भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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सोमवार, 30 सितंबर 2013

भाकपा की विशाल रैली संपन्न - साम्प्रदायिकता, महंगाई एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ 21 अक्टूबर को होगा जेल भरो सत्याग्रह

लखनऊ 30 सितम्बर। साम्प्रदायिकता, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ 21 अक्टूबर को जेल भरो आन्दोलन आयोजित करने के फैसले के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आज लखनऊ के ज्योतिर्बाफूले पार्क में रैली एवं विशाल जनसभा का समापन हुआ। जनसभा में उपस्थित हजारों की भीड़ ने प्रदेश में साम्प्रदायिक तथा अन्य विभाजनकारी ताकतों की काली करतूतों का मुंहतोड़ जवाब देने और शांति, सद्भाव एवं भाई चारा बनाये रखने के लिए हर संभव कोशिश करने का संकल्प लिया। जनसभा के पूर्व जिलों-जिलों से आये लगभग बीस हजार पार्टी कार्यकर्ताओं ने चारबाग रेलवे स्टेशन से एक जुलूस निकाला जो बर्लिंग्टन चौराहा, कैसरबाग, परिवर्तन चौक, स्वास्थ्य भवन, रूमी दरवाजा होते हुए ज्योतिर्बाफूले पार्क पहुंच कर जनसभा में परिवर्तित हो गया। जूलूस में प्रदर्शनकारी केन्द्र एवं राज्य सरकारों के खिलाफ गगनभेदी नारे लगा रहे थे।
जनसभा की शुरूआत में ही एक प्रस्ताव पेश किया गया जिसमें मुजफ्फरनगर और उसके समीपवर्ती स्थानों पर हाल में हुए दंगों के लिए जहां एक ओर साम्प्रदायिक भाजपा और उसके सभी संगठनों को दोषी ठहराया गया वहीं साम्प्रदायिकता एवं दंगों का इस्तेमाल वोट की राजनीति करने के लिए समाजवादी पार्टी को भी कठघरे में खड़ा किया गया। विभिन्न पूंजीवादी दलों के नेताओं की दंगों में संलिप्तता को रेखांकित करते हुए समस्त घटनाक्रमों की सर्वोच्च न्यायालय के परिवेक्षण में सीबीआई से जांच कराने की मांग की गई।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एवं पूर्व सांसद एस. सुधाकर रेड्डी ने अपने सम्बोधन में कहा कि लगातार बढ़ती चली जा रही महंगाई के कारण आम आदमी की जिन्दगी दुश्वार हो गयी है। रूपये की कोई कीमत रह ही नहीं गयी है। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री दोनों देश की सम्पत्ति बढ़ने की बात करते हैं लेकिन कुछ ही लोगों की सम्पत्ति बढ़ रही है जबकि अमीर-गरीब के बीच की खाई दिनों-दिन गहरी होती चली जा रही है। संप्रग-2 सरकार के सात मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा परन्तु राजा को छोड़कर कोई भी मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल नहीं गया। प्रधानमंत्री कार्यालय पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार में होने के कारण संप्रग-2 के मंत्रियों को अदालत से सजा मिले या न मिल परन्तु कांग्रेस को जनता की अदालत में जरूर सजा मिलेगी।
भाजपा द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किये जाने पर टिप्पणी करते हुए एस. सुधाकर रेड्डी ने कहा कि भाजपा के सत्ता में आने से नीतियां नहीं बदलने वाली और नीतियों को बदले बिना महंगाई नहीं रोकी जा सकती,  भ्रष्टाचार नहीं रोका जा सकता और साम्प्रदायिकता पर अंकुश भी नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर सार्वजनिक क्षेत्र को बचाना है, सभी के लिए खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, सभी को ईलाज मुहैया कराना है, सभी को शिक्षा मुहैया करानी है तो वैकल्पिक नीतियों के लिए प्रतिबद्ध विकल्प का निर्माण करना होगा जो बिना वामपंथ और विशेष कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूत किये हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने जनता का आह्वान किया कि वे आसन्न लोकसभा चुनावों में भाकपा के अधिक से अधिक प्रत्याशियों को विजयी बनायें।
एस. सुधाकर रेड्डी ने उत्तर प्रदेष की स्थिति पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेष देष का हृदयस्थल है और यह प्रदेष दुर्भाग्य से आर्थिक दृष्टि से भी पिछड़ा है। यहां विकास के लिए वैकल्पिक नीतियों की आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि मुजफ्फरनगर के दंगों से देष का सिर शर्म से झुक गया है। हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक ताकतों के साथ-साथ सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने खुल कर घृणित साम्प्रदायिक नफरत का खेल खेला है। शासक दल भी वोट बटोरने की राजनीति में जुटा रहा और इतना बड़ा जघन्य काण्ड हो गया। राज्य प्रषासन ने स्थिति को नियंत्रण में रखने में ढीढता एवं निष्क्रियता का परिचय दिया। समाजवादी पार्टी की सरकार ने साम्प्रदायिक शक्तियों को समय से रोकने में लापरवाही बरती है जिसको बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा खड़ी की गई बाधाओं के बावजूद लखनऊ में एक मजबूत दस्तक देने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं का अभिवादन करते हुए कहा कि डेढ़ साल पहले बसपा के कुशासन से परेशान हाल जनता ने सपा को वोट देकर यह उम्मीद की थी कि वह जिन्दगी में कुछ उजाला लायेगी परन्तु 16 माह में 1600 किसान आत्महत्या कर चुके हैं क्योंकि चुनाव घोषणापत्र में किये गये वायदे के बावजूद किसानों के कर्जे माफ नहीं किये गये। प्रदेश में श्रम कानूनों का पालन नहीं किया जा रहा है और मुख्यमंत्री उद्योगपतियों से मशविरा करने में ही मशगूल रहते हैं। कन्या विद्या धन का वायदा भी अधूरा रह गया। बेरोजगारी भत्ता भी कुछ हजार लोगों को ही मिला बाकी अभी भी रास्ता देख रहे हैं। जितना लैपटॉप खरीदने में पैसा खर्च नहीं किया गया उससे ज्यादा उसके वितरण के कार्यक्रमों में खर्च हुआ।