भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

बलात्कार सम्बन्धी बयान: मुलायमसिंह माफ़ी मांगें. भाकपा की मांग.

लखनऊ- ११, अप्रेल २०१४—भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने श्री मुलायम सिंह यादव के उस बयान की कड़े से कड़े शब्दों में भर्त्सना की है जिसमें उन्होंने बलात्कार जैसे जघन्यतम अपराध को लडकों की छोटी सी गलती करार दिया है और बलात्कारियों को फांसी की सजा का विरोध किया है. इतना ही नहीं सपा सुप्रीमो ने इस कानून को ही बदलने तक की धमकी दे डाली है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहाकि मुलायम सिंह जैसा व्यक्ति जो देश के सबसे बड़े सूबे, जहाँ बलात्कार भी सबसे ज्यादा होते हैं में शासन कर रहे दल के मुखिया हैं. ऐसे व्यक्ति द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में दिए बयान से बलात्कारियों के हौसले और भी बढेंगे और महिलाओं की सुरक्षा और भी खतरे में पड़ जायेगी. भाकपा इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताती है और श्री यादव से स्पष्ट मांग करती है कि वे इस घिनोने बयान के लिए समाज खास कर महिलाओं से अविलम्ब माफी मांगें. भाकपा राज्य सचिव ने कहाकि इस जघन्य अपराध के खिलाफ बने कानून को बदलने का सपना श्री यादव नहीं ही देखें तो अच्छा है. पहले तो वे कानून बदलने की हैसियत में ही नहीं आपायेंगे और ऐसा कदम उठायेंगे तो उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा. भाकपा स्वयं ऐसे किसी कदम का पुरजोर विरोध करेगी. डॉ. गिरीश
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गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मोदी का ढोंग बेनकाब: सार्वजनिक जीवन में बने रहने का खोया नैतिक अधिकार. चुनाव लड़ने पर रोक लगाये आयोग.

लखनऊ- १० अप्रेल २०१४. अपने नामांकन पत्र में यशोदा बेन को पत्नी स्वीकार करने के बाद मोदी, उनके आका संघ परिवार एवं भाजपा का ढोंग पूरी तरह बेनकाब हो गया है. शुचिता, पवित्रता एवं भारतीय संस्कृति के अलमबरदार होने के दाबे करने वाले भाजपाई तो अब मुहं दिखाने के काबिल नहीं रहे. यशोदा बेन के जीवन को बरबाद करने वाले और इतनी बड़ी घटना को अब तक छिपा कर रखने वाले श्री मोदी को तो अब सार्वजनिक जीवन में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. भाकपा मोदी से सभी पदों से स्तीफा देने और उनके आका आर.एस.एस. से देश और देश की महिलाओं से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने की मांग करती है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहाकि देश के सर्वोच्च पद पर आँख गड़ाए बैठे श्री मोदी दो दिन पहले तक अपने आपको अकेला बताते रहे और दूसरों पर आपत्तिजनक और बेहद भद्दी टिप्पड़ियां करते रहे. लेकिन कल निर्वाचन आयोग के भय से उन्हें अपने नामांकन पत्र में अपनी पत्नी का नाम भरना पड़ा और उनके जीवन का बेहद कलुषित पन्ना उघड़ कर सामने आगया. इसके बाद तो उन्हें सार्वजनिक जीवन में रहने का कोई अधिकार नहीं है. इससे भी बढ़ी बात यह है कि श्री मोदी ने अब तक लड़े सभी चुनावों में इस तथ्य को छिपाया और कानून का उल्लंघन किया. निर्वाचन आयोग को उनका गुजरात विधान सभा का चुनाव तत्काल रद्द करना चाहिये तथा उनके कल भरे नामांकन को निरस्त कर उनके छह वर्ष तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा देनी चाहिये. डॉ. गिरीश.
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शनिवार, 5 अप्रैल 2014

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र

देश चौराहे पर खड़ा है। नव उदारवादी नीतियों पर बेशर्मी के साथ चलते जाने के कारण देश एक ऐसे संकट में पड़ गया है जो हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रहा है। देश की जनता भूख, सभी आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों, लगातार बढ़ती महंगाई और बढ़ती आर्थिक असमानता से त्रस्त है। पिछले दो दशकों के दौरान एक के बाद आने वाली दूसरी सरकार जिन नीतियों पर चलती रही हैं, वे कारपोरेटों के पक्ष में और जनता के हितों के सरासर विपरीत रही। इन नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था लगातार गिरती जा रही है। राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक संसाधनों को बेशर्मी के साथ लूटा गया और शीर्षस्थ नौकरशाही की मिलीभगत से कारपोरेट घरानों और शासक राजनीतिक नेताओं के बीच इस लूट का बंटवारा हुआ, जिसके फलस्वरूप लाखों-करोड़ों रूपये के अभूतपूर्व बड़े घपले-घोटाले हुए। इस लूट और भ्रष्टाचार के पर्दाफाश के बावजूद शासक वर्ग आर्थिक विकास के उसी विनाशकारी रास्ते पर आगे बढ़ने पर आमादा है। अब यही लुटेरे, और कारपोरेट घराने देश में एक ऐसी सरकार लाने की कोशिश कर रहे हैं जो इनकी और अधिक खिदमत और ताबेदारी करे। इसके लिए वे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और इसके धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तबाह करने को भी तैयार हैं।
देश की जनता 16वीं लोकसभा के लिए ऐसे समय में मतदान करने जा रही है जब देश धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और आर्थिक सम्प्रभुता के गंभीर खतरे से दो-चार है।
दो दशक पहले देश गठबंधन सरकार के दौर में दाखिल हुआ और इन चुनावों के बाद भी एक अन्य गठबंधन सरकार ही बनने वाली है क्योंकि किसी भी पार्टी या चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत मिलने वाला नहीं है। चुनाव बाद के परिदृश्य में जबर्दस्त राजनीतिक मंथन एवं गहमा-गहमी होगी जिसके फलस्वरूप राजनीतिक ताकतों की फिर से कतारबंदी होगी। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद दोनों ही परिदृश्यों में मुख्य मुद्दा लाजिमी तौर पर यह होगा कि देश किस रास्ते पर आगे चले - नवउदारवाद के विनाशकारी रास्ते पर चलना जारी रखे या एक ऐसे कार्यक्रम आधारित विकल्प पर आगे बढ़े जो वर्तमान विनाशकारी रास्ते को पलटे और ऐसे विकास का सूत्रपात करे जिससे विकास के लाभ सभी को बराबर मिलें और जो देश में बहुलवाद और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की रक्षा करे और उसे और अधिक मजबूत करे।
कांग्रेस का चुनावी ग्राफ निश्चित तौर पर गिर रहा है क्योंकि संप्रग-2 सरकार स्वतंत्रता के बाद की सबसे अधिक भ्रष्ट और सबसे अधिक कुशासन की सरकार साबित हुई है। रोज-रोज सामने आने वाले बड़े-बड़े घपलों और घोटालों ने इसका हाल बिगाड़ दिया है। भ्रष्टाचार के कारण इसके लगभग आधा दर्जन मंत्रियों को सरकार से हटना पड़ा। एक मंत्री को तो 1.75 लाख करोड़ रूपये के घोटाले 2जी घोटाले में जेल भी जाना पड़ा। एक अन्य मंत्री को हटाना पड़ा क्योंकि उन्हें कोयला घोटाले के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही जांच रिपोर्ट में हस्तक्षेप करने का दोषी पाया गया जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधे उंगली उठाई गई थी। कुछ मंत्रियों को अपने विभागों से इसलिए हटाया गया क्योंकि वे कारपोरेटों और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी के इशारों पर चलने को तैयार नहीं थे।
अब यह और भी अधिक स्पष्ट हो गया है कि वित्त पूंजी और साम्राज्यवादी एजेंसियों का पक्ष लेने के कई मुद्दों पर शासक संप्रग-2 और मुख्य विपक्ष भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के बीच सीधी साठगांठ रही है। 15वीं लोकसभा में संसद के सभी सत्रों में न केवल कार्यवाहियों में रूकावटें एवं बाधाएं देखने में आयी बल्कि उसे इस बात का भी श्रेय जाता है कि उसमें पारित न हो सकने वाले बिलों की संख्या सबसे अधिक रही। उसमें अधिकतम कार्य दिवस बर्बाद हुए और साथ ही संसद के कार्य दिनों में भी भारी गिरावट आयी। वामपंथ ने जब भी उन बुनियादी, सामाजिक, आर्थिक समस्याओं को उठाना चाहा जिनसे जनता दो-चार है, दोनों पूंजीवादी राजनैतिक पार्टियों ने बुनियादी मुद्दों पर किसी सार्थक बहस को भितरघात करने के लिए परस्पर मिलीभगत कर ली। दूसरी तरफ, बैंकों एवं बीमा क्षेत्रों को निजी क्षेत्र, जिसमें बहुराष्ट्रीय निगम शामिल हैं, के हवाले करने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने आपस में साठगांठ की।
अपने मुनाफों को अधिकतम बढ़ाने की कोशिश में कारपोरेट घरानों ने उसे अपने इशारों पर नचाने के लिए सरकार में जोड़तोड़ करना जारी रखा, जिसका नतीजा आर्थिक संकट के और अधिक गहराने के रूप में सामने आया। 2008 के बाद से लगभग सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें दोगुना हो गयी हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहां पर बेरोजगारों की संख्या सबसे अधिक है। देश की काम करने योग्य आबादी के लगभग 4 प्रतिशत हिस्से के पास कोई रोजगार नहीं है।
कारखाना बंदी और रोजगारों के आउटसोर्सिंग एवं ठेकाकरण के परिणामस्वरूप पहले से रोजगार में लगे हजारों-हजार लोगों से भी उनका रोजगार छीन गया है। अनेक सरकारी विभागों में ‘‘नई भर्ती नहीं की जाये’’ का आदेश लागू है। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों को आउटसोर्सिंग के लिए मजबूर किया जा रहा है। रोजगार सृजन सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है। मजदूर वर्ग खतरे में है। ट्रेड यूनियन अधिकारों में लगातार कटौती की जा रही है। एक के बाद दूसरे क्षेत्रों को ट्रेड यूनियन अधिकारों से बाहर के क्षेत्र घोषित किया जा रहा है।
राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट संप्रग-2 सरकार की एक अन्य खासियत है। उसने अपने हर बजट में बढ़ते वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफा कमाने वाली इकाईयों के शेयरों को निजी क्षेत्र के हवाले करने की योजना बनाई। उसने जानबूझकर, सोझ समझकर प्राकृतिक संसाधनों को निजी क्षेत्र के हवाले करने की इजाजत दी। संप्रग-2 सरकार के सबसे बड़े घोटाले, जिसमें मुकेश अंबानी की कंपनी द्वारा निकाली गयी गैस के लिए दोगुनी कीमत देना शामिल है, मुनाफों को बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सबसे बड़ा उदाहरण है।
नव उदारवाद की नीतियों पर चलने का एक अन्य नतीजा है बढ़ती आर्थिक असमानता। एक तरफ भारत में सबसे अधिक अरबपति हैं तो दूसरी तरफ गरीबी के रेखा से नीचे वालों की संख्या भी सबसे अधिक है। हमारे देश के 70 प्रतिशत से भी अधिक लोग 20 रूपये प्रति दिन भी खर्च करने में समर्थ नहीं हैं। इस सरकार को जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती करने का भी श्रेय जाता है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर इसने अटल बिहारी बाजपेयी की पिछली भाजपा नीत राजग सरकार की उन नीतियों को जारी रखा है जिनमें ‘‘सभ्यता के टकराव’’ के उस अमरीकन सिद्धांत को अंगीकार कर लिया था जो मुस्लिम समुदाय को सभ्य जगत के लिए एक खतरे का नाम देता है। हजारों युवाओं को, अधिकांशतः शिक्षित युवाओं को गिरफ्तार किया गया और यहां तक कि एफआईआर दर्ज किये बिना जेल में रखा गया। जनता को उसके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने के लिए टाडा, एस्मा एवं पोटा की तर्ज पर काले कानून पारित किये गये हैं।
विदेश नीति अमरीकी साम्राज्यवाद की खिदमतगार-ताबेदार बनती जा रही है। अमरीकी दबाव में आकर राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाई जा रही है। रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के नाम पर संकटग्रस्त अमरीकी अर्थव्यवस्था, विशेष तौर पर इसके सैन्य-औद्योगिक कॉम्पलेक्स को मदद करने के लिए अमरीका और इस्राइल से साजो-सामान खरीदा जा रहा है। यहां तक कि इस सरकार ने अमरीकी साम्राज्यवादियों के दबाव में आकर ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन परियोजना को भी रद्द कर दिया। उसने हमारे राष्ट्रीय हितों को भी बलि चढ़ाकर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनीतिक मंचों पर साम्राज्यवादियों के साथ साठगांठ की। विश्व व्यापार संगठन में अमरीकियों को खुश करने के लिए उसने ब्रिक्स देशों की सहमति के विरूद्ध काम किया। सीरिया और ईरान के परमाणु विकल्प जैसे नाजुक मुद्दों पर हमारी पोजीशन इस तरह के आत्मसमर्पण का एक स्पष्ट उदाहरण है।
कुल मिलाकर यह एक ऐसी सरकार साबित हुई है जो कारपोरेट पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी के हित साधती है।
परन्तु संप्रग-2 सरकार का अधिकतम दोहन करने के बाद कारपोरेट पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी अब एक ऐसी सरकार लाने की कोशिश कर रही हैं जो उनकी खिदमत और ताबेदारी इस सरकार से भी अधिक करे। इसके लिए उन्होंने भाजपा के नरेन्द्र मोदी को चुन लिया है जिनके दामन पर 2002 के खून के दाग हैं और जो अपनी अधिनायकवादी सोच के लिए जाने जाते हैं। गुजरात में अपने एक दशक के मुख्यमंत्री काल में उन्होंने तीन पूर्व भाजपा मुख्यमंत्रियों को ठिकाने लगा दिया और उनके साथ उस नेता को भी हटा दिया जो बाजपेयी सरकार में गुजरात से अकेला मंत्री था। कारपोरेट घरानों द्वारा संचालित संचार माध्यमों ने नव-फासीवादी रूझान के इस व्यक्ति को उछालने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
परन्तु विकास के गुजरात मॉडल की सच्चाई का हर गुजरते दिन के साथ पर्दाफाश हो रहा है। उनकी सरकार केवल बड़े पंूजीपतियों के लिये ही है। उनके लिए उसने किसानों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया और यह बेदखली इस हद तक हुई है कि अब गुजरात उन शीर्ष राज्यों में से है जहां कृषि योग्य जमीन सबसे अधिक कम हुई है। किसानों की जमीन को तथाकथित औद्योगीकरण के लिए अधिग्रहण कर लिया गया और बिल्डर माफिया के हवाले कर दिया गया। यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जिन किसानों को कच्छ के सीमावर्ती इलाके में बसाया गया था उन्हें भी उस अदानी समूह के हितों की सेवा करने के लिए बेदखल किया जा रहा है जिसके पास उस जिले में पहले ही दो बन्दरगाह हैं। अदानी, टाटा, अम्बानी और एस्सार घरानों को ब्याज सब्सिडी दी गई है और खरबों रूपये 0.1 प्रतिशत की ब्याज दर पर दिये गये हैं जिनका वापस भुगतान 20 वर्ष या उससे भी बाद शुरू होगा। इसके फलस्वरूप गुजरात सरकार के खजाने में सामाजिक क्षेत्र के लिए कोई पैसा ही नहीं रह गया है। नरेन्द्र मोदी सरकार के एक दशक की खास निशानियां हैं बच्चों एवं महिलाओं का कुपोषण, शिक्षा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का पूरी तरह से व्यवसायीकरण और बढ़ती बेरोजगारी।
मुस्लिम अल्पसंख्यकों को ऐसी तंग एवं गंदी बस्तियों में जहां केवल वे ही रहते हैं, रहने को जबरन भेजने के काम ने भी मोदीत्व का पर्दाफाश कर दिया है। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद मोदी सरकार ने केन्द्र सरकार द्वारा वित्त पोषित अल्पसंख्यक-उन्मुखी सामाजिक-आर्थिक एवं शैक्षणिक स्कीमों पर अमल करने से इन्कार कर दिया है। मुसलमान दंगे से पहले जहां रहते थे अपने उन मकानों में वापस जाने में असमर्थ हैं और अहमदाबाद में जूहूपुरा जैसी ऐसी गंदी बस्तियों में रह रहे हैं जहां केवल मुसलमान ही रहते हैं।
कारपोरेटों की इससे भी अधिक खिदमत और ताबेदारी करने वाली सरकार बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताने-बाने पर भी हमले किये जा रहे हैं। मतदाताओं के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को आगे बढ़ाने के लिए हर किस्म की तरकीब और चालाकी का इस्तेमाल किया जा रहा है। मुजफ्फरनगर इस खेल का एक सुस्पष्ट उदाहरण है।
आजादी के बाद, वामपंथ, विशेषकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संसद के अंदर और बाहर जनता के लिए संघर्ष करने का एक शानदार रिकार्ड रहा है। सदन में उसकी संख्या कुछ भी रही हो, जनता के पक्ष में नीतियां बनवाने में और संसद के बाहर संघर्षरत जनता की मांगों को बुलंद करने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक अग्रणी संसदीय ताकत के रूप में उभरी है। प्रोफेसर हीरेन मुखर्जी, भूपेश गुप्ता, इन्द्रजीत गुप्ता, गीता मुखर्जी एवं अन्य भाकपा नेताओं ने जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष और मेहनतकश जनता के संसदीय एवं इतर संसदीय संघर्षों को जोड़ने में उदाहरण कायम किये हैं।
आज की परिस्थिति का तकाजा है कि देश की सम्प्रभुता, जनता की रोजी-रोटी, आवास, शिक्षा एवं जन स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा के लिए और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था को संसद के अंदर एवं बाहर दोनों जगह मजबूत करने के लिए वामपंथ और अधिक जोरदार और लगातार एवं लम्बा संघर्ष चलाए। इसके लिए यह आवश्यक है कि 16वीं लोकसभा में वामपंथ का अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व हो। लोकसभा में एक मजबूत लेफ्ट ब्लॉक आये, यह समय का तकाजा है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी निम्न घोषणा पत्र पेश करती है जो वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक नीतियों का एक आधार बनेः

