भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 8 मार्च 2011

बजट चर्चा

देश के अधिसंख्यक लोगांे को बजट का इंतजार रहता है - चाहे वह उत्तर प्रदेश सरकार का हो, केन्द्र सरकार का हो अथवा रेलवे का। केन्द्र सरकार के बजट के प्रति आकर्षण और उत्सुकता अन्य बजटों की अपेक्षा अधिक होती है।

28 फरवरी 2011 को वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने वर्ष 2011-12 का बजट संसद में पेश किया। राजनीतिज्ञों द्वारा समाजवाद का रास्ता छोड़े यानी देश की आम जनता से विमुख होकर देश एवं विदेशी सरमायेदारों की चाकरी के लिए उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की व्यवस्था को शुरू किए 20 साल पूरे हो गये। अर्थव्यवस्था की तथाकथित उदारता के दौर में पेश किए गए बजटों की श्रृंखला में यह 21वाँ बजट है। बजट के दिन तीन महीनों से गिरते चले आ रहे सेंसेक्स और निफ्टी ने उछल-उछल कर बजट को सलामी दी और उसके अगले दिन तो यह दोनों खूब उछले। अब यह फिर गिरने लगे हैं। उनके उछाल ने यह संदेश दे दिया कि बजट एक बार फिर देशी और विदेशी पूंजी के हितों की रक्षा करने के लिए बनाया गया है।

अगले दिन पूंजी नियंत्रित कई समाचार-पत्रों पर नजर दौड़ाई। लगभग सभी के मुखपृष्ट पर अर्थव्यवस्था के ‘समाजवाद’ से ‘पूंजीवाद’ में संक्रमण के बीस साल पूरे होने की खुशी स्पष्ट और जोरदार तरीके से दिखाई दी। स्पष्ट जिक्र किया गया है कि 20 सालों पहले जब मनमोहन सिंह वित्तमंत्री बने थे तब भारत के पास विदेशी मुद्रा केवल इतनी थी कि दो सप्ताह के आयात का भुगतान किया जा सके जबकि आज 300 बिलियन अमरीकी डॉलर के बराबर विदेशी मुद्रा भंडार है। तब श्वेत-श्याम टीवी के नाम पर केवल ‘उबाऊ’ दूरदर्शन था आज रंगीन डिजीटल टीवी सेट के साथ सेटटॉप बॉक्स के जरिये सैकड़ों चैनेलों में से किसी एक को देखने का विकल्प है। तब पिता या भाई की मृत्यु का समाचार कोना कटे पोस्टकार्ड अथवा तार से मिलने में हफ्ते से अधिक वक्त लग जाता था आज 2-जी और 3-जी के जरिये हजारों कि.मी. दूर बैठा आदमी अपने पिता के मरने के ‘लाइव’ और रियल टाईम दृश्य देख सकता है और मरते हुए पिता को अपने आंसू दिखा सकता है। यह बात दीगर है कि इस अवधि में वास्तव में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालों की तादाद - संख्या और प्रतिशत दोनों में काफी बढ़ गयी है।

ये दो जयघोष काफी कुछ कह गये, यानी बजट उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को और तेजी से आगे बढ़ाने के लिए केन्द्रित है, आम जनता महंगाई, बेरोजगारी सहित तमाम आक्रमणों के लिए तैयार रहे। कहीं जिक्र नहीं दिखाई दिया 880 मिलियन उन आदमियों का जो आज भी बीस रूपये या इससे भी कम पर यानी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने को विवश है। ध्यान दीजिएगा कि 880 मिलियन को अपनी भाषा में भी लिखा जा सकता है परन्तु आज-कल ईकाई-दहाई-सैकड़ा-हजार-लाख-करोड़-अरब........... शंख-नील सब छुद्र हो गये हैं, बाते मिलियन, बिलियन, ट्रिलियन लगती हैं औकात वाली। 1.1 बिलियन भारतीय आबादी में 880 मिलियन औकात रखता है। सरकार बना और बिगाड़ सकता है अगर जाति-धर्म और क्षेत्रीयता की संकीर्णता के मकड़जाल में फंसा हुआ न हो।

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण की शुरूआत में ही विकास दर को दो गिनतियों यानी दस से निन्यानवे प्रतिशत के क्षेत्र में शीघ्र ही पहुंचने की बात कही। मनमोहन सिंह बता ही चुके हैं कि विकास दर और महंगाई के बीच ककड़ी और पानी जैसा रिश्ता है। भरपूर पानी मिलने पर जिस तरह ककड़ी की बित्त भर की बतिया रात भर में हाथ भर की ककड़ी हो जाती है उसी तरह विकास-दर दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती है महंगाई को भरपूर बढ़ा कर। जान लेवा महंगाई पर उन्होंने चिन्ता इस लहजे में जाहिर की मानो प्रकृति की वर्षा और बाढ़ जैसी कोई मार हो जिसमें सरकार के लिए कुछ करने और सोचने को ज्यादा होता नहीं है। यानी बजट महंगाई को और बढ़ायेगा।

उल्लेख जरूरी होगा कि सरकार के आंकड़ों के अनुसार विकास दर बढ़ाने के प्रयास में बढ़ाई गयी महंगाई के कारण सन 1990 का बीस हजार रूपया आज के दो लाख रूपयों के बराबर हो चुका है। सरकारी आंकड़े कितने सत्य होते हैं? यह हम सभी जानते हैं। आंकड़े ढूंढ़ने होंगे कि सन 1991 में गरीबी रेखा कितने रूपये प्रतिदिन पर मानी जाती थीऔर आज कितने रूपयों पर। क्या उसमें विकास दर का कोई अनुपात है अथवा नहीं।

कुछ ऐसे समाचार भी बजट से निकलते हैं। अस्पतालों एवं होटल के बिल अब 5 प्रतिशत महंगे हो जायेंगे क्योंकि उन पर सेवा कर लगेगा। सरकार खुद के अस्पतालों को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। फ्री इलाज तो भूल जाइये, इलाज के लिए अब ज्यादा पैसे देने के लिए तैयार रहिये। 130 उत्पादों पर से उत्पाद कर की छूट वापस ले ली गयी है जिसके कारण टूथ पाउडर, टूथ पेस्ट, चश्में, लेंस, साईकिल, सिलाई मशीन, पेन, पेंसिल जैसी तमाम चीजें महंगी हो जायेंगी। कुछ अन्य उत्पादों पर उत्पाद कर की दर 4 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर देने के कारण चीनी, टॉफी, चाकलेट, बिस्कुट, पेस्ट्री, केक, कागज, दवाईयां और इलाज महंगे हो जायेंगे। जीवन बीमा की किश्तों पर सेवाकर लग जाने के कारण अब ज्यादा प्रीमियम देना होगा और हर साल मिलने वाला लाभांश कम हो जायेगा। कुछ अन्य प्राविधानों के कारण परचून की दुकान का बिल लगभग 5 प्रतिशत तो बढ़ ही जायेगा।

सीमेंन्ट पर उत्पाद कर को बढ़ा कर रू. 160.00 प्रति टन कर देने का बहाना सीमेन्ट कंपनियों को मिल गया है और बजट के दिन ही सीमेन्ट कंपनियों ने पांच रूपये प्रति बैग दाम बढ़ने की आशंका जता दी।

आंगनबाड़ी कार्यकात्रियों के वेतन को रू. 1500.00 से रू. 3,000.00 करने तथा आंगनबाड़ी सहायकों के वेतन को रू. 750.00 से रू. 1500.00 करने की बात अवश्य स्वागत योग्य है। परन्तु यह राशि अभी भी न्यूनतम मजदूरी से बेइंतिहा कम है और इन लोगों पर अत्याचार है। इसमें तथा इसी जैसे अन्य असंगठित क्षेत्र के कर्मियों के वेतन में बढ़ोतरी के लिए संघर्ष को और सघन करना होगा।

सरकार ने मनरेगा के अंतर्गत ग्रामीण मजदूरों को देय मजदूरी को महंगाई के साथ जोड़ने (इंडेक्सिंग) की बात की है लेकिन पिछले साल मनरेगा के अंतर्गत उपलब्ध कराये गये 40,000 करोड़ रूपये की राशि में केवल 100 करोड़ रूपये की बढ़ोतरी सरकार की मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है। एक तो मनरेगा का लाभ गरीबी रेखा के नीचे की शत-प्रति-शत आबादी को मिल नहीं पा रहा है और अगर इंडेक्सिंग की जानी है तो इस राशि में कम से कम 4,000 करोड़ रूपये की बढ़ोतरी की जानी चाहिए थी।

वित्तमंत्री ने पेट्रोलियम पदार्थों, खाद तथा खाद्यान्न पर दी जाने वाली सब्सिडी को नगद देने का ऐलान किया है लेकिन उन्होंने खुद स्वीकार किया कि इसे अगले साल यानी 2012-13 के पहले लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने दी जाने वाली सभी सब्सिडी के लिए प्राविधानों को काफी कम कर दिया है। जैसे पेट्रोलियम पदार्थों - मिट्टी का तेल, एलपीजी आदि पर दी जानी सब्सिडी के लिए राशि को 15000 करोड़ रूपये से अधिक कम कर दिया है। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार के कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रहीं हैं, तो सरकार इस घटी हुई राशि से जनता को कैसे राहत देना चाहती है, इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया है। निश्चित रूप से लोगों को इसकी बढ़ी हुई कीमतें अदा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

खाद्यान्नों पर दी जाने वाली सब्सिडी की राशि को भी कम कर वित्तमंत्री ने स्पष्ट बता दिया है कि सोनिया की अध्यक्षता वाली जिस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा जिस खाद्य सुरक्षा कानून का ढोल काफी दिनों से पीटा जा रहा है, उसे एक साल अभी लागू करने का कोई इरादा नहीं है।

वित्तमंत्री ने किसानों को उनके उत्पादों के लिए मिलने वाले अलाभकारी मूल्यों तथा बाजार में उन उत्पादों की उच्च कीमतों की तो चर्चा की लेकिन किसानों को लाभकारी मूल्यों को मुहैया कराने के बारे में वे चुप हैं। उन्होंने छोटी अवधि के लिए फसली ऋणों की समय से अदायगी पर एक प्रतिशत ब्याज का अनुदान देने की तो घोषणा की और ब्याज दर को 4 प्रतिशत होने का दावा भी किया परन्तु जब किसानों को समय से पैसा मिलना सुनिश्चित नहीं होगा तो वे ऋण समय से अदा करेंगे कैसे? यह सवाल अभी भी बरकरार है। ज्ञातव्य हो कि गन्ना जैसी फसलों को उगाने वाले किसान का पैसा लम्बे समय तक चीनी मिल मालिक दबाये बैठे रहते हैं और तमाम फसलों के बाजार में आने पर उसके मूल्य बइंतिहा कम होने के कारण किसान दाम बढ़ने की आस में अपना अनाज थोड़े दिनों तक रोकना चाहता है।

किसानों का कोई और चर्चा लायक मुद्दा बजट में नहीं दिखाई दिया। किसानों को अपने उत्पादों के लाभकारी मूल्यों तथा अन्य सुविधाओं के लिए संघर्ष तेज करना होगा।

वित्तमंत्री ने बीमा क्षेत्र में 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देने, विदेशी संस्थागत निवेशकों को बैंकों में मतदान का अधिकार देने सहित वित्तीय क्षेत्रों से संबंधित लंबित 7 बिलों को पारित करने का इरादा जता दिया और नए बैंक खोलने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को लाईसेन्स देने को कहा। यह सभी कदम प्रतिगामी होंगे। यह पूंजी को जन सामान्य की बहुमूल्य बचत से मुनाफा कमाने का अवसर देगा। राष्ट्रीयकरण के पहले और उसके बाद हमने निजी बैंकों के साथ उनमें जमा जनता के धन को डूबते देखा है। जनता को इन निजी बैंकों से न केवल होशियार रहना होगा बल्कि इनसे अपनी दूरी बनाये रखनी होगी। वित्तमंत्री ने यह इरादा भी साफ किया कि बैंकिंग सेवाओं को दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में बैंक कर्मचारियों के जरिये न पहुंचा कर कारपोरेट घरानों सहित सभी प्रकार के निजी व्यावसायिक सहायकों की आउटसोर्सिंग के द्वारा होगी। यानी रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के बजाय कम किया जायेगा।

बजट में घोषित इन उपायों को अमली जामा पहनाने के लिए जरूरी होगा कि सरकार भाजपा से हाथ मिलाकर संसद में संबंधित विधेयकों को पारित कराये। हाथ मिलाने में दोनों को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि दोनों के रास्ते एक ही हैं। दोनों अपने अमरीकी आकाओं के हुक्म की तामील ही तो करते रहे हैं।

सहकारी बैंकों की उपेक्षा की गयी है तथा सहकारिता आन्दोलन के बारे में कोई घोषणा नहीं की गयी है। सहकारी समितियों और बैंकों को आयकर से मुक्त करने की बात नहीं मानी गयी है जबकि कारपोरेट घरानों को आयकर से छूट दी गयी है। यह समितियां एवं बैंक अगर एक रूपये का भी मुनाफा कमाते हैं तो उन्हें आयकर देना होगा।

बैंकों द्वारा दिये जाने वाले प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋणों का लक्ष्य प्राप्त कराने के लिए पच्चीस लाख रूपये तक के गृह ऋण को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र में वर्गीकृत करने की बात कही गयी है। एक तरह से कृषि, कारीगरों, छोटे उद्यमियों, छोटे दुकानदारों तथा अन्य छोटे स्तर के सेवा प्रदाताओं को इसके कारण बैंकों से ऋण मिलना कम होगा।

वित्तमंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र में रू. 40,000 हजार करोड़ के विनिवेश द्वारा वित्तीय घाटे को कम करने की कोशिश की है। इन बीस वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम उद्यमों का निजीकरण किया जा चुका है। सरकार को इनसे मिलने वाले लाभांश की राशि में भी लगातार गिरावट दिखाई नहीं दे रही है।

शहर में मध्यमवर्गीय कर्मचारियों की संख्या ज्यादा होती है या फिर छोटे व्यापारियों की। बेचारों को इंकम टैक्स देना खलता है। छोटे-मोटे व्यापारी तो खर्चा-वर्चा दिखाकर और कुछ खर्च-वर्च करके कुछ बचा लेते हैं, इस कर्मचारी वर्ग के पास विकल्प ही नहीं हैं। सरकारी कर्मचारी हुआ तो ऊपरी आमदनी टैक्स देने से बच जाती है। बैंक, बीमा, शिक्षक, डिफेन्स जैसे सूखे क्षेत्र वालों के पास तो वह विकल्प भी नहीं है। हर साल 28 फरवरी को मुंह बाये बजट-बजट बतियाते रहते हैं फिर सिर धुनकर बैठ जाते हैं कि कुछ बचा नहीं। आयकर मुक्त आमदनी की सीमा में पुरूषों के लिए कुछ बढ़ोतरी की गयी है, महिलाओं को तो उससे भी महरूम रखा गया है। वरिष्ठ नागरिकों को कुछ छूट अवश्य दी गयी है। समाचार माध्यमों में छपा कि रू. 1,030.00 से लेकर रू. 26,780 तक की बचत होगी। रू. 1,030.00 तो समझ में आया लेकिन रू. 26,780.00 का आयकर कितनों का बचेगा, यह समझ में नहीं आया। रू. 1,030.00 का मतलब रू. 2.82 रोज। आयकर की सीमा में बढ़ोतरी दो साल बाद हुई है। इन दो सालों में महंगाई बढ़ने पर जो महंगाई भत्ता पा-पाकर संतोष कर रहे थे, वे अगर गणना करें तो पायेंगे कि इस बचत के बाद भी उनकी क्रयशक्ति में भारी गिरावट आयी है। दो साल पहले वे जितना खरीद सकते थे, आज वे उतना नहीं खरीद सकते। जो भविष्य निधि आज बचा-बचा कर रख रहे हैं, सेवानिवृत्त होने पर उसकी क्रयशक्ति भी बहुत कम हो चुकी होगी।

