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शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

इब्सा बैठक

यूरोपीय संघ के अधिकांश देश गहराते आर्थिक संकट के कारण सरकार के दिवालियेपन और आर्थिक रूप से धराशायी होने के कगार पर है। वहांॅ उमड़े संकट के ये बादल उन विकासमान देशों तक भी पहुंॅचने लगे हैं जो मई, 2008 से शुरू भूमंडलीय मंदी के अभी तक कम ही शिकार हुए हैं। इन हालात ने ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को इब्सा (इंडिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका- आईबीएसए) के अंतर्गत एकजुट कर दिया है ताकि वे इस भूमंडलीय संकट पर अपेक्षाकृत अधिक वस्तुगत तरीके से अपना दृष्टिकोण तय कर सके। इस प्रकार जब लगातार गहराते आर्थिक संकट से पार पाने के लिए कोई आर्थिक योजना तय करने के लिए पेरिस में जी-20 की मीटिंग एक ही महीने के बाद होने वाली है तो भारत के प्रधानमंत्री और ब्राजील एवं दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपतियों की प्रिटोरिया शिखर बैठक का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। एक तरफ यूरोप के विकसित देश हैं और दूसरी तरफ इब्सा के देश और साथ ही रूस और चीन जैसे देश हैं। पेरिस में इब्सा को रूस और चीन के साथ तालमेल रखनी होगी जो उनसे साथ ‘ब्रिक्स’ (ब्राजील, इंडिया, चाइना, साउथ अफ्रीका) संगठन में शामिल हैं।
 इब्सा के घोषणा पत्र में अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के कामकाज पर चर्चा की गयी। पर वह वर्तमान आर्थिक संकट के बुनियादी कारणों को नहीं छूता। यह सच है कि इन दोनों संगठनों पर विकसित देश या और अधिक सही कहंे तो अमरीका हावी है। वर्तमान आर्थिक संकट की जड़ में इन संस्थानों के जो नुस्खे जिम्मेदार हैं उनके बारे में घोषणा पत्र में कुछ भी नहीं कहा गया है। यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है कि वर्तमान भूमंडलीय संकट पंूजीवाद का चक्रीय आर्थिक संकट नहीं है बल्कि यह संकट उस अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी द्वारा निर्दिष्ट नीतियों के थोपने के कारण पैदा हुआ है जिनका एकमात्र उद्देश्य अपने मुनाफों को अधिकाधिक बढ़ाना और हर हथकंडे अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों की लूट करना है। न सिर्फ इन देशों के लोग कर्ज आधारित तौर तरीकों से जीवन गुजारते हैं बल्कि इन देशों की अर्थव्यवस्था भी उन कर्जों एवं बोर्डों पर आधारित हैं जिन्हें इस तरह के संकट में दुनिया को धकेलने के लिए अंतर्राष्ट्रीय वित्त ने बढ़ावा दिया है। संकट से पार पाने के लिए विकसित देशों ने दिवालिया हुए बैंकों और वित्त संस्थानों को बेलआउट पैकेज देने और धाराशायी होती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कमखर्ची के कदम (ऑस्टेरिटी मेजर्स) उठाने के तरीके अपनाये। पर इससे संकट पर पार पाना तो दूर रहा, संकट और अधिक गहरा गया। हाल के दिनों में अमरीका और यूरोप के 1500 के करीब शहरों में लोग जिस तरह इन तरीकों के विरूद्ध उठ खड़े हुए हैं वह इन देशों को राजनैतिक संकट की दिशा में ले जायेगा। 