भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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शनिवार, 26 मार्च 2011

आगामी चुनाव और वामपंथ


पांच राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधान सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है और उम्मीदवारों के नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है। ये चुनाव, खासकर पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव वामपंथी पार्टियों के लिए बड़े महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस समय वहां क्रमशः वाम मोर्चा और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकारें हैं। वामपंथ के लिए तमिलनाडु, पुडुचेरी और असम के चुनाव भी काफी अहमियत रखते हैं।

अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए केरल और पश्चिम बंगाल में विजय प्राप्त करना वामपंथी पार्टियों के लिए आवश्यक है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा पिछले लगभग 34 सालों से लगातार शासन कर रहा है जबकि केरल में एलडीएफ पिछले पांच वर्षों से सत्ता में है।

जब कोई सरकार सत्ता में होती है तो कुछ समस्याएं अपरिहार्य होती है। सभी वायदे पूरे नहीं किये जा सकते। पश्चिम बंगाल में कुछ गलतियां हो गयी हो सकती हैं। जब कोई सत्ता लम्बे अरसे तक रहती है तो कुछ अवांछनीय तत्वों समेत सभी तबके उसकी तरफ आकृष्ट होते हैं। भूल-चूकों और गलतियों की कुछ हद तक पहचान हो चुकी है और उन्हें दूर करने के लिए कुछ गंभीर प्रयत्न भी किये गये हैं।

कुछ अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं। उद्योगीकरण के ईमानदार प्रयास भूमि अधिग्रहण के गलत तरीकों से किये गये, जिसका विरोधियों ने फायदा उठाया, उसे हजारों गुना बढ़ाकर पेश किया गया और उससे जनता का एक हिस्सा भ्रमित हुआ। सभी वामपंथ विरोधी पार्टियों के एकजुट हो जाने की उम्मीद तो थी पर जब तृणमूल कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस माओवादियों को खुले समर्थन के साथ एकजुट हुई तो उन्होंने लक्ष्मण रेखा ही लांघ दी।

प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह लगातार इस अभियान को जारी रखे हुए हैं कि वामपंथी अतिवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है। उनके लिए सीमापार से आतंकवाद, अभूतपूर्व तरीके से बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, करोड़ों-अरबों रूपये कालाधन जैसी बातें मुख्य समस्याओं में नहीं हैं पर माओवाद सबसे बड़ी समस्या है। पर उनकी पार्टी ममता बनर्जी से हाथ मिलाती है और पश्चिम बंगाल में सत्ता छीनने के अपने सपने में माओवादियों से सहर्ष समर्थन लेती है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और वामपंथ का हमेशा ही विचार रहा है कि माओवाद एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है और इसके एक राजनैतिक समाधान की जरूरत है। हमने गोलियों और हत्याकांडों के जरिये माओवाद को कभी खत्म करना नहीं चाहा। यह कांग्रेस सरकार ही है जो माओवाद की तर्ज पर माओवादी समस्या का हल बन्दूक की नली की ताकत से निकालना चाहती है। वे माओवादियों को अत्यधिक नृशंसता से मार डालते हैं, यहां कि गिरफ्तार करने के बाद भी उनकी हत्या कर देते हैं जैसे उन्होंने आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में राज कुमार उर्फ आजाद के साथ किया और उसके बाद वे पश्चिम बंगाल में माओवादियों के साथ गलबहियां भी कर लेते हैं। यह हैरानी की बात है कि पश्चिम बंगाल में अपने अंध वामपंथ विरोधी रवैये के कारण वे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के घिनौने खेल को नहीं समझ पा रहे हैं। माओवादियों को बाद में अहसास होगा कि असली दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है। पर जो भयंकर राजनैतिक गलती वे आज कर रहे हैं, उसे दुरूस्त करने के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार को श्रेय जाता है कि उसने राज्य में बटाईदारों के अधिकारों की गारंटी समेत सार्थक भूमि सुधार किये; समुदायों के बीच शानदार धर्मनिरपेक्ष सम्बंध बनाये रखे; उनकी शिक्षा और सुविधाओं के साथ उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए मुस्लिम अल्पसंख्यकों को विशेष रियायतें प्रदान कीं। वाम मोर्चा को बदनाम करने के लिए कुछ गलतियों, भूलों को, खासकर आदिवासी क्षेत्रों में, बेहद बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है। पश्चिम बंगाल के लोग राजनीतिक तौर पर काफी अधिक सचेत हैं और हम आशा करते हैं कि वे तमाम बातों को समझेंगे और एक मजबूत वाममोर्चा के पक्ष में जनादेश देंगे।