इसके उलट देशी कारपोरेट घरानों की एक करोड़ से अधिक आय पर लगने वाले सरचार्ज को साढ़े सात प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है। विदेशी कारपोरेट घरानों को तो यह सरचार्ज केवल 2 प्रतिशत की दर से देना होगा। विदेशी सहयोगी कंपनियों से मिलने वाली लाभांश आय पर आयकर को घटाकर 16.22 प्रतिशत कर दिया गया है। कुछ छोटे सरमायेदारों पर थोड़ी सी गाज गिराई गयी है। न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) को लाभ के 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 18.5 प्रतिशत कर दिया गया है। सेज़ में काम कर रही कंपनियों को भी अब न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) देना होगा। यह स्वागत योग्य है और उनसे पूरा आयकर लेने की मांग की जानी चाहिए।

भ्रष्टाचार और काले धन के बारे में वित्तमंत्री ने मंत्रियों के ग्रुप को दी गयी जिम्मेदारी का संदर्भ ही दिया है। यानी आने वाले दिनों में भी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और काले धन की बरामदी/जब्ती होने वाली नहीं है।

बजट के निहितार्थ यही हैं कि जनता पर - मजदूर वर्ग पर और किसानों पर आने वाले दिनों में आर्थिक हमले और तेज होंगे और जनता के पैसे की लूट देशी और विदेशी दोनों तरह की ‘पूंजी’ करती रहेगा। रोजगारों की कोई संभावना नहीं है। असंगठित क्षेत्र का शोषण जारी रहेगा। संगठित क्षेत्र में सेवा सुरक्षा को खतरा बढ़ेगा। बेरोजगारी बढ़ेगी।

इन हमलों से निजात पाने के लिए मजदूर वर्ग और किसानों को अपने वर्गीय संगठनों में अपनी एकजुटता को बढ़ाना होगा, दमन और अत्याचार के खिलाफ अपने संघर्षों को धार देनी होगी। देश में मिस्र और ट्यूनीशिया की तरह विकराल जंगी प्रदर्शनों और आम हड़तालों को आयोजित करना होगा।

ऐसे हालातों में हमें जनता के तमाम तबकों को वर्गीय चेतना से लैस करने के उत्तरदायित्व को तेजी से अमली जामा पहनाना होगा।

- प्रदीप तिवारी
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सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

बुनकरों के लिए घड़ियाली आसूं बहाते पूंजीवादी दल


अपनी दयनीय दशा से पीड़ित बुनकरों ने डेढ़ माह पूर्व स्वतःस्फूर्त ढंग से जिलों-जिलों में आवाज उठाना शुरू किया था। भाकपा राज्य नेतृत्व ने इस सवाल को राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के दरबार तक पहुंचाया। मीडिया में इन खबरों के प्रकाशित होते ही तमाम दलों और मौसमी नेताओं का बुनकर प्रेम छलकने लगा। कोई राज्यपाल के यहां ज्ञापन देने दौड़ा तो किसी ने बुनकर सम्मेलनों का आयोजन कर थोथी घोषणायें कीं। लेकिन भाकपा ने बुनकरों के सवाल पर सड़क पर उतरने का ऐलान कर सबको पीछे धकेल दिया। बात यहीं नहीं रूकी। जिस दिन भाकपा का धरना/प्रदर्शन था उसी दिन प्रदेश कांग्रेस ने बयान दिया कि उसने बुनकरों को राहत दिलाने को केन्द्र पर दबाव बढ़ा दिया है। इस दबाव का कोई परिणाम तो आज तक आया नहीं। पता नहीं कहां काम रहा है यह दबाव। भाकपा के धरने से दो दिन पूर्व प्रदेश के कद्दावर मंत्री ने जो अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं कुछ कथित बुनकरों को अपने आवास पर परेड कराई और वायदा किया कि प्रदेश के बजट में बुनकरों को बड़ी राहत दी जायेगी। अब बजट आ चुका है। पावर लूमों को कुछ रिआयत की घोषणा हुई है मगर हथकरघे वालों के हाथ कुछ नहीं लगा। सपा, भाजपा के शासन काल में भी बुनकर तबाह होते रहे। पर अब ये दोनों दल विपक्ष में हैं तो बुनकरों के लिये आंसू बहाने में तो कुछ हर्ज है नहीं। सो घड़ियाली आंसू बहाये जा रहे हैं। कुछ कागजी संगठन भी खड़े हो गये हैं जो बुनकरों के सच्चे प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं।

सच तो यह है कि भाकपा और उत्तर प्रदेश बुनकर फैडरेशन द्वारा इस सवाल को मजबूती से उठाने के बाद वोद के सौदागर मैदान में कूद पड़े हैं। लेकिन उनके व्यवहार ने ही यह जता दिया है कि उन्हें बुनकरों की समसयाओं से कोई मतलब नहीं मतलब तो उनके वोट से है।

- प्रदीप तिवारी
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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

भ्रष्ट भाजपा की भ्रष्टाचार विरोधी रैली हुई फ्लाप



महंगाई एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ तथाकथित महासंघर्ष का शंखनाद करने के नाम पर राजग - विशेषकर भाजपा ने कानपुर में 5 फरवरी को एक विराट जनसभा आयोजित करने की घोषणा की थी जिसे भाजपा के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आडवानी और मुरली मनोहर जोशी सहित जनता दल (एकी) के शरद यादव और अकाली नेता बलविंदर सिंह भुल्लर को भी सम्बोधित करना था। जनता दल (एकी) और अकाली दल जैसे दल उत्तर प्रदेश में अस्तित्वहीन हैं। लेकिन भाजपा की गिनती चार प्रमुख राजनीतिक दलों में होती है। विधान सभा में बसपा और सपा के बाद वह तीसरा सबसे बड़ा दल है। पूरे प्रदेश से कार्यकर्ताओं और जनता

को कानपुर के ऐतिहासिक फूलबाग मैदान पहुंचाने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

रैली का यह दिन भाजपा के लिए बहुत बड़े झटके का दिन था। अखबारों में छपी खबरों के अनुसार रैली शुरू होने तक फूलबाग मैदान में केवल पांच हजार लोग थे। वैसे बाद में यहां कुछ और लोग पहुंच गये थे। यह बात अलग है कि भाजपा ने इस रैली को लक्खी रैली बनाने के मंसूबे बांध रखे थे। रैली में राजग के कई दिग्गज नेता चार्टर्ड हवाई जहाज से दिल्ली से कानपुर के लिए चले। खबर है कि भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने आडवानी को बता दिया कि भीड़ बहुत कम है। भाजपा की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया तो यह गया है कि कानपुर में धुंध और कोहरे के कारण हवाई जहाज का उतरना संभव नहीं था, इसलिए नेतागण कानपुर जाने के बजाय लखनऊ आ गये। लेकिन चर्चा यह है कि रैली में इतनी कम भीड़ की सूचना पाकर हवाई जहाज को लखनऊ लाया गया। रैली के दिन आसमान साफ था। पूरे उत्तर प्रदेश में धूप निकली हुई थी। वक्त भी दोपहर का था जिसमें दृश्यता की कमी का सवाल पैदा नहीं होता। चार्टर्ड प्लेन से आये राजग के सभी धुरंधर लखनऊ के अमौसी हवाई अड्डे पर बैठे रहे। भाजपा के कार्यालय से तीन बजे दोपहर पत्रकारों को फोन किया गया कि नेतागण मीडिया से वार्ता करेंगे। उन्होंने यहां पत्रकारों को सम्बोधित किया। जनता के सामने नहीं तो पत्रकारों के सामने ही सही उन्होंने भ्रष्टाचार पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों को लताड़ने का नाटक रचा।

राजग नेता बाद में सीधे दिल्ली वापस चले गये। लखनऊ में वे जितनी देर बैठे रहे, उससे कम देर में वे कानपुर सड़क मार्ग से पहुंच सकते थे। जिस समय वे यहां से दिल्ली के लिए रवाना हुए, कहा जाता है कि कानपुर में उस वक्त भी रैली चल रही थी और उनका इंतजार किया जा रहा था। भाजपा ने यह रैली उत्तर प्रदेश के आसन्न विधान सभा चुनावों को ध्यान में रख कर आयोजित की थी। उनका इरादा

यहां से चुनावी शंखनाद करना था। इस रैली का इंतजाम प्रदेश के कई बड़े भाजपा नेता देख रहे थे। इस रैली के फ्लाप होने से यह साबित होता है कि भाजपा का जनता पर प्रभाव धीरे-धीरे उतर रहा है। उसके सभी एजेन्डे - चाहे वह जन समस्याओं पर हो अथवा साम्प्रदायिकता के आधार पर, जनता को आकर्षित करने में लगातार विफल हो रहे हैं।

पिछले हफ्ते में ही 2 फरवरी को लखनऊ में बुनकरों की समस्याओं, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर भाकपा ने एक महाधरना दिया था। उसे महाधरने में पांच हजार से अधिक लोग आये थे। यह संख्या बताती है कि जनता में भाकपा के प्रति रूझान है। जब प्रमुख दल - बसपा, भाजपा, सपा और कांग्रेस का ग्राफ उतार पर हो और प्रदेश के राजनैतिक कैनवास पर रिक्त स्थान पैदा हो रहा हो हमें इसी तरह के संघर्षों को चलाने और जनता के मध्य अधिक से अधिक पहुंचाने में जी-जान एक कर इस स्थान पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़ना होगा।
- प्रदीप तिवारी


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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

मुलायम की पीड़ा



4 फरवरी को मुलायम सिंह ने लखनऊ में अपनी पीड़ा पत्रकारों को बताते हुए जो कुछ कहा वह अगले दिन के समाचार-पत्रांे में छपा। नवभारत टाईम्स ने उन्हें उद्घृत करते हुए जो छापा है, उसे हम यथावत नीचे दे रहे हैं:

”एसपी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री मायावती को चेतावनी दी कि उनकी सरकार निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया और लोकसभा में एसपी के मुख्य सचेतक शैलेंद्र सिंह सहित अन्य लोगों पर फर्जी मुकदमे वापस लें क्योंकि एसपी की सरकार बनने पर उनको भी ऐसे ही दिन देखने पड़ सकते हैं। ..................... उन्होंने कहा कि बीएसपी सरकार विद्वेषपूर्ण ढंग से केवल एसपी नेताओं और कार्यकर्ताओं को लक्ष्य बनाकर उत्पीड़न की कार्रवाई कर रही है, जबकि बीजेपी, कांग्रेस, आरएलडी और वामपंथी दलों के लोग जेल नहीं भेजे जाते।“ उन्होंने प्रेस वार्ता में बहुत जोर देकर वामपंथी दलों को न केवल भाजपा और कांग्रेस के बरक्स खड़ा कर दिया बल्कि यह आभास देने का प्रयास भी किया जैसे भाकपा सहित सभी वामपंथी बसपा के पाले में खड़े हों, मायावती के राज में उनके गलत कामों के खिलाफ सड़कों पर संघर्ष न कर रहे हों। मुलायम को नहीं भूलना चाहिए कि वामपंथी दलों में माफिया और गुण्ड़ों के हाथ नेतागीरी की कमान नहीं सौंपी जाती। जनता अच्छी तरह हकीकत जानती है। आसन्न विधान सभा चुनावों में भी पराजय के भय से उपजी हताशा के कारण बेचारे मुलायम यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्हें अपनी पीड़ा को बयान करने के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए।

एक बात और। प्रेस वार्ता में एक पत्रकार ने सवाल कर दिया कि गुंडों को टिकट देने में मुलायम सिंह और मायावती की राय एक जैसी है, जबकि निर्वाचन आयोग की राय थी कि जिसके खिलाफ आरोप-पत्र हो जाये, उन्हें चुनावों में न खड़ा किया जाये। इस पर मुलायम सिंह भड़क गये। बोले: ”दिमाग खराब हो गया है। क्या वह देखने में हमसे अच्छी है?“ फिर सवाल हो गया, ”बात देखने सुनने की नहीं गुंडों को टिकट देने की हो रही है?“ किसी बात का मुलायम सिंह जवाब देने की स्थिति में नहीं थे। बौखलाते चले गये और यह कहते हुए कि ”सत्ता में नहीं हूं तो इसका मतलब यह नहीं है कि जो चाहे कह दे“ उठ कर पैर फटकते हुए चले गये। नेता विरोधी दल और उनके भाई शिव पाल सिंह यादव सहित सपा के अन्य नेता भी उनके पीछे चले गये।
- प्रदीप तिवारी
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गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

बुनकर रैली का विडियो क्लिप

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बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

बुनकरों की समस्याओं तथा महंगाई एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं बुनकर फेडरेशन की 2 फरवरी की रैली तथा धरना के दृश्य







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बुनकरों एवं आम जनता की समस्याओं पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं बुनकर फेडरेशन द्वारा लखनऊ में रैली एवं धरना

लखनऊ 2 फरवरी। बुनकरों की ज्वलन्त समस्याओं, महंगाई एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कैसरबाग स्थित राज्य कार्यालय से पूरे प्रदेश से आये हजारों बुनकरों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं ने गगनभेदी नारे लगाते हुए जुलूस निकाला जो बारादरी, जयशंकर प्रसाद सभागार, परिवर्तन चौक, छतर मंजिल, स्वास्थ्य भवन, आईटीआरसी, शहीद स्मारक, मेडिकल कालेज, ईमामबाड़ा होते हुए चौक स्थित ज्योतिर्बाफूले पार्क पहुंच कर महाधरने में बदल गया।

  
धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि केन्द्रीय स्तर पर एक के बाद एक हो रहे घोटालों, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बार-बार इजाफा करने, जमाखोरी-कालाबाजारी पर अंकुश न लगाने तथा वायदा कारोबार को प्रश्रय देने के कारण दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का जीना मुश्किल कर रखा है तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार सरकारी एवं सहकारी चीनी मिलों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कीमती परिसम्पत्तियों को सरमायेदारों को औने-पौने दामों पर बेचने में मशगूल हैं। खाद्यान्न घोटाला अभी भी जारी है, बुनकरों, नरेगा मजदूरों, बीड़ी मजदूरों, खेत मजदूरों तथा अन्य असंगठित मजदूरों को उनके जायज हकों से वंचित किया जा रहा है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। पूरे प्रदेश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। विरोध प्रदर्शन करने वालों से लाठी-गोली से निपटा जाता है।

 

 प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि प्रदेश में अराजकता का खुला नाच हो रहा है। दलितों, महिलाओं खासकर अबोध बालिकाओं से बलात्कार हो रहे हैं। कई की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। राजधानी तक में महिलायें एवं आम नागरिक सुरक्षित नहीं हैं। अराजकता और अत्याचार का खेल शासक दल बसपा के विधायकों-मंत्रियों की छत्र-छाया में चल रहा है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और बुनकर फेडरेशन के सदस्यों का आह्वान किया कि वे धरने से लौट कर 3 फरवरी से 9 फरवरी तक अन्य वामपंथी पार्टियों तथा लोकदल एवं जनता दल सेक्यूलर के साथ मिलकर महंगाई के खिलाफ जगह-जगह पर व्यापक विरोध प्रदर्शनों को आयोजित करें तथा जन-लामबंदी कर 9 फरवरी को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करें।

