भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

About The Author

Communist Party of India, U.P. State Council

Get The Latest News

Sign up to receive latest news

समर्थक

शनिवार, 10 मई 2014

Election Telecast of CPI on Doordarshn. (9.5.14.) By Dr.Girish.

प्रिय मतदाता भाइयों एवं बहनों, आप सभी लोक सभा के चुनावों की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और आप सभी को पिछले चुनावों की तुलना में ज्यादा विवेक और सूझ-बूझ के साथ मत का प्रयोग करना है क्योंकि देश के सामने जैसी चुनौतियाँ आज हैं, पहले कभी न थीं। जनता की जैसी हालत आज है, वैसी कभी न थी। पूंजीवादी नीतियों और सरकारों की कारगुजारियों के चलते आज महंगाई सातवें आसमान पर है। महंगाई ने आम और गरीब लोगों की मुसीबतें बेहद बढ़ा दी हैं। अनेक लोग आधे पेट सोने को मजबूर हैं। एक ओर मुट्ठी भर लोग अरबों-खरबों की सम्पत्ति के स्वामी हैं तो बहुमत लोग बेहद गरीब हैं। खुद सरकार ने स्वीकार किया है कि 78 प्रतिशत लोग प्रतिदिन 20 रूपये से कम में गुजारा करते हैं। एक तिहाई बच्चे और 50 फीसदी मातायें कुपोषण की शिकार हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की जनविरोधी नीतियों के कारण देश के किसान कंगाल हो चुके हैं। कर्ज में डूबे किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। मजदूरों और कर्मचारियों के न तो जीवन की सुरक्षा है न उनकी नौकरियों की। बढ़ती जा रही बेरोजगारी नौजवानों के लिए अभिशाप बन चुकी है। रिक्त होने वाले पदों पर नौकरियां नहीं दी जा रहीं हैं। शिक्षा का बजट लगातार कम हो रहा है। दोहरी शिक्षा प्रणाली और बेहद महंगी फ़ीस के कारण आम आदमी बच्चों को पढ़ा ही नहीं पा रहा है। केंद्र की सरकार इस बीच तमाम घपलों-घोटालों में जुटी रही। लाखों करोड़ के इन घोटालों में जनता के पसीने की कमाई सरकारी खजाने से निकल कर भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों में पहुंच गयी। आम लोग विकास से वंचित रह गये। मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। उसने भ्रष्टाचार जैसे सवालों पर संसद में कभी सार्थक बहस नहीं होने दी। इसके दो राष्ट्रीय अध्यक्षों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे जिनमें से एक को न्यायालय से सजा तक मिली। कर्नाटक के इसके पूर्व मुख्यमंत्री सहित कई मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार की खबरें जगजाहिर हैं। इस दौर में हमारे प्राकृतिक संसाधनों की बेपनाह लूट चलती रही। इन भ्रष्टाचार और घोटालों के सभी मामलों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मजबूत आवाज उठाई और कोयला आबंटन घोटाला तथा एक उद्योग समूह द्वारा निकाली जाने वाली गैस के दाम कई गुने किये जाने के घपले को तो भाकपा के नेताओं ने ही उजागर किया था। हालात यह हैं कि करोड़ों लोगों के पास रहने को घर नहीं है। शहरों की आबादी का बड़ा भाग झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहा है। बड़ी संख्या में लोगों को स्वच्छ पेयजल नहीं मिलता। शहरों-कस्बों में उच्चस्तरीय प्रदूषण के चलते श्वांस लेना कठिन है। कुपोषण, प्रदूषण और दूषित जल से बीमारियों में इजाफा हो रहा है। ऊपर से इलाज इतने महंगे हो गये हैं कि आम आदमी बिना इलाज के तड़प-तड़प कर मर रहा है। यह सब पूंजीवादी नीतियों को निर्ममता से चलाने का दुष्परिणाम है। पिछले दो दशकों में यह व्यवस्था आर्थिक नवउदारवाद के आवरण में लपेट कर चलायी जाती रही है। इसके चलते देश की दौलत का बहुत बड़ा भाग पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों की झोली में पहुँच चुका है जिसका बड़ा भाग विदेशी बैंकों में डाला जा चुका है। अभावों के महासागर में धकेल दी गई जनता में भारी असंतोष और गुस्सा है। केंद्र में सत्ता में होने के कारण कांग्रेस इन हालातों के लिए जिम्मेदार है। कांग्रेस से नाराज लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस के समान आर्थिक नीतियों पर ही चलने वाली भाजपा उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं ला सकती। वह और भी मुस्तैदी से गरीबों की लूट का एजेंडा चलाएगी। लोगों की इस नाराजगी को भुनाने के लिए भाजपा एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। कारपोरेटों की पूँजी और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया उसके प्रचार अभियान को धार देने में जुटे हैं। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता में आने को छटपटा रही है तो कारपोरेट घराने उसे सत्ता में बैठा देने को आतुर हैं ताकि कारपोरेटों को मालामाल और आमजनों को कंगाल बनाने के एजेंडे को निर्ममता से लागू किया जा सके। वामपंथी दलों को तो इस कारपोरेटी मीडिया ने पूरी तरह किनारे कर रखा है। जनता को लुभाने को गुजरात के कथित विकास की लम्बी-चौड़ी बातें की जा रही हैं। आजादी के पहले ही गुजरात में पूँजी का विकास देश के अन्य भागों की तुलना में ज्यादा हो चुका था। गत दशक में तो वहां किसानों की जमीनें बेहद कम कीमत पर अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को मुफ्त में सौंपी गयी हैं। यहाँ तक कि सीमाओं की रक्षा के उद्देश्य से कच्छ में बसाये गये सिक्ख किसानों को भी नहीं बक्शा गया और उनकी जमीनें अधिगृहीत कर बड़े उद्योग समूहों को दे दी गयीं। वहां कुपोषण, शिशु मृत्युदर और जननी मृत्युदर देश के अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है। मजदूरों को तो साधारण अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं। नये रोजगार सृजन में गुजरात पीछे है तथा वहां तरक्की की दर राष्ट्रीय दर से कम है। दशकों पहले हुये विकास को भी भाजपा अपने सत्ताकाल के विकास के रूप में प्रचारित कर रही है। देश में संसदीय प्रणाली लागू है जिसके अंतर्गत चुन कर आने वाले सांसदों का बहुमत प्रधानमंत्री का चुनाव करता है। लेकिन सत्ता पाने को व्याकुल भाजपा एवं संघ परिवार ने साम्प्रदायिक विभाजन को तीव्र कर वोट पाने की गरज से घनघोर सांप्रदायिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया है। यह संसदीय प्रणाली को बदल कर राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की भाजपा की चिर-परिचित नीति को आगे बढाने का प्रयास भी है। सांप्रदायिक विभाजन को तीखा करने की गरज से भाजपा और संघ परिवार के नेता तमाम भड़काने वाली बयानबाजियां कर रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की यह राय है कि हमारा महान देश अनेक धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं और संस्कृतियों का संमिश्रण है। धर्मनिरपेक्षता हमारी राष्ट्रीय एकता का मुख्य आधार है। हम सभी धर्माबलंबियों को यह भरोसा दिलाने के पक्षधर हैं कि वे सुरक्षित हैं और उन्हें समान अवसर मिलेंगे। देश में सांप्रदायिकता के लिए कोई स्थान नहीं है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने हमेशा देश और देश की जनता के हित में अभूतपूर्व योगदान किया है। आजादी की लड़ाई में हम किसी से पीछे न थे। इतिहास गवाह है कि जमींदारी के उन्मूलन और व्यापक भूमि सुधार के लिए हमने निर्णायक आन्दोलन किये। बैंकों का राष्ट्रीयकरण कराने और राजाओं का प्रिवीपर्स समाप्त कराने में हमने ठोस भूमिका निभाई। सार्वजनिक क्षेत्र की मजबूती के लिए हमने मजबूत आवाज उठाई। हमारे समर्थन पर टिकी संप्रग-1 सरकार को मनरेगा, सूचना का अधिकार अधिनियम, आदिवासी अधिकार अधिनियम, घरेलू हिंसा विरोधी अधिनियम आदि पारित करने के लिए बाध्य किया। सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखने को हम हमेशा मैदान में डटे रहे। हाल में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने महंगाई को नीचे लाने, भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने, सभी को खाद्य सुरक्षा दिलाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक बनाने, किसानों को उनकी पैदावारों का समुचित मूल्य दिलाने, किसानों बुनकरों दस्तकारों और सभी जरूरतमन्दों को रूपये 3000/- प्रति माह पेंशन दिलाने, मजदूरों को उचित वेतन दिलाने, ठेकेदारी प्रथा समाप्त कराने, बेरोजगारों को रोजगार दिलाने, शिक्षा का बाजारीकरण रोके जाने, स्वास्थ्य सेवाओं को आमजन के लिए सुलभ बनाने आदि के लिए भी निरंतर आवाज उठाई है। महिलाओं, आदिवासियों, दलितों एवं अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण के लिए भी हम अनवरत संघर्ष करते रहे हैं। इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि देश और समाज के समक्ष मौजूद चुनौतियों से तभी निपटा जा सकता है जब आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों की जगह जनता के बुनियादी हितों को साधने वाली वैकल्पिक नीतियों को आगे बढाया जाये। और यह तभी संभव होगा जब संसद में एक मजबूत वामपंथी ब्लाक जीत कर आये। यह वामपंथी ब्लाक ही संसद से सडक तक इन मुद्दों पर संघर्ष करेगा। मतदाता भाइयो और बहिनों, मौजूदा निजाम को बदलो, इससे से भी बदतर निजाम को आने से रोको और वामपंथी जनवादी ताकतों के हाथ मजबूत करो। अतएव आपसे अनुरोध है कि जहां-जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं वहां उनके चुनाव निशान - “हंसिया बाली“ के सामने वाला बटन दबा कर उन्हें भारी बहुमत से विजयी बनायें। धन्यवाद!

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय पोस्ट

कुल पेज दृश्य