
फ़ॉलोअर
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
खून-ए-दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैंने

फैज अहमद फैज को मैंने तब देखा था, जब सज्जाद जहीर की लंदन में मौत हो गई थी और वह उनकी लाश लेकर हिंदुस्तान आए थे। लेकिन उनसे बाकायदा तब मिला, जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का सचिव था। यह इमरजेंसी के बाद की बात है। उन दिनों मैं खूब भ्रमण करता था। बड़े-बड़े लेखकों से मिलना होता था। एक मीटिंग में प्रगतिशील साहित्य को लोकप्रिय बनाने की बात चल रही थी। मैंने फैज साहब से पूछा कि आप इतना घूमते हैं, लेकिन हर जगह अंग्रेजी में स्पीच देते हैं। ऐसे में हिंदुस्तान और पाकिस्तान में हिंदी-उर्दू के प्रगतिशील साहित्य का प्रचार कैसे होगा? फैज साहब ने कहा, ‘इंटरनेशनल मंचों पर अंग्रेजी में बोलने की मजबूरी होती है। लेकिन आप लोग कम से कम उतना काम तो कीजिए, जितना हमने अपनी जुबान के लिए किया है।’ उसके बाद उनसे मेरा कई बार मिलना हुआ। फैज साहब के बारे में एक बात बहुत कम लोग जानते हैं। इसे ठीक से प्रचारित नहीं किया गया। जब गांधीजी की हत्या हुई थी, तब फैज ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के संपादक थे। गांधीजी की शवयात्रा में शरीक होने के लिए वह चार्टर्ड प्लेन से आए थे और जो संपादकीय उन्होंने लिखा था, मेरी चले तो मैं उसकी लाखों करोड़ों प्रतियां लोगों में बांटू। गांधीजी के व्यक्तित्व का ऐतिहासिक मूल्यांकन करते हुए शायद ही कोई दूसरा संपादकीय ऐसा लिखा गया होगा। फैज साहब ने लिखा था - अपनी मिल्लत और अपनी कौम के लिए शहीद होने वाले हीरो तो इतिहास में बहुत हुए हैं, लेकिन जिस मिल्लत से अपनी मिल्लत का झगड़ा हो रहा हो और जिस मुल्क से अपने मुल्क की लड़ाई हो रही हो, उस पर शहीद होने वाले गांधीजी अकेले थे। पार्टीशन के बाद उन दिनों पाकिस्तान में लड़ाई चल रही थी। गांधी जी खुद को बड़े गर्व से हिंदू कहते थे, लेकिन यह इतिहास की विडंबना है कि नाथूराम गोडसे ने सेकुलर पंडित नेहरू को नहीं मारा, राम का भजन गाने वाले गांधी को मारा। फैज अहमद फैज उर्दू के प्रगतिशील रचनाकारों में सबसे प्रसिद्ध कवि हैं। जोश, जिगर और फिराक के बाद की पीढ़ी के कवियों में वह सबसे लोकप्रिय थे। नोबेल प्राइज छोड़कर उन्हें साहित्य जगत का सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार मिला। फैज उन कवियों में थे, जिन्होंने अपने विचारों के लिए अग्नि-परीक्षा भी दी। मशहूर रावलपिंडी षड्यंत्र केस के वह आरोपी थे। सज्जाद जहीर और फैज साहब पर पाकिस्तान में मुकदमा चलाया गया था। उन्हें कोई भी सजा हो सकती थी। वे काफी दिनों तक जेल में रहे ही। फैज साहब के एक काव्य संकलन का नाम है - ‘जिंदानामा’। इसका मतलब होता है कारागार। अयूबशाही के जमाने में उन्होंने विद्रोहात्मक कविताएं लिखीं। उन्होंने मजदूरों के जुलूसों में गाए जाने वाले कई गीत लिखे, जो आज भी प्रसिद्ध हैं। मसलन,हम देखेंगेलाजिम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिसका वादा हैजब जुल्मोसितम के कोह-ए-गरांरूई की तरह उड़ जाएंगे.....जब बिजली कड़-कड़ कड़केगीहम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरममसनद पर बिठाए जाएंगेसब ताज उछाले जाएंगेसब तख्त गिराए जाएंगेऔर राज करेगी खुल्क-ए-खुदाजो मैं भी हूं और तुम भी हो। फैज अहमद फैज की इस चर्चित नज्म को पिछले दिनों टेलीविजन पर सुनने का मौका मिला। इसे पाकिस्तानी गायिका इकबाल बानो ने बेहद खूबसूरती से गाया है। फैज प्रेम और जागरण के कवि हैं। उर्दू-फारसी की काव्य परंपरा के प्रतीकों का वे ऐसा उपयोग करते हैं, जिससे उनकी प्रगतिशील कविता एक पारंपरिक ढांचे में ढल जाती है और जो नई बातें हैं, वे भी लय में समन्वित हो जाती हैं। उन्होंने कई प्रतीकों के अर्थ बदले हैं, जैसे उनकी एक कविता है - ‘रकीब’। रकीब प्रेम में प्रतिद्वंद्वी को कहा जाता है। उन्होंने लिखा कि मैं अपनी प्रेमिका के रूप से कितना प्रभावित हूं, यह मेरा रकीब जानता है। उन्होंने लिखा - मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग। इतनी ही नहीं, उन्होंने ही यह लिखा - और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा। राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा। और लेखकों के लिए उन्होंने लिखा - मता-ए-लौह-ओ-कलम छिन गई, तो क्या गम है। कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने। दरअसल फैज में जो क्रांति है, उसे उन्होंने एक इश्किया जामा पहना दिया है। उनकी कविताएं क्रांति की कविताएं हैं और सरस भी हैं। सबसे बड़ा कमाल यह है कि उनकी कविताओं में सामाजिक-आर्थिक पराधीनता की यातना और स्वातंन्न्य की कल्पना का जो उल्लास होता है, वह