 

 भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने जोर देकर कहा कि अपने कारनामों से कांग्रेस, भाजपा, बसपा एवं सपा आदि सारी की सारी पूंजीवादी पार्टियां दागदार साबित हो रही हैं, अतएव देश एवं प्रदेश की राजनीति को वामपंथी मोड़ देने की जरूरत है। भाकपा कार्यकर्ता इसके लिए आन्दोलन और संघर्ष की झड़ी लगा दें।

 

 प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए भाकपा के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अनजान ने कहा कि देश में और उत्तर प्रदेश में महाभ्रष्ट सरकारें काम कर रही हैं। प्रधानमंत्री संसद में कुछ कहते हैं और संसद के बाहर कुछ और। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश बुनकर फेडरेशन ने जिस लड़ाई की शुरूआत की है, वह इसके लिए बधाई की पात्र हैं। इन संघर्षों को आगे भी जारी रखना होगा।

 

 प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए बुनकर फेडरेशन के महामंत्री तथा भाकपा के राज्य सचिव मंडल के सदस्य इम्तियाज अहमद, पूर्व विधायक ने कहा कि देश में बनने वाले 100 मीटर में से 60 मीटर कपड़ा बुनने वाले बुनकर आज भुखमरी की कगार पर हैं। उनकी रोजी-रोटी छीन ली गयी है। लागत भी न निकल पाने के कारण बुनकरों के परिवार अपने रिहायशी क्षेत्रों से पलायन करने को मजबूर हैं और अपने परम्परागत कुशल कारीगरी के काम को छोड़कर अकुशल कार्यों को करने पर मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि पहले यू.पी. हैण्डलूम कारपोरेशन के माध्यम से बुनकरों के हितों की रक्षा राज्य सरकार करती थी परन्तु मुलायम सिंह की सरकार के समय से इन परियोजनाओं को चलाना बन्द कर दिया गया और मायावती ने तो अपने शासन काल में यू.पी. हैण्डलूम कारपोरेशन की तमाम परिसम्पत्तियों को बेच दिया तथा कर्मचारियों की छंटनी कर दी। उन्होंने मांग की कि राम सहाय आयोग की संस्तुतियों को शीघ्र लागू किया जाये, बुनकरों को सभी तरह के धागों को कम कीमत पर सीधे मुहैया कराया जाये, बुनकरों को 4 प्रतिशत ब्याज पर कर्ज मुहैया कराया जाये, बुनकरों द्वारा तैयार माल की खपत के लिए उस पर अनुदान दिया जाये, उत्तर प्रदेश हैण्डलूम कारपोरेशन को विशेष पैकेज देकर बुनकरों के हितों की तमाम परियोजनायें चालू कराई जायें।

 

 प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करने वाले अन्य प्रमुख वक्ता थे - भाकपा की राज्य मंत्रिपरिषद के सदस्य अशोक मिश्र एवं विश्वनाथ शास्त्री, भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य अरविन्द राज स्वरूप, महिला फेडरेशन की प्रदेश महामंत्री आशा मिश्रा, खेत मजदूर यूनियन के प्रांतीय अध्यक्ष सुरेन्द्र राम, किसान सभा के महामंत्री राम प्रताप त्रिपाठी, नौजवान सभा के प्रदेश संयोजक नीरज यादव आदि।

 

 प्रदर्शनकारियों की ओर से सिटी मजिस्ट्रेट को राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को सम्बोधित ज्ञापन भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश तथा बुनकर फेडरेशन के इम्तियाज अहमद एवं एहतेशाम मिर्जा ने दिये। ज्ञापन में मांग की गयी है कि:

 

 बुनकरों की स्थिति को सुधारने हेतु प्राथमिकता के आधार पर सभी तरह के धागों - सूती, रेशमी एवं सिंथेटिक तथा अन्य की बढ़ती कीमतोें पर रोक लगाई जाए।
  • सरकारी डिपो खोल कर सूत की आपूर्ति सीधे बुनकरों को की जाए।
  • बुनकरों को बैंकों एवं अन्य संस्थाओं से 4 प्रतिशत ब्याज और आसान शर्तों पर कर्ज दिलाया जाये।
  • उत्तर प्रदेश हैण्डलूम कार्पोरेशन को विशेष आर्थिक पैकेज देकर बुनकरों के हितों की तमाम परियोजनायें चालू की जायें।
  • पावर लूमों को कम से कम 20 घंटे बिजली आपूर्ति की जाये; ऐसी व्यवस्था की जाए कि उन पर कम से कम बिजली भाड़ा पड़े। बुनकरों के बिजली के पिछले सभी बकायों को माफ किया जाये।
  • बुनकरों द्वारा तैयार माल की खपत के लिये उस पर अनुदान दिया जाये।
  • बुनकरों को बीपीएल राशन कार्ड जारी किया जाए, उनके परिवारों को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवायें, शिक्षा एवं आवास तथा वृद्धावस्था पेंशन आदि उपलब्ध कराया जाएं।
  • बुनकरों के कल्याणार्थ राम सहाय आयोग की संस्तुतियों को लागू किया जाए।
  • निरन्तर बढ़ती महंगाई पर रोक लगाने के लिए प्रभावी कार्यवाही की जाए।
  • घोटालों और भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जाये और उसमें लिप्त व्यक्तियों को सजा दिलवाई जाए। उनके विरूद्ध मुकदमा चलाने के लिए विशेष अदालतों का गठन किया जाए ताकि न्याय प्रक्रिया में विलम्ब न हो।
  • नरेगा मजदूरों, बीड़ी मजदूरों, खेत मजदूरों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के हकों की सुरक्षा की जाए।
  • उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक क्षेत्र की बर्बादी को रोका जाए। उदाहरण के तौर पर प्रदेश में चीनी मिलों को औने-पौने दामों पर बेच दिया गया है, इसी तरह से विद्युत एवं अन्य बहुत से सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के साथ भी ऐसा ही किया जा रहा है।
  • सुनिश्चित किया जाए कि जनता को दिये जाने वाले खाद्यान्न में किसी प्रकार की चोर-बाजारी अथवा घोटाला न हो।
  • किसानों की उपजाऊ जमीन को छीन कर पूंजीपतियों को सौंपने की सारी कार्यवाही रोकी जाये तथा किसानों की समस्याओं को प्रभावी ढंग से हल किया जाये।
  • प्रदेश में निरन्तर बिगड़ती एवं चिन्ताजनक कानून व्यवस्था पर प्रभावी कार्यवाही की जाये। दलितों, महिलाओं और विशेषकर दलित महिलाओं पर अत्याचार, दुराचार एवं बलात्कारों की बाढ़ सी आ गयी है। आम नागरिकों में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है। इन अपराधों में शासक पार्टी के प्रतिनिधियों के शामिल होने से जनता असहाय स्थिति में है। प्रभावी कदम उठाकर इस सबको तत्काल रोका जाए।
  • राज्य सरकार द्वारा नगर निकायों के अध्यक्षों के चुनावों को अप्रत्यक्ष रूप से और उन्हें गैर दलीय आधार पर कराने के फैसले जनतांत्रिक व्यवस्था को तो नुकसान पहुंचायेगी ही अपितु इस प्रक्रिया से भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलेगा। इस संभावित प्रक्रिया को निरस्त किया जाये। नगर निकायों के चुनाव दलीय आधार पर ही कराये जायें।
  • चुनाव सुधारों पर समाज में व्यापक चर्चा हो। वोटरों में जागरूकता-अभियान चले तथा अपराधियों को चुनाव प्रक्रिया से ही वंचित कर दिया जाए। जो राजनैतिक दल अपराधियों को प्रत्याशी बनायें, उन पार्टियों की मान्यता रद्द कर दी जाए और उन्हें चुनाव लड़ाने से वंचित कर दिया जाए। चुनाव आयोग की स्वतंत्र प्रशासनिक मशीनरी एवं सुरक्षा बल गठित हों तथा चुनाव खर्च सरकार वहन करे।
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रविवार, 26 दिसंबर 2010

”हमें तुम्हारे स्विस बैंक खाते का हिसाब चाहिए“

लखनऊ 26 दिसम्बर। लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों - राजनीति, नौकरशाही और न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की कटु भर्त्सना के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ तथा व्यापक चुनाव सुधारों के लिए व्यापक जनसंघर्ष के संकल्प के साथ आज भाकपा के 85वें स्थापना दिवस पर यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की लखनऊ जिला कौंसिल द्वारा ”हमें तुम्हारे स्विस बैंक खाते का हिसाब चाहिए“ शीर्षक से आयोजित परिचर्चा सम्पन्न हुई।



परिचर्चा शुरू करते हुए भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने मुंडरा काण्ड से लेकर 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले तक के तमाम घोटालों की चर्चा करते हुए कहा कि पूंजीवाद ने जिस भ्रष्टाचार को पिछले बीस सालों में फैलाया है, उसके खिलाफ व्यापक जन-संघर्ष के बिना लोकतंत्र को बचाया नहीं जा सकता और इसके लिए शहरी मध्यमवर्ग को अगुवा दस्ते की भूमिका अदा करनी होगी। उन्होंने पंचायत चुनावों तक फैल गये भ्रष्टाचार पर चिन्ता जाहिर करते हुए कहा कि आश्चर्य होता है कि ग्राम प्रधान और ब्लाक प्रमुख तक के प्रत्याशियों ने करोड़ों रूपये खर्च किये हैं। उन्होंने कहा कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ बात करने वाले राजनीतिक दल - भाजपा, सपा, राजग, बसपा आदि सभी जिस पैसे से चुनाव लड़ते हैं, वह भ्रष्टाचार के जरिए ही पैदा किया गया होता है। उन्होंने व्यापक चुनाव सुधारों पर भी बल दिया जिसमें अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और वापसी के अधिकार का उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया।



परिचर्चा को सम्बोधित करते हुए भाकपा के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान ने कहा कि तेलगी काण्ड से शुरू हुए तमाम घोटालों ने देश में एक आवारा पूंजी को जन्म दिया है जो देश में हर चीज को अवारा बना रही है। उन्होंने कहा इस अवारा पूंजी द्वारा पैदा किए गए अवारा भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज के सजग लोगों को निकलना ही होगा। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए हमें परिपक्व इरादों की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि स्विस बैंक जमा अरबों करोड़ रूपये के मामले को भाकपा के सांसद गुरूदास दासगुप्ता ने संसद में उठाया था तब भाजपा के लाल कृष्ण आडवाणी बिलकुल चुपचाप बैठे रहे थे और उन्होंने स्वर नहीं उठाया था। उन्होंने कहा कि भाकपा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ क्षेत्रीय सम्मेलनों का फैसला लिया है और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर कार्यवाही योजना बनाई जायेगी।



विख्यात आरटीआई कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में अगर स्विस बैंक में जमा अरबों करोड़ रूपये अगर वापस आ भी गये तो भ्रष्टाचार के जरिए वे दुबारा स्विस बैंक या किसी दूसरे देश के बैंकों में पहुंच जायेंगे। उन्होंने एक ऐसी एकीकृत एजेंसी के गठन पर बल दिया जिसके पास राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों तथा न्यायाधीशों के सभी खिलाफ जांच करने और उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार हो।



फारवर्ड ब्लाक के सचिव वीरेन्द्र कुमार ने भाकपा द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किए अभियान में फारवर्ड ब्लाक द्वारा शिरकत की घोषणा करते हुए कहा कि निमंत्रण भेजे जाने के बावजूद बाकी राजनीतिक दलों का परिचर्चा में भाग न लेना यह दर्शाता है कि वे भ्रष्टाचार में कितने तल्लीन हैं। इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स के महासचिव शास्त्री प्रसाद त्रिपाठी, एडवोकेट ने जहां न्यायपालिका के अन्दर ही व्याप्त भ्रष्टाचार पर चल रहे आत्ममंथन और चिन्ता की चर्चा की वहीं वाई.एस.लोहित एडवोकेट ने संस्थागत भ्रष्टाचार और छोटे स्तर के भ्रष्टाचार में अंतर करने की बात कही। महिला फेडरेशन की कान्ती मिश्रा ने भ्रष्टाचार के कारण महिलाओं पर पड़ रहे कुप्रभावों की चर्चा करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ जनान्दोलन को महिलाओं को आगे आने का आह्वान किया। यू.पी. बैंक इम्पलाइज एसोसिएशन के मंत्री आर.के.अग्रवाल ने कहा कि हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के पहले खुद से लड़ना होगा। एलआईसी कर्मचारियों के नेता लालता शाह ने कहा कि हमें परेशानियों से बचने के लिए और निजी नुकसान की आशंका से भ्रष्टाचार से समझौता करने की प्रवृत्ति के खिलाफ भी संघर्ष करना होगा।



परिचर्चा की शुरूआत में विषय प्रवर्तन करते हुए ”पार्टी जीवन“ के कार्यकारी सम्पादक प्रदीप तिवारी ने कहा कि पूंजीवाद में पूंजी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए जिन बुराईयों को जन्म देती है उनके प्रमुख है राजनीति में भ्रष्टाचार फैलाना। पिछले 20 साल पहले देश में आर्थिक उदारीकरण का जो दौर शुरू हुआ था, उसमें पूंजी ने मुनाफे के बरक्स अगर कुछ बढ़ना शुरू हुआ तो वह था भ्रष्टाचार और खाद्य पदार्थों की कीमतें। इन दोनों ने मिल कर देश की 95 प्रतिशत जनता का जीवन दुश्वार कर दिया है। उन्होंने इतिहास में जाते हुए कहा कि 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर चुनाव जीतने के लिए भ्रष्ट तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए उंगली क्या उठा दी थी कि उसके फलस्वरूप आपात काल घोषित हुआ और 1977 में कांग्रेस को पहली बार केन्द्र में सत्ता से बेदखल होना पड़ा। 1988 में फिर बोफोर्स दलाली का मुद्दा चुनावी मुद्दा बना और सत्ता परिवर्तन हो गया।



प्रदीप तिवारी ने कहा कि 1993 में नरसिम्हाराव ने अपनी सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को ही खरीद लिया। उसके बाद से अगर संयुक्त मोर्चा सरकार के छोटे-से कार्यकाल को छोड़ दिया जाये तो कांग्रेस नीत संप्रग या भाजपा नीत राजग ही केन्द्र सरकार में सत्तासीन रहे। कहने को दो महा-ईमानदार - अटल बिहारी बाजपेई और मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री रहे पर ये दोनों भ्रष्टों के पालनहार की भूमिका में ही नजर आए। प्रदीप तिवारी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा अदल-बदल कर सत्ता चलाते रहे और इनके भ्रष्टाचार ने पंचायत चुनावों तक को भ्रष्टाचार की दलदल में ढ़केल दिया है। उन्होंने परिचर्चा में भाग ले रही जनता का आह्वान करते हुए कहा कि इस माहौल में संघर्ष के लिए जनता को खड़ा करना जरूरी हो गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष एक फौरी जरूरत बन गया है। भ्रष्टाचार के मुद्देनजर वर्तमान चुनावी व्यवस्था सड़ चुकी है और चुनाव सुधारों के लिए संघर्ष भी फौरी जरूरत बन गया है।



परिचर्चा के पहले वयोवृद्ध कम्युनिस्ट शिव प्रकाश तिवारी ने ध्वजारोहण किया। इप्टा के साथियों ने इस मुद्दे पर एक गीत प्रस्तुत किया। परिचर्चा की अध्यक्षता भाकपा जिला सचिव मो. खालिक ने की।
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बुधवार, 22 दिसंबर 2010

कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन में बढ़ती महंगाई, रोता आम आदमी और भरोसा दिलाते प्रधानमंत्री

दो साल से ज्यादा हो गये जब वाम मोर्चा ने संप्रग-1 सरकार से समर्थन वापस लेते समय जो कारण गिनाये थे उनमें एक मुद्दा महंगाई का भी था। आजादी के बाद के इतिहास में महंगाई बढ़ने की अभूतपूर्व गति बरकरार है। कृषि मंत्री शरद पवार जब भी मुंह खोलते हैं, महंगाई और बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष इत्मीनान से बंसी बजा रहे हैं कि आने वाले तीन महीनों में महंगाई पर काबू पा लिया जायेगा लेकिन महंगाई बढ़ती जा रही है, आम आदमी रो रहा है और प्रधानमंत्री मार्च 2011 तक महंगाई पर काबू पाने का भरोसा दिला रहे हैं परन्तु कर ऐसा कुछ रहे नहीं हैं जिससे महंगाई पर काबू पाया जा सके।
कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने एक आम आदमी की चर्चा की है। वे मानते हैं कि ”आम आदमी“ वह है जिसका उनकी व्यवस्था से कोई सम्पर्क नहीं है। शायद यही कारण है कि उसके दर्द को भूमंडलीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की यह व्यवस्था समझने को तैयार नहीं है। इस आम आदमी का रेखाचित्र बनाते हुए एक काव्यात्मक अंदाज में कांग्रेस के युवराज ने कहा - ”वह गरीब हो या अमीर, शिक्षित हो या अशिक्षित, हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, अगर वह इस व्यवस्था से नहीं जुड़ा है तो वह ‘आम आदमी’ है। ..... यह आम आदमी नियमगिरि का वह आदिवासी बालक है, जिसे अपनी जमीन से बिना किसी कानून के बेदखल कर दिया जाता है। यह आम आदमी झांसी का वह दलित बालक है जिसे अपनी कक्षा में दलित होने के कारण सबसे पीछे बिठाया जाता है। वह बंगलुरू का वह युवा प्रोफेशनल है, जिसके बच्चे को ऊंची कैपिटेशन फीस न दे पाने के कारण अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाया। वह शिलांग के विश्वविद्यालय का टॉपर है, जिसे इसलिए काम नहीं मिल सका, क्योंकि वह सही लोगों को नहीं जानता। वह अलीगढ़ का वह किसान है जिसे अपनी जमीन का उचित मुआवजा नहीं मिला है। वह हैदराबाद का बिजनेसमैन है जिसके अपने सम्पर्क नहीं हैं। यह ऐसा नौकरशाह है, जिसका भविष्य समझौता न करने की वजह से जोखिम में है। यह वह मेट्रो वर्कर है जिसने अपने खून-पसीने से उसे बनाया है, लेकिन जिसका उसे कोई श्रेय नहीं मिलता है। ...... वह जी-जान से इस देश को रोज बनाता है फिर भी हमारी व्यवस्था उसे हर कदम पर कुचलती है।“ आम आदमी को कुचलने का धमंड कांग्रेस में कूट-कूट कर भरा हुआ है।
इस रेखाचित्र में महंगाई और भ्रष्टाचार का मारा वह आम आदमी कहीं राहुल गांधी को नहीं दिखाई देता जिसके दुःख दर्दों के लिए उनकी तीन पीढ़ियां जिम्मेदार हैं। वे तीन पीढ़ियां जिन्होंने इस देश पर लम्बे समय तक शासन किया है। उनकी दादी इंदिरा गांधी के युग में इस आदमी के नाम का अखण्ड जाप कांग्रेस और सरकार रात-दिन करती रहती थी परन्तु उसके लिए करती कुछ नहीं थीं। उससे केवल वोट लेती थी। इस रेखाचित्र से कई सवाल उठते हैं, लेकिन एक सवाल को उठाना जरूरी है - आखिर कौन है जिम्मेदार जिसके कारण नियमगिरि का आदिवासी बालक अपनी जमीन से बेदखल होता है, दलित बालक को सबसे पीछे बैठना पड़ता है, पूरे देश के गरीबों और निम्न मध्यमवर्गीय लोगों की संतानें शिक्षा से वंचित रह जा रही हैं, टॉपरों को रोजगार नहीं मिलता आदि आदि। क्या जिम्मेदार वे सरकारें नहीं जो केन्द्र में या राज्यों में कांग्रेस चला रही है? क्या जिम्मेदार वे नीतियां नहीं जिन्हें उनकी पार्टी ने इस देश में चलाना शुरू किया था? राहुल गांधी इस आम आदमी को एक बार फिर बेवकूफ बना कर वोट बटोरने की राजनीति खेल रहे हैं।
कांग्रेस के इसी अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि मार्च 2011 तक महंगाई दर गिर कर 5.5 प्रतिशत हो जायेगी। इसे पढ़ कर या सुनकर अजीब सी अनुभूति होती है। उनकी सरकार के अनुसार तो महंगाई दर गिर कर नवम्बर में 7.48 प्रतिशत आ गयी है लेकिन आज प्याज 70 रूपये किलो बिक रहा है। पेट्रोल के भाव पिछले पांच महीनों में पांच बार कीमतें बढ़ाकर 60 रूपये प्रति लीटर सरकार ने पहुंचा ही दिये हैं। डीजल, किरोसिन और रसोई गैस की कीमतें बढ़ाने की तैयारी है। खाद्यान्न व्यापार में विदेशी पूंजी को अनुमति दी जा रही है, सट्टेबाजी कराई जा रही है और आयात-निर्यात का खेल चल रहा है। आम आदमी भूखों मरता है तो मरे। 87 करोड़ जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम आमदनी पर जीवित है, महंगाई के बावजूद गरीबी की इस रेखा में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी में कोई अन्तर नहीं आया है। उस आम आदमी की कोई पीड़ा उनके चेहरे पर नहीं झलकती।
कांग्रेस के इसी अधिवेशन में प्रस्तुत एक आर्थिक प्रस्ताव कहता है कि विकासशील देश में कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि उनकी आपूर्ति और मांग के मध्य असंतुलन होता है। कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि कई सेवाओं और वस्तुओं के निर्माताओं को ज्यादा कीमत दिये जाने की जरूरत होती है। कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उनकी कीमतें ऊपर चली जाती हैं। इस प्रस्ताव में भी कहीं दर्द नहीं झलकता उस आम आदमी का। यानी सब कुछ किसी न किसी कारक का सहज परिणाम है क्योंकि मुक्त अर्थव्यवस्था में सब कुछ सरमाया करता है, सरकारें कुछ नहीं। सरकारें तो केवल घोटाले, घपले और भ्रष्टाचार के लिए बनाई जाती हैं जिनसे आम आदमी का कोई सम्पर्क नहीं है। शायद वह समय आ गया है जब यह सवाल भी खड़ा किया जाये कि सरकारों की फिर जरूरत क्या है?
कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन ने आम आदमी को एक बार फिर ललकारा है कि तेरा कोई वजूद नहीं, तेरा कोई महत्व नहीं, तेरी कोई जरूरत नहीं, तेरी कोई अस्मिता नहीं।
आम आदमी का खून अगर अब भी इस ललकार से नहीं खौलता तो शायद वह पानी ही है खून नहीं!
- प्रदीप तिवारी
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सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

अकेला नहीं हूं, युग का भी साथ है

‘कामगार हूं, तेज तलवार हूं, सारस्वतों (कलम के रखवालों) मुआफ करना, कुछ गुस्ताखी करने वाला हूं’ - यह कहते हुए मराठी साहित्य में पचास के दशक में दस्तक देने वाले नारायण सुर्वे का 83 साल की उम्र में पिछले दिनों ठाणे के एक अस्पताल में देहांत हुआ।

सुर्वें नही रहे। अपने आप का सूर्यकूल का घोषत करने वाली आवाज खामोश हुई और उनकी रचनाओं के जरिए मराठी साहित्य में पहली दफा ससम्मान हाजिर हुए ‘उस्मान अली, दाऊद चाचा, याकूब नालबंदवाला, अपनी संतान को स्कूल पहुंचाने आई वेश्या, रात बेरात शहर की दीवारों पर पोस्टर चिपकाते घूमते बच्चे, बॉबिन का तार जोड़ने वाला मिल मजदूर, सभी गोया फिर एक बार यतीम हो गए।

नारायण सुर्वे ने अपने रचनात्मक जीवन की शुरूआत कम्युनिस्ट पार्टी के जलसों में गीत गाते और मजदूरों के आंदोलन में शामिल होकर की थी। और उनकी पहली कविता तब प्रकाशित हुई थी, जब वह किसी स्कूल में चपरासी की नौकरी कर रहे थे। प्रतिकूल वातावरण, आर्थिक वंचनाएं और सामाजिक तौर पर निम्न ओहदा जैसी विभिन्न कठिन परिस्थितियों का बोझ सुर्वे के मन पर अक्सर रहता था, मगर उस दबाव के नीचे उनकी कविता का दम नहीं घुटा, इंसान और इंसानियत पर उनकी आस्था कायम रही और उनके साहित्य में भी उसका प्रतिबिंबन देखने को मिला।

सुर्वे की रचना यात्रा 1956 के आसपास शुरू हुई थी, जब उनकी कविताएं युगांतर, नवयुग, मराठा आदि अखबारों में पहली दफा प्रकाशित हुई। 1962 में उनका पहला कविता संग्रह ‘ऐसा गा मी ब्रह्म’ प्रकाशित हुआ था। 1966 में उनका दूसरा कविता संग्रह ‘माझं विद्यापीठ’ (मेरा विश्वविद्यालय) प्रकाशित हुआ था। ‘जाहीरनामा’ (एलाननामा) शीर्षक कविता संग्रह 1975 में आया तो ‘सनद’ नाम से चुनिंदा संपादित कविताएं 1982 में प्रकाशित हुई। 1995 में ‘नव्या माणसाचे आगमन’ कविता संग्रह प्रकाशित हुआ तो इसी साल विजय तापस के संपादन में ‘नारायण सुर्वेच्या गवसलेल्या कविता (खोई हुई कविताएं) नाम से सर्वे की अब तक प्रकाशित कविताओं का संकलन सामने आया। 1992 में ‘माणूस’, ‘कलावंत और समाज’ शीर्षक से उनके वैचारिक लेखों का संकलन प्रकाशित हुआ, जिसमें उनके अपने चंद पूर्ववर्तियों या समकालीनों पर व्यक्तिचित्रणपरक लेख भी शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने दो किताबों का अनुवाद किया तथा आंदोलन के गीता पर दो किताबों का संपादन किया। अपने रचनाकर्म पर उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। परभणी में आयोजित साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के तौर पर भी वह निर्वाचित हुए।

प्रश्न उठता है कि बहुत विपुल लेखन न करने के बावजूद नारायण सुर्वे आखिर शोहरत की बुलंदियों पर किस तरह पहुंच सके, जिनकी रचनाएं प्रबुद्धों के जलसों से लेकर किसानों, मजदूरों के सम्मेलनों में उत्साह से सुनी जाती थीं। उनकी कविताओं की लोकप्रियता का प्रतीक उदाहरण अक्सर उद्धत किया जाता है जो बताता है कि किस तरह चांदवड नामक स्थान पर शेतकरी संघटन के महिला सम्मेलन में एकत्रित लगभग 70 हजार महिलाओं ने उनकी सबसे पहली प्रकाशित रचना सुरों में गाई थी। इकतीस साल की उम्र में अपने बेटे के साथ मैट्रिक का इम्तिहान देने बैठे नारायण सुर्वे की रचनाओं में ऐसी क्या बात थी कि वह अपनी एक अलग लकीर खींचने में कामयाब हुए?

दरअसल, बाद के दिनों में दलित रचनाकर्म ने जिस काम को व्यापक पैमाने पर किया, जिस तरह उसने मराठी साहित्य के वर्ण समाज तक सीमित ‘सदाशिवपेठी’ स्वरूप को चुनौती दी, उसका आगाज नारायण सुर्वे ने पचास के दशक में किया। कह सकते हैं कि मराठी साहित्य का सम्भ्रांत केन्द्रित व्याकरण ही उन्होंने बदल डाला। कामगार, मेहनतकशों की आबादी की बस्तियां ही अपने विश्वविद्यालय हैं- इस बात को डंके की चोट पर कहने वाले नारायण सुर्वे की कविताओं में बंबई के फुटपाथ ही असली जीवनशाला हैं, यह बात मराठी लेखकों के कान में पहली बार गूंजी।

‘ना घर था, रिश्तेदार थे, जितना चल सकता था उतनी पैरों के नीचे की जमीन थी/


दुकानों के किनारे थे/


नगर पालिका के फूटपाथ भी खाली थे बिल्कुल मुफ्त....।’

उनकी कविताओं के माध्यम से ऐसे तमाम पात्र पहली दफा काव्यजगत में ससम्मान हाजिर हुए जो समाज के उपेक्षित, शोषित तबके से थे। बात महज पात्रों तक सीमित नहीं थी, उनकी रचनाओं में दुनिया के तमाम शोषित पीड़ितों के सरोकार भी प्रकट हो रहे थे। उनकी कविता में

‘मार्क्स से मुलाकात हो रही थी’,


‘मेरी पहली हड़ताल में ही


मार्क्स ने सुर्वे को पहचाना और पूछा, ‘अरे, कविता-लिखते हो क्या?


