भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

नयी परिस्थितियां और हमारे कर्तव्य

पिछले अंक में हमने ऐतिहासिक अमृतसर पार्टी कांग्रेस के बाद उस पर लिखे गये लेख को प्रकाशित कर चुके हैं। अमृतसर पार्टी कांग्रेस ने विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन को जनवाद की जो दिशा दी, उसके फलस्वरुप 1960 में मास्को में 81 कम्युनिस्ट पार्टियों का एक सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमें पारित प्रस्ताव में बहुत मजबूती के साथ शान्तिपूर्ण सहअस्तित्च के संघर्ष को हर कम्युनिस्ट पार्टी का कर्तव्य बताते हुए बहुत मजबूती के साथ कहा गया था कि शान्ति एवम् जनवाद के रास्ते पर चल कर समाजवाद तक पहंुचने के रास्ते खोजने पडें़गे।
पिछले अंकों में इस विश्व कम्युनिस्ट पार्टी की इस आम सहमति के खिलाफ ‘‘सत्ता के बन्दूक के नाल से निकालने’’ के अतिवादी नारे का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया था कि किस प्रकार इस अतिवादी नारे से एशिया की तत्कालीन सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी - ”इंडोनेशिया की कम्युनिस्ट पार्टी“ समाप्त हो गयी।
1961 में इन दोनों सैद्धान्तिक लाईनों के मध्य तेज वैचारिक संघर्ष की पृष्ठभूमि में विजयवाड़ा पार्टी कांग्रेस में दिए गए ऐतिहासिक भाषण को किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं।
- कार्यकारी सम्पादक)
साथियों, हम तीन साल पहले अमृतसर में मिले थे। उसके बाद से अब तक अनेक बड़ी-बडी घटनाएं घटी हैं। हमें उन घटनाओं का, उन घटनाओं को सुगठित करने में हमारी अपनी भूमिका का मूल्यंाकन करना है और अपनी तात्कालिक रणनीति तय करनी है।
यह एक पेचीदा और कठिन काम है। इसे राष्ट्रीय परिषद, केन्द्रीय कार्य समिति और केन्द्रीय सचिवालय के सामूहिक प्रयास से ही पूरा किया जा सकता था। लेकिन हमारे साथी इस बात से अवगत हैं कि कुछ समय से हमारे बीच में तीखे मतभेद मौजूद हैं। इन मतभेदों के कारण एक साल पहले कलकत्ते में संपन्न राष्ट्रीय परिषद की बैठक में हम राजनीतिक प्रस्ताव पारित नहीं कर सके। केन्द्रीय कार्यसमिति का वह प्रस्ताव भी जो विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्पन्न समस्याओं पर बुखारेस्ट सम्मेलन के बाद पारित किया गया, सर्वसम्मत प्रस्ताव नहीं था।
इसके बाद नवंबर 1960 में मास्को में 81 कम्युनिस्ट पार्टियों का सम्मेलन हुआ, जो विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी। उस सम्मेलन में लंबे विचार-विमर्श के बाद एक वक्तव्य स्वीकृत किया गया, जिसका सभी कम्युनिस्ट पार्टियों और मजदूर पार्टियों ने सैद्धान्तिक और व्यावहारिक महत्व की दृष्टि से एक अद्वितीय दस्तावेज के रुप में स्वागत किया। हमारी पार्टी के प्रतिनिधियों ने दस्तावेज समिति और सम्मेलन दोनों में ही वक्तव्य तैयार करने में भाग लिया। यह सर्वविदित है कि हमारी पार्टी ने मास्को सम्मेलन में सभी समस्याओं पर सर्वसम्मत दृष्टिकोण अपनाया।
ऐसी हालत में यह उम्मीद करना स्वाभाविक था कि हमारी पार्टी के प्रमुख निकायों के अंदरुनी राजनीतिक मतभेद समाप्त हो जायेंगे अथवा बहुत अंशों में कम हो जायेंगे। लेकिन यह बात नहीं हुई।
ऐसे मतभेदों के रहते हुए हमारे लिए एक सर्वसामान्य राजनीतिक प्रस्ताव तैयार करना संभव नहीं था। इसी कारण ये आपके सम्मुख एक सर्वसामान्य राजनीतिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना भी संभव नहीं है।
इसके बावजूद मेरा ख्याल है कि हमें पिछले तीन वर्षों के दौर की अपने देश की बड़ी-बड़ी घटनाओं की, अपर्याप्त रुप से ही सही, समीक्षा करनी चाहिए। मैं अपने भाषण में इस ओर ध्यान देने की कोशिश करुंगा।
इस स्थल पर विश्व-परिस्थति का सविस्तार वर्णन आवश्यक नहीं है। यह काम 81 पार्टियांें के वक्तव्य में किया जा चुका है। वक्तव्य में कहा गया हैः
‘‘हमारा युग, जिसकी अंतर्वस्तु पूंजीवाद से समाजवाद की ओर संक्रमण है और जो महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति द्वारा प्रेरित है, दो विरोधी सामाजिक व्यवस्थाओं के आपसी संघर्ष का युग है,समाजवादी क्रांतियों और राष्ट्रीय मुक्ति-आन्दोलनों का युग है, साम्राज्यवाद के पतन और औपनिवेशिक व्यवस्था के उन्मूलन का युग है, समाजवादी पथ की ओर अधिकाधिक लोगों के संक्रमण और विश्व के पैमाने पर समाजवाद तथा कम्युनिज्म की विजय का युग है।
हमारे युग की यह प्रमुख विशेषता है कि समाज के विकास में विश्व समाजवादी व्यवस्था एक निर्णायक रुप ग्रहण करती जा रही है।
हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि मास्को सम्मेलन के पहले हमारे बीच के बहुत ही कम लोग युग की परिभाषा के प्रश्न पर अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में होने वाली बहस का महत्व ग्रहण कर पाये थे। बहुत से लोगों ने सोच लिया था कि यह पूर्ण रुप से एक शास्त्रीय विषय है। जो हो, हमारी वह समझदारी ठीक नहीं थी। दूसरे विश्व युद्ध की सामप्ति के बाद विश्व-इतिहास ने जो मार्ग अपनाया है, उसे हम तब तक नहीं समझ सकते, जब तक हम यह अनुभव नहीं करें कि हम नये युग में सांस ले रहे हैं।
81 कम्युनिस्ट और मजदूर पार्टियों के वक्तव्य में इस विषय का सविस्तार वर्णन किया गया है, जो न केवल नये युग के स्वरुपों को उजागर करता है, बल्कि मानव जाति के सम्मुख उपस्थित समस्याओं का समाधान करने के लिए इस युग की प्रेरणा से उत्पन्न विशाल संभावनाओं को भी व्यक्त करता है। यहां उन बातों को दोहराने की जरुरत नहीं है। लेकिन कुछ मुद्दों पर बल देना आवश्यक है।
पहले साम्राज्यवादी शासन के अंतर्गत रहने वाले देशों की स्थिति में जो परिवर्तन हुआ है; वह गत पन्द्रह वर्षों की घटनाओं का एक बहुत ही ज्वलंत रुप है।
वी.आई. लेनिन ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का चरम रुप में इंगित किया है कि साम्राज्यवादी ताकतों के बीच विश्व के देशों का पूरा बंटवारा साम्राज्यवादी युग की एक प्रमुख पहचान है। उन्होंने यह भी कहा हैः ‘‘पहली बार संसार का पूरी तरह बंटवारा किया जा चुका है, ताकि भविष्य में पुनर्विभाजन की ही संभावना रह जाय अर्थात एक ‘स्वामी’ के हाथों में ‘स्वामित्वविहीन’ देश को सौंपने के बदले देशों को केवल एक ‘मालिक’ से दूसरे ‘मालिक’ के हाथों में सौंपा जा सके।’’ (जोर मेरा)
