भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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बुधवार, 30 नवंबर 2011

भाकपा का 21वाँ राज्य सम्मेलन 16 से 18 दिसम्बर को अलीगढ़ में

वामपंथ को सुदृढ़ करने पर होगी चर्चा

    लखनऊ 30 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक यहां सम्पन्न हुई। बैठक में पार्टी के राज्य सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा की गई। मौजूदा राजनैतिक परिप्रेक्ष्य पर गहरी चर्चा के उपरान्त प्रदेश में वामपंथ को विस्तार देने की प्रारंभिक रणनीति का खाका तैयार किया गया जिसे राज्य सम्मेलन में अंतिम रूप दिया जायेगा। विधान सभा की कुछ अन्य सीटें और प्रत्याशी चयनित किये गये जिसे केन्द्रीय नेतृत्व से चर्चा के बाद घोषित किया जायेगा।
    बैठक के फैसलों की जानकारी देते हुए राज्य सचिव डा. गिरीश ने यहां जारी एक प्रेस बयान में बताया कि भाकपा अपना 21वाँ राज्य सम्मेलन 16 से 18 दिसम्बर अलीगढ़ में आयोजित करने जा रही है। इस सम्मेलन में भाकपा दुनियाँ, देश और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर राज्य कार्यकारिणी द्वारा तैयार प्रस्ताव पर चर्चा करेगी। साथ ही पिछले लगभग चार वर्षों में किये गये आन्दोलन व सांगठनिक कार्यों की समीक्षा भी करेगी। संगठन को चुस्त-दुरूस्त बनाने पर एक सांगठनिक प्रस्ताव पर अलग से चर्चा होगी।
    डा. गिरीश ने कहा कि चूंकि इस समय पूंजीवादी दल अपनी कारगुजारियों के चलते पूरी तरह बेनकाब हो गये हैं, अतएव उत्तर प्रदेश की जनता एक साफ सुथरे नये विकल्प की तलाश में है। एक हद तक इस कमी को वामपंथी दल पूरा कर सकते हैं जो आम जनता की समस्याओं पर लगातार संघर्ष करते रहे हैं, भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं और उनके पास संगठन का एक ठीक-ठाक ताना-बाना पूरे प्रदेश में मौजूद हैं। इस उद्देश्य से भाकपा, माकपा, फारवर्ड ब्लाक और आरएसपी पहले ही एकजुट हो चुके हैं और अब दूसरे वाम समूहों का आह्वान किया गया है कि ऐतिहासिक इस घड़ी में मोर्चे के साथ आयें। कुछ धर्मनिरपेक्ष और भ्रष्टाचार से मुक्त छोटे दलों को भी साथ लेने पर विचार किया जा रहा है।
    डा. गिरीश ने बताया कि राज्य सम्मेलन में इन सारे सवालों पर विस्तार से चर्चा होगी। पार्टी का ढांचा 70 जिलों में है जिनसे जिला सम्मेलनों से चुन कर आये 400 के लगभग प्रतिनिधि और वैकल्पिक प्रतिनिधि अलीगढ़ के हबीब गार्डेन में होने वाले 3 दिवसीय सम्मेलन में भाग लेंगे।
    सम्मेलन के प्रथम दिन 16 दिसम्बर की पूर्वान्ह वहां एक रैली का आयोजन भी किया जा रहा है जिसमें भाकपा महासचिव ए. बी. बर्धन, उप महासचिव का. एस. सुधाकर रेड्डी (पूर्व सांसद), भाकपा संसदीय दल के नेता का. गुरूदास दासगुप्ता, सांसद का. अजीज पाशा एवं केन्द्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान सहित राज्य के नेतागण भाग लेंगे। भाकपा के इस सम्मेलन में राज्य कौंसिल एवं राज्य सचिव का चुनाव भी किया जाता है। पटना में 27 से 31 मार्च तक होने वाले 21वें महाधिवेशन के लिये प्रतिनिधि भी चुने जायेंगे।
    राज्य कार्यकारिणी बैठक में एक प्रस्ताव पास कर खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को छूट देने की केन्द्र सरकार की कार्यवाही की कड़े शब्दों में निन्दा की गई तथा इसे तत्काल वापस लेने की मांग की गई। इस सम्बंध में 1 दिसम्बर को होने वाले भारत बन्द को पूर्ण समर्थन देने और उसमें सक्रिय भागीदारी करने का भी निर्णय लिया गया।
    बैठक की अध्यक्षता सुरेन्द्र राम ने की।
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सोमवार, 28 नवंबर 2011

संदर्भ: फैज अहमद फ़ैज़ जन्मशती वर्ष

फैज अहमद फै़ज़: अवाम का महबूब शायर
साल 2011 हिंदी- उर्दू के कई बड़े कवियों का जन्मशताब्दी साल है। यह एक महज इत्तेफाक है कि हिंदी में जहां हम इस साल बाबा नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह और अज्ञेय को उनकी जन्मशती पर याद कर रहे हैं वहीं उर्दू के दो बड़े शायर मज़ाज और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का भी यह जन्मशती साल है। बहरहाल, इन सब दिग्गज कवियों के बीच फ़ैज़ का मुकाम कुछ जुदा है। वे न सिर्फ उर्दूभाषियों के पसंदीदा शायर हैं, बल्कि हिंदी और पंजाबीभाषी लोग भी उन्हें उतने ही शिद्दत से प्यार करते हैं। गोया कि फ़ैज़ भाषा और क्षेत्रीयता की सभी हदें पार करते हैं। एक पूरा दौर गुजर गया, लेकिन फ़ैज़ की शायरी आज भी हिंद उपमहाद्वीप के करोड़ों- करोड़ों लोगों के दिलों दिमाग पर छाई हुई है। उनकी नज्मों- गजलों के मिसरे और टुकड़े लोगों की जबान पर कहावतों की तरह चढ़े हुए हैं। सच मायने में कहंे तो फ़ैज़ अवाम के महबूब शायर हैं और उनकी शायरी हरदिल अजीज।
 अविभाजित भारत के सियालकोट जिले के छोटे से गांव कालाकादिर में 13 फरवरी, 1911 को जन्मे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शुरूआती तालीम मदरसे में हुई। बचपन में ही उन्होंने अरबी व फारसी की तालीम मुकम्मल कर ली थी। बाद में उन्होंने स्कॉट मिशन स्कूल में दाखिल लिया। अदबी रूझान फ़ैज़ को विरासत में मिला। आपके वालिद सुल्तान मोहम्मद खान की गहरी दिलचस्पी अदब में थी। उर्दू के अजीम शायर इकबाल और सर अब्दुल कदीर से उनके नजदीकी संबंध थे। जाहिर हैं, परिवार के अदबी माहौल का फ़ैज़ पर भी असर पड़ा। स्कूली तालीम के दौरान ही उन्हें शायरी से लगाव हो गया। वे शायरी की किताबें किराये पर ले- लेकर पढ़ते। गोया कि शायरी का जुनून उनके सिर चढ़कर बोलता। शायरी के जानिब फ़ैज़ के इस लगाव को देखकर स्कूल के हेड मास्टर ने एक दिन उन्हें एक मिसरा दिया और उस पर गिरह लगाने को कहा। फ़ैज़ ने उनके कहने पर पाँच-छः अस आर की गजल लिख डाली। जिसे बाद में इनाम भी मिला। इसी के साथ ही उनके नियमित लेखन का सिलसिला शुरू हो गया। स्कूली तालीम के बाद उनकी आगे की पढ़ाई सियालकोट के मरे कॉलेज और लाहौर के ओरियंटन कॉलेज में हुई। वहांॅ उन्होंने अरबी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में एम0ए0 किया। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का परिवार, बड़ा परिवार था, जिसमें पांॅच बहनें और चार भाई थे। परिवार की आर्थिक मुश्किलों को देखते हुए, तालीम पूरी होते ही उन्होंने 1935 में एमएओ कॉलेज, अमृतसर में नौकरी ज्वाईन कर ली। वे अंग्रेजी के लेक्चरर हो गये।
 अमृतसर में नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात महमूदज्जफर, डॉ0 रशीद जहां और डॉ0 मोहम्मद दीन तासीर से हुई। बाद में उनके दोस्तों की फेहरिस्त में सज्जाद जहीर का नाम भी जुड़ा। यह वह दौर था, जब भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ आजादी का आंदोलन चरम पर था और हर हिंदोस्तानी अपनी- अपनी तरह से इस आंदोलन में हिस्सेदारी कर रहा था। ऐसे ही हंगामाखेज माहौल में सज्जाद जहीर और उनके चंद दोस्तों ने 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की। जिसके पहले अधिवेशन के अध्यक्ष महान कथाकार- उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद चुने गए। बहरहाल, फ़ैज़ भी लेखकों के इस अंादोलन से जुड़ गए। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद फ़ैज़ की शायरी में एक बड़ा बदलाव आया। उनकी शायरी की अंतर्वस्तु का कैनवास व्यापक होता चला गया। इश्क, प्यार- मोहब्बत की रूमानियत से निकलकर फ़ैज़ अपनी शायरी में हकीकतनिगारी पर जोर देने लगे। इसके बाद ही उनकी यह मशहूर गजल सामने आई- ”और भी दुख हैं, जमाने में मुहब्बत के सिवा/ राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा/ मुझसे पहली सी मुहब्बत, मेरी महबूब न मांग।“ फ़ैज़ की शायरी में ये प्रगतिशील, जनवादी चेतना आखिर तक कायम रही। कमोबेश उनकी पूरी शायदी, तरक्की पसंद ख्यालों का ही आइना है। उनके पहले के ही काव्य संग्रह ”नक्शे फरियादी“ की एक गजल के कुछ अस आर देखिए- ”आजिजी सीखी, गरीबों की हिमायत सीखी/ यासो हिर्मा के दुख दर्द के मानी सीखे/ जेरदस्तों के मसाइब को समझना सीखा/ सर्द आहों के, रूखेजर्द के मानी सीखे।“
 साल 1941 में ‘नक्शे फरियादी’ के प्रकाशन के बाद फ़ैज़ का नाम उर्दू अदब के अहम रचनाकारों में शुमार होने लगा। मुशायरों में भी वे शिरकत करते। एक इंकलाबी शायर के तौर पर उन्होंने जल्द ही मुल्क में शोहरत हासिल कर ली। अपने कलाम से उन्होंने बार- बार मुल्कवासियों को एक फैसलाकुन जंग के लिए ललकारा। ‘शीशों का मसीहा कोई नहीं“ शीर्षक नज्म में वे कहते हैं- ”सब सागर शीशे लालो- गुहर, इस बाजी में बद जाते हैं/ उठो, सब खाली हाथों को इस रन से बुलावे आते हैं।“ फ़ैज़ की ऐसी ही एक दीगर गजल का शेर है- ”लेकिन अब जुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं। इस जरा सब्र कि फरियाद के दिन थोड़े हैं।“ मुल्क में आजादी की यह जद्दोजहद चल रही थी कि दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। जर्मनी ने रूस पर हमला कर दिया। यह हमला हुआ तो लगा कि अब इंग्लैण्ड भी नहीं बचेगा। भारत में फासिज्म की हुकूमत हो जाएगी। लिहाजा, फासिज्म को हराने के ख्याल से फ़ैज़ लेक्चरर का पद छोड़कर फौज में कप्तान हो गए। बाद में वे तरक्की पाकर कर्नल के ओहदे तक पहुंॅचे। आखिरकार, लाखों लोगों की कुर्बानियों के बाद 1947 में भारत को आजादी हासिल हुई। पर यह आजादी हमें बंटवारे के रूप में मिली। मुल्क दो हिस्सों में बंट गया। भारत और पाकिस्तान। बंटवारे सेे पहले हुई साम्प्रदायिक हिंसा ने पूरे मुल्क को झुलसा के रख दिया। रक्तरंजित और जलते हुए शहरों को देखते हुए फ़ैज़ ने ‘सुबहे-आजादी’ शीर्षक से एक नज्म लिखी। इस नज्म में बंटवारे का दर्द जिस तरह से नुमाया हुआ वैसा उर्दू अदब में दूसरी जगह मिलना बमुश्किल हैं- ”ये दाग दाग उजाला, ये शब गजीदा सहर/ वो इंतिजार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं/ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरजू लेकर/ चले थे यार कि मिल जाएगी, कहीं न कहीं।“ इस नज्म में फ़ैज़ यहीं नहीं रूक गए, बल्कि वे आगे कहते हैं- ”नजाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई/चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई।“ यानि, फ़ैज़ मुल्क की खंडित आजादी से बेहद गमगीन थे। यह उनके ख्यालों का हिंदोस्तान नहीं था और उन्हें उम्मीद थी कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा।
 बहरहाल, बंटवारे के बाद फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पाकिस्तान चले गए। वहां उन्होंने पाकिस्तान टाईम्स, इमरोज और लैलो निहार के संपादक के रूप में काम किया। पाकिस्तान में भी फ़ैज़ का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। यहांॅ भी वे सरकारों की गलत नीतियों की लगातार मुखालफत करते रहे। इस मुखालफत के चलते उन्हें कई बार जेल भी हुई। लेकिन उन्होंने फिर भी अपने विचार नहीं बदले। जेल में रहते हुए ही उनके दो महत्वपूर्ण कविता संग्रह ‘दस्ते सबा’ और ‘जिंदानामा’ प्रकाशित हुए। कारावास में एक वक्त ऐसा भी आया, जब जेल प्रशासन ने उन्हें परिवार- दोस्तों से मिलवाना तो दूर, उनसे कागज- कलम तक छीन लिए। फ़ैज़ ने ऐसे ही हालात में लिखा- ”मताए लौहो कलम छिन गई, तो क्या गम है/ कि खूने दिल में डुबो ली है उंगलियां मैने/जबां पे मुहर लगी है, तो क्या कि रख दी है/हर एक हल्का-ए-जंजीर में जबां मैंने।“ कारावास के दौरान फ़ैज़ की लिखी गई गजलों और नज्मों ने दुनिया भर की आवाम को प्रभावित किया। तुर्की के महान कवि नाजिम हिकमत की तरह उन्होंने भी कारावास और देश निकाला जैसी यातनाएं भोगी। लेकिन फिर भी वे फौजी हुक्मरानों के खिलाफ प्रतिरोध के गीत गाते रहे। ऐसी ही प्रतिरोध की उनकी एक नज्म है- ”निसार मैं तेरी गलियों पे ए वतन कि जहांॅॅ/चली है रस्म की कोई न सर उठाके चले/जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले/नजर चुरा के चले, जिस्मों- जां को बचा के चले।“
 फ़ैज़ की सारी जिंदगी को यदि उठाकर देखे तो उनकी जिंदगी कई उतार-चढ़ाव और संघर्षों की दास्तान है। बावजूद इसके उन्होंने अपना लिखना नहीं छोड़ा। उनकी जिंदगानी में और उसके बाद कई किताबें प्रकाशित हुई। दस्ते-तहे-संग, वादी-ए-सीना, शामे-शहरे-यारां, सारे सुखन हमारे, नुस्खहा-ए-वफा, गुबारे अयाम जहां उनके दीगर काव्य संग्रह हैं। वहीं मीजान और मताए-लौहो-कलम किताबों में उनके निबंध संकलित है। फ़ैज़ ने रेडियो नाटक भी लिखें। जिनमें दो नाटक-अजब सितमगर है और अमन के फरि ते काफी मकबूल हुए। उन्होंने जागो हुआ सबेरा नाम से एक फिल्म भी बनाई। जो लंदन के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में पुरस्कृत हुई। 1962 में उन्हें लेनिन शांति सम्मान से नवाजा गया। फ़ैज़ पहले एशियाई शायर बने, जिन्हें यह सम्मान बख्शा गया।
 भारत और पाकिस्तान के तरक्कीपसंद शायरों की फेहरिस्त में ही नहीं बल्कि समूचे एशिया उपमहाद्वीप और अफ्रीका के स्वतंत्रता और समाजवाद के लिए किए गए संघर्षों के संदर्भ में भी फ़ैज़ सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रासंगिक शायर है। उनकी शायरी जहां इंसान को शोषण से मुक्त कराने की प्रेरणा देती है, वहीं एक शोषणमुक्त समाज की स्थापना का सपना भी जगाती है। उन्होंने अवाम के नागरिक अधिकारों के लिए, सैनिक तानाशाही के खिलाफ जमकर लिखा। ‘लाजिम है कि हम देखेंगे’, ‘बोल कि लब आजाद है तेरे’, ‘कटते भी चलो बढ़ते भी चलो’ उनकी ऐसी ही कुछ इंकलाबी नज्में हैं। अपने जीवनकाल में ही फ़ैज़ समय और मुल्क की सरहदें लांघकर एक अंतर्राष्ट्रीय शायर के तौर पर मकबूल हो चुके थे। दुनिया के किसी भी कोने में जुल्म होते उनकी कलम मचलने लगती। अफ्रीका के मुक्ति संघर्ष में उन्होंने जहांॅ ‘अफ्रीका कम बैक का’ नारा दिया, वहीं बेरूत में हुए नरसंहार के खिलाफ भी उन्होंने एक नज्म ‘एक नगमा कर्बला-ए-बेरूत के लिए’ शीर्षक से लिखी। गोया कि दुनिया में कहीं भी नाइंसाफी होती, तो वे अपनी नज्मों और गजलों के जरिये प्रतिरोध दर्ज करते थे।
 कुल मिलाकर फ़ैज़ की शायरी आज भी दुनिया भर में चल रहे लोकतांत्रिक संघर्ष को आवाज देती है। स्वाधीनता, जनवाद और सामाजिक समानता उनकी शायरी का मूल स्वर है। फ़ैज़ अपनी सारी जिंदगी में इस कसम को बड़ी मजबूती से निभाते रहे- ”हम परविशे- लौह-ओ-कलम करते रहेंगे/ जो दिल पे गुजरती है, रकम करते रहेंगे।“ एक मुकम्मल जिंदगी जीने के बाद फ़ैज़ ने 20 नवम्बर, 1984 को इस दुनिया से रूखसती ली। अवाम का यह महबूब शायर शारीरिक रूप से भले ही हमसे जुदा हो गया हो, लेकिन उनकी शायरी हमेशा जिंदा रहेगी और प्रेरणा देती रहेगी- ”बोल, कि लब आजाद हैं तेरे/बोल कि अब तक जुबा है तेरी।“
- जाहिद खान
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प्रगतिशील लेखन आन्दोलन के पचहत्तर वर्ष