अच्छी बात है


मुझे भी गटे पसंद था...।’

ये तमाम बातें शब्दाम्बर के तौर पर, दूसरे के अनुभवों से उधार लेकर प्रस्तुत नहीं हो रही थीं, बल्कि उनकी अपनी जिंदगी के तमाम अनुभवों से निःसृत हो रही थी। लोग जानते थे कि इंडिया वुलन मिल के स्पिनिंग खाते में काम करने वाले गंगाराम सुर्वे और काशीबाई सुर्वे नामक मिल मजदूरों की इस संतान ने खुद भी अपनी जिंदगी की शुरूआत कामगार होने से की थी और इतना ही नहीं, कबीर की तरह उन्हें भी अपनी मां ने कहीं जनमते ही छोड़ दिया था, जिसका लालन-पालन तमाम अभावों के बावजूद गंगाराम एवं उनकी ममतामयी पत्नी ने किया था, उन्हें अपना नाम दिया था, उनका स्कूल में भी दाखिला कराया था। अपने व्याख्यानों में वह अक्सर कबीर की जिंदगी के साथ अपनी तुलना करते थे।

जब नारायण सुर्वे बारह साल के थे तब मिल से गंगाराम रिटायर हुए, तो किसी अलसुबह उन्होंने नारायण के हाथों में दस रुपए पकड़ाए थे और फिर वे कोंकण के अपने गांव चले गए थे। तब से सड़क का फुटपाथ ही नारायण का आसरा बना था और बंबई की सड़के या मेहनतकशों की बस्तियां ही उनका ‘विद्यापीठ’ बना था। अपनी बहुचर्चित दीर्घ कविता ‘माझं विद्यापीठ’ (मेरा विश्वविद्यालय) में वह अपनी जिंदगी की कहानी का यही किस्सा बयां करते हैं।

अंत तक नारायण सुर्वे ‘बेघर’ ही रहे। किराए के मकान को निरंतर बदलते रहने की मजबूरी से उन्हें मुक्ति नहीं मिली। शायद यही वजह रही हो कि कुछ सालों में उन्होंने बंबई से दूर नेरल में अपना आशियाना बनाया था। अखबार में आया है कि अपने अंतिम समय में अस्पताल में अपनी बेटी से कागज और कलम मांग कर उन्होंने कुछ लिखने की कोशिश की थी, मगर शायद मन में उमड़-घुमड़ रहे तमाम विचारों एवं थरथराते हाथों में पकड़ी कलम के बीच सामंजस्य नहीं कायम हो सका। क्या कहना चाहते थे अपने अंतिम वक्त में नाराया सुर्वे? अपने जीवन संघर्ष के तमाम साथियों को आखिरी सलाम पेश करना चाह रहे थे या जाते-जाते इक्कीसवीं सदी के सारस्वतों को यायावरी के चंद नुस्खे बताना चाह रहे थे? कहना मुश्किल है।

‘सीमाबद्ध जिंदगी


सीमाबद्ध थी जिंदगी, जब मैंने जनम लिया


रोशनी भी सीमित ही थी


सीमित ही बात की मैंने, कुनमुनाते हुए


सीमित रास्तों पर ही चला, लौटा


सीमित से कमरे में, सीमित जिंदगी ही जिया


कहा जाता है! सीमित रास्तों से जाने से ही


स्वर्ग प्राप्ति होती है, सीमित पर चार खम्भों के बीच/थूः’

- सुभाष गाताड़े
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शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष : भगवान बौना है


भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना उसे साम्प्रदायिक हिंसाचार से होता है। बाबा नागार्जुन ने दंगों के बाद पैदा हुए साम्प्रदायिक वातावरण पर एक बहुत ही सुंदर कविता लिखी है जिसका शीर्षक है ‘तेरी खोपड़ी के अन्दर ’ । दंगों के बाद किस तरह मुसलमानों की मनोदशा बनती है । वे हमेशा आतंकित रहते हैं। उनके सामने अस्तित्व रक्षा का सवाल उठ खड़ा होता है ,इत्यादि बातों का सुंदर रूपायन नागार्जुन ने किया है। यह एक लंबी कविता है एक मुस्लिम रिक्शावाले के ऊपर लिखी गयी है।लेकिन इसमें जो मनोदशा है वह हम सब के अंदर बैठी हुई है। मुसलमानों के प्रति भेदभाव का देश में सामान्य वातावरण हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों ने बना दिया है। प्रचार किया जाता रहा है कि किसी मुसलमान की दुकान से कोई हिन्दू सामान न खरीदे,कोई भी हिन्दू मुसलमान को घर भाड़े पर न दे, कोई भी हिन्दू मुसलमान के रिक्शे पर न चढ़े। साम्प्रदायिक हिंसा ने धीरे-धीरे मुसलमानों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी और आर्थिक हिंसाचार की शक्ल ले ली है। मुसलमानों के खिलाफ बड़े ही सहजभाव से हमारे अंदर से भाव और विचार उठते रहते हैं। हमारे चारों ओर साम्प्रदायिक ताकतों और कारपोरेट मीडिया ने मुसलमान की शैतान के रूप में इमेज विकसित की है। एक अच्छे मुसलमान,एक नागरिक मुसलमान,एक भले पड़ोसी मुसलमान, एक सभ्य मुसलमान, एक धार्मिक मुसलमान,एक देशभक्त मुसलमान की इमेज की बजाय पराए मुसलमान, आतंकी मुसलमान,गऊ मांस खानेवाला मुसलमान,हिंसक मुसलमान, बर्बर मुसलमान,स्त्री विरोधी मुसलमान ,परायी संस्कृति वाला मुसलमान आदि इमेजों के जरिए मुस्लिम विरोधी फि़जा तैयार की गयी है। नागार्जुन की कविता में मुसलमान के खिलाफ बनाए गए मुस्लिम विरोधी वातावरण का बड़ा ही सुंदर चित्र खींचा गया है। कुछ अंश देखें-

‘‘यों तो वो
कल्लू था-
कल्लू रिक्शावाला
यानी कलीमुद्दीन...
मगर अब वो
‘परेम परकास’
कहलाना पसन्द करेगा...
कलीमुद्दीन तो भूख की भट्ठी में
खाक हो गया था ’’
आगे पढ़ें-
‘‘जियो बेटा प्रेम प्रकाश
हाँ-हाँ ,चोटी जरूर रख लो
और हाँ ,पूरनमासी के दिन
गढ़ की गंगा में डूब लगा आना
हाँ-हाँ तेरा यही लिबास
तेरे को रोजी-रोटी देगा
सच,बेटा प्रेम प्रकाश,
तूने मेरा दिल जीत लिया
लेकिन तू अब
इतना जरूर करना
मुझे उस नाले के करीब
ले चलना कभी
उस नाले के करीब
जहाँ कल्लू का कुनबा रहता है
मैं उसकी बूढ़ी दादी के पास
बीमार अब्बाजान के पास
बैठकर चाय पी आऊँगा कभी
कल्लू के नन्हे -मुन्ने
मेरी दाढ़ी के बाल
सहलाएंगे... और
और ?
‘‘ और तेरा सिर... ’’
मेरे अंदर से
एक गुस्सैल आवाज आयी...-
बुडढ़े,अपना इलाज करवा
तेरी खोपड़ी के अंदर
गू भर गयी है
खूसट कहीं का
कल्लू तेरा नाना लगता है न ?
खबरदार साले
तुझे किसने कहा था
मेरठ आने के लिए ?...
लगता है
वो गुस्सैल आवाज
आज भी कभी-कभी
सुनाई देती रहेगी...

एक जमाने में भाजपा को जनसंघ के नाम से जानते थे। जनसंघ पर बाबा ने लिखा
-

‘‘तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप वो जनसंघी ,
वो स्वतंत्र हैं जिनके परम समीप 
उनकी लेंड़ी घोल-घोल कर लो यह आँगन लीप 
उनके लिए ढले थे मोती, हमें मुबारक सीप 
तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
नया जमाना

लोक संघर्ष
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गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

भारतीय खेत मजदूर यूनियन की केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति के फैसले

भारतीय खेत मजदूर यूनियन की केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति की बैठक 23 एवं 24 अगस्त 2010 को नई दिल्ली में यूनियन के अध्यक्ष अजय चक्रवर्ती पूर्व सांसद की अध्यक्षता में संपन्न हुई। जनरल सेक्रेटरी नागेन्द्र नाथ ओझा ने दिनांक 5 एवं 6 मई 2010 को पटना में हुई जनरल कौसिंल की बैठक के बाद गतिविधियों पर एक रिपोर्ट समीक्षा के लिए पेश की। विचार-विमर्श के बाद निम्नांकित फैसले लिये गये।



1. टेªड यूनियनों द्वारा आहूत 7 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल में खेत मजदूर को भारी संख्या में गोलबंद किया जाये। यूपीए-2 सरकार की जनविरोधी आर्थिक नीतियों के विरूद्ध आयोजित इस हड़ताल को खेत मजदूरों की विशाल भागीदारी से अत्यंत ही जुझारू बनाया जा सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए राज्य यूनिटें खेत मजदूरों की भारी भागीदारी सुनिश्चित करें।



2. खेत मजदूरों का संसद मार्च: यूनियन की केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति ने खेत मजदूरों के ‘संसद मार्च’ (दिल्ली रैली) के लिए 2011 साल में मार्च महीने के प्रथम पखवाड़े में आयोजित करने का फैसला किया। भाखेमयू, खेत मजदूरों की मांगों को लेकर इस रैली के लिए अभी से तैयारी शुरू कर देगी।



- ‘चलो पार्लियामेंट’ के आह्वान को लेकर तैयारी पूरी करने हेतु कन्वेंशन, सम्मेलन तथा आम सभाएं आयोजित कर इसका संदेश लोगों के बीच ले जाया जाये,



- आगामी अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर माह में विभिन्न स्तरों पर सरकारी कार्यालयों के समक्ष प्रदर्शन आयोजित कर खेत मजदूर आंदोलन की मांगों को, जो प्रधानमंत्री को संबोधित हो पेश किया जाये;



- ‘चलो पार्लियामेंट’ को लेकर पर्चे एवं पोस्टर प्रसारित किये जायें;



2011 जनवरी एवं फरवरी के माह में जिलों के अंदर “जत्था मार्च” का कार्यक्रम चलाया जाये।



पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र से खेत मजदूरों की भारी गोलबंदी पर ही इस कार्यक्रम की सफलता निर्भर करेगी। अतः इनकी राज्य यूनिटों की विशेष जवाबदेही है। इन राज्यों में खेत मजदूरों की गोलबंदी के लिए व्यापक अभियान चलाया जाये।



-रैली के लिए पूर्व से निर्धारित कोष संग्रह के लक्ष्य को सभी राज्य यूनिटें पूरा कर दिसंबर के अंत तक जमा करा दें। रैली की तिथि का ऐलान भी शीघ्र कर दिया जायेगा।



3. मानवाधिकार दिवस 10 दिसंबर 2010 का कार्यक्रम: 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। कार्यकारिणी समिति ने 10 दिसंबर 2010 को ‘मानवाधिकार दिवस’ को भूमिहीनों के बीच खेती एवं आवासीय भूमि के वितरण की मांग को लेकर मनाने का आह्वान किया है। इसमें बंटाईदारों के हक एवं आदिवासियों के भूमि अधिकार संरक्षण की मंागें भी शामिल हैं। 15 डिसमिल आवासीय भूमि और आवास योजना के अंतर्गत 3 लाख रुपये की मांग को शक्तिशाली ढंग से उठाना है। इसी के साथ शामिल है इंदिरा आवास योजना के अंदर हाल में बने क्षतिग्रस्त मकानों के पुनर्निर्माण की मांग। खाद्य सुरक्षा, अस्पृश्यता निवारण और अत्याचार पर रोक की मांगेे भी उठायी जायें।



इस अवसर पर स्थानीय बाजारों में खेत मजदूरों के जुलूस, मशाल जुलूस, सभाएं और कन्वेंशन आयोजित करें। इसे व्यापक पैमाने पर मनाने की योजना बनाकर उसे लागू करें।



4. राष्ट्रीय सम्मेलन: केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति ने राष्ट्रीय सम्मेलन 2011 में संपन्न करने का फैसला किया जो अक्टूबर या नवम्बर में होगा। सम्मेलन की तिथि एवं स्थान की सूचना शीघ्र दी जायेगी। 12वां राष्ट्रीय सम्मेलन 2010 की सदस्यता के आधार पर होगा।



5. खेत मजदूर यूनियन के कार्यकर्ताओं की राष्ट्रीय स्तर पर एक बैठक आगामी दिसम्बर माह के अंत तक आयोजित की जायेगी जिसमें केन्द्रीय खेत मजदूर विभाग, राज्य के ख्ेात मजदूर विभाग अथवा खेत मजदूर उपसतिति के सदस्य भाग लेंगे और प्रत्येक राज्य में 2 से 5 तक की संख्या में अन्य प्रमुख साथी इस बैठक के लिए आमंत्रित किये जायेंगे। यह बैठक खेत मजदूर आंदोलन की वर्तमान चुनौतियों और कर्तव्य विषयक एक प्रस्तावित दस्तावेज पर विचार-विमर्श के उद्देश्य से आयोजित होने वाली है। बैठक की तिथि एवं स्थान की सूचना शीघ्र ही तय की जायेगी।



6. कार्यकारिणी ने यूनियन के राज्य सचिवों से आग्रह किया हे कि वे राज्य परिषदों की बैठक कर इन फैसलों के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करें। निर्धारित अवधि के अंदर रैली के लिए फंड एवं यूनियन की सदस्यता का लक्ष्य पूरा कर लिया जाये।
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बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

मेरी मां मेरी दोस्त

मेरी मां कुलवंत कौर अत्यंत सहृदय एवं दयालु इंसान थी। हम बहनें और भाई, जब कभी वह हमारे इर्द-गिर्द होती या किसी अन्य स्थान को गयी होती, कभी भी उनसे दूर महसूस नहीं करते थे। अन्य लोग उनकी स्वागतमयी मुस्कान, हर किसी की जरूरत में मदद करने की उनकी भावना और हम बच्चों को उनकी तरफ से दी गयी आजादी की प्रशंसा करते थे। हम बचपन से ही इस पर बड़े गर्वित होते रहे हैं।



उन्हें और हमारे पिता कामरेड दीवान सिंह को कालोनी में आदर्श दम्पत्ति के रूप में माना जाता था। हम तो मां को ‘बीजी’ और पिता को ‘पापाजी’ कहते ही थे, हमारी कालोनी के भी लगभग सभी लोग-भले ही उनकी उम्र कितनी भी रही हो- उन्हें इसी तरह पुकारते थे। कालोनी में किसी परिवार में कोई झगड़ा हो या पड़ोसियों के बीच; लोग उम्मीद करते थे कि ‘बीजी’ और ‘पापाजी’ उनके मामले को अवश्य ही सुलझा देंगे।



हमारे घर को समझा जाता था कि यह घर शांति कायम कर देगा, इंसाफ करेगा और किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा। हमने अपने माता-पिता से ही सीखा कि जाति व्यवस्था में विश्वास न करें, सभी इंसानों को बरारबर समझें, सबका सम्मान करें। मेरे पिता कोई सरनेम नहीं लगाते थे। हमने भी उसका पालन किया। सभी धर्मों का सम्मान करना, किसी की आस्था को चोट न पहुंचाना-इसके पहले पाठ हमने अपने घर में ही पढ़े।



मां मेरे पापा से 11 वर्ष छोटी थी। जब हमारे पिता विभिन्न धर्मों, दर्शनों और इतिहास के बारे में बताया करते थे तो मां भी उसे सुनने हमारे साथ बैठ जाती।



हमें स्वतंत्रता संग्राम, भारत के विभिन्न भूमिगत क्रांतिकारियों की जीवन गाथाओं, विश्व में हो रहे परिवर्तनों और समाजवादी देशों की उपलब्धियों आदि के बारे में सुनने-जानने का अवसर मिला।



हमने देखा कि हर तरफ जो घटनाक्रम होता, मां उसमें बड़ी दिलचस्पी लेती, उन्हें समझती। बड़ी ग्रहणशील थी वह। वह पार्टी क्लासों में नियमित हिस्सा लेती जो समय-समय पर हमारे घर की छत पर ही ली जाती थी। मैं उस समय सेकंडरी स्कूल में पढ़ रही थी।



मुझे अपने बचपन के दिन याद हैं जब पंजाब एवं अन्य स्थानों के कामरेड हमारे घर आते रहते थे और मां हमेशा उनके स्वागत सत्कार में लगी रहती।



कुछ लोग विभिन्न कारणों से हमारे याहं काफी लम्बे अरसे तक भी ठहरे रहते। बाद में अनेक ऐसे मौके आये जब मैं लोगों को अपने यहां कुछ समय ठहरने के लिए बुलाती। मां उनके स्वागत-सत्कार में भी कभी कोताही नहीं करती थी। हम, उनके बच्चे ही उनकी इस उदारता का फायदा नहीं उठाते थे बाद में उनकी बहुओं ने भी उनकी इस उदारता का फायदा उठाया।



उन्हें तीसरे-चौथे दर्जें से आगे पढ़ने का मौका नहीं मिला था। पर सीखने की उनमें अपार क्षमता थी। अपनी लगन एवं इस क्षमता के बल पर वह न केवल हिंदी और पंजाबी के बल्कि अंग्रेजी के अखबार भी नियमित पढ़ने लगी।