प्रथम विश्व युद्ध, जो साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विताओं की प्रत्यक्ष उपज थी, विश्व के छठे भाग में पूंजीवादी शासन के चकनाचूर होने के बाद समाप्त हो गया। यह विश्व की एक ऐतिहासिक महत्व की घटना थी, जिसने एक नये युग का सूत्रपात किया। फिर भी, विश्व के शेष भागों में साम्राज्यवादी शासन जारी रहा। उपनिवेशों का पुनर्विभाजन हुआ - फ्रांसीसी और अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने अफ्रीका-स्थित जर्मन उपनिवेशों को और तुर्की साम्राज्य के विशाल एशियाई भू-भागों को हड़प लिया।
दूसरा विश्व युद्ध जर्मन,इतावली और जापानी साम्राज्यवादियों की पराजय में समाप्त हुआ। सोवियत संघ ने यह शिकस्त देने में निर्णायक भूमिका का निर्वाह किया। विजेताओं में ब्रिटेन और फ्रांस की भी साम्राज्यवादी शक्तियां थीं, जिन्हें यह उम्मीद थी कि उनकी विजय के परिणामस्वरुप उनके साम्राज्य अविचल रह जायेंगे। विजेताओं में अमेरिकी साम्राज्यवाद भी था, जो युद्व में अपनी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न नहीं होने, अपनी औद्योगिक क्षमता में पहले से भी अधिक वृद्धि होने और परमाणु बम पर अपना एकाधिकार समझने के कारण विश्व पर आधिपत्य स्थापित करने का सपना देखने लगा था। ब्रिटेन, फ्रांस, हालैंड और बेल्जियम की साम्राज्यवादी ताकतों के चंगुल में फंसे हुए देशों की जनता मायूस थी और उसे इस बात का भय सता रहा था कि अभी दीर्घकाल तक उसे गुलामी का अभिशाप झेलना पड़ेगा।
उसके बाद से अभी मुश्किल से सोलह साल गुजर पाये हैं- इसे हम कोई लंबी अवधि नहीं कहेंगे। आज हम देखते हैं कि ये सभी अनुमान और आशंकाएं गलत साबित हो चुकी हैं। संपूर्ण विश्व की स्थिति बदल गयी है। एशिया और अफ्रीका में एक तूफान आया हुआ है। शक्तिशाली साम्राज्य ध्वस्त हो गये हैं। जिन लोगों के बारे में साम्राज्यवादियों ने सोचा था कि वे हमेशा लकड़हारों और पनहारों की ही जिन्दगी व्यतीत करते रहेंगे, उन लोगों ने गुलामी की जंजीरे तोड़ डाली हैं।
संयुक्त राष्ट्र के गठन में भी इस बदलाव को साफ-साफ देखा जा सकता है। 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ के 51 सदस्य राष्ट्रों में से केवल 15 एशिया और अफ्रीका के सदस्य राज्य थे अर्थात् एक-तिहाई से भी कम। इस समय 99 सदस्य राज्यों में से 50 एशिया और अफ्रीका के हैं।
इनमें से अनेक देशों ने न केवल अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता हासिल की है, बल्कि वे शांतिपूर्ण विदेश-नीति का अनुसरण कर रहे हैं, अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर रहे हैं और अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता को मजबूत कर रहे हैं। इन सभी मामलों में, उन्हें समाजवादी विश्व का संपूर्ण सहयोग मिलता है।
कई देशा में, जो आज भी साम्राज्यवादी शासन के चंगुल में फंसे हैं, राष्ट्रीय मुक्ति-आन्दोलन आश्चर्यजनक रुप से आगे बढ़ गया है। अल्जीरिया की जनता के विद्रोह को खून में डुबोने के लिए फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने जो भी प्रयास किये, वे विफल हो गये। पुर्तगाली उपनिवेशों की स्थिति डांवाडोल है। अंगोला में विद्रोह की आग भड़क उठी है। लातिन अमेरिका के अनेक देशों में अमेरिका की स्थिति कमजोर होती जा रही है। प्रतापी क्यूबा ने एक मिसाल पेश कर दी है, जिसका अनेक देशों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की की घटनाएं अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रभाव क्षेत्र में होने वाले महत्वपूर्ण परिवर्तनों की ओर साफ-साफ इंगित कर रही हैं।
दुनिया ने इतने कम समय में इतने विशाल क्षेत्रों में होने वाले दूरगामी परिवर्तन कभी नहीं देखे थे।
अक्टूबर क्रांति और समाजवादी निर्माण में सोवियत संघ की महान भूमिका के बिना, दुनिया के एक-तिहाई हिस्से में समाजवाद की विजय के बिना और समाज के विकास में तेजी से निर्णायक शक्ति का स्थान ग्रहण करने वाली समाजवादी व्यवस्था के बिना इन बातों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। ये घटनाएं एक तरफ विश्व समाजवादी व्यवस्था के विकास और दूसरी तरफ राष्ट्रीय मुक्ति-आन्दोलन की जीत तथा मजबूती के बीच के घनिष्ठ संबंधों को साफ-साफ उजागर करती हैं। ये घटनाएं जोरदार ढंग से ‘‘दो ताकत गुटों’’ के बीच में फैलाये जाने वााले झूठ की धज्जियां उड़ा देती हैं- साम्राज्यवादी और पूंजीवादी तत्व इसी झूठ का सहारा लेकर समाजवादी देशों के बारे में लोगों के बीच भ्रम उत्पन्न करते हैं और जनवादी तथा सामाजिक बदलावों के लिए छिड़े आन्दोलन को कमजोर करते हैं।
यह बड़े हर्ष की बात है कि हमारे देश और सोवियत संघ के आपसी संबंध पहले से अधिक सौहार्दपूर्ण हो गये हैं। यह संबंध न केवल विश्वशांति के संघर्ष के विकास का एक प्रमुख कारक है, बल्कि यह हमारी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ और हमारी राष्ट्रीय स्वाधीनता को मजबूत भी करता है, जैसा कि राष्ट्रीय परिषद द्वारा स्वीकृत राजनीतिक प्रस्ताव में अंकित किया गया है। सेावियत संघ के प्रति हमारी मैत्री भावना में काफी विकास हुआ है और जीवन के सभी क्षेत्रों और भिन्न-भिन्न राजनीतिक विचारों वाली पार्टियों के लोग भी इस मैत्री संबंध का स्वागत करते हैं।
लेकिन, इसके साथ ही चीनी लोक गणतंत्र के साथ हमारे देश के संबंधों में हृास हुआ है, जिसका हमारे संपूर्ण राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पडा़ है।
