भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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बुधवार, 14 जुलाई 2010

गड़े मुर्दे मत उखाड़ें, वक्त के तकाजे को अमल करें - एटक की अपील

प्रिय कामरेड पंधे,
“आपकी पत्रिका “वर्किंग क्लास” (जून 2010) में प्रकाशित का. जीवन राय के आलेख की तरफ हमारा ध्यान दिलाया गया है। उस आलेख को हमने गंभीरता से पढ़ा है।
आप कृपया स्मरण करें कि आपके कार्यालय में ही कोयला हड़ताल के प्रश्न पर चर्चा हुई थी और हमने सुझाव दिया था कि हड़ताल की तारीख आगे बढ़ायी जाय और अन्य टेªड यूनियनों के परामर्श से हड़ताल की वैकल्पिक तारीख तय की जाय। असलियत में एटक के राष्ट्रीय सचिव रमेन्द्र कुमार ने इस बारे में एक पत्र का. जीवन राय को 27 अप्रैल 2010 को ही लिखा और हड़ताल करने के लिए अन्य संबंधित टेªड यूनियनों से परामर्श करने का सुझाव दिया था, किंतु का. जीवन राय ने अपने आलेख में हड़ताल में शामिल नहीं होने वाले यूनियनों को ‘अवसरवादी’ होने का आरोप लगाया है। जाहिर है, एटक ने उस हड़ताल में भाग नहीं लिया, जिस हड़ताल की तारीख का एकतरफा फैसला आपके संगठन ने किया। इसलिए इस दोषारोपण को हम पूरी तरह इंकार करते हैं, बल्कि हमारा आरोप है कि आपके संगठन ने एटक एवं अन्य संगठनों से परामर्श किये बगैर एकतरफा फैसला लेकर हड़ताल में एटक एवं अन्य संगठनों को शामिल होने से अलग कर दिया। इस तरह टेªड यूनियनों में आम सहमति बनाने के हमारे प्रयास का अनदेखा किया गया। हमें भय है, आपका यह आचरण एकता के लिए गंभीर वचनबद्धता का बयान नहीं है।
आप महसूस करेंगे कि टेªड यूनियनों की प्रतिद्वंद्विता को एक-दूसरे की टंगरी काटने की अधोगति में नहीं परिणत करना चाहिए। यह आचरण सरकार की प्रतिक्रियावादी नीतियों के विरुद्ध लड़ाकू व्यापक कारगर एकता के निर्माण को कमजोर करता है। ऐसा आचरण मजदूरों को विभाजित रखता है और इसलिए यह मजदूर वर्ग की व्यापक एकता में बड़ी बाधा है।
एटक और इंडिया माईंस वर्कर्स फेडरेशन का निजीकरण, विनिवेश, आउटसोर्सिंग आदि के खिलाफ संघर्ष का शानदार रिकार्ड है। हमने बराबर व्यापक मंच का निर्माण किया है और मजदूर वर्ग को संघर्ष के मैदान में उतारा है। अगर मजदूरों का कुछ तबका अपने यूनियन के बैनर तले अलग झुंड बनाकर व्यापक एकता से बाहर हो जाता है तो इसमें संदेह नहीं कि यह राष्ट्रीय स्तर की व्यापक एकता को भी नुकसान पहुंचाता है और यह अपने आप में उन उद्देश्यों के प्रति भी कुसेवा है, जिसके लिए वह हड़ताल आयोजित की गयी थी।
आप संकटपूर्ण वर्तमान समय के तकाजे से अवगत हैं, जिसके चलते हाल के दिनों में वामदलों ने पलटियां खायी हैं। देश संकट से गुजर रहा है। भविष्य की नयी चुनौतियों का सामना व्यापक एकता के माध्यम से ही किया जा सकता है। हम सबने नौ केंद्रीय मजदूर संगठनों के बीच आपसी सहयोग और परस्पर परामर्श से एकता को मजबूत बनाने में सफलता हासिल की है। वर्तमान समय में मजदूर वर्ग के नये रूझान का यह इजहार है। यह प्रयास हमें जारी रखना है।
आप अपने संगठन का महिमा मंडन करें तो इसमें कुछ भी नुकसान नहीं है, जैसा आपके अध्यक्ष द्वारा किया प्रतीत होता हैं, किंतु ऐसा करते समय अन्य संगठनों की भूमिका नकारी नहीं जा सकती जो, ज्यादा नहीं तो, आपकी तरह ही समान रूप से गौरवशाली है।
इस आलेख में एटक और सीटू के पुराने मतभेदों को प्राथमिकता दी गयी है, जबकि तथ्य यह है कि हम सरकार की दुर्नीतियों के खिलाफ मिलकर संघर्ष किये हैं। यह तथ्य नजरअंदाज किया गया है। वर्तमान संदर्भ में क्या यह उचित है कि इतिहास के गड़े मुर्दों को फिर से उखाड़ा जाय? उन्होंने अपने लेख में तथाकथित कतिपय निराधार घटनाओं का उल्लेख किया है और एटक को ‘मजदूर विरोधी’ कहकर निंदित किया है। इससे हम अत्यंत क्षुब्ध है। ऐसी लांछना को हम पूरी तरह खारिज करते हैं। एटक मजबूती से विश्वास करता है कि वर्तमान समय में हमारा उद्देश्य न केवल राष्ट्रीय स्तर पर एकता को मजबूत करने का होना चाहिए, बल्कि औद्योगिक और क्षेत्रीय स्तर पर भी संपूर्ण मजदूर वर्ग के बीच महत्तर सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने का भी होना चाहिए।
हम आपसे अपील करते हैं कि आप सुनिश्चित करें कि पत्र-पत्रिकाओं में कुछ भी ऐसा प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए, जिससे यह ऐतिहासिक एकता भंग हो, जिसे हमने हाल के दिनों में निर्मित की है।
चूंकि वह आलेख, जिसकी चर्चा हमने ऊपर की पंक्तियों में की है, आपकी पत्रिका में प्रकाशित हुई है, इसलिए यह पत्र भी हम एटक पत्रिका ‘ट्रेड यूनियन रिकाडर्’ में प्रकाशित कर रहे हैं।
भाईचारा के साथ,
जी एल धर
सचिव, एटक”
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कंपनी अफसरों का वेतन करोड़ों में - करते क्या हैं वे मोटे पगार वाले?