17 सितम्बर को न्यूयार्क में शुरू हुआ ”वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो“ आंदोलन अब तेजी से नये इलाकांे में फैल रहा है। सुदूर पूर्व जापान तक में जन प्रतिरोध की आंधी चल रही है। ग्रीस, जो पहले ही आर्थिक दिवालियेपन और धराशायी होने के कगार पर हैं वहांॅ जबर्दस्त विरोध आंदोलन हो रहा है। सरकार ताकत के बल पर उसे दबाने की कोशिश कर रही है। इस सप्ताह इटली में भी हिंसा हुई। संभव है स्पेन, पुर्तगाल और फ्रांस दिवालियापन के अगले शिकार बनें। कुछ दिन तक को सरकार विरोध प्रदर्शनों और आंदोलन को दबाने में कामयाब रह सकती है वह दिन दूर नहीं जब यह आंदोलन वर्ग युद्ध की प्रकृति हासिल कर ले। अभी अधिकांशतः ये आंदोलन स्वतः स्फूर्त और दिशाविहीन हैं। जो ताकतें अन्ततः वर्ग संघर्ष की जीत में यकीन करती हैं जरूरत है कि वे आगे आयें और समय रहते इसे एक सही आकार दें।
 इब्सा घोषणा पत्र में अरब जगत के संकट, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुर्नगठन जैसी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय घटनओं पर समन्वित कार्रवाई के बारे में बाते कहीं गयी हैं। उसमें सीरिया को एक मंत्री स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात भी कही गयी है ताकि अमरीका- ब्रिटेन- फ्रांस की तिकड़ी द्वारा लीबिया पर हमले की तरह की सीरिया पर किसी कार्रवाई को रोका जा सके। यहां तक तो ठीक है पर इब्सा देशों को खासकर भारत को उन नीतियांे पर ध्यान देना होगा जिन पर वह चल रहे हैं।
 डा0 मनमोहन सिंह के तहत यूपीए- दो सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक जैसे उसके एजेंट संगठनों द्वारा निर्दिष्ट आर्थिक नव उदारवाद के नुस्खे को पूरी तरह हृदयंगम कर रखा है। यूपीए- दो सरकार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर तो आर्थिक नव उदारवाद के अपरिहार्य सह उत्पादों- इसकी बुराईयों की बातें करती हैं पर देश में उन्हीं विनाशकारी नीतियों पर बेशर्मी के साथ अमल करी हैं। मुद्रास्फीति, भ्रष्टाचार, बढ़ती बेरोजगारी और अमीरों एवं गरीबांे के बीच बढ़ती असमानता- ये सभी चीजें आर्थिक नव उदारवाद के उत्पाद हैं। देश में ऐसी ताकतें हैं जो जनता के दिलों- दिमाग पर पकड़ रखने वाले भावनात्मक मुद्दों को उछालकर जनता का ध्यान इन बुराईयों के बुनियादी कारणों से हटाने की कोशिश करेंगे। इस किस्म की गुमराह करने वाली कोशिशों से सावधान रहना होगा।
 भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने व्यापक स्तर पर भूख हड़ताल के अभियान का आह्वान किया है। अच्छा होगा हम आर्थिक नव उदारवाद, अधिकांशतः पूंजीवाद परस्त पार्टियां जिसके लिए प्रतिबद्ध हैं, के विरूद्ध और अधिक सतत एवं संगठित आंदोलन के लिए इस भूख हड़ताल से शुरूआत करें।
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चार रुपये का मासिक पेंशन: योजना का कैसा मजाक?

चार रुपये का मासिक पेंशन: योजना का कैसा मजाक?
भारत सरकार हाल के दिनों में लगातार असंगठित मजदूरों के लिये सामाजिक सुरक्षा योजना का ढोल पीटती रही है। इसने नयी पेंशन योजना बनायी है, जिसमें कामगारों की योगदान राशि को निश्चित किया गया है, किंतु पेंशन कितना मिलेगा, इसका कोई आश्वासन नहीं है। नीचे कतिपय बीड़ी कामगारों की सूची और उन्हें मिलनेवाले पेंशन रकम उल्लिखित है, जिनसे पता चलता है कि कामगार पेंशन योजना 1995 के अंतर्गत किस प्रकार दृरिद्रों को मिलनेवाले पेंशन से भी कम मजदूरों का पेंशन निर्धारित किया गया है। उड़ीसा के बीड़ी मजदूर बिजली पटेल का पेंशन 4 रुपये मासिक निर्धारित किया गया है। क्या यह पेंशन योजना का मजाक नहीं है?
