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शनिवार, 18 जून 2011
at 9:35 am | 1 comments | शमशेर बहादुर सिंह
ग़ज़ल
राह तो एक थी हम दोनों की
आप किधर से आए-गए।
हम जो लूट गए पिट गए,
आप जो राजभवन में पाए गए!
किस लीलायुग में आ पहुंचे
अपनी सदी के अंत में हम
नेता, जैसे घास-फूंस के
रावन खड़े कराए गए।
जितना ही लाउडस्पीकर चीखा
उतना ही ईश्वर दूर हुआ
(-अल्ला-ईश्वर दूर हुए!)
उतने ही दंगे फैले, जितने
‘दीन-धरम’ फैलाए गए।
मूर्तिचोर मंदिर में बैठा
औ’ गाहक अमरीका में।
दान दच्छिना लाखों डालर
गुपुत दान करवाये गये।
दादा की गोद में पोता बैठा,
‘महबूबा! महबूबा...’ गाए।
दादी बैठी मूड़ हिलाए
‘हम किस जुग में आए गए।’
गीत ग़ज़ल है फिल्मी लय में
शुद्ध गलेबाजी, शमशेर
आज कहां वो गीत जो कल थे
गलियों-गलियों गाए गए!
- शमशेर बहादुर सिंह
शुक्रवार, 17 जून 2011
at 9:32 pm | 0 comments | राम किशोर
न्यायपालिका में पसरा भ्रष्टाचार
यह बात अब जन सामान्य में ही नहीं वरन् न्याय के सर्वोच्च मन्दिर में भी गूंज रही है कि न्यायपालिका में भ्रष्ट, पतित, बेईमान और रिश्वतखोर न्यायाधीशों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी हो रही है।
अप्रैल 2011 में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.एच. कपाडिया ने एम.सी. सीतलवाड स्मृति व्याख्यान माला में भाषण देते हुए कहा कि “बेईमान और भ्रष्ट न्यायधीशों को राजनीतिक संरक्षण नहीं प्रदान किया जाना चाहिए। यदि न्यायपालिका से भ्रष्टचार को समाप्त करना है तो भ्रष्ट न्यायधीशों के साथ किसी भी प्रकार की दयालुता, कृपा या मेहरबानी नहीं दिखायी जानी चाहिए।” अपने भाषण में उन्होंने एक ओर तो राजनीतिज्ञों को सुझाव दिया कि वे भ्रष्ट एवं बेईमान न्यायाधीशों से दूर रहे वहीं दूसरी ओर उन्होंने न्यायाधीशों को सलाह दिया कि वे सुविधादायक व्यवहार, सुविधाजनक बर्ताव तथा सेवानिवृत्ति के पूर्व ही या बाद में पद पाने की लालसा में किसी राजनैतिक संरक्षण प्राप्त करने की कामना के साथ राजनीतिज्ञों, विशेषकर सत्ताधारी राजनीतिज्ञों से निकटता न बनायें।” न्यायमूर्ति एस.एच. कपाडिया ने चेतावनी देते हुए कहा कि “न्यायाधीश राजनीतिज्ञों से दूरी बना कर रखें।“ यह प्रवृति “तुम मेरे काम आओ, मैं तुम्हारे काम आऊंगा” या “तुम मेरी मदद करो, मैं तुम्हारी मदद करूंगा“ को जन्म देती है और भ्रष्टाचार को पोषित करती है।“
उन्होंने आगे कहा कि यदि “कोई न्यायाधीश पक्षपात के आरोप से बचे रहना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह समाज से थोड़ी दूरी और अलगाव बना कर रखे।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि “एक व्यक्ति जो न्यायाधीशों के संसार में प्रवेश करता है उसे स्वयं में अपने ऊपर कुछ नियंत्रण रखने होंगे। उसे वकीलों से राजनीतिक दलों, उनके नेताओं से, मंत्रियों आदि से सामाजिक समारोहों के अतिरिक्त अन्य प्रकार के मेल मिलाप नहीं रखना चाहिये।“ उन्होंने कहा कि “न्यायपालिका अपने गुप्त भवनों में, जिन्हें भ्रष्ट और बेईमान न्यायाधीश सुरक्षा कवच समझते हैं, सूर्य का प्रकाश आने से भयभीत नहीं है परंतु सूर्य का प्रकाश आने से भयभीत नहीं है परंतु सूर्य का प्रकाश इतना अधिक और प्रभावी न हो जाय कि उससे शरीर की खाल ही जल जाय।“
यह सत्य है कि पिछले कुछ महिनों से, विशेषकर जब से न्यायमूर्ति एस.एच. कपाडिया सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद पर आसीन हुए हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने जनता की आशाओं में पर लगा दिये हैं, न्यायापालिका के प्रति सम्मान बढ़ा है और लोकतंत्र को मजबूती प्रदान हुई है परंतु भ्रष्ट न्यायाधीशों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। हम भूले नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश रामा स्वामी पर संसद में जब भ्रष्टाचार का महाअभियोग चला था उस समय उनके भ्रष्टाचार की पैरवी करने में, उसे सही ठहराने में केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल आगे आये थे, उन्हीं तर्कों के साथ जो आज वह टू जी स्पैक्ट्रम और कामनवेल्थ खेल घोटालों के बचाव में दे रहे हैं- “कोई घोटाला नहीं हुआ”, “कोई नुकसान नहीं हुआ” इत्यादि-इत्यादि।
आज भी भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह से घिरे सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिकरन के प्रकरण पर अच्छी-अच्छी, सुन्दर-सुन्दर और उपदेशात्मक बातें करने वाले उच्चतम न्यायालय के व्यवहार पर आश्चर्य होता है। सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने के पूर्व वह कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे। उनका नाम उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिये प्रस्तावित किया गया था, यद्यपि वह भ्रष्टाचार के अनेकों आरोपों में लांक्षित थे। उन पर जमीन घोटालों, आय से कई हजार गुना अधिक सम्पति बटोरने, भूमि सीमाबन्दी से अधिक जमीन रखने, सार्वजनिक, सरकारी एवं दलितों की भूमि पर जबरदस्ती कब्जा करने, साक्ष्यों को नष्ट करने, विक्रय प्रपत्रों में सम्पति का वास्तविक मूल्य से कम मूल्य दिखाने और इस प्रकार कर चोरी करने, स्टैम्प ड्यूटी की चोरी करने, गैर कानूनी निर्माण करने, बेनामी ट्रांसज्कशनस करनें, तमिननाडु हाउसिंग बोर्ड द्वारा अपनी पत्नी एंव पुत्रियों के नाम से पांच प्लाट आबंटित कराने इत्यादि के अनेकों आरोप हैं। इतना ही नहीं दिनकरन पर आरोप हैं कि उन्हांेपे कर्नाटक हाईकोट के मुख्य न्यायधीश पद पर रहते समय नियमों के विरूद्ध जानबूझ कर गलत एवं बेईमानी भरा प्रबन्धन किया, वह न्यायाधीशों का क्रम इस प्रकार निश्चित करते थे जिससे बेईमानीपूर्ण न्यायिक निर्णय दिये जा सकें। उनको अविलम्ब हटाने, उनके ऊपर लगे आरोपों की जांच के लिये, कर्नाटक के अधिवक्ताओं ने धरना दिया, प्रदर्शन किये, हड़तालों की, अदालतों का बहिष्कार किया। संसद में भी इस भ्रष्टाचारी न्यायाधीश के करतूतों की गूंज उठी।
इन तमाम आन्दोलनों की अगुवाई मुख्यतः कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ एडवोकेट श्री पी.पी. राव एवं कमेटी फार जुडीशियल एकाउन्टेबिलिटी के संयोजक वरिष्ठ एडवोकेट श्री वागाई कर रहे थे। अन्ततः दिकरन के ऊपर लगे आरोपों की जांच के लिये एक तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई जिसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आफताब आलम, कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. केहर एवं वरिष्ठ एडवोकेट श्री पी.सी. राव थे। जनता और अधिवक्ताओं के दबाव के चलते पी.डी. दिनकरन को कर्नाटक उच्च न्यायाधीश के मुख्य न्यायाधीश के पद से सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य पद पर स्थानान्तरण कर दिया गया। प्रश्न उठता है कि यदि सरकार और उच्चतम न्यायालय ने दिनकरन जैसे बेईमान और भ्रष्ट न्यायाधीश को जेल की राह नहीं दिखाई तो उन्हें कम से कम कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन की भांति, जिनके ऊपर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जबरन छुट्टी पर क्यों नहीं भेजा? जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के अनेकों गंभीर आरोप लगे हों, उनकी जांच चल रही हो और जांच समिति में उच्चतम न्यायालय का एक वर्तमान न्यायाधीश हो, उस आरोपित न्यायाधीश को दूसरे राज्य का मुख्य न्यायाधीश बना दिया जाय? यह कैसी और किस प्रकार की न्यायिक पारदर्शिता और निर्णय है?
इतना ही नहीं पराकाष्ठा तो उस समय हो गई जब उच्चतम न्यायालय की जस्टिस एस.एस. बेदी और जस्टिस के.सी. प्रसाद की खण्डपीठ ने दिकरन के इम्पीचमेंट (न्यायाधीश की नौकरी से बर्खास्त किये जाने की कार्यवाही) से पूर्व होने वाली जांच को ही रोक दिया। स्मरण रहे कि दिनकरन के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए बनायी गयी तीन सदस्यीय समिति को राज्य सभा ने बनाया था जिसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति आफताब आलम, कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. केहर और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ एडवोकेट श्री पी.पी. राव थे।
इस तीन सदस्यीय समिति ने दिनकरन को नोटिस भेज कर चेताया था कि वे अपने ऊपर लगाये गये 16 आरोपों का 20 अप्रैल, 2011 तक उत्तर दें अन्यथा समिति अपनी आगे की कार्यवाही करेगी।
इस बीच दिनकरन ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की कि चूंकि वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी.पी. राव, जो समिति के सदस्य हैं उनसे (दिनकरन से) दुराग्रह रखते हैं अतः जब तक वह जांच समिति में हैं तब तक समिति निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती। उच्चतम न्यायालय ने इसी अपील के आधार पर पूरी जांच पर ही रोक लगा दी। वाह! बहुत खूब! प्रश्न उठता है कि राज्य सभा के निर्णय पर उच्चतम न्यायालय ने रोक क्यों लगायी? हमारे देश में तो संसद ही सर्वोपरि है। इसके उपरान्त भी यदि श्री पी.पी. राव, एडवोकेट, से दिनकरन को निष्पक्षता की आशा नहीं थी तो उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम और कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केहर भी क्या दिनकरन से दुराग्रह रखते थे? यदि उच्चतम न्यायालय इतनी निष्पक्षता और पादर्शिता का हिमायती है और भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कृत संकल्प है, तो उसे श्री पी.पी. राव, एडवोकेट, के स्थान पर किसी अन्य को समिति में नियुक्त करने का आदेश देना चाहिए था। क्या उच्चतम न्यायालय का यह आदेश न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम और न्यायमूर्ति केहर का अपमान नहीं है? उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से कौन से तत्वों को, किस प्रकार के लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा?
दिनकरन की ही भांति उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के.जी. बालाकृष्णन पर भी आय से अधिक सम्पत्ति रखने, बेनामी सम्पत्तियां रखने, अपने परिवार के सदस्यों द्वारा की गयी बेईमानी, भ्रष्टाचार आदि कुकृत्यों पर पर्दा डालने के आरोप हैं। बालाकृष्णन तो अपनी सम्पत्ति का विवरण देने के लिए भी तैयार नहीं है। उन्होंने जो आयकर रिटर्न दाखिल किये हैं उसका भी वह खुलासा करने से मना कर रहे हैं।
दिनकरन, सौमित्र सेन बालकृष्णन की भांति ही देश के लगभग पचास से अधिक न्यायाधीशों के विरूद्ध बेईमानी, भ्रष्टाचार, आय से अधिक सम्पत्ति रखने, हेराफेरी, धोखाधड़ी, नाजायज सम्पत्ति रखने, अपने मित्रों/सम्बन्धियांे के साथ पक्षपात करने और उनको लाभ पहुंचाने आदि के मुकदमें चल रहे हैं।
देखना है कि उच्चतम न्यायालय कब अपने घर-न्यायापालिका में गंदगी फैलाने वालों पर चाबुक चलाती है, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाती है।
- राम किशोर
at 9:26 pm | 0 comments | शमीम फ़ैजी
सरकार का पीछा कर रहे हैं भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे
भ्रष्टाचार का मुद्दा कांग्रेस नीत यूपीए-दो सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा है। इसका कारण स्पष्ट हैं इस सरकार के पहले दो साल के अरसे में सरकार की ऊंची जगहों पर भ्रष्टाचार के इतने मामले बेनकाब हुए हैं जैसे पहले कभी नहीं हुए। इन घोटालों में शामिल रकम इतनी बड़ी हैं कि दिमाग चकरा जाता है। देश की जनता ने मनमोहन सिंह की सरकार को भ्रष्टाचार का पर्यायवाची मानना शुरू कर दिया है।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता की बढ़ती जागरूकता ने यूपीए सरकार को सांसत में डाल दिया है। भ्रष्टाचार शब्द के जिक्र मात्र से सरकार को सांप सूंघ जाता है। केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोक आयुक्त संस्था बनाने के लिए कानून बनाने की मांग करते हुए जब सामाजिक कार्यर्ता अन्ना हजारे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठे तो हमने सरकार को बचाव का कोई रास्ता तलाश करने के लिए व्याकुल होते देखा। चार ही दिन के अंदर सरकार ने घुटने टेक दिये और एक दस सदस्यीय संयुक्त मसविदा समिति (ज्वायंट ड्राफ्टिंग कमेटी) बना दी गयी जिसमें पांच सदस्य अन्ना हजारे द्वारा नामित थे।
अब योग गुरू रामदेव खासतौर पर विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मुद्दे पर भूख हड़ताल पर जाने पर अड़ गये हैं तो सरकार के हाथ पांव फूल गये हैं सरकार बुरी तरह हड़बड़ायी हुई है। मंत्रीगण और वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी योग गुरू के पास भागे फिर रहे हैं। अन्ना हजारे के मामले मेें शीर्ष कार्पोरेटों द्वारा समर्थित नवगठित सिविल सोसायटी ने भूख हड़ताल पर बैठे हजारे के साथ एकजुटता का तमाम
प्रबंध किया था। पर रामदेव के साथ अपने सवयं के योग शिविरों के अनुयायी हैं। उन्होंने दावा किया कि 4 जून से एक करोड़ लोग उनकी भूख हड़ताल में शामिल होंगे। जाहिर है सरकार इस तरह के जबर्दस्त आंदोलन के हलके तरीके से नहीं ले सकती।
इन दो आंदोलनों को जनता का स्वतः स्फूर्त समर्थन मिला है क्योंकि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले, राष्ट्रमंडल खेल घोटाले और आदर्श सोसायटी घोटाले के मामले में सरकार जिस तरह से पेश आयी लोगों ने उसे मामलों को रफा-दफा करने की कोशिश के रूप में देखा। लोगों को सीबीआई (सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन) और सीवीसी (चीफ़ विजिलेंस कमिश्नर) जैसी वर्तमान संस्थाओं से विश्वास ही उठ गया। सरकार ने एक आरोपित एवं दागदार नौकरशाह पीजे थॉमस को सीवीसी नियुक्त किया, पर सर्वोच्च न्यायालय ने उस नियुक्ति को खारिज कर दिया। इससे स्वयं इस संस्थान की ही साख कम हो गयी है।