एक आग है जो जलती है अभी
भारत के सांस्कृतिक इतिहास का यह कोई विरल संयोग अथवा सहसा घटित घटना नहीं है कि युगान्तकारी विकराल मूर्ति भंजक प्रगतिशील लेखन आन्दोलन तथा अपने समय के सामाजिक यथार्थ के सबसे कुशल चित्रेता कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द्र के काल-जयी उपन्यास ‘गोदान’ की पचहततरवीं वर्षगांठ एक साथ मनायी जा रही है। साथ ही ऐसी यागदार विभूतियों की जन्म शताब्दियांॅ भी, जिन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ व आन्दोलन की संस्थापना, उसकी वैचारिकी व सैद्धान्तिकी रचने एवम् उसके चतुर्दिक विस्तार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। जैसे कि फैज, नागार्जुन, केदारनाथ अगव्राल, शमशेर बहादुर सिंह, मजाज तथा भगवत् शरण उपाध्याय। सज्जाद जहीर, डॉ0 रशीद जहांॅ, डॉ0 अब्दुल अलीम, मुल्कराज आनन्द इत्यादि की जन्म शताब्दियांॅ निकट अतीत की ही घटनाएंॅ हैं। एक ही वर्ष में प्रगतिशील आन्दोलन का आरम्भ तथा गोदान का प्रकाशन (जून 36) काल विशेष में व्याप्त सामाजिक व्याकुलता तथा बदलाव की छटपटाहट की अभिव्यक्ति के दो रूप ही माने जा सकते हैं। यह कांग्रेस के नेतृत्व से भारतीय बुद्धिजीवियों के मोहभंग का दौर था और सामंती साम्राज्यवाद की संगठित शक्ति से मुठभेड़ की छटपटाहट का भी।
 इतिहास का क्रमिक विकास बताता है कि लन्दन में जुलाई, 1935 में प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन के गठन, जिसका प्रथम अधिवेशन ई0एम0 फॉस्टर के सभापतित्व में हुआ तथा इसके ऐतिहासिक महत्व के घोषणा पत्र के जारी होने के उपरान्त सज्जाद जहीर की लन्दन से वापसी पर तब की सांस्कृतिक राजधानी इलाहाबाद में जस्टिस वजीर हसन (सज्जाद जहीर के पिता) के आवास पर दिसम्बर, 1935 में प्रेमचन्द्र की उपस्थिति में प्र0ले0सं0 की पहले इकाई के गठन का फैसला हुआ। इसी बैठक में अप्रैल, 1936 में लखनऊ में प्र0ले0सं0 का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन करने का भी निर्णय किया गया। बैठक में प्रेमचन्द्र व सज्जाद जहीर के अतिरिक्त मुंशी दयानारायण निगम, मौलवी अब्दुल हक, अहमद अली, डॉ0 रशीद जहांॅ, जोश मलीहाबादी व फिराक गोरखपुरी इत्यादि उपस्थित थे। एजाज हुसैन भी। प्रगतिशीलता को ठोस वैचारिक- सांस्कृतिक अभियान का रूप देने के पक्ष में व्यवहारिक रणनीति बनाने का अवसर दिया था, ”हिन्दुस्तान एकेडमी“ (इलाहाबाद) के एक समारोह ने जिसमें हिन्दी- उर्दू के अनेक विख्यात रचनाकार सम्मिलित हुए थे।
 तीव्र होते सघन संक्रमण के उस दौर में अप्रैल 36 आते-आते सृजन व बौद्धिकता के क्षेत्र में बहुत कुछ घटित हो चुका था। रूसी इंकिलाब, हाली का मुकदमा-ए-शेरो शायरी, सरसैय्यद तहरीक, प्रेमाश्रम, सेवासदन और कर्मभूमि, माधुरी, हंस तथा रामेश्वरी नेहरू की पत्रिका स्त्री दर्पण के साथ ही शेख अब्दुल्लाह की खातून (अलीगढ़) और सत्य जीवन वर्मा की पहल पर बना हिन्दी लेखक संघ फांसीवाद के विरूद्ध कला और संस्कृृति की रक्षा के लिए 1935 में पेरिस में सम्पन्न हुआ लेखकों और संस्कृति कर्मियों का ऐतिहासिक सम्मेलन, जिसने सज्जाद जहीर को गहरे तक प्रभावित किया। वे उस सम्मेलन में मौजूद थे। साहित्य, अभिव्यक्ति के दूसरे माध्यमों मेें प्रगतिशीलता, मानवीय कला दृष्टि व जीवन मूल्य की हैसियत पाने के सघर्ष में थी। राम विलास शर्मा जिसे स्वतः स्फूर्त यथार्थवाद कहते आये हैं। सौन्दर्य के प्रति दृष्टिकोण में भी सन् 1936 के बाद जैसी न सही परन्तु तब्दीली अवश्य आई थी। नवम्बर, 1932 में सज्जाद जहीर के सम्पादन में चार कहानीकारों के कहानी संग्रह ‘अंगारे’ का प्रकाशित होना तथा मार्च 1933 में उस पर प्रतिबन्ध लग जाना। 15 अप्रैल, 1933 को महत्वपूर्ण अंग्रेजी दैनिक ”लीडर“ में अंगारे के कहानीकारों द्वारा इस प्रतिबन्ध के विरोध व भर्त्सना में एक संयुक्त बयान प्रकाशित होना, भविष्य में भी ऐसा लेखन जारी रखने का संकल्प प्रकट करना तथा यथास्थितिवादी ह्रासोन्मुख पतन शील सामंती जीवन व कला मूल्य के विरूद्ध प्रगतिशील बदलाव परक दृष्टिकोण के प्रचार- प्रसार केा रचनात्मक अभियान की शक्ल देने के उद्देश् से ”लीग ऑफ प्रोग्रेसिव आथर्स“ का प्रस्ताव इस प्रेस वक्तव्य में प्रस्तुत किया गया था। यह शोध अभी शेष है कि आखिर क्यों प्रगतिशील लेखकों की लीग बनाने के प्रस्ताव को उस समय अमली जाना नहीं पहनाया जा सका। जबकि बाद के वर्षों में प्र्रगतिशील लेखक संगठन- आन्दोलन को बनाने- फैलाने में अंगारे के इन चारों कहानीकारों की भूमिका अत्यन्त महतवपूर्ण थी और यह कि किन कारणों से सज्जाद जहीर ने प्रगतिशील आन्दोलन के दस्तावेज की हैसियत रखने वाली पुस्तक ”रौशनाई“ में ”लीडर“ में प्रकाशित बयान व उसमें ”लीग ऑफ प्रोग्रेसिव आथर्स“ के गठन के प्रस्ताव का उल्लेख नहीं किया। क्या इस कारण कि ‘अंगारे’ के प्रकाशन के बाद से ही उनके और अहमद अली के बीच मतभेद आरम्भ हो गये थे, जो आगे अधिक तीखे होते गये और यह कि लीडर में छपे बयान में मुख्य भूमिका अहमद अली ही की थी। यहांॅ उस विभाजक रेखा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है जो अंगारे की कहानियों के कथा तत्व, उनकी वैचारिक भूमि तथा प्रेमचन्द्र के अध्यक्षीय सम्बोधन में निहित वृहत्तर सामाजिक यथार्थ की चिन्तनशीलता के बीच ख्ंिाचती दिखाई पड़ी थी, जिसने 1945 में हैदराबाद में हुए प्रगतिशील लेखकों के एक सम्मेलन में बड़े विवाद का रूप ले लिया था। यशपाल के दादा कामरेड (1943) को लेकर भी राम विलास शर्मा ने ऐसी ही एक रेखा खींची है।
 इतिहास का यह भी एक विस्मयकारी तथ्य है कि राम विलास शर्मा ने 1950 में प्र0ले0 संघ में प्रगतिशील शब्द को लेकर भी आशंका प्रकट की थी। उनकी आपत्ति प्रगतिशीलता के लिए बुद्धिवाद की अनिवार्यता पर भी थी। डॉ0 नामवर सिंह के अनुसार, “उन्होंने लेखकों को शिविरों में बांॅटने वाले इस संगठन का नाम अखिल भारतीय जनवादी लेखक संघ, अथवा परिसंघ ;।सस प्दकपं न्दपवद वत थ्मकमतंजपवद व िक्मउवबतंजपब ॅतपजमतेद्ध रखने का प्रस्ताव दिया था।“
 बहरहाल प्रगतिशील आन्दोलन के पचहत्तरवें वर्ष में कई सारे जरूरी प्रश्नों के साथ ही इस प्रकार के लुप्त हो आये प्रश्नों से भी मुठभेड़ की आवश्यकता महसूस की जा सकती है। भुला दिये गये इस प्रसंग को भी याद किया जा सकता है कि लंदन (1935), लखनऊ (1936) घोषणा पत्रों के जारी होने तथा प्रेमचन्द के ऐतिहासिक अध्यक्षीय सम्बोधन से पूर्व 1935 में ही उर्दू में प्रकाशित अख्तर हुसैन रायपुरी के लेख ”अदब और जिन्दगी“ का व्यापक स्वागत हुआ। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका हिन्दी अनुवाद कराकर ”माधुरी“ में प्रकाशित किया। 1936 में नागपुर में हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में इस लेख पर आधारित घोषणा पत्र पर मौलवी अब्दुल हक और प्रेमचन्द के साथ ही पण्डित जवाहर लाल नेहरू तथा आचार्य नरेन्द्र देव ने भी हस्ताक्षर किये। लेख में अख्तर हुसैन रायपुरी का जोर इस बात पर है कि साहित्य को जीवन की समस्याओं से अलग नहीं किया जा सकता, समाज को बदलने की इच्छा जगाने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। लन्दन से जारी घोषणा पत्र पर अख्तर हुसैन रायपुरी के भी हस्ताक्षर थे। भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता विषय पर शिवदान सिंह चौहान के लेख ने जो 1937 में ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित हुआ, प्रगतिशीलता के पक्ष में फिज़ा को साज़गर बनाने में मदद की। हालांकि नामवर सिंह ने इसे आन्दोलन को क्षति पहुंॅचाने वाला लेख बताया है। जबकि राम विलास शर्मा इसके प्रशंसक थे।
 यह छोटी सी भूमिका इस कारण कि नित नये आते हिन्दी पाठक आन्दोलन के पचहत्तरवें वर्ष में कुछ अचर्चित रह जाने वाली जरूरी सच्चाईयों से परिचित हो सके। और इसलिए भी कि प्रगतिशील आन्दोलन की सुसंगत वैचारिक शुरूआत की समग्र प्रेरणाएंॅ यूरोपीय नहीं थी, जिसका आरोप इस पर दक्षिणी पंथी प्रतिक्रियावादी धार्मिक व अन्य विभिन्न विचार क्षेत्रों तथा सत्ता समर्थक खेमों की ओर से लगाया जाता रहा है। कभी अंग्रेजी दैनिक ‘स्टेट्रसमैन’ ने इस अभियान में अग्रणी भूमिका ली थी तथा समाज में हिंसा व आराजकता फैलाने का आरोप लगाते हुए प्रगतिशील लेखक संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की गुहार लगायी थी। प्रगतिशील दृष्टि सम्पन्न साहित्यिक संगठन के निर्माण की चर्चा के दौर में ही ‘गोदान’ जैसे किसान केन्द्रित महाकाव्यात्मक उपन्यास की, बदलाव की चेतना जिसमें एक आग की तरह प्रवाहित है, रचना प्रक्रिया का गतिशील होना तथा लन्दन प्रवास से वापस आये सज्जाद जहीर का पहले अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए प्रेमचन्द से आग्रह करना संकेत करता है कि दोनों की बुनियादी चिन्ताओं में कोई विपरीतता नहीं थी। ठीक उन्हीं दिनों किसानों के अखिल भारतीय संगठन का अस्तित्व में आना और किसान आन्दोलन का तेज होना, इस संकेत को अधिक चमकदार बनाता है। यहांॅ अधिवेशन की तिथियों का भी अपना महत्व है। ये तिथियांॅ (9-10 अप्रैल) लखनऊ में आयोजित किसान सम्मेलन के साथ जोड़ कर निश्चित की गयी थी, कुछ किसान लेखकों के अधिवेशन में शरीक भी हुए थे। (ऐसे ही एक किसान नेता ने पंजाब में आन्दोलन के आरंभिक विस्तार में मदद की थी) तब और भी जब हम पाते हैं कि सज्जाद जहीर आन्दोलन के आरम्भिक दिनों में किसानों के बीच कवि सम्मेलन, मुशायरे तथा साहित्यिक सभाओं की परम्परा स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे जैसा कि बाद के वर्षों में कानपुर, बम्बई, अहमदाबाद, मालेगांॅव इत्यादि औद्योगिक नगरों में मजदूरों के बीच घटित होती दिखाई पड़ी। यह आयोजन आमतौर पर टिकट से होते थे। इनके विज्ञापन ‘नया पथ’ तथा दूसरी पत्रिकाओं में अब भी देखे जा सकते हैं। यानि कि ‘गोदान’ प्रगतिशीलता के महाभियान के गति पकड़ने से पहले ही प्रगतिशील रचना कर्म के उच्च प्रतिमान के रूप में सामने आ चुका था। 75वें वर्ष में इसकी आलोचना के कुछ नये आयाम अवश्य निर्मित हुए है।
 फलस्वरूप प्रगतिशील आन्दोलन के पचहत्तर वर्ष के इतिहास को गोदान व प्रेमचन्द से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भले ही कथा सम्राट आन्दोलन का भौतिक नेतृत्व बहुत कम समय ही कर पाये हों। उसी तरह जैसे अंगारे, हंस, माधुरी, विशाल भारत, रूपाभ तथा नया अदब व नया साहित्य, इण्डियन लिट्रेचर, परिचय को अलग नहीं किया जा सकता और न ही उसे उन्नीसवीं सदी के भारतीय नवजागरण से असम्बद्ध किया जा सकता है और न सदी के उत्तरार्द्ध में अंकुरित उन बहसों से जो आस्था, ज्ञान जीवन पद्धति तथा मानव अधिकारों से सम्बन्धित थी। नवजागरण ने अपने को खोजने, पाने तथा स्वाधीनता की लालसा को बौद्धिक आवेग दिया था, कारणवष प्रेमचन्द्र का समूचा लेखन तथा प्रगतिशील आन्दोलन परस्पर पूरक होते दिखाई पड़े तो यह स्वाभाविक तरीके से हासिल हुई बड़ी उपलब्धि ही थी। सर सैय्यद तहरीक और प्रेमचन्द्र के साहित्य के समान प्रगतिशील रचनाओं ने भी समाज को प्रभावित किया तथा राष्ट्रीय संस्कृति के निर्माण में अपने हस्तक्षेप की ऐतिहासिकता प्राप्त की। अवश्य ही भक्तिकाल के बाद जीवन व कला कर्म को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करने वाला यह अकेला आन्दोलन था।
 प्रगतिशील कवियों- शायरों की रचनाएंॅ न केवल मजदूरों- किसानों के आन्दोलनों को गति व धार दे रही थी बल्कि आजादी के मतवालों के दिलों में भी आग भर रही थी। बताने की जरूरत नहीं कि इंकलाब की एक काव्य रचना में सबसे पहले राजनैतिक अर्थों में प्रयुक्त हुआ ”इंकिलाब“ शब्द कहांॅ से आया था और कैसे वह बहुत थोड़े समय में समूचे उत्तरी- पूर्वी भारत में परिवर्तनकारी उत्तेजना का प्रतीक बन गया कि उसने क्रान्तिकारी आन्दोलन के भी अति-प्रिय उद्बोधन की हैसियत प्राप्त की। एक शब्द के भीतर छिपे हुए महाप्रलय के संकेत से लोग पहली बार परिचित हुए, याद कीजिए फैज का तराना। एक अकेला शब्द दमित जनता की मूल्यवान पूंॅजी के रूप में जन संघर्ष की थाती बन गया, उसी तरह जैसे भोर, सुबह या सहर शब्द जो उम्मीद और बदलाव का रूपक बन गया। भोर या सुबह होने का मतलब केवल उजाला होना नहीं बल्कि एक अंधकारमयी सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था से उजासमयी व्यवस्था में जाना, समय का साम्यवादी होना अथवा अमीरों की हवेली का गरीबों की पाठशाला बनना, तख्तों का गिरना, ताजों का उछलना या राज सिंहासन का डांॅवाडोल होना हो गया। प्रगतिशील आन्दोलन जिन कुछ खास लक्ष्यों को लेकर आगे बढ़ रहा था, उनमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच अजनबीपन व दूरियों को कम करना भी था। यह कोई साधारण घटना नहीं है कि सन् 1936 के ठीक दो वर्ष बाद संघ का दूसरा अधिवेशन कलकत्ता में हो रहा था। जहांॅ यदि एक ओर महाकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर एक संदेश के द्वारा आन्दोलन व अधिवेशन का स्वागत कर रहे थे, और जनता से अलग-थलग रहने पर अपनी आलोचना तो दूसरी ओर बंगभाषी महानगरी में उर्दू, अरबी व जर्मन भाषाओं के एक विद्वान डॉ0 अब्दुल अलीम को प्र0ले0 संघ का महासचिव बनाया गया था। उनके द्वारा दिया गया भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखे जाने का विवादास्पद प्रस्ताव इसी समय आया था। बांग्ला, उर्दू, हिन्दी के अतिरिक्त अधिवेशन में पंजाबी, तेलुगू इत्यादि भाषाओं के लेखक भी सम्मिलित हुए थे। बलराज साहनी और उनकी नव वधू दमयन्ती थी। छायावाद के इसी अवसान काल में सुमित्रानन्दन पंत व निराला भी प्रगतिशीलता की ओर आकृष्ट हुए थे। अज्ञेय के आकर्षण का भी तकरीबन यही काल है। संयोग से ये तीनों ही आन्दोलन के साथ दूर तक नहीं चल पाये। पन्त ने ‘रूपाभ’ को एक तरह से आन्दोलन के लिए समर्पित कर दिया था। डॉ0 नामवर सिंह इसे संयुक्त मोर्चे की साहित्यिक अभिव्यक्ति कहते हैं। लेकिन आन्दोलन के कर्णधारों को आर्थिक चिंता उत्तरी- पूर्वी भारत में उर्दू- हिन्दी लेखकों के संयुक्त मोर्चा को लेकर थी। नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा अंजुमन तरक्की उर्दू इत्यादि के भाषागत अभियानों से दोनों भाषाभाषी श्ंाका व संशय के घेरे में थे। हिन्दुस्तानी के विकल्प ने हिन्दी भाषियों की शंका को अधिक गहरा किया था, कारणवश यदि कुछ लोगों को उर्दू लेखकों की पहल पर प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना भी उर्दू के पक्ष में कोई रणनीतिक कार्यवाही महसूस हुई हो तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए और न आरम्भिक वर्षों में आन्दोलन के प्रति उनके ठण्डे रवैये पर। यकीनी तौर पर थोड़े अन्तरालोपरान्त वे बड़ी संख्या में आन्दोलन के साथ आये, उनकी सम्मिलिति से संगठन व आन्दोलन दोनों को अप्रतिम बल व विस्तार प्राप्त हुआ। अपनी शिनाख्त के प्रति संदनशील रहते हुए वे एक दूसरे के निकट आये। फलस्वरूप औपनिवेशक