भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

About The Author

Communist Party of India, U.P. State Council

Get The Latest News

Sign up to receive latest news

समर्थक

बुधवार, 13 जनवरी 2010

परसाई क पुनर्पाठ

यह दृश्य अधिकतर लोगों का देखा हुआ दृश्य है। लेकिन देखकर अनदेखा कर देना या भूल जाना सामान्य बात है। परसाई देखे हुए को परिभाषित करते हैं। सबसे कठिन काम है मूक भावों, मनोविकारों को पकड़ना और उन्हें दिखाना। परसाई के पास एक दृष्टि है, अनुभव है और दूसरों को भी वे अनुभव कराते हैं। उनकी भाषा, कहने का ढंग अनुभव की दूरी को पाटता है।
शहर में अगर कहीं वफा है...
वेद प्रकाश
एक बार जुआ खेलने के आरोप में मिर्जा गालिब को कैद हो गई। उन्होंने कैद में कविता लिखी। उस कविता का अभिप्राय है -
‘कैदियों ने मुझे सर-आंखों पर बिठाया है। मैं इनकी मुहब्बत पर कितना नाज करूं? शहर में अगर कहीं वफा है तो उन चोरों में है, जो पकड़े जा चुके हैं। मैं उनके साथ रिश्ता जोड़ना चाहता हूं।’
इस पर डाॅ. विश्वनाथ त्रिपाठी की टिप्पणी है, ‘हिन्दी-उर्दू के मध्यकालीन कवियों में सिर्फ गालिब हैं जो कैदियों से रिश्ता जोड़ना चाहते हैं। गिजाज की आजादी, मानवीय संवेदना और जीवन-परिस्थितियों ने गालिब को उनकी असल रिश्तेदारी समझा दी थी। नवाब अमीउमरा, सेठ-साहूकार, मुगल साम्राज्य, ब्रिटिश साम्राज्य उन्हें पेंशन, रसद दे सकता था, आत्मीयता नहीं दे सकता था। ये सब न पकड़े गए चोर हैं।’
सोचते हुए कभी-कभी यह लगता है कि साथ जो होना चाहिए, जैसा व्यवहार होना चाहिए, वह नहीं होता। व्यवस्था की तरफ से भी और प्रकृति की तरफ से भी। जिस पर व्यवस्था की मार पड़ती है, उस पर प्रकृति की भी मार अधिक पड़ती है। कई बार हम जिसे भाग्य अथवा प्रकृति की मार समझते हैं, उसके मूल में व्यवस्था का भी दोष रहता है। उसके पक्ष में व्यवस्था होती है, वह प्रकृति से भी काफी दूर तक लड़ सकता है। इस बात को आज की परिस्थितियों में समझना बहुत मुश्किल नहीं है। श्रेष्ठ रचनाकार प्रकृति और व्यवस्था के इस संबंध की अभिव्यक्ति करता है। इनके टूटू हुए संबंध-सूत्रों को जोड़ता है। पे्रमचंद की रचनाओं में यह अभिव्यक्ति सर्वाधिक है। उन्हें अपना साहित्यिक पुरखा कहने वाले परसाई के यहां भी। परसाई की रचनाएं समकालीन मनुष्य के किसी प्रसंग में फंसे रहने का चित्रण करती है, लेकिन इसके माध्यम से वे समकालीन जीवन की अनेक स्तरीय परिस्थितियों के कारण रूप को प्रकाशित करती हैं।
नयी कहानी और नयी कविता में मृत्यु-बोध तथा हत्या-आत्महत्या का दर्शन खूब फला-फूला। यह अधिकतर उधार लिया गया दर्शन था। यदि उसमें वास्तविकता होती तो उसका रूप कुछ और होता। परसाई ने एक कहानी लिखी ‘जिन्दगी और मौत।’ इस कहानी को जवाब के तौर पर मृत्युबोध का जाप करने वाली कहानियों के समक्ष रखा जा सकता है। यह कहानी ‘वसुधा’ के जून 1957 अंक में प्रकाशित हुई थी।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, ‘मरण से बढ़कर करुणा का विषय और क्या हो सकता है? लेकिन मरण भी करुणा का विषय तभी बनेगा जब वह अपनी विश्वसनीय परिस्थितियों या देश-काल को साथ लेकर आए। अनेक कहानियों का आरंभ नाटकीयतापूर्ण ढंग से करने वाले परसाई, यह कहानी ऐसे शुरू करते हैं, ‘सेनेटोरियम’ लगभग दो मील दूर है। 7 घण्टे एम्बुलेन्स कार में बैठे हो गये। भीतर कवि हैं। रह-रहकर उन्हें खांसी आती है और मैं कांप-कांप उठता हूं। बगल में बैठा ड्राइवर भी, जो ऐसे अनगिनती मनुष्यों को मौत से मिलने आधे रास्ते तक पहुंचा आया है, ‘हे राम!’ कहकर गहरी सांस छोड़ता है।
परसाई मौत के सन्नाटे का भी वर्णन कर सकते हैं। मृत्यु-भय से कैसे अनुभव प्रकट होते हैं, इसका भी। मौत अगर पड़ोस में हो तो प्रकृति कैसी-कैसी लग सकती है, इसका वर्णन देखिए-
‘ऐम्बुलेन्स चल पड़ी है। सांझ उतरने लगी है। वृक्ष पक्षियों के कलरव से गूंज उठे हैं- यह जीवन का मुक्त कल्लोल है। और इधर निर्बल फेफड़ों से निकली यह मजबूर खांसी-मृत्यु का क्रन्दन। दोनों ओर के वृक्षों से उठते इस कलरव के बीच से यह खांसी बढ़ रही है- जैसे मरण के स्वागत में दोनों ओर गीत गाती जिन्दगी खड़ी है।
रचनाकार बाहरी दृश्यों को जिन रूपों में लेता है, वह उह्नसका यथार्थ होता है यानी रचनाकार को जो लगता है वही उसकी यथार्थ दृष्टि है। परसाई जीवन और मृत्यु का संश्लिष्ट चित्रण करते हैं। एक तरफ प्रकृति का मुक्त कल्लोल यानी उसका स्वतंत्र आलंबनत्व और दूसरी तरफ मृत्यु का क्रन्दन। प्रकृति सबको अपने भीतर समेटे हैं। बाहरी दृश्यों को मनोभावों या स्थिति विशेष रंग में रंगकर प्रस्तुत करने की रूढ़ि रही है। कहीं-कहीं यह पद्धति बहुत आवश्यक भी होती है। वहां विशेष रूप से जहां यातना की तीव्रता या भाव-सघनता है की अनुभूति करानी हो। कहानी में एक और चित्र इस तरह है-
‘सामने लम्बा-चैड़ा मैदान, सर्वत्र हरियाली-लेकिन इस हरियाली में जिन्दगी का हरापन कहीं नहीं दिख्ता। सम्पूर्ण प्रकृति जैसे किसी आशंका से हर क्षण सहमी रहती है। इतने मनुष्य हैं- मरीज, डाॅक्टर, नर्स लेकिन जीवन का स्पन्दन कहीं अनुभव नहीं होता। ठण्डी हवा हल्की-सी सिहरन पैदा कर रही है। जहां-तहां हट्स हैं- एक दूसरी से दूर, अपने-आप में एक भिन्न संसार। हरियाली में बल्बों से जगमगाती वे झोपड़ियां आकाश में झिलमिल करते नक्षणों-सी मालूम होती हैं।’
परसाई अपनी रचनात्मक प्रभाव-क्षमता को समृद्ध करने के लिए अनुभाव, संवाद आलंबन, उद्दीपन-सबका उपयोग कर सकते हैं, करते हैं।
कुल छह पृष्ठों की इस कहानी के आरंभिक ढाई पृष्ठों में वातावरण बनाया गया है। परसाई कहीं-कहीं वाचकीय टिप्पणियों के माध्यम से कहानी का वातावरण बनाते हैं। इस संदर्भ में ‘किताब का एक पन्ना’ कहानी का उल्लेख हो चुका है। परसाई क्ल्लहीं-कहीं कुछ पात्रों के माध्यम से भी कथ्य की भूमिका बनाते हैं। ‘जिन्दगी और मौत’ के इन आरंभिक पृष्ठों में किन्हीं कवि का चित्रण हैं, जो फेफड़े के रोग से ग्रस्त हैं और वाचक उन्हें सेनेटोरियम में भर्ती करने के लिए ले जाता है। ध्यान रहे कि यह कहानी सन् 1957 की है। उन दिनों अधिकतर कवि सामान्य जन ही होते थे और सामान्य आदमी के लिए उस समय टी.बी. रोग का क्या अर्थ होता था, हम कुछ-कुछ समझ सकते हैं। केवल कवि और उनकी बीमारी का वर्णन, इस कहानी का उद्देश्य नहीं है। लेकिन कवि का रोग तथ संत्रास वाचक का नजदीकी अनुभव है। कवि से वाचक का संबंध है, कवि के रोग के कारण को वाचक जानता है। हम अपनी या अपने किसी आत्मीय, संबंधी, मित्र की यातना के द्वारा दूसरों की यातना का अनुमान करके दुःखी होते हैं, परसाई इन पृष्ठों में यह भी बताते हैं कि उन्हें कैसे-कैसे अनुभव किन कारणों से हुए। वे कवि को लेकर सेेनेटोरियम गए तो उन्हें एक नया अनुभव हुआ। यही अनुभव कहानी बन गया है। यह अनुभव गालिब के उस अनुभव के समान है, जो उन्हें कैद में रहते हुआ।
