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शनिवार, 10 मई 2014

सरमाये एवं मीडिया का नग्न नृत्य और असहाय चुनाव आयोग

लोक सभा चुनाव के अंतिम दौर का प्रचार आज सायं समाप्त हो जायेगा और इस अंक के पाठकों तक पहुंचने के पहले चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और नई सरकार के गठन की कवायद चल रही होगी। लोक सभा चुनावों के चुनाव परिणामों के बारे में कोई भी टिप्पणी परिणाम आने के बाद ही की जा सकती है लेकिन इस चुनाव के दौरान जिस तरह सरमाये एवं मीडिया ने एक व्यक्ति विशेष को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अभियान चलाया और जिस तरह चुनावों के दौरान धर्म एवं जातियों में मतदाताओं के संकीर्ण ध्रुवीकरण के प्रयास हुए, वह दोनों निहायत चिन्ताजनक है। भारतीय संविधान की आत्मा जार-जार की जाती रही। इस पूरे चुनाव के दौरान मुद्दे गायब रहे, जनता के सरोकार गायब रहे और चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई। जिस विकास की बातें की गईं, उस तरह का विकास पूरे देश में जगह-जगह पिछले 23 सालों में देखने को मिलता रहा है। इस दौर में हर चीज बढ़ती रही है, सरमायेदारों का सरमाया बढ़ता चला गया है और गरीबों की गरीबी बढ़ती चली गई है। महंगाई, बेरोजगारी, दमन, उत्पीड़न, अपराध सब प्रगति के पथ पर बेरोकटोक आगे बढ़ते रहे हैं। नई आर्थिक नीतियों की शुरूआत में नीति नियंताओं और साम्राज्यवादी अर्थशास्त्रियों का दावा था कि सरमायेदारों का सरमाया बढ़ने से टपक-टपक कर पैसा आम जनता तक पहुंचने लगेगा और यह सिद्धान्त ‘ट्रिकल डाउन’ थ्योरी के रूप में जाना गया। 23 साल बीत गये हैं परन्तु ऐसा होता कहीं दिखाई नहीं दिया। ऊपर से नीचे टपकता धन कहीं दिखाई नहीं दिया। उलटे नीचे से उछल कर धन ऊपर वालों की तिजोरियों में जाता रहा।
तीव्र ध्रुवीकरण के लिए नेता अनाप-शनाप बोलते रहे। लम्बे समय तक चुनाव आयोग खामोश रहा। अमित शाह, तोगड़िया, गिरिराज सिंह और बाबा रामदेव सरीखे अन्यान्य के आपत्तिजनक बयानों को लेकर निर्वाचन आयोग पर उदारता बरतने के आरोप लगते रहे। फिर उसने कुछ को नोटिसें और कुछ के खिलाफ एफआईआर लिखाने के निर्देश दिये। शुरूआत में अमित शाह एवं आजम खां के उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने पर पाबंदी लगा दी परन्तु बाद में अमित शाह के माफी मांगने के बाद उन पर लगाया गया प्रतिबंध वापस ले लिया गया। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों किया गया? यदि एक अपराध किया जाता है तो दुनियां के किसी भी कानून में माफी मांग लेने से अपराध की तीव्रता कम नहीं हो जाती। चुनाव आयोग को बार-बार चैलेन्ज किया जाता रहा। कभी आजम खां ने तो कभी मोदी ने संवैधानिक संस्था पर दवाब बनाने के प्रयास किये। वाराणसी में बिना अनुमति मोदी ने रोड शो किया और ध्रुवीकरण के तमाम प्रयास किये। चुनाव आयोग निरपेक्ष भाव से देखता रहा। संवैधानिक संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से चैलेन्ज करना लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है।
विज्ञापनों एवं पेड न्यूज की भरमार रही। इलेक्ट्रानिक मीडिया पूरी तरह और प्रिंट मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा बिका हुआ साफ दिखाई दिया। विज्ञापनों के अलावा खबरों तथा सर्वेक्षणों को इस प्रकार पेश किया गया कि जनता का अधिसंख्यक तबका मानने लगा है कि मीडिया बिका हुआ था। मीडिया की विश्वसनीयता पर अभूतपूर्व प्रश्नचिन्ह लग गया है।
चुनावों के दौरान कई स्थानों पर पैसे के बल पर मतदाताओं के खरीदने के नापाक प्रयास किये जाने के समाचार हैं। कई स्थानों पर बूथ कैपचरिंग की भी घटनायें हुई हैं। आश्चर्य का विषय है कि कई पोलिंग बूथों पर 100 प्रतिशत से अधिक मत पड़ने के समाचार मिले हैं। ऐसा कैसे सम्भव हुआ, इसका कोई उत्तर किसी के पास नहीं है।
सबसे अधिक चिन्ता का विषय यह है कि चुनावों के दौरान मीडिया में वामपंथ को कोई स्थान नहीं मिला। चुनाव सर्वक्षणों में वामपंथ को 20 सीटों के करीब सिमटा दिया गया। चुनाव परिणाम क्या होंगे, इस बारे में कयास लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह अंक पाठकों तक पहुंचते-पहुंचते चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे।
चुनाव परिणाम कुछ भी हों, देश पिछले 23 सालों से जिन आर्थिक नीतियों के रास्ते पर चल रहा है, उसमें बदलाव की कोई भी संभावना नहीं दिखाई दे रही है। अगर तीसरे मोर्चे की भी सरकार बन जाती है, तो उसमें अधिसंख्यक वहीं क्षेत्रीय राजनैतिक दल होंगे जो अपने-अपने राज्यों में जनविरोधी पूंजीवादी आर्थिक नीतियों को अमल में लाते रहे हैं।
इन आर्थिक नीतियों में बदलाव के लिए चुनावों के बाद वामपंथ, विशेषकर भाकपा को अपनी रणनीति में सुधार की दिशा में निर्ममता के साथ आगे बढ़ना होगा। प्रखर जनांदोलनों के जरिये जनता को पंूजीवाद के खिलाफ लामबंद करने की दिशा में हमें आगे बढ़ना होगा।
इस चुनाव के दौरान चुनाव सुधारों की आवश्यकता बहुत ही प्रबलता के साथ महसूस की गई। इस दिशा में प्रखर जनांदोलन समय की मांग है। भाकपा को इसके लिए पहल करनी होगी।
- प्रदीप तिवारी

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