साम्राज्यवाद, फासीवाद, युद्ध सांप्रदायिकता, धर्मोन्माद, बंगाल के महादुर्भिंक्ष के खिलाफ तथा जनसंघर्षों के विविध अवसरों पर दोनों भाषाओं के रचनाकार साझे मंच पर दिखाई पड़े। फासीवादी युद्ध के विरूद्ध उर्दू- हिन्दी लेखकों का साझा बयान इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आया, जो नया साहित्य में प्रकाशित हुआ। अब इसको क्या कीजिए कि जिस प्रकार अनेक लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकारों ने अन्तिम सांॅस तक प्रगतिशील आन्दोलन से अपनी सम्बद्धता को खण्डित नहीं होने दिया उसी प्रकार विडम्बनाओं ने भी इतिहास का साथ नहीं छोड़ा। देश विभाजन से पूर्व यदि 1945 में उर्दू के प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन हैदराबाद में हो रहा था तो सन् 1947 में विभाजन के ठीक एक माह बाद हिन्दी के प्रगतिशील रचनाकारों का अधिवेशन साम्प्रदायिक तनाव के बीच इलाहाबाद में आयोजित हुआ। उसी इलाहाबाद में जहांॅ प्रगतिशील लेखन आन्दोलन की नींव पड़ी थी, रमेश सिन्हा द्वारा लिखित जिसकी रिपोर्ट कम्युनिस्ट पार्टी के साप्ताहिक ”जनयुग“ तथा अन्य पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित हुर्ठ। उसी अधिवेशन में उर्दू का एक नौजवान जोशीला शायर (अली सरदार जाफरी) उर्दू लेखकों के अकेले प्रतिनिधि के रूप में हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों को समूचे सहयोग का आश्वासन देते हुए उनसे राष्ट्र भाषा के मुद्दे पर जल्दबाजी में कोई फैसला न लेने की मार्मिक अपील कर रहा था। जबकि 31 अगस्त को बम्बाई में हुई प्रलेस की बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि पाकिस्तान में उर्दू के साथ हिन्दी को भी राष्ट्रभाषा बनाये जाये। बैठक में उपस्थित सभी लेखक उर्दू के थे। बम्बई में ही 24 सितम्बर की बैठक में अली सरदार जाफरी ने इलाहाबाद सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुत की और कहा कि हिन्दी लेखकों में उर्दू का उतना विरोध नहीं है जितना हम समझते हैं। अलग- अलग अधिवेशनों का यह सिलसिला बाद में भी जारी रहा। दूसरे रूपों में भाषा विवाद भी जारी रहा। उत्तर प्रदेश में माहौल ज्यादा उत्तेजना पूर्ण था। कभी-कभी कटुता इतनी गहरी हुई कि एक ही संगठन के लोग भिन्न शिविरों में विभाजित एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकते नजर आये, जिसका दुखद उदाहरण प्र0ले0 संघ के स्वर्ण जयन्ती समारोह (अप्रैल, 1986, लखनऊ) में देखने में भी आया। गौरवपूर्ण इतिहास के पचहत्तरवें वर्ष का यथार्थ यह है कि प्रमुख रूप से कुछ उर्दू लेखकों द्वारा आरम्भ किये गये इस आन्दोलन में उर्दू रचनाकारों की भागीदारी लगातार कम होती गयी है। वैसे केन्द्रीय धारा के लेखकों एवम् महिला रचनाकारों की दूरी भी आन्दोलन से बढ़ी है।
 भाषा के प्रश्न पर कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ देने वाले राहुल सांकृत्यायन ने देश की तमाम जनपदीय बोलियों को जातीय भाषा मानते हुए उनके अपने- अपने प्रदेश बनाने का सुझाव रखा तो उर्दू के मुद्दे पर उनसे सहमति रखने वाले राम विलास शर्मा ने इस पर घोर आपत्ति की। विडम्बना यहांॅ भी है। पचहत्तर वर्ष के पूर्णता काल में यह मुद्दा नया ताप ग्रहण कर रहा है। जनपदीय बोलियों की रक्षा और अधिकार के प्रति संवेदनशीलता का विस्तार हुआ है। जाहिर सी बात है ऐसे में प्रगतिशील लेखक संघ को निश्चित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत पड़ सकती है। यों बम्बई प्रलेस की बैठक में प्रो0 मुम्ताज हुसेन ने भी कुछ ऐसे ही प्रस्ताव रखा था।
 पूरी पौन सदी में विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच जीवन्त संवाद- गतिशील आवाजाही का उद्देश्य भले पूर्णतः न प्राप्त कर पाया हो, इन भाषाओं का विशाल एका बनाने का स्वप्न जरूर पूरा हुआ। जहीर कश्मीरी व रंजूर जैसे प्रखर जनवादी रचनाकार देने वाला आन्दोलन कश्मीरी भाषा में खास कारणों से अवश्य शून्य तक पहुंॅच गया। डोगरी में उसकी गतिशीलता बनी रही। देखने वालों ने वह मंजर भी देखा कि उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से सम्बन्ध रखने वाले परिवार का एक युवा तेलंगाना के निर्माण तथा तेलुगू- उर्दू भाषी आयाम के अधिकारों के लिए जुझारू संघर्ष के मैदान में था। वह अपने उर्दू गीतों से तेलुगू भाषी जनता के दिलों में आग भर रहा था। अकेले मख्दूम के कारण तेलुगू भाषी क्षेत्र में प्रगतिशील आन्दोलन के विस्तार में बड़ी मदद मिली। ठीक उसी तरह जैसे मलियाली क्षेत्र में वल्लत्तोल और बिहार के एक बड़े क्षेत्र में नागार्जुन के कारण। बंगाल में हीरेन मुखर्जी की वजह से तो पंजाब में फैज के प्रयासों से। बम्बई में अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी, साहिर लुधियानिवी, मजाज इत्यादि के कारण। जैसे वामिक जौनपुरी की अकेली नज्म ”भूका है बंगाल रे साथी“ से प्र0ले0 संघ व इप्टा दोनों तहरीकों को बड़ी शक्ति प्राप्त हुई। शील के इस गीत से भी कि ”नया संसार बसायेंगे, नया इंसान बनायेंगे.......“
 इस लम्बे दौर में विस्मृति के धंुधलके में चले गये आन्ध्र प्रदेश के वामपंथी- प्रगतिशील संस्कृति कर्मी डॉ0 कृष्णा राव ने अपने एक नाटक के जरिये आन्ध्र प्रदेश के किसानों को उद्वेलित व संगठित करने का जो ऐतिहासिक कारनामा अंजाम दिया, उसे याद रखना आवश्यक है। कृष्णा राव ही उस नाटक के लेखक, निदेशक व केन्द्रीय पात्र थे। इससे इप्टा व प्रलेस दोनों के प्रसार में मदद मिली। एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय डॉ0 राजबहादुर गौड़ को भी हम याद करते चलें।
 आन्दोलन की शुरूआती सैद्धान्तिकी में ही विभिन्न कला माध्यमों के बीच उद्देश्यपरक वैचारिक रागात्मकता की जरूरत को रेखांकित किया गया था, उस ओर उत्तेजक अग्रसरता आन्दोलन की विशिष्ट उपलब्धि है। प्रमुख रूप से साहित्य के पारम्परिक चरित्र को बदलते हुए आन्दोलन ने केन्द्रीय धारा के विभिन्न कला माध्यमों में सक्रिय लोगों, बौद्धिकों व विद्वानों को भी गहरे तक प्रभावित किया था। मई 1943 में इप्टा के अस्तित्व में आने से स्वप्न को नये रंग मिले थे। साहित्य, संगीत, रंग कर्म को सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति के पक्ष में इस तरह एकाकार होते कब किसने देखा था। कला जीवन में उत्साह, उमंग, ऊर्जा और चेतना भर रही थी। आनन्दित होने के क्षणों से गुजरते हुए व्यवस्था द्वारा सताये गये गरीब जन संघर्ष का संकल्प ले रहे थे। लेखन आन्दोलन अपनी समूची सदाशयता के बावजूद लोक साहित्य में वैसी हलचल घटित नहीं कर सका था जैसी जन नाट्य आन्दोलन ने लोक संगीत, लोक नाट्य तथा लोक साहित्य में संभव की। रंगमंच के साथ मजदूरों किसानों का ऐसा जीवन्त रिश्ता पहले कब बन पाया था। इसे संभव करने में प्रगतिशील रचनाकारों की सक्रिय भूमिका थी। हम यहांॅ प्रलेस द्वारा ‘मई दिवस’ के आयोजन की परम्परा को भी याद कर सकते हैं।
 ”आवामी थियेटर और प्रगतिशील लेखकों के आन्दोलन में चोली दामन का साथ था। प्रगतिशील लेखकों की संस्था के बहुत से कार्यकर्ता आवामी थियेटर में भी काम करते थे और उसे संगठित करने में उन्होंने बहुत अहम हिस्सा लिया।“
 मराठी लम्बी कविता पावड़ा और तेलुगू की बुर्रा कथाओं ने प्रासंगिकता के नये शिखर प्राप्त किये। अन्नाभाऊ साठे के पावड़े सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। साठे प्रलेस के सक्रिय साथी थे। अवश्य ही विविध लोक नाट्यांे को नया जीवन प्राप्त हुआ, परन्तु उसके पीछे मुख्य भूमिका लोक नाट्य कर्मियों की थी। इप्टा की सफलता ने फिल्म निर्माण की ओर अग्रसरता को सहज बना दिया। इस क्रम में ख्वाजा अहमद अब्बास की किसान केन्द्रित फिल्म ”धरती के लाल“ एक विस्फोट की तरह थी। इस बिन्दु पर जो बात ध्यान देने की है वह यह है कि इन तमाम पड़ावों के दौरान होरी, धनिया और गोबर के तनावों व संघर्षों को केन्द्रीयता प्राप्त रही। एक तरह से ‘गोदान’ आन्दोलन का सहयात्री बना रहा। कभी-कभी पथ प्रदर्शक भी। इससे दूसरी सामाजिक समस्याओं, राजनैतिक चुनौतियों, सांस्कृतिक संकटों व अन्तर्राष्ट्रीय व्याकुलताओं को नेपथ्य में ढकेल देने का तात्पर्य नहीं ले लेना चाहिए।
 विशिष्टताओं की बात जब चल ही निकली है तो यह जिक्र भी होता चले कि प्रगतिशील राजनैतिक शक्तियांॅ जिन मोर्चों पर विजय की मुद्रा बनाये नहीं रख पायीं असफलता उनकी नियति बनी प्रगतिशील साहित्यिक मोर्चे या लेखन आन्दोलन ने उन्हीं मोर्चांे पर ताबनाक कामयाबियांॅ अर्जित की।
 इनमें सबसे प्रमुख है साहित्य में दक्षिण पंथी साम्प्रदायिक पुनरूत्थान वादी शक्तियों का प्रगतिशील जनवादी रचनाकारों की सक्रियता के कारण हाशिये पर चले जाना। जातिवादी, नस्लभेदी, स्त्री विरोधी मानसिकता का व्यापक तिरस्कार। जनविरोधी सामंतवादी शक्तियों के विरूद्ध निरन्तरता प्राप्त करती सजगता, अन्ततः साहित्य में उनका अपदस्थ होना, साहित्यिक जन-तांत्रिकता की वैभवपूर्ण सम्पन्नता के बीच ‘जन’ का केन्द्रीयता प्राप्त करना। बताने की आवश्यकता नहीं कि भारतीय राजनीति के बड़े फलक पर जहांॅ ‘जन’ बहुलता में सत्ता की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल होता रहा है, अपने बारे में अराजकशोर के बीच उसकी निःस्वरता आह में भी नहीं बदल पाती। जबकि साहित्य में उसकी वंचना, अभाव, पीड़ा, चीख, संघर्ष और प्रतिवाद सब लगातार घटित होता आया है। शब्द जैसे उसके भीतर उतर पाने की अपूर्व सामर्थ्य से समृद्ध हुआ।
 ऐसा सत्ता के किसी शिखर पर पहुंॅचने के लिए नहीं बल्कि प्रगतिशीलता की कसौटी के रूप में स्थापित हुई सामाजिक प्रतिबद्धता तथा यथार्थ के प्रति संवेदनशील, मानवीय वैज्ञानिक दृष्टि के कारण संभव हो पाया। यानि ऐसा साहित्यिक जिम्मेदारी के तहत हुआ। एक मोर्चे पर जन की गुहार यदि संभावना पूर्ण अवसरों का निर्माण करती है तो साहित्य में जन प्रतिबद्धता कई अवसरों से वंचित। उदाहरणों की कमी नहीं है। खतरे और भी हैं। तनिक सी जल्दबाजी या असावधानी के कारण ‘जन’ से प्यार पर लिजजिली भावुकता या सपाट समझ का आरोप भी लग सकता है। यानि ”खुदा मिला न विसाले सनम“। बीते पचहत्तर साल ऐसी कई त्रासदियों के साक्षी हैं। इसे प्रगतिशील आन्दोलन की उपलब्धि ही कहा जायेगा कि विपरीतता के बावजूद आन्दोलन से जुड़े या उसकी आंॅच से तपे रचनाकर जनसंघर्षों से भले दूर होते चले गये हैं (वह भी एक दौर था जब अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन में भारत का प्रतिनिधित्व मख्दूम ने किया तो पाकिस्तान का फैज ने। बाद के वर्षों में भी मजदूर मोर्चे पर लेखकों की सक्रिया जारी रही) जन से उसी अनुपात में विमुख नहीं हुए। वह साहित्य के केन्द्र में है। जबकि भारतीय राजनीति में वह हाशिये पर चला गया है। तकरीबन यही स्थिति दलित व स्त्री की भी है। अधिकांश राजनैतिक दलों के लिए ये सत्ता सोपानों से अधिक महत्व नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं। जबकि साहित्य में ये अनिवार्यता प्राप्त कर रहे स्थाई विमर्श का विषय है। विमर्श वृहत्तर संदर्भों से सम्बद्ध हुआ है। अनुभूति परक संवेदनशीलता तथा वैचारिक दायित्व बोध जिसका खास अवलम्ब है। जहांॅ समानता और आजादी किसी एक फूल या रंग का नाम नहीं बल्कि समग्र बदलाव का प्रतीक है। रात से भोर की ओर जाने की यात्रा जैसा अल्पसंख्यकों तथा जनजातियों के सामाजिक यथार्थ से यदि साहित्य वंचित नहीं रह गया तो इसमें प्रगतिशील आन्दोलन का कुछ योगदान अवश्य है, जबकि स्त्री मुक्ति के स्वप्न को फ्रायडवादी, यौनकेन्द्रित, मनोविज्ञान एवम् दलित दमित वर्ग के लिए नई सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की चेतना को एकान्तिकता, आध्यात्मवादी परोपकारी मानवतावाद से बचाने की चुनौती सामने थी।
 प्रगतिवाद के उभार के तीव्रतम दौर में ही प्रयोगवाद भी बहुत गतिशील रहा है। इसे सिद्धान्त विशेष की शक्ति ही माना जायेगा कि प्रयोगवाद ने प्रगतिशील रचना कर्म को प्रभावित तो अवश्य किया परन्तु वह कोई कठिन चुनौती खड़ी नहीं कर पाया। अवश्य ही अनेकानेक प्रगतिशील रचनाकारों ने परिपाटी तथा शिल्पवादी आवेग से मुठभेड़ करते हुए भाषा व शिल्प के स्तर पर प्रयोग किये। कुछ आलोचक शिल्पवाद को साम्राज्यवादी कुचक्र घोषित करते रहे। अन्तर्वस्तु का पुराना लोक जैसे अदृश्य ही हो गया। कथा परिदृश्य पर ग्रामीण परिवेश के प्रभुत्व, सामान्य पारिवारिक व उपेक्षित जातीय पृष्ठभूमि से आये पात्रों उनके संघर्ष ने पाठकों को पहली बार अपनी जमीन का साहित्य होने की अनुभूति दी। मध्यवर्गीय वर्चस्व ने इसे थोड़ा धुंॅधलाया अवश्य फिर भी वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार तथा विस्थापित स्त्री की स्थापना ने यह भरोसा तो दिया ही कि समाज बदल भी सकता है। यथार्थ की खोज में पेड़ से गिरे फल पर उन्होंने भरोसा नहीं किया। सम्पूर्ण मनुष्य के यथार्थ को उद्घाटित करने के क्रम में जीवनानुभव और गहन अन्वेषण के साथ वैज्ञानिक पुनर्रचना की दिशा में वो गये। प्रगतिशील जनवाद की तीव्रता के क्षणों में कला के प्रति बढ़ते सम्मोहन से जो आत्मसंघर्ष निर्मित हुआ उसने कई यादगार कृतियों के लिए फिज़ा साज़गार की।
 प्रगतिशील जीवन दर्शन से हासिल हुई समय व समाज को समझने की अन्तर्दृष्टि ने स्वानुभूति को सामूहिक अनुभूति में रूपान्तरित करते हुए उसे उच्चतम स्तरों तक ले जाने की चुनौती उन्होंने स्वीकार की। दृष्टि की संकीर्णता तथा स्थानीयता के अतिक्रमण की ओर जाते हुए वे जिस विराटता की ओर गये उसने उन्हें सर्वदेशीय विश्व दृष्टिकोण तक पहंॅुचाया। स्थापना के दिन से ही प्रगतिशील आन्दोन के निश्चित अन्तर्रष्ट्रीय सरोकार रहे हैं। ये सरोकार वृहत्तर भारतीय चिंता के रूप में स्थापित हुए, यह याद रखने वाली घटना है। फै़ज़ की कई नज़्में जिसका बेहतर उदाहरण है। शमशेर की कुछ कविताएं भी इस ओर ध्यान खींचती है। विश्वदृष्टि का अर्थ भारतीय सीमाओं के पार की सच्चाईयों को पकड़ना ही नहीं, वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में यथार्थ को देखना था।