कहानी का वास्तविक आरंभ होता है इन पंक्तियों से, जहां से एक-एक वाक्य,एक-एक शब्द बहुत‘कुछ कहता नजर जाता है-
-जनरल वार्ड के सामने हम आ गए हैं। नया मरीज आता देख 50-60 रोगी एकदम बरामदे में आ गये हैं। ये मनुष्य लगते ही नहीं हैं- ये केवल अस्तित्व हैं- बिल्कुल वायवी! शून्य आंखों में केवल उत्सुकता! मरीज की मायूसी, पीड़ा, चिन्ता भी इनकी आंखों में नहीं है, केवल कुतूहल, केवल उत्सुकता-बच्चों की तरह! नये रोगी के माध्यम से ये दुनिया से सम्बन्ध जोड़ना चाहते हैं।’
यह दृश्य अधिकतर लोगों का देखा हुआ दृश्य हैं लेकिन देखकर अनदेखा कर देना या भूल जाना सामान्य बात है। परसाई देखे हुए को परिभाषित करते हैं। सबसे कठिन काम है मूक भावों, मनोविकारो को पकड़ना और उन्हें दिखाना। परसाई के पास एक दृष्टि है, अनुभव है और दूसरों को भी वे अनुभव कराते है। उनकी भाषा, कहने का ढंग अनुभव की दूरी को पलटाता है। मरीज मनुष्य हैं, लेकिन लगते नहीं क्योंकि शारीरिक-मानसिक स्वस्थता मनुष्य होने के लिए आवश्यक है। रोग, मानसिक रूप से भी रिक्त करता है। रोगियों का केवल ढांचा मनुष्य का है, इसलिए वे मनुष्य नहीं लगते, अस्तित्व-मात्र लगते हैं। यह संसार उनके हाथों से छूट रहा है, वे हमसे दूर जा रहे हैं। उनका ढांचा-शरीर हमारे पास खड़ा है, लेकिन वे वस्तुतः हमसे दूर हैं। उनके देखने का ढंग ऐसा है जिससे लगता है कि बहुत दूर से देख रहे हो। सांसारिक अनुभव को आंखे प्रमुखता से ग्रहण करती हैं। आंखे कहने के लिए शब्द की मांग नहीं करतीं। आंखें ही सबसे ज्यादा, सबसे सच्चे, विश्वसनीय को शब्द देते हैं। मूक को शब्द देना, अर्थ और शब्द की दूरी को कम करना है। रोगियों की आंखों में उन्होंने किस अभाव और किस भाव को देख लिया है। एक स्थिति ऐसी आती है जब प्राणी मात्र सम पर आ जाते हैं। इन रोगियों की आंखों के माध्यम से परसाई ने प्राणी मात्र की आदिम निरीहता को देखा। यह निरीहता हमारे आदिम संस्कारों से भी जुड़ी है। इसलिए इसका अबूझ प्रभाव पड़ता है। उनकी आंखों में बच्चों की तरह केवल कुतूहल और उत्सुकता है। वह भी इसलिए कि एक नया मरीज आ गया है। नया रोगी छूटी हुई दुनिया से उनका संबंध स्थापित करता है। उनके परिवार में बढ़ोत्तरी करता है। इसलिए वे उसे देखते एकदम बरामदे में आ गए। ऐसा विश्सनीय, अनुभूत लेकिन सघन, दुसाध्य चित्रण निराला और परसाई जैसे रचनााकर ही कर सकते हैं। नये रोगी के जरिए वे दुनिया से संबंध इन प्रश्नों के माध्यम से जोड़ते है-
‘कहां से आये हैं?’
‘कौन सी स्टेज?’
‘एक लंग?’
‘दोनों लंग?’
‘कलेप्स करना पड़ेगा’
ये सब टी.बी. के विशेषज्ञ हो गये हैं। जरा देर हलचल रुक गयी है। मैं जवाब दे रहा हूं, वे कान खोले सुन रहे हैं। फिर हलचल हुई- -अरे राम राम! बड़ी देर कर दी।’
शुक्लजी ने लिखा है कि ‘दूसरों के दुःख से दुःखी होने का नियम बहुत व्यापक है और दूसरों के सुख से सुखी होने का नियम उसकी अपेक्षा परिमित है।’
यह नियम हमारे देश के सरकारी अस्पतालों ने विशेष रूप से घटित होते हुए देखा जा सकता है। संकट के समय दूर-दूर से आए लोग परिजन हो जाते हैं। वे एक-दूसरे के दुःख को बांटकर उसे कम करने की चेष्टा करते हैं। ऐसा नहीं है कि वहां पर केवल ऐसा ही सात्विक वातावरण होता है। वहां भी चालाकियां और काईयांपन होता है। लेकिन परसाई उन व्यंग्यकारों की तरह नहीं हैं जो हर स्थिति में, हर पात्र पर व्यंग्य करें, उसे हास्यास्पद बना दें। उनकी व्यंग्य दृष्टि यह बखूबी पहचानती है कि किस पर हंसना है, किस पर रोना है, किसे आत्मीयता और करुणा देनी है। उनके साहित्य में अनेक स्थलों पर मानवीय पात्र मिलते हैं, उनमें ‘जिन्दगी और मौत’ के ये संकटग्रस्त रोगी पात्र भी शामिल हैं। ये नये रोगी का स्वागत इस प्रकार करते हैं- ‘और अब इनमें एक विचित्र व्यवस्तता आ गयी है। उनके भटके हुए सामथ्र्य को सहारा मिल गया है। उनके अस्तित्व को सार्थकता मिल गयी है। वे नये मरीज के प्रबंध में लग गये हैं-
‘कौन-सा बैड है?’
‘सिस्टर को बुलाओ?’
‘चादर बदलने को बोलो।’
सब बच्चों की तरह दौड़ रहे हैं। एक क्षण को उन्हें लगा कि वे स्वस्थ हैं और नए मरीज की परिचर्चा कर रहे हैं। मेरा काम कुछ नहीं रह गया। उनके अन्दर की मानवी करुणा, संवेदना उमड़ पड़ रही है। वे कुछ कर सकने को आतुर हैं। वे इस घर के वासी हैं और मेहमान की सेवा चाकरी में लग गये हैं। सामान जमा रहे हैं, बिस्तर ठीक कर रहे हैं, पानी ला रहे हैं। 2-4 कवि के पास खड़े हैं और उन्हें धीरज दे रहे हैं- ‘चिंता नहीं है। जल्दी ठीक हो जायेंगे। मैं भी ऐसा ही आया था पर अब देखिये।’
जो मनुष्य नहीं है, अस्तित्व मात्र हैं, भावरिक्त हैं, जिनके सामथ्र्य को सहारा नहीं है, जो दिन-रात एक जैसा, जितना जीवन बचा है, उसे व्यतीत कर रहे हैं, वे ही अचानक व्यस्त, सार्थक हो गए हैं, उनके सामथ्र्य को केन्द्र मिल गया है। उनकी संवेदना, मानवीयता और करुणा उभर आयी है। वे अब रोगी नहीं रहे, घर-बासी हो गये हैं और मेहमान की खातिरदारी में लगे हैं। अपने आपको भूलकर विशुद्ध अनुभूति मात्र हो गए हैं, मुक्त हृदय हो गए हैं। कहानी में इन रोगियों के लिए कई बार आता है- ‘बच्चों की तरह’। वे बच्चों की तरह देखते हैं, बच्चों की तरह दौड़ते हैं, बच्चों की तरह सिसकते हैं, आदि। रोगी बच्चे नहीं हो गए हैं, बच्चों की तरह हो गए हैं। बच्चे से हो ही नहीं सकते क्योंकि अब तक इन्होंने जो जीवन जिया है, उसमें अनेक भाव कमाए होंगे। क्रोध, ईष्र्या, घृणा भी उन भावों में निश्चित ही रहे होंगे। पर अब ये इन ज्यादातर भावों से रिक्त हो चुके हैं। अब इनके पास केवल वही भाव रह गया है जिससे मनुष्य का जीवनारंग होता हैं वह भाव है करुणा और हिंदी में करुणा से संबंधित कोई बात आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का उल्लेख किए बिना नहीं की जा सकती। उन्होंने लिखा-
‘जब बच्चे को सम्बन्ध ज्ञान कुछ-कुछ होने लगता है, तभी दुःख के उस भेद की नींव पड़ जाती है जिसे करुणा कहते हैं। बच्चा पहले परखता है कि जैसे हम हैं वैसे ही ये और प्राणी भी हंै और बिना किसी विवेचना-क्रम के स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा वह अपने अनुभवों का आरोप दूसरे प्राणियों पर करता है। फिर कार्य-करण सम्बन्ध से अभ्यस्त होने पर दूसरों के दुःख के कारण या कार्य को देखकर उनके दुःख का अनुमान करता है और स्वयं एक प्रकार का दुःख अनुभव करता हैं। प्रायः देखा जाता है जब मां झूठ-मूठ ‘ऊँ-ऊँ’ करके रोने लगती है तब कोई बच्चे भी रोे पड़ते हैं। इसी प्रकार जब उनके किसी भी भाई या बहिन को कोई मारने उठता है तब वे कुछ चंचल हो उठते हैं।’
