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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह


नई चुनौतियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाने का संकल्प
प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह
लखनऊ 9 अक्टूबर। नई चुनौतियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाने के संकल्प के साथ प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह आज कैफी आज़मी एकेडमी में सम्पन्न हो गया। समारोह के प्रथम दिन का आयोजन नेहरू युवा केन्द्र में किया गया था और दूसरे दिन का आयोजन कैफी आजमी एकेडमी में किया गया। प्रथम दिन उद्घाटन सत्र के साथ ”प्रगतिशील लेखक आंदोलन के 75 वर्ष - परिप्रेक्ष्य और चुनौतियां“ विषय पर परिसंवाद आयोजित किया गया तो दूसरे दिन ”प्रगतिशील आंदोलन की विरासत - पक्षधरता के जोखिम“ विषय पर परिचर्चा के साथ समापन समारोह सम्पन्न हुआ।
गतिशीलता से काम नहीं चलने वाला है। हमें ऐसी गतिशीलता चाहिए जो समाज को आगे ले जाए। मनुष्यता को आगे ले जाए। हम अपनों से भी लड़ रहे हैं जो ज्यादा मुश्किल काम है। इसके बावजूद हम हैं और हमारा आंदोलन जिंदा है। यह उद्गार थे खगेन्द्र ठाकुर के जब वे नेहरू युवा केंद्र में अतीत की उपलब्धियों को रेखांकित करने के साथ ही भावी चुनौतियों और जिम्मेदारी के सन्दर्भ में बोल रहे थे।
प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव अली जावेद ने कहा कि मेहनकश अवाम के साथ लेखक के एकाकार होने की जरूरत है आज के साम्राज्यवादी चुनौतियों के दौर में संगठन की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं। शेखर जोशी ने कहा कि प्रगतिशील लेखक आंदोलन न होता तो हम लोग न होते। ‘परिप्रेक्ष्य और चुनौतियां’ विषय पर रीवां से आए युवा साहित्यकार डा. आशीष त्रिपाठी ने अगली पीढ़ी तैयार न होने का मुद्दा उठाकर चर्चा को गरमा दिया। डा. त्रिपाठी ने कहा कि युवा विचारक व लेखक नहीं दिखाई दे रहे हैं। अगली पीढ़ी तैयार करनी होगी। इसके लिए हमें फिर विश्वविद्यालय व दूसरे शैक्षिक संस्थानों की तरफ रुख करना होगा।
नाटककार राकेश ने कहा कि लेखन के केंद्र में अभी भी हाशिए का आदमी है। दलित व महिलाएं हैं। हमारे सामने लेखन में धार देने की चुनौती है। डा. रमेश दीक्षित ने कहा कि नए लोगों को जोड़ने के साथ-साथ प्रगतिशील लेखकों का व्यापक संयुक्त मोर्चा बनना चाहिए। अब नए साम्राज्यवाद का दौर है। समाज का एनजीओकरण हो गया है। जनतांत्रिक संगठनों को एक होकर बड़ा संघर्ष शुरू करने की जरूरत है। महाराष्ट्र के जाने माने लेखक श्रीपाद जोशी ने विचारधारा पर एक्शन प्लान की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि लोगों को हमसे आशा हमेशा बनी रही है लेकिन आज अपनी विरासत को लोगों तक पहुंचाने के माध्यम की चुनौती है। हमें संवाद के माध्यमों के बारे में विचार करना होगा। अवसर खोजने होंगे। लेखक डा. श्रीप्रकाश शुक्ल ने जनता की पक्षधरता का मुद्दा उठाते हुए साहित्य को जनता से जोड़ने की कोशिश करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि धर्म और पूंजी के रिश्ते बड़ी चुनौती हैं। डा. रघुवंश मणि, डा. सुखदेव सिंह, मोहन सिंह ने भी चर्चा में अपने विचार रखे।
समारोह की शुरुआत में विरोधाभासी टिप्पणियां कर चुके डा. नामवर सिंह ने समापन भाषण में उन्हें नसीहत दी। उन्होंने दो दिन की चर्चा के बाद एक नया घोषणापत्र तैयार करने पर बल दिया। नई चुनौतियों पर नए कार्यभार तय करने की जिम्मेदारी उन्होंने साथी साहित्यकारों को थमाई और कहा ‘ये कार्य अकेले नहीं किया जा सकता’। इसके लिए उन्होंने एक कमेटी के गठन की आवश्यकता रेखांकित की। उन्होंने कई भावी चुनौतियों के बारे में आगाह करते हुए उनसे लड़ने के लिए समान विचार वाले साहित्यकारों को एकजुट करने की जरूरत बताई। उन्होंने कई बड़ी चुनौतियों की बात करते हुए साहित्यकारों को उनसे आगाह भी किया। उन्होंने कहा कि नए वैश्विक अर्थ संकट के आने की आशंका है। जनवादी लेखक संघ (जलेस) और जन संस्कृति मंच (जसम) के साथ मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।