केरल एक ऐसा राज्य है जहां एलडीएफ ने ऐसे अनेक सकारात्मक कार्यक्रम चलाये हैं जिनसे जनता को, खासकर गरीबों एवं मध्यवर्ग के लोगों को फायदा पहुंचा है। केरल में देश की सबसे अच्छी सार्वजनिक वितरण प्रणाली है जिसके जरिये चावल दो रूपये किलो दिया जाता है और गरीबी रेखा के नीचे के लगभग 35 लाख परिवारों को खाद्य तेल, दाल और लगभग दो दर्जन आवश्यक वस्तुएं आपूर्ति की जाती हैं। गरीबी की रेखा से ऊपर के अन्य 40 लाख परिवारों को 50,000 सहकारी दुकानों के जरिये बाजार दर से 15 से 40 प्रतिशत की कम कीमत पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की जाती है। इस अवधि में गरीबों के लिए साढ़े तीन लाख मकान बनाये गये, एम.एन. आवास योजना के मकानों पर प्रति मकान एक लाख रूपये खर्च कर एक लाख पुराने मकानों की मरम्मत कराई गयी और उन्हें बड़ा बनाया गया। केरल देश का एक अकेला राज्य है जहां किसान कर्ज राहत कमीशन का गठन किया गया और कर्ज राहत देकर किसानों को संकट से बचाया जाता है। केरल के मछुआरों की काफी बड़ी आबादी है, उन्हें 300 करोड़ रूपये की कर्ज राहत दी गयी। इस कर्ज राहत का फायदा 80,000 मछुआरों को मिला। जहां जमीन कम है वहां और अधिक जमीन को धान की खेती के तहत लाया गया।

केरल को इसका भी श्रेय है कि वहां सुशासन है, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन है, सबसे अच्छे साम्प्रदायिक सम्बंध हैं और कानून एवं व्यवस्था की स्थिति अच्छी है।

यह हैरानी की बात है कि चुनाव आयोग ने गरीबी की रेखा के ऊपर के लोगों को भी दो रूपये किलो राशन के दायरे में लाने की इजाजत केरल सरकार को नहीं दी हालांकि इसका फैसला चुनाव संहिता के लागू होने से पहले बजट अधिवेशन के दौरान ही घोषित किया जा चुका था। यही बात ममता बनर्जी पर लागू नहीं की गयी जिन्होंने छात्राओं को रेलों में मुफ्त सफर करने की घोषणा की। अलग-अलग पैमाने - इससे भारत के चुनाव आयोग की अच्छी छवि देश के सामने नहीं जायेगी। उसे अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

एलडीएफ के राजनैतिक अभियान को केरल में उत्साहपूर्ण समर्थन मिल रहा है, एलडीएफ के दो जत्थों ने सभी 140 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया। उन्हें जनता का भरपूर समर्थन और प्यार मिला। क्रीम पार्लर सेक्स घोटाला का, जिसमें पूर्व मंत्री और मुस्लिम लीग के नेता कुन्हाली कुट्टी शामिल हैं, पूर्व मंत्री बाल कृष्ण पिल्लई को एक साल की सजा, जिसकी पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय ने भी की है, पूर्व मंत्रियों पर अन्य मामले - इन तमाम बातों से भ्रष्ट यूडीएफ सरकार का चेहरा पूरी तरह जनता के सामने आ गया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन के भाई और उनके दादाद - जो दोनों ही कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं - कालेधन के साथ पकड़े गये हैं। केरल के पामोलीन घोटाले में शामिल थॉमस की भारत के मुख्य सतर्कता आयुक्त के रूप में नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त किये जाने से केन्द्र की संप्रग सरकार की नाक तो कटी ही केरल में यूडीएफ की छवि भी खराब हुई। केरल के लोग उच्च साक्षर हैं और अत्यंत सचेत हैं। यूडीएफ, मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों, जो केरल की आबादी का 40 प्रतिशत हिस्सा हैं - के राजनैतिक प्रबंधकों पर निर्भर करता है। जनता अपनी पसंद तय करने के मामले में काफी होशियार है। पिछले कुछ महीनों के राजनैतिक घटनाक्रम से निश्चय ही वामपंथ के पक्ष में वातावरण बना है।