 आन्दोलन के कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेरित या उससे निर्देशित होने के आरोपों को झुठलाने के प्रयास अब लगभग नहीं होते। स्वयम् संगठन के अन्दर पार्टी की नीतियों से आन्दोलन के प्रभावित होने के मुद्दे पर विवाद उठना अतीत की बात हो चुकी है। पार्टी के प्रति उन्मुखता से जहांॅ एक ओर आन्दोलन के व्यापक विस्तार में मदद मिली वहीं उसकी नीतियों से प्रभावित होने ने कई आघात भी पहुंॅचाये। विश्व युद्ध व भारत छोड़ों आन्दोलन के प्रति दृष्टिकोण, पाकिस्तान की मांॅग का समर्थन,प्रगतिशील आन्दोलन के संस्थापक सज्जाद जहीर को पार्टी निर्माण के लिए पाकिस्तान भेजना, उनका वहांॅ, फैज तथा कई सैनिक अधिकारियों के साथ राजद्रोह के आरोप में पकड़े जाना, कांग्रेस के प्रति भिन्न अनुपातों में आकर्षण का लगातार बने रहना, अन्ततः आपातकाल की हिमायत ने भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के सामान्य नागरिकों, विशेष रूप से मध्य वर्ग के मनोविज्ञान पर नकारात्मक प्रभाव छोड़े। हालांकि इन कारणों से कम्युनिस्ट पार्टी को जितनी क्षति उठानी पड़ी उतनी प्रगतिशील आन्दोलन को नहीं, फिर भी उसे आघात तो पहुंॅचते ही रहे। पार्टी बीस धड़ों में विभाजित हुई तो आन्दोलन प्रमुखतः तीन धड़ों में। जहांॅ आन्दोलन नहीं है, वहांॅ पार्टी भी नहीं है, परन्तु जहांॅ पार्टी नहीं है वहांॅ आन्दोलन शेष है। मध्य प्रदेश जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जम्मू, मालेगांॅव, भिवण्डी तथा पाकिस्तान के भी कुछ शहर। यह स्थिति जनता के विराट हृदय से समझ भरे सम्पर्क के कारण ही संभव हो पायी है। जनाकांक्षाओं से जुड़ने के लिए हथियार उठाना अथवा सड़कों पर उत्तेजक नारों के साथ उतरना ही हमेशा जरूरी नहीं होता, आकांक्षाओं की प्रभावपूर्ण कलात्मक अभिव्यक्ति, जनवादी लयात्मकता वंचित वर्ग के लोगों को साथ करने में सहायक हो सकती है। भौतिक आवश्यकताओं से अलग जनता की सांस्कृतिक आकांक्षाएंॅ भी होती हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि में प्रगतिशीलों ने जनता की सांस्कृतिक आकांक्षाओं की भी चिंता की है। प्रश्न इतना भर है कि नेतृत्व किन लोगों के पास है।
 संयोग नहीं हालात की स्वाभाविक परिणति है कि ऐसे ही समय में जब विशाल कम्युनिस्ट या वामपंथी एका की बात चल रही है तभी वृहद सांस्कृतिक मोर्चा बनाने की जरूरत भी शिद्दत से महसूस की जा रही है। सांस्कृतिक मोर्चे के निश्चित राजनैतिक परिप्रेक्ष्य हो सकते हैं। सावधानी चाहिए तो बस इतनी ही कि वह पार्टी की जरूरतों पर आधारित न हो। ”साहित्य को राजनीतिक चेतना से सम्पन्न बनाने का अर्थ साहित्य- सृजन और चिंतन में राजनीतिक संघर्ष की रणनीति और कार्य नीति का अमल नहीं है।“
 समय का साम्यवादी होना दिवास्वप्न की तरह है तो स्टालिनग्राड के मोर्चे पर हिटलर की सेनाओं के ध्वंस से उत्साहित होकर मख्दूम का झूम-झूमकर गाया गीत ”यह जंग है जंगे आजादी“ दिलों में पहले जैसा ओज भरने की सामर्थ्य खो चुका है। सुमन की लालसेना पूंॅजीवाद की चाकरी में है तो फैज के आश्वासनों के बावजूद सहर अब भी बहुत दूर है, एक हथौड़े वाले से कई हथौड़े वाले और फौलादी हाथों वाले होते चले जाने के बावजूद पूंॅजीवाद का कुछ नहीं बिगड़ा है। कई दिनों बाद घर में दाने आने की दारूण स्थिति अब भी शेष है। वाम दिशा विहान दिशा हो आयी है। कारण वश प्रगतिशील आन्दोलन की प्रासंगिकता भी शेष है और उसकी जरूरत भी। उसी तरह जैसे गोदान की। बावजूद इसके यह नहीं कहा जा सकता कि भोर का स्वप्न अपना समूचा सम्मोहन खो चुका है, भूमण्डलीकरण और बाजार वाद द्वारा प्रस्तुत कलाकर्म को हाशिये पर डालने, इलेक्ट्रानिक चैनल्स द्वारा उसे जीवन से बाहर निकालने तथा सांस्कृतिक प्रदूषण की चुनौती ने प्रगतिशील आन्दोलन, सांस्कृतिक एका तथा अमानवीय लूट के विरूद्ध वैचारिक सृजनात्मकता तथा मानवीय संवेदना के हस्तक्षेप दोनों को अधिक जरूरी बनाया है। बदलाव की इच्छा आवेगपूर्ण हो आई हो तो संकीर्णता व अतिवाद के खतरे पैदा हो ही जाते हैं। कविता नारा बन जाती है। लड़ाई के दौर में नारों की अपनी भूमिका होती है। यह लड़ाई का दौर है। नारे फैज ने भी लगाये, शमशेर, नागार्जुन, मख्दूम, मजाज और केदारनाथ अग्रवाल ने भी, शिवमंगल सिंह सुमन, शील, मजरूह, तोप्पिल भासी और कैफी आजमी, नियाज हैदर ने भी। नारों से साहित्य को उतनी बड़ी क्षति नहीं पहुंॅचती जितनी नारे न होने पर जनसंघर्षों को, इंसान की भलाई की लड़ाई को पहुंॅच सकती है। इससे साहित्य को नारा बनाने की पक्षधरता का तात्पर्य नहीं लेना चाहिए, कहना मात्र इतना है कि यदि साहित्य का इंसानी भलाई से कोई सरोकार है तो नारों के लिए कुछ गंुजाइश तो होनी ही चाहिए। नारा भी कलात्मक अनुभव हो सकता है। अब इसे सम्मानीय आलोचक रोमांटिक और अंधलोकवादी रूझान कहे तो कहें।
 हबीब जालिब की शायरी का बड़ा हिस्सा नारा है। फैज की कुछ नज्में भी। पाकिस्तान की निरंकुश सत्ताएं दोनों से लगातार भयभीत रही। वहांॅ प्रगतिशील आन्दोलन को अपनी यात्रा कठिन परिस्थितियों में तय करनी पड़ी। रावल पिण्डी साजिश केस (1948) ने हालात को अधिक दुरूह बनाया। प्रगतिशील लेखक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। कई लेखक गिरफ्तार कर लिये गये (1954) इनमें वहांॅ के राष्ट्रीय सचिव अहमद नदीम कासमी भी थे। लाहौर में प्रगतिशील लेखकों के पहले अखिल पाकिस्तान सम्मेलन (नवम्बर, 1949) पर लाठी डण्डों से हमला किया गया। लेखकों पर पाकिस्तान-इस्लाम विरोधी नारों का इल्जाम लगाते हुए उनके विरूद्ध मुकदमें दर्ज हुए। रावल पिण्डी साजिश केस के बाद चालीस मस्जिदों के इमामों ने फैज व दूसरे प्रगतिशील लेखकों के खिलाफ बयान जारी किये। यहांॅ तक कि लन्दन में प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक दीन मुहम्मद तासीर भी मुखालिफों में शामिल हो गये। पंजाब के गवर्नर के रूप में जिनके पुत्र सलमान तासीर की हाल ही में हत्या हुई है। मतलब यह है कि जिनपे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे। पाकिस्तान में प्रलेस द्वारा आयोजित मई दिवस के जलसों पर भी हमले किये गये।
 पाकिस्तान बनने के तुरन्त उपरान्त तक उस क्षेत्र यानि कि पश्चिमी पाकिस्तान की कई भाषाओं जैसे सिन्धी, पंजाबी, पश्तो, मुल्तानी, सरायकी इत्यादि भाषाओं में प्रगतिशील आन्दोलन की जड़े कहीं गहरी, कहीं कम गहरी हो चुकी थी। पूर्वी पाकिस्तान की भी लगभग यही स्थिति थी। वहांॅ आन्दोलन के कार्यकर्ता अब भी मौजूद हैं। कुछ साल पहले तक सिन्धी अदबी संगत की शाखाएंॅ सिन्ध से बाहर रावल पिण्डी, कोयटा तथा जद्दा तक में सक्रिय थी। कई बड़े शहरों में प्रगतिशील लेखक कहीं मूल कहीं बदले हुए नामों वाले संगठनों के बैनर तले संगठित हैं। स्वर्ण जयन्ती समारोह (लखनऊ 1986) में वहांॅ से बड़े प्रतिनिधि मण्डल का आना और वहांॅ स्वर्ण जयन्ती का भव्य आयोजन तथा 1936 से 1986 तक के अधिवेशनों की रिपोर्टों पर आधारित दस्तावेज का प्रकाशित होना, एकतरफा, मंशूर, अफकार, आज, फुनून, सीप जैसी पत्रिकाएं, वहांॅ रचे जा रहे साहित्य यह संकेत देते रहे हैं कि 1936 में रौशन चिंगारी वहांॅ बुझी नहीं है। साहित्य का केन्द्रीय स्वर अब भी प्रगतिशील है। साम्राज्यवादी विस्तार, पूंॅजीवादी लूट, जन दमन, एकाधिकार वाद, लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन, स्त्रियों की बाड़े बन्दी तथा धार्मिक उन्माद उससे पैदा हुआ आतंकवाद, उसकी व्यावसायिकता के विरूद्ध लेखक खतरे उठा कर भी लिख रहे हैं। महिला रचनाकारों की साहसिकता ने हदों को तोड़ा है और साबित किया है कि संगठन के बगैर भी आन्दोलन चलते रह सकते हैं। पाकिस्तान के प्रगतिशील रचनाकारों ने अमन व मित्रता के पक्ष में शस्त्रों की होड़ तथा युद्ध विरोधी अभियानों की भी अगुवाई की हैं पाकिस्तान के रचनाकारों ने प्रगतिशीलता के संदेश को कई अमरीकी, यूरोपीय तथा एशियाई देशों में पहंॅुचाने की पहल अर्जित की है। कहीं- कहीं संगठन भी मौजूद है, जैसे लन्दन में जिसने 1985 में स्वर्ण जयन्ती का भव्य आयोजन भी किया। ब्वउउमदजउमदज नाम से एक दस्तावेज भी प्रकाशित किया। पत्रिकाएं तो निकलती ही हैं। निःसन्देह प्युपिल्स पार्टी के शासन काल में प्रलेस की गतिविधियांॅ ज्यादा तेज हुई। बंगाल, केरल, त्रिपुरा में वामपंथी शासन के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया यह अलग बात है।
 भारत हो या पाकिस्तान संकरी संकीर्णता ने आन्दोलन को जो क्षति पहुंॅचाई वह अपनी जगह। उल्लेखनीय है कि फैज पाकिस्तान प्र0ले0सं0 से उसके नेतृत्व तथा भारत में कुछ रचनाकार राम विलास शर्मा व अली सरदार जाफरी के अतिवादी रवैये के कारण ही अलग हुए थे। अति उदारता ने भी आन्दोलन को बहुत नुकसान पहुंॅचाया, कृश्नचन्दर के सचिव काल में तो जैसे अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। राजीव सक्सेना के काल में भी लगभग यही स्थिति थी। भीष्म साहनी तथा डॉ0 कमला प्रसाद का नेतृत्व आन्दोलन की बड़ी उपलब्धि है। सज्जाद जहीर के समय की अखिल भारतीयता आन्दोलन को उन्हीं के काल में प्राप्त हो पायी। उनकी सक्रियता ने आन्दोलन में जैसे नये प्राण फूंॅक दिये। बांॅदा, गया और जबलपुर- जयपुर के अधिवेशनों ने आन्दोलन को विनाश की हद तक पहुंॅचने से बचाया। सिकुड़ती हुई सीमाओं के बीच गया सम्मेलन ने संघ को महासंघ बना दिया। उत्तर प्रदेश में 1975 के बाद आया नया उभार यहीं से प्रेरित था। जबलपुर का अधिवेशन (1980) इस अर्थ में महत्वपूर्ण साबित हुआ कि उसने कम से कम मध्य प्रदेश में संगठनात्मक लक्ष्यों की पूर्ति तथा आन्दोलन के फैलाव में बड़ी मदद की। समूचे उत्तरी पूर्वी व पश्चिमी भारत में आन्दोलन, उससे भी ज्यादा प्रगतिशील लेखन के पक्ष में समर्थन का उत्तेजनापूर्ण वातावरण बनाने में लघु पत्रिका आन्दोलन ऐतिहासिक महत्व का योगदान दे रहा था। ”पहल“ की उसमें विशेष भूमिका थी। बहुत कुछ हार कर खास वर्गों का हित पोषण करने वाली अन्याय परक व्यवस्था के विरूद्ध शब्दकर्म का वह महा अभियान अब अतीत का यथार्थ हो गया है। लेकिन धमनियों में शिथिल होते रक्त को प्रवाह देने का सामर्थ्य अब भी उसके पास हैं। सच पूछिये तो आधुनिकता- स्वच्छंदतावादी, विसर्जोन्मुखी प्रवृत्तियों को, तथा निराकारी आत्मोन्मुखी शमशानी मनोविज्ञान के धराशाई होने में लघुपत्रिका आन्दोलन की शक्ति प्रमुख थी। ऊर्जा समानान्तर सिनेमा से भी मिल रही थी। ”प्रगतिशील आन्दोलन अपनी भूमिका निभा चुका है, उसे भंग कर देना चाहिये“ का उद्घोष करने वाली विसर्जनवादी प्रवृत्ति विभाजन के बाद ज्यादा सक्रिय दिखाई दी थी। हताश होकर उसका स्वयम् विसर्जित हो जाना इतिहास की बड़ी घटना है। कमोवेश यही स्थिति लगभग इसी काल में पारम्परिकता के पूर्ण निषेध आधुनिकतावाद पोषित अमूर्त्तता, कलावाद, वैयक्तिकता, सामाजिक उद्देश्य से विमुखता, अकहानी, नई कहानी, प्रतीक वाद तथा साहित्य की स्वायत्तता आदि प्रवृत्तियों का संगठित आक्रमण भी तेज हुआ। उर्दू में अपेक्षाकृत यह ज्यादा सघन था। इससे आन्दोलन को कुछ चोट अवश्य पहुंॅची। परन्तु इसका अंजाम भी विर्सजनवाद के जैसा ही हुआ। सामाजिक प्रतिबद्धता अग्नि परीक्षा के बाद कुन्दन सी आभामयी हो गयी। 1953 के दिल्ली व 1954 के कराची अधिवेशनों में इसका खास नोटिस लिया गया।
 पूंॅजीवादी प्रलोभनों, अमरीका प्रेरित कल्चरल फ्रीडम के नारों, तीव्र होते व्यवसायीकरण और महंगाई में आटा गीला हो जाने के समान सोवियत संघ तथा दूसरी साम्यवादी सत्ताओं का पतन, लाखों- लाख लोगों को सम्मोहित करने वाला सुनहरा स्वप्न ही बिखर गया, निराशाजन्य अवसद के बीच आन्दोलन की यात्रा अधिक कठिन हो गयी। कामरेड का कोट चीथड़े हो गया। वोदका का मादक स्वाद जीवन की कसैली याद जैसा हो आया। इन हालात में यगाना चंगेजी की वह फब्ती कौन दोहराता जो उन्होंने 1857 के संदर्भ में मिर्जा गालिब पर कसी थी
 शहजादे पड़े फिरंगियों के पाले
 मिर्जा के गले में मोतियों के माले
या यह कि -
 तलवार से गरज न भाण्डे से गरज
 मिर्जा को अपने हलवे माण्डे से गरज
 उपलब्धियों के कई तमगो के बीच एक दाग भी है, लेखकों, विशेष रूप से युवा लेखकों के हित में आन्दोलन या प्र0ले0सं0 का कोई ठोस काम न कर पाना। प्रकाशकों के शोषण से उन्हें बचाने के लिए कोई कारगर रणनीति न अपना सका। एक केन्द्रीय प्रकाशन गृह और पत्रिका का निरन्तरता न प्राप्त कर पाना। प्रलेस के अधिवेशनों की रिपोर्टों का संकलित न हो सकता। दाग और भी है लेकिन यह दाग़ धब्बे दिखाने का अवसर नहीं है। इसकी जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह पर नहीं, आन्दोलन में शामिल सभी रचनाकारों पर आती है। यह समय आत्मविश्लेषण का जरूरी है। गहरे आत्ममंथन का समय है। जो आग या मशाल 1936 में रौशन हुई थी, उसकी आंॅच कम हुई है पर वह बुझी नहीं है। उस आग में, मशाल में पूर्वजों ने इतनी आंॅच और रौशनी भर दी है कि वह आसानी से बुझेगी भी नहीं, नये रचनाकार आते रहेंगे वो उसके होने से इंकार करेंगे और उसकी तपन से प्रभावित भी होते रहेंगे। कोई भी रचनाकार भले वह कितना ही ऊर्जावान हो परम्परा से कटकर बहुत दूर तक नहीं जा सकता। जब परम्परा की याद आयेगी तो प्रेमचन्द याद आयेंगे, जब प्रेमचंद याद आयेंगे तो प्रगतिशील लेखन आन्दोलन याद आयेगा। यह स्मरण की उस आग को बाकी रखेगा, यों तो जो लिखा जा रहा है उसका बहुतांश ही उसके शेष रह जाने का संकेत है।
 डॉ0 नामवर सिंह ने 1986 में प्रगतिशील आन्दोलन की पचासवीं वर्षगांॅठ के अवसर पर लिखे गये अपने एक लेख में रेखाकित किया है कि ”वस्तुतः सन् 1936 के बाद का हिन्दी साहित्य प्रगतिशील आन्दोलन के सचेत और संगठित हस्तक्षेप का पात्र है“ और उसे हम चाहें तो वाल्टर वेन्जामिन के शब्दों में ”इतिहास के नैरंतर्य में विस्फोट की संज्ञा दे सकते हैं....“
 इतिहास के इस नैरंतर्य को आगे जारी रखने की कठिन चुनौती आन्दोलन के सहयात्रियों के सम्मुख है। डा0 नामवर सिंह ने लेख की शुरूआत में यह भी याद दिलाया है कि ”पचास साल पहले, जैसी और जिन चुनौतियों का सामना करने के लिए, प्रगतिशील लेखक संघबद्ध हुए थे, आज वैसी ही, किन्तु उनसे भी अधिक गंभीर चुनौतियांॅ हमारे सामने हैं .....“
 तब भी कुछ खास चुनौतियों के संदर्भ अन्तर्राष्ट्रीय थे, आज वे संदर्भ अधिक भयावह रूप में प्रस्तुत है। संयोग से गोदान भी जिन चुनौतियों से टकराते हुए पूर्णता प्राप्त करता है, बिगड़ी हुई शक्ल में वे चुनौतियांॅ भी हमारे सम्मुख है। धार्मिक- सांप्रदायिक फासीवपाद से बाजारवादी शक्तियों के गठजोड़ ने प्रगतिशील लेखन का संकट बढ़ाया। संस्कृति इतिहास के तीव्रतम आक्रमण की चपेट में है, जनपक्षधर शक्तियों के लगातार कमजोर होते जाने के कारण चुनौतियांॅ अधिक दुरूह तथा आक्रमण अधिक सघन हुआ है। लेखन को प्रमुखता देते हुए बहुआयामी सक्रियता से ही इनका कारगर मुकाबला किया जा सकता है। प्रगतिशीलता की आरंभिक अवधारणा भी यही रही है। जाहिर सी बात है इसके लिए दृष्टिकोण में बदली हुई व्यापकता तो लानी ही होगी। प्रगति की समय सापेक्षता का चिंतन तो साथ रहेगा ही।
 ”जो साहित्य मनुष्य के उत्पीड़न को छिपाता है, संस्कृति की झीनी चादर बुनकर उसे ढांॅकना चाहता है, वह प्रचारक न दीखते हुए भी वास्तव में प्रतिक्रियावाद का प्रचारक होता है।
संदर्भ:
1. नामवर सिंह, वाद- विवाद संवाद, पृ. 89
2. वही
3. वही, पृ. 91
4. हमीद अख्तर, रूदादे अन्जुमन, पृ. 190
5. वही, पृ. 198
6. वही, पृ. 190
7. सज्जाद जहीर, रौशनाई (हिन्दी अनुवाद), पृ. 243
8. डा. नामवर सिंह, वाद-विवाद संवाद
9. चन्द्रबली सिंह, ‘कथन’ त्रैमासिक, जुलाई-सितम्बर, 2011
10. नामवर सिंह, वाद-विवाद संवाद, पृ. 87
11. वही
12. राम विलास शर्मा, प्रगति और परम्परा, पृ. 50
- शकील सिद्दीकी
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Uttar Pradesh should not be divided


