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शनिवार, 26 मार्च 2011

बजट 2011-12


एक बार फिर 2011-12 के लिए सरकार के वित्तीय एवं अन्य कार्यकलाप का ब्यौरा बजट के जरिये पेश किया गया है। बजट पेश करना एक कानूनी आवश्यकता तो है ही यह सरकार की बहुमुखी राजनैतिक-आर्थिक चाल का भी प्रतिनिधित्व करता है। अब लोगों को उसके नतीजे का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। अब लोगों को उसके नतीजे का इंतजार करने की जरूरत नहीं उन्हें पहले से ही जोरशोर से बता दिया गया है कि उन्हें कितना अधिक फायदा पहुंचने वाला है। पर विरले ही इनसे फायदा पहुंचता है। भारत की लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकरों ने इस बात की जरूरत कभी नहीं समझी कि जो लोग अपेक्षाकृत खराब हालत में हैं, वंचित हैं, हाशिये पर हैं, असमानता का शिकार हैं उनके हित में ऐसी सामाजिक-आर्थिक प्रक्रियाएं आगे बढ़ायी जायें कि उन्हें अधिक फायदा पहुंचे, बेहतर सेवाएं मिले, उनकी जिंदगी में कुछ रोशनी आये।

आज जो आर्थिक दृष्टिकोण हावी है बजट 2011-12 भी उसी के अनुरूप है। उम्मीद की जाती थी कि कुछ कारणों से स्थापित तरीके से थोड़ा हटकर बजट आये। पहला, पिछले दो वर्षों से अधिक समय से देश में अत्यधि महंगाई का दौर-दौरा चल रहा है। यह महंगाई देश के आम गरीब लोगों पर जबर्दस्त मुसीबत ढा रही है। सरकार के लोग भी मानते हैं कि महंगाई जनता पर एक गैरकानूनी तरीक से थोपा गया टैक्स है। जाहिर है बाजार की ताकतें इस टैक्स को जनता पर थोपती हैं, अतः वही इसे वसूल भी करती हैं।

दूसरा, बिजनेस वर्ग की तरफ को जो अतिरिक्त नकद धन बहकर जा रहा है वह दरअसल उन्हें सरकार से मिल रही सौगात है। इस वर्ग की तरफ को धन के बहने का कारण यह है कि आज महंगाई की उग्रता और उसका जारी रहना-यह स्वयं सरकार का ही कारनामा है। सरकार के पास खाद्यान्न का विशाल भंडार है। उस खाद्यान्न भंडार को कम करके और उसके जरिये कीमतों को गिरा कर गरीब लोगों को सस्ते दर पर खाद्यान्न मुहैया करने के बजाय सरकार ने उसे गोदामों में ही सड़ाना या उसे किसी न किसी तरीके से व्यापारियों एवं कालाबाजारियों के हवाले करना ही बेहतर समझा। साथ ही सरकार ने देशी-विदेशी बड़ी कम्पनियों को इजाजत दी कि वे सीधे किसानों सेे खाद्यानन खरीदें और फिर ऊचें दामों पर बेचें। आज जो आर्थिक वृद्धि हो रही है उसकी कमान कार्पोरेट क्षेत्र के हाथ में है, उत्तरोत्तर बढ़ती ‘असमावेशी वृद्धि’ के ‘राष्ट्रीय’ कार्य को आगे बढ़ाने के कार्य के लिए उन्हें प्रोत्साहन दिया जा रहा है, रियायतें दी जा रही हैं, खोलकर उन्हें पैसा दिया जा रहा है।

