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सोमवार, 14 जनवरी 2013

मानेसर सुजुकी के सबक - कार्पोरेट शासन पर हल्ला बोल

   मानेसर सुजुकी प्लांट में गत 18 जुलाई के हादसे के बारे में अब यह तथ्य पूरी तरह उजागर हुआ है कि उस दिन की हिंसक घटना प्रबंधन द्वारा पूर्व नियोजित थी, जिसका उद्देश्य मजदूरों को सबक सिखाना था। कारखाना परिसर में अभी भी पुलिस बल की भारी तैनाती और बाद की घटनाओं से जाहिर है कि हरियाणा राज्य सरकार किस हद तक विदेशी कंपनियों की गिरफ्त में है। हरियाणा सरकार पूरी तरह विदेशी पूंजी की सेवा में समर्पित हो गयी है।
    राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) के सुपुर्द प्रतिवेदन में लिखा गया है कि राज्य पुलिस प्रशासन द्वारा कोर्ट में दाखिल चार्जशीट में गवाहों के नाम नहीं दिये गये हैं और न अभियोगों के पक्ष में समुचित कागजात एवं दस्तावेज दाखिल किये गये हैं। इन दो तथ्यों के अभाव में मामले की न्यायिक जांच को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। विशेष जांच दल ने यह भी सुझाव दिया है कि सरकार उन मजदूरों के नाम अभियुक्तों की सूची से हटा दें जिन पर हिंसा फैलाने का आरोप नहीं है। इसके बावजूद निर्दोष मजदूरों के नाम अभियुक्तों की सूची से नहीं हटाया गया है और ऐसे बेगुनाह मजदूरों को काम पर वापस भी नहीं लिया गया है। इस तरह मारूति सुजुकी प्रबंधन एवं हरियाणा राज्य सरकार के नापाक गठबंधन से मनमानीपूर्वक बेगुनाह मजदूरों को गोलमटोल अभियोगों के आधार पर जेल में बंद कर आतंक का माहौल बनाया हुआ है।
    अब तक बिना किसी ठोस आधार के 546 स्थायी कर्मचारियों को और 1800 से ठेका मजदूरों को बर्खास्त किया गया है। पुलिस ने 149 मजदूरों को गिरफ्तार कर जेल मेें बंद रखा है, जिसें यूनियन के अनेक पदाधिकारी शामिल हैं। इन गिरफ्तार लोगों में 125 मजदूर तो घटना के दिन कारखाने में मौजूद ही नहीं थे। विशेष जांच दल द्वारा ऐसे ही लोगों के नाम हिंसा के अभियोगों की सूची से हटाने का सुझाव दिया है।
    ‘ट्रेड यूनियन रिकार्ड’ के पिछले अंकों में गुड़गांव सहित नोएडा, फरीदाबाद, गाजियाबाद, धारूहेड़ा के औद्योगिक क्षेत्र में फैल रही अनेकानेक हिंसक घटनाओं का कारण अंधाधंुंध गैरकानूनी ठेका प्रथा के प्रचलन को बताया है। दिल्ली समेत यू.पी. और हरियाणा सरकार का श्रम विभाग ठेका प्रथा उन्मूलन एवं नियमन कानून के प्रावधानों के कार्यान्वयन के प्रश्न पर नीतिगत रूप से कान में तेल डालकर सोया है। इस प्रकार शासन में देशी-विदेशी कार्पोरेट घराने के बढ़ते प्रभाव और उसके चलते हो रही हिंसक घटनाएं देश को खतरनाक औद्योगिक अराजकता में धकेल रही है। भारत के सस्ता श्रम के दोहन के लिये विदेशी कंपनियां बेताब हैं। अब वालमार्ट जैसी दैत्याकार अमेरिकी कंपनियां भी भारत के कृषि उत्पाद तथा उपभोक्ता बाजार के शोषण के लिये मैदान में उतर रही है।
    शासक दल के राजनेताओं को ‘‘शिक्षित करने’’ के लिये बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों द्वारा भारी रकम खर्च करने की खबरें पहले भी आयी थीं। बोफोर्स तोप घोटाले में भी विक्रय प्रोत्साहन (सेल्स प्रमोशन) के लिये किया गया खर्च को रिश्वत नहीं माना गया था। योरोप के अनेक देशों में घूस की रकम को अनैतिक नहीं माना जाता है।
    बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियां कारोबार को आगे बढ़ाने के लिये राजनेताओं को पटाते हैं और इसके लिये भारी रकम खर्च करते हैं। ऐसी खर्च रकम को वे लाबियिंग एक्पेंडीचर कहते हैं और बजाप्ता नियमित खाता में डालत हैं। अभी वालमार्ट कंपनी ने 125 मिलियन डालर भारत में खुदरा बाजार हासिल करने के लिये ‘लाबियिंग खर्च’ दिखाया है अमेरिका में ऐसा ‘लाबियिंग खर्च’ कानूनी तौर पर वैध है। यह मुद्दा संसद में भी गरमाया और सरकार ने इसकी न्यायिक जांच कराने की घोषणा की।
    सर्वविदित है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के नेतृत्व में राबर्ट क्लाइब ने भारत में पैर जमाने के लिये किस तरह देशी रजवाड़े को घूस देकर पटाया था। भारत में विदेशी कंपनियोें के आचरण अत्यंत आपत्तिजनक हैं। वे भारत के श्रम कानूनों की उपेक्षा करते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य भारतीय श्रम बाजार का शोषण और कृषि उत्पादों को लूटना एवं उपभोक्ता बाजार में सामान बेचकर मुनाफा कमाना है। अतएव अब समय आ गया है कि भारतीय जनगण कार्पोरेट घरानें के शिकंजों के खिलाफ हल्ला बोलें।
    केंद्रीय ट्रेड यूनियन अधिकारों की रक्षा में संयुक्त संघर्ष 20-21 फरवरी 2013 को दो-दिवसीय आम हड़ताल को कामयाब करें। भारत का लोकतंत्र कार्पोरेट शासन के गिरफ्त में हैं। यह हमारी आजादी और सार्वभौमिकता पर खतरा है। इसलिये जरूरी है कि कार्पोरेट शासन के बढ़ते शिकंजे के खिलाफ जोरदार हल्ला बोलें।
- सत्य नारायण ठाकुर

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