The demand to divide Uttar Pradesh into separate states has been raised off and on for the last two decades. But the bitter truth remains that such a demand has never received popular support. There has been no movement in any part of the state; only in Bundelkhand one has witnessed infrequent dharna’s, demonstrations and a few meetings on the issue.
 To be honest, the division of Uttar Pradesh is not a peoples’ issue at all. Guided by the whim of politicians the issue of division of Uttar Pradesh is periodically raised merely to serve their selfish political goals.
 The latest attempt in this regard has been made by the BSP supremo Mayawati .It is an open secret that during the last four and a half years her government has miserably failed on every front. This move is an attempt on her part to divert popular attention from her failures.
 Looking back we see that attempts have been made to divide the people in the name of religion, then on caste and now a fresh effort to segregate them on geographical lines in order to help the capitalist forces remain in command.
 The argument that smaller states accelerates  the process of development appears strange. Development depends on the political will of the ruling class and the equitable distribution and utilization of resources across regions. Merely carving out smaller states is definitely not enough.  
To create the very basic infrastructure in the newly created states and to run it efficiently requires huge and recurring investment in infrastructure.  As corruption is most rampant in the creation of infrastructure, a sizable amount of this money would be siphoned off in that direction.
In any case such huge resources being diverted to set up the fresh infrastructure in these new states would impact the availability of resources for the overall development of the states.
If the newly created state is backward and not able to raise sufficient resources then the chances of it further falling back remains high.  It remains dependent on the central government’s largess. If the central government and state government are not from the same party the political tussle between them would be at the cost of development of the newly created state.   
It is also completely misleading to claim that industrialization would pick up pace with the creation of smaller states.  Under the neo liberal polices governments are selling off the existing industries in the public sector. Under such conditions the government is no where near promoting the setting up of new industries in the government sector.
 As regards the private sector, entrepreneurs invest as per their priorities and not as according to the requirements of the state. To attract investments governments forcibly acquire land from farmers and hand it over at throw away prices to industrialists to set up industries. After acquiring such land at dirt cheap prices at times industries never come up or even if they do, industries often closes down due to various reasons. The land is sold off as real estate at huge profits.  In the deal the farmer is left high and dry.
 The rampant crony capitalism witnessed in the recently created states of Uttrakhand, Jharkhand and Chhattisgarh needs no recounting. The unscrupulous nexus between politicians – capitalists and middlemen has led to the open loot of the state’s precious resources – both natural and man made.
 Such capitalists find it easier to ‘manage’ the governments of these smaller states. Controlling the numerically small vidhan sabhas on the strength of their money power is relatively easier just as pushing through legislations which go in their favour.
In such a manner the mineral resources, land and forest resources of these smaller states have become vulnerable to the whims and fancies of such crony capitalism.
Correspondingly the strength of the people’s movement to raise their voice against such a collective sell off diminishes after divisions. For such crony capitalist forces convenient division of states serves the purpose of further decimating the voice of the struggling people fighting for justice and their rights over resources.
Uttar Pradesh  now a state of close to 20 crore  people , plays a politically significant role  in the country’s polity.  Every citizen of Uttar Pradesh is proud of this fact. Many symbols of Hindu-Muslim’s composite culture are visible all over the state.
A resident of West Uttar Pradesh considers it an honor to visit places of religious significance like Varanasi, Sarnath, Prayag, and Gorakhpur. Similarly, any one from East Uttar Pradesh always wishes to visit the Taj Mahal, Mathura and Jhansi.
The proposed Bundelkhand, Purvanchal and Awadh Pradesh are relatively backward compared to the prosperous Pashchim Pradesh. The revenue generated from the better off region helps the development of the remaining parts. This is the natural equity within the state.  Disturbing this arrangement would make the new states completely vulnerable and dependent on the generosity of the central government.
Why should the people of Uttar Pradesh pay for the idiosyncrasy and political ambitions of a certain politician or political party?  Why should the people suffer from the additional burden of a division?  The people should pledge not to accept such a division at any cost. 
- Dr Girish, Secretary. CPI Uttar Pradesh
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खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के खिलाफ 1 दिसम्बर को प्रस्तावित भारत बन्द को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा समर्थन