जिन रजिस्टर्ड कम्पनियों के आय-व्यय के विवरण आ चुके हैं उनके मुनाफों के आंकड़े देखने योग्य हैं। उन्होंने बेतहाशा मुनाफे कमाये हैं। 2009-10 में, रिटर्न फाईल करने वाली लगभग 4.27 लाख कम्पनियों में से 2.5 लाख कम्पनियों ने लगभग 2.54 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था। उन्होंने कानून के अनुसार 33 प्रतिशत टैक्स देने के बजाय 23.63 प्रतिशत का प्रभावी टैक्स ही अदा किया। गत वर्ष कम्पनियों द्वारा दिये गये टैक्स की प्रभावी दर लगभग 22 प्रतिशत रही इसका अर्थव्यवस्था में जो लोग सबसे अधिक मालामाल हैं उन्हें सरकार ने टैक्सों के मामले में सबसे अधिक रियातें दी। कभी यह सवाल नहीं पूछा जाता कि इन कम्पनियों को इतनी रियायत देकर आखिर देश को क्या फायदा पहुंचता है। यह स्पष्ट है कि हमारी वित्तीय नीति से सामाजिक न्याय और समानता जैसी बातें लम्बे समय से या स्थायी तौर पर गायब हो चुकी हैं।

उम्मीद की जाती थी कि जमीनी स्तर पर आम लोगों के दबाव के चलते वित्तीय तौर-तरीकों की प्रतिगामी प्रकृति में कुछ कमी कर नीतियों को सही रास्ते पर लाने की दिशा में शायद कोई कदम उठा लिया जाये। जाहिर है यह उम्मीद बिजनेस वर्ग और कार्पोरेट घरानांे के लिए लाबीईंग करने वालों के चमक-दमक भरे कागजों में पेश ज्ञापनों के सामने कमजोर पड़ी और अंत में बिजनेस वर्ग और कार्पोरेट घराने ही विभिन्न स्पष्ट एवं सुनिश्चित रियायतें और ऐसे संशोधन हासिल करने में कामयाब हो गये जिनके फलस्वरूप प्रत्यक्ष करों के रूप में उन्हें कम पैसा देना पड़ेगा।

इस प्रकार वर्तमान बजट के फलस्वरूप 11 हजार करोड़ रुपये की धनराशि को इस प्रकार न्यौछावर कर दिया गया क उससे कार्पोरेटों के पक्के चिट्ठे बैलेंस शीट में उनके मुनाफों में सीधे तौर पर बढ़ोतरी हो जायेगी। एक बिजनेस दैनिक पत्र में कुछ कम्पनियों के नाम देकर बताया है कि उन्हें कितना-कितना फायदा पहुंचेगा।

क्या किसी ने सोचा कि इतने पैसे से तो उस पूरे के पूरे आदिवासी क्षेत्र की शक्ल ही बदली जा सकती है जहां के लोगों को किसी कम्पनी की फैक्टरी या पावर प्लांट या अन्य कोई कारखाना लगाने के लिए उनके रोजगार के प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल कर दिया गया है।

असल में केन्द्र के बजट खर्च का लगभग आधा हिस्सा अमीरों और सम्पन्न वर्गों के लिए है। यह पैसे का ऐसा हस्तांतरण हैं जिसके बदले में देश को कुछ नहीं मिलता। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है। लम्बे अरसे से खासकर 1991 से जबकि विकास एक वृद्धि की भूमिका इन बड़े लोगोें के हवाले कर दी गयी और इस महान दायित्व को पूरा करने में उन्हें कामयाब करने के लिए सरकार उनके वफादार सेवक के रूप में खड़ी हो गयी है- यही सब चल रहा है।

बजट की कुछ अन्य बातें देखें जिनसे पता चले कि बजट का असली चेहरा क्या है, असली जोर किस बात पर है। सबसे पहले देखें महात्मा

गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना- जिसकी बहुत चर्चा होती है और जो तत्वतः अत्यंत सकारात्मक स्कीम है- की बजट में क्या तुलनात्मक स्थिति है। पिछले वर्ष इसके लिए जो आवंटन हुआ था न तो वह पूरा खर्च किया गया औरन ही वित मंत्री इस वर्ष के बजट में उसमें कटौती करने से बाज आये। इधर तो उसमें दैनिक मजदूरी बढ़ाने की बातें चल रही हैं। पर बजट में उसके लिए पैसे का आवंटन ही कम कर दिया गया है। जाहिर है उसमें अब कम लोगों को काम मिलेगा और यह कानून एक मजाक बन कर रह जायेगा। नियेक्ता वर्गों का दबाव है कि मनरेगा पर कोई अंकुश लगे क्योंकि मनरेगा के कारण अनेक बार उन्हें उचित मजदूरी देेने पर मजबूर होना पड़ता है। मनरेगा में आवंटन कम करना बेहतर हालात वाले तबकों की मांग के अनुरूप है।

सरकार कार्पोरेट तबकों, खुशहाल तबकों और विश्व बैंक-अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष पर निष्ठावान लोगों की इस मांग के लिए प्रतिबद्ध है कि वित्तीय घाटा कम किया जाये, इसके लिए सकल घरेलु उत्पाद के हिस्से के रूप में सरकारी खर्चे में निर्धारित समय में उत्तरोत्तर कमी लायी जाये और सरकारी खर्चे की ऊपरी सीमा तय हो भले ही राष्ट्रीय जरूरतें कैसी भी हों, या कार्पोरेटांे जैसी बड़ी हस्तियां इस सिलसिले में आवश्यक दायित्व को पूरा करने में विफल रहें। अतः सार्वजनिक व्यय को कम करने की हर चंद कोशिश की जाती है बशर्ते उसमें कार्पोरेट हितों पर या उन जी-7 देशों की अर्थव्यवस्था पर कोई आंच न आए जो भारत के बाजारों से बड़े मुनाफे कमाने पर नजर गड़ाये हैं।

बजट से पता चलता है कि टैक्स-जीडीपी अनुपात भी व्यवहारतः ठहराव की स्थिति में है। कार्पोरेट तबका खुश है कि संसाधन बढ़ाने के लिए उन पर ऐसा कोई दबाव नहीं कि जिस हद तक उन्हें मंजूर है उसमें अधिक टैक्स देने के लिए सरकार उनसे कहे। इस तरह सार्वजनिक व्यय में और टैक्स वसूल करने की सरकार की कोशिश में कमी से यह तबका गदगद है। इससे उनके निजी खातों में दौलत बढ़ती है और कोई भी आर्थिक वृद्धि उस तरीके से ही होती है जो उन्हें मंजूर हो। इसमें विभिन्न रूपों मे और उनकी शर्तों के अनुसार विदेशी पूंजी आने की भी भरपूर गुंजाइश रहती है। इस वित्तीय व्यवस्था में जिनके पास टैक्स देने की क्षमता है उन्हें छूने पर बहुत हो-हल्ला होता है। इस प्रकार एक तरफ वित्तीय घाटे को कम रखने का कृत्रिम लक्ष्य और दूसरी तरफ राजनैतिक रूप से स्वार्थसाधक टैक्स नपुंसकता- ये दोनों बातें आम आदमी के प्रति सरकार की जो नैतिक एवं आर्थिक दायित्व है उनको पूरा करने के लिए सरकार के पास उपलब्ध साधनों को सीमित बना देती हैं। टैक्स राजस्व में 23 प्रतिशत वृद्धि का और जी-3 स्पेक्ट्रम से जबर्दस्त राजस्व पाने का दावा भले ही किया जाये, सरकार का दृष्टिकोण सार्वजनिक व्यय के संबंध में जस का तस है।

तथ्य यह है कि देश में औद्योगिक एवं कृषि उत्पाद की ऐसी विशाल क्षमताएं हैं जो अभी तक प्रयोग में नहीं लायी गयी है, देश में विशाल युवा आबादी है जिनमें हर तरह की शिक्षा प्राप्त लोग शामिल हैं। ये दो सकारात्मक पहलू है। अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए इनका लाभ उठाने की कोशिश नहीं की गयी है।

