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सोमवार, 14 जनवरी 2013

बलात्कार के खिलाफ जनाक्रोश को भुनाने की कवायद

16 दिसम्बर की रात देश की राजधानी में एक पैरा-मेडिकल छात्रा के साथ बलात्कार की घृणित बहशी हरकत होती है। वह बेचारी तो अब इस दुनियां में नहीं रही लेकिन उसके साथ घटी घटना के फलस्वरूप दिल्ली की सड़कों और उसके बाद पूरे देश की सड़कों पर हुए विरोध प्रदर्शनों ने यह जाहिर किया कि जनता में आक्रोश है। जहां मीडिया ने शुरूआत से ही इसे एक विचारधाराविहीन जनसंघर्ष की संज्ञा देने शुरू कर दिया था, वहीं देश के राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में तमाम लोगों ने इस घटना पर तरह-तरह की अनर्गल प्रतिक्रिया देकर उस जनाक्रोश को भुनाने की अपनी-अपनी तरह की कोशिशें कीं। इन कोशिशों में देखा जाना चाहिए कि जिन संगठनों का यह प्रतिनिधित्व करते हैं, उन संगठनों का महिलाओं के बारे में, महिलाओं के सशक्तीकरण के बारे में और उनकी अस्मिता के बारे में सोच क्या है।
दूरदर्शन सहित सभी प्रमुख न्यूज चैनलों पर सबसे पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की वार्ता दिखाई गयी जिसमें वे इस घटना पर अपना गुस्सा प्रकट करते हुए सख्त एवं त्वरित कार्यवाही की मांग कर रही थीं। शीला जी लम्बे अर्से से देश की उसी राजधानी की मुख्यमंत्री हैं, जहां घटना घटी थी और केन्द्र में लगभग साढ़े आठ सालों से उन्हीं की सरकार सत्तासीन है। समझ में नहीं आया कि वे इस घटना के लिए किसको जिम्मेदार बता रही थीं - खुद को या सोनिया को या मनमोहन को? वे जो फार्मूले पेश कर रहीं थी, वे किसके लिए थे। उसी समय कांग्रेस के कुछ नेता, जिसमें राष्ट्रपति के सांसद पुत्र भी शामिल हैं, ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के लिए अशोभनीय शब्दों का प्रयोग किया, बाद में उनकी बहन और उन्होंने खुद माफी मांग ली।
इसके बाद सोनिया जी खुद सामने आती हैं और बलात्कार के अपराधियों के लिए मृत्यु दंड और उन्हें नपुंसक कर देने तक की सजा की मांग करती हैं। वे किस हैसियत से और किससे यह मांग कर रहीं थीं, इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। चूंकि दिल्ली की घटना में एक नाबालिग भी शामिल था, इसलिए उन्हीं की पार्टी नाबालिग बच्चों पर भी मुकदमा चलाने के लिए कानून बदलने की मांग करती है। ध्यान देने योग्य बात है कि अगर कानून बदल भी दिया जाये तो उसे पीछे से लागू नहीं किया जा सकता। दूसरे यूएन कंवेंशन होने के कारण इसे बदल पाना शायद आसान नहीं है।
भाजपा के कुछ नेताओं ने भी कुछ अभद्र टिप्पणियां कीं। बाद में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत सामने आये और पहले दिन उन्होंने कहा कि बलात्कार ‘इंडिया’ में होते हैं, ‘भारत’ में नहीं। वैसे तो ‘इंडिया’ और ‘भारत’ में फर्क केवल इतना है कि ये दो अलग-अलग भाषाओं के शब्द हैं, जिसे हिन्दी में हम भारत कहते हैं उसे ही अंग्रेजी में इंडिया कहा जाता है। भागवत का इससे क्या आशय था, इसे साफ नहीं किया गया परन्तु इसके दो ही अर्थ हो सकते हैं - या तो वे प्राचीन भारत को भारत और वर्तमान को इंडिया कह रहे थे अथवा वे ग्रामीण भारत को भारत और शहरी भारत को इंडिया कह रहे थे। दोनों अर्थों पर उनके ज्ञान पर तरस आता है। प्राचीन भारत के “महाभारत“ में द्रौपदी के चीरहरण का प्रकरण जनमानस में बहुत ख्यात है। प्राचीन भारत के गांवों में उत्तर और दक्षिण टोला हुआ करता था और जो आज भी अपने अस्तित्व को समाप्त नहीं कर सका है। बात को स्पष्ट कहने की जरूरत नहीं है। ग्रामीण अंचलों में निवास करने वाले लोग आशय समझ जायेंगे। दिल्ली की घटना के बाद रोज अखबारों को पलटने पर पता चलता है कि रोजाना कम से कम पांच बलात्कारों के समाचार तो केवल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों के होते हैं। यानी कम से कम 5 घटनायें तो रौशनी में आ जाती हैं, पता नहीं कितनी घटनायें समाचार ही नहीं बन पाती हैं।
भागवत की इस टिप्पणी के समाचार पत्रों में प्रकाशित होने और न्यूज चैनलों में दिखाये जाने से वे उत्साहित हुये और फिर बोल उठे। उन्होंने विवाह को एक ऐसा ”समझौता“ करार दे दिया, जिसमें महिला अस्मिता और सम्मान तार-तार होते दिखाई देते हैं।
जमायते इस्लामी पीछे कैसे रहती। उसने भी न्यायमूर्ति वर्मा आयोग को एक प्रतिवेदन दे दिया जिसमें सह-शिक्षा पर पाबंदी लगाने और लड़के-लड़कियों के मिलने जुलने और चलने तक पर पाबंदी लगाने की मांग कर दी।
इन सबके टीआरपी को देख कर आसाराम बापू में भी जोश में आ गये और कहा कि पीड़ित लड़की को बलात्कारियों के सामने हाथ जोड़ कर, बलात्कारियों के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाना चाहिए था, दया की याचना करनी चाहिए थी। इनके इस बयान की भी खूब पब्लिसिटी हुई।
आने वाले दिनों पता नहीं कौन-कौन क्या-क्या कहेगा परन्तु इस घटना और उसके बाद उपजे जनाक्रोश तथा उसके फलस्वरूप हुए प्रलापों के कुछ अर्थ निकाले जाने जरूरी हैं। महिला आन्दोलन और भाकपा कार्यकर्ताओं को चाहिए कि जहां-जहां भागवत और आसाराम सरीखे महिला विरोधी जायें, वहां उनके कार्यक्रमों के समय इनके विरोध में महिलाओं को भारी संख्या में भागीदारी करनी चाहिए और उनके कार्यक्रमों में व्यापक व्यवधान पैदा करना चाहिए। जहां-जहां बलात्कार की घटनाओं के समाचार मिलते हैं, वहां-वहां जनता की व्यापक लामबंदी करनी चाहिए और दिल्ली जैसे लगातार और लम्बे समय तक चलने वाले तथा व्यापक विरोध आयोजित करने चाहिए।
- प्रदीप तिवारी
9 जनवरी 2013

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