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने मुजफ्फरनगर और उसके आस-पास की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि आजादी के बाद यह पहला मौका है जब एक लाख लोगों को पलायन कर शिविरों में रहने को मजबूर होना पड़ा है। उन्होंने प्रदेश सरकार से सवाल किया कि कौन है इसका जिम्मेदार? उन्होंने कहा कि मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी भाजपा ने दंगे करवाने के लिए ही घोषित किया है लेकिन 27 अगस्त से 7 सितम्बर तक सपा सरकार कर क्या रही थी? उन्होंने कहा कि मुलायम परिवार अपने राजकुमार को मुख्यमंत्री की ट्रेनिंग दे रहा है और उत्तर प्रदेश की 20 करोड़ जनता उसका खामियाजा भुगत रही है। उन्होंने कहा कि आज तक जो चला है वह आगे नहीं चलेगा, सरकार रहे या जाये, साम्प्रदायिकता को हम चलने नहीं देंगे। उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि संसद में वामपंथ का प्रतिनिधित्व पहुंचाना सुनिश्चित करें। उन्होंने 21 अक्टूबर को जनता के सुलगते सवालों पर जिलों-जिलों में सफल सत्याग्रह करने का आह्वान भी किया।
भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के सचिव एवं अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव अतुल कुमार अंजान ने आज की रैली को उत्तर प्रदेश में राजनैतिक सन्नाटे को तोड़ने वाली रैली बताते हुए कहा कि कुछ लोग लोकतांत्रिक परम्पराओं को खत्म कर देना चाहते हैं। किसानों-मजदूरों के वोटों को छीनने की तैयारियां की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस कहती है ”मीलों हम आ गये, मीलों हमें जाना है।“ परन्तु वह आम जनता को खाक में मिलाने की ओर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जब अटल प्रधानमंत्री बने थे तो आटा 5 रूपये किलो था, जब गये तो 12 रूपये किलो पहुंच गया था। इसी तरह हर जिन्स के दाम दो-तीन गुने बढ़ गये थे। मोदी द्वारा लाल किला और लोकसभा का मॉडेल बनाकर भाषण करने के अंदाज पर कटाक्ष करते हुए कहा कि व्याकुल मोदी न तो लाल किले की प्राचीर से भाषण दे सकेंगे और न ही लोकसभा में अपनी बात रख सकेंगे। उन्होंने कहा कि मुलायम सिंह जी संसद में बताते रहे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक शक्तियां काम कर रही हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी गतिविधियों को रोकने के लिये उनकी सरकार ने कुछ भी नहीं किया।
भारतीय खेत मजदूर यूनियन के महामंत्री नागेन्द्र नाथ ओझा ने जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि खेती, व्यापार, उद्योग, शिक्षा को जनमुखी बनाने के लिए नीतियां बदली जायें और वैकल्पिक नीतियों को लागू किया जाये। उन्होंने कहा कि केवल किसान ही आत्म हत्या नहीं कर रहे हैं बल्कि ग्रामीण मजदूर बड़ी संख्या में या तो भूखों मर रहे हैं या फिर आत्महत्या कर रहे हैं।  मनरेगा में काम नहीं मिलता। 12 करोड़ से ज्यादा के पास जॉब कार्ड हैं। उनमें से केवल 4 करोड़ को ही मनरेगा में काम मिला, उसमें भी केवल 13 लाख को ही साल भर में 100 दिन का काम मिला। उत्तर प्रदेश में तो हालात और ज्यादा खराब रहे हैं - चाहे बसपा की सरकार रही हो या वर्तमान सपा की सरकार हो। अनाज घोटाले में सैकड़ों मुकदमें न्यायालयों में विचाराधीन हैं। उन्होंने कहा कि देश में सब कुछ संकट में है। व्यक्ति बदलने से काम नहीं चलेगा। नीतियां बदली जायें। मोदी के नाम पर साम्प्रदायिकता भड़काई जा रही है। तालाब में मछली पालने के बजाय लाश पालने वाले राजनीतिज्ञों से जनता का भला नहीं होने वाला है। उन्होंने उपस्थित जन समुदाय से साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए काम करने का आह्वान किया।
रैली को सम्बोधित करने वाले अन्य प्रमुख वक्ता थे - माकपा के राज्य सचिव डा. एस. पी. कश्यम, फारवर्ड ब्लाक के राम दुलारे,  एटक के राष्ट्रीय सचिव सदरूद्दीन राना, अखिल भारतीय नौजवान सभा के अध्यक्ष आफताब आलम, अखिल भारतीय स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के अध्यक्ष परमजीत ढांबा। सभा का संचालन भाकपा के राज्य सह सचिव अरविन्द राज स्वरूप ने किया। सभा की अध्यक्षता श्रीमती हरजीत कौर, सुरेन्द्र राम, विश्वनाथ शास्त्री, अशोक मिश्र, इम्तियाज बेग, विनय पाठक के अध्यक्षमंडल ने की।