तमिलनाडु बहुत हद तक दो द्रविड़ पार्टियों के प्रभाव में है। वामपंथ ने आल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के साथ तालमेल किया है। वामपंथ वहां सीमित संख्या में - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 10 स्थानों पर तथा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) 12 स्थानों पर चुनाव लड़ रही है।

दोनों वामपंथी पार्टियों की छवि है कि वे गरीबों, दबे-कुचले लोगों, किसानों, श्रमिकों और मजदूर वर्ग के लिए लड़ती है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कई संघर्ष किये हैं जिनसे पार्टी की विश्वसनीयता बढ़ी है।

ठीक इसी समय में डीएमके बदनाम हुई, उसकी साख गिरी। वह भ्रष्टाचार का पर्याय बन गयी है। करूणानिधि ने डीएमके को एक पारिवारिक सम्पत्ति बना लिया है। करूणानिधि मुख्यमंत्री हैं, उनका छोटा बेटा स्टालिन उप मुख्यमंत्री है, बड़ा बेटा केन्द्र में कैबिनेट मंत्री है और बेटी राज्य सभा की सदस्य है।

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने - डीएमके नेता और टेली कम्युनिकेशन के मंत्री के रूप में केन्द्रीय कैबिनेट में डीएमके नामजद ए. राजा की गिरफ्तारी ने - डीएमके के भ्रष्ट तौर-तरीकों का पर्दाफाश कर दिया है। अब क्लाइन्गर टीवी में 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के पैसे के प्रवाह के सम्बंध में सीबीआई जांच चल रही है। चुनाव तक वह जांच दिखाने भर के लिए चलेगी क्योंकि हम सभी जानते हैं कि सीबीआई को एक निष्पक्ष सरकारी एजेंसी के रूप में रखने के बजाय उसे अब कांग्रेस पार्टी का एक साधन, एक औजार बना दिया गया है।

पिछले लोकसभा चुनाव में डीएमके ने समूचे तमिलनाडु को भ्रष्ट करने की कोशिश की। अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए उसने अत्यंत शर्मनाक तरीके अपनाये। अंग्रेजी पत्र ‘हिंदू’ द्वारा कुछ वीकीलीक्स दस्तावेजों को प्रकाश में लाया गया है जिसमें अमरीकी राजनयिक द्वारा अमरीकी सरकार को भेजे गये संदेशों से पता चलता है कि तमिलनाडु चनाव मंे किस हद तक भ्रष्टाचार हुआ। भ्रष्टाचार से हमेशा ही फायदा पहुंचे, ऐसा नहीं है। तमिलनाडु की जनता इस भ्रष्ट परिवार के शासन से तंग आ चुकी है और इस अत्यंत बदनाम सरकार को उखाड़ फेंकने में अपनी भूमिका अदा करेगी।