सब है। फैज की दो और खासियतें हैं - एक, वह व्यंग्य कम करते हैं, लेकिन जब करते हैं, तो उसे बहुत गहरा कर देते हैं। जैसे - शेख साहब से रस्मोराह न की, शुक्र है जिंदगी तबाह न की। दूसरी बात फैज रूमानी कवि हैं। वे अपने भावबोध को सकर्मक रूप प्रदान करने वाले कवि हैं। क्रांति सफल नहीं हुई तो ऐसे में जो क्रांतिकारी कवि हैं, निराश होकर बैठ जाते हैं। कई तो आत्महत्या कर लेते हैं और कई जमाने को गालियां देते हैं। फैज वैसे नहीं हैं। उनका एक शेर है - करो कज जबीं पे सर-ए-कफन, मेरे कातिलों को गुमां न हो। कि गुरूर इश्क का बांकपन, पसेमर्ग हमने भुला दिया। अर्थात कफन में लिपटे मेरे शरीर के माथे पर टोपी थोड़ी तिरछी कर दो, इसलिए कि मेरी हत्या करने वालों को यह भ्रम न हो कि मरने के बाद मुझमें प्रेम के स्वाभिमान का बांकपन नहीं रह गया है। यह ऐतिहासिक यातना की अभिव्यक्ति है। यह समूचे समाजवादी आन्दोलन और समाजवादी चेतना की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में ऐसी अनेक कविताएं बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’, निराला आदि कवियों ने लिखी थीं। कुछ इसी भावबोध पर लिखी उनकी एक नज्म है, जो मुझे अभी याद नहीं है। हां, एजाज अहमद ने उन पंक्तियों को अपने एक मशहूर लेख आज का मार्क्सवाद में उद्घृत किया है। जिसका भाव है - हमने सोचा था कि हम दो-चार हाथ मारेंगे और यह नदी तैरकर पार कर लेंगे। लेकिन नदी में तैरते हुए पता चला कि कई ऐसी लहरें, धाराएं और भंवरें हैं, जिनसे जूझने का तरीका हमें नहीं आता था। अब हमें नए सिरे से यह नदी पार करनी होगी। सो, फैज केवल रूप, सौंदर्य और प्रेरणा के ही कवि नहीं हैं, बल्कि विफलताओं और वेदना के क्षणों में साथ रहने वाली पंक्तियों के भी कवि हैं।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
मेरी ब्लॉग सूची
-
CPI Condemns Attack on Kanhaiya Kumar - *The National Secretariat of the Communist Party of India issued the following statement to the Press:* The National Secretariat of Communist Party of I...7 वर्ष पहले
-
No to NEP, Employment for All By C. Adhikesavan - *NEW DELHI:* The students and youth March to Parliament on November 22 has broken the myth of some of the critiques that the Left Parties and their mass or...9 वर्ष पहले
-
रेल किराये में बढोत्तरी आम जनता पर हमला.: भाकपा - लखनऊ- 8 सितंबर, 2016 – भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने रेल मंत्रालय द्वारा कुछ ट्रेनों के किराये को बुकिंग के आधार पर बढाते चले जाने के कदम ...9 वर्ष पहले
Side Feed
Hindi Font Converter
Are you searching for a tool to convert Kruti Font to Mangal Unicode?
Go to the link :
https://sites.google.com/site/technicalhindi/home/converters
Go to the link :
https://sites.google.com/site/technicalhindi/home/converters
लोकप्रिय पोस्ट
-
New Delhi : Communist Party of India(CPI) on August 20,2013 squarely blamed the Prime Minister and the F...
-
लखनऊ 6 दिसम्बर। बैंक कर्मचारियों की सबसे बड़ी यूनियन - एआईबीईए के आह्वान पर यू.पी. बैंक इम्पलाइज यूनियन की स्थानीय इकाई ने यूनियन बैंक आफ...
-
कांबड़ियों की मौत प्रशासनिक अव्यवस्थाओं का परिणाम: भाकपा आस्थावानों को उकसा कर उन्हें राम भरोसे छोड़ देती है सरकार लखनऊ- 24 जुलाई ,2022,...
-
The Central Secretariat of the Communist Party of India has issued following statement to the press today: The Communist Party of India...
-
अभूतपूर्व रहा किसानों- कामगारों का भारत बन्द भाकपा ने सभी बन्द समर्थकों को दिली मुबारकबाद दी सरकार को चेताया कि वह दीवार पर लिखी इबारत...
-
अपने घनघोर कट्टरपंथी एजेंडे को ज नता पर जबरिया थोपने , 2014 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं से किये वायदों से पूरी तरह मुकरने और काम ...
-
वाराणसी में नेपाली मजदूर को प्रताड़ित करने वालों पर रासुका लगे घटना से देश की प्रतिष्ठा को धक्का लगा , गरीबों में उपजा आक्रोश पूर्व क...
-
हाल ही में लखनऊ की दो घटनायें काबिले गौर हैं- प्रथम- अपनी लखनऊ यात्रा के दौरान श्री मोदी जब हजरतगंज से गुजर रहे थे तो हैदराबाद के दलित छात्...
-
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने बाराबंकी में जहरीली शराब पीने से दर्जन भर नागरिकों की मौत पर गहरा दुःख...
-
हाशिमपुरा पर न्यायपालिका का फैसला संवैधानिक मूल्यों के प्रति उम्मीद जगाने वाला है भाकपा ने फैसले का किया स्वागत लखनऊ- 1 नवंबर 2018 ...



1 comments:
lage raho. uttar pradesh ka bhagya shayad badlne wala hai.
एक टिप्पणी भेजें