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शनिवार, 26 मार्च 2011

फ़ैज़ की जन्मशती - एक साल चलने वाले समारोहों का शानदार आगाज़


उर्दू के क्रांतिकारी शायर फै़ज़ की जन्मशती के सिलसिले में एक साल चलने वाले समारोहों की शुरूआत दिल्ली में दो दिन के कार्यक्रम से हुई जिसका उद्घाटन भारत की प्रथम नागरिक प्रतिभा पाटिल ने किया और इसके साथ ही देश के विभिन्न भागों में प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) समेत - जिनके निर्माण में स्वयं फै़ज़ की एक प्रमुख भूमिका थी - विभिन्न सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संगठनों द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों का सिलसिला भी शुरू हो गया।

उद्घाटन कार्यक्रम का आयोजन 25 फरवरी को दिल्ली के विज्ञान भवन में किया गया जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्र की लब्धप्रतिष्ठित हस्तियों ने हिस्सा लिया। उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि थे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ए.बी. बर्धन। इस कार्यक्रम के लिए पाकिस्तान से लगभग दो दर्जन लेखक, शायर एवं कलाकार खासतौर पर आये। उनमें फै़ज़ की दोनों बेटियां-सलीमा और मुनीज़ा भी शामिल थी।

जन्मशती समारोहों का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पटिल ने सही ही कहा कि “कुछ लोग अपने देश की सीमाओं और समय से परे जीवित रहते हैं और काम करते हैं। फैज ऐसे ही चंद लोगों मंे थे।” प्रख्यात शायर के योगदान का स्मरण करते हुए राष्ट्रपति ने स्वतंत्रता संग्राम और साथ ही देश की धर्मनिरपेक्ष राज्य व्यवस्था में उर्दू भाषा के योगदान की याद दिलायी।

प्रतिभा पाटिल ने यह भी कहा कि “फै़ज़ ने गालिब की परम्परा को आगे बढ़ाया। कहा जाता है कि यदि शब्दों में आत्मा होती तो गालिब शब्दों के भगवान होते और फै़ज़ उनके मसीहा होते।”

क्रांति के इस शायर के बारे मंे बोलते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ए.बी. बर्धन ने फै़ज़ के साथ अपनी उस मुलाकत की याद ताजा की जब उनकी कथित भूमिका के लिए मनगढ़ंत रावपिंडी साजिश केस से रिहा होने के बाद फै़ज़ भारत के दौरे पर आये थे। ग़ज़लों की महारानी इकबाल बानों की आवाज से अमर यादगार बनी फै़ज़ की मशहूर नज़्म ‘हम भी देखेंगे...’ का जिक्र करते हुए बर्धन ने कहा कि हमें गर्व है कि फै़ज़ एक मार्क्सवादी थे। आईसीसीआर के अध्यक्ष डा. कर्ण सिंह ने कहा कि फै़ज़ जैसे महान कवियों के शब्द अमर हो जाते हैं। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि “फै़ज़ की शायरी सीमा पार के लोगों के साथ जुड़ने के लिए एक पुल का काम करेगी।”

अंजुमन तरक्कीपसंद मुस्सन्फीन के महासचिव डा. अली जावेद ने अतिथियों का स्वागत करते हुए साल भर चलने वाले कार्यक्रमों का ब्यौरा दिया। पाकिस्तान मंे उद्घाटन कार्यक्रम पहले ही फै़ज़ के जन्मदिन 13 फरवरी को हो चुका है। पाकिस्तान प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (पीडब्लूए) ने अन्य संगठनों के साथ मिल कर साल के अंत तक विभिन्न शहरों में हर पन्द्रह दिन में एक कार्यक्रम करने का मंसूबा बनाया है। इसी प्रकार पीडब्लूए-भारत, जर्मनी, रूस और कनाडा ने भी इस वर्ष के दौरान यादगार कार्यक्रम करने के लिए तय किया है।

इस अवसर पर पाकिस्तान की टीना सानी द्वारा गायी गयी फै़ज़ की गज़लों एवं नज़्मों की एक काम्पेक्ट डिस्क भी जारी की गयी। प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा फै़ज़ के संबंध मंे एक 20 मिनट की डाक्यूमेंटरी फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया।

उद्घाटन सत्र के बाद पाकिस्तान से आये मेहमानों के साथ बातचीत का दौर चला। इसमें फै़ज़ की दोनों बेटियां और पीडब्लूए पाकिस्तान के महासचिव राहत सईद भी शामिल थे। डा. अली इमाम, शायरा किश्वर नाहीद एवं अन्य ने फै़ज़ और उनके कृतित्व पर अपने विचार व्यक्त किये। उन सभी का मानना था कि फै़ज़ एक प्रतिबद्ध कवि थे जिन्होंने अपनी शायरी को मेहनतकश लोगों की जिंदगी के रोजमर्रा के संघर्षों के साथ जोड़ा। पाकिस्तान सरकार के, खासकर एक के बाद आने वाली दूसरी फौजी सरकारों के जबर्दस्त दमन के बावजूद वह अपनी विचारधारा - मार्क्सवाद - लेनिनवाद की अपनी प्रतिबद्धता से कभी नहीं हटे। वह सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयवाद के सिद्धातंों पर चलने वाले सच्चे व्यक्ति थे। उन्होंने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान समेत विश्व भर के संघर्षरत लोगों की एकता के लिए अथक काम किया। एफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन के मुखपत्र ‘लोटस’ के संपादक के रूप में उन्होंने विकासशील देशों के ध्येय की हिमायत की और तीसरी दुनिया के लेखकों और बुद्धिजीवियों को एकताबद्ध करने के लिए शानदार कोशिशें की। फिलिस्तीन पर उनकी नज्में स्वतंत्रता एवं समाजवाद के लिए संघर्षरत लोगों को हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी।