जहां तक सीबीआई की बात है, एक के बाद दूसरी सरकारों ने उसे अपने राजनैतिक औजार के रूप मंे इस्तेमाल किया है जिससे उसकी साख एवं विश्वसनीयता खत्म ही हो गयी है। यदि कोई पार्टी या व्यक्ति आसानी से सरकार के पक्ष में नहीं आता तो सीबीआई को उसके विरूद्ध जांच में तेजी लाने के लिए कह दिया जाता है, वह घुटने टेक देता है; तो उसकी फाइलों को ताक पर रखवा दिया जाता है। इस गंदे खेल में कांग्रेस और भाजपा दोनों बरारबर की गुनाहगार हैं। लोगों को निराश और परेशान करने वाली बात है लम्बी चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया जिसका वास्तव में भ्रष्ट लोग वाजिब सजा से बचने के लिए बुरी तरह फायदा उठाते हैं।
इस तरह की हालत में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए किसी नये तंत्र की ललक एक स्वाभाविक सी बात है। जनता एक ऐसा तंत्र चाहती है जो कठोर और पारदर्शी हो, जो जांच-पड़ताल करे, गलत कामों का पता लगाये और अपराधियों को सजा दिलाने में मददगार की भूमिका अदा करे। इस पृष्ठभूमि में केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोक आयुक्त संस्था की अवधारणा लोगों के दिलों-दिमाग में घर कर गयी है।
सरकार यद्यपि अभी भी दावा कर रही है कि संयुक्त मसविदा समिति 10 जून तक अपना काम पूरा कर लेगी और संसद के मानसूत्र सत्र में बिल पेश किया जा सकता है पर मसविदा तैयार करने के लिए अपनायी गयी प्रक्रिया और कुछ मुद्दों पर विवाद से यह नजर आता है कि यह काम निर्धारित समय में संभवतः नहीं हो पायेगा।
पर विवादित मुद्दों में से कुछ पर जाने से पहले यह बताना संदर्भ से हटकर नहीं होगा कि लोकपाल की संस्था के निर्माण का विचार पहली बार 1997 में उस समय लाया गया था जब देवगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार सत्ता में थी। यही वह एकमात्र मौका था जब केन्द्र सरकार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दो मंत्री थे। आज बहुत से जिन मुद्दों को ताजे और नये मुद्दों का नाम दिया जा रहा है वे उस समय तैयार दस्तावेज में शामिल थे।
उस समय भी यह खुलासा किया गया कि लोकपाल का संस्थान एक “सुपरकोप” (यानी ऐसा अधिकारी जिसकी हैसियत सबसे ऊपर हो) नहीं होगा। वह जांच-पड़ताल करने वाला, मुकदमा चलाने वाला और जज-तीनों काम एक ही संस्थान के हाथ में हों, ऐसा संस्थान नहीं होगा। तीनों शक्तियां एक ही संस्थान में रहे, हमारा
संविधान इसकी इजाजत नहीं देता। संयोग से, संयुक्त मसविदा समिति के एक सदस्य प्रशांत भूषण ने भी इसी बिन्दु को दोहराया है। उन्होंने लिखा है:
“लोकपाल के प्रशासकीय एवं सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत एक जांच पड़ताल शाखा और एक मुकदमा चलाने वाली (प्रोसीक्यूटिंग) शाखा होगी। यदि जांच-पड़ताल शाखा पाती है कि भ्रष्टाचार का अपराध किया गया है तो वह मामले को प्रोसीक्यूटिंग शाखा को भेज देगी जो स्पेशल कोर्ट-जो सामान्य न्यायिक व्यवस्था का एक हिस्सा होगा- में उस मुकदमें को चलायेगी। स्पेशल कोर्ट लोकपाल के तहत नहीं होगा। लोकपाल केवल समय-समय पर यह मूल्यांकन एवं निर्धारण करेगा कि भ्रष्टाचार के मुकदमों की सुनवाई को तेजी से पूरा करने के लिए इस तरह के कितने कोर्टो की जरूरत है और सरकार की जिम्मेदारी होगी कि उतनी संख्या में स्पेशल कोर्ट बनायें” (टाईम्स ऑफ इंडिया, 1 जून, 2011)।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि स्पेशल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी।
30 मई को संयुक्त मसविदा समिति की अंतिम बैठक में जो पांच विवादस्पद मुद्दे उभर कर आये हैं, उनमें यह भी शामिल है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में आना चाहिये। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने एनडीए के शासन के दिनों में भी इस मांग का समर्थन किया था। एक अन्य कुछ जटिल मुद्दा इस मांग के संबंध में है कि बिल में यह प्रावधान भी होना चाहिए कि संसद में संसद सदस्यों के आचरण भी उसके दायरे में आयें। यह सच है कि निर्णायक विश्वासमत के दौरान संसद सदस्यों की खरीद-फरोख्त हुई और कई संसद सदस्यों को (अधिकांशतः वे भाजपा के हैं) को प्रश्न पूछने के एवज में पैसा लेने के आरोप में सजा दी गयी। जो भी, हम इस मुद्दे पर बहस करना चाहते हैं क्योंकि इसके साथ संसद की सर्वाेच्चता की बात जुड़ी हुई है।
सभी नौकरशाहों को लोकपाल के दायरे में लाने जैसे मुद्दों पर कोई विवाद नहीं होगा हालांकि संयुक्त मसविदा समिति में यूपीए-दो के प्रतिनिधि इस पर बतंगड़ खड़ा कर रहे हैं। इसी प्रकार सीबीआई और सीवीसी जैसी अन्य जांच एजेंसियों को लोकपाल के तहत लाने के मुद्दे पर विचार-विमर्श की जरूरत है। जैसा कि पहले कहा गया इन संस्थानों की साख एवं विश्वसनीयता खत्म हो गयी है क्योंकि सरकारों ने अपने हितों के लिए इनका घोर दुरूपयोग किया है। मुद्दा यह हैः क्या इन सब को लोकपाल संस्थान के साथ मिला देने पर वही उद्देश्य खत्म नहीं हो जायेगा जिसके लिए यह संस्थान बनाया जा रहा है। यह कहना काफी नहीं होगा कि लोकपाल पारदर्शी तरीके से काम करेगा और उसका सारा कार्यकलाप वेबसाईट पर होगा। उसे एक सतर्क प्रहरी की तरह रहना चाहिए।
जैसा कि संयुक्त मसविदा समिति के अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि इन सब विवादस्पद मुद्दों को राज्यों और राजनैतिक पार्टियों और सिविल सोसायटी के अन्य तबकों को उनकी राय जानने के लिए भेजा जाएगा। आशा करें कि संविधान के फ्रेमवर्क के अंदर ही एक बेहतर मतैक्य बन जाएगा।
कालेधन के जिस मुद्दे को योगगुरू रामदेव ने अपने आंदोलन का मुख्य बिन्दु बनाया है उस संबंध में वास्तव में तेजी से समाधान निकालने की जरूरत है। वामपंथी पार्टियां लम्बे अरसे से मांग करती रही है कि विदेशी बैंकों में जमा पैसे को वापस लाया जाए। यह राष्ट्रीय परिसम्पत्ति है जिसे गैर कानूनी तरीके से दूर विदेश में जमा किया गया है। इसी के साथ ही देश के अंदर काले धन का पता लगाने की जरूरत है क्यांेकि इसने देश में अनाचार मचा रखा है। देश में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है जो कभी-कभी वास्तविक अर्थव्यवस्था से भी बड़ी नजर आती है।
भ्रष्टाचार और काले धन के विरूद्ध संघर्ष करते हुए तमाम बुराईयों की जड़ को नहीं भूलना चाहिये। इन सब बुराईयों का मूलभूत कारण है लालच। अधिकांश राजनैतिक पार्टियां आर्थिक नवउदारवाद की जिन नीतियों के लिए प्रतिबद्ध है उन नीतियों ने लोगों में बड़े पैमाने पर लालच पैदा कर दिया है। हर कोई जैसे-तैसे किसी भी तिकड़म से सुपर मुनाफा कमाना चाहता है। इसके फलस्वरूप सर्वव्यापक भ्रष्टाचार और काले धन के सृजन में बेतहाशा वृद्धि हुई हैं। अर्थव्यवस्था की अनेक बुराईयों में इस या उस बुराई के विरूद्ध संघर्ष के भेष में पूंजीवाद के खिलाफ, आर्थिक नवउदारवाद के इसके वर्तमान अवतार के खिलाफ असली संघर्ष से ध्यान डाइवर्ट नहीं होना चाहिए।
- शमीम फ़ैजी
गुरुवार, 16 जून 2011
at 5:54 pm | 0 comments | AISF, Students' Movement, U.P.
छात्रों द्वारा उत्तर प्रदेश में छात्र आन्दोलन को बहाल करने का फैसला
लखनऊ 14 जून। देश के सबसे पुराने संगठन - एआईएसएफ की एक राज्य स्तरीय विद्यार्थी कैडर बैठक यहां सम्पन्न हुई जिसमें प्रदेश के सभी हिस्सों से सभी प्रमुख शिक्षा संस्थानों का प्रतिनिधित्व करते हुए छात्रों ने भाग लिया।
बैठक को सम्बोधित करते हुए एआईएसएफ के महासचिव अभय टकसाल ने एआईएसएफ के गौरवपूर्ण इतिहास का स्मरण करते हुए छात्र आन्दोलन के वर्तमान संकटों पर विस्तार से प्रकाष डाला। उन्होंने उत्तर प्रदेष के छात्रों का आह्वान किया कि वे आगे आयें और प्रदेष में एक मजबूत एवं जुझारू एआईएसएफ का निर्माण करें तथा उत्तर प्रदेष के छात्र आन्दोलन को अन्य राज्यों के छात्र आन्दोलनों से जोड़ें।
बैठक को सम्बोधित करते हुए भाकपा राज्य सचिव तथा एआईएसएफ के पूर्व नेता डा. गिरीष ने कहा कि अस्सी के दषक तक छात्र राजनीति में पिस्तौल और बमों की कोई जगह नहीं थी। छात्र आन्दोलन पर मजबूत एआईएसएफ का कब्जा था जिसका नारा है - षिक्षा और संघर्ष। बाद में पूंजीवादी ताकतें कैम्पस को प्रदूषित करने की अपनी साजिश में कामयाब रहीं जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि छात्रों ने छात्र आन्दोलन से किनारा कर लिया। उसके बाद केन्द्र एवं राज्यों की सत्ता में आयीं सरकारें शिक्षा का बाजारीकरण करने में सफल रहीं क्योंकि शैक्षिक संस्थाओं में कोई विरोध के स्वर मुखर नहीं हो सके। उन्होंने प्रदेश में एआईएसएफ के बैनर के नीचे एक मजबूत छात्र आन्दोलन की आवश्यकता पर बल दिया।
बैठक में उपस्थित 7 छात्रों ने चर्चा में भाग लेते हुए परिसरों में महसूस की गयी परेशानियों की चर्चा की। उन्होंने राज्य में मजबूत छात्र आन्दोलन की कमी को गंभीरता से महसूस किया।
बैठक ने राज्य में एआईएसएफ को गठित करने के लिए एक तदर्थ समिति का गठन किया तथा पूरे राज्य में एआईएसएफ को गठित करने तथा उसे मजबूत करने के लिए रणनीति बनाने के लिए जुलाई में पुनः एकत्रित होने का फैसला लिया। अगली बैठक में एआईएसएफ की प्लेटिनियम जुबली समारोह को लखनऊ के ऐतिहासिक गंगा प्रसाद मिमोरियल हॉल (जहां पं. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में एआईएसएफ का स्थापना सम्मेलन सन 1936 में हुआ था) आयोजित करने पर भी विचार किया जायेगा।
बैठक को सत्तर के दशक में एआईएसएफ के नेता रहे मजदूर नेता अरविन्द राज स्वरूप, वामपंथी पत्रकार प्रदीप तिवारी तथा एप्सो के महासचिव डा. आनन्द तिवारी ने भी सम्बोधित किया।
इस अवसर पर एआईएसएफ की प्रांतीय ईकाई का ब्लॉग भी जारी किया गया जिसका पता है:
http://aisfup.blogspot.com/
गुरुवार, 9 जून 2011
at 9:51 pm | 0 comments | प्रदीप तिवारी
अमरीका में एक और मंदी के आसार
अमरीकी अर्थतंत्र में एक और मंदी आने के आसार व्याप्त हैं। 31 मई को अमरीका के शेयर बाजारों में ग्रीस को एक और बेलआउट पैकेट मिलने की उम्मीद में तेजी आई थी लेकिन अगले ही दिन 1 जून को अमरीकी शेयर बाजारों में अगस्त 2010 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट ने यह संकेत दे दिये कि अमरीकी अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है। यह गिरावट आज तक जारी है। कल अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बर्नानके ने स्वीकार किया कि अमरीकी अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ गई है। हालांकि मंदी से उबरने के लिए किसी तरह की कदम उठाने की घोषणा नहीं की गई है। बाजार को उम्मीद थी कि फेडरल रिजर्व तीसरे राहत पैकेज की घोषणा कर सकता है परन्तु ऐसा नहीं हुआ।
अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव नजदीक आता जा रहा है। वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा जनता के मध्य अपनी छवि को दूसरे देशों की प्रभुसत्ता के उल्लंघन द्वारा, जिसका ताजा उदाहरण पाकिस्तान में बिना पाकिस्तानी सरकार को बताये घुस कर ओसामा बिन लादेन का शिकार करना रहा है, निखारने और जनप्रिय होने का प्रयास कर रहे हैं परन्तु वे अपना घर ठीक तरह से नहीं चला पा रहे हैं। अमरीकी अर्थव्यवस्था संकटों से उबर नहीं पा रही है और हालात यहां तक पहुंच गये हैं कि अमरीका द्वारा अपने कर्जों और उस पर ब्याज की अदायगी में डिफाल्टर होने की कगार पर पहुंच गया है। पूरी दुनियां में उसके इस संकट से कई देशों की सरकारें चिन्ताग्रस्त हैं। चीन के केन्द्रीय बैंक के एक सलाहकार ली डाउकोई ने बुधवार 8 जून को कहा कि अगर अमरीकी सरकार अपने ऋणों की अदायगी में डिफाल्ट करती है तो वह आग से खेलेगी। ज्ञातव्य हो कि चीन अमरीकी सरकार को ऋण देने वाला दुनिया का सबसे बड़ा निवेशक है जिसने 1.14 ट्रिलियन अमरीकी डालर अमरीकी सरकार को उधार दे रखे हैं। भारत ने भी अमरीकी सरकार को 39.8 बिलियन अमरीकी डालर अमरीकी सरकार को उधार दे रखे हैं और भारतीय रिजर्व बैंक मामले पर नजर रखे हुये है।
अमरीकी अर्थव्यवस्था का घाटा इस साल 1.4 ट्रिलियन अमरीकी डालर तक पहुंचने के उम्मीद जताई जा रही है और इसे कम करने के लिए ओबामा प्रशासन हर सम्भव उपाय करने के प्रयास कर रहा है।
अगर अमरीकी ट्रेजरी ऋणों पर ब्याज की अदायगी नहीं कर पाती है तो अमरीकी अर्थव्यवस्था के एक बार फिर मंदी से घिरने की आशंका पूरे विश्व में जतायी जा रही है। अगर ऐसा होता है तो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डालर के नीचे गिरने की पूरी संभावना है।
बार-बार मंदी का शिकार होना पूंजीवादी व्यवस्था का अंतर्निहित चरित्र है। इसे रोके जाने के प्रयास तो किये जा सकते हैं लेकिन इसे अधिक दिनों तक टाला नहीं जा सकता है। सम्प्रति जिस तरह का अंतर्राष्ट्रीय अर्थतंत्र काम कर रहा है, उसमें अमरीकी अर्थव्यवस्था के मंदी में जाने से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। चीन के एक अर्थशास्त्री ने तो स्वीकार किया है कि यदि अमरीका अपने ऋणों और उस पर देय ब्याज में डिफाल्ट करता है, तो उसका असर चीनी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
- प्रदीप तिवारी
at 10:34 am | 0 comments |
CPI DECLARES NORMS FOR MP LAD FUND UTILISATION BY IT'S MEMBERS OF PARLIAMENT
National Executive (24th May 2011) adopted the following norms for the allotment of MP Lad funds by CPI Members of Parliament
Earlier Members of Parliament were given Rs. 2 crore to allot for local area development. Now recently it has been increased to Rs. five crores. We have nine Members of Parliament four in Lok Sabha and five in Rajya Sabha. Some norms were decided a few years back, how to spend the money. Once again it has became necessary to decide the norms on MP Lad funds, to be allotted by our comrades.