लखनऊ 28 नवम्बर। केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दिये जाने के खिलाफ खुदरा व्यापारियों के संगठनों के महासंघ (सीआरटीओ) द्वारा 1 दिसम्बर को भारत बंद का आह्वान किया गया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस आह्वान का समर्थन करते हुए अपनी सभी पार्टी इकाईयों का आह्वान करती है कि वे इस बंद को सफल बनाने के लिए खुदरा व्यापारियों को हर सम्भव समर्थन और सहयोग दें।
    यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि केन्द्र सरकार उपभोक्ताओं को सस्ता सामान मुहैया होने, किसानों को बेहतर दाम मिलने, महंगाई पर नियंत्रण होने आदि के बहाने कर वालमार्ट, केयरफोर आदि बहुराष्ट्रीय निगमों को भारत में खुदरा व्यापार की अनुमति दे चुकी है जिससे लगभग साढ़े चार करोड़ लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार के इस कदम का विरोध करती है और इसके खिलाफ खुदरा व्यापारियों के हर संघर्ष में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उनके साथ कदम से कदम मिला कर उनका समर्थन करेगी।
    भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने व्यापारियों को आगाह किया है कि उन राजनीतिक दलों - बसपा, सपा और भाजपा से होशियार रहें जो इस समय व्यापारियों के साथ दिखाई पड़ने का प्रयास कर रही हैं परन्तु सत्ता मिलने पर वे उन्हीं आर्थिक नीतियों पर चलती रहीं हैं जिन्हें संप्रग-दो की सरकार इस समय चला रही है।