  • नवउदारीकरण को अपनाने के लिए उठाये गये कदमों की पूरी तरह समीक्षा और दुरूस्तगी के लिए समूचित कदम;
  • खुदरा व्यापार में एफडीआई नहीं। एफडीआई केवल उन्हीं क्षेत्रों में जहां यह उच्च टेक्नालोजी, रोजगार सृजन और परिसम्पत्ति निर्माण के लिए आवश्यक हो।
  • सार्वजनिक परिसम्पत्तियों की रक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करना और राज्य की भूमिका पर फिर से जोर, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों का निजीकरण बंद करो, गैस, पेट्रोल एवं खनिज आदि प्राकृतिक संसाधनों को आगे निजी क्षेत्र के हवाले न करना;
  • प्रभावी कराधान (टैक्सेशन) कदम और वैध एवं तर्क संगत टैक्सों की वसूली को सुनिश्चित करना, आयकर छूट की सीमा को बढ़ाना और जो लोग टैक्स दे सकते हैं उनके लिए टैक्स में क्रमिक वृद्धि।
  • खनिज, तेल, गैस जैसे तमाम प्राकृतिक संसाधनों का राज्य ही एकमात्र स्वामी रहे; 
  • पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप नहीं, क्योंकि यह निजी क्षेत्र द्वारा इसके फायदों को हड़पने को वैध बना रहा है और घाटे को संस्थागत रूप दे रहा है; 
  • आवास, शिक्षा आदि के लिए कम ब्याज पर आसान ऋण। जो ऋण पहले लिये गये हैं रेपो रेट का उनके ईएमआई पर असर नहीं पड़ना चाहिए; 
  • जिन कारपोरेट बैंक ऋणों को बैंकों ने गैर निष्पादित परिसम्पत्ति (एनपीए) करार कर दिया है उनकी वसूली के लिए कठोरतम कानूनी कदम; डिफाल्टरों की परिसम्पत्ति जब्त की जाये;
  • विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाया जाये। काले धन के ट्रांसफर को रोकने के तंत्र को मजबूत बनाओ;
  • विकास के रास्ते को इस तरह पुनः निरूपित करो कि वह न्यायसंगत वितरण और सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास की दिशा मे ले जाये; 
  • सभी के लिए आवास, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा; महिला एवं बच्चों में कुपोषण को खत्म करने के लिए विशेष जोर;
  • मनरेगा स्कीम की तरह शहरों के बेरोजगारों के लिए काम का अधिकार सुनिश्चित करो;
  • बड़ी कम्पनियां के लिए ऑडिट के लिए कानून; और
  • कैग को एक संवैधानिक प्राधिकार बनाया जाये। 
  • लघु एवं मझोले उद्योग एवं कुटीर उद्योग
  • लघु एवं मझोले और कुटीर उद्योग, जो भूमंडलीय मंदी के कारण बर्बाद हो गये हैं, उनकी रक्षा;
  • इन क्षेत्रों को सब्सिडी युक्त ब्याज पर ऋणों का प्रावधान, खासकर उन उद्योगों को जो इनके उत्पादों के निर्यात पर निर्भर हैं;
  • इन क्षेत्रों द्वारा लिये गये ऋणों की वसूली पर स्थगन और इनके उत्पादों के लिए आरक्षण;
  • स्थानीय बाजार की जरूरतों को पूरा करने में मदद के लिए उन्हें सब्सिडी;
  • हैण्डीक्राफ्ट और कुटीर उद्योगों में फिर से जान फूंकने के लिए विशेष पैकेज क्योंकि ये उद्योग रोजगार के अधिकतम अवसर प्रदान करते हैं।

चुनाव सुधारों के संबंध में

  • वर्तमान व्यवस्था में जिस उम्मीदवार को पड़ने वाले वोटों में से सबसे अधिक वोट मिलते हैं उसको निर्वाचित माना जाता है, इससे जिन लोगों या पार्टियों को 50 प्रतिशत से कम मत मिल जाते हैं वह भी जीत जाता है। इससे धन बल और बाहुबल को बढ़ावा मिलता है। इस व्यवस्था को बदला जाना चाहिए;
  • आंशिक सूची व्यवस्था के साथ समानुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था को लागू किया जाये; और 
  • जो लोग सशस्त्र बलों एवं विदेशी मिशनों में काम कर रहे हैं वह मताधिकार का प्रयोग कर सकें इसके लिए तंत्र।

विशिष्ट क्षेत्रीय एवं राज्य स्तर मुद्दों के संबंध में

  • पिछड़े राज्यों को स्पेशल स्टेट्स;
  • जिन क्षेत्रों में कथित वाम उग्रवाद चल रहा है वहां वार्ता और उन क्षेत्रों के विकास के लिए स्पेशल पैकेज के क्रियान्वयन के जरिये शांति बहाली के लिए विशेष प्रयास;
  • अंतर-राज्य श्रम प्रव्रजन कानून 1979 (इंटर-स्टेट माइग्रेशन ऑफ लेबर एक्ट 1979) और शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में प्रव्रजन मजदूरों की रक्षा के लिए संबंधित कानूनों में संशोधन;
  • असम एवं अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में नृवंशीय (एथनीक) एवं साम्प्रदायिक भीतरघात को रोकने के लिए पैकेजों के जरिये विशेष प्रयास।
  • मणिपुर, कश्मीर एवं अन्य पूर्वाेत्तर क्षेत्रों से सशस्त्र बल विशेष शक्ति कानून (अफस्पा) को निरस्त किया जाये।