Earlier Members of Parliament were given Rs. 2 crore to allot for local area development. Now recently it has been increased to Rs. five crores. We have nine Members of Parliament four in Lok Sabha and five in Rajya Sabha. Some norms were decided a few years back, how to spend the money. Once again it has became necessary to decide the norms on MP Lad funds, to be allotted by our comrades.
- There is criticism generally, that some times the MP Lad funds are unutilized, misused and even corruption. Our comrades should take all care not to face such criticism. Though funds are earmarked, it will not be used as the local officers, cannot get the land as dispute arises in the village. The carelessness of department concerned will be responsible for non-implementation. Hence regular check up on the execution of all works should be taken up.
- Specific instructions from Government are given to earmark 10% or more for works in S.C. localities. This should be implemented strictly.
- Generally there are complaints of misuse of funds, in works like road formations, compound walls, drainage works etc. These should be avoided, as these works will not be remembered by the people except in remote villages. The Member of Parliament is to be accountable to party while distributing the funds.
a) The Lok Sabha members are bound to accept the advice of the concerned district committee on 80% of the funds. The district committee secretariat or a three-member committee should give the proposals in writing to the Member of Parliament. No funds should be allotted by M.P directly overtaking the concerned committee. It can be distributed assembly segments wise. The committee should respect the friendly parties needs also while finalizing the works. MPs proposals should be given the first priorityb) Rajya Sabha Members should be accountable to the state committee. A small committee including the state secretary can make the allotments, keeping the interest of different districts.c) As the Member of Parliament will be approached directly by some individuals, friends, other parties etc. He should have the discretion to allot 20% of the total funds. However these allotments also should be informed to the committee.d) District Parties should take all care that funds are not misused, at any cost and inform to MP from time to time on the progress of execution.e) Efforts can be made to create permanent assets like Hospitals, Primary health centres, Schools, Community halls, Anganwadi, Panchayat offices, which will stand permanently. Concerned committees can take decisions.f) There should be press statement from time to time on allotment of MP Lad funds by the concerned M.P. A register should be available with the concerned Party Committee on the allotment of funds. If possible it should be put on online. Our allotment of MP Lad funds and execution should be as transparent as possible.
सोमवार, 6 जून 2011
at 7:16 pm | 1 comments | जन लोकपाल बिल, भाकपा महासचिव
जन लोकपाल बिल के प्रारूप पर संप्रग सरकार द्वारा मांगे गये सुझावों पर भाकपा महासचिव का पत्र
4 जून 2011
प्रिय श्री प्रणब बाबू,
आपका पत्र मिला।
आप चाहते हैं कि हमारी पार्टी, और अन्य दूसरी पार्टियां भी, जन लोकपाल बिल के सम्बंध में कतिपय बिन्दुओं पर अपने विचार 6 जून 2011 तक प्रेषित करें, क्योंकि जैसा कि आप कहते हैं, ”संयुक्त प्रारूपण समिति को निर्देश है कि वह अपना कार्य 30 जून 2011 तक पूर्ण कर ले।“
हमको यह जानकारी नहीं है कि किसने यह निर्देश संयुक्त प्रारूपण समिति को दिया है।
संयुक्त प्रारूपण समिति के गठन की प्रक्रिया के दौरान किसी भी स्तर पर न तो राजनैतिक पार्टियों को शामिल किया गया और न ही उनसे किसी प्रकार का सलाह-मशविरा किया गया। उन्हें जानबूझ कर नजरंदाज किया गया। हम एक राजनैतिक पार्टी की हैसियत से यह नहीं देख पा रहे हैं कि अब इस मुकाम पर संयुक्त प्रारूपण समिति में बहस के दौरान उठे कतिपय मुद्दों पर कैसे हमसे जवाब देने की अपेक्षा की जा रही है और वह भी ऐसी बहस जिसमें हमारी कोई पहुंच ही नहीं रही और न कोई जानकारी ही। आपके द्वारा जवाब भी ‘हां’ या ‘ना’ में मांगे गये हैं जैसे कोई वस्तुनिष्ठ टेस्ट लिया जा रहा हो। हमारी यह समझ है कि इतने जरूरी, संवदेनशील एवं महात्वपूर्ण मुद्दों पर हमसे इतने लापरवाह ढंग से राय मांगी जा रही है।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि एक असरदार लोकपाल बिल के हम समर्थक हैं। हम जोर देकर कह रहे हैं कि उसका प्रारूप लोकसभा के आसन्न मानसून सत्र में पेश किया जाये। उसमें और अधिक विलम्ब नहीं किया जाये। हम राजनैतिक पार्टी की हैसियत से निश्चित तौर पर अपने विचारों एवं सुझावों को संसद में होने वाली बहस के दौरान प्रस्तुत करेंगे, और हम आवश्यकता होने पर इसके बारे में लिखेंगे भी।
सादर,
भ व दी य
हस्ताक्षर
(ए. बी. बर्धन)
सेवा में
श्री प्रणब मुखर्जी
वित्त मंत्री
भारत सरकार
नई दिल्ली
शनिवार, 4 जून 2011
at 4:55 pm | 0 comments | Jan Lokpal Bill
CPI's befitting reply to Pranab Mukherjee on socalled draft of Jan Lok Pal Bill
COMMUNIST PARTY OF INDIA
CENTRAL OFFICE
Ajoy Bhavan, 15, Comrade Indrajit Gupta Marg, New Delhi-110 002
Telephone: (9111) 23235546, 23235058, 23235099
Fax: (91-011) 23235543e-mail: cpindia@gmail.com
------------------------------------------------------------------------------------------------------------
General Secretary : A. B. Bardhan
4th June 2011
Dear Shri Pranab Babu,
Received your letter.
You want our Party, and also other Parties to give our views on certain matters raised by you regarding the Jan Lokpal Bill latest by 6th June 2011, because as you say, “The Joint Drafting Committee has been given a mandate to complete its work latest by 30th June 2011”.
We are not aware who gave the ‘Mandate’ to the Joint Drafting Committee.
At no stage were the Political Parties involved or ever consulted during the entire process of constituting the Joint Drafting Committee. They were deliberately ignored. We do not see how at this stage we, as a Political Party, are called upon to reply to certain matters, that came up during discussions within the Joint Drafting Committee, to which we have had no access or knowledge. Answers are sought by you to some issues in ‘yes’ or ‘no’ as in an objective test. We think this is a very casual way of inquiring from us on such an urgent, sensitive and important matter.
Needless to say we are very keen about an effective Lokpal Bill. We insist that such a Draft should be brought in the forthcoming Monsoon Session of Parliament. There can be no further delay. We as a Political Party will most certainly state our views and suggestions during the discussion on the Bill within the Parliament, and also say and write about them whenever we find it necessary.
With Regards,
Yours,
(A.B. Bardhan)
To,
Shri Pranab Mukherjee,
Minister of Finance,
Government of India,
New Delhi.
CENTRAL OFFICE
Ajoy Bhavan, 15, Comrade Indrajit Gupta Marg, New Delhi-110 002
Telephone: (9111) 23235546, 23235058, 23235099
Fax: (91-011) 23235543e-mail: cpindia@gmail.com
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General Secretary : A. B. Bardhan
4th June 2011
Dear Shri Pranab Babu,
Received your letter.
You want our Party, and also other Parties to give our views on certain matters raised by you regarding the Jan Lokpal Bill latest by 6th June 2011, because as you say, “The Joint Drafting Committee has been given a mandate to complete its work latest by 30th June 2011”.
We are not aware who gave the ‘Mandate’ to the Joint Drafting Committee.
At no stage were the Political Parties involved or ever consulted during the entire process of constituting the Joint Drafting Committee. They were deliberately ignored. We do not see how at this stage we, as a Political Party, are called upon to reply to certain matters, that came up during discussions within the Joint Drafting Committee, to which we have had no access or knowledge. Answers are sought by you to some issues in ‘yes’ or ‘no’ as in an objective test. We think this is a very casual way of inquiring from us on such an urgent, sensitive and important matter.
Needless to say we are very keen about an effective Lokpal Bill. We insist that such a Draft should be brought in the forthcoming Monsoon Session of Parliament. There can be no further delay. We as a Political Party will most certainly state our views and suggestions during the discussion on the Bill within the Parliament, and also say and write about them whenever we find it necessary.
With Regards,
Yours,
(A.B. Bardhan)
To,
Shri Pranab Mukherjee,
Minister of Finance,
Government of India,
New Delhi.
शुक्रवार, 27 मई 2011
at 9:26 pm | 1 comments | सत्य नारायण ठाकुर
....... मेरे मरने के बाद - लोहिया
डा. राम मनोहर लोहिया की जन्मशती के मौके पर अखबारों में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक है - ”मुझे याद करेंगे लोग मेरे मरने के बाद“। मरने के बाद मनुष्य की अच्छाइयों को याद करने की प्राचीन भारतीय परम्परा है। इसलिये स्वाभाविक ही लोहिया ने ऐसी आशा की होगी। महाभारत युद्ध की विनाश लीला का सेनापति भीष्म ने भी मरने के ठीक पहले शरशैया पर लेटे अपनी ‘प्रतिज्ञा’ के दुष्परिणामों और यहां तक कि उस प्रतिज्ञा को न तोड़ पाने की अपनी विवशता पर अफसोस जाहिर किया था। लोहिया आज जिन्दा होते तो यह मानने के अनेक कारण हैं कि वे भीष्म की तरह विवेकहीन प्रतिज्ञा से बंधे रहने की गलती नहीं दोहराते और वे खुलकर अपने शिष्यों के कारनामों के विरूद्ध खड़े हो जाते। उन्होंने केरल में अपनी सोशलिस्ट पार्टी की सरकार द्वारा गोली चलाये जाने का विरोध किया और सरकार से इस्तीफा की मांग की थी।
- दक्षिण का ब्राम्हण-विरोधी आन्दोलन किस प्रकार दलित बनाम थेवर-बनियार में बदल गया? और यह भी कि यहां ब्राम्हण उद्योगपति बने तथा दलित-पिछड़े उनके कर्मचारी?
- पश्चिम भारत का गैर-ब्राम्हण आन्दोलन क्यों दलित बनाम मराठा का रूप ले चुका है? इधर शिवसेना और आरपीआई के चुनावी तालमेल का ताजा समाचार भी प्राप्त हुआ है।
- बिहार अगड़ा-पिछड़ा झगड़ा अब क्यों पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा और दलित बनाम महा दलित के झगड़े में बदल चुका है। यद्यपि लालू और राम विलास पासवान ने दलितों और पिछड़ों का पुराना समीकरण बनाने में अपनी सम्पूर्ण ताकत झोंक दी फिर भी वे इस नये समीकरण के सामने बुरी तरह पिट गये।
- उत्तर प्रदेश में 1993 की सम्पूर्ण शूद्र एकता (दलित पिछड़ा मिलन) आज क्यों शूद्र बनाम अतिशूद्र शत्रुता (मुलायम बनाम मायावती) में परिणत हो गयी? और यह भी कि मनुवाद विरोधी दलित नेताओं का मनुवादी ब्राम्हणों से कैसी भली दोस्ती चल रही है। क्या यहां मगध शूद्र सम्राट महानंद द्वारा नियुक्त ब्राम्हण मंत्री कात्यायन और वररूचि का इतिहास दोहराया जा रहा है?
- क्यों राजस्थान में लड़ाकू गुर्जर आदिवासी बनना चाहते हैं और क्यों गैरद्विज बलशाली भूस्वामी जाट पिछड़ा वर्ग में नाम लिखाने को बेताब हैं?
