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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

ऑनलाइन आंदोलन की सम्भावना: एक विश्लेषण

आम तौर पर आंदोलन से मीटिंग, जुलूस, सत्याग्रह आदि समझा जाता है। लेकिन अब जमाना बदल रहा है और इसके साथ-साथ कई चीजें भी बदल रहीं हैं। इस बदलाव में कम्प्यूटर और इससे जुड़े इंटरनेट की बड़ी भूमिका है। प्रायः इंटरनेट का इस्तेमाल व्यक्तिगत तथा संस्थागत ईमेल भेजने के लिए किया जाता है।लेकिन हाल में इस क्षेत्र में नए प्रयोग देखने में आये हैं। अभी हाल ही में बीटी बैंगन के संबंध में फैसले के बारे में लोगों ने ईमेल भेजकर फैसला लेने वालों की नाक में दम कर दिया। नतीजा यह हुआ कि हुकूमत को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी दबाव के बावजूद उनके विरूद्ध फैसला लेना पड़ा।इसी प्रकार हाल में चर्चा में आये नोएडा के मोबाइल टावरों का मामला है। खबर है कि कुछ लोगों ने आबादी वाले इलाकों से उन टावरों को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ने का फैसला किया। उक्त आंदोलन परम्परागत न होकर इंटरनेट के माध्यम से ऑन लाइन होना था। फिर क्या था, कुछ लोगों ने संबंधित प्रशासकों, मीडिया और समाचार पत्र के लोगों तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ-साथ आम लोगों को भी ताबड़तोड़ ईमेल भेजना शुरू कर दिया। ईमेल की इस भरमार ने प्रशासकों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया और नतीजतन मोबाइल टावरों को आबादी वाले इलाके से हटाने का फैसला करना पड़ा। यह कार्य अभी सिर्फ नोएडा में हुआ है। लेकिन सम्भव है कि इससे प्रेरणा लेकर देश के अन्य शहरों के निवासी भी इस तरह का कार्य कर सकेंगे।ऐसे तो इस तरह की गतिविधियों में न तो भाषण, न ही जुलूस और न ही किसी तरह का सत्याग्रह का शोरशराबा होता है। इसलिए परम्परागत नजरिये से इसे आंदोलन की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। लेकिन अगर हम इसके परिणामों को देखें तो यह भी यथार्थ में आंदोलन ही है।इसकी अच्छाई भी देखिए। इस तरह के आंदोलन के संचालन में कोई शारीरिक परेशानी नहीं होती है। पैसा बस नाममात्र का लगता है। आप घर बैठे लोगों को ईमेल भेज सकते हैं। अगर आपको किसी बड़े अधिकारी या मंत्री से मिलना है तो मीलों दूर आपको रोक दिया जायेगा। अगर चिट्ठी भेजते हैं तो उसका सचिव ही आगे नहीं भेजेगा। लेकिन ईमेल का करिश्मा देखिए। आप किसी को भी ईमेल भेज सकते हैं। आम तौर पर लोग अपना ईमेल खुद देखते हैं। इसलिए उन तक पहुंचना लगभग निश्चित ही है।सबसे बड़ी बात है कि आप देश के बाहर से भी ईमेल भेज सकते हैं। इसी प्रकार अपने यहां से अन्य देश में भी ईमेल भेज सकते हैं।इसके अलावा एक बड़ा फायदा यह है कि अकेला व्यक्ति ही ईमेल के माध्यम से बहुत कुछ कर सकता है, बशर्ते कि उठाया गया मुद्दा सही और लोकप्रिय हो। यहां पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता की कहावत भी गलत साबित होती है।देश की राजनीतिक पार्टियों और जन संगठनों को भी आंदोलन के इस परम्परागत तरीके को अपनाना चाहिए। अन्य परम्परागत गतिविधियों के साथ-साथ इसे भी उन्हें अपने गतिविधि का प्रमुख हिस्सा बनाना चाहिए।

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