साम्राज्यवादी व्यवस्था संकट और हृास के बीच से गुजर रही है। लेकिन अभी तक वह शक्तिहीन नहीं हुई है। साम्राज्यवादी ताकतें आज भी मजबूत हैं। वे आज भी प्रलय मचाने की क्षमता रखती हैं। अपनी पराजयों को स्वीकार करने के लिए वे तैयार नहीं है। वे आज भी मानवजाति को एक नये खूनी युद्ध में डुबोकर संपर्ण विश्व पर पुनः आधिपत्य जमाने की बात सोच रही हैं। वे ऐसा युद्ध छेड़ना चाहती हैं,जो मानव-संहार के विकसित प्रलयंकर साधनों के कारण, मास्को सम्मेलन के वक्तव्य के अनुसार ‘‘सभी देशों को अभूतपूर्व प्रलयाग्नि में झोंक देगा और विश्व के प्रमुख औद्योगिक तथा सांस्कृतिक केन्द्रों को ध्वस्त कर देगा। इस तरह के युद्ध के कारण करोड़ों व्यक्ति मौत और विपत्ति के चंगुल में फंस जायेंगे, जिनमें युद्ध से अलग रहने वाले देशों के लोग भी सम्मिलित होंगे।’’
(जोर मेरा)
हमारे देश के बहुत से लोगों का ख्याल है कि भारत एक गुटनिरपेक्ष देश है और किसी भी भावी युद्ध में इसके तटस्थ रहने की ही संभावना है, इसलिए यह बर्बादी से बच जायगा। आज के तापनाभिकीय युग में इस तरह का विश्वास बिल्कुल निराधार है। वक्तव्य में साफ-साफ कहा गया है कि ‘‘साम्राज्यवाद सम्पूर्ण मानवजाति के सम्मुख गंभीर संकट उत्पन्न करता है।’’ (जोर मेरा)
इसीलिए आज विश्वशांति आन्दोलन ने एक विशाल आन्दोलन का रुप धारण कर लिया है, जैसा कि इतिहास में इसके पहले कभी देखा या सुना नहीं गया था। यह एक ऐसा आन्दोलन है, जो विश्व के सभी देशों के भिन्न-भिन्न विचारों के लोगों को एकताबद्ध करता है।
नये युग और इस युग की प्रेरणा से शक्तियों का जो नया आपसी संबंध दिखलायी पड़ रहा है, उससे यह संभावना पैदा हो गयी है कि नये विश्वयुद्ध को भड़कने से रोका जा सकता है, साम्राज्यवादियों द्वारा छेड़े गये क्षेत्रीय युद्धों का प्रभावोत्पादक ढंग से मुकाबला किया जा सकता है और ऐसे युद्धों के अधों को समाप्त किया जा सकता है। पिछले 15 वर्षों की घटनाओं ने इसे पूरी तरह प्रमाणित कर दिया हैं।
शांति-संघर्ष के अग्रिम मोर्चे पर महान सोवियत संघ और समाजवादी शिविर के देश खड़े हैं।
सभी देशों और सभी लोगों में शांति की प्रबल भावना सुदृढ़ और विकसित होती जा रही है। समाजवादी शिविर शांति के लिए संघर्ष करते हुए और शांति के उद्देश्य की सिद्धि के लिए ठोस प्रस्ताव उपस्थित करते हुए विश्व के लोगों का नैतिक समर्थन प्राप्त करता जा रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में आक्रामक साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी तेजी से जनता की आंखों से गिरती जा रही हैं।
जैसा कि 81 कम्युनिस्ट और मजदूर पार्टियों के वक्तव्य में कहा गया है, संसार के सभी भागों की कम्युनिस्ट पार्टियां शांति-संघर्ष को अपना प्रमुख कर्तव्य समझती हैं। सोवियत संघ द्वारा प्रस्तावित आम और पूर्ण निःशस्त्रीकरण का कार्यक्रम इस संघर्ष का अनिवार्य और सर्वाधिक प्रमुख अंग है। इस कार्यक्रम की सिद्धि, जो कि लंबे संघर्ष से ही संभव है, का अर्थ है कि युद्ध छेड़ने की संभावना ही खत्म हो जायगी। नाभिकीय हथियारों के परीक्षण और निर्माण पर प्रतिबंध, सैनिक अधों की समाप्ति, विदेशों में स्थित युद्ध के अधों का उन्मूलन और सशस्त्र सेनाओं तथा हथियारों में पूरी कटौती- इन सभी बातों से आम और पूर्ण निःशस्त्रीकरण का मार्ग प्रशस्त होगा। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के संघर्षों में हमें सभी शांतिप्रेमी तत्वों को शामिल करने के लिए प्रयत्नशील होना पड़ेगा। कई दृष्टिकोणों से हमारे देश की परिस्थिति इसके लिए बहुत ही अनुकूल है। लोग शांति के लिए लालायित हैं। भारत सरकार ने भी आम और पूर्ण निःशस्त्रीकरण के उद्देश्य को अपना समर्थन प्रदान किया है। हमारी जनता ने शांति-संघर्ष में प्रमुख भूमिका अदा की है, अभी उसे आने वाले दिनों में और भी प्रमुख भूमिका अदा करनी पडे़गी। हमारी पार्टी और देश के सभी राष्ट्र प्रेमी तत्वों को इस बात का सतत प्रयास करना चाहिए, ताकि भारत इस तरह की भूमिका का अवश्य ही निर्वाह करे।
साम्राज्यवादी न केवल एक अभूतपूर्व विनाशकारी युद्ध का खतरा वरण करना चाहते हैं, बल्कि वे हर तरह से शोषित-पीड़ित जनगण की स्वतंत्रता के विकास को अवरुद्ध करना चाहते हैं। वे जनगण पर एक नयेे ढंग की औपनिवेशिक दासता लाद देना चाहते हैं। कांगो और लाओस में जो कुछ हुआ है और उन देशों में आज जो कुछ भी हो रहा है, वह इस बात की चेतावनी है कि अनुनय-विनय से कुछ भी नहीं होने वाला है।
हमारा देश शांति की रक्षा और निःशस्त्रीकरण के पक्ष में तथा सैनिक अधों के विपक्ष में जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है, उस पर हमें वस्तुतः गर्व है। फिर भी, यह एक अकाट्य बात है कि शांति-संघर्ष से संबंधित ज्वलंत प्रश्नों पर हमने बहुत की कम जन-संघर्ष किये हैं। आम जनता को अभी तक बड़े पैमाने पर सक्रिय साझीदार के रुप में शांति-संघर्ष के प्रांगण में दाखिल नहीं किया जा सका है। यह निश्चय ही गम्भीर खामी हैं
वक्तव्य में कहा गया है, ‘‘इस समय शांति के पक्ष में संघर्ष का अर्थ है कि पूरी तरह से चैकसी बरती जाय, साम्राज्यवादी नीति का बिल्कुल पर्दाफाश किया जाय, जंगबाजों की चालबाजियों और साजिशों पर हमेशा नजर रखी जाय, युद्ध की आग भड़काने वालों के विरुद्ध जनता का यथार्थ आक्रोश जाग्रत किया जाय, शांति की शक्तियों को पहले की अपेक्षा और भी अधिक सुचारु रुप से संगठित किया जाय, शांति के पक्ष में जन-संघर्षों को लगातार तीव्र किया जाय और नये युद्ध में जिन देशों की दिलचस्पी नहीं है, उनके साथ और अधिक सहयोग स्थापित किया जाय।’’
इस मापदंड के अनुसार जांच-पड़ताल करने पर हम देखते हैं कि हमने बहुत ही कम काम किया है। जिन राज्यों में हमारी पार्टी कमजोर है, केवल उन्हीं राज्य में नहीं, बल्कि अन्य राज्यों में भी यही बात देखी गयी है। पश्चिम बंगाल में हमारी पार्टी ने कई अवसरों पर शांति और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय सवालों पर जनता को आन्दोलित किया हैं। लेकिन कुछ अन्य राज्यों में, जहाँ जनता के बीच पार्टी का प्रमुख स्थान है, जैसे आंध्र और केरल में, चाहे अपने मंच से हो अथवा जन-संगठनों के माध्यमों से हो या संगठित शांति आन्दोलन के जरिये हो, शांति के सवाल पर हमने बहुत ही कम संघर्ष किये हैं।
हमने कई बार इस कमजोरी की चर्चा की है। पार्टी की कांग्रेसों और पार्टी के सम्मेलनों में कई बार इस कमजोरी को दूर करने के लिए फैसले लिये गये है; लेकिन इस संबंध में बहुत ही कम कामयाबी मिली है।