कार्यालय सचिव

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रविवार, 29 सितंबर 2013

भाकपा की रैली की तैयारियां पूर्ण - रैली में भाग लेने वालों का राजधानी में आगमन शुरू

लखनऊ 29 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्वाधान में कल दिनांक 30 सितम्बर को होने वाली रैली की तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं और रैली में भाग लेने वालों का राजधानी पहुंचना शुरू हो गया है। आयोजकगण आशा कर रहे हैं कि कल प्रातः तक बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और आम जन लखनऊ पहुंचेगें।
भाकपा के राज्य कार्यालय की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह रैली 30 सितम्बर को प्रातः 10 बजे चारबाग रेलवे स्टेशन से प्रारम्भ होगी और बर्लिंग्टन चौराहा, कैसरबाग चौराहा, परिवर्तन चौक होता हुआ ज्योतिर्बा फूले पार्क पहुंचेगा जहां एक जन सभा का आयोजन किया जा रहा है जिसे भाकपा महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी, भाकपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं राज्य सचिव डा. गिरीश, अखिल भारतीय किसान सभा के महामंत्री अतुल कुमार अंजान, भारतीय खेत मजदूर यूनियन के महामंत्री नागेन्द्र नाथ ओझा, पूर्व सांसद, अखिल भारतीय नौजवान सभा के अध्यक्ष आफताब आलम एवं अखिल भारतीय स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के अध्यक्ष परमजीत ढांबा सम्बोधित करेंगे।

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गुरुवार, 19 सितंबर 2013

भाकपा नेताओं का लखनऊ में जमावड़ा 30 सितम्बर को - सम्बोधित करेंगे विशाल रैली को

लखनऊ 19 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं जन संगठनों द्वारा 30 सितम्बर को राजधानी लखनऊ में एक विशाल रैली आयोजित की जा रही है। इस रैली में भाकपा एवं जन संगठनों के कई वरिष्ठ नेतागण भाग लेने लखनऊ पधारेंगे।
उपर्युक्त जानकारी देते हुए भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि इस रैली के प्रमुख वक्ता भाकपा महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी होंगे। इसके अलावा आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की सचिव अमरजीत कौर, अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव अतुल कुमार अंजान, भारतीय खेत मजदूर यूनियन के महासचिव नागेन्द्र नाथ ओझा, अखिल भारतीय नौजवान सभा के अध्यक्ष आफताब आलम, आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष परमजीत ढाबां एवं वे स्वयं भी सम्बोधित करेंगे। अन्य वामदलों के प्रादेशिक नेताओं को भी एकजुटता प्रकट करने हेतु आमंत्रित किया गया है।
रैली के आयोजन के उद्देश्यों के बारे में भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि केन्द्र और उत्तर प्रदेश की सरकारें लगातार जनविरोधी कामों को अंजाम दे रही हैं। इससे आम लागों के कष्ट और कठिनाईयां बेहद बढ़ गयी हैं। अपनी बदहाली के चलते लोगों में दोनों सरकारों के प्रति भारी गुस्सा है। इस गुस्से को आगामी लोक सभा चुनावों में अपने-अपने पक्ष में भुनाने के लिये साम्प्रदायिक एवं जातिवादी दल घृणित खेल खेल रहे हैं। मुजफ्फरनगर का दंगा इसी खेल का परिणाम है जिसमें भाजपा ही नहीं, कंाग्रेस, बसपा और सपा के नेता लिप्त पाये गये।
भाकपा एवं वामपंथ महसूस करता है कि जनता के इस गुस्से को सही दिशा दिये जाने की आवश्यकता है वरना इसका फायदा वही पूंजीवादी पार्टियां उठा ले जायेंगी जिनके काले कारनामों, निकम्मेपन एवं अवसरवादी नीतियों की वजह से यह जनाक्रोश पैदा हुआ है।
भाकपा जनता के ज्वलंत सवालों पर लगातार आन्दोलन चला रही है ताकि जनता के सामने एक वामपंथी जनवादी विकल्प पेश किया जा सके। इन्हीं आन्दोलन के अगले चरण के रूप में 30 सितम्बर को प्रदेशव्यापी रैली लखनऊ में की जा रही है। रैली की केन्द्रीय विषयवस्तु है - 
”महंगाई, अत्याचार और भ्रष्टाचार के खिलाफ!
सद्भाव, विकास और कानून के राज के लिये!!
रैली में उन सभी बिन्दुओं पर चर्चा होगी जो आज प्रदेश एवं देश की तमाम मेहनत करने वाली जनता को व्यथित कर रहे हैं।



(डा. गिरीश)
राज्य सचिव

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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

कैग रिपोर्ट में दोषी ठहराए गये विभागों के मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करे राज्य सरकार. भाकपा

लखनऊ- १७ सितम्बर| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि वह गत सरकार के कार्यकाल में बिजली विभाग एवं यू.पी.एस.आई.डी.सी.सहित कई विभागों में हुए घोटालों के दोषियों को चिन्हित कर उन्हें कड़ी सजा दिलाने को ठोस कदम उठाये| यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ.गिरीश ने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में हुये खुलासों से स्पष्ट हो गया है कि गत सरकार के कार्यकाल में बिजली विभाग, यू.पी.एस.आई.डी.सी., मनरेगा, खनन एवं अन्य विभागों में भारी अनियमिततायें एवं बड़े पैमाने पर धांधली हुयी है| इसी तरह आगरा की विद्युत् व्यवस्था को करोड़ों का घाटा उठा कर टोरंट पावर कं. को सौंप दिया गया था| इतना ही नहीं सारे नियमों को ताक पर रख कर एक ही दिन में तकनीकी बिड और वित्तीय बिड पास कर इस कं. को काम का आदेश थमा दिया गया| इससे बड़ी अनियमितता और क्या हो सकती है| भाकपा ने मांग की है कि इस रिपोर्ट के आधार पर संबंधित विभागों के मंत्रियों एवं जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर अभियोग चलाया जाये और धन की हानि की भरपाई उनकी निजी सम्पत्तियों से की जाये| साथ ही टोरंट पावर के साथ किये करार को तत्काल उसी तरह रद्द किया जाये जिस तरह यह करार किया गया था| डॉ.गिरीश,राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश
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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

वामपंथ को नजरंदाज करना मीडिया की सोची-समझी साजिश.