बुधवार, 25 मई 2011
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में चल रहे आन्दोलन पर भाकपा महासचिव का. ए. बी. बर्धन के प्रधानमंत्री को प्रेषित पत्र का हिन्दी अनुवाद
23 मई 2011
प्रिय श्री मनमोहन सिंह जी,
मुझे मालुम है कि आप आवश्यक मसलों में व्यस्त हैं। लेकिन मेरा कर्तव्य है कि आपका ध्यान उस संकट की ओर आकर्षित करूं जिसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जो हमारे देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में एक है, को अपनी चपेट में ले रखा है।
विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. पी. के. अब्दुल अजीज के खिलाफ आन्दोलन चल रहा है। वे आर्थिक हेराफेरी एवं अनियमितताओं के अभियुक्त हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति नियुक्त किये जाने के पहले केरल के कोचीन विश्वविद्यालय के उपकुलपति के रूप में नियुक्ति के दौरान भी उन पर इसी तरह के आरोप लगे थे। विभिन्न अनियमितताओं की जांच के लिए जांच समितियों ने उन्हें इसका दोषी पाया। मैं नही जानता कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गयी।
उपकुलपति के रूप में वे अक्षम रहे हैं। विगत 3-4 वर्षों में विश्वविद्यालय 3-4 बार अनिश्चितकालीन बन्द घोषित किया गया। ताजा उदाहरण 29 अप्रैल 2011 को विश्वविद्यालय का बंद किया जाना है। कारण छात्रों के दो दलों का आपसी विवाद था जिसे आसानी से सूझबूझ का परिचय देकर नियंत्रित किया जा सकता था। यह अनिश्चितकालीन बन्द तब घोषित किया गया जब परीक्षाएं चल रहीं थीं तथा नए छात्रों का प्रवेश होना था। इससे हजारों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया है। उपकुलपति ने प्रेस को सम्बोधित करते हुए कहा कि छात्रावासों में हथियार मौजूद हैं, यहां तक कि महिला छात्रावास में भी। लड़के-लड़कियों से 24 घंटे के अन्दर छात्रावास खाली कराया गया। अन्ततः यह आरोप झूठा निकला और छात्रावासों के किसी भी कमरे से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ। लेकिन उपकुलपति जनता की नजरों में विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने में सफल रहे।
शिक्षक, छात्र, पूर्व छात्र और जागरूक जनता ने उपकुलपति को हटाने तथा जांच की मांग की है। दो शिक्षक विगत कुछ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं तथा अन्य भी अनशन में भागीदारी कर रहे हैं।
एक गौरवशाली विश्वविद्यालय संकट में है। इस पर सरकार की चुप्पी मेरी समझ में नहीं आ रही है।
अतएव मैं निवेदन करता हूं कि आप क्रुध जन आन्दोलन फैलने के पहले इसमें हस्तक्षेप करें। उपकुलपति को तुरन्ट हटाया जाये। एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन किया जाये। ऐसे कदम उठाये जाएं जिससे दो शिक्षकों का आमरण अनशन तथा शिक्षकों, छात्रों तथा अन्य द्वारा किये जा रहे अनशन को समाप्त किया जा सके। यह सब देश के गौरवशाली विश्वविद्यालय की साख बचाने के लिए आवश्यक है।
मुझे आशा है कि अन्य व्यस्तताओं के रहते हुए आप इस मसले पर तुरन्त ध्यान देंगे।
सादर,
भ व दी य
हस्ताक्षर -
(ए.बी.बर्धन)
श्री मनमोहन सिंह
प्रधानमंत्री
भारत सरकार
नई दिल्ली
प्रिय श्री मनमोहन सिंह जी,
मुझे मालुम है कि आप आवश्यक मसलों में व्यस्त हैं। लेकिन मेरा कर्तव्य है कि आपका ध्यान उस संकट की ओर आकर्षित करूं जिसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जो हमारे देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में एक है, को अपनी चपेट में ले रखा है।
विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. पी. के. अब्दुल अजीज के खिलाफ आन्दोलन चल रहा है। वे आर्थिक हेराफेरी एवं अनियमितताओं के अभियुक्त हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति नियुक्त किये जाने के पहले केरल के कोचीन विश्वविद्यालय के उपकुलपति के रूप में नियुक्ति के दौरान भी उन पर इसी तरह के आरोप लगे थे। विभिन्न अनियमितताओं की जांच के लिए जांच समितियों ने उन्हें इसका दोषी पाया। मैं नही जानता कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गयी।
उपकुलपति के रूप में वे अक्षम रहे हैं। विगत 3-4 वर्षों में विश्वविद्यालय 3-4 बार अनिश्चितकालीन बन्द घोषित किया गया। ताजा उदाहरण 29 अप्रैल 2011 को विश्वविद्यालय का बंद किया जाना है। कारण छात्रों के दो दलों का आपसी विवाद था जिसे आसानी से सूझबूझ का परिचय देकर नियंत्रित किया जा सकता था। यह अनिश्चितकालीन बन्द तब घोषित किया गया जब परीक्षाएं चल रहीं थीं तथा नए छात्रों का प्रवेश होना था। इससे हजारों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया है। उपकुलपति ने प्रेस को सम्बोधित करते हुए कहा कि छात्रावासों में हथियार मौजूद हैं, यहां तक कि महिला छात्रावास में भी। लड़के-लड़कियों से 24 घंटे के अन्दर छात्रावास खाली कराया गया। अन्ततः यह आरोप झूठा निकला और छात्रावासों के किसी भी कमरे से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ। लेकिन उपकुलपति जनता की नजरों में विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने में सफल रहे।
शिक्षक, छात्र, पूर्व छात्र और जागरूक जनता ने उपकुलपति को हटाने तथा जांच की मांग की है। दो शिक्षक विगत कुछ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं तथा अन्य भी अनशन में भागीदारी कर रहे हैं।
एक गौरवशाली विश्वविद्यालय संकट में है। इस पर सरकार की चुप्पी मेरी समझ में नहीं आ रही है।
अतएव मैं निवेदन करता हूं कि आप क्रुध जन आन्दोलन फैलने के पहले इसमें हस्तक्षेप करें। उपकुलपति को तुरन्ट हटाया जाये। एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन किया जाये। ऐसे कदम उठाये जाएं जिससे दो शिक्षकों का आमरण अनशन तथा शिक्षकों, छात्रों तथा अन्य द्वारा किये जा रहे अनशन को समाप्त किया जा सके। यह सब देश के गौरवशाली विश्वविद्यालय की साख बचाने के लिए आवश्यक है।
मुझे आशा है कि अन्य व्यस्तताओं के रहते हुए आप इस मसले पर तुरन्त ध्यान देंगे।
सादर,
भ व दी य
हस्ताक्षर -
(ए.बी.बर्धन)
श्री मनमोहन सिंह
प्रधानमंत्री
भारत सरकार
नई दिल्ली
सोमवार, 23 मई 2011
at 9:49 pm | 0 comments | शमीम फैजी
पांच विधान सभाओं के चुनाव परिणाम
संचार माध्यम और वामपंथ के जाने-पहचाने विरोधी इस बेबुनियाद बिंदु पर जोर देने के लिए हर किस्म के सिद्धान्त और आक्षेप फैलाने में जुटे हैं कि वामपंथ की चुनाव में पराजय, खासकर पश्चिम बंगाल में पराजय का अर्थ है देश में वामपंथ का खात्मका। यह महज अनर्गल प्रलाप है।
यह सही है कि पश्चिम बंगाल में वामपंथ को एक बड़ा धक्का लगा है। विधान सभा चुनावों में लगातार सात बार की सफलताओं और लगभग साढ़े तीन दशक तक सत्ता में रहने के बाद वामपंथ सत्ता से बाहर हो गया है। पर यह ध्यान में रखना चाहिये कि वामपंथ साढ़े तीन दशक तक लगातार सत्ता में बना रहा जबकि जिस कांग्रेस को स्वाधीनता के बाद से सत्ता पर इजारेदारी थी, उसे दो दशकों से भी पहले जनता का कोप भाजन बनना पड़ा था और 1967 में नौ राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। वाम मोर्चा का लगभग साढ़े तीन दशक तक सत्ता पर बने रहना स्वयं में बहुपार्टी लोकतंत्र के इतिहास का रिकार्ड बन गया है और यह उस समय तक एक रिकार्ड बना रहेगा जब तक वाममोर्चा भविष्य के चुनावी संघर्ष के लिए फिर से अपनी कमर कसता है और नया रिकार्ड स्थापित करता है।
कांग्रेसजन तथ्यों के खंडन-मंडन का मजाक बनाने में हदों को पार कर रहे हैं। सबसे अधिक उपहासास्पद बात तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने कही। उन्होंने चटखारे लेते हुए कहा कि प. बंगाल में वाममोर्चा को पटक कर दो अंकीय आंकड़े पर ला दिया गया है। वह बड़े मजे से भूल गये कि इसी चुनाव में तमिलनाडु विधानसभा में उनकी पार्टी एक ही अंक में सिमट कर रह गयी है जहां कांग्रेस को 294 स्थानों में से मात्र पांच स्थान ही मिले हैं। इसके अलावा केरल में कांग्रेस सत्ता में तो जरूर आ गयी है पर वह नई विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में नहीं आ सकी। यह सम्मान तो वामपंथ की ही पार्टी ने अपने पास बनाये रखा। इसी प्रकार, उन्होंने इस तथ्य को भी नजरंदाज करने की कोशिश की कि उनकी पार्टी से पुडूचेरी में सत्ता छिन गयी है, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लोकसभा के लिए दो उपचुनावों में उन्हें अपमानजनक तरीके से शिकस्त का मुंह देखना पड़ा; और कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में विधानसभा के लिए सभी उपचुनावों में कांग्रेस के हाथ विफलता ही लगी।
पर इस खंडन-मंडन को यही छोड़ते हैं। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों और उनके दूसरे वामपंथी सहयोगियों ने सही ही कहा है कि प. बंगाल में वामपंथ को मिली जबर्दस्त हार के लिए गहन आत्म विश्लेषण, और राजनैतिक, सरकारी और संगठनात्मक - सभी क्षेत्रों में अपने कामकाज की समीक्षा की जरूरत है। स्वाभाविक ही है कि एक सांगोपांग समीक्षा के लिए वामपंथी पार्टियों के नेतृत्वकारी निकायों को कुछ समय की जरूरत होगी क्योंकि संबंधित राज्यों की पार्टी इकाईयों द्वारा समीक्षा इस दिशा में पहला कदम होगा।
इस बीच कुछ बातें सुस्पष्ट हैं। वामपंथ को कुछ बुनियादी मुद्दों - जैसे कि आधारभूत जनता के साथ हमारे संबंधों और जुड़ाव, प्रशासन में पारदिर्शता, सत्ता का अहंकार और कुछ हद तक भ्रष्टाचार जो विभिन्न स्तरों पर हमारे संगठनों में घर कर गया है - पर आत्म निरीक्षण की जरूरत है। जनता के जो तबके इन तमाम तीस वर्षों में हमारा समर्थन करते रहे हैं, इन तमाम बातों के बीच परिवर्तन की भावना को पैदा किया जिसका इस बात अप्रत्याशित रूप में कहीं अधिक एकताबद्ध वाम विरोधी ताकतों ने पूरा दोहन किया है। यदि आंकड़ों को देखें तो यह काफी सुस्पष्ट है कि हर किस्म की वाम विरोधी ताकतों की एकता ने वाम मोर्चा की हार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यह चुनाव वाम मोर्चा और बाकी के मध्य एक दो-धु्रवीय लड़ाई में बदल गया। वाम मोर्चा यद्यपि 62 ही स्थानों पर जीत पाया पर उसे 41 प्रतिशत से थोड़ा अधिक मत प्राप्त हुए।
पर इससे हमें इस गलत नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए कि मतदाताओं के कुछ तबकों ने पक्ष नहीं बदला है। सबसे अधिक सुस्पष्ट शिफ्ट है मुस्लिम समुदाय की जो राज्य के कुल मतदाताओं का 27 प्रतिशत हैं। हालांकि वाममोर्चा के विरूद्ध मतदान करने के बाद भी, एक आम मुसलमान यही कहेगा कि केवल कम्युनिस्ट ही हैं जिनकी धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्धता पर उंगली नहीं उठायी जा सकती, पर वाम मोर्चा सरकार ने अपने शासन के इन तमाम वर्षों में उनके जीवन और उनकी सम्पत्ति को जो सुरक्षा प्रदान की है, वही पर्याप्त नहीं है। अन्य लोगों की तरह उन्हें भी विकास के लाभ में हिस्सा मिलने की जरूरत है। दुर्भाग्य से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बार-बार याद दिलाये जाने के बावजूद वाम मोर्चा ने शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और रोजगार जैसी उनकी बुनियादी ललक और आकांक्षाओं की अनदेखी की।
यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसके मामले में सही तरह से जुटने की जरूरत है न केवल उस समय जब हम सत्ता में वाप आते हैं बल्कि अल्पसंख्यकों के बीच हमारे कामकाज के कुल दृष्टिकोण में इस पर ध्यान रखने की और इस दिशा में जुटने की जरूरत है।
इसी प्रकार, उद्योगीकरण के प्रश्न पर पूर्ण, सम्यक एवं गहन सोच-विचार की जरूरत है। नंदीग्राम के समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक कोलकाता में चल रही थी। राष्ट्रीय परिषद ने कृषि योग्य भूमि को बचाने और बेदखल हुए किसानों के पुनर्वास के प्रश्न पर एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया था। हमें उस प्रस्ताव में प्रतिपादित दो बुनियादी बातों पर दृढ़ता से जमे रहना चाहिये। पहली बात - सरकारों के पास बुनियादी ढांचों और जनोपयोगी सेवाओं को खड़ा करने के अलावा अन्य किसी उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहण का अधिकार नहीं होना चाहिए। अन्य सभी उद्देश्यों के लिए बाजार का नियम लागू होना चाहिये। दूसरी बात - उसमें भी, बहुफसली जमीन के अधिग्रहण या खरीदारी से यथासंभव बचा जाना चाहिए। इस प्रश्न पर व्यापक गलतफहमी के कारण यद्यपि हम सत्ता खो चुके हैं, तो भी इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में अन्य अनेक नंदीग्राम और सिंगूर सामने उभर कर आ रहे हैं।
प. बंगाल में वाम मोर्चा का केवल एक ही विकल्प है और वह है एक ऐसा वाम मोर्चा जो अपने कामकाज में कहीं अधिक पारदर्शी और लोकतांत्रिक हो, जिसमें छोटे बड़े सभी भागीदारों की राय को वाजिब महत्व दिया जाये। वाम मोर्चा के घटकों की हिस्सेदारी में उनके प्रभाव की जमीनी वास्तविकता झलकनी चाहिये। वाम मोर्चा की कोई पार्टी अपने को दूसरों से बड़ा समझे इस तरह के रूख से वाम मोर्चा को और कुल मिला कर प. बंगाल की जनता को नुकसान पहुंचेगा। वामपंथ ने घोषित किया है कि वह रचनात्मक और उत्तरदायी विपक्ष की भूमिका अदा करेगा। वह जनता की उपलब्धियों की मजबूती एवं दृढ़ता से रक्षा करेगा पर तृणमूल कांग्रेस की तरह अवरोध और टकराव का रूख नहीं रखेगा। दुर्भाग्य से नये शासक गठबंधन ने इसे सही तरीके से नहीं समझा है। वाम कार्यकर्ताओं और पार्टी दफ्तरों पर हमलों की खबरें लगातार आ रही हैं।
केरल में एक बार एलडीएफ तो दूसरी बार यूडीएफ के सत्ता में आने की प्रवृत्ति रही है। इस बार केरल इस प्रवृत्ति को बदल कर इतिहास रचने के कगार पर ही पहुंच गया था। एलडीएफ केवल तीन स्थान कम मिलने के कारण सत्ता से दूर रह गया। दोनों मोर्चों को मिलके मतों का अंतर एक प्रतिशत से भी कम रहा। दोनों के बीच केवल 0.89 प्रतिशत का अंतर रहा। एलडीएफ को श्रेय जाता है कि अपनी सत्ता के पिछले पांच वषों में उसने न केवल पहले से कहीं अधिक पारदर्शी तरीके से शासन किया बल्कि आर्थिक नवउदारवाद की बुराईयों जैसे कि महंगाई, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ध्वंस और भ्रष्टाचार आदि के विरूद्ध भी उसने दृढ़तापूर्वक संघर्ष किया। एलडीएफ ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया, उसके दायरे को बढ़ाया जिससे जनता को महंगाई से बड़ी राहत मिली। हमारे विरोधियों को भी इसकी प्रशंसा करनी पड़ी। इसी प्रकार, पिछले पांच वर्षों में एलडीएफ ने घाटे में चल रहे 38 सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठानों से 33 की जीर्णोद्धार किया और वे मुनाफा कमाने लगे। इससे हजारों लोगों के रोजगार का बचाव हुआ। यूडीएफ के एक पूर्वमंत्री को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा सुनायी जाने और यूडीएफ के एक अन्य पूर्वमंत्री के यौन एवं भ्रष्टाचार घोटाले के पर्दाफाश से न केवल मुख्यमंत्री को निजी तौर पर बल्कि समूचे एलडीएफ को जनता से सराहना मिली। इन बातों के अलावा, एलडीएफ की प्रमुख पार्टियों के बीच (और पार्टियों के स्वयं के अंदर भी) यदि उद्देश्ययुक्त एकता एवं जुड़ाव कुछ और अधिक रहा होता तो उससे वाम मोर्चा को राज्य में दो मोर्चों के एक के बाद दूसरे के सत्ता में आने की आम प्रवृत्ति को रोकने में निश्चय ही कामयाबी मिल सकती थी।
इसी प्रकार तमिलनाडु का जनादेश अत्यंत स्पष्ट है। यह डीएमके के भ्रष्ट पारिवारिक शासन और कांग्रेस जैसे उसके समथर्कों-रक्षकों के विरूद्ध जनादेश है। इसी प्रकार पुडुचेरी की जनता ने एक अपेक्षाकृत ईमानदार एवं सरल व्यक्ति, जिसे कांग्रेस से निकाल दिया गया था, का वरण किया है।
असम में, कांग्रेस को विप्ख की फूट का फायदा मिला। इसके अलावा उल्फा के एक घड़े के साथ वार्ता शुरू कर टिकाऊ शांति एंव स्थिरता का जो भ्रम उसने पैदा किया, उसका भी कांग्रेस ने फायदा उठाया। असम के लोग शांति चाहते हैं। यह केन्द्र सरकार और नई राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वे असंतुष्ट तत्वों के साथ वार्ता की प्रक्रिया तो आगे बढ़ायें, राज्य में शांति को सुनिश्चित करें और सभी जातीय एवं अन्य समस्याओं का समाधान करें।
चुनाव की जीत की वास्तविक एवं काल्पनिक खुशियों और कुछ ताकतों की हार के हल्ले-गुल्ले के बीच इन चुनावों के एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम की अनदेखी नहीं करनी चाहिये। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने 24 स्थानों पर चुनाव लड़ा और 20 स्थान जीते। असम में मुस्लिम संगठन एआईयूडीएफ ने अपने स्थानों को 11 से बढ़ाकर 18 कर लिया। इसी प्रकार भाजपा के साथ गठजोड़ के ममता बनर्जी के संदिग्ध रिकार्ड के बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमानों ने उनका पक्ष लिया। इन प्रवृत्तियों पर सम्यक एवं पूर्ण अध्ययन की जरूरत है।
एक अन्य कारक है निरंतर बढ़ते मध्यम वर्ग के चरित्र और आकांक्षाओं में बदलाव। मध्यम वर्ग यद्यपि अधिकाधिक ‘उपभोक्तवादी’ और ‘कैरियर उन्मुख’ हो रहा है, सब मिला कर वह जनमत निर्माण की एक बड़ी भूमिका का निर्वाह भी कर रहा है। वामपंथ को इन रूझानों एवं कारकों पर और नई पीढ़ी पर ध्यान देना होगा।
- शमीम फैजी
शनिवार, 21 मई 2011
FAST UNTO DEATH AT ALIGARH MUSLIM UNIVERSITY - AN APPEAL
THIS IS VERY URGENT PLEASE ATTEND.
