताकतों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए आक्रामक अभियान चलाया हुआ है। हमारे देश के चुनावी इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब पूंजीपतिवर्ग खास कर कार्पाेरेट घराने सांप्रदायिक ताकतों के पक्ष में पूरी ताकत से अभियान चला रहे हैं और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये वे प्रचार माध्यमों का भरपूर स्तेमाल कर रहे हैं। कार्पाेरेट्स इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि अपना हित साधने के लिये जितना काम उन्होंने कांग्रेस से लिया है उससे कहीं ज्यादा काम वे भाजपा और उसके काल्पनिक प्रधानमंत्री से ले सकेंगे। कार्पाेरेट घराने यह भी जानते हैं कि यूपीए सरकार ने जब भी कार्पाेरेट्स के पक्ष में फैसला लिया तो विपक्ष में होने के बाबजूद भाजपा ने उसका साथ दिया। देश की जनता निश्चित ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से आजिज आ चुकी है। अभूतपूर्व महंगाई, हर क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और रोजगारों के छिनते चले जाने, निजीकरण के चलते शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के आमजनों के लिए दुर्लभ हो जाने, डीजल, पेट्रोल और गैस एवं जनहित में अन्य वस्तुओं पर दी जाने वाली सब्सिडीज को योजनाबद्ध तरीके से घटाते जाने तथा सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को विभाजित और पंगु बना डालने जैसी उसकी कारगुजारियों ने जनता की मुसीबतों को बेहद बढ़ा दिया है। अतएव लोग कांग्रेस से बेहद नाराज हैं। आम जनता की इस नाराजगी को भुनाने के लिये ही भाजपा और संघ परिवार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। वे देश की शीर्ष सत्ता पर आसीन हो कर अपने संरक्षक कार्पाेरेट घरानों के आर्थिक एवं व्यावसायिक एजेंडे तथा संघ परिवार के सांप्रदायिक एजेंडे को लागू करना चाहते हैं। परन्तु यहाँ सवाल यह है कि क्या बीजेपी वाकई कोई ऐसा वास्तविक बदलाव ला सकती है जैसा जनता चाहती है? सवाल यह भी है कि यूपीए सरकार ने जब संसद में जनविरोधी, किसान विरोधी और मजदूर विरोधी कई कानून पारित करने की कोशिश की तो क्या कभी भाजपा ने उसे रोकने की कोशिश की? सरकार ने जब जनता की मुसीबतें बढ़ाने वाले कई फैसले लिए अथवा कार्यवाहियां कीं तो क्या कभी भाजपा ने इनको रोकने की कोशिश की? क्या भाजपा की आर्थिक नीतियाँ और दृष्टिकोण कांग्रेस से किसी भी तरह अलग हैं? इन सभी का जबाब है - नहीं, नहीं, बिलकुल नहीं। स्पष्ट है कि भाजपा देश में सांप्रदायिक विभाजन कर अपने विनाशकारी आर्थिक एजेंडे को ही मुस्तैदी से लागू करेगी और जिन समस्यायों से जनता छुटकारा पाना चाहती है, भाजपा के पास उनके समाधान का कोई रास्ता नहीं है। देश के कई राज्यों में वामदलों से अलग कई दल हैं जो क्षेत्रीय पहचान अथवा सामाजिक न्याय के सवालों को उठाकर सत्ता में आते रहे हैं। परन्तु उनकी आर्थिक नीतियां भी कांग्रेस और भाजपा के समान हैं। राज्यों में सत्ता में आने पर ये पार्टियाँ भी आर्थिक नव उदारवाद की उन्हीं नीतियों को लागू करती हैं जिनसे खेती और कुटीर उद्योग बर्बाद होते हैं और महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कुपोषण जैसी समस्यायें पैदा होती हैं। सत्ता में भागीदारी के लिए ऐसे दल सांप्रदायिक भाजपा से भी जुड़ जाते हैं। देश के मौजूदा परिदृश्य को सत्ता शीर्ष पर केवल पार्टियों को बदल कर नहीं बदला जा सकता। इसको आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों को पलट कर वैकल्पिक नीतियों को लागू कर ही बदला जा सकता है। और केवल वामपंथ ही ऐसी वैकल्पिक नीतियों को पेश करता रहा है और वामपंथ के पास ही हालात बदलने का बुनियादी रास्ता है। यह मुख्यतः वामपंथ ही है जो मजदूर वर्ग, किसानों, दस्तकारों, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों तथा पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण के शिकार सभी मेहनतकशों के हितों की रक्षा में लगातार संघर्ष करता रहा है। सदन में उसकी संख्या कुछ भी रही हो, जनता के पक्ष में नीतियां बनवाने में और संसद के बाहर संघर्षरत जनता की मांगों को बुलंद करने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक अग्रणी ताकत के रूप में काम करती रही है। आज की परिस्थिति का तकाजा है कि देश की संप्रभुता, जनता की रोजी-रोटी, आवास, रोजगार, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के अधिकार और धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था को संसद के अंदर और बाहर मजबूत करने के लिए वामपंथ और जोरदार तथा लम्बा संघर्ष चलाये। इसके लिए जरूरी है कि १6वीं लोकसभा में वामपंथ का एक मजबूत ब्लाक पहुंचे। अतएव आप सभी से विनम्र निवेदन है कि लोकसभा चुनावों में जहां-जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार मैदान में हैं, वहां भाकपा के चुनाव निशान - ”बाल हंसिया“ के सामने वाला बटन दबा कर उन्हें भारी बहुमत से विजयी बनायें। धन्यवाद!