कृषि क्षेत्र 

  • सिंचाई, बीज और उर्वरकों जैसी सुविधाएं सभी किसानों को उचित एवं कुछ मामलों में सब्सिडीयुक्त मूल्य पर मिलें इसके लिए कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश में पर्याप्त वृद्धि;
  • कृषि एवं बुआई के लिए भूमि सुनिश्चित करने के लिए मूलगामी भूमि सुधार एवं भूमिहीनों को भूमि वितरण; 
  • निजी बीज कारपोरेशनों का पक्ष लेने वाले कदमों को बंद किया जाना चाहिए;
  • व्यापक एवं अनिवार्य फसल बीमा जिसके लिए प्रीमियम का भुगतान राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा किया जाये;
  • छोटे एवं सीमांत किसानों को ब्याज मुक्त ऋण;
  • कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य;
  • स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर अमल;
  • किसानों, खेत मजदूरों और ग्रामीण दस्तकारों समेत सभी को 3000 रूपये मासिक पेंशन; और 
  • खेत मजदूरों के लिए केन्द्रीय कानून को पारित करना। राज्यों एवं केन्द्र में कृषि के लिए अलग बजट।

विदेश नीति

  • स्वतंत्र विदेश नीति पर चलो, अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी ताकतों के सामने कोई आत्म-समर्पण नहीं;
  • अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे पड़ोसी संबंधों को बढ़ावा दो;
  • श्रीलंका के तमिलों के लिए एक राजनीतिक समाधान पर जोर दो और 2009 में श्रीलंका में युद्ध के अंतिम दौर में जो मानवाधिकार उल्लंघन और युद्ध अपराध हुए उनके सम्बंध में विश्वसनीय जांच;
  • क्षेत्रीय सहयोग के संवर्धन पर जोर। ब्रिक्स एवं शंघाई सहयोग संगठन जैसे ग्रुपिंग्स में और अधिक सक्रिय भूमिका; और 
  • गुट निरपेक्ष आंदोलन को सार्थक तरीके से मजबूत करना।

शिक्षा नीति

  • सरकार द्वारा प्राइमरी से सेकेंडरी स्तर तक निःशुल्क एवं सर्वसुलभ शिक्षा के लिए गारंटी दी जाए;
  • शिक्षा पर खर्च को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 10प्रतिशत किया जाय;
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण नहीं, सभी को समान गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा, समान स्कूल प्रणाली, मेडिकल शिक्षा समेत सभी पेशेवर शिक्षा संस्थानों में दाखिले के लिए और अधिक अवसर; 
  • प्राइमरी से उच्चतर शिक्षा के सरकारी शिक्षा संस्थानों में तमाम रिक्त पदों को भरकर सभी स्तर पर सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना;
  • तर्कबुद्धिवाद ;रैशनलिज्मद्ध और वैज्ञानिक स्वभाव को प्रोत्साहित करने के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव। संविधान विहित प्रावधानों के अनुसार धर्मनिरेक्षता की रक्षा;
  • छात्रों के लिए सभी लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी;
  • अगले 5 वर्षोंं में निरक्षरता का खात्मा करो।

रोजगार के और अधिक अवसर

  • बुनियादी अधिकार के रूप में काम के अधिकार की गांरटी; 
  • सभी बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता;
  • स्वरोजगार से जुड़े लोगों, दस्तकारों एवं विकलंागों के लिए विशेष बैंक क्रेडिट नीति को सुनिश्चित करो;
  • नौकरियों में भर्ती पर रोक और सरकारी विभागों एवं सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों में वर्तमान रोजगार में कटौती को समाप्त करो; और
  • पंूजी सघन विकास के बजाय रोजगार सघन विकास पर जोर दिया जाये।

खाद्य सुरक्षा

  • सभी परिवारों को 2 रुपये प्रति किलो के अधिकतम भाव पर 35 किलो खाद्यान्न का प्रावधान;
  • सर्वसुलभ (यूनिवर्सल) सार्वजनिक वितरण प्रणाली स्थापित की जाये और उसे विस्तारित किया जाये;
  • आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी के विरूद्ध कठोरतम कानूनी कदम; और
  • किसी भी वस्तु में फॉरवर्ड ट्रेडिंग नहीं।

सामाजिक सुरक्षा

  • सर्वसुलभ (यूनिवर्सल) वृद्धावस्था पेंशन का ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में सभी के लिए विस्तार; और
  • पेंशन को रहन-सहन के खर्च के साथ लिंक करो।

स्वास्थ्य सेवा

  • स्वास्थ्य सेवा पर सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत खर्च सुनिश्चित करो;
  • स्वास्थ्य सेवा एक बुनियादी अधिकार बनाया जाना चाहिए।

भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना

  • जांच की स्वतंत्र शक्ति के साथ लोकपाल कानून को मजबूत करो; 
  • राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट को बंद करो क्योंकि बड़े घपलों और घोटालों की जड़ में यही चीज है;
  • सरकारी कामकाज के सभी स्तरों पर पूरी तरह पारदर्शिता;
  • सूचना के अधिकार कानून को कमजोर नहीं करना;
  • शिकायत निवारण कानून बनाओ; और
  • बाकी पड़े कानूनों को पारित करो, शिकायतकर्ताओं/ जानकारी देने वालों की रक्षा के संबंध में कानून को मजबूत करो।

न्यायिक सुधार

  • वहनीय खर्च पर सभी को समय पर न्याय मिले इसे सुनिश्चित करना;
  • न्यायिक व्यवस्था का विस्तार करो;
  • राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन करो; और
  • राजद्रोह धारा एवं अन्य क्रूर कानूनों को हटाने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समुचित संशोधन लाओ;
  • जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता।

पुलिस सुधार

  • पुलिस बल में ऐसा सुधार जिससे वह उत्पीड़न के लिए राज्य के एक हथियार, जैसा कि आज वह है, के स्थान पर जनता की सेवा के लिए एक संस्था बने; और
  • पुलिस सुधार आयोग रिपोर्ट पर अमल करो।

महिलाओं के लिए 

  • लिंग समानता, सभी क्षेत्रों में महिलाओं को समान अधिकार;
  • महिला सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत तंत्र; हिंसा की पीड़ित महिलाओं के लिए फास्ट टैªक कोर्ट सुनिश्चित करो;
  • संसद एवं विधान सभाओं मंे महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए कानून, स्थानीय निकायों मंे 50 प्रतिशत आरक्षण;
  • लिंग स्तर की पारदर्शिता एवं जवाबदेही;
  • समलैंगिकों, उभयलैंगिकों एवं लिंग परिवर्तितों को समान अधिकार सुनिश्चित करो।

मजदूर वर्ग के लिए

  • कठिन संघर्षों के बाद प्राप्त ट्रेड यूनियन अधिकारों की रक्षा;
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में ट्रेड यूनियन कानून लागू करो;
  • उचित न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा कदमों को लागू करना;
  • ठेके पर काम कराने, आउटसोर्सिग और कैजुअल मजदूरी को समाप्त करना;
  • आंगनवाडी, आशा मिड-डे-मील और घरेलू वर्करों समेत असंगठित मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा;
  • पहले की सुनिश्चित, गारंटीशुदा पेंशन योजना की बहाली;
  • हाथ से शौच-सफाई के काम (मैनुअल स्केवेंजिग) को खत्म करो;
  • बाल-मजदूरी एवं बंधुआ मजदूरी के चलन को खत्म करने के लिए कानूनी प्रावधानों पर सख्ती से अमल।

अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए

  • एससी /एसटी सब-प्लान के लिए केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर कानून;
  • उत्पीड़न के विरूद्ध कानूनों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए उनमें संशोधन किया जाए;
  • वन सम्पदा पर वनवासियों को अधिकार देने वाले कानूनों को समग्रता से लागू किया जाए;
  • निजी क्षेत्र एवं पीपीपी संस्थानों समेत सभी क्षेत्रों में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग के हित मंे आरक्षण नीति पर उचित अमल को सुनिश्चित करो;
  • रोजगार के सभी प्रवर्गों में एससी/एसटी के लिए आरक्षित पदों को पूरी तरह भरने को सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र बनाया जाए;
  • जनजाति आबादी वाले सभी क्षेत्रों को संविधान की 5वीं अनुसूची ;पेसाद्ध के अन्तर्गत लाया जाए;
  • आदिवासियों के लिए पांचवीं और छठी अनुसूची अधिकारों की रक्षा करना;
  • आदिवासी स्वायत्ता की रक्षा एवं संवर्धन के लिए बने कानूनों में समुचित संशोधन;
  • वन भूमि से आदिवासियों की बेदखली पर प्रतिबंध।

मछली उद्योग एवं मछुआरा समुदाय

  • मछली उद्योग और मछली पालन से जुड़े मजदूरों समेत मछुआरा समुदाय से संबंधित मुद्दों को डील करने के लिए अलग मंत्रालय बनाओ;
  • मछुआरा समुदाय को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का स्टेट्स देने के संबंध में विचार करो;
  • भारतीय मछुआरा समुदाय के अधिकारों की रक्षा करो; समुद्र में जाकर मछली पकड़ने वाले लोगों और मछुआरा समुदाय को विदेशी ताकतों के हमले से बचाओ। 

धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए

  • सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह और ईमानदारी से लागू करना, दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को सुविधाएं देने के संदर्भ मंे धार्मिक आधार पर भेद-भाव खत्म करना; 
  • एससी/एसटी सब प्लान की तर्ज पर केन्द्र और राज्य दोनों स्तर पर अल्पसंख्यकों के लिए एक सब प्लान का प्रावधान करना;
  • साम्प्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण के लिए कठोर कानून बनाए जाए और दंगा पीड़ितों का उचित पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए;
  • अल्पसंख्यक आयोग को वैधानिक दर्जा दिया जाए;
  • सभी मकबूजा वक्फ भूमि और संपत्ति को वापिस करो, वक्फ की आय को अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सुधार में इस्तेमाल किया जाए;
  • अल्पसंख्यकों के लिए 15 सूत्रीय प्रधानमंत्री कार्यक्रम समेत सभी सरकारी स्कीमों को समग्रता से लागू करना; 
  • उर्दू समेत मातृभाषा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा सुनिश्ेिचत की जाए; और
  • धार्मिक आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए भर्ती के सभी रास्तों के मैकेनिज्म को ठीक करो।

आंतकवाद के संबंध में

  • आंतकवाद के संबंध में नीति में संशोधन करो, ‘सभ्यता के टकराव‘ के सिद्धांत पर आधारित अवधारणा को त्याग दो; 
  • एफआईआर और चार्जशीट बगैर सालों से हिरासत में लिए गए युवकों को रिहा करो;
  • न्यायालय द्वारा सभी रिहा किए गए आंतक के अभियुक्तों का सरकारी रोजगार और पर्याप्त वित्तीय मुआवजे के साथ पुनर्वास करो; 
  • मासूम नौजवानों को फंसाने वाले और फर्जी मुठभेड़ करने वाले अधिकारियों को सजा दो; और
  • गैर-कानूनी गतिविधि (निवारण) कानून (यूएपीए) समेत सभी काले कानूनों को रद्द करो।

केन्द्र-राज्य संबंध

  • संघवाद को मजबूत करो;
  • राजस्व एवं वित्तीय संसाधनों के उचित हिस्सा बंटाने को नये सिरे से तय करो और सुनिश्चित करो।

शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए

  • शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए रोजगार और आजीविका के लिए विशेष कानून; और
  • विकलांग अधिकार कानून को लागू करो।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए

  • आयकर दाताओं को छोड़कर अन्य सभी को वृद्धावस्था पेंशन; और
  • देश के सभी 622 जिलों में प्रत्येक में कम से कम एक वृृद्धावस्था आवास (ओल्ड होम) सरकार द्वारा चलाया जाए।

युवकों के संबंध में

  • एक व्यापक युवा नीति बनाओ;
  • निर्णय लेने वाले सभी निकायों में युवकों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करो; और
  • युवाओं के सभी तबकों तक खेल-कूद की समान पहुंच को सुनिश्चित कराने के लिए खेल एवं क्रीड़ा नीति बनाओ। स्कूलों एवं शिक्षा संस्थानों मंे खेल-कूद एवं क्रीड़ा के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा बनाओ।

बाल अधिकारों के संबंध में

  • गुणवत्तापूर्ण डे- केयर सेवा;
  • पैदा होने से लेकर छः साल तक की उम्र के बच्चे को देखभाल और शिक्षा का अधिकार;
  • कार्यस्थलों पर शिशु सदनों का प्रावधान करो;
  • कुपोषण का अंत करो;
  • बच्चों के गिरते हुए लैंगिक अनुपात को रोको; और
  • सकल घरेलू उत्पाद का 3 प्रतिशत बच्चों की देखभाल में खर्च किया जाए।