आजकल बड़े छोटे न्यूज़ चैनल्स का ट्रेंड एकदम साफ है. डिस्कसन पैनल में दो व्यक्ति साम्प्रदायिक पार्टियों के बिठाये जाते हैं जो रोबोट की तरह जो कुछ उनके अंदर फीड किया गया है उसे कोबरा के विष-वमन की तरह उंडेलते रहते हैं. एक कांग्रेस का कोई मरघिल्ला बैल बिठाया जाता है जो दम तोड़ते हुए बुड्ढे की भांति लम्बी लम्बी सांसें लेता हांफता पार्टी के पापों पर पर्दा डालता नजर आता है. एक कोई क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी पार्टी के पक्ष में उलट बांसियाँ करता नजर आता है. लेकिन ८० प्रतिशत शोषित, पीड़ित ,दलित और दमित समाज के लिए संघर्षरत वामपंथ का कोई प्रतिनिधि या तो बुलाया नहीं जाता या बुलाया जाता है तो ऐसा कोई गुड्डा जो वामपंथ के सरोकारों को रखने के बजाय विक्रत अंग, विक्रत वाणी, विक्रत वेश के जरिये विदूषक की भूमिका में नजर आता है. अच्छे,सच्चे और जमीन से जुड़े नेताओं को मौका नहीं दिया जाता. जाहिर है कार्पोरेट हितों का पोषक मीडिया क्यूँ कर आम जनता के सच्चे पेरोकारों को जनता के सामने पेश करेगा. डॉ. गिरीश.
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बुधवार, 11 सितंबर 2013

एक पहेली दो उत्तर.

हम से बढ़ कर कौन? जब चाहा फैला दिया. जब चाहा रोक दिया. जिसको चाहा अंदर किया. समर्पण किया तो छोड़ दिया. हम से बढ़ कर कौन, बोलो! हम से बढ़ कर कौन. पहेली का उत्तर दें?
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सोमवार, 9 सितंबर 2013

COMMUNAL HOLOCAUST IN MUZAFFARNAGAR-a great shock:CPI

COMMUNIST PARTY OF INDIA
Central Office
Ajoy Bhavan, 15, Com. Indrajit Gupta Marg, New Delhi-110002
Telephone: 23232801, 23235058, Fax: 23235543, Email: cpiofindia@gmail.com
General Secretary: S. Sudhakar Reddy
Dated: 9th September 2013 
 
 

The CPI expresses its profound shock and deep concern at the communal holocaust that has broken out in Muzaffarnagar, in Uttar Pradesh. Already 26 people have died and more than 50 grievously injured. The flames have spread from the city to the nearby villages. Belatedly the State Government has called in the army to restore peace and order.

The Government should have acted immediately after two media persons were killed in front of a so-called “Maha Panchayat”. The state administration showed incompetence and inefficiency in controlling the situation.

The Samajwadi Party Government had been lax for quite some time in curbing all these communal outbursts and in countering the aggressive machinations of the Sangh Parivar and other communal forces of minority community, till now when it has been compelled to call in the army. The Akhilesh government should implement its promise of immediate action against erring district officials.

This is the culmination of communal tension breaking into occasional riots that have gripped U.P. for the last few months.

Stalwarts of the BJP and its Sangh Parivar have been named for inciting the people to resort to killings and arson against members and properties of the minority community. This is part of the nefarious design of the communal BJP for its political and electoral gains.

The CPI demands that strict and effective measures should be taken against all the communal instigators and hooligans. They should be apprehended and immediately prosecuted.

The CPI appeals to the people of all communities to restore peace. Peace committees should be formed for going round the affected localities to restore the traditional harmony that has always been the ‘Ganga-Jamuni’ culture of U.P.
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शुरू से सतर्कता बरती होती तो न जलता पश्चिमी उत्तर प्रदेश - भाकपा

