भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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बुधवार, 10 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 5

आजादी का दिन
जनवरी से अगस्त 1947 भारतीय स्वतंत्रता के लिए गहन राजनैतिक
गतिविधियों से परिपूर्ण कठिन समय था। यह ए0आई0एस0एफ0 की संयुक्त जन कार्यवाहियांे का समय था। बम्बई के प्रांतीय गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने 22 जुलाई को छात्रों की एक बैठक पर रोक लगा दी तो बम्बई के 60000 छात्र हड़ताल पर चले गए। इसके समर्थन में बनारस और कानपुर में भी बडी हड़तालों का आयोजन किया गया।
14-15 अगस्त की रात को लाल किले से ब्रिटिश यूनियन जैक उतर गया और उसकी जगह तिरंगे ने ले ली। आखिरकार भारत की आजादी का दिन आ ही गया। ए0आई0एस0एफ0 ने भी विभिन्न संगठनों और देश के साथ मिलकर आजादी के उत्सव में हिस्सेदारी की। दिल्ली में स्टूडेन्ट्स कांग्रेस के साथ मिलकर ए0आई0एस0एफ0 ने लार्ड डरविन की मूर्ति पर चढ़कर उसके मुँह पर कालिख पोती और ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पुत्तला फूँका। यह आजादी का वह उत्सव था जिसके लिए संघर्ष में आर0एस0एस0 जैसे संगठनों ने बाधाएँ खड़ी करने के अलावा कोई योगदान नहीं दिया और अपने कुत्सित प्रयासों को उन्होंनें साम्प्रदायिक सद्भाव खत्म करने के तौर पर जारी रखा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद छात्र आन्दोलन
आजादी के वातावरण में नई उम्मीदंे, नए सपने और नई महत्वकांक्षाएँ जन्म ले रही थीं। इस समय नए नेतृत्व के सामने विकास का एक ऐसा रोडमैप तैयार करने की चुनौती थी जिस पर चलकर विकास की निर्धारित मंजिल तक पहँुचा जा सके। स्टूडेन्ट्स फैडरेशन ने औद्योगिकीकरण की योजनाओं के साथ ही नया प्रशासनिक ढ़ाँचा तैयार करने में भरपूर योगदान किया। छात्र फैडरेशन ने सांमतशाही के खिलाफ देश की अखण्डता और रियासतों के विलय के सवालों पर उठे आन्दोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। चाहे औरंगाबाद का संघर्ष हो या निज़ाम हैदराबाद के खिलाफ लड़ाई, छात्रों ने संघर्षों में एक जुझारू भूमिका अदा की। हैदराबाद स्टूडेन्ट्स फैडरेशन ने तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर शिरकत की। ए0आई0एस0एफ0 के 400 छात्रों ने गुरिल्ला लड़ाई में सामंतशाही को खत्म करने के लिए भाग लिया। हालाँकि यह संघर्ष आजादी के बाद भी जारी रहा और अन्ततोगत्वा हैदराबाद की जनता ने नई भारतीय सरकार का साथ दिया।
ग्यारहवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का ग्यारहवाँ सम्मेलन दिसम्बर 1947 में हुआ। बम्बई के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने सम्मेलन के पहले दिन 28 दिसम्बर को इस पर
प्रतिबंध लगा दिया। सम्मेलन गुप्त रूप से सम्पन्न हुआ जिसमें 1500 प्रतिनिधियों और पर्यवेक्षकों ने भाग लिया। परन्तु संगठन की कार्यकारिणी को आम सभा और रैली करने की इजाजत नहीं मिल पाई। फिर भी नेतृत्व ने प्रतिबंध को तोड़कर कार्यक्रम करने का निर्णय किया जिस के कारण छात्रों को लाठीचार्ज और गोलीबारी का सामना करना पड़ा। इस पुलिस ज्यादती के खिलाफ ए0आई0एस0एफ0 ने 9 जनवरी को विरोध दिवस के रूप में मनाया। सरकार की ज्यादतियों की दुनिया भर में निन्दा हुई दुनिया के कई छात्र एवं युवा संगठनों ने सरकार के इस कृत्य की आलोचना की। ए0आई0एस0एफ0 ने आजादी के फौरन बाद से ही छात्र और देशहित की लड़ाई जारी रखी। चाहे वह फीस वृद्धि का सवाल हो, शिक्षा के जनवादीकरण का या सांप्रदायिकता से लड़ने का ए0आई0एस0एफ0 ने अन्य जनवादी धर्मनिरपेक्ष छात्र संगठनों के साथ मिलकर संघर्ष जारी रखा।

बारहवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का बारहवाँ सम्मेलन 23-27 जुलाई को कलकत्ता में सम्पन्न हुआ। 80 हजार सदस्यों के प्रतिनिधियों के तौर पर सम्मेलन में 340 छात्रों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में संगठन ने एक दुस्साहसिक और संकीर्णतावादी दिशा में बढ़ने का निर्णय किया। इस निर्णय द्वारा संगठन ने आजादी के स्वागत को छोड़कर उसके खिलाफ खड़ा होने की दिशा ली। संगठन ने संकीर्णतावादी नारा दिया देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है। संगठन के इस कदम से ए0आई0एस0एफ0 छात्रों के बीच अलग-थलग पड़ गया। तमाम असहमतियों के बावजूद देश की जनता हथियार उठाकर नेहरू सरकार को उखाड़ फंेकने के लिए अभी तैयार नहीं थी क्योंकि जनता अभी तक आजादी का स्वागत कर रही थी। दरअसल यह आत्मघाती कदम अति वामपंथी बी0टी0आर0 लाइन के कारण था।
ए0आई0एस0एफ0 ने अपनी दिशा और गतिविधियों में सुधार किया। संगठन ने तय किया कि उसे छात्रांे की समस्याओं पर ही अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। ए0आई0एस0एफ0 ने अब छात्रों की शैक्षिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करते हुए जन आंदोलन के निर्माण का काम शुरू किया। यह देश को एक नए व वैकल्पिक विकास के रास्ते पर ले जाने की तरफ बढ़ने में ए0आई0एस0एफ0 की भागेदारी का प्रयास था।
1950 में भारत के एक गणराज्य बनने की घोषणा और नया संविधान लागू हो जाने के साथ ही देश के विकास की संभावनाओ के लिए नई राहें और आशाएँ बन रही थीं। युवा और छात्र आन्दोलन के विकास की भी नई राहंे बन रही थीं जिसके लिए नए रास्ते और नए तरीकों की आवश्यकता थी। यह समय पूरे देश में एक नए जनवादी ढाँचे के तैयार होने का था। पूरे देश में छात्र संघांे का निर्माण हो रहा था जिसमें ए0आई0एस0एफ0 ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
तेरहवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का तेरहवाँ सम्मेलन 1-5 जनवरी 1953 को हैदराबाद में हुआ। एक लाख से अधिक की सदस्यता के आधार पर सम्पन्न इस सम्मेलन में देश भर से 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन के बाद संगठन ने देश भर में छात्र संघों के निर्माण के लिए और फीस बढ़ोत्तरी के खिलाफ आन्दोलन चलाए। इस दौरान पुलिस द्वारा दिसम्बर 1953 को डाॅ0 जगदीश लाल की हत्या कर दिए जाने के खिलाफ राज्य भर में आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। वहीं 1954 में शैक्षिक संस्थानो की स्वायŸाता बचाने के लिए और यू0पी0 यूनिवर्सिटी बिल के खिलाफ भी यू0पी0 में बड़ा आन्दोलन ए0आई0एस0एफ0 के नेतृत्व में हुआ।
चैदहवाँ सम्मेलन और गोवा मुक्ति संग्राम
ए0आई0एस0एफ0 का चैदहवाँ सम्मेलन 5-8 जनवरी 1955 में लखनऊ में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में पुर्तगाली दासता से गोवा की मुक्ति का प्रश्न छाया रहा। ए0आई0एस0एफ0 ने देश के छात्रों से बड़ी संख्या में गोवा के मुक्ति संघर्ष में शामिल होने का आवाह्न किया। ए0आई0एस0एफ0 और समाजवादी युवक सभा ने संयुक्त रूप से 12 जुलाई को दिल्ली में गोवा मुक्ति के लिए कार्यक्रम आयोजित किया। 9 अगस्त 1955 को ‘पुर्तगालियों भारत छोड़ो’ दिवस के रूप में मनाया गया। वहीं 3 अगस्त 1955 को 59 कम्युनिस्टों सहित 250 स्वयंसेवकों ने गोवा में प्रवेश किया। जहाँ पुर्तगाली सैनिकों ने उन पर गोलीबारी की और इसमें दो कम्युनिस्ट वी0 के0 थोराट और नित्यानन्द साहा शहीद हुए। इस गोलीबारी के खिलाफ देश भर में छात्र हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लग गई जिसमें चार लाख से भी अधिक छात्रों ने भाग लिया। देश भर से लोग गोवा में दाखिल होने के लिए उमड़ पड़े। गोवा की सीमा पर इन सत्याग्रहियों का साथ देने के लिए ए0आई0एस0एफ0 के महासचिव सुखेन्दु मजूमदार के साथ छात्र नेता सी0 के0 चन्द्रप्पन भी मौजूद थे। इसके बाद 16 अगस्त को दिल्ली में एक बड़ी रैली आयोजित की गई जिसमें 2 लाख छात्रों ने भाग लिया।