पेंशनरों के नाम          पेंशन रकम      पी एफ एकाउंट नंबर                    प्रदेश
बिजली पटेल              4/-                    ओआर438/705                              उड़ीस
मल्लाम्मा                  66/-                   एपी/5276/14950                            आंध्र प्रदेश
के. राजेश्वरी              42/-                   एपी/5276/14903                            आंध्र प्रदेश
इला बाई                  42/-                    एपी/5276/14908                            आंध्र प्रदेश
वेंकट लक्ष्मी             64/-                   एपी/5276/14944                             आंध्र प्रदेश
इमाम बी                  92/-                   एपी/5276/14932                             आंध्र प्रदेश
वी. राजेश्वरी             55/-                   एपी/5276/14892                             आंध्र प्रदेश
राजू                          66/-                   एपी/5207/6640                               आंध्र प्रदेश
वीरालक्ष्मी                54/-                   एपी/5276/14318                             आंध्र प्रदेश
आरूधाम                  47/-                    टीएन/8213/1549                            तमिलनाडु
रामायी                     93/-                   टीएन/8213/1522                             तमिलनाडु
सागर                      90/-                    टीएन 19844/91                              तमिलनाडु
एम. मुरगन             72/-                   टीएन 21270/2634                           तमिलनाडु
मुरगन                    94/-                   टीएन 9627/98                                 तमिलनाडु
जय लक्ष्मी            69/-                    टीएन 23092/120                             तमिलनाडु
मो. मेहबुबिया      134/-                    एपी/5276/14880                              आंध्र प्रदेश
...............            116/-                    एपी/8213/1563                                आंध्र प्रदेश
चौ. कट्टक्का        197/-                     एपी/5276/14953                              आंध्र प्रदेश
एम. मल्लम्मा    114/-                     एपी/5276/14902                              आंध्र प्रदेश
इंदराम               120/-                     टीएन 8213/1549                             तमिलनाडु
सेमिउल्लाह        132/-                    टीएन 19844/132                              तमिलनाडु
अल्लाबकश        163/-                    टीएन 18420/17                               तमिलनाडु
एम. राजी           107/-                    टीएन 21270/279                              तमिलनाडु
वी.पी.  समराज  184/-                     टीएन 18787/94                               तमिलनाडु
के. चेन्नप्पन      318/-                    टीएन 1270/2655                              तमिलनाडु
के.पी. मणि         150/-                   टीएन 18657/988                              तमिलनाडु
उपर्युक्त नाम केवल सांकेतिक उदाहरण है। अनुमान किया जाता है कि केवल बीड़ी मजदूरों की संख्या पांच लाख है, जिन्हें दो सौ  रूपये मासिक के आस-पास पेंशन निर्धारित किया गया है।
- सत्य नारायण ठाकुर
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“समानुपातिक प्रतिनिधित्व” के बिना चुनाव सुधार बेमानी

भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल के लिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले अराजनैतिक आन्दोलन के बीच स्वयंभू सिविल सोसाईटी ने चुनाव-सुधारों के लिए आन्दोलन चलाने की चर्चा शुरू कर दी थी। इस आन्दोलन की मीमांसा एक बहुत गहन और उलझा हुआ विषय है। हम उनके विभिन्न आयामों की चर्चा समय-समय पर करते रहे हैं।