निस्संदेह इसका एक प्रमुख कारण यह है कि हमारे पार्टी सदस्यों के साथ ही मजदूर वर्ग और किसान-वर्ग की चेतना का स्तर ऊँचा नहीं है। बहुधा स्थानीय समस्याओं, खासकर अपने ऊपर असर डालने वाली आर्थिक समस्याओं से आक्रांत रहने के कारण वे दूर-दराज की लगने वाली घटनाओं से प्रभावित नहीं होते। लेकिन इसके लिए हम उन्हें दोषी नहीं ठहरा सकते हैं। दोष पूरी तरह हमारा, यानी पार्टी के नेताओं का है; क्योंकि हम उनका स्तर ऊँचा उठाने का बहुत कम प्रयास करते हैं। जब हमारी राष्ट्रीय परिषद अथवा केन्द्रीय कार्यसमिति की बैठकें होती हैं, तब हम संसार की घटनाओं पर प्रस्ताव पास कर लेते हैं। लेकिन ये प्रस्ताव अक्सर हमारी पत्र-पत्रिकाओं तक ही सीमित रह जाते हैं। हमारे नेता- केन्द्रीय कार्यसमिति और राष्ट्रीय परिषद के सदस्य - सार्वजनिक सभाओं में भाषण देते हुए इन प्रस्तावों का शायद ही उल्लेख करते हैं। इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल यह है कि हम दक्षिण अफ्रीका के शार्पविले हत्याकाण्ड के बाद जोरदार जन-आन्दोलन संगठित नहीं कर सके, जबकि इस घटना ने संपूर्ण मानवजाति को आन्दोलित कर दिया, इसके विरोध में अनेक देशों में बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए और हमारे देश की सभी पार्टियों, सभी समाचारपत्रों और भारत की संसद ने इस हत्याकाण्ड की भत्र्सना की।
भारत में कई दृष्टियों से शांति के पक्ष में, उपनिवेशवाद के विपक्ष में और अफ्रो-एशियाई एकजुटता के लिए जोरदार आन्दोलन शुरु करने की सभी संभावनाएं मौजूद हंै। हमारे राष्ट्रीय पुनःनिर्माण के लिए शांति अपरिहार्य है। हमारी साम्राज्यवाद- विरोधी परंपराएं बहुत लंबी हैं। हमारी जनता के बीच सोवियत संघ के प्रति मैत्री की भावनाएं और अफ्रो-एशियाई देशों के प्रति मैत्री की भावनाएं दृढ़ता से मौजूद हैं। भारत सरकार अक्सर ऐसा रुख अपनाती है, जिससे शांति और राष्ट्रीय मुक्ति के मामलों में मदद मिलती है। फिर हम स्वयं इतना संकोच और बड़े पैमाने पर शांति के सवाल को जनता के बीच ले जाने में अपनी असमर्थता क्यों दिखलाते हैं?
मुझे लगता है कि काफी हद तक इसका प्रमुख कारण अपनी गहरी जडे़ जमाये संकीर्णतावादी मनोवृत्ति हैं। हमारे अधिकांश कार्यकत्र्ता और नेता भी ऐसे सवालों पर आन्दोलन करने के अभ्यस्त हो गये हैं, जिन पर हमारा दृष्टिकोण सरकार के दृष्टिकोण से भिन्न हो, और ऐसे सवाल, जिनको लेकर सरकार की भत्र्सना नहीं की जा सकती हो और हमारे तथा कांग्रेस कर्मियों के बीच जिन सवालों पर मतैक्य हो, वे हमें ‘‘पे्ररित’’ ही नहीं कर पाते हैं। इसलिए हम अनुकूल स्थिति का उपयोग ठीक तरह से नहीं कर पाते हैं। जैसा कि वक्तव्य में कहा गया है, हम शांति-संघर्ष को ‘‘संपूर्ण पार्टी के महत्वपूर्ण कत्र्तव्य’’, सभी जन-संगठनों के बड़े कत्र्तव्य के रुप में स्वीकार नहीं करते हैं, बल्कि यह समझते हैं कि यह काम तो शांति-समितियों और उन्हीं की तरह के अन्य संगठनों से संबद्ध साथियों का हैं। अधिकांश पार्टी-नेता अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति, शांति आन्दोलन की सभी समस्याओं के प्रति, शांति-समितियों में काम करने वाले साथियों के प्रति और भारत तथा समाजवादी देशों के मैत्री सूत्र को मजबूत करने वाले संगठनों के प्रति गहरी निर्लिप्तता का भाव प्रदर्शित करते हैं।
पिछलग्गूवादी और सुधारवादी प्रवृत्तियां भी दिखलायी पड़ती हैं। हम साम्राज्यवादियों के षड्यंत्रों और उत्तेजना पैदा करने वाली उनकी क्षमता को नजरअंदाज करते हैं, जिसके फलस्वरुप हम कभी-कभी हतप्रभ भी हो जाते हैं। अनेक साथियों ने भारत सरकार की वर्तमान विदेश-नीति को रामबाण समझ लिया है। हम अक्सर भारत सरकार और प्रधानमंत्री नेहरु पर बहुत अधिक भरोसा करने लगते हैं और उनके द्वारा अपनायी गयी नीति के परे जाने में हिचकते हैं। हम साम्राज्यवादियों के युद्ध संबंधी षड्यंत्रों के विरुद्ध और अपनी आजादी की रक्षा करने वाली या अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाली जनता के समर्थन में स्वतंत्र रुप से जन-समूह को गोलबंद करने और जन-संघर्ष छेड़ने के महत्व को नजरअंदाज करते हैं।
यह स्वाभाविक है कि भारत सरकार शांति के पक्ष में स्वतंत्र रुप से जनसमूह को गोलबंद करना नहीं चाहती है और वह इससे संबंधित सारे मामले को स्वयं नियंत्रित करना चाहती है। लेकिन यह बात समझ में नहीं आती है कि हम कम्युनिस्ट इस स्थिति को चुपचाप क्यों स्वीकार कर लें।
इन दोनों प्रवृत्तियों का यही नतीजा हो सकता है कि हम पूरी तरह सरकार की आधीनता स्वीकार कर लें और यह सिद्ध कर दें कि हममें नेतृत्व की क्षमता नहीं है, शिखर-सम्मेलन को भंग करने वाले यू-2 की उत्तेजक कार्रवाई जैसी मूत्र्त समस्या पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में हम असमर्थ हैं और जनता को संघर्ष में उतारने तथा सरकार की विदेश-नीति को गढ़ने में हम अक्षम हैं। हम अपरिहार्य रुप से सरकारी नीतियों के नकारात्मक पहलुओं का,ऐसे पहलुओं का, जो दबे-कुचले देशों की शांति और राष्ट्रीय स्वाधीनता की ओर ध्यान नहीं देते, मुकाबला करने में समर्थ नहीं है। हमने भारत सरकार की प्रगतिशील विदेश-नीति की हिफाजत के लिए एक मजबूत जन आन्दोलन नहीं खड़ा किया है, इसलिए हम उस नीति से भटकाव का मुकाबला करने के लिए आम जनता को बड़े पैमाने पर मैदान में उतारने में भी समर्थ नहीं हैं।
इस तरह की विफलता की सदैव निन्दा की जायगी, लेकिन आज की स्थिति मंे उसी दिशा की ओर चलते रहने से बहुत ही हानि होगी। भारत--चीन-विवाद के प्रारंभिक काल से ही उग्र दक्षिणपक्षी तत्वों ने अपने प्रयास तेज कर दिये हैं कि भारत की विदेश-नीति में परिवर्तन लाया जाय। इजारेदारों द्वारा संचालित बड़े-बड़े समाचार पत्रों में और स्वयं कांग्रेस के अनेक नेताओं के बीच उनके जबर्दस्त समर्थक मौजूद हैं। साम्राज्यवादी शक्तियां अपनी आर्थिक ‘‘सहायता’’ के नाम पर भारत सरकार की विदेश-नीति पर दबाव डाल रही हैं। केनेडी प्रशासन ने आइजन हाॅवर के अनुभवों से यह सीख लिया है कि धमकाने और दबाव डालने की रणनीति अपनाने से कोई लाभ नहीं होगा, इसलिए वह एक ‘‘नया दृष्टिकोण’’ अपनाकर भारत सरकार को अपनी विदेशनीति बदल लेने के लिए फुसला रहा हैं