संचार माध्यमों के संबंध में

  • इलेक्ट्रोनिक और प्रिन्ट मीडिया दोनों पर कॉरपोरेट घरानों द्वारा कब्जा करने की कोशिशों को रोको;
  • पत्रकारों के लिए वेज बोर्डों द्वारा की गयी सिफारिशों पर दृढ़ता से पूरी तरह अमल कर और पत्रकारों की नियुक्ति में अनुबंध व्यवस्था (कॉन्ट्रेक्ट सिस्टम) को खत्म कर पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहाल किया जाए;
  • प्रसार भारती को वास्तविक रूप में जन प्रसारण सेवा बनाने के लिए और अधिक संसाधन मुहैय्या कराए जाएं। 

संस्कृति के संबंध में

  • बहुलवादी राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा करो;
  • एकरूपवादी (मोनोलिथिक) व्यवस्था को थोपने की कोशिशों को नाकाम करो;
  • संस्कृति की सभी धाराओं के साथ सरकार एक जैसा बर्ताव करें;
  • सभी भाषाओं को बढ़ावा देना;
  • आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं के साथ राष्ट्रीय भाषा के रूप में व्यवहार किया जाए;
  • आदिवासी और क्षेत्र-विशिष्ट संस्कृतियों को बढ़ावा देना; और
  • आदिवासी लिपियों और बोलियांे को विकसित करना।

पर्यावरण नीति

  • पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति तैयार करो;
  • पर्यावरण की जरूरतों और विकास के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण;
  • पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली खतरनाक टेक्नोलॉजी पर प्रतिबंध लगाओ;
  • प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सार्वजनिक परिवहन और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन व्यवस्था का विकास करना।

जल-संसाधनों का संरक्षण 

  • जल-संसाधनों को व्यवसायिक उद्देश्य के लिए लीज पर न दिया जाये;
  • सभी को साफ पीने का पानी सुनिश्चित करो;
  • भूमिगत जल संसाधनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर नियंत्रण लगाओ; और
  • वर्षा जल संचयन के साथ-साथ परंपरागत झीलों, तालाबों और अन्य जल संसाधनों का संरक्षण करना।

विज्ञान और टेक्नोलॉजी के संबंध में

  • ज्ञान और आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक विज्ञान और टेक्नोलॉजी नीति;
  • प्रतिभा पलायन पर नियंत्रण करो;
  • शोध और विकास के लिए अधिक फंड ;
  • राष्ट्रीय हितों के संरक्षण के लिए वर्तमान पेटेंट कानून में संशोधन करो; और
  • परमाणु दायित्व कानून को कमजोर न किया जाय।

मतदाताओं से अपील
कारपोरेट पंूजी केन्द्र में एक कमजोर, अपनी खिदमतगार और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी सरकार बनाने की कोशिश कर रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य वामपंथी पार्टियां विकास का फायदा आबादी की सभी तबकों तक पहुंचाने के लिए जो सामाजिक-आर्थिक नीतियां अपनाई जायेगी उनके संबंध में निरंतर एवं सुसंगत तरीके से एक सुस्पष्ट समझ बनाने के लिए कोशिश करती रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जिसका एक बेहतर जीवन के लिए संसद के अंदर और बाहर जनता के संघर्षोंं को जोड़कर चलाने का एक गौरवपूर्ण रिकॉर्ड रहा है, मतदाताओं से अपील करती है कि वे देश के विभिन्न हिस्सों मंे उसके उम्मीदवारों को वोट दें।
आपका वोटः 

  • नव उदारवादी एवं जन विरोधी आर्थिक नीतियों को बदलेगा;
  • वर्तमान भ्रष्ट सरकार को सत्ता से हटायेगा;
  • सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता पर कब्जा करने से रोकेगा; और
  • एक जनतापक्षीय विकल्प के लिए पथ-प्रशस्त करेगा।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को वोट दें।
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शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

उत्तर प्रदेश में आठ लोकसभा क्षेत्रों में भाकपा ने प्रत्याशी उतारे.

लखनऊ- ४ मार्च, २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आजमगढ़ जनपद की लालगंज(अनु.) लोकसभा क्षेत्र से भी प्रत्याशी घोषित किया है. कामरेड हरी प्रसाद सोनकर वहां भाकपा के प्रत्याशी होंगे. उपर्युक्त जानकारी देते हुये भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने बताया कि अब भाकपा प्रदेश में आठ लोक सभा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है. जिन अन्य क्षेत्रों से भाकपा ने प्रत्याशी उतारे हैं वे हैं- बरेली से मसर्रत वारसी उर्फ़ पप्पू भाई, खीरी से विपनेश शुक्ल, बाँदा से राम चन्द्र यादव सरस, गोंडा से ओमप्रकाश, घोसी से अतुल कुमार अनजान, मछली शहर(अनु.) से सुभाष गौतम तथा राबर्ट्सगंज(अनु.) से अशोक कुमार कनोजिया एडवोकेट. भाकपा कार्यालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार भाकपा राज्य सचिव डॉ. गिरीश एवं सहसचिव अरविंद राज स्वरूप कल दिनांक- ५ अप्रैल से पूर्वांचल के चुनावी दौरे पर जारहे हैं. वे ५ अप्रैल को लालगंज(सु.) लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत दुर्गा भाभी बालिका विद्यालय कन्दरा में सुबह ११ बजे एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करेंगे तथा ६ अप्रैल को राबर्ट्सगंज(सु.) क्षेत्र के अंतर्गत रेनुकूट में कार्यकर्ता सम्मेलन को सम्बोधित करेंगे. डॉ. गिरीश,राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश.
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गुरुवार, 27 मार्च 2014

राज्य सरकार ने नहीं निभाया राजधर्म--भाकपा

लखनऊ- २७, मार्च, २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा कि मुजफ्फरनगर के दंगों पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की सरकार इन दंगों के फ़ैलने देने की गुनहगार है और उसे अब इन दंगों की नैतिक जिम्मेदारी कबूल कर लेनी चाहिये. लेकिन इस फैसले की आड़ में भाजपा द्वारा अपने को निर्दोष साबित करने की कोशिशों को भी भाकपा कतई बर्दाश्त नहीं करेगी और दंगों में उसकी संलिप्तता का भी पर्दाफाश करेगी. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भाकपा की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाकपा के राज्य सचिव डॉ.गिरीश ने कहा कि वे स्वयं और उनकी पार्टी शुरू से ही कहती आरही है कि मुजफ्फरनगर दंगों में राज्य सरकार अपने राजनैतिक स्वार्थों को पूरा करने में जुटी रही और उसने दंगों को रोकने और फैलने से रोकने के लिये समुचित प्रयास नहीं किये. राज्य सरकार अपने कर्तव्य निर्वहन की दोषी है. अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे कटघरे में खड़ा कर देने के बाद राज्य सरकार को इसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर लेनी चाहिये. भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि इस फैसले की आड़ में भाजपा अपने को पाक दामन साबित करने में जुट गयी है. उसकी इस कोशिश का भाकपा पर्दाफाश करेगी. इस हेतु शीघ्र ही एक “खुलासा पत्र” जारी किया जायेगा. डॉ. गिरीश ने राज्य सरकार से मांग की कि वह इस फैसले को अमली जमा पहनाये और दंगे के दोषी वे चाहे किसी भी सम्प्रदाय अथवा पार्टी से सम्बंधित हों को तत्काल गिरफ्तार करे, सभी पीड़ितों को समान मुआबजा दे तथा वहां से पलायित लोगों को उनके गांवों में बसाने को ठोस कदम तत्काल उठाये. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा , उत्तर प्रदेश
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मंगलवार, 18 मार्च 2014

मोदी के खिलाफ साझा प्रत्याशी उतारें वाम- जनवादी दल: भाकपा

लखनऊ- १८ मार्च २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि वाराणसी से मोदी को भाजपा ने प्रत्याशी घोषित कर यह जताता दिया है कि दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक और बरबादी का उनका एजेंडा अब उत्तर प्रदेश से देश पर छाजाने की राह तलाश रहा है. यह वाराणसी और उत्तर प्रदेश की जनता के लिये भी एक चुनौती है. भाकपा की दृढ़ राय है कि इस चुनौती को वाराणसी एवं उत्तर प्रदेश की जनता को स्वीकार करना चाहिये और मोदी को खाली हाथों यहाँ से विदा करना चाहिये. उत्तर प्रदेश हिंदुस्तान का दिल है और वाराणसी उसका दिमाग. उत्तर प्रदेश और वाराणसी के मतदाता देश की बरबादी का रास्ता कदापि नहीं खोल सकते. सभी जानते हैं कि भूल से भी देश की बागडोर मोदी के हाथों में पहुँच गयी तो वे बरबादी का ऐसा भीषण तांडव छेड़ेंगे कि उससे उत्तर प्रदेश ही नहीं देश भी झुलस जायेगा . यह देश, इसका बुध्दिजीवी तबका एवं जागरूक मतदाता ऐसा कभी सम्भव नहीं होने देगा. डॉ. गिरीश ने कहा कि यदि वामपंथी धर्मनिरपेक्ष एवं लोक तांत्रिक ताकतें वाराणसी से मोदी के खिलाफ एक साझा उम्मीदवार उतारें तो भाजपा और संघ परिवार के घ्रणित मंसूबों को वहीं दफनाया जा सकता है. अतएव भाकपा काग्रेस, बसपा, सपा, आप एवं अन्य राजनैतिक दलों से अपील करती है कि वहां एक साझा प्रत्याशी उतारने को शीघ्र ठोस कदम उठायें. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव.
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शुक्रवार, 14 मार्च 2014

भाकपा ने बनाई चुनावी अभियान चलाने की रणनीति.

लखनऊ- १४, मार्च २०१२- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य काउन्सिल की दो दिवसीय बैठक आज यहाँ सम्पन्न होगयी. बैठक में भाकपा द्वारा लड़ी जारही ८ लोक सभा सीटों पर चुनाव की तैय्यारियों पर चर्चा की गई, इस हेतु जनता से चुनाव फंड एकत्रित करने का निर्णय लिया गया तथा इन सीटों पर शीघ्र से शीघ्र कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया. साथ ही वामदलों के साथ अधिक से अधिक सहमति बनाने को सघन प्रयास करने का निर्णय भी लिया गया. बैठक में देश और प्रदेश के मौजूदा हालात पर चर्चा करते हुये पार्टी के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि देश इस समय अभूतपूर्व राजनैतिक एवं आर्थिक संकटों से जूझ रहा है. केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा अपनायी जा रही नीतियों से आम जनता बेहद कठिनाइयों का सामना के रही है. जनता कमरतोड़ महंगाई, शासन- प्रशासन में दीमक की तरह घुस चुके भ्रष्टाचार, निरंतर बढ़ रही महंगाई, महंगे इलाज और महंगी पढ़ाई की मार से जूझ रही है. सत्ता में बैठे पूंजीवादी दलों से जनता आजिज आगयी है और वह उसका विकल्प चाहती है. जनता के गहरे आक्रोश को भांपते हुये ये पार्टियाँ उसको गुमराह करने को हर तरह के हथकंडे अपना रही हैं. कांग्रेस अपनी उपलब्धियों का झूठा ढिंढोरा पीट रही है. भाजपा फिर से अपने चिर परिचित सांप्रदायिक औजारों को पैना कर रही है. उसने मुजफ्फर नगर और उसके अगल-बगल के जिलों को साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बनाया और सैकड़ों लोगों की हत्याएं वहां कराई गयीं. वे नारा देरहे हैं- उत्तर प्रदेश गुजरात बनेगा. वे गुजरात के विकास के फर्जी आंकड़े प्रस्तुत कर रहे हैं. डॉ. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पिछले दो सालों में प्रदेश का राजनैतिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया और आम आदमी का जीवन दूभर होगया. यहाँ तक कि राज्य सरकार सांप्रदायिक वारदातों को रोकने के बजाय वोट की राजनीति करते नजर आयी. सूबे का मुख्य विपखी दल बसपा है जो कभी भी जनता के सवालों पर आवाज नहीं उठाता. वे वोट के लिए केवल और केवल जातीय समीकरण साधने में लगे रहते हैं. प्रदेश की जनता अपने जीवन से जुड़े कठिन सवालों का हल चाहती है लेकिन ये सारे दल मुद्दों से दूर भाग रहे हैं. उन्हाने कहाकि वह केवल वामपंथ है जो जनता के ज्वलंत सवालों महंगाई भ्रष्टाचार बेरोजगारी महंगी शिखा महंगे इलाज और किसान कामगारों की जिन्दगी में रोशनी लाने वाले सवालों पर निरंतर आवाज उठा रहा है और सांप्रदायिक और विभाजनकारी अन्य ताकतों को कड़ी चुनौती देता रहा है. हम इन्ही सवालों को लेकर चुनाव अभियान चलाएंगे.हम जनता से अपील करेंगे कि वह मुद्दों पर आधारित राजनीति को बल प्रदान करे और वामपंथी दलों को आगे बढ़ाये. उन्होंने भाकपा कार्यकर्ताओं और नेताओं से अपील की कि वे भाकपा प्रत्याशियों की सफलता के लिए पूरी ताकत से जुट जायें. बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि भाकपा को अपना चुनावी अभियान जनता के सहयोग से चलाना है माफिया दलाल और शोषकों के धन से नहीं. इसके लिए जनता के बीच जाकर चुनाव फंड एकत्रित करने का निर्णय भी लिया गया. बैठक में बुन्देलखण्ड पश्चिमी उत्तर प्रदेश मध्य उत्तर प्रदेश एवं पूर्वांचल में ओलों एवं वारिश से फसलों के हुये भारी नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त की गयी. एक प्रस्ताव पास कर राज्य सरकार और केंद्र सरकार से मांग की गयी कि वह फसलों की हानि की शत-प्रतिशत भरपाई तत्काल करे. निर्वाचन आयोग से भी मांग की गयी कि वह केंद्र और राज्य सरकार को किसानों को तत्काल आर्थिक पैकेज उपलब्ध कराने का निर्देश जारी करे. बैठक की अध्यक्षता अशोक मिश्र ने की. बैठक को पूर्व विधायक इम्तियाज़ अहमद, एटक के प्रांतीय अध्यक्ष एवं सचिव अर्विन्दराज स्वरूप व सदरुद्दीन राना, महिला फेडरेशन की महासचिव आशा मिश्रा आदि ने भी सम्बोधित किया. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव
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रविवार, 9 मार्च 2014

