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सोमवार, 31 मई 2010

बड़े उद्योगपतियों ने बैंकों के दबाए एक लाख करोड़

जमशेदपुर: सरकारी बैंकों ने पिछले दस साल में बड़े उद्योगपतियों और व्यावसायिक घरानों के एक लाख करोड रुपए से अधिक के ऋण को बट्टे खाते में डाल दिया है। आल इंडिया बैंक एम्पलाइज संघ के महासचिव सीएच वेंकटचलम ने बताया कि सरकार की गलत बैंकिंग नीतियों के कारण करोड़ों आम लोगअब भी बैंकिंग सुविधाओं से वंचित है।उन्होंने कहा कि रोजगार पैदा करने वाले छोटे और मझोले उद्योगों को ऋण नहीं मिल पा रहा जबकि हर साल लगभग 14 से 15 हजार करोड़ रुपए का ‘बैड लोन’ राइट ऑफ कर (बट्टे खाते में डाल) दिया जा रहा है जिसमें से एक बड़ा हिस्सा बड़े उद्योगों और व्यावसायिक घरानों का है।वेंकटचलम ने कहा कि एक तरफ तो छोटे-छोटे ऋण की वसूली के लिए आम लोगों को तुरन्त नोटिस जारी कर उनकी संपत्ति तक जब्त कर ली जा रही है वहीं जानबूझकर ऋण नहीं देने वाले उद्योगपतियों को बचाने के लिए बैंक प्रबंधन और नौकरशाहों की मिलीभगत से ऋण पुनर्सरचना जैसी सुविधा भी दी जा रही है। इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। उन्होंने सरकार से बैंकिंग नीति को जन केन्द्रित बनाने की मांग करते हुए निजी बैंकों के भी सरकारीकरण, कृषि आधारभूत संरचना तथा छोटे उद्योगों आदि को अधिक से अधिक ऋण मुहैया कराने की जरूरत बताई। वेंकटचलम ने बैंकों के एकीकरण के बजाय इनके विस्तारीकरण पर बल देते हुए कहा कि सुदूरवर्ती क्षेत्रों में अधिक सेअधिक बैंक खुलने चाहिए।उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि आज भी देश के 54 करोड़ लोगों के पास खाते नहीं है तथा 88 फीसद लोगों को ऋण सुविधा नहीं है। कृषि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र की मात्र 30 फीसद ऋण जरूरतेें ही सरकारी बैंक पूरा करते हैं।

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