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बुधवार, 23 नवंबर 2011

उत्तर प्रदेश के लोगों द्वारा भीख मांगने का जिम्मेदार राहुल का परिवार

लखनऊ, 23 नवंबर। उत्तर प्रदेश के लोगों द्वारा भीख मांगने की बात को बार-बार राहुल गांधी द्वारा दोहराने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाकपा कोषाध्यक्ष प्रदीप तिवारी ने कहा है कि इसके लिए राहुल का परिवार ही जिम्मेदार है। उत्तर प्रदेश के लोग अब भीख मांगने से आजिज आ चुके हैं और इसके लिए वे राहुल, उनकी मां, उनके पिता और दादी को कभी माफ नहीं कर सकते। इन लोगों को सर-आंखों पर बैठाने का खामियाजा उत्तर प्रदेश के लोग भोग रहे हैं और इन विधान सभा चुनावों में कांग्रेस के किसी भी विधायक का विधान सभा पहुंचना मुश्किल हो सकता है। वे यहां भाकपा कार्यालय पर पत्रकारों की बातों का जवाब दे रहे थे।
उन्होंने दावा किया कि भाकपा आगामी विधान सभा चुनावों में बहुत बेहतर करेगी। कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा सभी को उत्तर प्रदेश के लोग मौका दे चुके हैं और मौका देने का खामियाजा भुगत रहे हैं। बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार ने राज्य की जनता में वामपंथ के प्रति रूझान पैदा किया है जिसका फायदा हमें अवश्य मिलेगा। आगामी विधान सभा में हमारे जो भी साथी चुने जायेंगे वे सभी जनता की आकांक्षाओं पर खरे उतरेंगे।
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मंगलवार, 22 नवंबर 2011

फासीवाद की ओर बढ़ती मायावती

21 नवम्बर 2011 को देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की विधान सभा में जो कुछ भी हुआ, वह निहायत निन्दनीय है, संविधान की शरेआम बेइज्जती है और लोकतंत्र पर विश्वास रखने वालों के लिए बेहद चिन्तनीय है। विधान सभा में अध्यक्ष ने बिना चर्चा, बिना तर्क 70 हजार करोड़ के लेखानुदान तथा प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव को 16 मिनटों के अन्दर ध्वनि मत से पारित घोषित कर दिया और सत्र को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। देर रात कैबिनेट बाई सर्कुलेशन द्वारा सत्रावसान के प्रस्ताव को राज्यपाल की मंजूरी के लिए राजभवन भेज दिया। अगर यह कहा जाये कि विपक्ष ने भी सदन में सरकार को पूरा सहयोग दिया, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। सपा और भाजपा के सदस्यों ने जिस प्रकार सदन शुरू होते ही वेल में जा कर हंगामा शुरू किया और जिस प्रकार उसे जारी रखा, उसे और कहा भी क्या जा सकता है। इसी अव्यवस्था ने विधान सभा अध्यक्ष को इस प्रकार संसदीय अव्यवस्था को अंजाम देने में मदद की।
संविधान निर्माताओं, जिसमें बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर भी शामिल थे, ने कभी कल्पना तक नहीं की होगी कि उनके द्वारा बनाये जा रहे संविधान को लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी कोई राज्य सरकार इस प्रकार तार-तार कर देगी। अगर उन्हें जरा सा भी अंदाज रहा होता तो वे संविधान में इस प्रकार की अलोकतांत्रिक अव्यवस्था पर काबू पाने के प्राविधान संविधान में जरूर रखते।
लेखानुदान धन विधेयक होता है। उसे सदन से स्पष्ट बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है। धन विधेयक पारित न कराने से सरकार गिर जाती है। विरोधी दल - सपा और भाजपा ने अलग-अलग अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा कर सरकार को स्पष्ट रूप से चुनौती दी थी कि वह विधान सभा में अपना बहुमत साबित करे। उनकी नजर बसपा के असंतुष्ट विधायकों पर थी। सदन में बसपा के 219 सदस्य हैं। सदन में इस समय 8 रिक्त स्थानों के साथ 395 सदस्य हैं। इस प्रकार सरकार को बहुमत साबित करने के लिए अथवा लेखानुदान को पारित कराने के लिए 198 सदस्यों के वोट की जरूरत थी। समाजवादी पार्टी ने राज्यपाल को दिए गए ज्ञापन में टिकट कटने से 40 से अधिक विधायकों के बसपा के साथ न होने का दावा किया था।
संविधान में यह व्यवस्था रखी गयी थी कि विधान सभा की हर साल बैठक कम से कम 100 दिनां तक चलनी चाहिए। बाद में संविधान में परिवर्तन कर इसे 90 दिन कर दिया गया। 1962 में विधान सभा की बैठकें 103 दिनों तक चली थीं। उसके बाद से लोकतंत्र की धज्जियां सरकारों से बिखेरना शुरू कर दिया, शुरूआत में कांग्रेस ने, फिर जनता दल के शासन में, फिर भाजपा, सपा और बसपा के कार्यकालों में बैठकों की संख्या कम से कम होती चलीं गयीं। इस हमाम में प्रदेश के सभी विपक्षी दल नंगे खड़े हैं। बसपा ने तो इस बारे में अति कर दी। इस साल विधान सभा केवल 14 दिनों तक चली। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 2008 में 27 दिन, 2009 में 13 दिन और 2010 में 21 दिन ही चली। इन बैठकों में सदन शायद ही कभी पूरे दिन चला हो। मुलायम सिंह और राज नाथ सिंह के कार्यकालों में भी विधान सभा कभी भी संविधान द्वारा नियत न्यूनतम बाध्यता 90 दिनों के एक तिहाई से ज्यादा नहीं चली। विधान मंडलों के सत्र छोटे से छोटे होते जाना संसदीय लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत हैं। इसके लिए कोई एक नहीं बल्कि प्रदेश के सभी बड़े राजनीतिक दल जिम्मेदार रहे हैं।
लेकिन 21 नवम्बर को जो कुछ भी हुआ, वह पराकाष्ठा है। यह संसदीय लोकतंत्र का गला घोटना है। इसमें तानाशाही ही नहीं वरन् फासीवाद की झलक दिखती है। चुनावों के ऐन बेला पर जनता को अवश्य सोचना चाहिए कि वह जिस पार्टी को मत देने जा रही है, कहीं वह उसके मत देने के अधिकार को ही जब्त करने की ओर तो नहीं बढ़ रही है। विधान मंडलों की घटती सत्र संख्या भी एक गम्भीर मुद्दा बन गया है।
- प्रदीप तिवारी
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उत्तर प्रदेश का विभाजन नहीं होना चाहिये