भाकपा उत्तर प्रदेश में लोक सभा की आठ सीटों पर लड़ेगी चुनाव.

लखनऊ/ नई दिल्ली- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश में लोक सभा की आठ सीटों पर चुनाव लड़ेगी. आज नई दिल्ली में सम्पन्न भाकपा की केन्द्रीय कार्यकारिणी एवं राष्ट्रीय परिषद की बैठक में भाकपा की राज्य कार्यकारिणी द्वारा चयनित सीटों की सूची पर अंतिम मुहर लगादी. इस सूची में दो प्रत्याशी अल्पसंख्यक समुदाय से हैं, जब कि तीन अनुसूचित वर्ग से सम्बंधित हैं. पार्टी ने दो सुरक्षित सीटों के अलाबा गोंडा की सामान्य सीट से भी अनुसूचित प्रत्याशी उतरा है. भाकपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने बताया कि भाकपा जिन सीटों पर चुनाव लड़ेगी वे और उन पर लड़ने वाले प्रत्याशी इस प्रकार हैं— घोसी- अतुल कुमार अंजान, बाँदा- रामचंद्र सरस, मछलीशहर(अनु.)- सुभाष चन्द्र गौतम, बरेली- मसर्रत वारसी उर्फ़ पप्पू भाई, राबर्ट्सगंज(अनु.)- अशोक कुमार कनोजिया, मुजफ्फर नगर- नूर अली, गोंडा- ओमप्रकाश, लखीमपुर खीरी- विपनेश शुक्ला . डॉ. गिरीश ने बताया कि भाकपा ने अपनी चुनावी तैयारियों को गति प्रदान करने हेतु भाकपा की उत्तर प्रदेश राज्य कार्यकारणी और काउन्सिल की आपात्कालीन बैठक १३ एवं १४ मार्च को लखनऊ में आहूत की है. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव.
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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

पेट्रोलियम मंत्रालय के भ्रष्टाचार को उजागर करने में भाकपा की भूमिका और मीडिया.

आखिर एक लम्बी जद्दोजहद के बाद ओएनजीसी(विदेश)के प्रमुख श्री सर्राफ को ओएनजीसी के सीएमडी पद पर नियुक्ति मिल ही गयी. कई माह पूर्व चयनबोर्ड ने इस महत्त्वपूर्ण पद पर उनकी नियुक्ति की सिफारिश की थी. लेकिन पेट्रोलियम मंत्री श्री वीरप्पा मोइली ने सारे कायदे कानूनों को ताक पर रख कर आज सेवा निवृत्त होने जारहे श्री वासुदेव को एक साल के लिये सेवा विस्तार देने की संस्तुति की थी. इससे ओएनजीसी का हित चाहने वालों में खलबली मच गयी थी, क्योंकि इस कार्यवाही में स्पष्टतः भ्रष्टाचार की गंध आरही थी. ठीक उसी तरह जैसे कि के.जी.बेसिन से निकाली जाने वाली गैस की कीमतों को ४.८ प्रति यूनिट से बड़ा कर ८.४ डालर प्रति यूनिट कर वीरप्पा ने रिलाइंस समूह के मुखिया श्री मुकेश अम्बानी को और भी मालामाल करने का रास्ता साफ कर दिया. ओएनजीसी सार्वजनिक क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण उद्योग है जिसकी गिनती नवरत्न उद्योगों में होती है. यदि इसके मुखिया की नियुक्ति भ्रष्ट तौर तरीकों से हो तो इसमें भारी भ्रष्टाचार की भारी सम्भावनायें पैदा हो जाती हैं. चूंकि गत माह भारी उद्योग मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल भेल के प्रमुख को सेवा विस्तार दिलाने में कामयाब हो गये थे, अतएव सार्वजनिक क्षेत्र के शुभ चिंतकों में यही कहानी ओएनजीसी में दोहराए जाने को लेकर काफी चिंता व्याप्त थी. लेकिन इन दोनों ही मामलों पर मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत सारी पार्टियाँ चुप्पी सादे रहीं. यहाँ तक कि ‘आप’ भी खामोश बनी रही. मामले को गंभीरता से लेते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे न केवल उजागर किया अपितु इसे एक प्रमुख मुद्दा बनाया. भाकपा सांसद का. गुरुदास दासगुप्त ने मामलों को संसद में तो उठाया ही एक के बाद एक कई पत्र लिख कर प्रधानमन्त्री से हस्तक्षेप की मांग की. गैस घोटाले पर उन्होंने एक पुस्तिका भी प्रकाशित की और सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की जिस पर ४ मार्च को सुनवाई होनी है. इन पंक्तियों के लेखक ने भी पेट्रोलियम मंत्रालय के इन घपलों की प्रभावी जांच की मांग की. लेकिन भाकपा के इन प्रयासों को कुछ समाचार पत्रों एवं न्यूज चेनल्स ने ही महत्त्व दिया. उन्हें बधाई. लेकिन शेष मीडिया ख़ामोशी अख्तियार किये रहा. लेकिन जब श्री केजरीवाल ने अपनी सरकार को शहीद करने के पहले कुछ मुद्दे खड़े करना जरूरी समझा तो उन्होंने के.जी. गैस मामले को लेकर एंटी करप्शन ब्यूरो में एफ़ाइअर दर्ज करा दी. सभी जानते हैं कि एसीबी इस मामले की जाँच करने का अधिकारी नहीं था. लेकिन सारा मीडिया उन्हें हीरो बनाने में जुट गया. मगर कई ने कहा कि यह मुद्दे तो भाकपा नेता ने उठाये थे. अब जब कि भारी शोर शराबे के चलते और सीवीसी द्वारा वासुदेव को सेवा विस्तार देने की संस्तुति न करने पर सरकार को श्री सर्राफ को नियुक्तिपत्र देना पड़ा तो मीडिया के कुछ हिस्से इन मुद्दों को भाकपा के हाथ से छीनने में जुट गये. भाजपा के एक अंध समर्थक अख़बार ने लिखा कि इस मामले को वामपंथी दलों और भाजपा ने उठाया था जबकि भाजपा के किसी नेता ने मामले पर आज तक मुहं नहीं खोला. कुछ ही दिनों से लखनऊ और आगरा से प्रकाशित हो रहे एक टटपूंजिया अख़बार के सम्पादकीय प्रष्ट पर प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि गैस घोटाला केजरीवाल ने खोला. इस लेख के विद्वान् लेखक भूल गये या उन्होंने जानबूझ कर यह छिपाया कि इस मामले पर भाकपा पिछले ९ माह से अनवरत लड़ाई लड़ रही थी. सम्पादक महोदय ने भी निष्पक्षता जताने का कोई प्रयास नहीं किया. अब मीडिया ही इस स्थिति पर चर्चा करे तो अच्छा है कि वह कितना निष्पक्ष है. डॉ.गिरीश
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ओला और बारिश से हुई फसल हानि का पर्याप्त मुआबजा न दिया तो भाकपा आन्दोलन करेगी.

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने हाल के दिनों में समूचे उत्तर प्रदेश में हुई बेमौसम बारिश एवं प्रदेश के कई भागों में हुई ओलावृष्टि से किसानों की फसल की बरबादी की एवज में हानि का सौफीसद मुआबजा देने की मांग राज्य सरकार से की है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि पिछले दो माहों में प्रदेश में लगातार बारिश होती रही है, और दो दिन पहले झाँसी एवं ललितपुर जनपदों में भारी पैमाने पर ओलावृष्टि हुई है. प्रदेश के अन्य कई जिलों में भी इस माह अलग- अलग समय पर ओलावृष्टि हुई है. इससे झाँसी एवं ललितपुर में तो समूची फसल ही नष्ट होचुकी है और अन्य जिलों में भी फसल का काफी नुकसान हुआ है. पूरे प्रदेश में आलू, तिलहन. दलहन, हरी मटर और दूसरी फसलों को भारी क्षति पहुंची है और किसान बेहद संकट में आगये हैं. पीड़ित किसानों ने आज ललितपुर जिले में झाँसी- सागर राष्ट्रीय मार्ग पर जाम लगा दिया. अन्य जगहों पर भी किसान आन्दोलन की राह पकड़ रहे हैं. डॉ. गिरीश ने प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर इस समूची स्थिति से अवगत कराया है और मांग की है कि इस फसल हानि का शत- प्रतिशत मुआबजा किसानों को फौरन दिलाया जाये. उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्राकृतिक आपदा से पीड़ित किसानों को यथाशीघ्र राहत प्रदान नहीं की गयी तो भाकपा भी किसानों के साथ मिल कर आन्दोलन करने को बाध्य होगी. भाकपा ने अपनी समस्त जिला समितियों को निर्देश दिया है कि वे किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनके हित की आवाज उठायें.
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सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

केजरीवाल के वामपंथ न दक्षिणपंथ उवाच की सच्चाई.