»»  read more

निर्वाचन आयोग पर भाजपा के हमलों की भाकपा निंदा करती है.

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि अपनी अपेक्षित जीत से काफी दूर दिखाई देरही भाजपा इस कदर बौखला गई है कि अब वह संवैधानिक संस्थाओं पर हमले करने पर उतर आयी है. हाल ही में उसने चुनाव आयोग को निशाना बनाया है. भाजपा और उसके प्रवक्ताओं ने चुनाव आयोग पर चहुँतरफा हमले बोल दिए हैं. भाकपा इसकी कड़े शब्दों में निंदा करती है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि भले ही भाजपा भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुये ही सत्ता और राजनीति में भागीदारी करती है, लेकिन वह संविधान और संवैधानिक संस्थाओं की विरोधी है. उसकी सांप्रदायिक राजनीति एवं उसके द्वारा बाबरी ढांचे का तोड़ा जाना आदि अनेक उदाहरण हैं जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं. अब निर्वाचन आयोग द्वारा वाराणसी में उसकी सभा को सुरक्षा कारणों से अनुमति न दिए जाने पर भाजपा बुरी तरह तिलमिला गई है और निर्वाचन आयोग पर तीखे हमले कर रही है. वह मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती है कि चुनाव आयोग उसके साथ ज्यादती कर रहा है. इस तरह वह मतदाताओं की हमदर्दी बटोरना चाहती है. वह भूल गयी कि अमितशाह, तोगड़िया, गिरिराज सिंह और बाबा रामदेव के आपत्तिजनक बयानों को लेकर निर्वाचन आयोग पर भाजपा के प्रति कथित उदारता बरतने के आरोप लगते रहे हैं. भाकपा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को बधाई दी है कि उन्होंने दोटूक शब्दों में भाजपा की धौंसपट्टी में न आने का ऐलान कर दिया. किसी भी संवैधानिक संस्था पर हमले को भाकपा बेहद आपत्तिजनक मानती है और भाजपा को चेतावनी देना चाहती है कि वह अपनी संविधान विरोधी कारगुजारियों से बाज आये वरना भाकपा संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा के लिए जनांदोलन चलायेगी और भाजपा को बेनकाब करेगी. डॉ. गिरीश
»»  read more

Election Telecast of CPI on Doordarshn. (9.5.14.) By Dr.Girish.