लखनऊ 9 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि मुजफ्फरनगर की हिंसा एक सोची-समझी साजिश का परिणाम है और यह राज्य सरकार की पूरी तरह विफलता का परिचालय है। दंगों पर तत्काल रोक लगाया जाना बेहद जरूरी है। दंगों में मृतकों के परिवारों के प्रति गहरी सम्वेदना व्यक्त करते हुये भाकपा ने मुजफ्फरनगर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं देश की जनता से अपील की है कि वह हर स्थिति में शांति एवं सौहार्द कायम रखे और निहित स्वार्थों के मंसूबों को विफल कर दे।
मुजफ्फरनगर की वारदातों पर भाकपा की ओर से जारी बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि पिछले दस-बारह दिनों से साम्प्रदायिक एवं निहित स्वार्थी राजनैतिक शक्तियां मुजफ्फरनगर में अपना विभाजनकारी खेल खेल रही थीं और साम्प्रदायिक विभाजन को गाँवों-गलियों तक ले जाने में जुटी हुईं थीं। इस दरम्यान शासन-प्रशासन एक के बाद एक गलतियां करता रहा जिसकी परिणति यह दंगा है जिसकी चपेट में शामली, बागपत, मेरठ आदि जनपद आ चुके हैं। इस दंगों में अब तक लगभग 30 लोगों की जानें जा चुकी हैं और सैकड़ों स्त्री-पुरूष यहां तक कि बच्चे भी घायल हुए हैं। सम्पत्तियों की भी भारी बरबादी भी हुयी है। समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारी तनाव व्याप्त है। प्रदेश के अन्य भागों में भी तनाव पैदा करने की खबरें मिल रहीं हैं।
सबसे बड़ी बात है कि हालात इस कदर बेकाबू हो गये हैं कि राज्य सरकार को सेना को कमान सौंपनी पड़ी है। उत्तर प्रदेश में ऐसा लगभग डेढ़ दशक बाद हुआ है। इतना ही नहीं इस क्षेत्र के ग्रामीण जीवन के सौहार्द और मेल-जोल का ताना-बाना आजादी के बाद पहली बार टूटा है। यदि इसको पुनः कायम न किया गया तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
भाकपा का आरोप है कि राज्य सरकार साम्प्रदायिक और हिंसक तत्वों से कड़ाई से नहीं निपट रही है। मुजफ्फरनगर में पिछले 10 दिनों से भारी तनाव था और इसी तनाव के बीच एक पंचायत आयोजित हुई लेकिन इस दौरान सम्वेदनशील स्थानों से पुलिस और सुरक्षा बल गायब थे। पुलिस महानिदेशक एवं आई.जी. कानून-व्यवस्था वहां पहुंचे लेकिन स्थिति के बेहद गंभीर होने के बाबजूद उन्होंने स्थानीय पुलिस-प्रशासन को जरूरी निर्देश नहीं दिये। इतना ही नहीं दोनों अधिकारी वहां से पलायन भी कर गये।
प्रदेश सरकार तब हरकत में आयी जब हालात बेहद बेकाबू हो गये। यही वजह है कि सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह अब भी वोटों के ध्रुवीकरण के लिये साम्प्रदायिक विभाजन का उसी तरह प्रयास कर रही है जैसाकि उसने चौरासी कोसी परिक्रमा के समय  किया था। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और सभी धर्मनिरपेक्ष तथा सद्भाव चाहने वाली ताकतों का इसका मुकाबला करना चाहिये।
भाकपा मांग करती है कि वहां उपद्रवी तत्वों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाये, सघन तलाशी अभियान चला कर हथियारों को बरामद किया जाये, घायलों का पूरी तरह उपचार कराया जाये, जान-माल के नुकसान की भरपाई की जाये, मृतकों के परिवारों को समान धनराशि दी जाये, साम्प्रदायिक सौहार्द कायम करने को नागरिक संगठनों और धर्मनिरपेक्ष दलों के कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया जाये। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सरकार और पुलिस-प्रशासन इस ढंग से कार्य करे कि कोई पक्ष उस पर ऊँगली न उठा सके।
भाकपा ने अपनी समस्त जिला कमेटियों से अनुरोध किया है कि वे सौहार्द बनाये रखने हेतु हर सम्भव प्रयास करें। जहां सम्भव हो गोष्ठियां, सद्भाव सभायें तथा मेल-मिलाप के दूसरे कार्यक्रम आयोजित करें।
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रविवार, 8 सितंबर 2013

साजिश का परिणाम है मुजफ्फरनगर का दंगा| भाकपा ने की शांति स्थापित करने की अपील

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि मुजफ्फरनगर की हिंसा एक सोची- समझी साजिश का परिणाम है और इस पर तत्काल रोक लगाया जाना बेहद जरूरी है| दंगों में मृतकों के परिवारों के प्रति गहरी सम्वेदना व्यक्त करते हुये भाकपा ने मुजफ्फरनगर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं देश की जनता से अपील की है कि वह हर स्थिति में शांति एवं सौहार्द कायम रखे और निहित स्वार्थों के मंसूबों को विफल कर दे| कल की मुजफ्फरनगर की वारदातों पर अपनी पार्टी की ओर से जारी बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि पिछले दस दिनों से साम्प्रदायिक एवं निहित स्वार्थी राजनैतिक शक्तियां मुजफ्फरनगर में अपना विभाजनकारी खेल खेल रही थीं और साम्प्रदायिक विभाजन को गाँवों-गलियों तक लेजाने में कामयाब रहीं| इस दरम्यान शासन-प्रशासन एक के बाद एक गलतियाँ करता रहा जिसकी परिणति यह दंगा है जिसमें दर्जन भर से ज्यादा लोगों की जानें गयीं और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं| सम्पत्तियों की भी भारी बरबादी हुयी है| समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारी तनाव व्याप्त है| सबसे बड़ी बात है कि हालात इस कदर बेकाबू हो गये कि सेना को कमान सौंपनी पड़ी है| उत्तर प्रदेश में दशकों बाद ऐसा हुआ है| इतना ही नहीं इस क्षेत्र के ग्रामीण जीवन के सौहार्द और मेलजोल का ताना-बाना आजादी के बाद पहली बार टूटा है| यदि इसको पुनः कायम न किया गया तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे| भाकपा का आरोप है कि राज्य सरकार साम्प्रदायिक और हिंसक तत्वों से कड़ाई से नहीं निपट रही| एक पंचायत को लेकर वहां भारी तनाव था लेकिन सम्वेदनशील स्थानों से पुलिस और सुरक्षा बल गायब थे| पुलिस महानिदेशक एवं आई.जी. कानून-व्यवस्था वहां पहुंचे लेकिन स्थिति के बेहद गंभीर होने के बाबजूद उन्होंने स्थानीय पुलिस-प्रशासन को जरूरी निर्देश नहीं दिये| इतना ही नहीं दोनों अधिकारी वहां से पलायन भी कर गये| प्रदेश सरकार तब हरकत में आयी जब हालात बेहद बेकाबू हो गये| यही वजह है कि सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह भी वोटों के ध्रुवीकरण के लिये साम्प्रदायिक विभाजन का उसी तरह प्रयास कर रही है जैसे कि उसने चौरासी कोसी परिक्रमा के समय किया था|| यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है| भाकपा मांग करती है कि वहां उपद्रवी तत्वों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाये, सघन तलाशी अभियान चला कर हथियारों को बरामद किया जाये, घायलों का पूरी तरह उपचार कराया जाये, जान-माल के नुकसान की भरपाई की जाये, मृतकों के परिवारों को समान धनराशि दी जाये, साम्प्रदायिक सौहार्द कायम करने को नागरिक संगठनों और धर्म निरपेक्ष दलों के कार्य कर्ताओं का सहयोग लिया जाये| सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सरकार और पुलिस-प्रशासन इस ढंग से कार्य करे कि कोई पक्ष उस पर ऊँगली न उठा सके| डॉ.गिरीश, राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश
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बुधवार, 4 सितंबर 2013