उत्तर प्रदेश को बांटकर अलग राज्य बनाने की मांग लगभग 2 दशक से चलती आ रही है। लेकिन कड़वा सच यह है कि इस मांग को जनता का बहुमत समर्थन कभी नहीं मिला। किसी भी हिस्से में कोई बड़ा आन्दोलन भी नहीं चला, सिर्फ बुन्देलखण्ड को छोड़कर जहां जब तक छिटफुट धरने/प्रर्दशन/विचार गोष्ठियां होते रहते हैं।
सच पूछा जाये तो राज्य विभाजन जनता का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिज्ञों द्वारा पैदा किया हुआ एक शिगूफा है, जिसे वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए उछालते रहते हैं। अब ताजा प्रयास बसपा सुप्रीमो मायावती ने किया है। सभी जानते हैं कि वे गत साढ़े चार सालों में हर मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। मायावती इससे आम लोगों का ध्यान बांटना चाहती हैं। पहले धर्म, फिर जाति और अब क्षेत्रीय आधार पर जनता को विभाजित कर पूंजीवादी ताकतें अपने को सत्ता केन्द्र पर काबिज रखना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें राज्य का विभाजन एक अच्छा हथकंडा लगता है।
जहां तक यह तर्क कि क्षेत्रीय विकास के लिए छोटे राज्यों का होना आवश्यक है, एक बेहद भौंडा तर्क है। विकास राज्य सत्ता की इच्छा शक्ति और संसाधनों के सही बंटवारे तथा उसके उपयोग से होता है। छोटे राज्य बना देने मात्र से नहीं। विभाजित राज्यों के अलग-अलग प्रशासनिक ढ़ांचों को खड़ा करने और उन्हें चलाने में भारी धन व्यय होता है, जिससे बुनियादी विकास की धनराशि में कटौती हो जाती है। विकास के लिए आबंटित धन का बड़ा भाग भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
विभाजित होने के बाद नया राज्य बना क्षेत्र यदि पिछड़ा है तो और भी पिछड़ जाता है। उसका अपना राजस्व पर्याप्त होता नहीं। वह अधिकाधिक केन्द्र की सहायता पर निर्भर रहता है। केन्द्र में एवं राज्य में यदि अलग-अलग दलों की सरकारें हों तो टकराव के चलते छोटे राज्य की उपेक्षा ही होती है।
यह कहना कि अलग राज्य बन जाने से औद्योगीकरण बढ़ जाएगा, कतई सच नहीं। आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों के चलते सार्वजनिक क्षेत्र को बेचने की नीतियां चल रही हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र में किसी राज्य में नए उद्योग तो खुलने से रहे। निजी क्षेत्र के उद्यमों को उद्यमी अपनी प्राथमिकता से लगाते हैं। क्षेत्र की जरूरतों के मुताबिक नहीं। उद्योगपतियों को आकर्षित करने को सरकारें किसानों की जमीनों का जबरिया अधिग्रहण करती हैं और उन्हें उद्योगपतियों को सौंप देती हैं। उद्योगपति कुछ दिन उस पर उद्योग चलाते हैं और बाद में जमीन की कीमत बढ़ जाने पर उसे बेच डालते हैं। किसान चंद पैसे पाकर जीवन भर को भूमिहीन हो जाता है।
सबसे बड़ी बात है हाल में बने छोटे राज्यों - उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार चरम पर है। पूंजी ओर पूंजीपतियों, राजनेताओं और दलालों द्वारा संसाधनों की खुली लूट जारी है। आम जनता और शोषित तबकों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत बंटकर कमजोर हो गयी। पूंजीपतियों को छोटे राज्यों के सरकारों को मैनेज करना आसान होता है। दौलत के बल पर वे छोटी विधान सभा के बहुमत को काबू में कर लेते हैं और मनमाने फैसले करा लेते हैं। खनिज, भूमि, वन संपदा और विकास के धन को हड़प कर जाते हैं।
आज उत्तर प्रदेश, जोकि 17 करोड़ की आबादी वाला प्रदेश है, देश की राजनीति में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे उत्तर प्रदेश का हर नागरिक गौरव महसूस करता है। हिन्दू-मुसलिम साझी संस्कृति के तमाम प्रतीक उत्तर प्रदेश के आगोश में हैं। पश्चिम का वाशिंदा बनारस, सारनाथ, गोरखपुर, प्रयाग जाकर अपने को धन्य समझता है तो पूरब के वाशिंदे ताजमहल, मथुरा, झांसी का दीदार करते हैं। यह संयुक्त उत्तर प्रदेश की रंगत है।
उत्तर प्रदेश का बुन्देलखंड, पूर्वांचल एवं मध्य का भू-भाग पिछड़ा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश अपेक्षाकृत अधिक खुशहाल है। उसके द्वारा अदा किए गए राजस्व से इन पिछड़े क्षेत्रों के विकास का पहिया घूमता है। यह प्रदेश के अंदर एक स्वाभाविक समाजवाद है। इसे तोड़कर हम इन अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों को क्यों केन्द्र का मोहताज बनायें? किसी दल या नेता की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के औजार हम क्यों बनें? क्यों हम विभाजन की पीड़ा को अपने ऊपर थोपे? यह सब करने को हम तैयार नहीं हैं - यह उत्तर प्रदेश की जनता का संकल्प है।
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सोमवार, 21 नवंबर 2011

Resolutions adopted by National Executive of Communist Party of India in its' meeting dated 19-20th November 2011

REVERSE DEREGULATION OF FUEL PRICES


The Congress led UPA II Government has totally failed to contain inflation and to control the prices.  Despite Parliament passing resolutions urging the government to take adequate measures to contain inflation which continues to have adverse impact on common people, the government has not acted reasonably.  On the other hand, the government has gone ahead with deregulation of fuel prices and allowed oil marketing companies to go for hiking the price of Petrol and Petroleum products thirteen times in thirty months which led to cascading effect on prices. The recent hike in the price of petrol was done at a time food inflation continued to be high.  The government is under severe criticism for its insensitivity to the suffering of the common people.  In spite of Prime Minister talking tough on decontrol and deregulation and the role of market, the government had to announce roll back of petrol prices.  Government has done this roll back saying that international prices have come down.  This is an indication that prices can be increased at any time in future.

The National Executive of the Communist Party of India, therefore, demands that government must reverse deregulation and decontrol of fuel prices in the interests of common people.

PENSION FUND REGULATORY & DEVELOPMENT AUTHORITY


The National Executive of the Communist Party of India strongly condemns the recent decision of the Government to enact Pension Fund Regulatory and Development Authority Bill.  The Bill if passed will deprive millions of government employees both in Centre as well as in States and in autonomous bodies of their right to Pension after superannuation.  These categories of the employees had been enjoying this right since long times.  Even the Supreme Court of India has in a judgement laid down that pension is not bounty or grace.  According to Court, it is a right.  The employees fear if Pension Fund Regulatory and Development Authority Bill is enacted, the government may deny pension even to existing employees in due course.  The Central Government Employees Trade Unions and other Central Trade Unions have therefore expressed their strong opposition to this measure and demanded that the Bill be dropped.

What is worse, the Government of India has completely acted contrary to the recommendations of the Parliamentary Standing Committee of Ministry of Finance.  The proposed Bill has provision for putting pension funds in stock market thereby undermining the safety of these funds.  It is unethical and most deplorable attempt on the part of the government to divert public funds for private profits.  It is also deplorable that government has decided to invite 26 per cent FDI in Pension Scheme.

The Communist Party of India strongly opposes the move of the Government to enact this Bill and to divert Pension Funds to stock market as it will be against the interests of the workers and it will mobilize other democratic forces in the country in order to defeat the government moves.

FDI IN MULTI-BRAND RETAIL TRADE

 The National Executive of the Communist Party of India vehemently condemns the UPA-II government’s decision to allow FDI in Multi-brand Retail Trade.  Already government has allowed entry of giant retail MNCs, now it is opening it fully.  This will ruin the lives of millions of retail traders and people engaged in the trade.  They will be deprived of their livelihood.

Besides, entry of MNCs in the retail trade will have very disastrous impact on our economy as a whole, particularly on inflation as MNCs will enjoy monopoly on retail trade.

The decision has come in the wake of new spree of so-called “economic reforms” that is nothing but selling the house silver to subsidise the corporate sector and undermine our economic sovereignty to international finance capital.

The National Executive of the Communist Party of India demands roll-back of the decision and protect millions of Retail Traders.

SC SUB PLAN AND TRIBAL SUB PLAN


The National Executive of the Communist Party of India expresses its serious concern at the non-implementation of SC Sub Plan and Tribal Sub Plan by the Union and State Governments in accordance with the guidelines of the Planning Commission.  Union Government exempts several ministries from earmarking funds for SC/ST Sub Plans.  State Governments do not earmark the required funds to these sub plans.  These funds are non-lapsable.  But in several states, these funds are diverted for other purposes, as the Delhi Government diverted these funds for Commonwealth games.

The National Executive of the Communist Party of India, therefore demands that Union and State governments to earmark funds for SC/ST Sub Plans and implement the schemes for the welfare of SC and ST people who are fighting for their rights and due share in the wealth created in the nation. 

ON SYRIA

The National Executive of the Communist Party of India discussed the present political developments in Arab region particularly situation in Syria which is facing serious threats from all quarters of religious fundamentalists, reactionary Arab regimes and from US imperialists and its allies the NATO.

Surrounded the hostile neighbours such as Turkey in the north, Israel in the West, Jordon in the South and the US and NATO forces in Iraq in the east, Syria is  facing challenges from inside and outside forces who want to implement their policy of “Regime Change”. The present developments prove that the US and NATO are poised now to shift focus from Arab North Africa to the Arab Levant to deal with the last obstacle Syria to their regional hegemony.

The protests which started few months before for securing more democratic rights and for political reforms was hijacked by the forces of fundamentalists equipped with lethal weapons supplied by the neighbouring countries to escalate violence. It is reported that the Syria approved series of new steps towards political reforms and offered negotiations with the opposition but there was no response. Use of army for a solution to the present problem isolated the Syrian regime and gave opportunity to the Arab League to expel Syria as a pretext. The aim of US and NATO is to repeat the same strategy that was used in Libya and if successful then to follow it up against Iran as part of policy re-invent the region along the lines of the ‘New Middle East’.

The National Executive of CPI condemns the decision of the Arab League for o creating condition for external interference in the internal affairs of Syria by violating its own Charter. The CPI expresses grave concern on the present disturbance in Syria which jeopardizes the stability of the whole region.

The National Executive of CPI calls upon the present Syrian government to avoid military solution of the present problem. They should take appropriate measures by releasing political prisoners, initiate dialogue with the democratic forces in the opposition, take further steps towards radical democratic changes to meet the aspirations of the people and mobilize the common people to isolate religious fundamentalist forces engaged in sectarian violence aiming at to destroy the secular fabric of the their society and working for imperialist intervention in Syria. 

The National Executive of CPI calls upon the people of India to stand firmly with the people of Syria in their difficult hours and to expose US imperialists and their allies’ plan who are preparing for intervention in Syria to destabilize the entire Middle East and other areas.                                 
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