Dear Sir/Madam,
The Vice Chancellor of Aligarh Muslim University is as corrupt as Raja or kalmandi. Due to agitation of AMU students, teachers & non-teaching staff, the Government of India appointed a committee for enquiry into his misdeeds. This committee found numerous financial irregularities during his tenure.
Since 16th May, two senior teachers of AMU Prof. M.R.Shervani and Prof. A.A. Usmani are on fast unto death whereas numerous students, ex-students, other teachers and non-teaching staff are on indefinite fast. They are demanding CBI enquiry on the financial irregularities committed by the Vice Chancellor and his immediate removal for independent and prompt completion of investigation by CBI.
Due to hot weather conditions, Prof. Shervani and Prof. Usmani both developed renal problems but still they are continuing their fast unto death. Their deteriorating condition compelled me to address you this mail.
I personally request you :
Please forward this message to as many as possible promptly.
Please send the following message to the HRD Minister through his e-mail id : hrm@sb.nic.in and also endorse a copy to me on my e-mail ID : laxmipradeep.tewari@gmail.com.
Subject : FAST UNTO DEATH AT ALIGARH MUSLIM UNIVERSITY - AN APPEAL
“The Minister for Human Resource Development
Government of India
New Delhi
Dear Sir,
I invite your immediate attention towards the deteriorating health of both the senior teachers of AMU who are on the fast unto death.
I request you to please immediately visit AMU campus for dialogue with fasting teachers, students, ex-students and non-teaching staff.
Prompt intervention is solicited.
With regards/greetings.
Yours sincerely
Your Name”
I trust to get your prompt response in this matter.
- Pradeep Tewari
Treasurer,
Communist Party of India
Uttar Pradesh
Dear Sir/Madam,
The Vice Chancellor of Aligarh Muslim University is as corrupt as Raja or kalmandi. Due to agitation of AMU students, teachers & non-teaching staff, the Government of India appointed a committee for enquiry into his misdeeds. This committee found numerous financial irregularities during his tenure.
Since 16th May, two senior teachers of AMU Prof. M.R.Shervani and Prof. A.A. Usmani are on fast unto death whereas numerous students, ex-students, other teachers and non-teaching staff are on indefinite fast. They are demanding CBI enquiry on the financial irregularities committed by the Vice Chancellor and his immediate removal for independent and prompt completion of investigation by CBI.
Due to hot weather conditions, Prof. Shervani and Prof. Usmani both developed renal problems but still they are continuing their fast unto death. Their deteriorating condition compelled me to address you this mail.
I personally request you :
Please forward this message to as many as possible promptly.
Please send the following message to the HRD Minister through his e-mail id : hrm@sb.nic.in and also endorse a copy to me on my e-mail ID : laxmipradeep.tewari@gmail.com.
Subject : FAST UNTO DEATH AT ALIGARH MUSLIM UNIVERSITY - AN APPEAL
“The Minister for Human Resource Development
Government of India
New Delhi
Dear Sir,
I invite your immediate attention towards the deteriorating health of both the senior teachers of AMU who are on the fast unto death.
I request you to please immediately visit AMU campus for dialogue with fasting teachers, students, ex-students and non-teaching staff.
Prompt intervention is solicited.
With regards/greetings.
Yours sincerely
Your Name”
I trust to get your prompt response in this matter.
- Pradeep Tewari
Treasurer,
Communist Party of India
Uttar Pradesh
शुक्रवार, 20 मई 2011
at 6:16 pm | 0 comments |
रिश्वत को वैध बनाने की बेहूदगी को रोको - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उपमहासचिव एवं पूर्व संसद सदस्य एस0 सुधाकर रेड्डी ने केंद्रीय वित मंत्रालय के पोर्टल पर ”एक किस्म की रिश्वतों के मामले में रिश्वत देने के काम को वैध क्यों न मान लिया जाये“ शीर्षक पेपर के होने के संबंध में केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को एक पत्र लिखकर आपत्ति व्यक्त की है। इस पेपर के लेखक वित्तमंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु हैं। उन्होंने लिखा है:
21 अप्रैल 2011 के ”हिंदु“ दैनिक में पी0 साईनाथ द्वारा लिखे एक लेख ”रिश्वतः एक छोटा पर रेडिकल विचार“ पढ़कर आश्चर्यचकित हो गया हूँ। साईनाथ ने अपने इस लेख में वित्तमंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु द्वारा लिखित पेपर- ”व्हाई, फॉर ए क्लास ऑफ ब्राइब्स, दि एक्ट ऑफ गिविंग ब्राइब शुड बी ट्रीटिड एज लीगल“ (एक किस्म की रिश्वतों के मामले में रिश्वत देने के काम को वैध क्यों न मान लिया जाये) को विस्तार से उद्घृत किया है। बसु के इस पेपर को वित्तमंत्रालय के पोर्टल पर भी डाल दिया गया है।
मेरी समझ नहीं आता कि एक संविधान विरोधी और जन-
विरोधी विचार और वह भी एक ऐसे सरकारी अधिकारी द्वारा जो राष्ट्र और भारत सरकार की अपनी तमाम सेवाओं में भारत के संविधान की शपथ लेता है, प्रचार के लिए भारत सरकार के पोर्टल का इस्तेमाल क्योंकर किया जा सकता है। यदि यह उनका निजी सुझाव है तो इसके लिए उन्हें अपने निजी वेबसाईट पर, सरकार से इतर अन्य किसी साईट का इस्तेमाल करना चाहिये था। मैं पक्के तौर पर विश्वास करता हूॅ कि प्रणव दा और पूर्व वित्तमंत्री एवं वर्तमान प्रधानमंत्री इस तरह के भड़काने वाले, राष्ट्रविरोधी और भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन देने वाले विचारों का समर्थन नहीं करेंगे।
मुझे पक्का विश्वास है कि आप भ्रष्टाचार को वैध बनाने के बसु के विचारों से सहमत नहीं होंगे। बहरहाल, कौशिक बसु के लेख ने वित्तमंत्रालय के पोर्टल को काफी नुकसान पहुंचा दिया है। मेरा आपसे अनुरोध है कि इन विचारों को पूरी तरह से खारिज कर दें और कौशिक बसु के पेपर को सरकारी पोर्टल से तत्काल हटा दिया जाये। उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में, मैं आपसे अनुरोध करता हूॅ कि आप अपने आपको इसकी अंतवस्तु से अलग करें और सरकारी पोर्टल के इस तरह के दुरूपयोग के पीछे के असली इरादे की विस्तृत जांच करें।
आपको इस तरह की बातों की भर्त्सना करनी चाहिये क्योंकि ऐसी बातें लोकतांत्रिक व्यवस्था को बरबाद करने में ही मदद कर सकती है। इस तरह के असंवैधानिक कामों को लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दी जानी चाहिये। मुझे पक्का विश्वास है कि आप हमारी चिंता से सहमत होंगे और कन्फयूजन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए तुरंत कदम उठायेंगे।
भाकपा द्वारा एएमयू कम्यूनिटी के आन्दोलन का समर्थन
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति को तुरन्त हटाने की मांग
लखनऊ, 19 मई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि वह आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति को तुरन्त बर्खास्त करे ताकि उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित सीबीआई जांच निष्पक्ष और अबाध रूप से पूरी की जा सके। भाकपा ने कुलपति को हटाने की मांग को लेकर एएमयू में चल रहे आन्दोलन को पुरजोर समर्थन भी प्रदान किया है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने आरोप लगाया कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं और केन्द्र सरकार द्वारा एक कमेटी से कराई गयी जांच में वे दोषी पाये गये हैं लेकिन सरकार न तो उनके विरूद्ध कोई कार्रवाई कर रही है औरन न ही जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया गया है। इससे अमुवि के छात्रों, शिक्षकों, शिक्षणेतर कर्मचारियों एवं एमएमयू ओल्ड ब्याज में भी भारी आक्रोश व्याप्त हो गया है।
इस गहरे आक्रोश के चलते समूची एएमयू कम्यूनिटी आन्दोलन की राह पर है। एएमयू एंटी करप्शन फोरम के संयोजक प्रो.मदीउर्रहमान ‘सुहेब’ शेरवानी (जोकि भाकपा राज्य कार्यकारिणी के भी सदस्य हैं।) एवं प्रो. ए.ए. उस्मानी 16 मई से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। एएमयू स्टाफ एसोसिएशन के बैनर तले क्रमिक भूख हड़ताल जारी है। एएमयू स्टूडेन्ट्स यूनियन भी भूख हड़ताल पर है और छात्रों का एक स्वतंत्र ग्रुप अलग से भूख हड़ताल पर बैठा है। सच कहा जाये तो एएमयू कुलपति आवास के सामने वाला मार्ग जंतर-मंतर बन चुका है।
डा. गिरीश ने इस बात पर गहरा रोष जताया कि इन व्यापक जनान्दोलनों के बावजूद केन्द्र सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। केन्द्रसरकार ने सीबीआई जांच की घोषणा तो की है मगर उसका नोटीफिकेशन अभी तक नहीं किया। फिर सीबीआई जांच के पहले कुलपति को हटाने की बेहद जायज मांग को भी अभी तक नहीं माना। यह भ्रष्ट आचरण की परवरिश करने की साजिश है। भाकपा राज्य सचिव ने चेतावनी दी कि यदि केन्द्र सरकार एएमयू कम्यूनिटी की जायज मांगों पर अमल नहीं करेगी तो भाकपा को भी अपरिहार्य कदम उठाने को बाध्य होना पड़ेगा।
गुरुवार, 19 मई 2011
at 10:11 pm | 0 comments | ए.बी. बर्धन, रमेश पाढी
उड़ीसा सरकार की पोस्को एवं वेदान्तपरस्त नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध जारी रहेगा
भुवनेश्वर: “भाजपा नेतृत्व वाला राजग और कांगेस नेतृत्व वाला संप्रग दोनों ही विनाशकारी आर्थिक नीतियों पर अनुसरण करने के लिए जिम्मेदार हैं जिसके कारण पिछले 12 वर्ष में देश में 12000 पूंजीपति पैदा हो गये हैं और 20 लाख करोड़ से अधिक रुपये चोरी से स्विस बैंकों एवं अन्य विदेशी बैंकों में चले गये है।” भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ए.बी. बर्धन ने पार्टी की उड़ीसा इकाई द्वारा आयोजित एक विराट रैली मंे यह बात कही। उन्होंने उड़ीसा में बदतर होते हालत पर चिन्ता व्यक्त की।
बर्धन ने कहा: पिछला चुनाव हुए दो वर्ष से अधिक का समय बीत गया है। पर हमारी जनता के लिए क्या उपलब्धि है? देश की 100 करोड़ से अधिक की गरीबों एवं माध्यम वर्ग की आबादी को न केन्द्र की सरकार से कुछ मिला न राज्य की। केन्द्र एवं राज्य की न तो इन सरकारों ने जनता के भले के लिए कुछ किया और न उन पूर्ववर्ती सरकारों ने जिनकी शासक पार्टी अब फिर से सत्ता में आने के लिए मुंह बाये हुए है। देश में हर कहीं भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। 2जी स्पेक्ट्रम में दो करोड़ रुपये से भी अधिक का घोटाला हुआ है। बर्धन ने कहा कि गरीब लोगों के रहन-सहन के हालात बदतर हो रहे हैं। हाल यह हो गया है कि देश की लगभग 78 प्रतिशत आबादी 20 रुपये से भी कम के खर्च पर अपनी गुजर-बसर करने को मजबूर है; अभूतपूर्व महंगाई ने आम आदमी की दिन-प्रतिदिन की जिन्दगी को मुश्किल कर दिया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की तमाम सरकारों ने महंगाई को बढ़ावा दिया है इसका कुछ अपवाद रही तो केवल देवगाड़ा और गुजराल के प्रधानमंत्रित्व वाली वे सरकारें जिनमें कम्युनिस्ट मंत्री थे।
तथाकथित वेदांत विश्विविद्यालय को उड़ीसर सरकार द्वारा 8000 एकड़ जमीन के आवंटन की भर्त्सना करते हुए बर्धन ने कहा कि वेदंात कम्पनी का मालिक अनिल अग्रवाल एक कुख्यात कबाड़ीवाला है पर उड़ीसा सरकार ने उसे न केवल वेदांत विश्वविद्यालय के नाम पर जमीन आवंटित की बल्कि उसके स्टरलाईट अल्युमिना प्रोजेक्ट के लिए के केप्टिव लौह-अयस्क के लिए विशाल खान क्षेत्र भी उसे दे दिये हैं। इन परियोजनाओं के विरुद्ध हम कम्युनिस्ट ही अकेले उंगली नहीं उठा रहे हैं, लोकपाल, उच्च न्यायालय और देश के विभिन्न पर्यावरणविदों ने भी उड़ीसा सरकार द्वारा इस बहुराष्ट्रीय निगम को फायदा पहुंचाने के लिए किये गये पक्षपात पर आपत्ति की है। सरकार, लोकपाल और उड़ीसा के उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त सभी समितियों ने भी सरकार के कम्पनीपरस्त रूख और देश के कानूनों के उल्लंघन की भर्त्सना की है। राज्य सरकार किसानों द्वारा आत्महत्या, खान-खदानों के घोटालों और डायरिया की महामारी को रोकने में सर्वथा विफल रही है। बर्धन ने कहा है कि राज्य के किसानों एवं कृषि अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा कर नवीन पटनायक सरकार पिछले छह वर्ष से पारादीप में एक इस्पात परियोजना स्थापित करने की अपनी जनविरोधी नीतियों पर आगे बढ़ने पर उतारू है। सरकार ने निजी कम्पनी को केप्टिव लौह अयस्क खानें लीज पर दे दी हैं; उसे पारादीव बंदरगाह के पास केप्टिव पोर्ट बनाने की इजाजत दे दी है और कम्पनी को देने के लिए उस उपजाऊ कृषि जमीन और वनभूमि का अधिग्रहण करना चाहती है जिस पर वनवासी अपनी पीढ़ियों से खेती करते आये हैं और रहते आये हैं।
