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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

डा. कमला प्रसाद - हमें हताश कर गया है उनका जाना


प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव प्रख्यात आलोचक डा. कमला प्रसाद का न रहना हिन्दी-उर्दू साहित्य तथा प्रगतिशील जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन के कार्यकर्ताओं-शुभचिन्तकों के लिए किसी बड़े आघात की तरह है। यह उनकी लोकप्रियता के कारण ही है कि उनके निधन के समाचार से व्यापक साहित्यिक सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गयी। शोक की इस बेला में वैचारिक सांगठनिक सीमाएं बेमानी हो गयीं। उन्होंने बहुत कम समय में देश के सुदूर अंचलों तक जो लोकप्रियता अर्जित की थी, कठिन परिश्रम, निरन्तर सक्रियता तथा दृष्टिगत उदारता के बिना वह संभव नहीं है। उदारता जो वैचारिक विचलन का प्रमाण न हो। उन्हें “कमाण्डर” की प्यार भरी उपाधि इसी कारण मिल पायी कि वह सदैव रहनुमाई के लिए तैयार रहते। लक्ष्य की कठिनाई उन्हें हताश नहीं कर पाती। मैंने उन्हें कभी हताश और निराश नहीं देखा। थक कर बैठ जाने की मनः स्थिति में भी वह कभी नहीं दिखे। हालत यह थी कि स्वास्थ्य की चिंता किये बिना वह काम करने को प्राथमिकता देते। दूर की यात्राएं करते।

यहां तक कि अपने रचनाकार व्यक्तित्व की प्राथमिकताओं तक को उन्होंने संगठन व आन्दोलन के विस्तार की चिंता में तिलांजलि दे दी थी। वह प्रखर आलोचक थे, उनकी बुनियादी पहचान आलोचक के रूप में ही थी, इस रूप में उन्होंने कई मूल्यवान कृतियां हिन्दी को दीं। प्रगतिशील लेखक संघ की स्वर्ण जयंती के अवसर पर उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक “प्रगतिशील आलोचना” की मांग आज भी बनी हुई है। ठीक उसी तरह जैसे साहित्य शास्त्र, छायावाद प्रकृति और प्रयोग छायावादोत्तर काव्य की सामाजिक सांस्कृतिक, आधुनिक हिन्दी कविता और आलोचना की द्वन्दात्मकता, समकालीन हिन्दी निबन्ध मध्ययुगीन रचना और मूल्य आलोचक और आलोचना तथा इन जैसी कुछ अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों से हम उनके योगदान का अनुमान लगा सकते हैं। यह योगदान तब अधिक व्यापक हो जाता है जब हम उनके कुशल सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका वसुधा के विशेषांकों पर नज़र डालते हैं। समकालीन जीवन के तक़रीबन सभी ज्वलन्त मुद्दों पर उन्होंने यादगार विशेषांक प्रकाशित किये। विभिन्न भाषाओं के साहित्य पर केन्द्रित विशेषांकों की उन्होंने जैसे एक श्रृंखला ही खड़ी कर दी। उर्दू साहित्य पर उन्होंने दो अंक केन्द्रित किये। जिनका व्यापक स्वागत हुआ।