कई बार तब मैं कुछ दिनों बाहर रहकर दिल्ली वापस आती तो वह मेरे लिए पढ़ने की सामग्री रखती, यह सोच कर कि कहीं ये बातें मेरे पढ़ने से न छूट जायें। वह विभिन्न राजनैतिक घटनाक्रमों के बारे में पूछती रहती थी और उन पर अपनी राय भी जाहिर करती।



हम बिना किसी हिचक अपनी सभी व्यक्तिगत समस्याएं उनके साथ साझा कर सकती थी। हमें उन पर भरोसा रहता था कि एक दोस्त की तरह हमें सलाह दंेगी।



वह बड़ी सादा, अत्यंत परदर्शी इंसान थी। हमारे सारे मिलने-जुलने वाले, हमारे सभी मित्र उन तक पहुंचते थे। सभी को वह सलाह देती।



उनकी उल्लेखनीय बात यह थी कि वह हर उम्र के लोगों के साथ घुल-मिल जाती, उनसे दोस्ताना कर लेती। सब उनके साथ सहज हो जाते। कोई औपचारिकता नहीं रहती थी।



1981 में मेरे पिता का. दीवान सिंह का निधन हो गया था। उसके बाद के इन तमाम 29 वर्षों में वह उसी निष्ठा के साथ न सिर्फ अपनी तमाम जिम्मेदारियां निभाती रही बल्कि उन्होंने हम भाईयों और बहनों के लिए भी बहुत कुछ किया ताकि हम अपने पसंद के रास्ते पर आगे बढ़ सकें। वह अत्यंत संवेदनशील थी, बेटे-बेटियों में भेदभाव नहीं करती थी। सबके साथ एक सा बरताव करती थी।



मेरे जीवन में उनकी बड़ी भूमिका रही। मैं तो पार्टी के कामकाज में अपना पूरा समय लगाती रही, उन्होंने मेरे बेटे का पालन-पोषण किया। अपने दामाद अरूण मिश्रा की वह बड़ी प्रशंसा करती थी। हम आज जो कुछ भी हैं उसके लिए उन्होंने जिस त्याग एवं निष्ठा का परिचय दिया, अपने अंतरंग क्षणों में हम उसे याद कर भावुक हो उठते हैं।



मेरी मां ही नहीं चली गयी, मुझे लगता है मेरी दोस्त भी मुझसे दूर चली गयी। ऐसी दोस्त जिसे मैं चाहती थी कि मेरे इर्द-गिर्द रहे।



- अमर जीत कौर
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मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

हालात - जहां मौत एक गिनती है

इस साल मई में हम कैमरा टीम के साथ गोरखपुर के आसपास के इलाकों में जापानी बुखार से हुई मौतों की कहानी दर्ज कर रहे थे। जून का महीना बीतते-बीतते बारिश का पानी फिर से जमने लगा और इसी के साथ दिमागी बुखार ने भी अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। 1978 से शुरू हुई इस बीमारी से उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में अब तक बारह हजार से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। गैरसरकारी अस्पतालों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि यहां मौत के आंकड़े सरकारी अस्पतालों में हुई मौतों से कई गुना अधिक होंगी। हजारों बच्चों की मौत के बावजूद सरकार अब तक कोई ठोस नीति नहीं बना पाई है। सरकार ने 27 साल बाद इंसेफेलाइटिस के एक रूप जापानी इंसेफेलाइटिस के टीकाकरण का फैसला किया लेकिन चार साल तक टीकाकरण करने के बाद इस साल इसलिए टीकाकरण नहीं हो सका क्योंकि टीके रखे-रखे खराब हो गए। मतलब यह कि जापानी बुखार से बचने का इस बरस कोई रास्ता न था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री ने भी बचकाना बयान दे डाला। उन्होंने कहा कि हमने ग्रामीण इलाकों और कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सुविधा संपन्न बना दिया है इसलिए बेवजह जिला अस्पतालों में आने का कोई मतलब नहीं है। इसी आपाधापी में अगस्त का महीना बीत गया और बुखार ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया।



सितंबर के महीने में एक बार फिर मौत की खबरें आनी शुरू हो गईं। ये अलग बात है कि बच्चों की मौतों की रोज-रोज आने वाली खबरें अभी न्यूज रूम की टी आर पी नीति की नजर में न चढ़ने के कारण अदृश्य पेजों पर हाशिए पर पड़ी थीं। ऐसे समय में हम भी अपनी कहानी में मौतों को दर्ज करने आठ सितंबर की सुबह गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज पहुंचे। मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में जगह-जगह मरीजों के परिवार वाले भरे पड़े थे। कैमरामेन पंकज ने वार्ड का मुआयना किया और ट्राईपोड रख कर फ्रेम बनाने लगे। मई के महीने में यहां इक्का-दुक्का मरीज थे। अब पंकज के हर फ्रेम में कई मासूम बच्चे के चेहरे कैद हो रहे थे। हर बेड पर कम से कम दो-तीन बच्चे और उनका पस्त पड़ा परिवार। जूनियर डाक्टर जानता है कि इस बार तो टीका भी नहीं लगा है। इसलिए वे यही कह रहे थे कि मस्तिष्क ज्वर है। इस मस्तिष्क ज्वर का निदान कैसे होगा यह किसी के मस्तिष्क में नहीं था। सारे मस्तिष्क जैसे एक होनी को घटते हुए देखने के आदी हो चले थे।



वार्ड में भीड़ न हो इस समझ से मैं गलियारे की बेंच पर बैठ गया। बगल में बैठी नौजवान मुस्लिम औरत ने सुबकते हुए मुझसे कलम और कागज मांगा। उस पर उसने किसी का मोबाइल नंबर लिखा। उसका डेढ़ साल का बेटा भी यहां भरती था। कई हफ्ते उसे बीमारी समझने और अपने गांव-कसबे में ठोकर खाने में बीत गए। काश! मेरे पास कोई जादू होता और मैं मानवीय स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्रा जी से पूछता यह बिचारी किस अस्पताल में जाए। अनंत मिश्र जैसों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में दाखिल नहीं होंगे और न ही उनके घर तक मच्छर पहुंच सकेंगे। तभी एक औरत अपनी बारह साल की अचेत बेटी को गोद में उठाए बदहवास आती दिखाई दी। कुशीनगर के बड़गांव टोला उर्मिला और शारदा प्रसाद की बेटी मधुमिता को पंद्रह अगस्त से दौरे पड़ने शुरू हो गए थे। गांव और कस्बे में इधर-उधर चक्कर लगाने में ही इस परिवार के हजारों रुपए खर्च हो गए। रोते-रोते उर्मिला ने बताया कि कैसे इस बीमारी ने पूरे परिवार को सड़क पर खड़ा कर दिया है। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने अपनी बिटिया को टीके लगवाए थे- जवाब न में मिला।



मैं फिर उस मुस्लिम महिला के बगल में जा बैठा। अभी तक उसका फोन नहीं आया था लेकिन वार्ड की भयावहता से वह अपने डेढ़ साल के बेटे के भविष्य को लेकर परेशान थी और लगातार रो-रो कर हलकान हुए जा रही थी। स्वास्थ्य मंत्री के दावे को चुनौती देने के लिए एक समाचार एजेंसी की टीम भी वहां पहुंच चुकी थी। एजेंसी के रिपोर्टर की दुविधा थी कि उन्हें कोई भी डाक्टर आधिकारिक वक्तत्व नहीं दे रहा था। तब उन्होंने हमारे सहयोग के लिए आए गोरखपुर के पूर्व छात्र नेता व पत्रकार अशोक चौधरी को घेर लिया।



अशोक कुछ बोलते ही कि वार्ड के दूसरे कोने से गगन भेदती चीखों ने हमें हिला दिया। यह वार्ड के एक कमरे के बाहर से उठी आवाजें थी। ढाई साल के एक बच्चे ने दम तोड़ दिया था। बच्चे की मौत पर उसके परिवार वाले विलाप कर रहे थे। यह दूसरा बच्चा था जिसने उस दिन दिमागी बुखार से दम तोड़ा था। उस वार्ड में हर परिवार अपने ऊपर मंडरा रही मौत से आशंकित था। हम वार्ड के बाहर खड़े थे। थोड़ी देर बाद उस परिवार का मुखिया, संभवत उस नन्हें शिशु का दादा घुंघराले बालों वाले प्यारे शिशु को तेजी से लेकर बाहर निकला। उस नन्हें शिशु का सलोना चेहरा पूरे वार्ड को गहरी खामोशी और अवसाद में डुबा चुका था। हमने भी अपना ट्राईपौड समेटा और इमरजंसी वार्ड के पास आ गए। तभी उसी तीव्रता वाली चीख हैडफोन के जरिए मेरे कानों तक पुहंचा। दाहिनी तरफ नजर घुमाई तो वही मुसलिम महिला दहाड़ मारकर छाती पीट रही थी जिसने आधा घंटा पहले मुझे वार्ड के गलियारे में किसी परिचित का नंबर लिखने के लिए कलम और कागज मांगा था। हमारे फ्रेम में क्लोज अप में उसका आंसुओं से भरा चेहरा और हेडफोन पर अरे कोई मोर बेटवा के जिया दे... का करुण आतर्नाद था। राघव दास मेडिकल कालेज, गोरखपुर में अपनी फिल्म के लिए मौत की कहानी दर्ज करते हुए हमें सिर्फ तीस मिनट बीते थे और हम दो मौतों को देख चुके थे। अब उस आधी मौत के बारे में पता करने का हौसला मेरे अंदर नहीं बचा था जो बारह साल की लगभग विकलांग हो चुकी मधुमिता को बचाने में घरबार बेच कर कर्ज में डूब कर हासिल कर चुकी थी।



हम मेडिकल कालेज से लौट रहे हैं। गाड़ी गोरखपुर की भीड़ वाली सड़कों और बरसाती पानी के जमाव के बीच रास्ता बनाते हुए जा रही है। रेलवे स्टेशन पहुंचा तो एक पत्रकार दोस्त का संदेश मिला- बाबा राघवदास मेडिकल कालेज में छह बच्चों की आज मौत हुई।



 संजय जोशी
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Press statement of CPI on "Kashmir", "Ayodhya Judgement" & "Bihar Elections"

The National Executive of the Communist Party of India (CPI) has issued the following statements to the press:




ON JAMMU & KASHMIR



The National Executive of the Communist Party of India in its meeting on 4th October heard the report of Gurudas Dasgupta who was a member of the All Party delegation, which visited Jammu & Kashmir. The CPI expressed its appreciation that the delegation sent its representatives to meet those who had refused to meet on their own, conducted useful discussions with those supposedly separatist leaders. With these efforts the visit of the All Party delegation became more fruitful.



The National Executive welcomed the initiative taken by the Union Home Minister, following the discussions with the all-Party delegation, announcing an 8-point programme for Jammu & Kashmir. The CPI welcomed the proposals, but wanted the government of India to take necessary and meaningful steps for the time bound implementation of these proposals.



There are serious charges leveled by many people in Kashmir that the proposals and packages etc for Jammu & Kashmir announced in the past, were not at all implemented. There was no sincerity on the part of union government.



Keeping this in mind, the CPI feels that the Central Government should take urgent steps for the implementation of these proposals.



Besides, the CPI feels that a mechanism shall be set up, with representatives of Political Parties and other democratic forces to monitor the implementation of the 8-point program and to carry forward the dialogue.



The CPI also feels that it is necessary to have a re-look at the Armed Forces Special Powers Act at the earliest. It is necessary to withdraw AFSPA from Srinagar and several other places.



The CPI feels that it is necessary to have a broad democratic common platform to express solidarity with Kashmir and to discuss the issues like human right violation and autonomy to the state of Jammu and Kashmir.



ON AYODHYA JUDGEMENT





The National Executive of the Communist Party of India deliberated upon the verdict of the Lucknow bench of the Allahabad High Court and its consequences.



National Executive is of the view that the Allahabad High Court judgement based on faith and religious belief than the basic tenets of history, archeology, legal logic and facts of other streams of scientific knowledge. It has led to several questions being raised with regard to the fundamentals of jurisprudence, rule of law and the principles of secular democracy.



While appreciating the matured response of the people in the wake of the pronouncement of the judgement in maintaining calm and harmony, the party notes that the road to Supreme Court is open. Until and unless the Supreme Court finally disposes the case, nobody should try to interpret the High Court judgement to suit their political positions.



The National Executive of the Party has called upon the people to continue to stand united in protecting the republican Constitution and the secular democratic polity of the Nation.



ON BIHAR ELECTION



The National executive of the Party appealed to the people of Bihar to defeat the JD(U)-BJP combine, reject the other combinations of RJD-LJP, Congress and elect the CPI and Left candidates in the ensuing elections. National Executive endorsed the electoral adjustments between CPI, CPI(M) and CPI(ML). CPI is putting up 55 candidates.



After long time, the Left Parties have come together to fight large number of seats unitedly. It is a positive development in changing the political course in Bihar.



These Assembly elections are crucial for Bihar. The state government under JD(U)-BJP miserably failed to implement the recommendations of D. Bandhopadhyaya Committee on Land reforms. Implementation of land reforms in Bihar is a crying need of the downtrodden and the oppressed people. It is unfortunate all the other political parties except Left ganged up to stall the Land Reforms. These parties are trying to widen the caste-based politics for electoral gains. Notorious anti-social elements are made candidates, further encouraging the criminalisation of political atmosphere. What Bihar needs today is a secular democratic government.