ए.बी. बर्धन ने राज्य सरकार को चेतावनी दी कि “आप पोस्को और वेदान्त जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए जमीन का जबरन अधिग्रहण नहीं कर सकते, देश के स्थापित कानूनों का उल्लंघन नहीं कर सकते।” उन्होंने पोस्को परियोजना और वेदान्त के विरूद्ध संघर्षरत लोगों के प्रति अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने राज्य के शासकों से कहा कि इतिहास से सबक लें; याद करें एक कम्पनी देश में आयी थी और उस कम्पनी के साथ शासकों के रिश्तों के कारण देश अपनी आजादी खो बैठा था। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आंदोलन करती संघर्षरत जनता की आवाज पर ध्यान देने के बजाय बहुराष्ट्रीय निगमों के हित साधने में लगी है, यदि ऐसा ही चलता रहा तो राज्य और इसके लोगों का भविष्य अंधकार में पड़ जायेगा। उन्हांेने आशा व्यक्त की कि यद्यपि बहुत देर हो चुकी है फिर भी अच्छा होगा सरकार अपनी गलती का अहसास करे और अपनी हानिकर
जनविरोधी नीतियों का परित्याग करें
बर्धन ने कहा कि सरकार ने यदि जनता के संघर्षों को कुचलना जारी रखा तो उड़ीसा के शांतिप्रिय लोग सरकार को इसके लिए माफ नहीं करेंगे
उन्होंने जनता से अपील की कि बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवा और बेहतर जीवन स्तर हासिल करने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा छेड़े गये संघर्ष में अधिकाधिक संख्या में हिस्सा लें। उन्होंने कहा, “हम संघर्ष कर रहे हैं और संघर्ष को आगे भी जारी रखेंगे। शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा, भविष्य हमारा है, जनता अपने एतिहासिक मिशन में कामयाबी हासिल करेगी।”
इस राज्य स्तरीय रेली की अध्यक्षता वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता प्रो. अबनि बोराल ने की। इस विराट रैली में लाल झंडे हाथों में उठाये 15000 से भी अधिक लोग शामिल थे। रैली में शामिल होने वालों में कोरा पुट, कालाहांडी और मलकानगिरी से आयी हुई आदिवासी महिलाएं थी तो गंधमर्दन हिल्स और केओंझार के खान खदानों के मजदूर भी थे; मयूरभंज, गजपति और गंजम जिलों के सैकड़ों हजारों गरीब आदिवासी भी रैली में शामिल थे। चिलचिलाती धूप, बेमौसम की बारिश और बादलों के गर्जन-तर्जन के बावजूद भारी संख्या में राज्य के गरीब लोग रैली में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे।
विशाल रैली को संबोधित करते हुए पार्टी के राज्य सचिव दिवाकर नायक ने कहा कि दुनिया के सबसे गरीब लोग किसी काल्पनिक लोक में नहीं बल्कि उड़ीसा के सबसे कम विकसित आठ जिलों (केबीके जिलों) में रहते हैं, यह यूएनडीपी (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम) का कथन है। उन्होंने कहा कि तीसरी बार भारी बहुमत हासिल करने के बाद नवीन पटनायक जनविरोधी नीतियों पर चलना जारी रखे हुए हैं, पोस्को और वेदान्त जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए उन्होंने सभी कायदे-कानूनों को ताक पर रख दिया है। सरकार वनभूमि के बारे में फर्जी रिपोर्टे बना रही है। हम मुख्यमंत्री से मिले और उनसे अनुरोध किया कि संबंधित गांवों में जाकर वह प्रस्तावित पोस्को क्षेत्र के बारे में वहां के लोगों की बात सुनें, उनकी राय जानें। पर मुख्यमंत्री उन गांवों का दौरा कर असलियत को समझने के बजाय वनभूमि के संबंध में अफसरों द्वारा तैयार फर्जी रिपोर्टों पर यकीन कर आगे सिफारिश कर रहे हैं। ऐसी हालत में जब सरकार आंदोलकारी संघर्षरत जनता को सुनना ही नहीं चाहती तो हमारे पास लोकतांत्रिक आंदोलनों और समूची मानवता का समर्थन लेकर संघर्ष और प्रतिरोध को जारी रखने के अलावा क्या रास्ता रह जाता है।
आदिकंद सेठी विधायक, खिरोद प्रसाद सिंह देव, नारायण रेड्डी, पूर्व विधायक और वयोवृद्ध नेता डीके पंडा ने भी रैली को संबोधित किया और जनता का आह्वान किया कि वे शोषण, दमन, उत्पीड़न और सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरूद्ध भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे तले आगामी दिनों में और भी तीव्र संघर्ष के लिए तैयार हो जायें।
आम सभा से पहले हजारों कार्यकर्ताओं ने लाल झंडे हाथों में उठाये हुए रेलवे स्टेशन से एक जुलूस शुरू किया जिसका नेतृत्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिवमंडल के सदस्य गौरहरि नायक, अशोक बीसी, बनलता जेना, पर्वत मिश्र, प्रशांत पट्टजोशी और राष्ट्रीय परिषद सदस्य रामकृष्ण पंडा, बसन्त पैकरे, प्रकाश पात्रा, सूरा जेना और विजय जेना आदि कर रहे थे।
- रमेश पाढी
बुधवार, 18 मई 2011
at 10:12 pm | 0 comments | शमीम फै़जी
मध्य पूर्व से कदम वापस लेने की फिराक में ओबामा प्रशासन
राष्ट्रपति पद के लिए अपने दूसरे कार्यकाल के अपने इरादे की घोषणा करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने अपने प्रशासन से मध्य पूर्व की भूल भुलैया से बाहर निकलने के तौर तरीकों के तलाश करने के लिए भी कहा है अन्यथा ईराक के कारण उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बुश का जो हाल हुआ वैसा ही कुछ उनके साथ भी होने वाला है। अमरीका लीबिया के मामले में जिम्मेदारी को अपने सहयोगियों, खासकर फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी पर डालने की कोशिश तो कर ही रहा है साथ ही वह लम्बे समय से घोषित अपने शत्रु अलकायदा समेत अपने लिए किन्हीं नयी कठपुतलियों की तलाश में व्यग्र है क्योंकि उसे आशंका है कि उसके कठपुतली राष्ट्रपति अली अबदुल्ला सालेह के पतन में देरी से वहां उसके और मध्य पूर्व में अमरीका के सबसे मूल्यवान सहयोगी सऊदी अरब, दोनों के प्रति वैरभाव रखने वाली ताकतें वहां आ सकती हैं।
जहां तक लीबिया की बात है सभी संकेत ऐसे हैं कि अत्यधिक नृशंस बमबारी, यहां तक कि अस्पतालों एवं अनाथालयों जैसे स्थानों पर भी बमबारी, जिनमें सैकड़ों निर्दोष असैन्य लोग मारे गये हैं, गद्दाफी परिवार और उसके कबीले के लोगों के बीच कोई खाई नहीं पैदा कर सकी है। पिछले इतवार को फ्रांस और ब्रिटेन के लड़ाकू जहाजों ने पूर्वी तेल क्षेत्रों के निकट बम बरसाये जिसमें दर्जनों वे लोग मारे गये जो आंदोलनकारी समझे जाते हैं। इससे विद्रोही इस हद तक ‘नाराज‘ हुए हैं कि वे हमलावर फौजों के विरूद्ध नारे लगाने लगे। पहले अमरीका और उसके सहयोगी दावा कर रहे थे कि यही लोग कह रहे थे कि अमरीका लीबिया में ‘नो फ्लाई जोन‘ (हवाई उड़ान वर्जित क्षेत्र) लागू करने से कुछ अधिक कार्रवाई करे। यह सच है कि जब ‘नो फ्लाई जोन‘ के फैसले की घोषणा हुई थी तो विद्रोहियों के मजबूत प्रभाव वाले बेन गाजी और उसके आसपास इलाकों में सरकोजी को हीरो के रूप में माना गया था। अब वही लोग हमलावरों के खिलाफ नारे बुलंद कर रहे हैं क्योंकि लड़ाकू हवाई जहाज आंदोलनकारियों और उनके समर्थकों समेत लोगों को बमबारी कर अधंाधंुध मार रहे हैं।
सरकोजी, जिन्हें अगले वर्ष राष्ट्रपति पद के लिए बड़े मुश्किल चुनाव का सामना करना है, की अपनी स्वयं की मजबूरियां हैं। अपने देश में वह तेजी से समर्थन खो रहे हैं। स्थानीय निकायों के चुनाव में उनकी शासक पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। सोशलिस्टों के नेतृत्व में वामपंथियों ने और ग्रीन पार्टी ने अनेक नगर पालिकाओं पर कब्जा कर लिया है। नस्लवादी नेशनलिस्ट पार्टी ने सरकोजी की शासक पार्टी की कीमत पर चुनाव में फायदा उठाया। इसके अलावा, शासक पार्टी के अंदर भी सरकोजी का विरोध बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री फ्रांसोइस फिल्लॉन राष्ट्रपति पद के लिए वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में उभर रहे हैं। इस एवं अन्य कुछ कारणों ने सरकोजी को लीबिया में जुआ खेलने को मजबूर किया।
असल में, टयूनीशिया और मिस्र में अपनी भयंकर गलतियों के कारण सरकोजी बदहवास हो गये थे। जब इन दो देशों में विद्रोह चरम शिखर पर था फ्रांस के विदेश मंत्री माइकेल एल्लियट-मैरी अपने परिवार के साथ ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति जिने-अल आबेदिन बेन अली की मेहमानवाजी के मजे ले रही थी और ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति के सऊदी अरब को भागने के चंद दिन पहले उन्होंने वहां रहते हुए ही ट्यूनीशिया की दमनकारी सरकार के लिए खुला समर्थन व्यक्त किया। इसी प्रकार बड़े दिन से अपनी छुट्टी के दौरान फ्रांस के प्रधानमंत्री भी होस्नी मुबारक के मेहमान थे। दोनों ही देशों में फ्रांस सरकार इतिहास के गलत पलड़े में पायी गयी।
जन विद्रोह के विरोध की भयंकर गलती ने सरकोजी को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया। इससे पार पाने के लिए सरकोजी को अरब जगत में किसी साहसिक कार्य की जरूरत थी। ब्रिटिश प्रशानमंत्री के साथ मिलकर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में घालमेल की। मूल प्रस्ताव में सशस्त्र बलों के इस्तेमाल की बात थी, दो स्थायी सदस्यों-रूस और चीन के भारी विरोध के बाद उसे ‘नो फ्लाई जोन‘ में बदल दिया गया। ‘नो फ्लाई जोन‘ प्रस्ताव का समर्थन पांच सदस्यों-रूस, चीन, भारत, ब्राजील और जर्मनी ने नहीं किया। वे मतदान से अनुपस्थित हो गये। जर्मनी द्वारा साथ छोड़ना अमरीका फ्रांस और ब्रिटेन की तिकड़ी के लिए सबसे बड़ा धक्का है।
असैन्य क्षेत्रों पर अपनी बमबारी को सही ठहराने के लिए हमलावर फौजों ने 22 सदस्यीय अरब लीग द्वारा निर्विरोध समर्थन का दावा किया पर स्वयं अरब लीग के महासचिव ने इस दावे से असहमति व्यक्त की। उन्होंने इसे सुरक्षा परिषद के कार्यक्षेत्र से परे बताया। अभी तक कतर और ओमन-ये दो खाड़ी देश ही लीबिया पर हमला करने वाली फौजों में शामिल हुए हैं। सऊदी और संयुक्त अरब अमीरात ने शासक पार्टी के विरूद्ध जनता की बगावत को कुचलने के लिए अशांत देश-बहरीन में अपनी फौजों को भेजा है। बहरीन गयी सऊदी फौज में पाकिस्तानी मिलटरी कर्मचारी शामिल हैं। बहरीन के अधिकांश लोग बगावत में शामिल हो गये हैं, उन्होंने सरकार को ठप्प कर दिया है। यमन ओर जोर्डन में भी विद्रोह हो रहा है। सीरिया ने लीबिया पर हमले का विरोध किया था, अब उसे अमरीका का कोपभाजन बनना पड़ रहा है, राजधानी दमिश्क के दक्षिण में सरकार विरोधी आंदोलन की पुश्त पर अमरीका है। कुवैत में अमीर-अल-सबाह के तहत थोड़ी बहुत लोकतांत्रिक व्यवस्था है, वह भी राजनैतिक उथल-पुथल की चपेट में है, उसके परिणामस्वरूप मंत्रीमंडल ने त्यागपत्र दे दिया है।
अमरीका फ्रांस-ब्रिटेन की तिकड़ी को उम्मीद थी कि एक सप्ताह में लीबिया को ‘जीत‘ लेंगे। फ्रांस ने साफ कर दिया था कि गद्दाफी के बाद वह कब्जावर फौजों का नेतृत्व करेगा, पर अमरीका नाटो मुख्यालय को थोपना चाहता था। इससे पश्चिम के सहयोगियों में दरार पैदा हो गयी है।
फ्रांस, जो परमाणु ऊर्जा पर निर्भर है और उसके पास ‘न कोयला है, न तेल है, अतः कोई विकल्प नहीं‘ उसकी निगाह लीबिया के तेल क्षेत्रों पर थी। लीबिया के जिस क्षेत्र में 64.4 बिलियन बैरल तेल का रिजर्व है, वहां उस कबीले के लोग रहते हैं जिससे गद्दाफी हैं। इसके अलावा, लीबिया में 55 ट्रिलियन घन फिट प्राकृतिक गैस का रिजर्व है। लीबिया प्रतिदिन 1.8 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन करता है जो विश्व के कुल उत्पादन का दो प्रतिशत है। लीबिया प्रति वर्ष एक हजार बिलियन घन फिट से
अधिक गैस का उत्पादन करता है। लीबिया के तेल रिजर्व का 80 प्रतिशत हिस्सा सिरते नदी घाटी के उस इलाके में है जो गद्दाफी कबीले का गढ़ है और शासक परिवार के साथ मजबूती से टिका है।
लीबिया में युद्ध लम्बा खिंचने और ईराक के रास्ते पर जाने की संभावना के चलते अमरीका को इस जोखिम में अपनी हिस्सेदारी को जारी रखना मुश्किल पड़ रहा है। अमरीका शुरू में चाहता था कि गद्दाफी के हटने के बाद की सरकार नाटो की देखरेख में चले पर अब वह उस विचार को छोड़ कर इसे यूरोपीय संघ के हवाले करने के लिए सोच रहा है। मालूम नहीं अमरीका की योजना अंत में कामयाब होती है या कोई अन्य समझौते जैसी कोई बात होगी। लगता है गद्दाफी के दो बेटों के साथ किसी समझौते पर पहुंचने जैसी बातें हो रही हैं। गद्दाफी के दो छोटे बेटे किसी भी तरह के समझौते के विरूद्ध हैं। आगामी सप्ताहों में चित्र साफ तरह से सामने आयेगा। बहरहाल, गद्दाफी से पार पाना बहुत कठिन हो रहा है।
अमरीका का असली सिरदर्द यमन है जहां उसके कठपुतली शासक सालेह का उसकी भरोसेमंद सेना और अपने कबीले ने भी साथ छोड़ दिया है। अभी तक अमरीकी सरकार इस घृणापात्र राष्ट्रपति को बचाती रही है जो पिछले 32 वर्ष से अपने कठोर तरीकों से ‘एकताबद्ध‘ यमन पर शासन करता आया है। अमरीका उसे अलकायदा के विरूद्ध अपने संघर्ष में अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी के रूप में मानता आया है। यमन में जनवरी से जनविद्रोह चल रहा है और वहां के घटनाक्रम पर अमरीका अभी तक चुप्पी रखे हुए था। यमन के मामले में अमरीका उलझन में है।
