भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

About The Author

Communist Party of India, U.P. State Council

Get The Latest News

Sign up to receive latest news

समर्थक

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

संसद में महंगाई के खिलाफ गूंज : गुरूदास दासगुप्ता का भाषण

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गुरूदास दासगुप्ता ने लोकसभा में मूल्यवृद्धि पर बहस में भाग लेते हुए कहा कि मुख्य बात यह है कि मूल्यवृद्धि का कारण यदि खाद्यान्नों की कमी है तो यह कमी कल नहीं हुई। खाद्यान्नों की कमी लंबे अर्से से कृषि से जुड़ी रही है। मौजूदा सरकार छह सालों से सत्ता में है। इस अवधि में कमी को दूर करने तथा कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाये गये? सत्तापक्ष के सदस्यों ने जो भाषण दिये हैं वे स्थिति की गंभीरता को प्रतिबिंबित नहीं करते।
मूल्यवृद्धि की विशेषता
दूसरी बात यह कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने काम नहीं किया तो आप इसके लिए किसको दोषी मानते हैं? सरकार पूरे देश की है, केवल दिल्ली या कोलकाता की नही है। स्थित को सुधारने के लिए क्या किया गया? मैं केवल इतना समझ पाया हूं कि वायदा कारोबार पर चयनित ढंग से प्रतिबंध लगाया गया है, एक आर्थिक कदम के रूप में इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि आपने अपना केस ठीक से नहीं रखा है। हम सभी इससे सहमत हैं कि देश के खाद्यान्नों की मूल्यस्फीति में भूचाल आया हुआ है।
शरद पवार पिछले छह साल से कृषि मंत्री हैं। डा. मनमोहन सिंह पिछले छह साल से प्रधानमंत्री और यूपीए सत्ता में है। इस अवधि में मूल्यवृद्धि रोकने के लिए क्या कदम उठाये, क्योंकि इन कदमों का कोई नतीजा नहीं निकला? ऐसा लगता है कि राष्ट्र को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है सरकार उनके प्रति संवेदनशील नहीं है।
इसलिए मूल्यवृद्धि की विशेषता क्या है। मूल्यवृद्धि की विशेषता यह है कि मोबाइल फोन सस्ता हो गया है लेकिन दाल महंगी हो गयी है। रेल यात्रा सस्ती हो गयी है लेकिन तेल महंगा हो गया है। मतलब यह कि सभी उपभोक्ता वस्तुएं जो जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं, काफी महंगी हो गयी है। यह सब सरकार की आर्थिक नीति का नतीजा है। इस स्थिति के लिए सरकार की पूरी आर्थिक नीति जिम्मेदार है। वायदा कारोबार पर पूरी तरह रोक लगाने से किसने रोका था? हमने सभी वायदा कारोबार पर रोक लगाने की मांग की थी लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। खाद्यान्नों का निर्यात करने की इजाजत किसनेे दी। सरकार ने दी। किसने खाद्य सुरक्षा को कमजोर करने के लिए नकदी फसल को तरजीह दी? किसने खाद्यान्न भंडारों के विपरीत बड़े पैमाने पर बैंक ऋण मुहैया कराया? क्या आप मुझे बतायेंगे कि किसने नकदी फसल को तरजीह दी और खाद्यान्न भंडारों के विपरीत बैंक ऋण क्यों मुहैया कराया गया? बैंक ऋण के विपरीत खाद्यान्नों के भंडार में 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत की वृद्धि क्यों की गयी?
सरकार की पूरी आर्थिक नीति इसके लिए जिम्मेदार है। इसलिए मेरा आरोप है कि पर्याप्त कदम उठाये बिना मनमाना उदारीकरण मूल्यवृद्धि का कारण है।