दो भारत बन रहा है। एक ‘शाइनिंग इंडिया’ तो दूसरा ‘दरिद्र भारत’। इसी तरह श्रम के भी दो मानक हो गये हैं ‘आफिसर्स पर्क’ और ‘मजदूरों की दिहाड़ी’। कंपनी के सीइओ के वेतन करोडों में, लेकिन मजदूरों की दिहाड़ी मुश्किल से दो अंकों में। प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक देश में कारपोरेट जगत में सौ से अधिक अधिकारियों का मासिक वेतन एक करोड़ रुपए से अधिक है और यह संख्या शुरूआत भर है। भारत में कुल मिलाकर 4500 से अधिक सूचीबद्ध कंपनियां हैं, जिनमें 175 ने अब तक अपने सीइओ तथा अन्य शीर्ष पदाधिकारियों के वेतन पैकेज का खुलासा किया है। इनमें 60 कंपनियों के शीर्ष कार्यकारियों को मासिक एक करोड़ रुपयों या अधिक वेतन मिलता है।
अब तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2010 या दिसंबर 2009 को समाप्त वित्त वर्ष में एक करोड़ रुपए या इससे अधिक सालाना वेतन पाने वाले अधिकारियों की संख्या 105 है। इस सूची में पहले स्थान पर मीडिया मुगल कलानिधि मारन तथा उनकी पत्नी कावेरी कलानिधि हैं, जिनका वेतन मार्च 2010 में 37 करोड़ रुपए से अधिक रहा अर्थात् 3.10 करोड़ मासिक। यों वे साल के लिए 94.8 करोड़ रुपए तक का वेतन पाने के हकदार थे, जो 780 करोड़ मासिक होता है।
सन टीवी नेटवर्क के प्रबंध निदेशक कावेरी ने 2009-2010 में अधिकतम 74.16 करोड़ रुपए का वेतन लेना तय किया था। इस सूची में रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी भी हैं। जिन्होंने स्वैच्छिक कटौती के बावजूद 15 करोड़ रुपए का सालाना वेतन लिया। उल्लेखनीय है कि कारपोरेट जगत के अधिकारियों को बेतहाशा वेतन पर काफी हंगामा मच चुका है। मुकेश अंबानी ने पिछले साल अक्टूबर में 2008-09 के लिए अधिकतम 15 करोड़ रुपये वेतन लेने का फैसला किया था। अपने अधिकारियों को करोड़ो रुपए वेतन देने वाली कंपनियों में जेएसडब्ल्यू स्टील, पाटनी कम्प्यूटर्स, रैनबैक्सी, हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन, एचडीएफसी बैंक, शोभा डेवलपर्स, इंफोसिस, इंडसाइड बैंक, ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन, एसीसी, किसिल, रेमंड, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज, डेवलपमेंट क्रेडिट बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, नेस्ले इंडिया, यस बैंक तथा रैलीज इंडिया शामिल हैं, उल्लेखनीय है यह सूची सिर्फ शुरूआत भर कही जा सकती है। क्योंकि बहुत सारी प्रमुख कंपनियों की सालाना रपटें अभी आनी हैं। सरकार मोटे पगारवालों का वेतन भुगतान नहीं रोक सकती है तो क्या वह दिहाड़ी मजदूरों का न्यूनतम वेतन भुगतान गारंटी भी नहीं कर सकती हैं?
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