‘जिन्दगी और मौत’ के रोगी बच्चों की तरह हो गए हैं- इसका आशय स्पष्ट हो गया होगा। बच्चों का भाव-संसार सीमित होता है। करुणा या दुःख उसमें प्राथमिक है। उनके सीमित भावों और तत्सम्बन्धी कार्यों के बीच व्यवधान बहुत कम बन पाता है। जिसके प्रति करुणा उत्पन्न होती है, उसकी भलाई का उद्योग किया जाता है। इन रोगियों में नए रोगी के प्रति करुणा, संवेदना उमड़ती है तो ये कुछ करने को आतुर हो उठते हैं और बच्चों की तरह दौड़ते हैं। जो कुछ करने का सामथ्र्य रखते हैं, करते हैं। जो स्वयं करुणा के पात्र हैं, वे दूसरे पर करुणा कर रहे हैं। शुक्ल जी ने करुणा का सैद्धांतिक विवेचन सर्वाधिक किया उसका महत्व समझाया लेकिन इस स्थिति का संकेत संभवतः नहीं किया। परसाई इस स्थिति पर भी लिखते हैं इससे शुक्ल जी की मान्यता का विकास होता है। इससे रोगियों के प्रति पाठक की करुणा द्विगुणित होती है, रोगी श्रद्धा के पात्र भी बनते हैं। परसाई के पास करुणा की मार्मिकता को बढ़ाने का एक और तरीका है। वह है भावना, संवेदना तथा बढ़े हुए भाव का यथार्थ की चोट। उनका वाचन रचना के बीच में अक्सर एक टिप्पणी करता है तो बड़ी कठोर होती है, जहां किसी ज्ञात-अज्ञात के प्रति आक्रोश, अमर्ष, नाराजगी, क्रोध, झुंझलाहट, क्षोत्र आदि न जाने कितने भाव होते हैं, रोगियों पर वह टिप्पणी इस तरह है -
‘वही र्धर्य, जो उन्हें मिला था, वे नये मरीज को दे रहे हैं। वे जान गये हैं कि कोई उम्मीद नहीं है, मगर मरीज मरीज को धोखा दे रहे हैं। उनकी आत्मीयता उमड़ रही है, उन्होंने नये मरीज को स्वीकार कर लिया है, परिवार में शािमल कर लिया है। मुझसे बोले, ‘आप चिन्ता न करना। हम सब ठीक कर लेंगे। समझ लो कि घर में आ गये हैं।’
कैसा यह घर? और कैसे उसके ये वासी? इनमें अनेक उस लोक की यात्रा निकल पड़े हैं- यह सेनेटोरियम एक पड़ाव पर है- दो घड़ी रुके हैं और एक क्षीण आशा है कि शायद घर से वापिस लौटने की खबर आ जाय, नहीं तो आगे तो बढ़ना ही है,
कबीर तो पूरे जीवन को ही क्षण मानकर भक्ति में, दुःख में उसकी सार्थकता ढूंढते हैं। इन मरीजों का जीवन सचमुच ‘दो घड़ी’ का है, ये इस बात को जानते हैं। जानकर भी चीखते-चिल्लाते नहीं। उन्होंने इस बात में सार्थकता ढूंढ ली है कि दूसरों को इस थोड़े समय के जीवन की आत्मीयता दी जाए। ये हर नए रोगी को इस घर-परिवार में शामिल करते हैं। वाचक की झुंझलाहट इस बात को लेकर भी होगी कि इतने संवेदनशील, करुणा-आत्मीयता देने वाले ये मनुष्य ऐसे रोगी क्यों हैं? मानवीयता को इनकी आवश्यकता है। लेकिन शायद ये दुःख के मांजे हुए पात्र हैं। स्थितियों से गुजर कर ऐसे बने हैं। परसाई ने लिखा है कि दुःख सबको मांजता ही नहीं, वह मनुष्य को कमीना भी बनाता हैं लेकिन इस कहानी में परसाई ने वास्तविक दुःख में पड़े हुए मनुष्य की बढ़ी हुई मानवीयता तथा दुःख कातरता का चित्रण किया है।
एक अध्यापक के जीवन का बहुत बड़ा सुख यह है कि उसे जगह-जगह ‘सर नमस्ते’ कहकर पुकारने वाले विद्यार्थी मिल जाते हैं। यह अध्यापक का आत्म विस्तार है। लेकिन यह विस्तार जितना ही अधिक होगा दुःख के कारण भी उतने ही अधिक होंगे। जिसकों चाहने-जानने वाले जितने अधिक होते हैं, उसे सुख-संदेश भी उतने ही अधिक मिलते हैं और दुःखद खबरें भी। शर्मिंदगी का सामना करने की आशंका भी ज्यादा होती है। वाचक ऐसा ही अध्यापक है। वह इस समय सेनेटोरियम में है। अचानक एक नाटकीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है-
‘सर नमस्ते! मैंने चैंककर देखा। एक नव-तरुण है। बोला, ‘आपने मुझे नहीं पहचाना? मैं आपका विद्यार्थी रहा हूं। मेरा नाम नगेन्द्र नाथ है।’
‘सर नमस्ते’ से मेरा पिण्ड नहीं छूटता। शहर के किसी भी मुहल्ले में जाऊं, चाहे वीराने में जाऊं कोई ‘सर नमस्ते’ कह ही देता हैं अगर शहर में कहीं से चोरी करके भागूं, तो जगह-जगह ‘सर नमस्ते’ होगी और पकड़ लिया जाऊंगा। एक बार मित्रों के साथ सिनेमा में बैठा खूब हल्का फिल्म देख रहा था। हंसी-मजाक-चुहल! इण्टरवल हुई तो पीछे से आवाज आयी, ‘सर नमस्ते’ दो विद्यार्थी ठीक पीछे बैठे थे। डटा रहा- सोचा, ‘प्राप्तेषु षोडषे वर्षे।’
यह नगेन्द्र यहां! 3 साल पहले इसे पढ़ाया था। अच्छा खूबसूरत, स्वस्थ लड़का, हाकी बढ़िया खेलता था। और आज यह यहां?’
‘सर नमस्ते’ का स्वर अक्सर सुख देता है। लेकिन कभी-कभी वही ‘सर नमस्ते’ अनुभव कराता है। वाचक के माध्यम से यह परसाई की रचनात्मक झंुझलाहट है। यह हास्य नहीं व्यंग्य है, आत्म व्यंग्य भी और अबूझ लगने वाली परिस्थितियों पर भी। जहां इस स्वर की कोई आवश्यकता-अपेक्षा नहीं, वहां पर भी यह सुनने को मिल जाए तो झुंझलाहट होती है। जिस खूबसूरत, स्वस्थ, बढ़िया हाकी खेलने वाले लड़के को तीन वर्ष पहले पढ़ाया। जिसे कहीं अच्छी जगह देखकर संतोष होता- वह नगेन्द्र नाथ भी यहां सेनेटोरियम में। परसाई जैसे रचनाकारों का दुःख बहुत व्यापक होता है। जो ज्यादा जीवन को जानता है, उसे न जाने क्या-क्या देखना पड़ता है। उसकी यातना ‘काह न देखै नैन भरि जो जीवहु बहु काल’ की तरह होती है। समाज में एक वर्ग ऐसा है जो रोगों के ईलाज के लिए कहीं भी जाकर रह सकता है। जिसके पास फुर्सत और साधक दोनों होते हैं। लेकिन यह रोग उन्हें भी होता है जिनके पास एक दिन की भी फुर्सत नहीं होती। नगेन्द्रनाथ गरीब घर का है। उसकी मां है, छोटा भाई है जो उसी पर निर्भर हैं। वह नौकरी पर जा ही रहा था कि यहां आना पड़ा। छह महीने से यहां हैं और अभी छह महीने और रहना पड़ेगा। उसकी मां और भाई का क्या होगा? यह चिंता उसे है। बीमारी में भी अपनी चिंता की फुर्सत नहीं।
‘मैं उसकी पीठ पर हाथ फेर रहा हूं। उसे धीरज बंधा रहा हूं। बुजुर्ग कहते थे, यह राज-रोग कहलाता है, राजाओं को हुआ करता था- उन्हें फुर्सत थी। पर जो जीवन की कशमश में उलझे हैं, जो पसीने की एक-एक बूंद से एक-एक दाना कमाते हैं, जिन्हें बीमार पड़ने की फुर्सत नहीं है, उन्हें यह क्यों होता है? इसने कब से वर्ग-भेद छोड़ दिया?