Indian Economic Crisis – the Root and the Effect- A.B.Bardhan

Something akin to that has indeed occurred in the last few days. Sensex figure has plunged precipitately shedding more than a couple of thousand points. Rupee, the national currency of India, the symbol of its sovereignty and stability has collapsed. It fell head over heels in relation to the dollar. At the time of writing it has come down to
Rs 68.80 a dollar. Then it appreciated a bit, but there is no knowing what new depths it will plumb. Managers of the economy are hoping that it will find an ‘appropriate level’ at an ‘appropriate time’.
Indian economy is in deep crisis. Nobody can now deny or ignore this fact, hoping that the ominous signs will disappear and things will be back to normal.
 The rate of growth which touched 8.5 for some time and which the government touted as the second highest in the world has come down to less than 5 per cent. It is in fact hovering between 4 and 5 during the year 2012-2013, and in the quarter April to June 2013, it came down to 4.4 per cent, the lowest in 4 years.
 Communist Party of India (CPI) MP Gurudas Dasgupta poured out figures in Parliament to underline the depth of the economic crisis. The Index of Industrial production which is key to economic growth was 1.1 per cent in 2012-13 but it declined to – 1.6 per cent in May 2013 and then went down further to – 2.2 in June 2013. The decline continues unabated. In the service sector this is only 6.6 which is the lowest in last 11 years. In agriculture, the mainstay of our economy the rate of growth is only 1.1 per cent while the population continues to grow at 2 per cent. Consumption has gone down by 3.3 per cent since people don’t have money even to eat.
  The foreign exchange reserve, which was 300 billion dollars, has now come down to 275 million dollars. This is sufficient only for a few weeks or so. India is on the brink of insolvency. The shadow of 1991 hangs over the country. The prime minister has assured us that it is not so. After all India of 2013 is not the India of 1991.
For people of his thinking–i.e. the bourgeois elite, even the Food Security Bill, which has just gone through the Lok Sabha, is to be blamed. They consider every measure that is orientated to bring a modicum of relief to the poor as “populist”, an act of financial profligacy, as something that throws the country’s finances out of gear and spells disaster. They do not think so when a “package” is announced to bail out big business and corporates or when concession, are handed out to them. That according to them are necessary steps to stimulate the economy.
 Yet, in 2010-11 alone the corporate tax foregone was nearly Rs. 58,000 crore. In 2012-13 the estimated tax gone is Rs. 68,000 crore.
 It is true that the currency was devalued also in Brazil, Indonesia, South Africa, and Turkey among the newly emerging economies. But the rupee is the front-runner in a race to the bottom.
 The men who run our economy have no clue to the crisis that has overwhelmed them. Finance Minister Chidambaram is out to find alibis when he shifts the blame on others. He has also blamed his ‘predecessor’ for the financial mess knowing that his predecessor is in no position to reply.  Now that the American economy is on the recovery trail, he cites that as a reason for our disaster since capital is flowing out there for investment.
The country is witnessing a bout of sparring between the Finance Minister and the Governor of Reserve Bank of India (RBI). Mr Subarao, RBI Governor, has in a recent remark observed, “I do hope Chidambaram will one day say: I am often frustrated by RBI, so frustrated that I want to go for a walk, even if I have to walk alone. But thank God, the RBI exists.”
In the process of this economic tsunami the Indian people have suffered a loss of more than 2 lakh crores.
The present crisis in India is not an isolated phenomenon. Capitalism is in crisis. The world capitalist system is going through a prolonged recession. The European Union has been passing through a recession for over three years. Countries like Greece, Portugal, Spain, Italy are the main scapegoats of this downturn. The rate of unemployment in Greece has already reached the astounding figure of 27.6 and even three or four bailout packages have not been able to restore normalcy.
America itself had been going through a crisis beginning with the sub-prime loan crisis four year back, which witnessed the collapse of a number of American banks and financial institutions. The U.S. market shrunk putting pressure on exports from emerging economies like India. With the current signs of recovery in the U.S. the financial liquidity that has been set in motion by the U.S. Federal Reserve has led to a sudden out load of billions of dollars from countries like India, Indonesia and so forth, depreciating their currencies. The US pushes the effect of both its recession and its recovery on to the countries of the capitalist periphery.
Each country suffers the effect in its own specific way following from the economic policies that its government has been pursuing. In India the fiscal deficit and the current account deficit which coincided caused the precipitate fall in the stock exchange and the decline and volatility in the value of the rupee. It further unleashed speculative pressure on the prices of commodities in the market, both of gold on the one hand and vegetables on the other. 