इसलिए हमें खुशफहमी का शिकार नहीं हो जाना चाहिए। इसके साथ ही हमें वर्तमान विदेश-नीति को अचूक रामबाण भी नहीं समझ लेना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि भारत के सभी देशभक्त लोग अपनी विदेश नीति की हिफाजत करने, उसमें परिवर्तन चाहने वालों को पराजित करने और इस नीति को और भी सुदृढ़ करने के लिए तत्पर हो जायें।
इस संबंध में अपनी कमजोरियों पर बल देते हुए उन महत्वपूर्ण बातों पर भी गौर करना जरुरी है, जो हाल में ही उन संगठनों की प्रेरणा से उजागर हुई हैं, जिनमें हमारे साथी सर्वसामान्य अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर अन्य पार्टियों के लोगों तथा गैर-पार्टी लोगों के साथ मिलजुल कर काम करते हैं।
विदेश नीति के अनेक प्रश्नों पर सर्वसम्मत संगठनों में, शांति के पक्ष में और उपनिवेशवाद के विरोध में तथा समाजवादी देशों के साथ मैत्री के लिए काम करते हुए हमने प्रभावशाली कांग्रेस कर्मियो से संपर्क स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। भारत-चीन विवाद से उत्पन्न तनावों के बावजूद यह सहयोग जारी है और इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि भारत सरकार की विदेश-नीति के सकारात्मक पहलुओं का सही ढंग से उपयोग किया गया है और उनके विरुद्ध आक्रोश व्यक्त किया गया है, जो दक्षिणपक्ष की ओर इस नीति को मोड़ना चाहते हैं अथवा जो चाहते हैं कि हमारा देश शांति और गुट निरपेक्षता की नीति का बहिष्कार कर दे। 1959 में कलकत्ता में सम्पन्न अफ्रो-एशियाई एकजुटता संगठन के दूसरे राष्ट्रीय सम्मेलन में न केवल व्यक्तित्व रुप से कांग्रेस के लोग ही बल्कि इंटक के राज्य नेता भी शामिल हुए।
दिसंबर 1960 में बंबई में सत्पन्न तीसरा अफ्रो-एशियाई एकजुटता सम्मेलन एक स्मरणीय घटना हैं। उस सम्मेलन में विभिन्न संगठनों के 5000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया - उनमें ट्रेड यूनियन आन्दोलन के संबद्ध तीन हजार प्रतिनिधि थे और विभिन्न महिला-संगठनों की 500 सदस्याएं थी; सम्मेलन में भारी संख्या में गोवा के राष्ट्रप्रेमी उपस्थित थे। नौजवान, छात्र, डाॅक्टर, वैज्ञानिक, व्यापारी, फिल्म-निर्माता, अभिनेता, वकील, धार्मिक नेता आदि सम्मेलन में शामिल थे। विभिन्न राज्यों से पहले से भी अधिक संख्या में प्रतिनिधि आये हुए थे। भारत- सोवियत सांस्कृतिक संघ के सम्मेलन से भी यह तथ्य प्रकट हुआ कि उसके संगठन में वृद्धि हुई है और पिछले एक साल के दौरान उसकी शाखाओं में वृद्धि के साथ-साथ उनकी गतिविधियों में तेजी आयी है।
यह भी ध्यातव्य है कि हाल की कुछ घटनाओं ने हमारी जनता को बेतरह झकझोर दिया है। इनमें से एक घटना है पैट्रिस लुमुम्बा की नृशंसा हत्या, जो नव जाग्रत अफ्रीका की नयी चेतना के प्रतीक थे। दिल्ली में इस हत्याकांड के विरोध में एक संयुक्त सभा हुई, जिसमें कांग्रेस, प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के अखिल भारतीय नेताओं नेे भाषण दिये। दिल्ली, कलकत्ता, बंबई, मद्रास, हैदराबाद और अनेक अन्य स्थानों पर जो जन-प्रदर्शन हुए, उनसे कांगो के अपने भाइयों के प्रति भारत की जनता की एकजुटता की भावना की प्रबल अभिव्यक्ति होती है। सभी देशभक्त पार्टियों से संबंध रखने वाली जनता ने इन प्रदर्शनों में भाग लिया और अनेक क्षेत्रों में हमारी पार्टी ने प्रदर्शनों का नेतृत्व किया।
विभिन्न आयोजनों में जनता के सहयोग और समर्थन, खासकर दिल्ली में विश्व शंाति परिषद के अधिवेशन के सिलसिले में आयोजित सभाओं में दिल्ली के मजूदरों के सहयोग और समर्थन का विशेष महत्व है। विचार-विमर्शो में अनेक शांति-योद्धाओं ने, जिनमें विभिन्न राज्यों से आये हुए हमारे साथी और मजदूर नेता भी शामिल थे, सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया।
इन सभी बातों और अन्य तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि शांति के पक्ष में और उपनिवेशवाद के विरोध में जन-आन्दोलन को व्यापक बनाने तथा सुदृढ़ करने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। हमें अवश्य ही इन संभावनाओं का पूरा उपयोग करने का और भारत की विदेश-नीति को अधिकाधिक सुसंगत रुप प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए।
आज इस बात पर जोर देना केवल आवश्यक नहीं है कि दक्षिणपक्षी प्रतिक्रियावादियों की गतिविधियां तेज हो गयी हैं, बल्कि इसलिए भी कि अनेक अवसरों पर भारत सरकार बहुत अधिक हिचकिचाहट दिखलाती रही है और अनेक सवालों पर, खासकर उपनिवेशवाद-विरोधी सवालों पर सुदृढ़ नीति अपनाने में वह विफल रही है। ऐसी विश्व परिस्थिति में, जो समाजवादी शिविर की बढ़ती हुई ताकत और अफ्रीका के अनेक देशों की स्वतंत्रता-प्राप्ति के फलस्वरुप पहले से भी अधिक अनुकूल दिखलायी पड़ती है, इसकी उम्मीद थी कि भारत नव स्वाधीनता-प्राप्त देशों के नेता और हिरावल की भूमिका अदा करेगा; लेकिन यह उम्मीद पूरी नहीं हुई। कई सवालों पर हाल में हीं औपनिवेशिक शासन से छुटकारा पाने वाले कुछ देशों ने हमसे भी अधिक सुसंगत रुप में साम्राज्यवाद-विरोध रुख अपनाया है।
कांगो के सवाल पर हमारी सरकार ने जो हिचकिचाहट दिखलायी, वह इस बात का एक ज्वलंत उदाहरण है। भारत ने बेल्जियम के साम्राज्यवादियों की भत्र्सना करते हुए अमेरिका की भूमिका पर चुप्पी साध ली और हैमरशोल्ड की तारीफ का पुल बांध दिया, जबकि हैमरशोल्ड की कांगो से संबंधित घिनौनी कार्रवाइयों से साम्राज्यवादियों को ही बल मिला। संयुक्त राष्ट्र में कासावुबु के पिट्ठुओं के स्थान का उचित विरोध करते हुए और कांगो की संसद की बैठक बुलाने की मांग करते हुए भारत ने एंटोनी गिजेंगा की वैध सराकर को मान्यता देने से इंकार कर दिया है, जबकि कई अफ्रीकी देशों, यूगोस्लाविया ओर इण्डोनेशिया ने भी उस सरकार को मान्यता प्रदान कर दी है। संयुक्त राष्ट्र स्थित हिन्दू के संवाददाता ने अपने 5 मार्च के संवाद में लिखा था कि ‘‘भारत अफ्रो-एशियाई गुट के नरमपंथियों के उपहास का पात्र बनता जा रहा है’’ (जोर मेरा)। भारत के देशभक्त कदापि यह नहीं चाहते हैं कि भारत इस तरह की भूमिका अदा करे।