जिस कवि के चित्रण से कहानी का आरंभ हुआ है केवल उसकी यातना का चित्रण कहानी का उद्देश्य नहीं है। साथ ही नगेन्द्रनाथ का दुःख भी इस कहानी का उद्देश्य नहीं है। लेकिन ये दोनों ऐसे पात्र हैं जिनके आसपास का वर्णन कहानी में है। इनके माध्यम से हम विशिष्ट से सामान्य पात्रों की यातना का अनुभव करते हैं। कहानी के वे सामान्य पात्र 50-60 रोगी हैं। कवि के रोग के कारण का उल्लेख कहानी में है। कवि कहता है- श्च्वअमतजल ेनििमतपदहश् नगेन्द्रनाथ की कहानी भी कवि से अलग नहीं है। कहीं न कहीं कहानी में भी मुख्य है- श्च्वअमतजल ेनििमतपदहश् ‘गरीबी और दुख ऐसे लोगों को बीमार पड़ने की फुर्सत नहीं है जो गरीब हैं, जिनके दुःख और हैं, जो जीवन की कशमश में उलझे हैंः जो पसीने की एक-एक बूंद से एक-एक दाना कमाते हैं। लेकिन जो रोग किसी समय राज-रोग कहलाता था, आज वहीं आक्रमण करता है जहां गरीबी और दुःख देखता है। और ये गरीबी और दुःख कहां से आए- क्या किसी और लोक से आए हैं? क्या ये मनुष्य द्वारा बनाई गई व्यवस्था की ही देन नहीं हैं? इसलिए कहा गया था कि रचनाकार टूटे हुए सम्बन्ध-सूत्रों को जोड़ता हैं धनंजय वर्मा के अनुसार परसाई ने अनेक तरह की अमानवीयता और पाखंडों में छले जाते समकालीन आदमी को रोजमर्रा तकलीफ को जवान दी। यह तकलीफ मनुष्य रचित ही नहीं, मनुष्य रचित भी है। अनेक रोगों का कारण गरीबी तथा दुख है, और गरीबी तथा दुख के कारण हम स्वयं हैं।
सेनेटोरियम के रोगियों में न जाने कितने नगेन्द्रनाथ जैसे रहे होंगे। जो कुछ वे बोलते हैं, उससे वे मूर्त होते हैं, नगेन्द्रनाथ के चित्रण से वे और अधिक मूर्त होते हैं। रोगियों में नर्स को चिड़चिड़ी कहने वाला भी है और ‘कुछ नहीं - त्मचतमेेपवदश् (मौनदमन) है।’ कहने वाला भी। यह दक्षिण का है और पूछने पर बताता है कि ‘मैं टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशलाजी में था। कोर्स का एक साल रह गया था, सो यहां काटना पड़ रहा है। यानी गरीब, दुखी, प्रतिज्ञाशाली सब यहां सेनेटोरियम में रोगी बनकर जीवन बिता रहे हैं। गिंसबर्ग ने अपनी एक कविता में लिखा, ‘मैंने देखा है अपनी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ दिमागों को पागलपन से तहस-नहस होते-भूखे विक्षिप्त नंगे।’
सेनेटोरियम के रोगी मनुष्य नहीं लगते, अस्तित्व मात्र लगते हैं, लेकिन हैं तो मनुष्य ही। जब कोई बाहर से आता है तो उसके सहारे ये बाहर की उस दुनिया से जुड़ना चाहते हैं जो इनसे छूट गई है। नर्स इन्हें बच्चा समझकर डांटती है। बाहर से आए व्यक्ति के सामने ये अपने को बच्चा मानने को तैयार नहीं। नर्स की बातें इन्हीं रोग और अस्पताल की याद दिलाती हैं और बाहर से आया व्यक्ति जीवन से जोड़ता है। परसाई ने रोगियों का मनोविज्ञान ऐसे चित्रित किया है -
‘वे सब डांटे हुए बच्चे की तरह दुबककर रह गये हैं, निर्बल क्रोध और विवशता से एक-दो गले भर आये। इन्हें मीठी बात चाहिए,, स्नेह की वाणी चाहिए। घर से दूर, परिवार से दूर, मित्रों, सम्बन्धियों से दूर इस घेरे में बन्द ये आत्माएं जीवन का संस्पर्श चाहती हैं। उन्हें स्नेह की चाह है, माधुर्य की चाह है- उन्हें वह सब चाहिए जो जीवन को अर्थ देता है। नर्स के कड़वे बोल जैसे उन्हें जीवन से दूर ढकेलते हैं।
परसाई की अनेक रचनाओं में, संकट में पड़कर किसी अज्ञात सत्ता को पुकारते पात्रों का मार्मिक वर्णन मिलता है, अज्ञात को सम्बोधित यह पुकार उन पात्रों की यातना को कई गुणा बढ़ा देती है। साथ ही विडंबना की भी व्यंजना करती है। कस्बे में प्लेग पड़ने पर परसाई जी की मां मर रही थीं और परसाई-परिवार गा रहा था- ‘जय जगदीश हरे...।’ ‘किताब का एक पन्ना’ कहानी में भिखारिन युवती गाती है- ‘भगवान किनारे लगा दे मेरी नैया’ और ‘जिन्दगी और मौत’ के रोगी रोजाना गाई जाने वाली आरती आज फिर बड़े करूणा कंठ से गा रहे हैं- ‘जय जगदीश हरे...।’
‘गले उनके रुंधे हैं। पीड़ित आत्मा का आर्तनाद-सा लगता है। टी.बी. के मरीज को इस युग में भी लगता है कि उसका अन्त आ गया। ये सब अपने को गया हुआ मान बैठे हैं, जीवन इनका खो गया है। इनका विश्वास गया, आशा गयी, निष्ठा गयी! ये किसी अलक्ष्य, पर सर्वोपरि शक्ति से आसरा चाहते हैं। नदी में गिरे उस आदमी जैसे हैं, जो आसपास किसी तैरती लकड़ी को न पाकर चीखता है कि किनारे पर कोई कहीं सुन ले और बचा ले। कण्ठ से धनीभूत पीड़ा प्रवाहित हो रही है।
गाते-गाते, दो-तीन आदमी फूट-फूटकर रोने लगे। बच्चों की तरह सिसक रहे हैं।’
फिर वहीं ‘जय जगदीश हरेे।’ इस प्रार्थना की वास्तविकता परसाई व्यक्तिगत अनुभव से जानते हैं। यह प्रार्थना उनमें आतंक, त्रास और भय उत्पन्न करती है, ‘मैं इससे नफरत करता हूं। जवानी से ही मैं सब प्रार्थनाओं और भजनों से नफरत करने लगा।’
व्यक्तिगत अनुभव, रचनाकार का अनुभव बनकर अपने पात्रों द्वारा भगवान को पुकारते देख उनके दुख का अनुभव करता-कराता है। परसाई के ये पात्र उनके आत्मीय हैं। लेकिन ये जिसे रक्षा के लिए पुकारते हैं, वह भ्रम या धोखा है। परसाई की तटस्थ दृष्टि इस विडंबना को देखती है। विक्षोभ उत्पन्न करती है। जो करूणा पुकार जड़ पत्थर चाहे जड़ हो, कठोर हो - सत्य है, उसका अस्तित्व है। लेकिन जिसे पुकारा जाता है, वह है - इस पर परसाई का पूरा सन्देह है। इस सत्य को केवल परसाई का रचनाकार जानता है, इसलिए उसकी यातना और अधिक बढ़ जाती है, वह कबीर के दुःख के आसपास की है।
कहानी के अंत में वाचक कवि को सेनेटोरियम में छोड़कर, उसके उपचार का प्रबंध करके लौटने लगता है। वाचक चलने लगा तो वही करूण स्थिति वाले रोगी उसे विदा करते हैं, जो दूसरों को संभालने की क्षमता रखते हैं - ‘बाहर चलने लगा, तो उन 40-50 मरीजों ने ‘नमस्कार, जै रामजी की’ की झड़ी लगा दी। कैसी आत्मीयता और दो घण्टे के इस परिचित के जाने का कैसा दुख। जैसे जन्म का साथी जा रहा हो।’
बाबा नागार्जुन ने रास्ते में ही रह जाने वाले असफल, अनाम लोगों पर एक कविता लिखी ‘उनको प्रणाम’, परसाई ने अपने कुछ सात्विक वृत्तियों के पात्रों को अपनी रचनाएं समर्पित की हैं। उनमें से एक है ‘जिन्दगी और मौत’, इस कहानी के रोगियों से उन्होंने रिश्ता जोड़ा, जन्म का साथी माना। इनके आचरण, संवेदनशीलता, सीमित सकर्मकता को देखते हुए क्या ये सचमुच रोगी लगते हैं? डा. विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा निराला पर लिखी कविता ‘पागल’ की याद आती हैं -
ओ, नजरूल इस्लाम, रूसो, वान गाग के साथी
हमें तुम्हें पागल कहते हैं
किंतु हमें तुम क्या कहते हो?
परसाई ने समाज रक्षक होने का दंभ करने वालों, करूणा का प्रदर्शन करने वालों, करूणा चुराने वालों और करूणावान होने में समर्थ लेकिन उससे विमुख लोगों पर सीधा व्यंग्य भी किया है। लेकिन उनके रास्ते और भी हैं। इस कहानी के माध्यम से वे ऐसे लोगों पर सार्थक टिप्पणी करते हैं, व्यंग्य का एक रूप यह भी है। गालिब की वे पंक्तियां फिर याद आती हैं -
कैदियों ने मुझे सर आँखों पर बिठाया है। मैं इनकी मुहब्बत पर कितना नाज करूँ? शहर में अगर कहीं वफ़ा है तो वह उन चोरों में है, जो पकड़े जा चुके हैं। मैं उनके साथ रिश्ता जोड़ना चाहता हूँ।’
काश! कोई ऐसा भी सेनेटोरियम बने जिसमें उन वास्तविक मनोरोगियों की चिकित्सा हो जो बाहर घूम रहे हैं। परसाई साहित्य भी ऐसा ही एक सेनेटोरियम है।