समापन समारोह के पूर्व ‘प्रगतिशील आंदोलन की विरासत - पक्षधरता के जोखिम’ विषय पर लेखक एवं बीएसयू के रिटायर्ड प्रोफेसर चौथीराम यादव ने कहा कि प्रलेस को किसानों व मजदूरों के सहवर्ती आंदोलन से जोड़ना होगा। उनके प्रति प्रतिबद्धता लानी होगी। कबीर और प्रेमचंद की तरह जन पक्षधरता के जोखिम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि सोवियत यूनियन के विघटन को साहित्यकारों द्वारा माकर््सवादी समाजवाद के खात्में के बतौर लेना एक भ्रामक विश्लेषण था। उन्होंने कहा कि साहित्य को फिर से माकर््सवाद को एक विकल्प के बतौर प्रस्तुत करना होगा यही प्रगतिशील लेखक संघ की राजनीतिक जिम्मेदारी है। आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि लेखक ने अपने को वर्ण से मुक्त किया। तमाम विरोधों के बावजूद प्रलेस का आंदोलन बढ़ा है। प्रगतिशील लेखक संघ आधुनिक भारत का पहला ऐसा लेखक आंदोलन था जिसने साहित्य को राजनीति से जोड़ने का काम किया था। आज इस परम्परा को आगे बढ़ाने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में प्रलेस ब्रिटिश साम्रज्यवाद के साथ-साथ धार्मिक कठमुल्लावाद से भी लड़ा था आज इस आंदोलन को फिर से इस भूमिका में आना होगा।
लेखक आबिद सुहैल ने कहा कि हाशिये के आदमी का साहित्य हाशिये पर आ गया है। लेखन पर चिंतन करना होगा। लेखक एवं पत्रकार श्याम कश्यप ने कहा कि जोखिम उठाने का फैसला लेखक का निजी होता है। हम अपने हथियार को भूलने की कोशिश न करें। प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि जोखिम तो अभी उठाया ही नहीं गया है। साहित्यकार अफसरपरस्ती छोड़ें। उन्होंने संघर्ष के साथियों के साथ काम करने की सलाह दी। उर्दू के जाने माने लेखक प्रो. अली अहमद फातमी ने सवाल किया कि आम आदमी के सरोकार क्यों गायब होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाजारवाद हमें अपने सरोकारों से भटका रहा है।
लखनऊ दूरदर्शन के निदेशक शशांक ने कहा कि जीवनमूल्य क्षण में खत्म नहीं हो जाते। प्रगतिशील लेखन की विरासत को नई चीजों से जोड़ना होगा। परिवहन विभाग के रिटायर्ड प्रधान प्रबंधक एवं लेखक मूलचंद्र सोनकर ने यह सवाल उठाया कि दलितों के बारे में एक दलित लेखक ही बेहतर लिख सकता है। उन्होंने कहा कि हमारी विरासत का समावेश करने को प्रगतिशील साहित्यकार तैयार नहीं होते हैं। आज दलितों और पिछड़ों के सवालों को भी अपने विमर्श में रखना होगा। उन्होंने कहा कि सावित्री बाई फुले, रमाबाई को आप संज्ञान में नहीं लेंगे तो उनका गलत लोगों द्वारा इस्तेमाल आप नहीं रोक पाएंगे। दिल्ली से आए वरिष्ठ लेखक श्याम कश्यप ने कहा कि संगठन पर अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए जब तक संगठन का पार्टी के साथ संबन्ध रहा, आंदोलन अपनी भूमिका में ज्यादा कारगर साबित रहा।
सम्मेलन में पिछले दिनों लेखिका शीबा असलम फहमी पर हुए हमले की निंदा की गयी।
सम्मेलन को सम्बोधित करने वाले अन्य प्रमुख वक्ता थे - दीनू कश्यप, राजेन्द्र राजन, साबिर रुदौलबी, डा. गया सिंह, जय प्रकाश धूमकेतु, संजय श्रीवास्तव, रवीन्द्र वर्मा, केशव गोस्वामी, पंजाबी लेखक डा. सर्वजीत सिंह, गुरुनाम कंवर व खान सिंह वर्मा, आनन्द शुक्ला, नरेश कुमार, सुभाष चंद्र कुशवाहा, रवि शेखर, एकता सिंह, शाहनवाज आलम आदि शामिल रहे।
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