भारत सरकार की यह हिचकिचाहट न केवल भारत की व्यापक विदेश-नीति के अनुरुप और एशिया तथा अफ्रीका की जनता के हितों के अनुकूल नहीं है, बल्कि भारतीय जनमत को भी यह प्रतिबिंबित नहीं करती है। पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या के समाचार के बाद देश में आक्रोश की जो लहरें दौड़ गयीं और जो स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन हुए, वे इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि भारतीय जनता किस को कांगो का वास्तविक प्रतिनिधि समझती है। पूरे देश में आन्दोलनों का तांता लगाकर भारत सरकार पर दबाव डालना जरुरी है कि वह कांगों की वैध सरकार को मान्यता प्रदान करे।
भारत सरकार की विदेश-नीति में जो फिसलाव और कमजोरयिां प्रकट हुई हैं,वे अवश्य ही हमारे लिए बहुत दुःखद और भयप्रद हैं। यदि जन-आन्दोलनों के माध्यम से इस तरह के फिसलावों को रोका नहीं गया, तो भयानक स्थिति पैदा होगी और दुनिया में हमारी प्रतिष्ठा गिर जायगी। ऐसी बात नहीं होनी चाहिए।
साथियों, राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले समस्त जनगण के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करते हुए हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि अभी तक भारत का कुछ भाग पुर्तगाली साम्राज्यवादियों के कब्जे में है और हमारे 6 लाख से भी अधिक भाई-बहन विदेशी दासता झेल रहे हैं। 1955 में गोवा की मुक्ति के लिए भारत में एक जबर्दस्त आन्दोलन शुरु हुआ। उस संघर्ष ने सबके हितों की पूर्ति के लिए एक सामान्य राष्ट्रीय झण्डे के साये में सभी राजनीतिक पार्टियों और संगठनों के सदस्यों और आम अनुयायियों को एक व्यापक संयुक्त मोर्चें से संबद्ध कर दिया। जनता अभी तक यह नहीं भूली है कि निहत्थे सत्याग्रहियों ने किसा प्रकार मौत को चुनौती देेते हुए भारतीय गणतंत्र का झण्डा ऊँचा उठाये काल के जबड़ों में प्रवेश किया। दुर्भाग्यश, संघर्ष सफल नहीं हुआ; क्योंकि भारत सरकार ने नकारात्मक भूमिका अदा की- उसने गोवा की मुक्ति की किसी भी कार्रवाई का समर्थन करने से इंकार कर दिया, उसने आजादी के योद्धाओं को गोवा में प्रवेश करने से रोक दिया और उसने साफ-साफ कह दिया कि पुर्तगाली साम्राज्यवादियों के विरुद्ध वह बल प्रयोग नहीं करेगी
गोवा में फासिस्ट आतंक और भारत सरकार की उदासीनता के कारण स्वभावतः आन्दोलन विफल हो गया। लेकिन अब आन्दोलन पुनः जोर पकड़ता जा रहा है। गोवा की सभी राजनीतिक पार्टियां गोवा के राजनीतिक सम्मेलन के गठन के लिए एकताबद्ध हो गयी हैं। गोवानी राजनीतिक सम्मेलन के घनिष्ठ सहयोग से संघर्षरत गोवा की राष्ट्रीय संघर्ष-समिति ने आन्दोलन छेड़कर सब का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया है। कई राज्यों में बड़ी-बड़ी रैलियां और सभाएं आयोजित की गयी हैं, जिनमें गोवानी नेताओं और सभी पार्टियांे के लोगों ने भाग लिया है। इस आन्दोलन को और आगे बढ़ाना बहुत जरुरी है।
भारत सरकार एक लंबे अरसे तक मौन धारण कर उस असह्य स्थिति को स्वीकार करती रही है जो गोवा, दमन और दिऊ में व्याप्त है। वह एक लंबे अरसे तक नाटो की ताकतों और अमेरिका की सहायता पर पलने वाले पुर्तगाली साम्राज्यवादियों को हमारी मातृभूमि के हिस्से पर अपना आधिपत्य कायम कखने की इजाजत देती रही है। आज जबकि एक के बाद दूसरे देश में उपनिवेशवाद का खात्मा होता जा रहा है, जबकि पुर्तगाली उपनिवेश अंगोला में विद्रोह की लहर दौड़ गयी है और जबकि स्वयं पुर्तगाल के भीतर सालाजार की तानाशाही हुकूमत के खिलाफ जनमत पहले से भी उग्र हो गया है, जिसकी एक नाटकीय मिसाल सांता मारिया जहाज की जब्ती है- ऐसे वक्त में भारत सरकार की अकर्मण्यता की नीति अथवा निष्क्रियता की नीति बिल्कुल अुनचित मानी जायगी। हमारी पार्टी की मांग है कि गोवा को मुक्त करने के लिए अविलंब जोरदार कदम उठाये जायें और हमारे उन छः लाख से भी अधिक भाइयों तथा बहनों के कलंक को दूर किया जाय, जो भारत की 13 साल की आजादी के बाद भी इतिहास के सबसे बेशर्म और क्रूर शासन के खौफनाक तलवों के नीचे कराह रहे हैं।
1955 में गोवा की मुक्ति के लिए छिड़े आन्दोलन के अग्रिम मोर्चे पर रहने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को आज उस समस्या की ओर राष्ट्र का ध्यान केन्द्रित करने में प्रमुख भूमिका का निर्वाह करना पड़ेगा, जिसके सामाधान के लिए अब अधिक इंतजार नहीं किया जा सकता है।
साथियो, तथ्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हमारी पार्टी और अन्य देशानुरागी तत्वों के सही दृष्टिकोण तथा प्रयास के बिना जनता को शांति, समाजवादी देशों के साथ मैत्री और अफ्रो-एशियाई एकजुटता के संघर्ष से संबंधित समस्याओं पर मैदान मे उतारा नहीं जा सकता है। जहां भी इस तरह के प्रयास किये गये हैं, वहां लोगों का व्यापक समर्थन मिला है। इस तरह के प्रयासोें से निराशा की भावनाएं छिन्न-भिन्न होंगी और हम अपने प्रयासों को द्विगुणित करने के लिए प्रेरित होंगे, ताकि शांति-आंदोलन एक जबर्दस्त जन-आन्दोलन का रुप धारण करे और प्रतिक्रियावादियों की चालों को विफल किया जा सके, सरकार की हिचकिचाहटों को दूर किया जा सके, उसकी नीतियों को सही रुप में ढाला जा सके और अपने देश का गौरव बढ़ावा जा सके।
हमारी आर्थिक स्थिति
पिछले तीन वर्षोंेे के दौरान आर्थिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं। राजनीतिक प्रस्ताव में उन पर न्यूनाधिक प्रकाश डाला गया है, इसलिए यहां उनके विस्तार में जाने की जरुरत नहीं है। फिर भी कुछ सवालों को प्रमुख रुप से पेश करना और उनका उत्तर देना जरुरी है।
इनमें से एक प्रश्न इस प्रकार है:
पिछले 13 वर्षों की संपूर्ण अवधि में अर्थात् स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद एक तरफ साम्राज्यवाद और दूसरी तरफ राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के साथ-साथ संपूर्ण भारतीय जनगण के बीच का अन्तर्विरोध बढ़ा है या कमजोर हुआ है? इसके अतिरिक्त, उस अन्तर्विरोध से क्या नतीजा निकलता है?