»»  read more

भाकपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक सम्पन्न

महंगाई के खिलाफ सशक्त आन्दोलन का आह्वान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक बंगलौर में 27 से 29 दिसम्बर 2009 को का. अजीज पाशा, सांसद की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई।
बैठक में महासचिव का. ए.बी.बर्धन ने राजनीतिक-संगठनात्मक रिपोर्ट, उप महासचिव का. एस. सुधाकर रेधी ने पार्टी संगठन तथा उसके कार्य-कलाप तथा सचिव का. डी. राजा ने राष्ट्रीय परिषद की पिछली बैठक के बाद की कार्य रिपोर्ट पेश की। महासचिव का. ए.बी.बर्धन ने आर्थिक संकट, संप्रग सरकार की जन-विरोधी आर्थिक नीति, महंगाई को नियंत्रित करने में उनकी विफलता तथा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के अंधाधुंध विनिवेश की उसकी नीति के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने देश के सामने विद्यमान अनेक राजनीतिक सवालों तथा सरकार की विदेश एवं घरेलू नीतियों पर भी रोशनी डाली। महासचिव द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल की स्थिति, माओवादी हिंसा, उत्तर-पूर्व में विद्रोह की समस्याओं एवं वाम एकता को मजबूत करने की जरूरत आदि के बारे में भी बताया गया है।
राष्ट्रीय परिषद द्वारा अनेक प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें से कुछ को नीचे दिया जा रहा है।
महंगाई
”आसमान छूती महंगाई, खासकर खाद्य पदार्थों की आसमान छूती कीमतों - जो हर सप्ताह 20 प्वाइंट की दर से बढ़ रही है, चावल की खुदरा कीमत 51 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है जो पिछले 6 महीनों से निर्बाध रूप से जारी है - की वजह है खाद्यान्न व्यापार में सट्टेबाजी पर रोक लगाने में केन्द्र सरकार की पूर्ण विफलता और मांग-आपूर्ति के बेमेल होने की स्थिति में सरकार द्वारा वायदा कारोबार की इजाजत देना, खाद्य पदार्थों का बेरोकटोक निर्यात और मुख्य तौर से उदारीकरण की नीति एवं एक निर्बाध बाजार अर्थव्यवस्था की स्थापना। शर्मनाक बात यह है कि करीब बीस वर्षों के बाद देश ने चावल के आयात का सहारा लिया है।
खाद्य सुरक्षा नहीं रही, केरल जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर अनेक राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली खत्म हो गयी है। यह चिन्ताजनक बात है कि देश फिर राष्ट्र की खाद्य संप्रभुता का भीतरघात करते हुए आज खाद्य के आयात पर निर्भरशील हो गया है।
सरकार के पास पूरी दृढ़ता से इस बदतर स्थिति का सामना करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है। उसका यह तर्क कि विकास की उच्च दर हमेशा ऊंची कीमत से जुड़ी रहती है, एकदम अतर्कसंगत है। उसकी यह सफाई कि उच्च वसूली कीमत से यह स्थिति पैदा हुई, एकदम अस्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त खाद्यान्न की बढ़ती कीमत इन वस्तुओं के उत्पादन में गिरावट के अनुपात से काफी अधिक है।
फिर कृषि में गंभीर संकट, उत्पादन में गिरावट जो वर्षों से चली आ रही है, की वजह है सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र की घोर उपेक्षा, कृषि में निवेश में लगातार कमी, आसान कर्ज की अनुपलब्धता और सबसे बढ़कर सामाजिक आधारभूत ढांचे का अभाव।
इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद कीमतों में असहनीय अभूतपूर्व वृद्धि एवं आम जनता के सामने उत्पन्न भयंकर मुसीबतों पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करते हुए केन्द्र सरकार से अपील करती है कि वह खाद्य पदार्थों की कीमत में अभूतपूर्व वृद्धि का समाधान करने एवं जनता की मुसीबतों को दूर करने के लिए अविलम्ब प्रभावी कदम उठाये।
आवश्यक वस्तु कानून को और अधिक कठोर बनाकर जमाखोरों एवं सट्टेबाजों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपील करती है कि विवेकसम्मत कीमत पर जनता को आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आम लोगों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पुनस्र्थापित किया जाये एवं उसे सशक्त बनाया जाये। अल्पकालिक कदम उठाते हुए सरकार को अवश्य ही कृषि को पुनर्जीवंत बनाने एवं कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सभी प्रयास करने चाहिए, खाद्य एवं पदार्थों का निर्यात बन्द करना चाहिए, वायदा कारोबार बंद करना चाहिए, बेईमान खाद्यान्न व्यापारियों को आसान बैंक कर्ज देना बन्द करना चाहिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाते हुए बिक्री कीमत बढ़ाने के कदम का विरोध करती है और उसे वापस लेने की मांग करती है।
खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों की बुनियादी मानवीय समस्या का समाधान करने में सरकार की लगातार अकर्मण्यता की निन्दा करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जनता से अपील करती है कि वह सभी संभव रूपों में कार्रवाई के लिए आगे बढ़े, व्याकतम एकता कायम करे,
अप्रितिरोध्य आंदोलन करे और सरकार को अपनी नीति में बदलाव लाने के लिए मजबूर कर दे।
राष्ट्रीय परिषद महंगाई के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आन्दोलन तेज करने के वामपंथी पार्टियों के निर्णय का स्वागत करती है और वह समस्त पार्टी से आह्वान करती है कि वह हजारों-लाखों लोगों को लामबंद करके इस अभियान को पूरी तरह सफल बनाये और मार्च महीने में संसद मार्च को असाधारण रूप से सफल बनाये।
तेलंगाना
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद दोनों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के दूसरे हिस्सों में उत्पन्न भारी विक्षोभ पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करती है। इस स्थिति की पूरी जिम्मेवारी कांग्रेस की है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक अलग राज्य के रूप में तेलंगाना के निर्माण का समर्थन करती है। उसने मार्च 2008 में आयोजित हैदराबाद पार्टी कांग्रेस के अनुरूप यह निर्णय लिया है। अन्य प्रमुख पार्टियों ने भी तेलंगाना के निर्माण को स्वीकार किया है। संसद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता ने उसके निर्माण का आग्रह किया। उसके साथ ही उन्होंने जोरदार अपील की कि एक आम सहमति कायम करने तथा कार्यविधि एवं अन्य विवरण तैयार करने के लिए तुरन्त एक सर्वदलीय बैठक बुलायी जाये। उसके लिए व्यापक सलाह-मशविरे की प्रक्रिया की जरूरत है।
एक राज्य के विभाजन का तकाजा है कि उससे संबंधित सभी मसलों का समाधान किया जाना है, आम सहमति के लिए व्यापक प्रयास किया जाना है और आशंकाओं को दूर किया जाना है तथा उन लोगों को मनाया जाना है जो उससे मतभेद रखते हैं।
कांग्रेस नेतृत्व ने जिसने तेलंगाना के निर्माण का पूरा श्रेय स्वयं लेने और दूसरी पार्टियों पर भारी पड़ने का सपना संजो रखा था, पूरी प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा करने का प्रयास किया। तेलंगाना की मांग पर काफी विलम्ब से प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी पर फटाफट मध्यरात्रि में उसकी घोषणा की गयी। यहां तक कि संप्रग के घटकों से भी परामर्श नहीं किया गया। राज्य के दोनों हिस्सों में कांग्रेस नेता अभी तेलंगाना के निर्माण के पक्ष में और विरोध में भावनाओं को भड़का रहे हैं। कुछ ऐसी पार्टियां भी ऐसा ही कर रही हैं।
कांग्रेस की जोड़तोड़ ने पूरे आंध्र राज्य को संकट में डाल दिया है। विधायकों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है। यहां तक कि मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया है और सरकार भी ठहराव में है। अब कांग्रेस नेतृत्व यह कहते हुए पैर पीछे खींच रहा है कि राज्य विधान सभा को अवश्य ही एक प्रस्ताव पास करना होगा। वह दोनों प्रतिद्वंद्वियों की भावनाएं भड़काने के बाद ऐसा कर रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मांग करती है कि कांग्रेस नेतृत्व को यह खेल बंद करना चाहिए। उसे अवश्य ही राज्य के दोनों हिस्सों में अपने पार्टी नेताओं को नियंत्रित और अनुशासित करना चाहिए। उसे अवश्य ही तेलंगाना राज्य के निर्माण के लिए निर्णय लेना चाहिए और विधान सभा में एक एकीकृत प्रस्ताव पेश करना चाहिए ताकि पूरे राज्य की जनता के बीच आम सहमति कायम हो सके तथा एक भाईचारे की भावना में राज्य का विभाजन हो सके।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग गठित करने के किसी कदम का विरोध करती है। यह केवल तेलंगाना पर निर्णय को स्थगित करने का ही एक कदम होगा और उस उलझन भरे दलदल से निकलने का एक प्रयास होगा जिसे स्वयं कांग्रेस ने ही निर्मित किया है। वह मुसीबत का पिटारा खोल देगा और सभी राज्यों में उन तत्वों को प्रोत्साहित करेगा जो राज्यों को दो, तीन या अधिक इकाइयों में बांटने के अभियान में लगे हुए हैं। यह महंगाई, खाद्य सुरक्षा, रोजगार के नुकसान, बेरोजगारी आदि जैसे प्रभावित करने वाले मुख्य मसलों पर संघर्ष करने से जनता के ध्यान को दूसरी ओर मोड़ने का ही काम करेगा।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद राज्य के दोनों हिस्सों की जनता के सभी तबकों से अपील करती है कि वे वर्तमान आन्दोलन एवं जवाबी आन्दोलन को बंद करे जो कटुता के बीज बो रहे हैं, सामान्य स्थिति बहाल करें तथा तेलंगाना के निर्माण के लिए एवं आंध्र प्रदेश के बाकी हिस्से के अलग राज्य के लिए संयत रूप से कार्य करे जो अब अपरिहार्य हो गया है।
कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मेलन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मेलन के विचार-विमर्श तथा परिणामों का विश्लेषण करने के बाद अमरीका और अन्य विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन में कमी करने के संबंध में किसी समझौते पर नहीं पहुंचने के लिए जिम्मेवार समझती है।
तथाकथित कोपेनहेगन समझौते ने धनी औद्योगिक देशों के लिए कोई बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है जैसी कि क्योटो करार (1997) में मांग की गयी थी जिसकी अभिपुष्टि करने में अमरीका लगातार इन्कार करता रहा है। अब उनका प्रयास केवल क्योटो करार को खत्म करना ही नहीं है बल्कि संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क तथा बाली कार्रवाई योजना (2007) का भीतरघात करना भी है।
हालांकि भारत ने चीन, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर कार्य किया पर अंततः वह ”अंतर्राष्ट्रीय सलाह-मशविरा एवं विश्लेषण“ के लिए सहमत हो गया। यह भारत की घोषित स्थिति में एक बदलाव है। इसे किसी कानूनी बाध्यकारी समझौते के अभाव एवं तकनीकी के स्थानांतरण पर किसी समझौते के अभाव की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह एक तरह से अमरीका को तुष्ट करने का जोड़-तोड़ है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद भारत सरकार को सावधान करती है कि वह विकासशील देशों की एकता को तोड़ने की अमरीका की दुरभिसंधि से चैकस रहें। वह सरकार से आग्रह करती है कि वह ‘बेसिक’ में हिस्सा लेते हुए जी-77 तथा जी-192 के देशों के साथ घनिष्ठ रूप से काम करे और विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेवारी को स्वीकार करने एवं क्योटो करार के अनुरूप काम करने के लिए मजबूर करें। विकासशील देशों की एकता अगले वर्ष मेक्सिको में होने वाली वार्ता के लिए आवश्यक है।
वनभूमि पर आदिवासी अधिकार कानून के कार्यान्वयन में भीतरघात के प्रयास का विरोध
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी अधिकार मान्यता कानून 2006 (2007 का कानून) की व्यवस्थाओं तथा उसके नियमों के तहत आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के कब्जे में वनभूमि के वितरण के लिए आदिवासी अधिकार कानून के कार्यान्वयन के लिए 31 दिसम्बर 2009 की तिथि निर्धारित करने के केन्द्र सरकार के कथित निर्णय पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है, हालांकि इस कानून ने उसके कार्यान्वयन के लिए कोई समय-सीमा नहीं लगायी है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद समझती है कि समय सीमा लगाने का निर्णय गैरकानूनी है और इस कानून का भीतरघात करने का सरकार का एक सुनियोजित प्रयास है जिसे एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कानून समझा गया है।
वास्तव में लाखों वनवासी, दोनों आदिवासी तथा अन्य गरीब लोग, अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक दावों का आवेदन भी नहीं दे सके हैं क्योंकि उनका आवास सुदूर जंगल में इलाकों में है और वे अधिकांशतः निरक्षर हैं तथा सूचना का अभाव है एवं आदिवासी आबादी वाले राज्यों के अनेक हिस्सों में माओवादी उग्रवाद एवं विद्रोह द्वारा भारी कठिनाइयां पैदा कर दी गयी हैं। ग्राम सभा तथा पंचायतें भी अभी तक भूमि अधिकार सर्टिफिकेट जारी करने के लिए सिफारिशें देने की औपचारिकताओं की प्रक्रिया को पूरी नहीं कर सकी है। इस घड़ी में एक समय सीमा लगाकर कार्यान्वयन की प्रक्रिया को रोकने का प्रयास गैरकानूनी है और कानून के लाभ प्राप्तकर्ताओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्र तथा संबंधित राज्य सरकारों से अपील करती है कि वे आदिवासी अधिकार कानून के कार्यान्वयन की प्रक्रिया को खुला रखें जो ब्रिटिश शासन के समय से ही और उसके बाद शासक वर्गों द्वारा देश की आदिवासी जनता के साथ किये गये ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए बनाया गया था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आदिवासी संगठनों तथा आदिवासी जनों के बीच काम करने वाले एनजीओ से अपील करती है कि वे इस कानून का भीतरघात करने के केन्द्र सरकार के घृणित प्रयासों को नाकाम करने के लिए एक साथ आयें। इस कानून का राष्ट्र ने स्वागत किया था हालांकि निहित स्वार्थों के दबाव के कारण देरी से उसके नियम बनाये गये। अब किसी भी तरह की समय सीमा लगाये बिना उसके पूर्ण कार्यान्वन की इजाजत दी जानी चाहिए।
खाद्य सुरक्षा कानून
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद खाद्य सुरक्षा पर प्रस्ताववित कानून पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करती है।
प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून में अनेक कमियां हैं जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली को केवल बीपीएल श्रेणी तक ही सीमित रखना, सबों के लिए खाद्य सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से वापस होने का केन्द्र का प्रयास और बीपीएल एवं एपीएल श्रेणियों के लिए मानदंड निर्धारित करने के राज्य सरकार के अधिकार को अस्वीकार करना।
योजना आयोग समेत सरकारी निकायों में गरीबी निर्धारण के मानदंड पर मतभेद है।
केन्द्र बीपीएल तथा एपीएल मानदंडों को निर्धारित करने के राज्यों के अधिकार को हड़पने क प्रयास कर रहा है। इसके अतिरिक्त अनेक राज्य सरकारें खाद्यान्न 2 रुपये प्रति किलो तथा 1 रु. प्रतिकिलो की दर से दे रही है। प्रस्तावित कानून कीमत बढ़ाकर 3 रुपये प्रतिकिलो कर देगा एवं खाद्यान्न की मात्रा 35 किलो से घटाकर 25 किलो कर देगा।
कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार समावेशी विकास की बात करती है। लेकिन वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बड़ी संख्या में गरीब लोगों को अलग कर रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद केन्द्र सरकार से आग्रह करती है कि वह खाद्य सुरक्षा के मसले पर विचार करने के लिए राज्य के खाद्य मंत्रियों की एक बैठक आयोजित करे और केरल की एलडीएफ सरकार की पहल को भी ध्यान में रखे जिसने इस मसले पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया।
वह यह मांग भी करती है कि प्रस्तावित कानून सभी राज्य सरकारों को भेजे जायें तथा उस पर बहस की जाये। सबों को खाद्य सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए।
उत्तर-पूर्व के विद्रोही ग्रुपों से राजनीतिक वार्ता
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने मिलिटेंट ग्रुपों की कार्रवाइयों के चलते जो अलग राज्य तथा संप्रभुता की मांग कर रहे हैं, उत्तर पूर्वी क्षेत्र में उत्पन्न गंभीर स्थिति पर विचार किया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद भारत सरकार से आग्रह करती है कि वह मसले के समाधान के लिए बिना किसी पूर्व शर्त के उल्फा और अन्य मिलिटेंट और अन्य गु्रपों से राजनीतिक बातचीत शुरू करे। भारत सरकार और उत्तर-पूर्व के मिलिटेंट ग्रुपों के नेतृत्व द्वारा किसी भी बहाने पर राजनीतिक वार्ता की प्रक्रिया में विलंब नहीं किया जाना चाहिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को तुरन्त वापस करने की मांग करती है जिसका केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा दुरूपयोग किया जा रहा है। इस मामले पर विचार करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त कुछ समितियों का भी यह विचार है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद राजनीतिक पार्टियों, बुद्धिजीवियों, लोकतांत्रिक संगठनों से यह अपील करती है कि वे देश के हित में इस मांग को स्वीकार करने के लिए भारत सरकार पर दबाव डालें।
»»  read more