मूल्यवृद्धि रोकने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाये हैं? केवल यह विश्वास कि बाजार अर्थव्यवस्था से सब ठीक हो जायेगा। बाजार अर्थव्यवस्था में सरकार का विश्वास, मनमाने ढंग से उदारीकरण में उसका विश्वास, भूमण्डलीय में उसका विश्वास है जिसके चलते देश की यह हालत हो गयी है। हमने मांग की थी कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन किया जाये, लेकिन संशोधन नहीं किया गया। आंकड़ों की कालाबाजारी केवल भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में सबसे बड़ा रहस्य है। मूल्यों को कैसे नियंत्रित किया जाये? केवल यही मुद्दा नहीं है। आज देश में अनाज का कारोबार सबसे मुनाफे का कारोबार है। सुषमा स्वराज ने चीनी की बात कही है। मैं पूरे अनाज कारोबार की बात कर रहा हूं। क्या आप विश्वास करेंगे कि एक साल में अनाज कारोबार में 300 प्रतिशत का मुनाफा हुआ है?ये पैसे कहां से आये? ये पैसे राष्ट्रीयकृत बैंकों से आये। ये पैसे क्यों आये? क्योंकि सरकार ने अनाज का कारोबार करने वालों के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों के दरवाजे खोल दिये। आम लोगों की मुसीबतें बढ़ाने के लिए जनता के पैसे का इस्तेमाल किया गया।
महंगाई और सब्सिडी
मैं कहता हूं कि बंगाल काफी दूर है। आंध्र प्रदेश में क्या हो रहा है? छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है? पुणे में क्या हो रहा है? समस्या यह है कि बढ़ती कीमतों की चिंता करने वाला कोई नहीं है, भुखमरी की चिन्ता करने वाला कोई नहीं है। मेरा सुझाव है कृषि के क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश होना चाहिए। सरकार सिंचाई की सुविधा को बढ़ाए, भूमि का व्यापरीकरण बन्द हो, भूमि का गैर कृषि उद्देश्यों के लिए विपणन बंद हो , किसानों को फसल का समर्थन मूल्य मिले तथा देहातों के लिए एक विशाल सामाजिक संरचना बनायी जाये। दूसरा सरकार को सट्टेबाजी, स्टाक का बाजारीकरण, वादा कारोबार तथा अन्न व्यापार के लिए बैंकों से कर्ज को रोक देना चाहिए।
आज हम जीडीपी का 1 प्रतिशत अन्न सब्सिडी पर खर्च करते हैं। मैं मांग करता हूं कि इसके लिए 3 प्रतिशत सब्सिडी दी जाये ताकि 23.96 करोड़ लोगों को सस्ते दामों पर अन्न मिले। सरकार को देश के हक में काम करना चाहिए, जनता के हक में काम करना चाहिए। इसके लिए नीति में परिवर्तन होना चाहिए। जब तक गरीबी है, जब तक बेरोजगारी है, जब तक भुखमरी है, जब तक हरिजनों और आदिम जातियों पर अत्याचार होतें रहेंगे, माओवाद को पनपने का अवसर मिलेगा।
हम मोआवादियों द्वारा हिंसा के खिलाफ हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि अगर आप महंगाई नहीं रोकेंगे, भुखमरी नहीं रोकेंगे, जरूरत के अनुसार अन मुहैया नहीं कराएंगे, बेरोजगारी की समस्या हल नहीं करेंगे, यह देश बंट जाएगा, सरकार साख खो देगी, जनता का विश्वास खो देगी, जो हम नहीं चाहते हैं। (संक्षिप्त)
डी. राजा का भाषण
डी. राजा ने बहस में भाग लेते हुए मूल्यवृद्धि के लिए सरकार कोे जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि आज देश में महंगाई सबसे ज्वलंत समस्या बनी हुई है। सभी जरूरी चीजों के मूल्यों में कई गुना वृद्धि हो गयी है। यही कारण है कि हमने मूल्यवृद्धि पर व्यापक बहस की मांग की। मैं सभी राजनीतिक दलों से अपील करता हूं कि वे बहस के दौरान लोगों की गंभीर चिंताओं को ध्यान में रखे। लोगों में गुस्सा है और निराशा की भावना है।
