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गुरुवार, 12 मई 2011

स्मरण : सआदत हसन मंटो



भारतीय उपमहाद्वीप के ही नहीं, सारी दुनिया के महानतम आधुनिक कथाकारों में से एक सआदत हसन मंटो का जन्मशती वर्ष शुरू हो रहा है। मंटो 11 मई 1912 को पैदा हुए थे और 1 8 जनवरी 1955 को उनका असामयिक निधन हो गया था। मंटो का लेखन चर्चित होने के साथ-साथ विवादों मंे भी घिरा रहा। अविभाजित भारत और पाकिस्तान में उन पर अश्लीलता के लिए कई मुकदमे हुए, लेकिन आज मंटो को उनकी गहरी मानवीय दृष्टि और मार्मिकता के लिए जाना जाता है। प्रस्तुत है विभाजन की त्रासदी पर उनके स्याह हाशिए से दो कहानियां।

तआवुन

चालीस-पचास लठबंद आदमियों का एक गिरोह लूट-मार के लिए एक मकान की तरफ बढ़ रहा था। दफ्अतन उस भीड़ को चीर कर एक दुबला-पतला अधेड़ उम्र का आदमी बाहर निकला। पलट कर वह बलवाइयों से लीडराना अंदाज में मुखातिब हुआ: “भाइयो, इस मकान में बेअंदाजा दौलत है, बेशुमार किमती सामान है... आओ हम सब मिल कर इस पर काबिज हो जाएं और माले-गुनीमत आपस में बांट लें।”

हवा में कई लाठियां लहराईं, कई मुक्के भिंचे और बुलंद वाँग-नारों का एक फव्वारा सा छूट पड़ा।

चालीस-पचास लठबंद आदमियों का गिरोह दुबले-पतले अधेड़ उम्र के आदमी की कयादत में उस मकान की तरफ तेजी से बढ़ने लगा, जिसमें बेअंदाजा दौलत और बेशुमार कीमती सामान था।

मकान के सदर दरवाजे के पास रूक कर दुबला-पतला आदमी फिर बलवाइयों से मुखातिब हुआ: “भाइयों, इस मकान में जितना भी माल है, सब तुम्हारा है... देखो, छीना-झपटी नहीं करना, आपस में नहीं लड़ना, आओ!“

एक चिल्लाया: “दरवाजे में ताला है।“

दूसरे ने बआवजे बुलंद कहा: “तोड़ दो।“

“तोड़ दो, तोड़ दो।“ हवा में कई लाठियां लहराई, कई मुक्के भिंचे और बुलंद बांग-नारो का एक फव्वारा-सा छूट पड़ा।

दुबले-पतले आदमी ने हाथ के इशारे से दरवाजा तोड़ने वालों को रोका और मुसकराकर कहाः “भाइयों, ठहरो... मैं इसे चाबी से खोलता हूं।“

यह कहकर उसने जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला और एक चाबी मुंतखब करके ताले में डाली और इसे खोल दिया- शीशम का भारी दरवाजा एक चीख के साथ वो हुआ तो हुजूम दीवानावार अंदर दाखिल होने के लिए आगे बढ़ा। दुबले-पतले आदमी ने माथे का पसीना अपनी आस्तीन से पोंछते हुए कहा: “भाइयांे, आराम से जो कुछ इस मकान में है, सब तुम्हारा है, फिर इस अफरा-तफरी की क्या जरूरत है?“

फौरन ही हुजूम में जब्त पैदा हो गया एक-एक करके बलवाई मकान के अंदर दाखिल होने लगे, लेकिन जूं ही चीजों की लूटमार शुरू हुई, फिर धांधली मच गई। बड़ी बेरहमी से बलवाई कीमती चीजों पर हाथ साफ करने लगे।

दुबले-पतले आदमी ने जब यह मंजर देखा तो बड़ी दुख भरी आवाज में लुटेरों से कहा: “भाइयों, आहिस्ता-आहिस्ता... आपस में लड़ने-झगड़ने की कोई जरूरत नहीं... नोच-खसोट की भी कोई जरूरत नहीं... तआवुन से काम लो। अगर किसी के हाथ ज्यादा कीमती चीज आ गई है तो हासिद मत बनो... इतना बड़ा मकान है, अपने लिए कोई और चीज ढूंढ़ लो... मगर वहशी न बनो... मार- धाड़ करोगे तो चीजें टूट जाएंगी... इसमें नुकसान तुम्हारा ही है...“ लुटेरों में एक बार फिर नज्म पैदा होग या, और भरा हुआ मकान आहिस्ता-आहिस्ता खाली होने लगा।