ललितपुर के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मुख्यमंत्री को भाकपा राज्य सचिव का पत्र

महोदय,
हम सभी जानते हैं कि प्रदेश का बुन्देलखण्ड क्षेत्र एक बहुत ही पिछड़ क्षेत्र है। उसमें भी ललितपुर जनपद और भी अधिक पिछड़ा है।
इस जनपद के विकास और सम्पर्ण बुन्देलखण्ड के विकास की आवाज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सदैव से उठाती रही है। आज भी भाकपा मांग कर रही है कि वहां सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम स्थापित किये जायें।
इसके पीछे भाकपा की समझ है कि ललितपुर जनपद और समूचे बुन्देलखण्ड में तमाम पठारी, गैर उपजाऊ तथा वन विभाग की ऐसी जमीन जिस पर वृक्ष नहीं है, मौजूद है जिसके रहते बिना कृषि योग्य भूमि को लिये ही तमाम उद्योग खोले जा सकते हैं।
अब पता चला है कि आपकी सरकार ललितपुर में एक ऊर्जा संयत्र बनाने जा रही है। हम इसका स्वागत करते हैं।
लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जनपद ललितपुर काउंसिल ने मेरे पास सैकड़ों हस्ताक्षरों से युक्त उस ज्ञापन की प्रति भेजी है जो आपको, महामहिम राज्यपाल जी को तथा माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार को भी भेजा गया है।
ज्ञापन से पता चलता है कि उपर्युक्त विद्युत परियोजना के निर्माण के लिये ललितपुर जनपद के विकास खण्ड जखौरा के ग्राम दैलवारा, जैरवारा, टौरिया, रांकड तथा थनवास आदि ग्रामों के किसानों की उपजाऊ जमीनों को अधिग्रहीत किये जाने की योजना चल रही है।
स्पष्ट कर दें कि ये भूमि बेहद उपजाऊ है तथा दो फसल देने वाली सिंचित जमीन है। इन जमीनों के मालिक अधिकतर दलित और आदिवासी हैं तथा राजघाट बांध के डूबे क्षेत्र से भगाये गये किसान हैं जो अभी बर्बादी से उबर भी न पाये थे कि दोबारा बर्बादी के कगार पर लाकर खड़े कर दिये गये हैं।
हम भाकपा के बुन्देलखण्ड के विकास के लक्ष्य को दोहराते हुए कहना चाहते हैं कि उपर्युक्त परियोजना के लिये ‘नरेन्द्रा एक्सप्लोसिव’ नामक वर्षों से बन्द पड़े, उद्योग की 1100 एकड़ जमीन का उपयोग किया जाये। यह जमीन इस उद्योग के लिये किसानों से अधिग्रहीत की गयी थी तथा शेष वन विभाग से ली गयी थी। आज उसे वापस ले वहां विद्युत परियोजना का निर्माण किया जा सकता है।
दूसरे जनपद बुन्देलखण्ड में हजारों एकड़ जंगल की ऐसी जमीन मौजूद है जिस पर वृक्ष नहीं है। उसका इस्तेमाल भी उक्त परियोजना के लिये किया जा सकता है।
केन्द्र सरकार के उद्योग मंत्रालय ने भी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि उद्योगों के लिये उपजाऊ जमीने न अधिग्रहीत की जायें।
खाद्यान्न संकट, बेरोजगारी और किसानों को बर्बादी से बचाने को भी यह जरूरी है।
अतएव आपसे निवेदन है कि ललितपुर जनपद में राज्य सरकार विद्युत परियोजना का अवश्य निर्माण करे परन्तु परियोजना के लिये किसानों की उपजाऊ जमीनें कतई न ली जायें।
हम समझते हैं कि आप जनहित में, कृषि हित में एवं दलित हित में उक्त परियोजना का निर्माण ‘नरेन्द्रा एक्सप्लोसिव’ की बेकार पड़ी जमीन पर अथवा किसी दूसरी गैर उपजाऊ जमीन पर करायेंगी। अन्यथा भाकपा किसानो के आन्दोलन का पूरा-पूरा सहयोग एवं समर्थन करेगी।
सधन्यवाद।
»»  read more