आपात्काल के दिनों में स्व.श्री संजय गाँधी ने नारा दिया था- न वामपंथ न दक्षिणपंथ. तब हम वामपंथियों ने दो टूक कहा था कि जो वामपंथी नहीं है वह दक्षिणपंथी ही है. संजय गाँधी की इस लाइन का सार्वजनिक रूप से विरोध करने पर इन पंक्तियों के लेखक समेत कईयों को तत्कालीन शासन ने आपात्काल विरोधी घोषित कर दिया था, अतएव हमें भूमिगत होना पड़ा था. ऐसे ही नायाब विचार अब आम आदमी पार्टी(आप) के नेता अरविन्द केजरीवाल ने व्यक्त किये हैं. दिल्ली में कन्फेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज(सीआइआइ) की बैठक में केजरीवाल ने कहा कि वे न तो पूंजीवाद के खिलाफ हैं न निजीकरण के. कारोबार में सरकार का कोई काम नहीं है. ......यह सब निजी क्षेत्र के लिये छोड़ दिया जाना चाहिए. उन्होंने इंस्पेक्टर राज एवं लाइसेंस राज के खिलाफ होने की घोषणा भी की. इससे पहले वे यह भी कह चुके हैं कि हम न तो पूंजीवादी हैं न समाजवादी या वामपंथी. हम तो बस आम आदमी हैं और किसी खास विचारधारा से जुड़े हुए नहीं हैं. अपनी समस्याएं हल करने के लिए चाहे दक्षिण हो या वाम, हम किसी भी विचारधारा से विचार उधार ले सकते हैं. केजरीवाल और उनके समर्थकों को यह बताया जाना जरूरी है कि पूंजीवाद का अस्तित्व और विकास आम आदमी के शोषण पर टिका है. आम आदमी का विकास और उत्थान समाजवादी व्यवस्था में ही सम्भव है. और समाजवादी व्यवस्था का आधार सार्वजनिक क्षेत्र है निजीकरण नहीं. फिर पूंजीवाद और निजीकरण की वकालत करके केजरीवाल किस आम आदमी की बात कर रहे हैं? वैसे तो वे आम आदमी की परिभाषा भी गढ़ चुके हैं- “ग्रेटर कैलाश(दिल्ली के धनाढ्य लोगों की आबादी) से लेकर झुग्गी- झोंपड़ियों तक जो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ है वह आम आदमी है”. वे शेर और बकरी को एक घाट पर पानी पिलाना चाहते हैं. यह पूंजीवाद का ही कानून है. केजरीवाल का यह कथन कि सरकार का कारोबार में कोई काम नहीं और तमाम कारोबार निजी क्षेत्र के लिये छोड़ दिया जाना चाहिए,उनके उस नवउदारवादी द्रष्टिकोण का ही परिचायक है जिसकी वकालत हूबहू इन्हीं तर्कों के साथ कांग्रेस और भाजपा दशकों से करती आरही हैं. इस नजरिये का तो सीधा अर्थ है कि सभी आर्थिक गतिविधियाँ और उनके सभी क्षेत्र बाजार से संचालित होने चाहिये. यहाँ तक कि बिजली पानी की आपूर्ति और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी सेवायें भी. केजरीवाल ने कहा है कि इस बात की जरूरत है कि सरकार ऐसी अच्छी नियामक व्यवस्था कायम करे कि कारोबार और उद्यम खेल के नियमों के हिसाब से चलें. यह उनकी एक अच्छी कपोल-कल्पना है. अब तक के अनुभव तो यही बताते हैं कि कारोबारी और उद्यमी सरकारों की सदाशयता हासिल कर अपने मुनाफे और पूँजी का आकार बढ़ाते हैं और केजरीवाल जैसे दार्शनिक उनके फायदे के लिये वैचारिक प्रष्ठभूमि बनाने में जुटे रहते है. वैसे भी यह नव-उदारीकरण के मॉडल का ही हिस्सा है, जिसके तहत बड़ी पूँजी के हितों को आगे बढ़ाया जाता है. केजरीवाल ने दिल्ली की बिजली और पानी के निजीकरण के अपने विरोध को भी भुला दिया है. आखिर क्यों? केजरीवाल ने यह भी कहा कि वह केवल दरबारी पूंजीवाद के खिलाफ हैं, पूंजीवाद के खिलाफ नहीं.उन्होंने दिल्ली में अंबानी सन्चालित बिजली आपूर्ति कम्पनियों के खिलाफ और रिलायंस गैस मूल्य निर्धारण के मुद्दे पर अपनी लड़ाई को दरबारी पूंजीवाद के खिलाफ बताया. वे इस बात पर अनजान बने हुये हैं कि बड़े पैमाने पर दरबारी पूंजीवाद का पनपना नव-उदारवादी व्यवस्था की ही देन है, जो प्राक्रतिक संसाधनों की लूट को आसान बनाती है और पूरी तरह बड़े पूंजीपतियों के लिए मुनाफा बटोरने का रास्ता बनाती है. यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि केजरीवाल को एन आर आई, निर्यातकों तथा उद्योग घरानों से जो चंदा मिलता है वह यह जान कर ही मिलता है कि वे वामपंथी नहीं हैं. वे ही लोग वामपंथियों को फूटी आंखों नहीं देखना नहीं चाहते. अतएव आप भले ही न वामपंथ न दक्षिणपंथ कह कर अपने को तटस्थ और भोला साबित करने की कोशिश करे अब तक के उसके बयान एवं कारगुजारियां उसे पूंजीवाद और आज के नव-उदारवाद के हितैषी के रूप में ही पेश करती हैं. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश
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शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

राहुल गाँधी के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में भाकपा ने आन्दोलन का बिगुल फूंका.

मुसाफिरखाना(अमेठी)- गरीब और आम आदमी की ज्वलंत समस्यायों, कानून व्यवस्था की बिगडी हालात और भाकपा नेता का० शारदा पाण्डेय के विरुध्द कोतवाली मुसाफिरखाना में दलालों के दबाब में दर्ज किये गये फर्जी मुकदमे के विरुध्द भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय खेत मजदूर यूनियन, अ० भा० किसान सभा, अ० भा० नौजवान सभा एवं आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के लगभग २५० कार्यकर्ताओं ने मुसाफिरखाना तहसील के प्रांगण में धरना दिया एवं एक आमसभा की. सभा के मुख्यवक्ता भाकपा के राज्य सचिव डॉ० गिरीश थे. सभा को सम्बोधित करते हुये डॉ० गिरीश ने कहाकि आज केंद्र की सरकार द्वारा चलाई जारही नीतियों से जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. केंद्र सरकार आये दिन डीजल पेट्रोल एवं रसोई गैस के दाम बढ़ाती रहती है. इस कारण और सरकार के दुसरे कदमों के कारण महंगाई आसमान छू रही है. आम जनता का जीवन दूभर होगया है. इस सरके के नौ वर्ष के शासनकाल में घपलों-घोटालों और भ्रष्टाचार की तो मानो बाढ़ सी आगयी है. बेरोजगारी बढ़ी है और शिक्षा एक व्यापार बन चुकी है,जिसके बेहद महंगा होजाने के कारण आमजन शिक्षा से वंचित रह जारहे हैं. सरकार की जनविरोधी नीतियों और कारगुजारियों के चलते जनता में भारी आक्रोश है जिसका खामियाजा कांग्रेस को आगामी लोकसभा चुनावों में निश्चय ही भुगतना होगा, जनता के इस गुस्से को भाजपा अपने पक्ष में भुना कर सत्ता पर कब्जा करने की हर कोशिश में जुटी है. उसने देश और दुनियां के पूंजीपतियों, उद्योगपतियों एवं कार्पोरेट घरानों के सबसे चहेते नरेंद्र मोदी को चुनावों से पहले ही प्रधानमन्त्री पद का प्रत्याशी बना दिया है जबकि हमारे यहाँ संसदीय जनतंत्र है जिसमें चुनाव के बाद सांसदों के बहुमत द्वारा चुना गया व्यक्ति ही प्रधानमन्त्री बनता है. वे मोदी को चाय बेचनेवाले के रूप में प्रचारित कर रहे हैं ताकि गरीबों को बहकाया जासके और इस बात पर पर्दा डाला जासके कि मोदी की रैलियों और भाजपा के प्रचार अभियान में बहाया जारहा अरबों रुपया आखिर कहां से आरहा है. डॉ० गिरीश ने कहाकि सवाल यह नहीं है कि कोई चाय बेचता रहा है या चावल. सवाल यह है कि उसकी नीतियां चाय बेचने वाले जैसे गरीबों के पक्ष में खड़ी हैं या गरीबों को लूटने वाले धनपतियों के पक्ष में. ये मोदी नामक तत्व तो पूरी तरह धनपतियों का रक्षक है. डॉ० गिरीश ने कहाकि वैसे भी भाजपा की आर्थिक नीतियों और कांग्रेस की नीतियों में कोई फर्क नहीं हैं. भाजपा नाम की मुर्गी के पेट से भी वही अंडा निकलेगा जो आज कांग्रेस के पेट से बाहर आरहा है. यह पार्टी भी महंगाई, भ्रष्टाचार बढ़ाने एवं सांप्रदायिकता फेलाने के लिये सुविख्यात है. यह जो सत्ता पर कब्जा करने के मंसूबे बांध रही है वो धुल-धूसरित होकर रहेंगे. डॉ० गिरीश ने कहाकि आम जनता भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त है और उसे पूरी तरह समाप्त करना चाहती है. वह कांग्रेस, भाजपा एवं दूसरी पूंजीवादी पार्टियों से भी बुरी तरह परेशान है और एक जन हितेषी राजनैतिक विकल्प की तलाश में है. अपनी इसी ख्वाहिश के चलते जनता ने दिल्ली विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया. लेकिन सरकार बनाने के बाद वे न तो अपने चुनावी वायदे पूरे कर पाये न ही सत्ता में बने रह पाये. अब उद्योगपतियों की बैठक में जाकर उन्होंने यह भी ख डाला कि न तो वह पूंजीपतियों के खिलाफ हैं न ही निजीकरण के. उन्होंने अपना यह मन्तव्य भी उजागर कर दिया की वह सरकार के द्वारा उद्योग चलाये जाने के पक्ष में नहीं है. यह वही विचार है जिसे कांग्रेस और भाजपा अपनी विनाशकारी नई आर्थिक नीतियों को जायज ठहराने के लिये प्रकट करती रही हैं. उन्होंने स्पष्ट कियाकि कोई या तो पूँजीवाद का पैरोकार हो सकता है अथवा गरीबों का. कोई पूँजीवाद का समर्थक हो सकता है या समाजवाद का. आज यह स्पष्ट होगया है कि केजरीवाल और उनकी मंडली पूंजीवाद के पक्ष में खड़ी है और उन्हीं की पैरोकार है. भाकपा राज्य सचिव ने कहाकि आज ऊतर प्रदेश की सरकार भी हर मोर्चे पर विफल होचुकी है. कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है. किसान-कामगार तवाह होरहे हैं. वे आर्थिक बदहाली के चलते आत्महत्यायें कर रहे हैं. मुजफ्फरनगर शामली एवं मेरठ के दंगों सहित १४० दंगे सपा के शासनकाल में होचुके हैं जिन्हें रोकने में सरकार पूरी तरह नाकमयाब रही है. प्रदेश की सत्ता मफियायों, दलालों और दबंगों के हाथों में कैद है. ऐसे ही लोगों के कहने पर भाकपा के जुझारू नेता का० शारदा पाण्डेय के खिलाफ फर्जी मुकदमे लिखे जारहे हैं और उनको गरीबों का साथ छोड़ने अथवा जान से हाथ धोने की धमकियां दी जारही है. डॉ० गिरीश ने चेतावनी देते हुए कहाकि यदि का० शारदा पांडे के खिलाफ कुछ भी हुआ तो उत्तर प्रदेश सरकार की चूलें हिला दी जायेंगी. भाकपा सुल्तानपुर के जिला सचिव का० शारदा पाण्डेय ने कहाकि आजादी के ६५ साल बाद भी किसान मजदूर गरीब मेहनतकश आवश्यक सुविधाओं से वंचित हैं. भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार की जनविरोधी नीतियों के चलते किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य, मजदूर को उसका सही हक मनरेगा के तहत काम, अत्यंत गरीबों को बीपीएल के तहत मिलने वाला अनाज, राशनकार्ड नहीं मिल रहा. नौजवानों को रोजगार और गरीबों के बच्चों को शिक्षा से वंचित रखा जारहा है. भाकपा आज ही नहीं अपने जन्म से ही इन सवालों पर संघर्ष करती रही है और करती रहेगी आज भाकपा को और मजबूती प्रदान करने की जरूरत है. सभा के बाद एक ९ सूत्रीय ज्ञापन जो मुख्यमंत्री को सम्बोधित था उपजिलाधिकारी को सौंपा गया. सभा को देव पाल सिंह एडवोकेट, जियालाल कोरी, रामदेव कोरी, रामप्यारे पांडे, रोशनलाल प्रधान, श्यामदेवी, नीलम, मीणा देवी, राम्सुधारे पासी, रामतीर्थ पासी, छितईराम पासी, बीडी रही, राकेश पासी, श्रीपाल पासी, एवं लल्लन पाल आदि ने सम्बोधित किया.
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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

पेट्रोलियम मंत्रालय के घोटालों की प्रभावी जाँच की मांग.

