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मंगलवार, 28 जून 2011

उत्तर प्रदेश में असली जंगल राज


गत दिनों बालिकाओं एवं महिलाओं के साथ बलात्कार और फिर उनकी हत्या के इतने मामले अखबारों में प्रकाशित हुए कि प्रदेश सरकार का पूरा अमला उन्हें नकारने में लगा रहा लेकिन सरकार का हर दावा अगले दिन ही झूठा साबित हो गया। लखीमपुर के निघासन थाने के परिसर में एक दलित बालिका का शव लटका हुआ पाया गया था। मायावती सरकार ने इसे खुदकुशी बता कर लीपापोती की भरसक कोशिश की। पुलिस वालों ने लाश को बाकायदा नहला-धुला कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि दलित बालिका की हत्या की गयी है। अगले ही दिन बाराबंकी के घुंघटेर थाने में एक व्यक्ति की हत्या कर दी गयी। मुजफ्फरनगर के बसपा विधायक के गुर्गों ने दिल्ली की देा लड़कियों का राष्ट्रीय राजमार्ग से अपहरण कर उनकी इज्जत लूटने की सरेआम कोशिश की। विधायक के सरकारी अंगरक्षक भी इस अपराध में शरीक हो गये। फिर भी मायावती के खास सांसद बाबू मुनकाद ने बेशर्मी से बयान दिया कि घटना में शामिल लोगों का बसपा से कोई नाता नही था।

बसपा के नेताओं और पुलिस कर्मियों द्वारा बलात्कारों और हत्याओं को झुठलाने में लगी मुख्यमंत्री मायावती के राज में लखनऊ जेल में निरूद्ध लखनऊ के उप मुख्य चिकित्साधिकारी डा. वाई.एस. सचान की हत्या कर दी गयी। डा. सचान पर मायावती की पुलिस ने लखनऊ के पिछले दो मुख्य चिकित्साधिकारियों की हत्या का आरोप लगाते हुए उनकी पुलिस रिमांड के लिए अदालत में आवेदन दिया था। अदालत ने डा. सचान को अगले दिन अदालत में तलब किया था। उसके एक दिन पहले ही जेल में उनकी हत्या ने कई नये सवाल खड़े कर दिये हैं जिनके जवाब आसानी से मिलने वाले नहीं हैं। आम जनता तक कह रही है कि नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में अरबों रूपयों का घोटाला मायावती के दो खास कारिंदों बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत मिश्रा ने करवाया है और चूंकि डा. सचान के दिल में इस लूट के तमाम राज दफन थे जिन्हें वे अदालत के सामने सरेआम बोल सकते थे, इसलिए उनकी हत्या मायावती सरकार द्वारा करवाई गयी है। इस मृत्यु को जिस प्रकार आत्महत्या बताने के लिए जेल और पुलिस के उच्चाधिकारियों के साथ ही मायावती के खास कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह व्यस्त थे, उससे कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ नजर आ रहा था। लखनऊ मेडिकल विश्वविद्यालय में पांच डाक्टरों के पैनल ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु पूर्व के आठ जख्मों तथा मृत्यु के बाद के गर्दन के जिस एक जख्म का जिक्र किया, उससे साफ है कि डा. सचान की हत्या के बाद उनके शव को बेल्ट से लटकाया गया था। लखनऊ की उच्च सुरक्षा जेल के अन्दर बेल्ट से डा. सचान की लाश लटकी बताई गयी थी तथा पोस्टमार्टम में जिन घावों का जिक्र है वह किसी धारदार भारी हथियार से ही किये जा सकते हैं। वो बेल्ट और धारदार हथियार जेल में कैसे पहुंचे, इसका कोई स्पष्टीकरण मायावती के सरकारी कारकुनों के पास नहीं है। जेल में हत्या की यह पहली घटना नहीं है। इसके पहले कविता चौधरी हत्याकांड के आरोपी रवीन्द्र तथा पीएफ घोटाले के मुख्य आरोपी आशुतोष अस्थाना की हत्यायें गाजियाबाद जेल में हुई थीं। जेलों में हुई कुछ अन्य मौतों पर भी सवालिया निशान लगे थे।

दरअसल मायावती के राज में हर कोई लूट में लगा है। निदेशालयों से लेकर थानों तक पर तैनाती की बाकायदा नीलामी होती है। बसपा के सांगठनिक तंत्र में अध्यक्ष और मंत्री जैसे किसी पदाधिकारी की कोई औकात नहीं होती। जिला, मंडलीय और राज्य स्तरीय कोआर्डिनेटर मायावती द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। कहा जाता है कि यही कोआर्डिनेटर मायावती के पूरे भ्रष्ट तंत्र के खेवनहार हैं। कोआर्डिनेटर नियुक्त होने के पहले भूखों मरने वाला कोआर्डिनेटर बनने के 3-4 महीने में ही किसी महंगी बड़ी कार (एसयूवी) से चलता हुआ दिखता है। स्थानान्तरण और पोस्टिंग के लिए सरकारी मुलाजिम इनके आगे-पीछे टहलते हुए नजर आते हैं।

अगले साल उत्तर प्रदेश में विधान सभा का चुनाव होना है। इन चुनावों के मद्देनजर कई तरह की बातें की जा रहीं हैं। हर कोई अपने नफा-नुकसान के लिहाज से व्याख्यायें कर रहा है। उससे इतर प्रदेश की आम जनता मायावती के राज को जंगल राज बता रही है।

- प्रदीप तिवारी

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