कोपनहेगन समझौताः विकासशील देशों पर नया लगाम

कोपनहेगन जाने के पूर्व ही पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने घोषित किया था कि भारत स्वतः कार्बन उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कटौती करेगा तो संसद में आपत्ति प्रकट की गयी क्योंकि ऐसी एकतरफा घोषणा से भारत की स्थिति कमजोर पड़ती थी। तब जयराम रमेश ने कहा था कि यह आश्वासन भारतीय जनगण को संबोधित है और ऐसा वे कोपनहेगन में नहीं करने जा रहे हैं और यह भी कि पर्यावरण के क्योटो प्रोटोकाल से पीछे हटने का प्रशन नहीं उठता है। ऐसी दुमंुही बातों पर तब भी किसी ने विश्वास नहीं किया था, पर अब जब जयराम रमेश कोपनहेगन में अपने दोनों ही हाथों से ऐसा ही लिखित समझौते पर हस्ताक्षर कर लौटे हैं तो झेंपते से बोले कि उन्होंने क्योटो संधि पर लचीला रूख अपनाया। लाज छिपाने का यह अनोखा तरीका है। असल बात तो यह है कि उन्होंने क्योटो संधि को अलविदा कर दिया है।

आखिर क्या मजबूरी थी कि भारत क्योटो संधि से पीछे हट गया? विकासमान देशों के साथ मिलकर भारत ने जो दबाव बनाया था, ऐसा करके भारत स्वयं विकासमान देशों से अलग-थलग हो गया। विकसित देशों ने अफ्रीकी देशों को आर्थिक और तकनीकी सहायता का आश्वासन देकर पहले से ही फोड़ने का प्रयास कर रहे थे। ऐसे में भारत को ज्यादा सावधानी बरतनी थी। इस तरह बेजरुरत भारत-अमरीकी परमाणु संधि के बाद फिर एक बार भारत की घुटनाटेकू विदेश नीति उजागर हुई है। साम्राज्यवाद के समक्ष ऐसी ही घुटनाटेकू नीति के चलते भारत के संबंध अपने ही पड़ोसी देशों के साथ अच्छे नहीं हैं। संप्रग शासनकाल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख हमेशा ही दुविधाजनक संदिग्ध होती गयी है।
राष्ट्र संघ के 187 देशों का सर्वसहमत और अत्यंत न्यायपूर्ण क्योटो संधि को तजने का कोई कारण नहीं था। क्योटो संधि के अंतर्गत विकसित देशों के ऊपर कानूनी प्रतिबंध था कि वह अपना कार्बन उत्सर्जन घटाकर 2.7 टन प्रतिव्यक्ति की सीमा के अंदर करे। वर्तमान में अमेरिका 23.5 टन प्रतिव्यक्ति कार्बन उत्सर्जन करता है, जबकि भारत में महज 1.7 टन प्रतिव्यक्ति कार्बन उत्सर्जन है। क्योटो संधि के अंतर्गत विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन की सीमा घटाकर 1.4 टन प्रतिव्यक्ति करने की है। ऐसी स्थिति में भारत को मात्र 0.3 टन प्रतिव्यक्ति कार्बन घटाना होता। अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर करना यह कहकर इंकार किया कि इस संधि का बुरा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। तो क्या भारत का अपना कार्बन उत्सर्जन 20 प्रतिशत कम करने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर अच्छा असर पडेगा?
जाहिर है, भारत फिर अमेरिकी फांस में फंस गया है। भारत को नये कोपनहेगन प्रस्ताव के मुताबिक उत्सर्जन कम करने संबंधी नियमित रपट देनी होगी और उसकी जांच, निरीक्षण माॅनिटरिंग, वेरिफिकेशन के नाम पर भारत में अमेरिकी दखलंदाजी बढ़ती जाएगी और तब अमेरिका पर कोई ऊंगली नहीं उठाएगा कि वह क्यों अपना कार्बन उत्सर्जन कम नहीं कर रहा है।
कार्बन उत्सर्जन का संबंध निःसंदेह अर्थव्यवस्थ के साथ जुड़ा है और इसलिए अमेरिका आर्थिक क्षेत्र में अपना दबदबा बनाये रखने के लिए पर्यावरण संरक्षण के मामले में टांगे भिड़ा रहा है, उसी तरह जैसा उसने परमाणु अप्रसार संधि; एनपीटी के मामले में किया। सर्वविदित है माल उत्पादन के लिए कारखानों में मुख्यतः कोयला, बिजली और तेल का इंधन इस्तेमाल होता है। कोयला, तेल, बिजली जलाने और तैयार करने से कार्बन डाइआक्साइड गैस बनती है। इसे ही ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कहते हैं। धरती पर तापमान बढ़ने से पहाड़ों पर जमे ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं। उत्तर ध्रवु आर्कटिक और दक्षिण ध्रुव अंटार्कटिका की बर्फ भारी मात्रा में पिघल रही है। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। प्रकटतः इससे दुनिया के समुद्र तटीय शहरों और आवासों का अस्तित्व खतरें में है। कार्बनडाइआक्साइड गैस पृथ्वी के वायुमंडल में लिपटा ओजोन गैर परत को भी कमजोर करता है। ओजोन गैस परत पृथ्वी का कवच है, जो सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावायलट किरणों से पृथ्वी को बचाता है। विकसित देशों में ज्यादा कल-कारखानें हैं। इसलिए ये प्रदूषण फैलाने वाले सबसे बडे़ देश हैं। अमेरिकी नीति का मर्म यह है कि वह प्रदूषण फैलाने के अर्थात् कार्बन उत्सर्जन के अपने अधिकार सुरक्षित रखना चाहता है, वहीं वह विकासमान देशों को कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए कानूनी तौर पर प्रतिबंधित करना चाहता है। परमाणु अप्रसार संधि; एनपीटी पर हस्ताक्षर कराकर उन्होंने ऐसा ही किया। वे स्वयं आणविक हथियार रखेंगे, किंतु दूसरों को इसकी इजाजत नहीं देंगे। इससे उनकी वरीयता बनी रहेगी। जाहिर है, औद्योगिक देश अपने कारखानों का माल उत्पादन जारी रखने के लिए पिछड़े देशों को कारखाना विस्तार रोकना चाहते हैं।
आर्थिक विकास की विश्व प्रतियोगिता में हर देश ऊर्जा की खपत में वृद्धि कर रहा है और इससे उसी अनुपात में दुनिया में कार्बन-उत्सर्जन बढ़ रहा है। इस तरह बेलगाम माल उत्पादन और मुक्त बाजारवाद से दुनिया में एक तरफ कुछ देश और कुछ व्यक्ति अपार संपदा समेटे हैं, तो दूसरी तरफ इस दौर में न केवल दुनिया में गरीबी और दारिद्रय का फैलाव हो रहा है, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी का अस्तित्व ही गंभीर खतरे के आगोश में है। इस खतरे की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए मालद्वीप की सरकार ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक समुद्र की गहराई में पैैठकर की तो नेपाल सरकार का मंत्रिमंडल ने एवरेस्ट के तुंग शिखर पर जाकर बैठक रचायी। वैज्ञानिकों का आकलन है कि एशिया-अफ्रीका के समुद्र तटीय देशो का बड़ा भाग 2150 तक समुद्र के गर्भ में चला जाएगा। भारत के कलकत्ता, मुंबई जैसे शहर भी खतरे में होंगे। अनुमान है कि बंग्लादेश का एक तिहाई भाग समुद्र में डूबेगा और वहां से कई करोड़ आबादी का पलायन होगा। बंग्लादेशी भागकर कहां जायेंगे? भारत उनके लिए सबसे सुगम है। ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया में बड़ा उलटफेर होने वाला है।
कोपनहेगन में फिर अमेरिकी कूटनीति की जीत हुई। वह 1992 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी), 1997 की क्योटो संधि और 2004 की बाली कार्ययोजना प्रावधानों को ठेंगा दिखाने में कामयाब हो गया, जिसके मुताबिक विकसित औद्योगिक देशों के लिए पहले अपना कार्बन उत्सर्जन घटाना लाजमी था। जयराम रमेश के ‘लचीलेपन’ के चलते अब ये दोनों ही दस्तावेज बेकार हो गए। संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन और क्योटो संधि विकासमान देशों के हित में अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
अमेरिका स्वाभाविक ही कोपनहेगन में अपनी दोहरी जीत से प्रसन्न है। विश्व का 4.5 प्रतिशत आबादी वाला देश, जो 22 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन का दोषी है, वह किसी प्रकार की बाध्यकारी वचनबद्धता से साफ बच गया और उलटा वह भारत जैसे विकासमान देशों को वचनबद्धता के दायरा में खींच लाने में कामयाब हो गया, जिसका विकसित औद्योगिक देशों के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन ही अत्यल्प है। निश्चय ही, यह विकासशील देशों के आर्थिक विकास पर नया लगाम साबित होगा।

सत्य नारायण ठाकुर
»»  read more

लोकप्रिय पोस्ट

कुल पेज दृश्य