भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 10 अप्रैल 2010

कृषि में कार्पोरेट को न्यौता

कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में अकस्मात बदले हुए सरकारी रूख से जो चौंकाने वाली बात सामने आयी वह यह कि इसके बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले ही अपनी अमरीका यात्रा के समय वचन दे चुके थे कि वे पश्चिमी देशों के अनुकूल लचीला रवैया अपनायेंगे। इसी तरह जनता का आक्रोश ठंडा करने के लिए सरकार बीटी बैंगन के प्रश्न पर पीछे हट गयी दिखती हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि पर्दे के पीछे अमरीका के साथ इसी दौर में गुपचुप वार्ता भी चलती...
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सरकारों की संवेदनहीनता के परिणामस्वरूप अब गेहूं किसानों के लूटने की बारी

किसी खाद्यान्न का न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत होती है जिस पर केन्द्र एवं राज्य सरकारें अपनी-अपनी एजेंसियों की मार्फत किसानों से सीधे उस खाद्यान्न की खरीदारी करती हैं। लेकिन अगर सरकार केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करें परन्तु उस मूल्य पर खाद्यान्न की खरीदारी न करें तो निश्चित रूप से बाजार कीमतों को निर्धारित करता है। बाजार में छोटे एवं मझोले किसानों तथा उन किसानों जिन्होंने साहूकारों या बैंकों से ऋण लेकर फसल उगाई है, के पास...
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कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा हैजहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा हैमनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ाकि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा हैमैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँकि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा हैसजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किएउसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा हैतमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदादिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा हैसब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैंख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा हैजिसे पुकारिए मिलता...
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रोटी नहीं तो क्या शिक्षा का अधिकार तो है?

केन्द्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के प्रभुत्व वाली सरकार को दुबारा बनने के बाद देश के शिक्षा परिदृश्य में लगातार कुछ नया घटित होता रहा है। कई बार परिदृश्य बहुत उत्तेजनापूर्ण होता नजर आया। शिक्षा के प्रति गहरी राजनैतिक संवेदनशीलता रखने वाली सरकारें तो पहले भी केन्द्र में सत्तासीन हुई है। उन्होंने प्रचलित शिक्षा को अपने तौर पर प्रभावित करने एवं उनमें खास तरह परिवर्तन भी किये, परन्तु वर्तमान सरकार शिक्षा के आधारभूत...
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