यदि कृषि में, खासकर वर्षा सिंचित इलाकों में दालों एवं खाद्यान्नों के उत्पादन के लिए सार्वजनिक एवं निजी निवेश में वास्तव में वृद्धि की जाती तो उससे मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने में काफी मदद मिल सकती थी। दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए 60 हजार गांवों को 300 करोड़ रुपये देना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

मुख्य बात यह हे कि कीमतों को नीचे लाने की दिशा में मांग और आपूर्ति में तालमेल और व्यापक उपभोग की वस्तुओं के विकेन्द्रीकरण उत्पादन की आवश्यकता है ताकि बुनियादी जरूरतें पूरी हों और अत्यधिक आयातों, पूंजी निवेश, ऊर्जा खपत और प्रदूषण पर अंकुश लगे।

कहने का मतलब यह है कि जब सार्वजनिक व्यय बढ़ने से मांग बढ़ती है तो कम अरसे में आपूर्ति में वृद्धि करने के लिए हमारे पास अच्छी क्षमता एवं संभावना है। पर कार्पोरेट निवेशकों के लिए कोष की अथाह गंगा बहती रहे इस मकसद से सरकार सार्वजनिक व्यय को कम कर रही है और सभी नीतियां इस तरह बनायी जा रही हैं कि कार्पोरेटों को खूब पैसा मिलता रहे, उनके लिए सभी संसाधन उपलब्ध रहें और उनका विस्तार हो और उन्हें बाजार के अवसर मिलें। बजट की यही दिशा है। यह कहना कि सरकार केवल वित्तीय घाटे को कम करने के लिए सार्वजनिक व्यय को कम कर रही है, सच नहीं है।

महंगाई को रोकना भी सरकार की प्राथमिकता नहीं है क्योंकि सरकार का विचार है कि महंगाई को रोकने से विकास दर घट जायेगी और पूंजीपति वर्ग के मुनाफे घट जायेंगे।

यह सुविदित है कि बचतों से आने वाला पैसा सामान्यतः काफी गरीब परिवारों से आता है जो पेट काटकर भविष्य के लिए कुछ बचत करने की कोशिश करते हैं और उन्हें बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थान जो ब्याज देते हैं वह बहुत कम होता है; खुदरा बाजार में कीमतें जिस रेट पर बढ़ रही हैं उससे बहुत कम ब्याज उन्हें बैंकों से मिलता है। कार्पोरेट क्षेत्र और अमीरों को उनसे अधिक ब्याज दिया जाता है और इस तरह गरीब परिवारों के संसाधनों का कार्पोरेट क्षेत्र का वास्तव में अघोषित हस्तांतरण हो जाता है और यह बरसों-बरस से चल रहा है।

हमारे देश के आज के हालात में आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई में तेज एवं सुनिश्चित वृद्धि संभव है। अतः बजट में एक बड़ा कदम उठाते हुए मनरेगा में वर्ष में लगभग 200 दिन काम देकर और न्यूनतम वेतन देकर और रोजगार गारंटी कानून के दायरे में शहरी गरीबों को लाकर इस दिशा में बढ़ा जा सकता था। पर बजट में ऐसा नहीं किया गया।

आज आवश्यकता है कि भारत के नौजवानों को रोजगार दिलाने पर फोकस किया जाये। पर हो इससे उलटा रहा है। भारत के कार्पोरेट विदेशों में निवेश कर रहे हैं और सरकार उन्हें रियायत के बाद रियायत दिये चली जा रही है, यह फिक्र किए बिना कि इससे भारत में रोजगार सृजन को नुकसान पहुंच रहा है।

नवउदारवाद के तहत समावेशी वृद्धि का दावा सरकार फरेब और धोखा है। इस तरह के विकास के स्थान पर सच्चे तौर पर समावेशी वृद्धि की दिशा में चलने की जरूरत है। पर हमारे देश के वास्तविक हालात और जरूरतों को अनदेखा कर हमारी पूंजीपति-समर्थक सरकार ने बेशर्मी के साथ इस तरह की गलत एवं विकास विरोधी नीतियां देश पर थोप दी हैं जिनसे सार्वजनिक व्यय कम होता है और सभी आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई पर अति समृद्ध लोगों की इजारेदारी हो जाती है।