12 अगस्त 1955 को पटना के0बी0एन0 काॅलेज के छात्रों और राज्य परिवहन सेवा के कर्मचारियों के बीच एक छोटी सी झड़प ने एक बडे़ देशव्यापी जनांदोलन का रूप धारण कर लिया। दरअसल पुलिस ने इस पूरे मामले में गलत तरीके से हस्तक्षेप करते हुए छात्रों पर बर्बरतापूर्वक हमला किया। इस हमले में काॅलेज प्रांगण में एक छात्र दीनानाथ की मौत हो गई, जिसके बाद विरोध की आग पूरे बिहार और फिर पूरे देश में फैल गई। इस बर्बर पुलिस कार्यवाही के विरोध में 14 अगस्त को बिहार भर में विरोध प्रदर्शन और सभाएँ आयोजित की र्गइं। जिस पर पुलिस ने गोलीबारी की जिसमें कई छात्रों ने अपनी जानें गँर्वाइं। सरकार की इस कार्यवाही के खिलाफ 15 अगस्त को तिरंगे की जगह काला झण्डा फहराकर विरोध प्रकट किया गया। इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी सहित कई पार्टियों ने विरोध सभाएँ और प्रदर्शन करके अपने विरोध का इज़हार करते हुए इस ऐतिहासिक जनांदोलन में शिरकत की।
1959 में बंगाल ने भयावह भुखमरी और खाद्य संकट का सामना किया। खाद्य संकट का प्रमुख कारण राज्य सरकार की अदूरदर्शिता पूर्ण नीतियाँ थीं जिनका ए0आई0एस0एफ0 ने जबरदस्त विरोध किया। इस संकट से निपटने के लिए वामपंथी पार्टियांे एवं संगठनों ने अकाल एवं मूल्य वृद्धि के खिलाफ कमेटी का गठन किया। खाद्य संकट के खिलाफ गुस्सा और जनाक्रोश फूट पड़ा। बंगाल के मुख्यमंत्री बी0सी0 राय ने 20 अगस्त से होने वाले आंदोलन को वापस लेने की अपील की जिसे कमेटी ने खारिज कर दिया। सरकार ने आंदोलन से पहले रातो-रात आंदोलन के अगुवा नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। तत्पश्चात कमेटी ने 31 अगस्त को एक बड़ी रैली आयोजित करने का निर्णय किया। ट्रेड यूनियनांे ने भी 3 सितम्बर को आम हड़ताल करने का निर्णय किया। अब डाॅ0 बी0सी0 राय ने बर्बरता पूर्वक इस आन्दोलन को कुचलने के प्रयास शुरू कर दिए। लाठी, गोली, आँसू गैस और दमन के सभी तरीकांे का इस्तेमाल किया। परन्तु सरकार के सारे हथकण्डे विफल रहे, आन्दोलन दिनो दिन तेज होता गया। लाखों लोग सड़कांे पर उतर आए और छात्रों ने प्रत्येक गाँव कस्बे और शहरों में इस आंदोलन में आगे बढ़कर हिस्सेदारी की। यह बंगाल के छात्रों और जनता के संघर्षांे का गौरवशाली और ऐतिहासिक आंदोलन था।
ए0आई0वाई0एफ0 की स्थापना
आजादी के बारह वर्ष बीत जाने के बाद भी युवाआंे के सामने बेरोजगारी और शिक्षा के प्रश्न अभी तक ज्यों के त्यों खडे़ थे। जिसके कारण देश की जनता विशेषकर युवाओं में आक्रोश लगातार बढ़ता ही जा रहा था, इस आक्रोश को संगठित करने के लिए देश के युवाओं के एक संगठन की बड़ी व्यग्रता से आवश्यकता महसूस की जा रही थी। ए0आई0एस0एफ0 और उसके संघर्षांे का लम्बा इतिहास भी देश के युवाओं के लिए एक प्रेरक का काम कर रहा था। ऐसी स्थिति में देश की राजधानी दिल्ली में 28 से 31 मार्च 1959 को देशभर के 11 राज्यों के 250 प्रतिनिधि युवाओं ने एकत्र होकर ए0आई0वाई0एफ0 की स्थापना की। ए0आई0वाई0एफ0 वल्र्ड फैडरेशन आॅफ डेमोक्रेटिक यूथ से सम्बंधित हुआ। सम्मेलन ने प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता बलराज साहनी को अपने पहले अध्यक्ष के रूप में चुना, शारदा मित्रा इसके पहले महासचिव निर्वाचित हुए और साथ ही पी0के0 वासुदेवनायर को संगठन की राष्ट्रीय कार्यसमिति का चेयरमैन चुना गया। 1962 के आम चुनावों में कम्युनिस्ट और प्रगतिशील ताकतों ने अच्छा प्रदर्शन किया। जिसमें ए0आई0एस0एफ0 ने भी अपनी सक्रिय भूमिका अदा की। आम चुनावों के बाद सरकार की नीतियों के खिलाफ 1963 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने देश में पहली बार संसद चलो का नारा दिया जिसमें लाखों की संख्या में लोगांे ने भाग लिया। ए0आई0एस0एफ0 की भी इस संसद मार्च में उल्लेखनीय भागेदारी थी।
चीनी आक्रमण
चीनी फौजी टुकडि़यांे ने 1962 में भारतीय सीमा पर चढ़ाई कर दी। यह चीनी आक्रमण भारतीय कम्युनिस्टों, वामपंथी, प्रगतिशील और जनवादी शक्तियों के लिए बड़े संकट का समय था। ए0आई0एस0एफ0 ने इस चीनी हमले की तीखे और साफ शब्दो में निन्दा की। साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस चीनी दुस्साहस की कड़ी भत्र्सना की।

क्रमश:

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