यमन के एकीकरण से पहले दक्षिण यमन के रेडिकल शासकों ने, जिनका मुख्यालय अदन में और सऊदी अरब की सीमा के पास था, सऊदी भूक्षेत्र पर अपना दावा किया था। 30 वर्ष पहले तथाकथित रक्तरंजित ‘एकीकरण के बाद अली अब्दुल्ला सालेह को एक अमरीकी कठपुतली की तरह वहां शासक बनाया गया। सालेह को खुश रखने के लिए सऊदी अरब हर वर्ष उसको पैसा देता रहा। यमन में वर्तमान विद्रोह के दो विकल्प है, जो रेडिकल नेतृत्व विद्रोह की अगुवाई कर रहा है उसके हाथ में सत्ता को आने दिया जाये या फिर देश को उत्तर और दक्षिण में बांट दिया जाये। दोनों ही हालतों में सऊदी अरब के लिए खतरा पैदा होगा जिसके लिए अमरीका तैयार नहीं हो सकता। दुनिया के इस क्षेत्र में अमरीकी ताकत का मुख्य ठिकाना सऊदी अरब है। अतः अमरीका के सामने दुविधा है। अन्य खतरा है समूचे अरब जगत में बढ़ती अमरीका विरोधी भावनाएं। यदि रक्तरंजित विद्रोह में अली अब्दुल्ला सालेह सत्ता से उखाड़ फेंका जाता है तो उससे बहरीन-कतर, ओमन और सऊदी अरब समेत खाड़ी के सभी देशों में अमरीका विरोधी भावनाएं मजबूत होंगी। बहरीन अमरीका के 5वें बेडे का मेजबान है तो अमरीका की सेंट्रल कमान्ड ओमन में स्थित है। दोनों ही उथल-पुथल के शिकार हैं। यमन के जनविद्रोह की सफलता से न केवल खाड़ी के अन्य देशों में ऐसे आंदोलन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि वे आंदोलन वास्तविक रूप में अमरीका विरोधी आंदोलनों में बदल जायेंगे।
यही कारण है कि ओबामा सरकार इस नतीजे पर पहुंच चुकी है कि अब्दुला सालेह को हटना पड़ेगा। पर उसकी जगह कौन लेगा? अमरीका ने इसके लिए दमन के गवर्नर को, जो विद्रोही कतारों में शामिल हो चुके हैं, खींचना चाहा पर सऊदी अरब उन पर भरोसा करने को तैयार नहीं। एक अन्य चिन्ता यह है कि कई कबीलाई चीफों के बीच झगड़े हो सकते हैं।
पश्चिम की कुछ गुप्तचर एजेंसियों के अनुसार अब अमरीकी सरकार अपने लम्बे अरसे से दुश्मन अलकायदा, जिसको कबीला-चीफों का काफी समर्थन हासिल है, के साथ कुछ समझौते की संभावनाओं पर गौर कर रहा है। इस समय वह यमन में सबसे अधिक संगठित ताकत है।
मिस्र में 1952 में जब नासिर ने राजा फारूक और नेशनलिस्ट पार्टी (होस्नी मुबारक की पार्टी) का तख्ता पलट कर सत्ता हासिल की थी तब ही से मुस्लिम ब्रदर हुड पर प्रतिबंध रहा है। उल्लेखनीय है कि अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने अपनी हाल की काहिरा यात्रा के दौरान धार्मिक कट्टरपंथी मुस्लिम ब्रदर हुड से कुछ सौदा किया। रिपोर्ट है कि दो पूर्व-शत्रु सितम्बर 2011 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को आपस में मिलकर लड़ेंगे। इसी तरह का कोई सौदा यमन में भी हो जाये इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
अमरीका इस तरह की कलाबाजियों से बहरीन, ओमन और कतर में जहां पहले ही भारी उथल-पुथल चल रही है- अपने कठपुतली शासकों को बचाना चाहता है। यमन के घटनाक्रम से सऊदी अरब को भारी नुकसान पहुंचेगा।
लगभग सभी अरब देशों में राजनैतिक सुधारों के लिए बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। बहरीन में अस्तव्यस्त राजधानी शहर समेत शिया बहुल शहरों और कस्बों में प्रदर्शन हुए हैं। बहरीन की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी-वेफाक के प्रवक्ता मत्तर इब्राहिम मत्तर के अनुसार सैकड़ों प्रदर्शनकारी गिरतार किये गये हैं, दर्जनों गायब हैं। देश में तैनात सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की सेनाओं ने अस्पतालों और उन सभी सरकारी संस्थानों को निशाना बनाया है जिन पर आंदोलनकारियों ने कब्जा कर रखा है।
पहली अप्रैल को मस्कट के उत्तर में बदंरगाह शहर सोहर में राजनैतिक कैदियों की रिहाई और राजनैतिक सुधारों की मांग करते आंदोलनकारियों को तितर-बितर करने के लिए ओमन की पुलिस ने गोलियां चलायी, जिसमें एक प्रदर्शनकारी मारा गया। सोहर में कई सप्ताह से धरने-प्रदर्शन हो रहे थे। प्रदर्शनकारी सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को हड़ताल के लिए और धरने पर बैठने के लिए मनाने में कामयाब रहे। 5 अप्रैल को सोहर में एक महीने से चल रहे प्रदर्शन और धरने पर ओमन की सेना ने हमला किया और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर कर दिया। शासकों ने लोगों के बीच कुछ अफवाहे फैला कर और शिया और सुन्नी का नाम लेकर फूट डालने की कोशिश की पर उनकी कोशिश कामयाब नहीं हो सकी।
जोर्डन में भी पहली अप्रैल जुम्मे के दिन को व्यापक प्रदर्शन हुए। जोर्डन के लोग जुम्मे के दिन राजनीतिक सुधारों की मांग के लिए प्रदर्शन करते हैं। यह इस तरह के प्रदर्शनों के सिलसिले में 15वां जुम्मा था। राजधानी अम्मान में छात्र-युवा, फेसबुक कार्यकर्ता और इस्लामिस्ट-सब मिलकर नारा लगा रहे थे, ‘सुधार करो, हम नया प्रधानमंत्री चुनना चाहते हैं।‘ पुलिस ने गोली चलाई, एक प्रदर्शनकारी मारा गया, लगभग 120 जख्मी हुए। लोग चाहते हैं राजा अब्दुल्ला-2 अपनी निरंकुश शक्तियों को छोड़े और नये चुनाव किये जायें।
संयोग से पहली अप्रैल को काहिरा के तहरीर चौक में भी हजारों लोग भ्रष्ट अधिकारियों को हटाने की मांग करते हुए फिर जमा हुए। उनका मत था कि मुबारक के रक्षामंत्री की अध्यक्षता में सुप्रीम आर्म्ड कौंसिल उनकी क्रांति को बरबाद कर रही है, वह भ्रष्ट अधिकारियों का न केवल बचाव कर रही है बल्कि मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी ताकतों और अन्य कट्टर धार्मिकपंथी संगठनों को संरक्षण दे रही है। तहरीर चौक पर एक बैनर था, वैधता तहरीक चौक से मिलती है। परिवर्तन का अर्थ है परिवर्तन‘ एक अन्य बैनर था- ”उफ! कौंसिल संदेश अभी नहीं आया है, हम ऐसा संविधान चाहते है जिस पर हमें भरोसा हो।“ भूमध्य सागर के तट पर मिस्र के दूसरे सबसे बड़े शहर एलेक्जेंडरिया में भी हजारों लोग मुख्य चौक पर जमा हुए। इसी तरह के नारे लगाते हुए हजारों लोग स्वेज और महल्ला-अल-कुबरा शहरों में भी सड़कों पर उतर पड़े।
पहली अप्रैल को सबसे
अधिक उल्लेखनीय विरोध-प्रदर्शन सऊदी अरब में हुआ। संघर्षरत बहरीन के अपने भाईयों के समर्थन में और स्वयं सऊदी अरब में निरंकुश शासन के खात्मे की मांग करते हुए सैंकड़ों शांतिपूर्ण शियाओं ने राजशाही के पूर्व तेल क्षेत्र में प्रदर्शन किया। जुम्मे की नमाज के तुरन्त बाद प्रदर्शनकारी कातिफ के पास एक गांव अवामिया में जमा हुए। आंदोलनकारियों ने निरंकुश सुन्नी बादशाहत द्वारा शियाओं के विरूद्ध भेदभाव को खत्म करने की मांग की। उन्होंने नारे लगाये जिनमें ”तेल एवं बेरोजगारी, इंसाफ क्या है?“ ”बहरीन से फौज वापस बुलाओ“, ”बहरीन के लोगों को अपनी नियति तय करने दो“ जैसे नारे लगाये गये। संयोग से साझा मांगों में एक है महिलाओं का सशक्तीकरण। संभवतः कुवैत के अलावा, जहांॅ पांॅच वर्ष पहले महिलाओं को मताधिकार दिया गया और जहांॅ अब उनका संसद और कैबिनेट में प्रतिनिधित्व है, अधिकांश अरब देशों में महिलाएं इन अधिकारों से वंचित है। सऊदी अरब में जून में स्थानीय निकायों में आंशिक चुनाव होने वाले हैं। आधे सदस्य चुने जायेंगे और आधों के लिए राजा मनोनयन करेगा। इन चुनावों में भी महिलाओं को मताधिकार नहीं दिया गया है।
कुवैत में शासक परिवार के विरूद्ध यद्यपि अभी तक खुले प्रदर्शन तो नहीं हुए हैं पर असंतोष की आग सुलग रही है। जब संसद सदस्यों ने प्रधानमंत्री समेत मंत्रियों पर सवाल दागे तो केबिनेट ने त्यागपत्र दे दिया। इनमें से
अधिकांश मंत्री शासक अल-सबहा परिवार के हैं। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों के अलावा सरकार पर पड़ोसी देश बहरीन में लोकप्रिय विद्रोह के मुद्दे पर हिचकिचाहट के आरोप लगे हैं। कुवैत गल्फ कोआपरेशन कौसिल का सदस्य है। इस कौंसिल के दो सदस्य देशों-सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने बहरीन में अपनी फौजें भेजी हैं पर कुवैत ने नहीं। इसके बजाय उसने वहां एक मेडिकल मिशन भेजा जिसे वहां प्रवेश नहीं दिया गया क्योंकि उस मिशन के कुछ सदस्य उस शिया सम्प्रदाय के थे जिसका सुन्नी शाही परिवार द्वारा शासित बहरीन में बहुमत है।
अरब संचार माध्यम में इन जनविद्रोहों को शिया शासित ईरान द्वारा उकसाये गये विद्रोहों के रूप में पेश करने की एक कोशिश चल रही है। कुवैत में एक अदालत ने ईरान के लिए जासूसी के आरोप में सेना के तीन कर्मचारियों को मौत की सजा दे दी है हालांकि ईरान की सरकार ने जासूनी की बात से मजबूती के साथ इंकार किया है। अदालत के इस फैसले के आधार पर कुवैत के संचार
माध्यमों के एक हिस्से ने एक जबर्दस्त शिया विरोधी अभियान छेड़ दिया है। उनके मुख्य निशाने पर हैं लेबनान का हजबोल्ला और हमास जिसका गाजा पट्टी पर शासन है। संयोग से ये दोनों इस्राइल के सबसे पक्के विरोधी है। उन पर खाड़ी के लगभग सभी देशों में सरकार विरोधी आंदोलन भड़काने के आरोप लगाये जा रहे हैं। वही संचार माध्यम सीरिया में बशर अल असद सरकार के विरूद्ध विरोध प्रदर्शनों को जनता के विद्रोह के रूप में पेश कर रहे हैं। यद्यपि वह आंदोलन दमिश्क के दक्षिण में केवल एक शहर तक सीमित है।
अरब संचार माध्यमों पर विश्वास करें तो खाड़ी क्षेत्र और उत्तरी अफ्रीका समेत समूचे अरब जगत में जबर्दस्त कन्फयूजन चल रहा है, हर कोई घटनाक्रम की अपने तरीके से व्याख्या कर रहा है।
- शमीम फै़जी
जहां तक लीबिया की बात है सभी संकेत ऐसे हैं कि अत्यधिक नृशंस बमबारी, यहां तक कि अस्पतालों एवं अनाथालयों जैसे स्थानों पर भी बमबारी, जिनमें सैकड़ों निर्दोष असैन्य लोग मारे गये हैं, गद्दाफी परिवार और उसके कबीले के लोगों के बीच कोई खाई नहीं पैदा कर सकी है। पिछले इतवार को फ्रांस और ब्रिटेन के लड़ाकू जहाजों ने पूर्वी तेल क्षेत्रों के निकट बम बरसाये जिसमें दर्जनों वे लोग मारे गये जो आंदोलनकारी समझे जाते हैं। इससे विद्रोही इस हद तक ‘नाराज‘ हुए हैं कि वे हमलावर फौजों के विरूद्ध नारे लगाने लगे। पहले अमरीका और उसके सहयोगी दावा कर रहे थे कि यही लोग कह रहे थे कि अमरीका लीबिया में ‘नो फ्लाई जोन‘ (हवाई उड़ान वर्जित क्षेत्र) लागू करने से कुछ अधिक कार्रवाई करे। यह सच है कि जब ‘नो फ्लाई जोन‘ के फैसले की घोषणा हुई थी तो विद्रोहियों के मजबूत प्रभाव वाले बेन गाजी और उसके आसपास इलाकों में सरकोजी को हीरो के रूप में माना गया था। अब वही लोग हमलावरों के खिलाफ नारे बुलंद कर रहे हैं क्योंकि लड़ाकू हवाई जहाज आंदोलनकारियों और उनके समर्थकों समेत लोगों को बमबारी कर अधंाधंुध मार रहे हैं।
सरकोजी, जिन्हें अगले वर्ष राष्ट्रपति पद के लिए बड़े मुश्किल चुनाव का सामना करना है, की अपनी स्वयं की मजबूरियां हैं। अपने देश में वह तेजी से समर्थन खो रहे हैं। स्थानीय निकायों के चुनाव में उनकी शासक पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। सोशलिस्टों के नेतृत्व में वामपंथियों ने और ग्रीन पार्टी ने अनेक नगर पालिकाओं पर कब्जा कर लिया है। नस्लवादी नेशनलिस्ट पार्टी ने सरकोजी की शासक पार्टी की कीमत पर चुनाव में फायदा उठाया। इसके अलावा, शासक पार्टी के अंदर भी सरकोजी का विरोध बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री फ्रांसोइस फिल्लॉन राष्ट्रपति पद के लिए वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में उभर रहे हैं। इस एवं अन्य कुछ कारणों ने सरकोजी को लीबिया में जुआ खेलने को मजबूर किया।
असल में, टयूनीशिया और मिस्र में अपनी भयंकर गलतियों के कारण सरकोजी बदहवास हो गये थे। जब इन दो देशों में विद्रोह चरम शिखर पर था फ्रांस के विदेश मंत्री माइकेल एल्लियट-मैरी अपने परिवार के साथ ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति जिने-अल आबेदिन बेन अली की मेहमानवाजी के मजे ले रही थी और ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति के सऊदी अरब को भागने के चंद दिन पहले उन्होंने वहां रहते हुए ही ट्यूनीशिया की दमनकारी सरकार के लिए खुला समर्थन व्यक्त किया। इसी प्रकार बड़े दिन से अपनी छुट्टी के दौरान फ्रांस के प्रधानमंत्री भी होस्नी मुबारक के मेहमान थे। दोनों ही देशों में फ्रांस सरकार इतिहास के गलत पलड़े में पायी गयी।
जन विद्रोह के विरोध की भयंकर गलती ने सरकोजी को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया। इससे पार पाने के लिए सरकोजी को अरब जगत में किसी साहसिक कार्य की जरूरत थी। ब्रिटिश प्रशानमंत्री के साथ मिलकर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में घालमेल की। मूल प्रस्ताव में सशस्त्र बलों के इस्तेमाल की बात थी, दो स्थायी सदस्यों-रूस और चीन के भारी विरोध के बाद उसे ‘नो फ्लाई जोन‘ में बदल दिया गया। ‘नो फ्लाई जोन‘ प्रस्ताव का समर्थन पांच सदस्यों-रूस, चीन, भारत, ब्राजील और जर्मनी ने नहीं किया। वे मतदान से अनुपस्थित हो गये। जर्मनी द्वारा साथ छोड़ना अमरीका फ्रांस और ब्रिटेन की तिकड़ी के लिए सबसे बड़ा धक्का है।