असम में दारोमदार आदिवासियों एवं अल्पसंख्यकों पर

असम में चुनाव के पहले चरण में चुनाव होंगे। राज्य की अनेक विशेषताएं हैं। यह एक ऐसा राज्य भी है जहां अल्पसंख्यकों एवं आदिवासियों का संकेन्द्रण है। वहां नियमित रूप से बाढ़ आती है या बंगला देश से बड़ी संख्या में लोग आ जाते हैं। विद्रोही गतिविधियां और उल्फा द्वारा इक्के-दुक्के हमले वहां की सामान्य बात बन गयी है। अब एक चुनावी चाल के तौर पर, उल्फा बोडो पार्टियों और अल्पसंख्यकों से समर्थन चाहती है। दुर्भाग्य से, असम गण परिषद - जो पहले भाजपा के खिलाफ कोई निश्चित एवं ठोस दृष्टिकोण नहीं अपना सकी थी - इस बार भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन में है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और अन्य वामपंथी पार्टियां अलग से चुनाव लड़ रही हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी असम के लोगों के सच्चे अधिकारों के लिए और शोषण के विरूद्ध हमेशा ही संघर्ष करती रही है। राज्य विधान सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधित्व बढ़ने से असम की जनता की ज्वलंत समस्याओं का समाधान सुनिश्चित करने के लिए एक बेहतर संघर्ष करने में मदद मिलेगी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 19 स्थानों पर चुनाव लड़ रही है।

पुडुचेरी में भाकपा का अच्छा रहेगा प्रदर्शन

तमिलनाडु के साथ ही पुडुचेरी में भी चुनाव हो रहा है। यह फ्रांसीसी उपनिवेश, जिसने फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के साथ संघर्ष किया, भारतीय संघ में कुछ देर बाद शामिल हुआ। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यहां मजदूरों और दबे-कुचले लोगों के लिए समझौताविहीन तरीके से संघर्ष करती आयी है और जनता के मध्य पार्टी की एक अच्छी छवि रही है और उसे जनता का समर्थन रहा है।

शासक पार्टी कांग्रेस को पूर्व मुख्यमंत्री रंगासामी के कांग्रेस से बाहर निकल जाने से एक झटका लगा है। तमिलनाडु की राजनीति का पुडुचेरी में भी असर पड़ेगा। पिछले कार्यकाल में पुडुचेरी में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायकों ने अच्छा काम किया है। अतः पार्टी को आशा है कि विधान सभा में पार्टी के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी होगी।

सामान्यतः राज्य विधान सभा के चुनावों में राज्य एवं स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर इस बार राष्ट्रीय राजनीति का भी इन चुनावों में बड़ी हद तक असर पड़ेगा। इन उपरोक्त पांच राज्यों में असम के सिवा भाजपा कहीं नहीं है। अन्य राज्यों में उसका अभी तक खाता नहीं खुला है और अब भी वह संभव नहीं है।

इन सभी पांच राज्यों में कांग्रेस और वामपंथ तथा कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियां मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं। संसद के चुनावों के बाद दो वर्षों तक संप्रग-दो का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस बड़े जोश में थी। दूसरे बार की विजय ने उसमें अहंकार पैदा कर दिया और इस तरह वह आम जनता से पूरी तरह अलग-थलग हो गयी। अभूतपूर्व भ्रष्टाचार, कांग्रेस नेताओं-मंत्रियों के घपले-घोटालों ने इस पार्टी को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है, उसकी छवि और प्रतिष्ठा धूल में मिल गयी है। खाद्यान्नों एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। महंगाई और मुद्रास्फीति बढ़ रही है। बढ़ती बेरोजगारी नई ऊंचाईयों पर पहुंच गयी है। लोगों में भारी आक्रोश है। पिछले दो वर्षों में दो बार ”भारत बंद“ हुए, मजदूरों की एक राष्ट्रीय हड़ताल हुई, सरकार के विरूद्ध अनेकानेक विराट रैलियां हुईं। सरकार के हर जनविरोधी कदम का विरोध हो रहा है।

कांग्रेस और संप्रग-दो की जनविरोधी नीतियों को शिकस्त देने के लिए और भ्रष्टाचार को पूरी तरह नकारने के लिए इन सभी पांचों राज्यों में कांग्रेस को शिकस्त देना एक राजनैतिक जरूरत है। वक्त का तकाजा है कि कांग्रेस को हटाया जाये।

- एस. सुधाकर रेड्डी

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