भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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बुधवार, 9 मार्च 2011

अमीर और गरीब के मध्य बढ़ती खाई


वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सन 1991 में जब पहली बार वित्तमंत्री बने थे तो

उन्होंने विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के इशारों पर नई आर्थिक

नीतियों - ”उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण“ को लागू करना शुरू किया

था। इन बीस सालों में एक लम्बा सफर तय हुआ है। सरकार दावा करती है कि विकास

दर को शीघ्र ही दो अंकों में पहुंचा दिया जायेगा। इन बीस सालों में अमीर

और गरीब के मध्य खाई बेइंतिहा बढ़ गयी है। महंगाई खूब बढ़ी है। बेरोजगारी

भी खूब बढ़ी है। भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंच गया है। पूंजी का मुनाफा खूब

बढ़ा है। कथित विकास दर के कारण पूंजी के मुनाफे में मजदूरों का और

किसानों का हिस्सा धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। सरकारों में बैठे लोग

इन्हीं मजदूरों-किसानों के वोटों के सहारे सत्तासीन हुए हैं लेकिन इनकी

दुर्दशा से उनका कोई सरोकार नहीं रहा।

आजादी के बाद सन 1990 तक सरकारों ने न्यूनतम आय और अधिकतम आय के बीच की

खाई को लगातार कम करने का काम किया था। 1991 में मनमोहन सिंह ने इस प्रक्रिया

को उलट दिया। न्यूनतम और अधिकतम आय के बीच की खाई बढ़ना शुरू हो गयी

और आज यह बहुत गहरी हो चुकी है। आज औद्योगिक मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी

उत्तर प्रदेश में रू. 2300.00 प्रतिमाह है। अगर साल में सौ दिन रोजगार मिला

नरेगा के अंतर्गत मिलने वाली मजदूरी के आधार पर अगर ग्रामीण मजदूर की मासिक

आय निकाली जाये तो यह लगभग रू. 833.00 आती है। मध्यान्ह भोजना रसोईया को

उत्तर प्रदेश में केवल रू. 1,000.00 मजदूरी प्रतिमाह मिलती है। अभी तक आंगनबाड़ी

सहायक का मासिक वेतन रू. 750.00 है। देश की तमाम जनता ऐसी है जिसे यह भी नसीब

नहीं होता है।

इसके ठीक उलट सरमायेदारों और उनके प्रबंधकों की आय कुलांचे मारने लगी है।

”इकोनॉमिक टाईम्स“ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले वित्तीय वर्ष में

कारपोरेट हाउसों के सीईओ का वेतन उस कंपनी के सभी कर्मचारियों के औसत

वेतन का 68 गुना पहुंच गया है। एक साल पहले तक यह 59 गुना ही था। इसका मतलब है

कि इन कारपोरेट हाउसों के सीईओ ने अपनी कम्पनी के कुल कर्मचारियों के औसत

सालाना वेतन को केवल पांच दिन के वेतन के जरिये कमा लेते हैं। 1990 तक किसी

भी कम्पनी की न्यूनतम पगार और अधिकतम पगार में केवल दस गुने का अंतर हुआ

करता था।

इन सरमायेदारों को अभी संतोष नहीं है। एक माह पहले मुम्बई में व्यापारियों

के एक सम्मेलन में के. लक्ष्मीकांत ने कहा था कि अमरीका में यह अंतर 250 गुना है

और हमें वहां पहुंचना है। मेसर्स जिंदल स्टील एंड पॉवर के कार्यकारी उपाध्यक्ष

नवीन जिंदल (जोकि कुरूक्षेत्र से कांग्रेस के सांसद हैं) ने अपनी कंपनी के औसत

प्रति कर्मचारी वेतन का 2000 गुना पिछले साल वेतन के रूप में लिया। उनका सालाना

वेतन रू. 48.98 करोड़ प्रतिवर्ष है जिसमें कुछ सहूलियतें शामिल नहीं हैं। सन

टीवी के अध्यक्ष कलानिधि मारन और उनकी पत्नी ने वेतन के रूप में पिछले साल

सैंतीस-सैंतीस करोड़ निकाले जोकि सन टीवी के कुल कर्मचारियों के औसत सालाना

वेतन का 1760 गुना है।

यह सीमाओं का नितान्त अतिक्रमण है और आगे आने वाले समय में पूंजी के मुनाफे

के इस तरह बंटवारे को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। जाति, धर्म एवं क्षेत्रीयता

की संकीर्ण राजनीति करने वाले लोग इस बंदरबांट को रोक नहीं सकते और न ही

इसके खिलाफ निर्णायक संघर्ष का हिस्सा हो सकते हैं। जरूरत वर्गीय आधार पर

एकता के आधार पर जुझारू संघर्षों की है, जिसे हमें ही निभाना होगा।

- प्रदीप तिवारी
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