असैन्य क्षेत्रों पर अपनी बमबारी को सही ठहराने के लिए हमलावर फौजों ने 22 सदस्यीय अरब लीग द्वारा निर्विरोध समर्थन का दावा किया पर स्वयं अरब लीग के महासचिव ने इस दावे से असहमति व्यक्त की। उन्होंने इसे सुरक्षा परिषद के कार्यक्षेत्र से परे बताया। अभी तक कतर और ओमन-ये दो खाड़ी देश ही लीबिया पर हमला करने वाली फौजों में शामिल हुए हैं। सऊदी और संयुक्त अरब अमीरात ने शासक पार्टी के विरूद्ध जनता की बगावत को कुचलने के लिए अशांत देश-बहरीन में अपनी फौजों को भेजा है। बहरीन गयी सऊदी फौज में पाकिस्तानी मिलटरी कर्मचारी शामिल हैं। बहरीन के अधिकांश लोग बगावत में शामिल हो गये हैं, उन्होंने सरकार को ठप्प कर दिया है। यमन ओर जोर्डन में भी विद्रोह हो रहा है। सीरिया ने लीबिया पर हमले का विरोध किया था, अब उसे अमरीका का कोपभाजन बनना पड़ रहा है, राजधानी दमिश्क के दक्षिण में सरकार विरोधी आंदोलन की पुश्त पर अमरीका है। कुवैत में अमीर-अल-सबाह के तहत थोड़ी बहुत लोकतांत्रिक व्यवस्था है, वह भी राजनैतिक उथल-पुथल की चपेट में है, उसके परिणामस्वरूप मंत्रीमंडल ने त्यागपत्र दे दिया है।
अमरीका फ्रांस-ब्रिटेन की तिकड़ी को उम्मीद थी कि एक सप्ताह में लीबिया को ‘जीत‘ लेंगे। फ्रांस ने साफ कर दिया था कि गद्दाफी के बाद वह कब्जावर फौजों का नेतृत्व करेगा, पर अमरीका नाटो मुख्यालय को थोपना चाहता था। इससे पश्चिम के सहयोगियों में दरार पैदा हो गयी है।
फ्रांस, जो परमाणु ऊर्जा पर निर्भर है और उसके पास ‘न कोयला है, न तेल है, अतः कोई विकल्प नहीं‘ उसकी निगाह लीबिया के तेल क्षेत्रों पर थी। लीबिया के जिस क्षेत्र में 64.4 बिलियन बैरल तेल का रिजर्व है, वहां उस कबीले के लोग रहते हैं जिससे गद्दाफी हैं। इसके अलावा, लीबिया में 55 ट्रिलियन घन फिट प्राकृतिक गैस का रिजर्व है। लीबिया प्रतिदिन 1.8 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन करता है जो विश्व के कुल उत्पादन का दो प्रतिशत है। लीबिया प्रति वर्ष एक हजार बिलियन घन फिट से
अधिक गैस का उत्पादन करता है। लीबिया के तेल रिजर्व का 80 प्रतिशत हिस्सा सिरते नदी घाटी के उस इलाके में है जो गद्दाफी कबीले का गढ़ है और शासक परिवार के साथ मजबूती से टिका है।
लीबिया में युद्ध लम्बा खिंचने और ईराक के रास्ते पर जाने की संभावना के चलते अमरीका को इस जोखिम में अपनी हिस्सेदारी को जारी रखना मुश्किल पड़ रहा है। अमरीका शुरू में चाहता था कि गद्दाफी के हटने के बाद की सरकार नाटो की देखरेख में चले पर अब वह उस विचार को छोड़ कर इसे यूरोपीय संघ के हवाले करने के लिए सोच रहा है। मालूम नहीं अमरीका की योजना अंत में कामयाब होती है या कोई अन्य समझौते जैसी कोई बात होगी। लगता है गद्दाफी के दो बेटों के साथ किसी समझौते पर पहुंचने जैसी बातें हो रही हैं। गद्दाफी के दो छोटे बेटे किसी भी तरह के समझौते के विरूद्ध हैं। आगामी सप्ताहों में चित्र साफ तरह से सामने आयेगा। बहरहाल, गद्दाफी से पार पाना बहुत कठिन हो रहा है।
अमरीका का असली सिरदर्द यमन है जहां उसके कठपुतली शासक सालेह का उसकी भरोसेमंद सेना और अपने कबीले ने भी साथ छोड़ दिया है। अभी तक अमरीकी सरकार इस घृणापात्र राष्ट्रपति को बचाती रही है जो पिछले 32 वर्ष से अपने कठोर तरीकों से ‘एकताबद्ध‘ यमन पर शासन करता आया है। अमरीका उसे अलकायदा के विरूद्ध अपने संघर्ष में अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी के रूप में मानता आया है। यमन में जनवरी से जनविद्रोह चल रहा है और वहां के घटनाक्रम पर अमरीका अभी तक चुप्पी रखे हुए था। यमन के मामले में अमरीका उलझन में है।
यमन के एकीकरण से पहले दक्षिण यमन के रेडिकल शासकों ने, जिनका मुख्यालय अदन में और सऊदी अरब की सीमा के पास था, सऊदी भूक्षेत्र पर अपना दावा किया था। 30 वर्ष पहले तथाकथित रक्तरंजित ‘एकीकरण के बाद अली अब्दुल्ला सालेह को एक अमरीकी कठपुतली की तरह वहां शासक बनाया गया। सालेह को खुश रखने के लिए सऊदी अरब हर वर्ष उसको पैसा देता रहा। यमन में वर्तमान विद्रोह के दो विकल्प है, जो रेडिकल नेतृत्व विद्रोह की अगुवाई कर रहा है उसके हाथ में सत्ता को आने दिया जाये या फिर देश को उत्तर और दक्षिण में बांट दिया जाये। दोनों ही हालतों में सऊदी अरब के लिए खतरा पैदा होगा जिसके लिए अमरीका तैयार नहीं हो सकता। दुनिया के इस क्षेत्र में अमरीकी ताकत का मुख्य ठिकाना सऊदी अरब है। अतः अमरीका के सामने दुविधा है। अन्य खतरा है समूचे अरब जगत में बढ़ती अमरीका विरोधी भावनाएं। यदि रक्तरंजित विद्रोह में अली अब्दुल्ला सालेह सत्ता से उखाड़ फेंका जाता है तो उससे बहरीन-कतर, ओमन और सऊदी अरब समेत खाड़ी के सभी देशों में अमरीका विरोधी भावनाएं मजबूत होंगी। बहरीन अमरीका के 5वें बेडे का मेजबान है तो अमरीका की सेंट्रल कमान्ड ओमन में स्थित है। दोनों ही उथल-पुथल के शिकार हैं। यमन के जनविद्रोह की सफलता से न केवल खाड़ी के अन्य देशों में ऐसे आंदोलन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि वे आंदोलन वास्तविक रूप में अमरीका विरोधी आंदोलनों में बदल जायेंगे।
यही कारण है कि ओबामा सरकार इस नतीजे पर पहुंच चुकी है कि अब्दुला सालेह को हटना पड़ेगा। पर उसकी जगह कौन लेगा? अमरीका ने इसके लिए दमन के गवर्नर को, जो विद्रोही कतारों में शामिल हो चुके हैं, खींचना चाहा पर सऊदी अरब उन पर भरोसा करने को तैयार नहीं। एक अन्य चिन्ता यह है कि कई कबीलाई चीफों के बीच झगड़े हो सकते हैं।
पश्चिम की कुछ गुप्तचर एजेंसियों के अनुसार अब अमरीकी सरकार अपने लम्बे अरसे से दुश्मन अलकायदा, जिसको कबीला-चीफों का काफी समर्थन हासिल है, के साथ कुछ समझौते की संभावनाओं पर गौर कर रहा है। इस समय वह यमन में सबसे अधिक संगठित ताकत है।
मिस्र में 1952 में जब नासिर ने राजा फारूक और नेशनलिस्ट पार्टी (होस्नी मुबारक की पार्टी) का तख्ता पलट कर सत्ता हासिल की थी तब ही से मुस्लिम ब्रदर हुड पर प्रतिबंध रहा है। उल्लेखनीय है कि अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने अपनी हाल की काहिरा यात्रा के दौरान धार्मिक कट्टरपंथी मुस्लिम ब्रदर हुड से कुछ सौदा किया। रिपोर्ट है कि दो पूर्व-शत्रु सितम्बर 2011 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को आपस में मिलकर लड़ेंगे। इसी तरह का कोई सौदा यमन में भी हो जाये इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
अमरीका इस तरह की कलाबाजियों से बहरीन, ओमन और कतर में जहां पहले ही भारी उथल-पुथल चल रही है- अपने कठपुतली शासकों को बचाना चाहता है। यमन के घटनाक्रम से सऊदी अरब को भारी नुकसान पहुंचेगा।
लगभग सभी अरब देशों में राजनैतिक सुधारों के लिए बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। बहरीन में अस्तव्यस्त राजधानी शहर समेत शिया बहुल शहरों और कस्बों में प्रदर्शन हुए हैं। बहरीन की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी-वेफाक के प्रवक्ता मत्तर इब्राहिम मत्तर के अनुसार सैकड़ों प्रदर्शनकारी गिरतार किये गये हैं, दर्जनों गायब हैं। देश में तैनात सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की सेनाओं ने अस्पतालों और उन सभी सरकारी संस्थानों को निशाना बनाया है जिन पर आंदोलनकारियों ने कब्जा कर रखा है।
पहली अप्रैल को मस्कट के उत्तर में बदंरगाह शहर सोहर में राजनैतिक कैदियों की रिहाई और राजनैतिक सुधारों की मांग करते आंदोलनकारियों को तितर-बितर करने के लिए ओमन की पुलिस ने गोलियां चलायी, जिसमें एक प्रदर्शनकारी मारा गया। सोहर में कई सप्ताह से धरने-प्रदर्शन हो रहे थे। प्रदर्शनकारी सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को हड़ताल के लिए और धरने पर बैठने के लिए मनाने में कामयाब रहे। 5 अप्रैल को सोहर में एक महीने से चल रहे प्रदर्शन और धरने पर ओमन की सेना ने हमला किया और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर कर दिया। शासकों ने लोगों के बीच कुछ अफवाहे फैला कर और शिया और सुन्नी का नाम लेकर फूट डालने की कोशिश की पर उनकी कोशिश कामयाब नहीं हो सकी।
जोर्डन में भी पहली अप्रैल जुम्मे के दिन को व्यापक प्रदर्शन हुए। जोर्डन के लोग जुम्मे के दिन राजनीतिक सुधारों की मांग के लिए प्रदर्शन करते हैं। यह इस तरह के प्रदर्शनों के सिलसिले में 15वां जुम्मा था। राजधानी अम्मान में छात्र-युवा, फेसबुक कार्यकर्ता और इस्लामिस्ट-सब मिलकर नारा लगा रहे थे, ‘सुधार करो, हम नया प्रधानमंत्री चुनना चाहते हैं।‘ पुलिस ने गोली चलाई, एक प्रदर्शनकारी मारा गया, लगभग 120 जख्मी हुए। लोग चाहते हैं राजा अब्दुल्ला-2 अपनी निरंकुश शक्तियों को छोड़े और नये चुनाव किये जायें।
संयोग से पहली अप्रैल को काहिरा के तहरीर चौक में भी हजारों लोग भ्रष्ट अधिकारियों को हटाने की मांग करते हुए फिर जमा हुए। उनका मत था कि मुबारक के रक्षामंत्री की अध्यक्षता में सुप्रीम आर्म्ड कौंसिल उनकी क्रांति को बरबाद कर रही है, वह भ्रष्ट अधिकारियों का न केवल बचाव कर रही है बल्कि मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी ताकतों और अन्य कट्टर धार्मिकपंथी संगठनों को संरक्षण दे रही है। तहरीर चौक पर एक बैनर था, वैधता तहरीक चौक से मिलती है। परिवर्तन का अर्थ है परिवर्तन‘ एक अन्य बैनर था- ”उफ! कौंसिल संदेश अभी नहीं आया है, हम ऐसा संविधान चाहते है जिस पर हमें भरोसा हो।“ भूमध्य सागर के तट पर मिस्र के दूसरे सबसे बड़े शहर एलेक्जेंडरिया में भी हजारों लोग मुख्य चौक पर जमा हुए। इसी तरह के नारे लगाते हुए हजारों लोग स्वेज और महल्ला-अल-कुबरा शहरों में भी सड़कों पर उतर पड़े।
पहली अप्रैल को सबसे
अधिक उल्लेखनीय विरोध-प्रदर्शन सऊदी अरब में हुआ। संघर्षरत बहरीन के अपने भाईयों के समर्थन में और स्वयं सऊदी अरब में निरंकुश शासन के खात्मे की मांग करते हुए सैंकड़ों शांतिपूर्ण शियाओं ने राजशाही के पूर्व तेल क्षेत्र में प्रदर्शन किया। जुम्मे की नमाज के तुरन्त बाद प्रदर्शनकारी कातिफ के पास एक गांव अवामिया में जमा हुए। आंदोलनकारियों ने निरंकुश सुन्नी बादशाहत द्वारा शियाओं के विरूद्ध भेदभाव को खत्म करने की मांग की। उन्होंने नारे लगाये जिनमें ”तेल एवं बेरोजगारी, इंसाफ क्या है?“ ”बहरीन से फौज वापस बुलाओ“, ”बहरीन के लोगों को अपनी नियति तय करने दो“ जैसे नारे लगाये गये। संयोग से साझा मांगों में एक है महिलाओं का सशक्तीकरण। संभवतः कुवैत के अलावा, जहांॅ पांॅच वर्ष पहले महिलाओं को मताधिकार दिया गया और जहांॅ अब उनका संसद और कैबिनेट में प्रतिनिधित्व है, अधिकांश अरब देशों में महिलाएं इन अधिकारों से वंचित है। सऊदी अरब में जून में स्थानीय निकायों में आंशिक चुनाव होने वाले हैं। आधे सदस्य चुने जायेंगे और आधों के लिए राजा मनोनयन करेगा। इन चुनावों में भी महिलाओं को मताधिकार नहीं दिया गया है।
कुवैत में शासक परिवार के विरूद्ध यद्यपि अभी तक खुले प्रदर्शन तो नहीं हुए हैं पर असंतोष की आग सुलग रही है। जब संसद सदस्यों ने प्रधानमंत्री समेत मंत्रियों पर सवाल दागे तो केबिनेट ने त्यागपत्र दे दिया। इनमें से
अधिकांश मंत्री शासक अल-सबहा परिवार के हैं। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों के अलावा सरकार पर पड़ोसी देश बहरीन में लोकप्रिय विद्रोह के मुद्दे पर हिचकिचाहट के आरोप लगे हैं। कुवैत गल्फ कोआपरेशन कौसिल का सदस्य है। इस कौंसिल के दो सदस्य देशों-सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने बहरीन में अपनी फौजें भेजी हैं पर कुवैत ने नहीं। इसके बजाय उसने वहां एक मेडिकल मिशन भेजा जिसे वहां प्रवेश नहीं दिया गया क्योंकि उस मिशन के कुछ सदस्य उस शिया सम्प्रदाय के थे जिसका सुन्नी शाही परिवार द्वारा शासित बहरीन में बहुमत है।
अरब संचार माध्यम में इन जनविद्रोहों को शिया शासित ईरान द्वारा उकसाये गये विद्रोहों के रूप में पेश करने की एक कोशिश चल रही है। कुवैत में एक अदालत ने ईरान के लिए जासूसी के आरोप में सेना के तीन कर्मचारियों को मौत की सजा दे दी है हालांकि ईरान की सरकार ने जासूनी की बात से मजबूती के साथ इंकार किया है। अदालत के इस फैसले के आधार पर कुवैत के संचार
माध्यमों के एक हिस्से ने एक जबर्दस्त शिया विरोधी अभियान छेड़ दिया है। उनके मुख्य निशाने पर हैं लेबनान का हजबोल्ला और हमास जिसका गाजा पट्टी पर शासन है। संयोग से ये दोनों इस्राइल के सबसे पक्के विरोधी है। उन पर खाड़ी के लगभग सभी देशों में सरकार विरोधी आंदोलन भड़काने के आरोप लगाये जा रहे हैं। वही संचार माध्यम सीरिया में बशर अल असद सरकार के विरूद्ध विरोध प्रदर्शनों को जनता के विद्रोह के रूप में पेश कर रहे हैं। यद्यपि वह आंदोलन दमिश्क के दक्षिण में केवल एक शहर तक सीमित है।
अरब संचार माध्यमों पर विश्वास करें तो खाड़ी क्षेत्र और उत्तरी अफ्रीका समेत समूचे अरब जगत में जबर्दस्त कन्फयूजन चल रहा है, हर कोई घटनाक्रम की अपने तरीके से व्याख्या कर रहा है।
- शमीम फै़जी
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