Even Ratan Tata, who is close to the Indian ruling circles, was forced to remark that India has lost the confidence of the world. He also said that the Government was ‘swayed’ by vested interests in the private sector and policies had been changed, delayed and manufactured. Since Tata himself is ‘a vested interest in the private sector’ it will be interesting to know from him who is the vested interests he is pointing at.
 The CPI had initiated a debate on the economic crisis in Parliament on August 7, 2013. Gurudas Dasgupta charged, the country is facing an economic tsunami because of the reckless policies of the government. Non- performing government has generated a dangerous crisis, which is almost an economic disaster thanks to their incapacity and inability….. The livelihood of millions have been affected and crores of jobs have disappeared, while farmers were also in grave distress.”
What solution does the Finance Minister have to overcome the present crisis? Chidambaram begins by asserting, what we need now is not less reforms, but more reforms, not more restrictions but less restrictions, not a closed economy but a more open economy.” The 10-point plan that he has proposed to drag the economy out of the mess is a reflection of this resolve.
The first step in this direction is to stabilize the rupee about which there seems to be no positive proposal.
 The crisis is not a sudden development. It is not a bolt from the blue. We from the Left have been pointing towards all the portends that have eventually brought on the crisis. We have drawn attention. We suggested measures and campaigned for them so as to bring down inflation. The government persisted in taking steps which further fuelled inflation. Repeated hikes in the prices of diesel and other petroleum products were allowed to be taken. There is even talk of a further hefty rise in these prices. They are only kept pending because the crisis overtook any such step.
How did Chidambaram react to the devaluation of the rupee? While acknowledging that some government steps have contributed to the devaluation of rupee, he went on to blame the judiciary for barring or putting an elaborate process for mining, environmental clearance and land acquisition. He admitted that the government had allowed the fiscal deficit to be breached and current deficit to swell because of certain decisions. They were allowed to be taken.
 We demanded that measures should be taken against closure of many industries and manufacturing units which was causing tremendous job losses. Unemployment figures including lack of jobs for educated and qualified youth were soaring.
 The government talks of reforms. But what kind of reforms? The Left has been demanding land reforms, which should mean distribution of land to the landless that helps restoring the agrarian economy. The bourgeois landlord dispensation has baulked taking any such basic reforms. Our aim should be to create a people- friendly socio- economic order in the country.
It necessary to curb imports, particularly of luxury goods, and such goods that are manufactured in the country. At the same time all efforts have to be made to increase India’s exports with a view to ease the balance of payments in the country. The outflow of dollars has to be substantially reduced.
A spate of investments whether public or private has to take place in industries which contribute to job creation, and in the education and health spheres. The emphasis has to be on mobilizing domestic resources (which we do not lack) and domestic capital. Foreign capital is welcome, but it can play only a supplementary role. The objective is to improve the livelihood of our people which alone can be the basis of our future development. Development strategy borrowed from abroad, neo-liberal or any other, cannot help.
A decline in the basic parameters of the economy may be followed by occasional signs of recovery, which will no doubt be hailed by the beleaguered government spokesmen. But the main thing is the stabilization of the economy at some time in the future.
It is important to invest in people. At a time when it is essential to add to the purchasing power of our people, the government is engaged in further restricting the people’s capacity in the name of cutting down on expenditure. This always affects the poorer and toiling sections since what is curtailed is the social security outgo and the subsidies In fact the Left is pressing for fixing the minimum wage at a reasonably higher figure. At the same time Left is demanding pension to all elderly citizens at the rate of Rs.3000 per month.
 The crying need is to reverse the neo- liberal policies pursued at present, which only maximizes the profit of Big Business and Corporate houses, while condemning the majority to poverty and deprivation. Today a situation has emerged where the economic policies are dictated by the corporates for the benefit of the corporates. As long as that persists there may be marginal and occasional recovery while the general downturn and depression continues.
The fall in the value of the rupee, the chaos in the stock-market, the general decline in the economy, and the uncertainty and instability that prevails in the country has its political fall-out that threatens the democratic polity of our country. This requires a separate treatment.
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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