Communist Party of India urges upon the people of Bihar to elect a strong contingent of CPI and Left candidates to the Legislative Assembly who will fight for the rights of poor and downtrodden, for implementation of Land Reforms, for corruption free administration.
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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

नेपाल के वर्तमान हालात

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य और उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल के सचिव डा0 गिरीश ने 17 से 21 सितंबर तक काठमांडू में संपन्न नेपाली कांग्रेस के कन्वेंशन में बतौर भाकपा प्रतिनिधि भाग लिया।






अपने पांच दिवसीय नेपाल प्रवास के दौरान उन्होंने नेपाली कांग्रेस के खुले अधिवेशन को संबोधित किया। नेपाली कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के अतिरिक्त उन्होंने नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री कामरेड माधव कुमार नेपाल, उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री सुजाता कोइराला, रक्षा मंत्री विद्या देवी भंडारी, पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं सीपीएन-यू.एम.एल के शीर्षस्थ नेता के.पी.एस.ओली के अतिरिक्त वरिष्ठ पत्रकारों, अधिवक्ताओं, उद्यमियों तथा समाज के विभिन्न तबकों के लोगों से भेंट की और विचारों का आदान प्रदान किया। प्रस्तुत लेख इसी अंतर्संवाद पर आधारित है।






- संपादक





लोकतांत्रिक नव निर्माण की राह पर है नेपाल



नेपाल अपने अब तक के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। कुछ ही वर्ष पहले निरंकुश राजशाही के चंगुल से मुक्त हुये इस देश की जनता के समक्ष चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। चुनौती शांति स्थापित करने की है। चुनौती नेपाल को तरक्की और समता के रास्ते पर ले जाने वाले संविधान के निर्माण की है। चुनौती नेपाल के विकास और आत्मनिर्भरता की है। और बड़ी चुनौती है प्रधानमंत्री के चुनाव में पैदा हुये गतिरोध को तोड़ कर नये प्रधानमंत्री के चुनाव की।



लोकतंत्र की गहरी नींव पड़ चुकी है



गत वर्षों में नेपाल की जनता और वहां के राजनैतिक दलों ने अपने लोकतांत्रिक संघर्षों के बल पर राजशाही को समाप्त कर एक बहुलवादी लोकतांत्रिक प्रणाली में विश्वास व्यक्त किया है। इसकी जड़ में 23 नवंबर 2005 को सात संसदीय पार्टियों एवं माओवादियों के बीच हुआ समझौता है। 12 सूत्रीय यह समझौता नेपाल के लोकतांत्रिक संघर्षों के बल पर राजशाही को समाप्त कर एक बहुलवादी लोकतांत्रिक संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें गैर हथियारी लोकतांत्रिक संघर्ष का संकल्प विहित है। यह जनता की सार्वभौमिकता एवं लोकतंत्र के लिये संघर्ष के संकल्प का वैध घोषणा पत्र है। इसी समझौते के परिणामस्वरूप अप्रैल 2006 में लाखों लोग सड़कों पर उतर आये और राजा को जी.पी. कोइराला को सत्ता सौंपनी पड़ी। नेपाल सदियों पुरानी राजशाही को अपदस्थ करने में कामयाब हुआ। 1 मई 10 को इस समझौते के विपरीत माओवादियों ने ‘सड़क विद्रोह’ की राह पकड़ी तो जनता ने विफल कर दिया।



यद्यपि 600 सदस्यीय संविधान सभा में आम जनता ने बहुदलीय लोकतंत्र के प्रति स्पष्ट जनादेश दिया लेकिन किसी भी दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हुआ। संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-माओवादी (यूसीपीएन-एम) को सबसे ज्यादा 238 सीटें मिलीं। नेपाली कांगेेस को 114 सीटें हासिल हुई। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-संयुक्त मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीएन-यू एमएल) को 109 सीटें, 82 सीटें मधेसी पार्टियों को तथा शेष कुछ अन्य दलों के खाते में र्गइं।



नेपाल के अंतरिम संविधान के अनुसार सरकार बनाने को आधे से अधिक बहुमत की जरूरत होती है। यानी कि 301 सदस्यों के बहुमत से ही प्रधानमंत्री चुना जा सकता है।



सरकार चुनने में खड़ा हुआ गतिरोध



संविधान सभा के चुनाव के बाद यू.सी.पी.एन-माओवादी पार्टी ने सत्ता संभाली और उसके नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचण्ड’ प्रधानमंत्री बने। लेकिन हथियार बन्द माओवादियों को नेपाली सेना में शामिल करने के सवाल पर सेना प्रमुख को हटाने के उनके फैसले पर उत्पन्न हुये गतिरोध के कारण उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी। तब नेपाली कांग्रेस, सी.पी.एन.-यू.एम.एल. एवं अन्य दलों के लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी जिसके प्रधानमंत्री सीपीएन-यू.एम.एल. के नेता माधव कुमार नेपाल बने। किसी कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री के नेतृत्व में वह भी एक केयर टेकर सरकार 17 माह से चल रही है और अभी तक नये प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं हो पाया है तो उसकी वजह है प्रमुख राजनैतिक दलों का आम सहमति अथवा बहुमत की स्थिति में न पहुंच पाना।



इस दरम्यान प्रधानमंत्री पद के लिये आठ बार निर्वाचन हो चुका है। आठवीं बार के चुनाव से पहले जो अभी 26 सितम्बर को ही संपन्न हुआ है, यू.सी.पी.एन.-एम. के नेता प्रचण्ड ने अपने को चुनाव से अलग कर लिया था और नेपाल कांग्रेस का भी आह्वान किया था कि वह भी अपने प्रत्याशी रामचन्द्र पौडल को चुनाव मैदान से हटा ले ताकि आम सहमति से नये प्रधानमंत्री के चुनाव का रास्ता साफ हो। सी.पी.एन.-यू.एम.एल ने चुनावों में तटस्थ रहने का निर्णय पहले ही ले रखा है अतएव आठवीं बार के चुनाव में भी नेपाली कांग्रेस के प्रत्याशी को बहुमत नहीं मिल सका। राजनैतिक दलों की ध्रुव प्रतिज्ञाओं के चलते प्रधानमंत्री पद के चुनाव का गतिरोध आज भी कायम है। बेशक नेपाली जनमानस इससे बेहद चिन्तित है और नेताओं की हठवादिताओं के प्रति जनाक्रोश स्पष्ट देखा जा सका है।



समाधान की राह आसान नहीं



लेकिन गतिरोध को समाप्त करने के लिये कई समाधान हवा में उछल रहे हैं। सबसे प्रमुख है - आम सहमति से प्रधानमंत्री चुनने के रास्ते खोजे जायें और जरूरी हो तो संविधान में संशोधन किया जाये। दूसरा - सीपीएन यू.एम.एल. और यू.सी.पी.एन. (माओवादी) मिलकर इसके लिये सहमति बना लें। तीसरा - यू.सी.पी.एन.-एम., मधेसी तथा अन्य दलों साथ लेकर 301 सदस्यों का बहुमत जुटा ले। बाद के दोनों समाधानों में माओवादी पहले ही असफल हो चुके हैं।



शांति प्रक्रिया जारी है



माओवादियों को नेपाली कांग्रेस और सी.पी.एन.-यू.एम.एल. तथा अन्य दलों द्वारा समर्थन न देने के पीछे माओवादियों द्वारा हथियार बंद संघर्ष की नीति का परित्याग न करना है जो शंाति प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। लगभग 20 हजार माओवादी लड़ाके जनमुक्ति सेना (पी.एल.ए.) और यंग कम्युनिस्ट लीग (वाई.सी.एल) नामक संगठनों के अंतर्गत काम कर रहे हैं और वे हथियार बंद हैं। वर्तमान में ये दोनों दस्ते संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति मिशन की देख रेख में बैरकों में रह रहे हैं मगर ये जब तक अपनी पुलिसिया कार-गुजारियों का प्रदर्शन करते रहते हैं। सरकार की ओर से उन्हें मासिक दस हजार नेपाली रुपए बतौर वेतन दिये जा रहे हैं। माओवादी इन्हें सेना में शामिल कराने का असफल प्रयास करते रहे हैं और आज भी दबाव बना रहे हैं। अन्य दल इसका विरोध करते आ रहे हैं और इन दलों के अनुसार शांति प्रक्रिया में यह सबसे बड़ी बाधा है।



अब हाल ही में केयर टेकर सरकार और माओवादियों के बीच पी.एल.ए. और वाई.सी.एल. के लड़ाकों के पुनर्वास के लिये एक चार सूत्रीय समझौता हुआ है जिसके तहत 14 जनवरी 2011 तक पीएलए माओवादियों के नियंत्रण से अलग हो जायेगी और 19602 माओवादी लड़ाके यू.सी.पी.एन.-एम की कमांड से बाहर आ जायेंगे। समझौते के तहत पीएलए. के निरीक्षण, कमांड, नियंत्रण और बनी आचार संहिता को लागू कराने के लिये छह दलों (जिसमें माओवादी शामिल हैं) की एक विशेष समिति गठित की गई है जिसने एक 12 सदस्यीय सैक्रेटरियेट का गठन किया है। इस विशेष समिति द्वारा जारी निर्देशों के तहत पी.एल.ए. लड़ाके सरकार के नियंत्रण में आ गये हैं। इस समस्या के समाधान से शांति प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।



बहुदलीय, धर्मनिरपेक्ष संविधान की ओर



बार-बार प्रधानमंत्री का चुनाव टलना और शांति प्रक्रिया में हो रहे विलंब के कारण संविधान निर्माण के काम में बाधा आ रही है और वह विलंबित हो रहा है। संविधान को 28 मई 2010 तक बन जाना चाहिये था। लेकिन अब यह समय सीमा बढ़ाकर मई 2011 कर दी गई है। विभिन्न दल इसके निर्माण में अवरोधों को लेकर भले ही एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हों लेकिन संविधान के मूल ढांचे और उद्देश्यों को लेकर एक व्यापक आम सहमति है। यह सहमति बहुदलीय लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समतामूलक समाज और सामाजिक न्याय के पक्ष में है। दशकों तक एक हिन्दू राजा के शासन में रहे नेपाल में धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाने का पक्ष इतना प्रबल है कि वहां नेपाली कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष को प्रेस वार्ता में कहना पड़ा कि उन्हें धर्मनिरपेक्ष संविधान के निर्माण पर कोई एतराज नहीं है।



रोड़े भी हैं राह में



प्रधानमंत्री के चुनाव में लगातार चल रहे गतिरोध, शांति प्रक्रिया की धीमी गति और संविधान के निर्माण में हो रही देरी से जनता में पैदा हो रहे आक्रोश को भुनाने के प्रयास भी शुरू हो गये हैं। राजावादी शक्तियां आपस में एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं। राजावादी चार पूर्व प्रधानमंत्री, हिन्दू राष्ट्र एवं संवैधानिक राजतंत्र के गुणगान में लगे हैं। धर्मनिरपेक्ष एवं कम्युनिस्ट पार्टियों की ताकत से खींझा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी वहां गतिविधियां बढ़ा रहा है। माओवादी यद्यपि शंाति, नये संविधान एवं राष्ट्रीय संप्रभुता की बात कर रहे हैं लेकिन यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ये लक्ष्य कानूनी तरीके से हासिल नहीं होंगे तो राष्ट्रयुद्ध होगा। आपसी फूट के चलते मधेसी पार्टियां भी संविधान निर्माण के लिये दबाव नहीं बना पा रही हैं। नेपाल की जनता वैधता, प्रासंगिकता एवं सकारात्मक परिणाम चाहती है। शांति ही लोगों के सम्मान की गारंटी करेगी और संविधान उनकी आकांक्षाओं की पूति करेगा।



रिश्ते गहरे हैं भारत-नेपाल के बीच



भारत और नेपाल के बीच गहरे भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनयिक एवं आर्थिक रिश्ते हैं। यहां तक कि आज भी दोनों के बीच आवागमन के लिये पासपोर्ट एवं वीजा आवश्यक नहीं है। दोनों देशों में लगभग 3565 करोड़ रुपये का भारत-नेपाल आर्थिक सहयोग कार्यक्रम चल रहा है जो शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में कार्यरत हैं। इसे और व्यापक बनाने की जरूरत है। वहां हाइड्रोपावर उत्पादन के क्षेत्र में सहयेाग का भारी स्केाप है। प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा को भी दोनों देश मिल कर काम कर सकते हैं। राजशाही नेपाली जनता को बरगलाने को भारत विरोधी दुष्प्रचार करती थी। आज भी कुछ अतिवादी ताकतें इसका सहारा लेती हैं। परन्तु नेपाली जनमानस भारतीय जनमानस के साथ प्रगाढ़ रिश्तों का हामी है। यहां तक कि हर नेपाली हिन्दी समझता है, पढ़ एवं बोल सकता है। भारत के टीवी चैनल घर-घर में देखे जाते हैं। परस्पर सहयोग और मैत्री की इस दास्तान को और आगे बढ़ाने की जरूरत है।



नौजवानों के सशक्तिकरण की जरूरत



नेपाल का नौजवान नये और समृद्ध नेपाल के लिये तत्पर है। वह रोजगार और शिक्षा जैसे सवालों पर काफी गंभीर है। नेपाली कांग्रेस के 12वें कन्वेंशन के समय आयोजित खुले अधिवेशन में नौजवानों का सागर उमड़ पड़ा था। 50 हजार से ऊपर उपस्थित जन समुदाय में 99 प्रतिशत उपस्थिति 18 से 40 साल के बीच उम्र के युवकों की थी। कन्वेंशन के लिये चुनकर आये 3100 प्रतिनिधियों में 38 प्रतिशत डेलीगेट नवयुवक थे। “नौजवान सकारात्मक बदलाव के वाहक हैं, इसलिये उन्हें ताकत दी जानी चाहिये” - एक नौजवान ने कहा। दूसरे ने कहा-“नेपाल को ब्रेन-ड्रेन से बचाने की नीति बनानी चाहिये। खाड़ी देशों और भारत तमाम नौजवान छोटे कामों के लिये जाते हैं। देश में ही रोजगार की योजना बनानी चाहिये।”



लंबे समय तक राजशाही और पंचायती सिस्टम के विरूद्ध जनांदोलनों के जरिये नेपाल की जनता ने आज यह मुकाम हासिल किया है। नेपाल के नेताओं और राजनैतिक पार्टियों को जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतराना होगा और अपने तात्कालिक निहित स्वार्थों से उबरना होगा। जनता के हितों के विपरीत चलने वालों को भविष्य में वही स्थान होगा जो पूर्ववर्ती राजाओं का बन चुका है। अतएव भविष्य की सच्चाइयों को पढ़ने और अमल में लाने में ही सभी की भलाई है।



- डा. गिरीश
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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

अखिल भारतीय नौजवान सभा उत्तर प्रदेश इकाई का राज्य कन्वेंशन 23 सितम्बर को कानपुर में सम्पन्न

अखिल भारतीय नौजवान सभा की उत्तर प्रदेश इकाई का राज्य कन्वेंशन 23 सितम्बर 2010 को औद्योगिक शहर कानपुर में अत्यंत उत्साह एवं धूमधाम से सम्पन्न हुआ। कन्वेंशन मजदूरों के संघर्ष के ऐतिहासिक केन्द्र कानपुर मजदूर सभा भवन में किया गया। नौजवानों ने कन्वेंशन स्थल को झंडियों और झंडों से सजाया हुआ था। स्थानीय पुलिस ने 24 सितम्बर के आदेश का नाम लेकर कुछ व्यवधान करने की कोशिश की। नेताओं के बीच में पड़ने से फोर्स वहां से चली गयी।

उत्तर प्रदेश नौजवान सभा का यह कन्वेंशन अखिल भारतीय नौजवान सभा के नेतृत्व की भूमिका एवं उसके इस विश्वास से सम्पन्न हो पाया कि नौजवान सभा को प्रत्येक राज्य में और अधिक क्रियाशील करना है। इस उद्देश्य से केन्द्र के साथियों ने 5 एवं 18 अगस्त को लखनऊ में नौजवानों की बैठके कर तय किया कि एक राज्य स्तरीय कन्वेशन आयोजित किया जाये। ताकि उक्त कन्वेंशन के बाद उ.प्र. नौजवान सभा का सदस्यता के आधार पर नियमित राज्य सम्मेलन आहूत किया जा सके।

बैठक में विभिन्न जिलों से आये नौजवानों ने नौजवान सभा की कानपुर इकाई के निवेदन को स्वीकार किया और फैसला किया गया कि राज्य कन्वेंशन कानपुर में ही सम्पन्न करवाया जाये।

कन्वेश्ंान की तिथि आते-आते तीन महत्वपूर्ण कारणों 23 सितम्बर 2010 के कन्वेंशन में व्यवधान पैदा होने लगा। 24 सितम्बर 2010 को अयोध्या की बाबरी मस्जिद की टाइटिल डीड का फैसला, प्रदेश में पश्चिमी एवं पूर्वी जिलों में भयंकर बाढ़ तथा 23 सितम्बर 2010 से ही पंचायती चुनावों का नामांकन। इन तीनों कारणों से जिला-जिलों से आयोजकों के पास फोन आने लगे कि प्रतिनिधियों के आने में कठिनाइयां है। लेकिन कन्वेंशन को किसी भी हालत में स्थगित नहीं किया जा सकता था। कन्वेंशन में विभिन्न जिलों से आये लगभग 110 प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।