जिस तरीके से कस्टम ड्यूटी (आयात शुल्क) साल-दर-साल नीचे की गयी है उसके कारण सरकार आयात शुल्क आधारित राजस्व की विशाल राशि से महरूम हो जाती है और देश में सस्ते आयात की बाढ़ आती है। इससे न केवल राजस्व को नुकसान पहुंच रहा है बल्कि भारत के मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र के रोजगार का निर्यात हो रहा है, रोजगार घट रहा है।

इस समय मेन्यूफैक्चर्ड मालों का आयात हमारे अपने मेन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में होने वाले कुल उत्पादन से अधिक है। यह देश में उद्योगों को खत्म करने की प्रक्रिया है। विश्व में औद्योगिक क्रांति के समय हमारे विदेशी शासक कोशिश किया करते थे कि हमारे यहां कोई माल न बने, सभी माल विदेशों से आये। आज हमारे अपने शासक ही वही काम कर रहे हैं। यह सब भूमंडलीकरण पर अंधा होकर चलने के कारण हो रहा है, बदले में हमारे नीति निर्माताओं को विदेशी सरकारों एवं विशेषज्ञों की तरफ से शाबाशी मिल जाती है।

बजट में सामाजिक क्षेत्र में वृद्धि का दावा सरासर गुमराह करने वाला है। महंगाई के हिसाब से देखें तो यह वृद्धि बहुत ही मामूली सी है। इसके अलावा कई सेवाओं जैसे कि ब्राडकास्टिंग या वैज्ञानिक एवं अन्य आकर्षक अनुसंधान केवल गरीबों के लिए नहीं। दरअसल उन्हें तो इसके फायदों को लेशमात्र भी हिस्सा नहीं पहुंचता। शिक्षा एवं भोजन के तथाकथित अधिकारों के प्रकाश में स्वास्थ्य एवं शिक्षा के दायरे में समूची आबादी आनी चाहिये। इनके लिए बजट में क्या प्रावधान हैं? जब पर्याप्त बजट आवंटन ही नहीं है तो इन अधिकारों का मतलब ही क्या रह जाता है?

इसके अलावा ये अधिकार जनता को मिल जायें इसके लिए न तो तफसील से कोई कार्यक्रम है न तंत्र; न ही केन्द्र सरकार या राज्य सरकरों को इसके प्रभावी अमल में कोई दिलचस्पी है। क्या हम नहीं देखते नौकरशाही किस कदर भ्रष्ट और जनता के हितों के प्रति किस तरह भाव शून्य है। सामाजिक खर्चो आदि के लिए कोई पैसा बजट में दिया भी जाता है तो भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट नौकरशाही के बीच साठगांठ और बंदरबांट के चलते जमीनी स्तर पर जनता को उसका फायदा पहुंच ही कहां पाता है?

आवश्यकता इस बात की है कि बजट में शीघ्र एवं दृश्यमान परिणाम-उन्मुखी जनता परस्त संसाधन आवंटन करने के लिए सरकारी नीतियों के महत्व को समझा जाये और इस तरह का सुस्पष्ट बजट बनाया जाये जिससे न सिर्फ शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे अति आवश्यक सामाजिक कार्यों के लिए संसाधन जुटाये जायें बल्कि हमारी अर्थव्यस्था और देश में जो सुस्पष्ट असंतुलन पैदा हो गये हैं उन्हें ठीक किया जाये। जनता के सशक्तीकरण के लिए और हमारे लोकतंत्र को वास्तव में प्रेरणास्पद एवं अग्रगामी सामाजिक परिवर्तनों का जरिया बनाने के लिए बजट में ऐसे बदलाव जरूरी हैं।

- कमल नयन काबरा

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