Gurudas Dasgupta's latest letter to the PM on the natural gas price increase scam to favour Reliance.





2/9/2013

Dear Dr. Manmohan Singh ji,
You would kindly recall the issue of gas price revision of RIL operated KG-D6 basin that I had raised in my earlier letters to you. You are also aware that the Finance Ministry has asked Petroleum ministry to examine the issue of pricing the shortfall quantities of gas at the old rate of $4.2 per mmbtu and the categorical rejection of this suggestion by the Petroleum Minister.
It has appeared in the press that the Petroleum Ministry has revised its earlier stand and has now circulated a Cabinet note to the effect that RIL shouldn’t get revised price on gas till the reasons for the fall in output are ascertained. It is further learnt that the Petroleum Ministry has proposed that if it reaches the conclusion that the fall was due to geological difficulties, then they would be allowed the benefit of the price increase to RIL.
The formulation of the Cabinet note in this fashion has again exposed the duplicity of the Petroleum Minister. You would recall that the government has consistently rejected the contention of RIL that the shortfall is due to geological difficulty. I would like to quote from the notice issued by the Government to RIL when cost recovery of $ 1 billion was sought to be disallowed in May 2012:
" You have failed to fulfill your obligations and to adhere to the terms of the PSC and are in deliberate and willful breach of PSC and have thereby caused immense loss and prejudice to the government.
As against the aforesaid required 31 wells to be drilled by April 2012 in accordance with the amended IDP, till date you have completed the drilling of only 18 wells and even out of these 18 wells, only 12 wells are presently in operation.
Your breach of PSC including failure to adhere to and comply with the Amended IDP have resulted in heavy loss of production of gas thereby causing loss to the Government and of scarce natural resource to the nation. You are not entitled to the recovery of costs incurred by you for the excess capacity created in block KG-DWN-98/3 and such recovery of costs has to be limited only to the extent of the infrastructure used by you for the production of the gas."
I may also add that this opinion was reached in consultation with Director General of Hydrocarbons ( DGH), the technical arm of the Petroleum Ministry. In fact the DGH wrote as many as seven letters between December 2010 and April 2011 pointing out the lapses on part of RIL and rejecting its contention of geological uncertainty. This was further re-iterated in the Management Committee meeting dated 17/3/2011. The same conclusion was also reached by the one man expert committee of Dr P Gopalkrishnan, a reservoir expert, who submitted his report to the Petroleum Ministry in April 2011. I must also point out that the Petroleum Ministry has also answered a number of questions in the Parliament wherein it rejected the claim of RIL regarding geological uncertainty.
Trying to re-open this issue, which had been conclusively settled by the previous Petroleum Minister, is a thinly disguised attempt to dilute the earlier stand of the government that the shortfall was on account of deliberate malfeasance of RIL. You are already aware that the present Petroleum Minister has deliberately stalled the arbitration proceedings for the recovery of the penalty of $ 1 billion. By trying to reverse the earlier view of the government, he is trying to weaken the arbitration proceedings and give an alibi to RIL to get away with its grave breach of the PSC.
Further, the Petroleum Minister has chosen not to consult the Fertiliser and Power ministries on this Cabinet note. Not consulting the biggest user ministries further shows the mala fides of the minister, to take a decision by stealth, without proper inter- ministerial consultation.
Since the Government has already taken a view that RIL had deliberately reduced production, the obvious conclusion has to be that the shortfall quantities have to be supplied at the old rates.I would like to re-iterate the financial benefits to the country if this decision were enforced. The shortfall in production in the years 2010-11, 2011-12, 2012-13, 2013-14 against approved targets are 5 mmscmd, 28 mmscmd, 55 mmscmd, 66 mmscmd respectively. This means that the total shortfall over the last four years is a mammoth 154 mmscmd. If this quantity of natural gas were supplied at the old rate of $4.2 per mmbtu instead of the revised rate of $8.4 per mmbtu recently fixed by the government, this would mean a saving of $4.2 per mmbtu. Simple calculations show that for a total of 154 mmscmd of gas and a total price decrease of $4.2 per mmbtu would translate into a total saving of Rs. 63,000 crore for the country. I would request the government to insist that RIL supply the shortfall quantity at the old rates to ensure that their sinister design of deliberately reducing production does not result in windfall profits for them.
I earnestly re-iterate that the government insist that RIL supply the shortfall in gas production at the old rates. I would also request that the government reconsider the decision to raise prices of natural gas and keep it in abeyance until these issues are openly debated with all stakeholders.

With kind regards,
Yours sincerely,

(Gurudas Das Gupta)

Dr. Manmohan Singh,
Prime Minister,
South Block,
New Delhi-110001.
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रविवार, 1 सितंबर 2013

'Very sceptical' about PM's statement on economy: Gurudas Dasgupta

New Delhi,August 30,2013
of () leader Gurudas Dasgupta on Friday said he was ' very sceptical' about Prime Minister Dr. 's statement on the present economic crisis, which will be made before the House today, and expressed that he did not think that the statement would have any immediate impact on the market.
"I am very sceptical because only two days back the Finance Minister made a statement. Therefore, I do not expect anything surprising from him. I do not think he will say anything which will immediately provoke any response in the market," Dasgupta said.
Dasgupta also predicted that the Prime Minister would focus his statement on the 'micro-management', like Finance Minister P. Chidambaram, instead of addressing the grassroot concerns of the people living through the economic meltdown.
"What the Finance Minister has said, he will harp on the same lines. The Finance Minister is very, very, clever. He was talking about the micro-management, about the CAD, about the fiscal consolidation-but the basic human problems that you are facing, regarding the price rise, regarding the job loss, regarding the retrenchment, regarding the instability in the market (was not talked about)," Dasgupta said.
"Spending more is the only solution, but they are not doing it. In fact, they are contracting; they are squeezing the expenditure," he added.
Meanwhile, Parliamentary Affairs Minister Kamal Nath on Friday raised hopes for Dr. Manmohan Singh's Parliamentary address on the state of the country's economy, and assured that the Prime Minister's speech would boost the economic situation in the country.
"The Prime Minister knows the economy better than anyone else and I'm sure his speaking in Parliament and telling the people of this country will have a message which will give a boost to the economy," Nath said.
Facing an attack over the economic situation amid a sliding rupee, Prime Minister Dr. Manmohan Singh told the Parliament on Thursday that he would make a statement on the state of the economy on Friday.
"It cannot be denied that the country is facing a difficult economic situation... I do not deny that there are some domestic factors. But there are also international factors arising out of the change in the US economic stance," Dr. Singh said.
"There are also problems created due to tensions that are on the horizon in Syria and they have inevitable consequences for oil prices. I will be happy to make a statement tomorrow (Friday)," he added.
Leader of Opposition Arun Jaitley raised the issue as soon as the Rajya Sabha met for the day, and demanded a statement by the Prime Minister outlining the steps that the Congress-led UPA II Government is contemplating to tackle the present economic situation.
He then took a dig at Finance Minister P Chidambaram's 10-point suggestions, saying it was just a "discourse in economic theory" when the country was actually moving towards stagflation.
Chidambaram had earlier on Tuesday suggested a 10-point formula to revive the country's economic situation, and sought co-operation from all quarters despite ideological and political differences.
Chidambaram, who was replying to a discussion on the country's economic situation in the Lok Sabha, said the country needs more reforms, lesser restrictions and an open economy.
The Finance Minister said the fiscal deficit would be contained at 4.8 percent of the GDP even after doling out subsidies for the implementation of the Food Security Bill.
He said the government is doing everything to boost investment.
Chidambaram also underlined the need to encourage manufacturing in sectors like power, steel, automobiles and textiles.
"We must increase production of electronics and textiles. We are importing things which we should not have imported. India can be strong only if we have a strong manufacturing economy," he said.
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