यह कोई मात्र सैद्धांतिक प्रश्न नहीं है। इसका हमारी पार्टी की रणनीति और कार्यनीति दोनों से ही गहरा संबंध है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं, 1951 के अक्टूबर में स्वीकृत और 1954 की जनवरी में मदुरै कांग्रेस में भी स्वीकृत, हमारे पुराने पार्टी-कार्यक्रम का, एक महत्वपूर्ण दस्तावेज और सृजनात्मक माक्र्सवादी कृति के रुप में, विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन द्वारा स्वागत किया गया था। उसने हमारी पार्टी को एकताबद्व करने में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक भूमिका का निर्वाह किया था। लेकिन मदुरै के तुरंत बाद घटनाओं की एक लंबी श्रंखला में हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बाध्य किया कि कार्यक्रम में कई गंभीर त्रुटियां हैं। 1955 के जून में अपनी केन्द्रीय समिति द्वारा स्वीकृत राजनीतिक प्रस्ताव में भी हमने कार्यक्रम की कुछ बड़ी स्थापनाओं को छोड़ दिया। जैसे, ‘‘यह सरकार ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के इशारे पर चलती है’’, ‘‘युद्ध-संबंधी कार्यों को प्रोत्साहित करने के सिवा’’ पुनर्निर्माण की ‘‘सभी योजनाएं लड़खड़ा रही हैं’’ भारत सरकार ‘‘अनिवार्य रुप से ब्रिटिश साम्राज्यवाद की विदेश-नीति का पालन करती है’’ - ये स्थापनाएं वर्तमान वास्तविकता के विपरित थीं। ये स्थापनाएं बांडुंग, पंचशील और द्वितीय पंचवर्षीय योजना की भावनाओं को प्रतिबिंबित नहीं करती थीं। हमने 1955 के जून में अर्थात् मदुरै कांग्रेस के 18 महीनों के अन्दर इन स्थापनाओं में ठोस और बुनियादी परिवर्तन किये और 1956 के अप्रैल में पालघाट में कुछ और परिवर्तन किये।
यह बहुत आवश्यक था, क्योंकि पुराने कार्यक्रम में कई सही तथ्य रहने के बावजूद, उसमें नयी परिस्थिति को देखते हुए कई आवश्यक बातें छूट गयी थीं। वे बातें थींः
(1) एक तरफ राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग और दूसरी तरफ साम्राज्यवाद के बीच का अन्तर्विरोध।
(2) वह भूमिका जिसका निर्वाह सुदृढ़ एकता और राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण के लिए सुलभ जनता के प्रबल समर्थन द्वारा किया जा सके।
(3) और सर्वोपरि विश्व व्यवस्था के रुप में समाजवाद के उद्भव का व्यापक और निर्णायक महत्व तथा हमारे देश के घटनाक्रम पर उसका प्रभाव।
कार्यक्रम की अतिसरलीकृत और एकपक्षीय स्थापनाओं के स्थान पर, जिनके अनुसार प्रायः यह मान लिया गया था कि भारत सरकार एक पिछलग्गू सरकार है, जो साम्राज्यवाद के आदेशों का पालन करती है ओर जिसके अंतर्गत थोड़ा भी विकास संभव नहीं है, पालघाट ने हमें एक नयी और बहुमूल्य समझदारी प्रदान की। राष्ट्रीय पूंजीवादी वर्ग की दोहरी भूमिका को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया। पूंजीपति वर्ग की समझौतावादी भूमिका को नगण्य नहीं समझते हुए पालघाट ने एक तरफ ‘‘साम्राज्यवाद और सामंतवाद और दूसरी तरफ भारत के आर्थिक विकास की आवश्यकताओं’’ के बीच के बढ़ते हुए ‘‘टकरावों और अन्तर्विरोधों’’ की पहचान स्थापित की, जो कि ‘‘भारत सरकार और साम्राज्यवाद के बीच बढ़ते हुए टकरावों और अन्तर्विरोधों में भी प्रतिबिंबित थे।’’
क्या वह अन्तर्विरोध लुप्त हो गया है? क्या वह कम हो गया है? हमारा जवाब हैः नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ है। वह तेज हो गया है। इसके अतिरिक्त, साम्राज्यवाद और राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के साथ-साथ संपूर्ण जनगण के बीच का अन्तर्विरोध तेज होने के फलस्वरुप हमारी राष्ट्रीय स्वाधीनता आज पहले से भी अधिक मजबूत आर्थिक आधार पर खड़ी है। कई विशाल सामरिक महत्व के उद्योग-धंधे स्थापित किये गये हैं। इस तरह के उद्योग-धंधों के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा है।
कई नकारात्मक पहलू भी है, जो सभी देशभक्तों को परेशान कर सकते हैं, लेकिन वे उस बड़ी वास्तविकता को अर्थात हमारी राष्ट्रीय स्वाधीनता के आर्थिक आधार के सुदृढ़ीकरण को तिरोहित नहीं करते हैं।
चेकोस्लोवाकिया, रुमानिया और सर्वोपरि सोवियत संघ जैसे सामजवादी देशों के सहयोग ने इस विकास में जो योगदान किया है, उस पर राष्ट्रीय परिषद के राजनीतिक प्रस्ताव में पूरा प्रकाश डाला गया है। हमारा यह प्रमुख कर्तव्य है कि हम अपनी जनता को इस तथ्य से अवगत करायें और वित्तमंत्री श्री मोराजी देसाई, जो सदैव समाजवादी सहायता के महत्व को निरर्थक घोषित करने का प्रयत्न करते हैं और अमेरिकी सहायता की भूरिभूरि प्रशंसा करते हैं, तथा उनकी तरह के अन्य लोगों के गंदे प्रचारों का मुंहतोड जवाब देें। श्री देसाई सूद की कड़ी दरों, अमेरिका से अन्य देशों के अपेक्षा ऊँची कीमतों पर आवश्यक वस्तुओं की खरीद की शर्त, सार्वजनिक क्षेत्र में बुनियादी उद्योगों के लिए सहायता प्रदान करने की अस्वीकृति आदि जैसे तथ्यों को छिपाते हैं।
प्रसंगवश हम एक दिलचस्प रिपोर्ट की ओर श्री मोराजी देसाई का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। 22 मार्च, 1951 को महालेखा-परीक्षक के प्रतिनिधि द्वारा प्रस्तुत तुलन-पत्र (बैलेंस शीट) के अनुसार पिछले एक साल के दौर में भिलाई में 3 लाख रुपये का लाभ हुआ, जबकि दुर्गापुर को 32 लाख और राउर केला को 90 लाख के नुकसान उठाने पड़े।
श्री मोराजी देसाई के सम्मुख कई और तथ्यो को भी प्रस्तुत करने की जरुरत है, जैसे-
सोवियत सहायता से रांची में जो भारी मशीन निर्माण-उद्योग खड़ा किया जा रहा है, वह स्वीकृत क्षमता-वृद्धि के बाद, हर साल 80000 टन माल पैदा करेगा। वह हर साल इतनी मशीनों का निर्माण करेगा, जो प्रतिवर्ष दस लाख टन इस्पात पैदा करने वाले भिलाई जैसे एक लौह-इस्पात कारखाने को लैस कर सकें।
सोवियत संघ और रुमानिया के सहयोग से भारत अपना स्वतंत्र तेल-उद्योग खड़ा कर रहा है। हमारे देश में 1950 में मात्र 3 लाख टन तेल पैदा हुआ था, लेकिन आशा की जाती है कि 1965 में तेल का उत्पादन 60 लाख टन तक पहुंच जायगा।