कन्वेंशन का प्रारम्भ झण्डारोहण से किया गया। मजदूर सभा भवन के मैदान में एकत्रित नौजवानों और विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में कानपुर के वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का. हरबंश सिंह ने झण्डारोहण किया। इस अवसर पर उन्होंने कानपुर में एकत्रित नौजवानों और आयोजकों कोे कन्वेंशन आयोजित करने के लिये बधाई दी। उन्होंने नौजवानों का आह्वान किया कि वे जातिवाद और साम्प्रदायिकता से संघर्ष करने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि वर्ग विभाजन से जातियां बनी हैं। समाजवाद स्थापित होने से वर्ग विहीन समाज की रचना होगी और जातियों के बंटवारे की परिस्थितियां भी समाजवादी समाज में समाप्त होने की स्थितियां पैदा हो जायेंगी। उन्होंने नौजवानों का आह्वान किया कि वो रोजगार प्राप्त करने की मांग और पूंजीवादी समाज द्वारा जनित भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी संघर्ष करें।

झण्डारोहण के बाद कन्वेंशन विनय पाठक,  सुनील सिंह, रामचन्द्र्र भारती, रशिम पासवान, वीरेन्द्र सिंह, राजू, गीता सागर एवं विनीता राज के अध्यक्षमण्डल में कन्वेंशन की कार्यवाही प्रारम्भ हुई।

स्वागत समिति की ओर से साथी नीरज यादव ने स्वागत भाषण दिया। उन्होनंे स्वागत भाषण में कानपुर के एतिहासिक महत्व पर चर्चा की। उन्होंने कहा कानपुर अतीत से ही क्रान्तिकारी नौजवानों की गतिविधियों का केन्द्र रहा है।  उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह कन्वेंशन उ.प्र. के नौजवानों को प्ररेणा देगा और संघर्षों का मार्ग प्रशस्त करेगा।

इस अवसर पर अखिल भारतीय नौजवान सभा के महामंत्री का. के. मुरुगन ने अपने ओजस्वी उद्घाटन भाषण में कहा कि नौजवान बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सामाजिक, आर्थिक असमानता सेत्रस्त है। उनको इसके विरूद्ध संघर्ष करना है। उन्होंने कहा कानपुर क्रान्तिकारियों की भूमि है तथा 1857 से ही स्वतंत्रता आन्दोलन का केन्द्र रहा है। उन्होंने भगत सिंह का हवाला देते हुये कहा कि भगत सिंह ने नौजवान सभा की शुरूआत की थी। भगत सिंह ने कहा था कि नया समाज बनाना होगा। नौजवान सभा उसी रास्ते पर चल रही है। नौजवान सभा में ही सबसे पहले 18 वर्ष के मताधिकार की मांग बुलन्द की थी। नौजवान सभा ने शिक्षा के अधिकार और नौजवानों के रोजगार के लिये संघर्ष किया है। 1980 में नारा दिया था “काम दो या जेल दो”। दुनिया भर में भारत केवल में 55 वर्ष से कम के लोग सबसे अधिक हैं। उन्होंने कहा कि श्री मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों के कारण नौजवानों के साथ-साथ 85 प्रतिशत देश की जनता गरीबी में रह रही है। उन्होंने कहा इन सब समस्याओं के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन संगठित किया जायेगा और उस आन्दोलन की रूपरेखा नौजवान सभा के 28 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक पंजाब में होने वाले 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन में बनाई जायेगी। उन्होंने अपने भाषण में उ.प्र. के साथियों को बधाई दी कि थोड़ी मुश्किल परिस्थितियों के बाद भी उन्होंने कन्वेंशन आयोजित किया। जिसमें नौजवान युवक और युवतियां उपस्थित रही।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि कानपुर विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डा. हेमलता स्वरूप ने नौजवानों को सम्बोधित और उत्साहित करते हुये कहा कि उन्हें सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध संघर्ष करना होगा। शासक वर्ग की नीतियां नौजवानों को चारों तरफ से घेर रही है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा का अभाव, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार जैसे प्रश्नों पर नौजवानों को जम कर संघर्ष करना चाहिये। उन्होंने नौजवानों का आह्वान किया कि वो स्त्रियों के बराबरी के हक के लिये और उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध भी संघर्ष करें। उन्होंने नौजवानों से पर्यावरण की रक्षा करने के संघर्ष में भी आगे आने को कहा। उन्होंने उ.प्र. के नौजवानों को बधाई दी और आशा व्यक्त की कि यह सम्मेलन उ.प्र. के नौजवानों को संगठित कर सही रास्ता दिखायेगा।

इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों के संदर्भों में नौजवानों को संघर्ष करने का आह्वान किया। उन्होंने अपन सम्बोधन में महंगाई, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता एवं नौजवानों के अधिकारों पर रोशनी डाली। उन्होंने ग्रामीण नौजवानों, किसानों के बेटे-बेटियों की तरफ भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने आश्वस्त किया कि नौजवान सभा के संघर्षों में भाकपा सदैव उनके साथ रहेगी।

कन्वेंशन को सम्बोधित करते हुये मजदूर नेता का. अरविन्द राज स्वरूप ने नौजवानों से कहा कि पूंजीवादी सामाजिक एवं आर्थिक नीतियां नौजवानों के अधिकारों को छीन रही हैं और क्रान्तिकारियों के आदर्शों से हटा कर नौजवानों को अपसंस्कृति की ओर धकेल रही हैं। नौजवानों को इन नीतियों का हर स्तर पर डट कर विरोध करना होगा।

कन्वेंशन के अन्त में उ.प्र. नौजवान सभा की सयोंजन समिति का गठन किया गया।
संयोजन समिति राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद जिलों में सदस्यता अभियान चला कर नियमित राज्य सम्मेलन आहुत करवायेगी। संयोजन समिति में संयोजक - नीरज यादव (कानपुर), सह संयोजक विनय पाठक (जालौन) एवं मुन्नीलाल दिनकर (सोनभद्र) चुने गये। इसके अतिरिक्त समिति में रामचन्द्र भारती (मऊ), एलान सिंह (हाथरस), शशिकान्त (मऊ), सुनील सिंह (कानपुर), नूर मोहम्मद (मुजफ्फर नगर), चन्दन सिंह (झांसी), जयप्रकाश (मुरादाबाद), राजकरन (बरेली), राजू (सुल्तानपुर), लक्ष्मण (मथुरा), पंकज (संत कबीरनगर), पूरन लाल (फतेहपुर), नूर मोहम्मद (मथुरा), गीता सागर (कानपुर), मुन्ना (इलाहाबाद), शैलेंद्र (औरय्या), अरूणेश (आगरा) तथा जनार्दन राम (गाजीपुर) की 21 सदस्यीय समिति का गठन हुआ।

पंजाब के राष्ट्रीय सम्मेलन हेतु नीरज यादव, विनय पाठक, रामचन्द्र भारती, मुुन्नी लाल दिनकर, नूर मोहम्मद (मुजफ्फर नगर), राजकरन एवं एक युवक एवं एक युवती मथुरा से प्रतिनिधियों के रूप में सर्वसम्मति से चुने गये।

कन्वेंशन के अन्त में भाकपा के जिला मंत्री ओम प्रकाश आन्नद और सहायक मंत्री राम प्रसाद कन्नौजिया ने आगन्तुकों को धन्यवाद दिया। कन्वेंशन के समापन की घोषणा अध्यक्ष मण्डल की ओर से रामचन्द्र भारती ने की और आयोजकों और प्रतिनिधियों को धन्यवाद देते हुए कन्वेंशन की समाप्ति की घोषणा की।

- नीरज यादव
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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

7 सितम्बर 2010 की राष्ट्रव्यापी हड़ताल जबरदस्त सफ़ल - दस करोड़ मजदूर हड़ताल में शामिल

आठ केन्द्रीय टेªड यूनियनों और कई स्वतंत्र फेडरेशनों के आह्वान पर संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के दस करोड़ से भी अधिक मजदूर हड़ताल में शामिल हुए। उन्होंने प्रभावी तरीके से यूपीए-दो सरकार की जनविरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों के विरूद्ध रोष व्यक्त किया। मजदूरों ने जबर्दस्त एवं अभूतपूर्व हड़ताल की। महानगरों में बैंकों से लेकर सड़कों पर चलने वाले थ्री-व्हीलर तक बंद रहे, जनजीवन ठप्प हो गया।



देश के मेहनतकश लोगों की इस जबरदस्त प्रतिक्रिया से उत्साहित टेªड यूनियन केन्द्रों ने सही ही घोषणा की है कि यदि सरकार मजदूर वर्ग की मांगों, खासतौर पर महंगाई रोकने के लिए समुचित कदम नहीं उठाती है तो मेहनतकश लोग और अध्ािक जोरदार कदम उठाने पर मजबूर होंगे।



देश की केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने 7 सितंबर 2010 को मेहनतकश वर्ग की ज्वंलत मांगों के लिए हड़ताल की राष्ट्रव्यापी सफलता पर देश के मेहनतकश लोगों का हार्दिक अभिनंदन किया है। एक बयान में उन्होंने कहा है:



“देश की केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें - इंटक, एटक, हिंद मजदूर सभा, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी और यूटीयूसी महंगाई, श्रम कानूनों के उल्लंघन, सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफा कमाने वाली इकाइयों के विनिवेश, छंटनी, ले ऑफ और ठेकाकरण के विरुद्ध ऐतिहासिक हड़ताल के लिये देश के मेहनतकश लोगों का हार्दिक अभिनंदन करती हैं।”



”यह आम हड़ताल असंगठित मजदूरों- जो आज देश की श्रमशक्ति के 90 प्रतिशत से अधिक हैं- के लिए सामाजिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त केन्द्रीय धनराशि की मांग के लिए भी थी।“



”अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में हड़ताल का असर पड़ा। ऐसा एक भी राज्य नहीं था जहां हड़ताल न हुई हो, यहां तक कि जम्मू-कश्मीर में भी हड़ताल रही; बैंक बीमा और अन्य अनेक संस्थान बंद रहे। कोयला, बिजली, टेलीकम्युनिकेशन, पेट्रोलियम, डाकघरों, राज्य सरकारों के दफ्तरों, रक्षा, सड़क परिवहन, आंगनबाड़ी और निर्माण में लगे लाखों मजदूरों ने हड़ताल की। गांवों के असंगठित मजदूरों ने भी साहस के साथ हड़ताल के आह्वान पर व्यापक रूप में हड़ताल में हिस्सा लिया। देश भर में हजारों मजदूरों ने जुलूस निकाले, धरने दिये और महंगाई के विरुद्ध प्रदर्शन किये।“



“सभी मेट्रोपेालिटन शहरों पर हड़ताल का जबरदस्त असर पड़ा। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा मंे ही नहीं, असम, मेघालय, मणिपुर, झारखंड, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोआ, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक एवं अन्य राज्यों में भी मजदूरों ने बढ़चढ़ कर हड़ताल में हिस्सा लिया।”



मजदूर वर्ग के बीच 63 वर्ष बाद हासिल की गयी एकता ने मजदूरों को हड़ताल पर जाने के लिए प्रेरित किया। सार्वजनिक क्षेत्र ही नहीं, निजी क्षेत्र में भी हड़ताल उल्लेखनीय तरीके से सफल रही। हमारे अनुमान के अनुसार, दस करोड़ से अधिक मजदूर हड़ताल में शामिल हुए। इस एकताबद्ध कार्रवाई के लिए मजदूरों का अभिनंदन करते हुए केन्द्र टेªड यूनियनें उनका आह्वान करती हैं कि यदि टेªड यूनियनों द्वारा उठाये गये मुद्दों को सरकार द्वारा सही तरीके से हल नहीं किया जाता है तो फरवरी 2011 के महीने में संसद को विशाल मार्च की तैयारी में जुट जाये।”



विभिन्न राज्यों से हड़ताल की प्रारंभिक रिपोर्ट अत्यंत उत्साहजनक हैंः



सभी केन्द्रीय टेªड यूनियनों (सिवाय भारतीय मजदूर संघ), औद्योगिक एवं स्वतंत्र फेडरेशनों द्वारा 7 सितंबर 2010 को राष्ट्रव्यापी हड़ताल के आह्वान पर सभी राज्यों, उद्योग के सभी क्षेत्रों, संगठित एवं असंगठित उद्योगों, राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के सभी कर्मचारियों, मजदूरों ने उत्साहपूर्वक हड़ताल में हिस्सा लेकर इस हड़ताल को एक ऐतिहासिक हड़ताल बना दिया।



हड़ताल के संबंध में क्षेत्रवार संक्षिप्त जानकारी

 बैंकिंग उद्योग



देश भर में बैंकों के कर्मचारियों और अधिकारियों ने अत्यधिक संगठित तरीके से हड़ताल में हिस्सा लिया।



बीमा उद्योग एवं अन्य वित्त क्षेत्र-बीमा कम्पनियों एवं वित क्षेत्र के विभिन्न संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारी शत-प्रतिशत हड़ताल पर रहे है।



कोयला मजदूर



देश भर में तमाम खान-खदानों में शत प्रतिशत कोयला मजदूर हड़ताल में शामिल हुए। अनेक खान क्षेत्रों में विशाल प्रदर्शन किए गये।



तेल-पेट्रोलियम उद्योग



लगभग तमाम रिफाइनरियों समेत ओएनजीसी, इंडियन ऑयल और अन्य तेल कंपनियों के कर्मचारियों ने अत्यंत सफल हड़ताल की। इससे स्वाभाविक ही था कि ट्रांसपोर्ट और एयरलाइंस जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी असर पड़ा।



सड़क परिवहन



राजस्थान, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, गोआ, पेप्सू ट्रांसपोर्ट, केरल, असम आदि राज्यों में सड़क परिवहन ठहर गया।



रक्षा क्षेत्र



आर्डनेंस फैक्टरियों में तमाम असैन्य कर्मचारियों, डीआरडीओ प्रयोगशालाओं और रक्षा कर्मचारियों ने आम हड़ताल में हिस्सा लिया। जिससे इस क्षेत्र मे काम ठप्प हो गया।



असंगठित क्षेत्र



सभी राज्यों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों ने शानदार तरीके से हड़ताल में हिस्सा लिया। आंगनबाड़ी, घरेलू, मजदूर, मिड डे मील योजना, आशा, लाखें निर्माण मजदूर, बीडी मजदूर, ठेका मजदूरों आदि ने हड़ताल में हिस्सा लिया। सरकारी दफ्तरों पर पिकेटिंग की और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।



बिजली उद्योग



कई राज्यों में बिजली मजदूरों ने हजारों की संख्या में हड़ताल में हिस्सा लिया जिसका इसके संबंधित अन्य गतिविधियों पर असर पड़ा।



राज्य और केन्द्र सरकार के कर्मचारी



केरल, हरियाणा, राजस्थान, पं. बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गोआ, बिहार, असम आदि राज्यों के काफी संख्या में सरकारी कर्मचारी हड़ताल मंे शामिल हुए। डाकतार, इन्कम टैक्स विभाग एवं अन्य विभागों के कर्मचारी विभिन्न राज्यों में और हड़ताल मंे शामिल हुए।



टेली कम्युनिकेशन



टेलीकम्युनिकेशन (बीएसएनएल) के कर्मचारी कई राज्यों में हड़ताल पर गये क्योंकि उनकी यूनियनें हड़ताल के प्रयोजकों में से थी।



एडयापुर रामगढ़ औद्योगिक इलाके की 1500 छोटी कंपनियों ने हड़ताल की। भावंतपुर लाईम स्टोन, बैंकों, बीमा, बीएसएनएल मजदूरों ने हड़ताल की। केन्द्र एवं राज्य सरकार के 90 प्रतिशत कर्मचारी हड़ताल में शामिल हुए। बीएसएसआर के सेल्स सेक्टर के शतप्रतिशत कर्मचारी हड़ताल पर थे।



- आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस
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