प्रिय मतदाता भाइयों एवं बहनों, आप सभी लोक सभा के चुनावों की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और आप सभी को पिछले चुनावों की तुलना में ज्यादा विवेक और सूझ-बूझ के साथ मत का प्रयोग करना है क्योंकि देश के सामने जैसी चुनौतियाँ आज हैं, पहले कभी न थीं। जनता की जैसी हालत आज है, वैसी कभी न थी। पूंजीवादी नीतियों और सरकारों की कारगुजारियों के चलते आज महंगाई सातवें आसमान पर है। महंगाई ने आम और गरीब लोगों की मुसीबतें बेहद बढ़ा दी हैं। अनेक लोग आधे पेट सोने को मजबूर हैं। एक ओर मुट्ठी भर लोग अरबों-खरबों की सम्पत्ति के स्वामी हैं तो बहुमत लोग बेहद गरीब हैं। खुद सरकार ने स्वीकार किया है कि 78 प्रतिशत लोग प्रतिदिन 20 रूपये से कम में गुजारा करते हैं। एक तिहाई बच्चे और 50 फीसदी मातायें कुपोषण की शिकार हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की जनविरोधी नीतियों के कारण देश के किसान कंगाल हो चुके हैं। कर्ज में डूबे किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। मजदूरों और कर्मचारियों के न तो जीवन की सुरक्षा है न उनकी नौकरियों की। बढ़ती जा रही बेरोजगारी नौजवानों के लिए अभिशाप बन चुकी है। रिक्त होने वाले पदों पर नौकरियां नहीं दी जा रहीं हैं। शिक्षा का बजट लगातार कम हो रहा है। दोहरी शिक्षा प्रणाली और बेहद महंगी फ़ीस के कारण आम आदमी बच्चों को पढ़ा ही नहीं पा रहा है। केंद्र की सरकार इस बीच तमाम घपलों-घोटालों में जुटी रही। लाखों करोड़ के इन घोटालों में जनता के पसीने की कमाई सरकारी खजाने से निकल कर भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों में पहुंच गयी। आम लोग विकास से वंचित रह गये। मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। उसने भ्रष्टाचार जैसे सवालों पर संसद में कभी सार्थक बहस नहीं होने दी। इसके दो राष्ट्रीय अध्यक्षों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे जिनमें से एक को न्यायालय से सजा तक मिली। कर्नाटक के इसके पूर्व मुख्यमंत्री सहित कई मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार की खबरें जगजाहिर हैं। इस दौर में हमारे प्राकृतिक संसाधनों की बेपनाह लूट चलती रही। इन भ्रष्टाचार और घोटालों के सभी मामलों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मजबूत आवाज उठाई और कोयला आबंटन घोटाला तथा एक उद्योग समूह द्वारा निकाली जाने वाली गैस के दाम कई गुने किये जाने के घपले को तो भाकपा के नेताओं ने ही उजागर किया था। हालात यह हैं कि करोड़ों लोगों के पास रहने को घर नहीं है। शहरों की आबादी का बड़ा भाग झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहा है। बड़ी संख्या में लोगों को स्वच्छ पेयजल नहीं मिलता। शहरों-कस्बों में उच्चस्तरीय प्रदूषण के चलते श्वांस लेना कठिन है। कुपोषण, प्रदूषण और दूषित जल से बीमारियों में इजाफा हो रहा है। ऊपर से इलाज इतने महंगे हो गये हैं कि आम आदमी बिना इलाज के तड़प-तड़प कर मर रहा है। यह सब पूंजीवादी नीतियों को निर्ममता से चलाने का दुष्परिणाम है। पिछले दो दशकों में यह व्यवस्था आर्थिक नवउदारवाद के आवरण में लपेट कर चलायी जाती रही है। इसके चलते देश की दौलत का बहुत बड़ा भाग पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों की झोली में पहुँच चुका है जिसका बड़ा भाग विदेशी बैंकों में डाला जा चुका है। अभावों के महासागर में धकेल दी गई जनता में भारी असंतोष और गुस्सा है। केंद्र में सत्ता में होने के कारण कांग्रेस इन हालातों के लिए जिम्मेदार है। कांग्रेस से नाराज लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस के समान आर्थिक नीतियों पर ही चलने वाली भाजपा उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं ला सकती। वह और भी मुस्तैदी से गरीबों की लूट का एजेंडा चलाएगी। लोगों की इस नाराजगी को भुनाने के लिए भाजपा एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। कारपोरेटों की पूँजी और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया उसके प्रचार अभियान को धार देने में जुटे हैं। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता में आने को छटपटा रही है तो कारपोरेट घराने उसे सत्ता में बैठा देने को आतुर हैं ताकि कारपोरेटों को मालामाल और आमजनों को कंगाल बनाने के एजेंडे को निर्ममता से लागू किया जा सके। वामपंथी दलों को तो इस कारपोरेटी मीडिया ने पूरी तरह किनारे कर रखा है। जनता को लुभाने को गुजरात के कथित विकास की लम्बी-चौड़ी बातें की जा रही हैं। आजादी के पहले ही गुजरात में पूँजी का विकास देश के अन्य भागों की तुलना में ज्यादा हो चुका था। गत दशक में तो वहां किसानों की जमीनें बेहद कम कीमत पर अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को मुफ्त में सौंपी गयी हैं। यहाँ तक कि सीमाओं की रक्षा के उद्देश्य से कच्छ में बसाये गये सिक्ख किसानों को भी नहीं बक्शा गया और उनकी जमीनें अधिगृहीत कर बड़े उद्योग समूहों को दे दी गयीं। वहां कुपोषण, शिशु मृत्युदर और जननी मृत्युदर देश के अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है। मजदूरों को तो साधारण अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं। नये रोजगार सृजन में गुजरात पीछे है तथा वहां तरक्की की दर राष्ट्रीय दर से कम है। दशकों पहले हुये विकास को भी भाजपा अपने सत्ताकाल के विकास के रूप में प्रचारित कर रही है। देश में संसदीय प्रणाली लागू है जिसके अंतर्गत चुन कर आने वाले सांसदों का बहुमत प्रधानमंत्री का चुनाव करता है। लेकिन सत्ता पाने को व्याकुल भाजपा एवं संघ परिवार ने साम्प्रदायिक विभाजन को तीव्र कर वोट पाने की गरज से घनघोर सांप्रदायिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया है। यह संसदीय प्रणाली को बदल कर राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की भाजपा की चिर-परिचित नीति को आगे बढाने का प्रयास भी है। सांप्रदायिक विभाजन को तीखा करने की गरज से भाजपा और संघ परिवार के नेता तमाम भड़काने वाली बयानबाजियां कर रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की यह राय है कि हमारा महान देश अनेक धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं और संस्कृतियों का संमिश्रण है। धर्मनिरपेक्षता हमारी राष्ट्रीय एकता का मुख्य आधार है। हम सभी धर्माबलंबियों को यह भरोसा दिलाने के पक्षधर हैं कि वे सुरक्षित हैं और उन्हें समान अवसर मिलेंगे। देश में सांप्रदायिकता के लिए कोई स्थान नहीं है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने हमेशा देश और देश की जनता के हित में अभूतपूर्व योगदान किया है। आजादी की लड़ाई में हम किसी से पीछे न थे। इतिहास गवाह है कि जमींदारी के उन्मूलन और व्यापक भूमि सुधार के लिए हमने निर्णायक आन्दोलन किये। बैंकों का राष्ट्रीयकरण कराने और राजाओं का प्रिवीपर्स समाप्त कराने में हमने ठोस भूमिका निभाई। सार्वजनिक क्षेत्र की मजबूती के लिए हमने मजबूत आवाज उठाई। हमारे समर्थन पर टिकी संप्रग-1 सरकार को मनरेगा, सूचना का अधिकार अधिनियम, आदिवासी अधिकार अधिनियम, घरेलू हिंसा विरोधी अधिनियम आदि पारित करने के लिए बाध्य किया। सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखने को हम हमेशा मैदान में डटे रहे। हाल में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने महंगाई को नीचे लाने, भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने, सभी को खाद्य सुरक्षा दिलाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक बनाने, किसानों को उनकी पैदावारों का समुचित मूल्य दिलाने, किसानों बुनकरों दस्तकारों और सभी जरूरतमन्दों को रूपये 3000/- प्रति माह पेंशन दिलाने, मजदूरों को उचित वेतन दिलाने, ठेकेदारी प्रथा समाप्त कराने, बेरोजगारों को रोजगार दिलाने, शिक्षा का बाजारीकरण रोके जाने, स्वास्थ्य सेवाओं को आमजन के लिए सुलभ बनाने आदि के लिए भी निरंतर आवाज उठाई है। महिलाओं, आदिवासियों, दलितों एवं अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण के लिए भी हम अनवरत संघर्ष करते रहे हैं। इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि देश और समाज के समक्ष मौजूद चुनौतियों से तभी निपटा जा सकता है जब आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों की जगह जनता के बुनियादी हितों को साधने वाली वैकल्पिक नीतियों को आगे बढाया जाये। और यह तभी संभव होगा जब संसद में एक मजबूत वामपंथी ब्लाक जीत कर आये। यह वामपंथी ब्लाक ही संसद से सडक तक इन मुद्दों पर संघर्ष करेगा। मतदाता भाइयो और बहिनों, मौजूदा निजाम को बदलो, इससे से भी बदतर निजाम को आने से रोको और वामपंथी जनवादी ताकतों के हाथ मजबूत करो। अतएव आपसे अनुरोध है कि जहां-जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं वहां उनके चुनाव निशान - “हंसिया बाली“ के सामने वाला बटन दबा कर उन्हें भारी बहुमत से विजयी बनायें। धन्यवाद!
»»  read more

लोकप्रिय पोस्ट

कुल पेज दृश्य