सोवियत संघ ने तृतीय पंचवर्षीय योजना के लिए 240 करोड़ रुपये कर्ज के रुप में दिये हैं- अन्य सभी देशों ने जितना धन कर्ज के रुप में देने का वायदा किया है उससे यह राशि बहुत अधिक है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये सभी कर्ज हमारे देश के महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए बहुत उपयोगी हैं।
ये कुछ तथ्य - हालांकि और भी तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं- किसी भी ईमानदार आदमी को पूरी तरह संतुष्ट कर सकते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सामजवादी देश अपने सहयोग के माध्यम से कितनी बड़ी भूमिका अदा कर रहे हैं। केवल वे लोग ही इन तथ्यों की ओर से जानबूझकर अपनी आंखें मूूंद ले सकते हैं, जो सत्य का सम्मान नहीं करते हैं। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि ऐसे लोग भारत के राष्ट्रीय हितों के सच्चे हितैषी नहीं हैं।
जहां तक हमारे औद्योगिक उत्पादन का सवाल है, वह 1951 के 100 से 1960 के 167.5 तक बढ़ा है। अनेक उद्योग,जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक महत्व के हैं, विकसित हो रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के चुकता पूंजी 1955-56 के 66 करोड़ रुपये से 468.4 करोड़ रुपये तक पहुंच गयी है।
हमारे मजदूरों, हमारे तकनीकविदों और हमारे अभियंताओं ने सिद्ध कर दिया है कि वे संसार में किसी से भी कम योग्य नहीं है। यदि उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलें, तो वे किसी भी देश के अच्छे-से-अच्छे कर्मियों का मुकाबला कर सकते हैं।
हम एक ही उदाहरण की ओर ध्यान दें। बंगलौर की हिन्दुस्तान मशीन टूल्स फैक्टरी आज ऐसी अनेक मशीनों का निर्माण कर रही है, जिन्हें पहले हम बाहर से मांगते थे। कुछ साल पहले स्विटजरलैण्ड का एक मजदूर जितना उत्पादन करता था, उतना ही उत्पादन भारत के चार मजदूर मिलकर करते थे। आज कई क्षेत्रों में भारतीय मजदूर स्विटजरलैण्ड के उन मजदूरों की बराबरी कर रहे हैं, जो संसार के सबसे अधिक कुशल मजदूरों के रुप में विख्यात हैं।
लेकिन अपनी प्रगति का उल्लेख करते हुए हमें अपनी अर्थव्यवस्था के नकारात्मक पहलुओं को नगण्य नहीं समझ लेना चाहिए। ये पहलू, जिनकी ओर हमने पालघाट और अमृतसर में ही ध्यान आकृष्ट किया था, न केवल आज भी दिखलायी पड़ते हैं, बल्कि ये और भी अधिक स्पष्ट हो गये हैं।
प्रतिशत की दृष्टि से ऐसा जान पड़ता है कि औद्योगिक उत्पादन में बहुत ही शानदार वृद्धि हुई है, लेकिन इसका प्रमुख कारण यह है कि शुरुआत बहुत ही निम्न थी। उदाहरणस्वरुप, हमें उम्मीद है कि 1960-61 में 20 लाख 60 हजार टन तैयार इस्पात प्राप्त होगा। यह 1950-51 की अपेक्षा, जबकि हमें केवल 10 लाख टन इस्पात प्राप्त हुआ था, 160 प्रतिशत की वृद्धि है; फिर भी यह हमारी न्यूनतम आवश्यकताओं से भी बहुत कम है।
औद्योगिक उत्पादन में सापेक्ष वृद्धि के बावजूद द्वितीय योजना के अंत में राष्ट्रीय आय में 25 प्रतिशत अनुमानित लक्ष्य के विरुद्ध वृद्धि होने की उम्मीद है। यह इस तथ्य को देखते हुए आश्चर्यजनक नहीं है कि कारखानों और खानों से हमें अपनी कुल राष्ट्रीय आय का केवल 10 प्रतिशत ही प्राप्त होता है। जिस कृषि पर 70 प्रतिशत से अधिक लोग निर्भर है और जिससे हमारी राष्ट्रीय आय का आधा भाग प्राप्त होता है, उसकी स्थिति बहुत ही दयनीय है। इस कमजोरी को दूर किये बिना न राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में ही कोई यथार्थ परिवर्तन होगा और न राष्ट्रीय आय में ही आशानुकूल तीव्र वृद्धि होगी।
दूसर बात यह है कि अतिरिक्त राष्ट्रीय आय का विशाल भाग धनवानों की तिजोरियों में बंद हो गया है। इजारेदार पूंजी में वृद्धि हुई है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि केवल दस बड़े व्यापारिक घराने सभी कंपनियों की कुल चुकता पूंजी के 67 प्रतिशत पर अपने-अपने नियंत्रण स्थापित किये हुए हंै। अपने विकास के बावजूद अभी सार्वजनिक क्षेत्र 1124.7 करोड़ रुपये की चुकता पूंजी वाले निजी क्षेत्र के बहुत पीछे है।
भयानक रुप से बढ़ते जाने वाले भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण यह है कि धन पर मुट्ठी भर लोगों का नियंत्रण है और एक पार्टी ने राज्य सत्ता पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया है।
द्वितीय पंचवर्षीय योजना के प्रारंभिक काल मंे ही थोक कीमतें लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ गयीं। अखिल भारतीय पैमाने पर मजदूर उपभोक्ताओं का मूल्य सूचकांक भी इसी वृद्धि की ओर संकेत करता है अर्थात मजदूरों का यथार्थ वेतन-स्तर निराशाजनक है ओर नियत आय वाले निम्न मध्यमवर्गीय लोगों की कठिनाइयों में अपार वृद्धि हुई है। खेत मजदूरों की आय में बहुत हृास हुआ है। अपनी मेहनत से नयी संपदा का सृजन करने वाले लोगों को गरीबी और बदहाली की स्थिति में रहने के लिए बाध्य किया जाता है। औद्योगिक मजूदरों की वास्तविक आय 1939 के मुकाबले में बहुत आगे नहीं बढ़ी है। हालांकि उनकी उत्पादकता में यथेष्ट वृद्धि हुई है। सरकार हमारे देश में सबसे अधिक संख्या में लोगों को रोजगार देती है, लेकिन वह उन मुसीबतों की ओर थोड़ा भी ध्यान नहीं देती है, जिन्हें स्वयं उसके कर्मचारी झेल रहे हैं। वह कीमत रेखा को स्थिर रखने के लिए कोई भी कदम उठाने से इंकार करती है और इसके साथ ही वह निर्वाह-व्यय की वृद्धि की क्षतिपूर्ति के लिए खिसकते पैमाने पर महंगाई-भत्ता देने से भी इंकार करती है।
200 रु। से कम आय वाले लोगों की संख्या 1952-53 में 50 प्रतिशत थीं, जो 1956-57 में 65 प्रतिशत तक पहुंच गयी।

-कामरेड अजय घोष
(कामरेड अजय घोष की जन्मशती पर हम उनके कुछ प्रसिद्ध भाषणों एवं लेखों की श्रंखला प्रस्तुत कर रहे है जो हमारे युवा पाठकों के लिए बहुत उपयोगी है।)

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