इस समारोह के आकर्षण का केन्द्र थे कैप्टन जफरूल्ला पोशानी जो उन दिनों पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सज्जाद जहीर और कुछ फौजी अफसरों के समेत फै़ज़ के साथ मनगढ़ंत रावलपिंडी साजिश केस के मुल्जिम थे। उन्होंने पांच वर्ष जेल में काटे। अपने जेल प्रवास के उन पांच वर्षों को याद को उन्होंने एक दिलचस्प किताब “जिंदगी जिंदादिली का नाम है” में कलमबद्ध किया है। पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल मंे शामिल अन्य हस्तियां थींः एक प्रख्यात वकील और पाकिस्तान वर्कर्स पार्टी के महासचिव आबिद हुसैन मिंटो, बलूचिस्तान नेशनल पार्टी के ताहिर बेजेंजों, युसफ सिंधी, मुश्ताक फूल, गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति डा. निजामुद्दीन, इमदाद आकाश, शोएब मोहिउद्दीन अशरफ।

सिटी फोर्ट आडिटारियम में पाकिस्तान से आयी टीना सामी और भारत के जगजीत सिंह ने जब फै़ज़ की ग़ज़लें और नज़्में गायीं तो हजारों श्रोता झूम उठे और वह एक यादगार शाम बन गयी।

अगले दिन फिक्की आडिटोरियम में एक सेमिनार किया गया। सेमिनार के पहले सत्र के मुख्य वक्ता थे डा. एजाज अहमद। योजना आयोग की सदस्य डा. सईदा हमीद ने सेमिनार की अध्यक्षता की। दूसरे सत्र की अध्यक्षता पाकिस्तान से आयी मेहमान डा. किश्वर नाहीद ने की। अशोक वाजपेयी मुख्य वक्ता थे। रखशंदा जलील, जिन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के इतिहास पर अनुसंधान किया है, ने दोनों सत्रों का संचालन किया।

सेमिनार के दो सत्रों मंे जिन प्रमुख लोगों ने हिस्सा लिया उनमें शामिल थेः डा. राजेन्द्र शर्मा (भोपाल), डा. रमेश दीक्षित (लखनऊ), मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (जनवादी लेखक संघ), हारून बीए (मालेगांव), अपूर्वानंद, जावेद नकवी (दिल्ली) और पाकिस्तान से आये कैप्टन जफरूल्ला पोशानी, युसुफ सिंधी, सलीमा हाशमी और डा. आलिया इमाम।

शाम को फिक्की आडिटोरियम में एक शानदार मुशायरा हुआ जिसमें भारत और पाकिस्तान के शायरों ने अपनी गज़ले-नज़्मंे सुनायी। उनमें शामिल थेः आलिया इमाम, डा. किश्वर नाहीद, वसीम बरेलवी, शहरयार, मेहताब हैदर नकवी आदि।

2 मार्च को लखनऊ में और 5 मार्च को हैदराबाद में भी गज़ल कार्यक्रमों के आयोजन किये गये। दोनों स्थल पर गज़ल कार्यक्रमों से पहले शायरों, लेखकों और बुद्धिजीवियों के बीच बातचीत हुई, सेमिनार हुए। लखनऊ के कार्यक्रम का उद्घाटन लखनऊ विश्वविद्यालय के उपकुलपति मनोज कुमार मिश्रा ने किया और डा. रूपरेखा वर्मा ने अध्यक्षता की। लखनऊ के कार्यक्रम मंे शकील अहमद सिद्दीकी, अनीस अशफाक, रमेश दीक्षित, शारिब रूदोलवी, आबिद सुहैल, मुद्राराक्षस और नसीम इक्तदार अली आदि शामिल थे।

हैदराबाद के उर्दू हाल में आयोजित कार्यक्रम की प्रख्यात व्यंग्यकार मुज़तबा हुसैन, संसद सदस्य अज़ीज़ पाशा और अंजुमन तरक्की-ए-उर्दू के राज्य अध्यक्ष ने की। इस कार्यक्रम में डा. बेग इलियास, बी. नरसिंग राव, रहीम खान, नुसरत मोहिउद्दीन, अली जहीर, तस्नीम जौहर, अवधेश रानी गौड़ एवं अन्य ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के प्रारंभ में डा0 अली जावेद ने वर्ष भर चलने वाले कार्यक्रमों के संबंध में विस्तार से बताया।

इससे पहले सभी मेहमानों ने टैंक बंद तक मार्च किया और मखदूम मोहिउद्दीन और श्रीश्री की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया। 7 मार्च को पाकिस्तानी मेहमानों ने हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दौरा किया और वहां के शिक्षकों एंव छात्रों से बातचीत की।

इसी प्रकार का कार्यक्रम उर्दू एकेडमी, पंजाबी लिखाड़ी सभा और पीडब्लूए के सहयोग से 11 मार्च को चंडीगढ़ में भी किया जायेगा।

- डा. अली जावेद

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