दुबला-पतला आदमी वक्तन- फक्वतन हिदायते देता रहा: “देखो भैया, वह रेडियो है... जरा आराम से उठाओ, ऐसा न हो कि टूट जाए... इसके तार भी साथ लेते जाओ...“

“तह कर लो भाई, इसे तह कर लो... अखरोट की लकड़ी की निपाई है, हाथीदांत की पच्चीकारी है, बड़ी नाजुक चीज है है... हां अब ठीक है...““

“नहीं-नहीं, यहां मत पियो, बहक जाओगे... इसे घर ले जाओ ...“

“ठहरो-ठहरो, मुझे मेन स्विच बंद कर लेने दो... कहीं करंट से धक्का न लग जाए...“

इतने में एक कोने से शोर बुलंद हुआ- चार बलवाई रेशमी कपड़े के एक थान पर छीना-झपटी कर रहे थे।

दुबला-पतला आदमी तेजी से उसकी तरफ बढ़ा और मलामत भरे लह्जे में उनसे कहने लगा: “तुम लोग कितने बेसमझ हो... चिंदी-चिंदी हो जाएगी ऐसे कीमती कपड़े की... घर में सब चीजें मौजूद हैं गज भी होगा... तलाश करो और नाप कर कपड़ा आपस में तकसीम कर लो...“

दफ्अतन एक कुत्ते के भौंकने की आवाज आई: अफ़-अफ़-अफ़... और चश्मे-जदन में एक बहुत बड़ा गद्दी कुत्ता एक जस्त के साथ अंदर लपका, और लपकते ही उसने दो-तीन लुटेरों को भंभोड़ दिया।

दुबला-पतला आदमी चिल्लाया: “टाइगर-टाइगर...“

टाइगर, जिसके मुुंह में एक लुटेरे का नुचा हुए गिरेबान था, दुम हिलाता हुआ दुबले-पतले आदमी की तरफ निगाहें नीची किए कदम उठाने लगा।

टाइगर के आते ही सब लुटेरे भाग गए थे, सिर्फ एक लुटेरा बाकी रह गया था, जिसके गिरेबान का टुकड़ा टाइगर के मुंह में था।

उसने दुबले-पतले आदमी की तरफ देखा और पूछा: “कौन हो तुम?

दुबला-पतला आदमी मुसकराया: “इस घर का मालिक, देखो-देखो, तुम्हारे हाथ से कांच का मर्तबान गिर रहा है।“

तकसीम

एक आदमी ने अपने लिए लकड़ी का एक बड़ा संदूक मुंतखब किया, जब उसे उठाने लगा तो संदूक अपनी जगह से एक इंच भी न हिला। एक शख्स ने जिसे शायद अपने मतलब की कोई चीज मिल ही नहीं रही थी, संदूक उठाने की कोशिश करने वाले से कहा: ”मैं तुम्हारी मदद करूँ।“

संदूक उठाने की कोशिश करने वाला इम्दाद लेने पर राजी हो गया।

उस शख्स ने जिसे अपने मतलब की कोई चीज मिल नहीं रही थी, अपने मजबूत हाथों से संदूक को जुंबिश दी और संदूक को उठाकर अपनी पीठ पर धर लिया - दूसरे ने सहारा दिया, और दोनों बाहर निकले।

संदूक बहुत बोझिल था। उसके वजन के नीचे उठाने वाले की पीठ चटख रही थी और टाँगें दोहरी हुई जा रहीं थीं, मगर इनाम की तवक्को ने उस जिस्मानी मशक्कत का एहसास नीम मुर्दा कर दिया था।

संदूक उठाने वाले के मुकाबले में संदूक मुंतखब करने वाला बहुत कमजोर था - सारा रास्ता वह सिर्फ एक हाथ से संदूक को सहारा देकर अपना हक कायम रखता रहा।

जब दोनों महफूज मुकाम पर पहुंच गए तो संदूक को एक तरफ रख कर सारी मशक्कत बर्दाश्त करने वाले ने कहा: ”बोलो, इस संदूक के माल में से मुझे कितना मिलेगा?“

संदूक पर पहली नजर डालने वाले ने जवाब दिया: ”एक चौथाई।“

”यह तो बहुत कम है।“

”कम बिलकुल नहीं, ज्यादा है.... इसलिए कि सबसे पहले मैंने ही इस माल पर हाथ डाला था।“

”ठीक है, लेकिन यहां तक इस कमरतोड़ बोझ को उठा के लाया कौन है?“

”अच्छा, आधे-आधे पर राजी होते हो?“

”ठीक है...... खोलो संदूक।“

संदूक खोला गया तो उसमें से एक आदमी बाहर निकला। उसके हाथ में तलवार थी - उसने दोनों हिस्सेदारों को चार हिस्सों में तकसीम कर दिया।

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