भाषाई संकीर्णता को तोड़ते हुए विभिन्न भाषाओं के रचनाकारों को साथ लेकर चलने की प्रगतिशील आन्दोलन की गरिमापूर्ण मूल्यवान परम्परा को आगे बढ़ाने में उन्होंने जिस उत्साह का प्रदर्शन किया वह वास्तव में अपूर्व है। जो प्रमाणित करता है कि प्रगतिशीलता की सैद्धांतिकी से प्रतिबद्ध हुए बिना एसेा कर पाना संभव नहीं। यह उनके प्रतिबद्ध व्यक्तित्व का ही चमत्कार था कि दो वर्ष पूर्व बिहार के बेगूसराय जिले के गोदर गोवा में प्रगतिशील लेखक संघ का सफ़ल अधिवेशन सम्पन्न हो सका। जिसमें अनेक भारतीय भाषाओं के साथ ही बंगलादेश के लेखकों का प्रतिनिधिमण्डल भी शरीक हुआ। जनवादी लेखक संघ तथा जनसंस्कृति मंच के प्रतिनिधि भी वहां मौजूद थे। आंचलिक भाषाओं के लेखकों का उस अधिवेशन की ओर आकृष्ट होना एक बड़ी घटना थी, शिथिल पड़ते प्रगतिशील आन्दोलन में उन्होंने अपनी सक्रियता से जैसे नये प्राण फूंक दिये थे। जिसके सबसे ज्यादा उत्तेजक दृश्य मध्य प्रदेश में दिखाई पड़े। वहां के सुदूर अंचलों तक में प्रगतिशील लेखक संघ की न केवल इकाइयां गठित हुई बल्कि उन्होंने अपनी सक्रियता भी बनाये रखी; यहां भी कमला प्रसाद जी की उस सांस्कृतिक समझ का प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है, जो स्थानीय - आंचलिक सांस्कृतिक विशिष्टताओं तथा रचनाकारों से गहरे सामंजस्य की सीख देती है। वैचारिक संकीर्णता का अतिक्रमण करते हुए संयुक्त प्रयास-साझा मंच इस सांस्कृतिक समझ का अनिवार्य अंग है। यह तथ्य बहुत लोगों को विस्मित कर सकता है कि प्रगतिशील लेखक संघ के स्वर्ण जयंती आयोजन (अप्रैल 1986) में उर्दू-हिन्दी लेखकों के बीच विवाद व कटुता की स्थिति बन जाने के बावजूद उन्होंने इस घटना के थोड़े दिनों बाद ही भोपाल में फै़ज़ अहमद फै़ज़ परएक भव्य-विचारपूर्ण समारोह आयोजित कर दिखाया; हिन्दी-उर्दू लेखकों का ऐसा शानदार समागम मैंने बहुत कम देखा है। एक ही मंच पर दो भाषाओं के दिग्गजों के बीच पाकिस्तान व दूसरे देशों से आये रचनाकार। यह भी वह ही कर सकते थे कि इतने महत्वपूर्ण आयोजन में उन्होंने मुझ जैसे साधारण व्यक्ति को आलेख प्रस्तुत करने का सम्मान दिया। शिव मंगल सिंह सुमन, त्रिलोचन शास्त्री, मजरूह सुल्तानपुरी भगवत रावत और शफ़ीका फ़रहत की सक्रियता कार्यक्रम को अतिरिक्त गरिमा प्रदान कर रही थी। सज्जाद जहीर की जन्म शताब्दी को भी उन्होंने जिस गहरे आत्मीय भाव से संगठन व आन्दोलन के विस्तार का आधार बनाने का स्वप्न देखा वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लगातार दो वर्ष तक देश के विभिन्न अंचलों में जन्मशताब्दी आयोजनों का सिलसिला विस्मृति के धुंधलके में जाते सबके प्यारे बन्ने भाई को जैसे नया जीवन दे गया। विभिन्न साहित्यिक सांस्कृतिक मुद्दों पर जीवन्त बहस की वह यादगार बेला थी। इस अवसर पर ‘वसुधा’ के संग्रहणीय विशेषांक का प्रकाशन भी बड़ी घटना के रूप में देखा गया। किसी पत्रिका को सांगठनिक वैचारिक तथा सृजनात्मक उद्देश्यों के पक्ष में समान निष्ठा व उद्वेग से इस्तेमाल करने से ऐसे उदाहरण विरल ही होते हैं। जहां विचार गुणवत्ता को स्खलित नहीं करते नई उठान देते हैं। उन्होंने प्रतिबद्धता के दबाव में पत्रिका की स्तरीयता को कभी प्रभावित नहीं होने दिया। सन् 2011 में पड़ने वाली हिन्दी-उर्दू के कई विद्धानों कवियों की जन्म शताब्दी को लेकर भी वह काफ़ी उत्साहित थे। वसुधा तथा सांगठनिक सर्कुलरों के माध्यम से वह प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े लोगों का इन शताब्दियों को बड़े पैमाने और संयुक्त रूप से आयेाजित करने का आह्वान कर रहे थे। चिंता एक ही थी कैसे ज़्यादा से ज़्यादा व नये आते हुए रचनाकारों को संगठन व आन्दोलन से जोड़ा जाये। कैसे प्रगतिशील आन्दोलन की उपलब्धियों के योगदानों और उससे जुड़ी ऐतिहासिक विभूतियों से नई पीढ़ी को परिचित कराया जा सके और कैसे इस बहाने आज के जरूरी मुद्दों पर सार्थक संवाद-विमर्श संभव हो सके। इस संन्दर्भ में प्रगतिशील आन्दोलन से शुरूआती जुडाव के बाद करीब-करीब उसके विरोधी हो गये उपन्सासकार और कवि हीरानन्द वात्साययन अज्ञेय को साथ जोड़कर चलने की उनकी सलाह का विशेष महत्व है कि अज्ञेय का भी यह जन्म शताब्दी वर्ष हैं इसके विपरीत कलावादियों ने अपने कार्यक्रम फ़ोल्डर में अज्ञेय और शमशेर बहादुर सिंह को ही प्रमुखता दी। कमला प्रसाद ने अपने दृष्टिकोण तथा सक्रियता से साबित किया कि संस्कृति व कला की वास्तविक रक्षा व चिंता प्रगतिशील वजन की नज़रिये के लोग ही कर सकते हैं।

उन्हें एक चिंता लगतार सताती थी कि दक्षिण भारत के रचनाकारों से कैसे उत्तर व पूर्वी भारत के रचनाकारों का जीवन्त संवाद संभव हो सके, कैसे संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन को दक्षिण के किसी राज्य में संभव बनाया जा सके। दो माह पूर्व ही कालीकट में राष्ट्रीय समिति की बैठक तथा आगामी राष्ट्रीय अधिवेशन केरल में ही करने का प्रस्ताव इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ियां है। जुझारू प्रतिबद्धता तथा दृष्टिकोण की व्यापकता वाले ऐसे व्यक्ति का अचानक चिरविदा ले लेना हम सब को हतप्रभ व हताश कर गया है।
- शकील सिद्दीकी

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