लोगों का कहना है कि जितना ही आप बात करते हैं उतना ही ज्यादा मूल्य बढ़ते हैं। यही निराशावाद है तथा संसद एवं संसद सदस्यों के प्रति लोगों की भावना है। हमें पूरी गंभीरता के साथ इस मुद्दे पर बहस करनी चाहिए। सरकार को इस बारे में अधिक संवेदनशील होना चाहिए। लोग सोचते हैं कि सरकार लाचार है। सरकार उपाय करने के लिए अंधेरे में हाथ-पांव चला रही है। लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। सरकार जानती है, जो सत्ता में हैं वे जानते हैं कि देश में क्या हो रहा है। लेकिन वे कुछ करना नहीं चाहते। सरकार चाहती तो मुद्रास्फीति और मूल्यवृद्धि रोकने के लिए सख्त कदम उठाती। लेकिन वह कारवाई करना नहीं चाहती। क्यों? क्योंकि सरकार, यूपीए 2 विकास के नवउदारवादी रास्ते के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की नीति पर चल रही है। सरकार बड़े औद्योगिक घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उदार पूर्वक रियायतें देने की नीति पर चल रही है। पहले सरकार कहा करती थी कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल, खाद्यान्नों आदि के मूल्य बढ़ गये हैं इसलिए भारत में भी मूल्य बढ़ेंगे। लेकिन मुद्रास्फीति की दर में काफी गिरावट आ गयी, यहां तक कि शून्य पर पहुंच गयी फिर भी कीमतें कम नहीं हुई। इसका आर्थिक तर्क क्या है? सरकार के पास इसका स्पष्टीकरण क्या है? सरकार ने मानसून एवं कम वर्षा की बात कही। लेकिन देश के अनेक हिस्सों में भारी वर्षा हुई, बाढ़ भी आयी। सरकार को इन सबका पूर्वानुमान होना चाहिए था। अब क्या हो रहा है। वे एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। कृषि मंत्री शरद पवार के कुछ बयानों से देश में भय और आशंका की स्थिति पैदा हुई।
हमारे सुझाव
कुछ लोग सोचते हैं कि जब हम सरकार की आलोचना करते हैं तो कोई सुझाव नहीं देते। अवश्य की हमने सुझाव दिया है और देते रहे हैं। जब हमने यूपीए-1 सरकार का समर्थन किया था तो हमने सरकार को काफी सार्थक सुझाव दिये थे मुद्रास्फीति और मूल्यवृद्धि रोकने के लिए। हमने सरकार से तभी कहा था आज भी कह रहा हूं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली सबके लिए लागू क्यों नहीं करते? गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) और गरीबी रेखा के ऊपर (एपीएल) के बीच क्यों विभाजन है जो काफी त्रुटिपूर्ण है और उसमें संशोधन करने की जरूरत है तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करके उसे मजबूत बनाने की जरूरत है। लेकिन सरकार का दृष्टिकोण भिन्न है और वह धीरे-धीरे इसे समाप्त करना चाहती है। इसी प्रकार हम सरकार से आवश्यक वस्तु अधिनियम को कारगर एवं मजबूत बनाने की मांग करते हैं लेकिन सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही है? देश में आज जो स्थिति पैदा हुई है उसके लिए सरकार की नीति जिम्मेदार है। सरकार को गरीबों को नहीं, बड़े उद्योगपतियों एवं कारपोरेट घरानों की चिंता है। इसलिए वह नवउदारवाद की नीति पर चल रही है ताकि बड़े उद्योगपतियों और कारपोरेट घरानों को खुश रखा जा सके।
केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने और आत्मनिर्भरता की बात करना काफी नहीं है, सरकार को सही मायने में ठोस कदम उठाना होगा। यदि सरकार ठोस कदम नहीं उठायेगी तो यहां बहस करना बेकार है। आज लोग क्या सोचते हैं, संसद एवं संसद सदस्यों के प्रति उनकी क्या सोच है, क्या भावना है? आमतौर पर वे यही कहते हैं कि संसद में चाहे जितनी बहस हो ले, संसद सदस्य जितना चिल्ला लें, कीमतें कम नहीं होगी, कीमतें ऐसी ही बढ़ती रहेंगी। इस तरह की सोच निराश को जन्म देती है जो खतरनाक है, लोकतंत्र के लिए घातक है। चूंकि हम लोकतंत्र में विश्वास करते हैं तो हम सरकार से कहना चाहते हैं कि वह कीमतें रोकने के लिए ठोस कदम उठाये। लोग यही चाहते हंै। (संक्षिप्त)

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय पोस्ट

कुल पेज दृश्य