चुनाव सुधारों के लिए आन्दोलन चलाने का जिक्र करते समय जिन दो सुधारों को बहुत उछाला गया, वे थे - ‘राईट टू रिकाल’ और ‘राईट टू रिजेक्ट’ यानी सभी उम्मीदवारों को खारिज करने तथा निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने के अधिकार। प्रथम दृष्टि में ये नारे बहुत लुभावने लगते हैं। चुनावों में व्याप्त तमाम बुराईयों पर चर्चा के बिना ही इन दो अधिकारों की मांग करना उचित नहीं है।
चुनावों के दौरान जनता का बड़ा हिस्सा अभी भी वोट डालने से कतराता है। बहुदलीय लोकतंत्र में तकनीकी बहुमत पाने वाला उम्मीदवार जीत जाता है। चुनावों के दौरान बहुबल, धनबल, जातिबल, धर्मबल जैसे तमाम फैक्टर्स काम करते हैं। चुनाव अभी तक इन्हें रोकने की व्यवस्था नहीं कर सका है। बहुदलीय लोकतंत्र की रक्षा करना इस देश के तमाम शोषित, वंचित नागरिकों के साथ-साथ इस देश के मध्यमवर्ग के लिए भी बहुत जरूरी है। ‘राईट टू रिकाल’ और ‘राईट टू रिजेक्ट’ के अधिकारों के परिणाम बहुत खतरनाक भी साबित हो सकते हैं। वर्तमान व्यवस्था में ये लोकतंत्र को ही अस्थिर कर सकते हैं।
स्वयंभू सिविल सोसाइटी की हां में हां मिलाते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जय प्रकाश नारायण का नाम लेते हुए मतदाताओं को ‘राईट टू रिकाल’ यानी निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने के अधिकार की वकालत करना भी शुरू कर दिया है। क्षेत्र का विकास न होने के नाम पर जनता को भड़का कर विपक्षी दल के सांसद अथवा विधायक के खिलाफ इस अधिकार का उपयोग सत्ताधारी राजनीतिक दल किस प्रकार कर सकता है, इस पर विचार की जरूरत है। इन चर्चाओं के मध्य लाल कृष्ण आडवाणी ने दबे स्वर में दो दलीय लोकतंत्र की बात भी की है, जोकि भारतीय लोकतंत्र के लिए और भारतीय जनता के लिए अनर्थकारी सिद्ध हो सकता है।
इन आवाजों के बीच हमारी पुराने मांग ”समानुपातिक प्रतिनिधित्व“ का कहीं जिक्र तक नहीं आया जबकि ”समानुपातिक प्रतिनिधित्व“ के जरिये हम चुनावों में व्याप्त वर्तमान तमाम बुराईयों को दूर कर सकते हैं। इस व्यवस्था में चुनाव छोटे-छोटे क्षेत्रों में न होकर राष्ट्रीय स्तर पर अथवा राज्य स्तर पर होता है। चुनाव उम्मीदवार नहीं बल्कि राजनैतिक दल लड़ते हैं। चुनावों में न्यूनतम मत पाने वाले राजनैतिक दलों को उनके द्वारा प्राप्त मतों के अनुपात में अपने-अपने प्रतिनिधि संसद और विधान मंडल में भेजने का अधिकार मिलता है।
इस प्रणाली के जरिये हम गुण्डों यानी बाहुबलियों और भ्रष्टों यानी धनबलियों के चुनावों पर प्रभाव को समाप्त कर सकते हैं। खर्चीले हो चुके चुनावों में प्रत्याशियों द्वारा निजी धन लगाने को इसके द्वारा रोका जा सकता है जो राजनीति में भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारक है। राजनैतिक दलों को हर तीसरा नामांकन महिला से करने की बाध्यता के द्वारा हम संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण सुनिश्चित कर सकते हैं। इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त तथा दल-बदल से भी निपटा जा सकता है। इसके जरिये हम लोक सभा एवं विधान सभा को पांच सालों तक बनाये रख सकते हैं।
इस पद्धति में जनता राजनीतिक दलों से अपना हम बेहतर तरीके से मांग सकती है और खरे न उतरने वाले दलों को चुनावों में खारिज कर सकती है। इस पद्धति में चुनावों पर धार्मिक, जातीय, भाषाई और क्षेत्रीय संकीर्णताओं का प्रभाव भी काफी कम हो जायेगा।
चूंकि चुनाव सुधारों पर चर्चा चल ही चुकी है तो हमें जनता के मध्य अपनी पुरानी मांग - ”समानुपातिक प्रतिनिधित्व“ प्रणाली को लागू करने की बात को जोर-शोर से उठाना चाहिए और इसकी अच्छाईयों तथा बुराईयों पर चर्चा का माहौल बनाना चाहिए। चुनाव सुधारों के कोलाहल में हमें अपनी आवाज को दबने से बचाना होगा। चुनावी
सुधार के लिए आन्दोलन हमें खुद शुरू करना चाहिए।
- प्रदीप तिवारी
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