लखनऊ—१३, फरबरी- २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डॉ०गिरीश ने कहाकि के.जी. बेसिन में अम्बानी की कम्पनी रिलाइंस इण्डिया लिमिटेड के लिये गैस की कीमतें दो गुनी करने के मामले एवं चुनाव वर्ष में तेल एवं प्राक्रतिक गैस आयोग(ONGC) के मौजूदा चेयरमैन को सारे नियमों को ताक पर रख कर एक साल के लिये पुनर्नियुक्ति दिलाने के प्रयासों से यह साबित हो गया है कि पेट्रोलियम मंत्रालय भारी भ्रष्टाचार में डूबा है. डॉ० गिरीश ने इस मंत्रालय के साढ़े चार साल के क्रिया कलापों की प्रभावी, विश्वासप्रद एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है. उन्होंने कहाकि दोनों ही सवाल अत्यधिक लोक महत्व के हैं और दोनों में लोकधन के अपव्यय एवं भारी भ्रष्टाचार की तमाम सम्भावनायें नजर आरही हैं अतएव भाकपा के वरिष्ठ सांसद एवं ए.आई.टी.यू.सी. के महासचिव का० गुरुदास दासगुप्त ने पिछले आठ माहों में इन मामलों को बार-बार उजागर किया. उन्होंने गैस के मुद्दे को लोक सभा में उठाया, कई बार प्रधान मंत्री को चिट्ठियां लिखीं, पूरे मसले पर एक पुस्तिका प्रकाशित की तथा सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की जिस पर ४ मार्च को सुनवाई होना वांच्छित है. इसी तरह जब पेट्रोलियम मंत्री ने सारे कायदे कानूनों और स्थापित परम्पराओं को दरकिनार कर ओ.एन.जी.सी.के मौजूदा चेयरमैन के कार्यकाल को एक वर्ष आगे बढ़ाने और नियमानुसार गठित पैनल द्वारा नयी नियुक्ति के लिए की गई संसुति को निष्प्रभावी करने की कोशिश की तो का० गुरुदास ने इस मामले को भी पूरी शिद्दत से उठाया और एक नहीं दो-दो बार इस सम्बन्ध में भी प्रधानमंत्री को चिट्ठियां लिखीं. अब दिल्ली की सरकार द्वारा गैस मामले पर ऍफ़.आई.आर. दर्ज करा देने से मीडिया ने भी खासी कवरेज दी है और जनता पेट्रोलियम मंत्रालय के भीतर क्या कुछ चल रहा है, जानना चाहती है. डॉ० गिरीश ने कहाकि वैसे तो कांग्रेस अथवा भाजपा दोनों के ही शासनकाल में अधिकतर पेट्रोलियम मंत्री अम्बानी की पसंद के आधार पर ही बनते रहे हैं, लेकिन इस बार हस्तक्षेप कुछ अधिक ही है. अतएव जनता के सामने सच्चाई आनी ही चाहिये.
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बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

LATHI-CHARGE ON STUDENTS CONDEMNED

The Central Secretariat of the Communist Party of India has issued following statement to the press:

The Secretariat of the Communist Party of India severely condemns the lathi-charge and use of water cannons on the peaceful demonstration of All India Students Federation today afternoon at the Parliament Street. The students were organizing demonstration on the call of AISF, for proper steps to implement Right to Education, Free education from K.G. to P.G; against privatization and commercialization of Education, against foreign universities, scraping of Lyngdo Committee report and democratize elections to students unions etc.

Thousands of students gathered near the Parliament Street and wanted to submit a memorandum to Education Minister. They were prevented. Police tried to disperse them by using water cannons and later resorted to brutal Lati-Charge. Even girl students were not spared. AISF President Syed Vali Ullah Khadri and many other students were severely injured and admitted in different hospitals. CPI demands action on Police Officers responsible for lathi-charge should be suspended and action should be initiated.


(S.S.BHUSARI)

Office Secretary
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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

सफल हड़ताल पर बैंक कर्मियों को भाकपा की बधाई

लखनऊ 10 फरवरी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने वेतन पुनरीक्षण की मांग कर रहे बैंक कर्मियों की आज से शुरू हुई दो दिवसीय अखिल भारतीय हड़ताल पर बैंक कर्मचारी एवं अधिकारी संगठनों को सफल हड़ताल आयोजित करने के लिए बधाई दी है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि बैंक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की वेतन पुनरीक्षण की मांगें जायज हैं और केन्द्र सरकार एवं भारतीय बैंक संघ पांच प्रतिशत, साढ़े चार प्रतिशत और आधा प्रतिशत वेतन वृद्धि की बात कर यह साबित कर रहा है कि वह इस मुद्दे को गंभीरता के साथ हल करना नहीं चाहते। बैंकों का आपरेटिंग मुनाफा लगातार बढ़ रहा है और नेट मुनाफे के कम बढ़ने का कारण बैंक के अधिकारी-कर्मचारी नहीं हैं बल्कि इंफ्रा सेक्टर के लिए जबरदस्ती दिलाये गये ऋण हैं जो सरकारी नीतियों के कारण एनपीए में तब्दील हो गये हैं। डा. गिरीश ने विश्वास जाहिर किया है कि वेतन कटवा कर हड़ताल करने वाली बैंक कर्मियों की क्रान्तिकारी जमात को इस बार भी सफलता मिलेगी।
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लेखानुदान नहीं पूर्ण बजट पास कराये राज्य सरकार - भाकपा

लखनऊ 10 फरवरी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल की एक बैठक डा. गिरीश, राज्य सचिव की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में राज्य सरकार से मांग की गई कि वह 19 फरवरी से प्रारम्भ हो रहे विधान मंडल के सत्र में पूर्ण बजट लाकर के उसे पास कराये। लेखानुदान लाने की कोई भी कोशिश न तो प्रदेश की जनता के हित में है और न ही स्वयं राज्य सरकार के हित में।
बैठक के बाद यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि ऐसी चर्चा है कि उत्तर प्रदेश सरकार विधान मंडल के आगामी सत्र में लेखानुदान लाने की कोशिश में है। चुनावों के पूर्व लेखानुदान पारित कराने की केन्द्र सरकार की तो मजबूरी होती है लेकिन राज्य सरकार के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। पूर्ण बजट पाना जनता का अधिकार है और राज्य सरकार को जनता के इस हक को नहीं छीनना चाहिए।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि इसका यह अर्थ लगाया जा रहा है कि राज्य सरकार लोकसभा चुनावों के पहले जनता के समक्ष अपनी नीतियों को घोषित करने से कतरा रही है और लेखानुदान पारित कराके अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाह रही है। जनता को भय है कि लोक सभा चुनाव के बाद सरकार निर्मम तरीके से जनविरोधी बजट लाने को स्वतंत्र होगी और जनता के ऊपर भारी भार थोपा जायेगा। विधान मंडल के वर्तमान सत्र के दौरान सरकार के पास बजट पेश करने और पास कराने के लिए पर्याप्त समय है, अतएव समयाभाव बता कर भी सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है।
सचिव मंडल की बैठक में लोक सभा चुनावों की तैयारियों पर गम्भीरता से विचार हुआ और निर्णय लिया गया कि भाकपा इन चुनावों में वामपंथी दलों को एकजुट करने की कोशिश करेगी। अपनी चुनावी तैयारियों को गति देते हुए भाकपा ने जनता के ज्वलंत मुद्दों पर क्षेत्रीय रैलियों का आयोजन करने का निर्णय लिया है। अब तक गन्ना किसानों की समस्याओं और फिरकापरस्ती के खिलाफ 2 रैलियां आयोजित करने का निर्णय लिया जा चुका है। 15 फरवरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक रैली मेरठ के नौचंदी ग्राउन्ड पर आयोजित की जा रही है जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी भी भाग लेने के लिए आ रहे हैं। दूसरी रैली पूर्वांचल की 20 फरवरी को पड़रौना में आयोजित की जा रही है जिसमें राज्य सचिव एवं सहायक सचिव आदि नेतागण भाग लेंगे।


राज्य सचिव
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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

चौदहवें वित्त आयोग के समक्ष भाकपा द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन

6 फरवरी 2014
समक्ष
चौदहवां वित्त आयोग
भारत सरकार
कैम्प: लखनऊ

आयोग के सम्मानित सदस्यगण,
देश का सर्वाधिक आबादी वाला प्रान्त उत्तर प्रदेश आजादी के बाद अपेक्षित विकास नहीं कर पाया है। पिछले 25 सालों से यह अनेक क्षेत्रों में पिछड़ता चला जा रहा है। इसके लिए इन वर्षों में कार्यरत राज्य सरकारें तो दोषी हैं ही केन्द्र सरकारें भी बराबर की जिम्मेदार हैं। राज्य सरकारों ने यदि विकास की उपेक्षा की है तो केन्द्र सरकारों ने भी राज्य के प्रति सौतेलेपन से काम लिया है। वैसे तो पूरा प्रदेश ही पिछड़ा है परन्तु बुन्देलखण्ड और पूर्वांचल के सभी जिले तथा मध्य एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भी कई जिले बेहद पिछड़े हैं। 
कृषि: उत्तर प्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है लेकिन गत वर्षों में यहां की खेती काफी पिछड़ गयी है और किसान कर्ज के जाल में डूबे हुए हैं। हजारों किसानों ने पिछले सालों में आत्महत्यायें की हैं और इससे कहीं अधिक भूख से मरे हैं। कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल लगातार सिकुड़ता जा रहा है। कृषि भूमि किसानों के हाथों से निकल कर उद्योगपतियों, व्यापारियों, भू-माफियाओं और रिश्वतखोर राजनीतिज्ञों एवं अधिकारियों के हाथों में सिमटती जा रही है। इनके द्वारा कृषि उपकरणों के अधिकाधिक प्रयोग से खेतिहर मजदूर बेकार हो गये हैं।
विधान सभा चुनावों के दौरान वर्तमान सरकार द्वारा सभी किसानों का 50,000 रूपये तक का ऋण माफ करने का वायदा किया गया था परन्तु सरकार ने केवल भूमि विकास बैंक के ऋण ही माफ किये हैं जिसके कारण तमाम छोटे किसानों के खेत आदि नीलाम हो गये। कइयों को हवालात की हवा खानी पड़ी तो कइयों ने आत्महत्या कर ली।
कृषि के लिए सिंचाई बेहद जरूरी है लेकिन 25-30 सालों में प्रदेश में नहरों, बंबों, बांधों के निर्माण का कार्य बेहद धीमा है। कहा जाये तो यह पूरी तरह उपेक्षित है। निजीकरण के इस दौर में सरकारी ट्यूबवेल लगाये नहीं जा रहे हैं। भूमिगत जल का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। सिंचाई के अभाव और भूमि सुधार लागू न किये जाने के कारण खेती दम तोड़ रही है।
औद्योगिक क्षेत्र: उत्तर प्रदेश में भारी मात्रा में कपड़ा मिलें, सूत मिलें, जूट मिलें, चमड़ा उद्योग, तेल उद्योग, इंजीनियरिंग उद्योग, चीनी मिलें, धातु उद्योग, दाल मिलें आदि थे। उनमें से बहुमत आज बन्द पड़े हैं और उद्योगपति खाली जमीनों पर कालोनियां बसा रहे हैं। अवस्थापना सुविधाओं के अभाव में औद्योगिक क्षेत्र बर्बाद हो चुका है और तमाम इकाईयां बीमार पड़ी हैं। केन्द्रीय उपक्रमों में स्कूटर इंडिया और इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज की हालत बहुत ही खराब चल रही है तो एनटीसी की सभी मिलें बन्द हैं। इसी तरह राज्य सरकार की तमाम इकाईयां बन्द हो चुकी हैं। सहकारी और सरकारी 21 चीनी मिलें पिछली सरकार ने बेच दी और गन्ना किसानों पर संकट आ गया।
कुटीर उद्योग: यहां भारी संख्या में कुटीर उद्योग थे जिनमें सबसे प्रमुख उद्योग बुनकरी रहा है। लेकिन सरकारों की कुटीर उद्योगों एवं दस्तकारी के प्रति उपेक्षा के कारण आज ये पूरी तरह बर्बादी की कगार पर हैं। लाखों-लाख बुनकर, बीड़ी मजदूर तथा अन्य दस्तकार बेरोजगारी से ग्रस्त होने के चलते भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। असंगठित मजदूरों का तो और भी बुरा हाल है।
सड़क एवं बिजली: प्रदेश में एक ओर तो एक्सप्रेस हाईवे बनाने की परियोजनाओं पर काम चल रहा है तो दूसरी ओर तमाम अन्य सड़कों की दशा बेहद दयनीय है। राज्य की जीवन रेखा कही जाने वाली जी.टी. रोड तक अत्यधिक खराब स्थिति में है। 27 सालों में प्रदेश में बिजली की कोई नई परियोजना नहीं लगी है। अब जो परियोजनायें निर्माणाधीन हैं या बन कर तैयार हो चुकी है, उनमें निजीकरण के कारण घपले ही घपले हैं। बिजली के अभाव में प्रदेश का उद्योग और कृषि व्यापार तो चौपट हो ही गया है, बिजली की समस्या कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गयी है। आगरा की विद्युत वितरण प्रणाली को निजी हाथों में देने से वहां अनेक समस्यायें पैदा हुई हैं। पिछले 25 सालों में सार्वजनिक क्षेत्र का एक ही उद्योग प्रदेश में शुरू नहीं किया गया।
शिक्षा: शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रदेश बेहद पिछड़ चुका है। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक महंगे निजी विद्यालयों की भरमार है, जिनमें पढ़ाई की गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं है। सरकार नियंत्रित विद्यालयों में भ्रष्टाचार, कार्य संस्कृति की पंगुता तथा सरकार की उपेक्षा के चलते शिक्षा दयनीय हालत में है। प्रदेश के किसान, मजदूर तबकों एवं आम आदमी के घरों के बच्चे उच्च शिक्षा तो दूर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा तक से वंचित है। वर्तमान शिक्षण सत्र में मिड डे मील के अंतर्गत अनाज एवं भोजन बनवाने का धन अभी तक उपलब्ध नहीं कराया गया है।
सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों पर प्रयोगशालायें और कम्प्यूटर कक्ष तक नहीं हैं और न ही कम्प्यूटर शिक्षक ही नियुक्त किये गये हैं। इन विद्यालयों में शिक्षकों की भी अतिशय कमी है। लगभग 20 वर्ष पूर्व शुरू किये गये विद्यालयों के वित्तविहीन उच्चीकरण के चलते इन विद्यालय के शिक्षकों को अति अल्प वेतन पर नौकरी पर रखा गया है। ऐसे शिक्षकों से क्या अपेक्षा की जा सकती है। स्वःवित्तपोषित कोर्सों के बारे में भी लगभग यही सत्य है।
इंटर पास करने वाले विद्यार्थियों को लैपटॉप बांटने के नाम पर आयोजित होने वाले आयोजनों पर अनाप-शनाप खर्चा किया गया और कई स्थानों पर आयोजनों पर हुआ खर्चा लैपटॉप बांटने के खर्चे से कहीं अधिक का था।  उत्तर प्रदेश में राजनैतिक हितों के लिए सरकारी धन का दुरूपयोग लगभग सभी सरकारों द्वारा किया गया है।
बेरोजगारी: उद्योग शून्यता, कृषि के बेढ़ब संचालन तथा आधारभूत ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) के निर्माण में उदासीनता और पिछड़ेपन के चलते प्रदेश में भयंकर बेरोजगारी है और प्रदेश के तमाम नौजवान और मजदूर जीवनयापन के लिये पलायन करने को मजबूर हैं। पलायन से गांव खाली हो रहे हैं और शहरों पर आबादी का भार बढ़ रहा है, जिससे अन्य समस्यायें पैदा हो रहीं है। नरेगा जैसी योजनायें भ्रष्टाचार की जकड़ में हैं। ईमानदार निर्वाचित जन प्रतिनिधियों यथा ग्राम प्रधानों का जीवन तक संकट में है।
नागरिक सुविधायें: जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिनीवल मिशन चन्द बड़े शहरों में लागू किया गया है, जहां भीषण भ्रष्टाचार व्याप्त है। तमाम मध्यम एवं छोटे शहरों में सड़कों, नालियों, सफाई आदि की स्थिति बेहद दयनीय है। प्रदेश की राजधानी तक में सार्वजनिक सफाई के लिए जनता को स्थानीय ठेकेदारों को मासिक आधार पर भुगतान करना पड़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में भी नागरिक सुविधायें हद दर्जे के निम्नतम स्तर पर हैं।
स्वास्थ्य: पूरे प्रदेश में राजकीय स्वास्थ्य सुविधायें चौपट पड़ी हैं। सरकारी अस्पतालों में से अधिकांश की इमारतें जर्जर अवस्था में हैं। अस्पतालों में पर्याप्त स्टाफ तक नहीं है। कई जिलों में एक भी महिला चिकित्सक नियुक्त नहीं है। दवाओं और उपकरणों का बेहद अभाव है। साफ सफाई और तीमारदारी की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। निजी नर्सिंग होम्स एवं चिकित्सालय लूट के अड्डे बने हुये हैं। आम जनता स्वास्थ्य की एवज में भारी कीमत चुका रही है। ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ अधिसंख्यक ग्रामीण जनता को नहीं मिल पा रहा है। उसकी एंबुलेंस गाडियां टैक्सी के रूप में चलाई जा रही हैं।
गरीब एवं असहाय तबके: प्रदेश में गरीबी की रेखा के नीचे गुजर करने वालों की संख्या बहुत अधिक है और यह प्रदेश की कुल आबादी का 70 प्रतिशत से कम नहीं है। गरीबी रेखा के नीचे के लोगों की गणना पहले योजना आयोग के दफ्तर में कर ली जाती है और फिर जिला एवं ब्लाक स्तरीय अधिकारियों को उतने ही बीपीएल परिवार चिन्हित करने के लिए निर्देश जारी कर दिये जाते हैं। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले अधिसंख्यक परिवारों के पास बीपीएल कार्ड नहीं हैं। नरेगा के अंतर्गत जॉब कार्ड देने में भी हीला हवाली की जाती है। नरेगा में काम करने के पूरे पैसे तक नहीं मिलते हैं। कहने को पैसा बैंक खातों में जमा किया जाता है परन्तु दबंगई के कारण बैंक खातों से पैसा निकालने के लिए विड्राल फार्मों पर घर-घर जाकर पहले से ही दस्तखत करवा लिये जाते हैं। गरीबों के लिए चल रही तमाम योजनायें भ्रष्टाचार में डूबी हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली: प्रदेश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली चौपट पड़ी है। आम आदमी को जरूरत की खास चीजें बेहद महंगी मिलती हैं। मौजूदा महंगाई ने तो आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक तथा भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने की जरूरत है।
विकास के धन का दुरूपयोग: राजनीतिक उद्देश्यों से वशीभूत होकर सरकारें विकास के लिये धन को स्मारकों, मूर्तियों और अपनी जन्मभूमियों को यादगार स्थल बनाने में जुटी रहीं और प्रदेश का विकास पिछड़ता चला गया है। उत्तर प्रदेश के समूचे विकास की उपेक्षा हुई है।
वित्त आयोग के सम्मानित सदस्यगण,
इन परिस्थितियों में प्रदेश के समग्र विकास के लिए हम निम्न मांगें आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं:

  • प्रदेश में कृषि के विकास के लिए पर्याप्त धन आबंटित किया जाये। ये धन प्रदेश में सहकारी खेती विकसित करने, खेती को उपकरण एवं अन्य उपादान मुहैया कराने तथा भूमि सुधार के वास्ते दिया जाये।
  • उत्तर प्रदेश के बन्द पड़े मिलों, उद्योगों - खासकर सार्वजनिक एवं सहकारी उद्योगों को चलवाने, बीमार उद्योगों को ठीक हालत में लाने तथा नये उद्योग खुलवाने को पर्याप्त मात्रा में धन मुहैया कराया जाये।
  • बुनकरों तथा बुनकर उद्योग, अन्य कुटीर उद्योगों की दशा सुधारने तथा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को रोजगार देने के लिए योजनायें चलाने हेतु भी पर्याप्त धन मुहैया कराया जाये।
  • सार्वजनिक क्षेत्र में प्रदेश में सड़क निर्माण, विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए पर्याप्त धन दिया जाये।
  • प्रदेश में नहरों के निर्माण, बांधों एवं चेकडैम्स के निर्माण तथा सरकारी ट्यूबवेलों को लगाने हेतु भी धन आबंटित किया जाये।
  • प्रदेश के सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारने तथा निजी स्कूलों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें संचालित करने, माध्यमिक शिक्षा सभी को मुफ्त दिलाये जाने और उच्च शिक्षा को आम आदमी के लिए सुलभ तथा सस्ती बनाने को शिक्षा का ढांचा खड़ा करने हेतु भारी धनराशि राज्य को मुहैया कराई जाये।
  • प्रदेश के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में कुटीर एवं मध्यम उद्योग लगाने और पर्याप्त रोजगार सृजन कर उसे कार्यान्वित करने हेतु धन उपलब्ध कराया जाये।
  • नरेगा का दायरा 200 दिन प्रतिवर्ष और मजदूरी रू. 300.00 रूपये प्रतिदिन बढ़ाई जाये और शहरी क्षेत्र के लिए भी शहरी रोजगार गारंटी कानून बनाया जाये।
  • नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें, गलियां, खड़ंजे, नालियों एवं तालाबों आदि के निर्माण और सफाई को ध्यान में रखते हुए धन मुहैया कराया जाये।
  • सभी गरीबों को बीपीएल कार्ड दिलाकर उनके लिए तमाम विकासकारी योजनायें चलाने, वृद्धों, विधवाओं, विकलांगों के लिए आश्रयस्थल बनाने को पर्याप्त धन मुहैया कराया जाये।
  • आम आदमी को महंगाई और काला बाजारी से निजात दिलाने को सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करना जरूरी है जिसके लिए धन आबंटित किया जाये। खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने को भी धन की जरूरत होगी।
  • प्रदेश के बुन्देलखंड, पूर्वांचल, मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिलों के विकास के लिये पर्याप्त धन मुहैया कराया जाये।
  • वन क्षेत्र के फैलाव एवं रखरखाव, वृक्षारोपण, झीलों, तालाबों-पोखरों के संरक्षण और उन्हें गहरा करने, जल संरक्षण के काम को अंजाम देने को भी धन की आवश्यकता है।
  • सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, गोबर गैस आदि से ऊर्जा दोहन के लिये पर्याप्त धनराशि भी आवश्यक है।
  • सूखा, बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने को अतिरिक्त धनराशि आबंटित की जाये।
  • अर्बन रिनीवल का कार्य 50,000 से अधिक आबादी वाले सभी नगरों तक लागू किया जाये, जिसमें प्रमुखता पेय जल की आपूर्ति एवं सीवरेज व्यवस्था स्थापित करने के साथ-साथ सड़कों के उच्चीकरण को दी जाये।

अतएव आपसे अनुरोध है कि प्रदेश के भौगोलिक एवं जन सांख्यकीय विस्तार तथा प्रदेश के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय की न्यूनता को देखते हुये प्रदेश के विकास के लिए उपर्युक्त बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए आप वसूल किये जाने वाले केन्द्रीय करों में से समान हिस्सा राज्य को प्रदान करें तथा केन्द्रीय निधियों में अधिकाधिक धन उत्तर प्रदेश के लिए आबंटित करने की संस्तुति करें। आबंटन के लिए 1971 की जनगणना के आंकड़ों के बजाय 2011 की वास्तविक संख्या को ध्यान में रखा जाये। विभाज्य अंश के वितरण के सिद्धान्त में वित्तीय अनुशासन के भार को बढ़ाया जाये। 

सुझाव


  • विकास का धन विकास में ही लगे अन्य मनमाने कामों में नहीं इसके लिए राज्य एवं जिलों के स्तर पर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की एक निगरानी समिति बनाये जाने की सिफारिश केन्द्र सरकार से की जाये। उल्लेख आवश्यक होगा कि विधान मंडल की बैठकों की संख्या अत्यधिक घट चुकी है और पीएसी की कार्यपद्धति अंकुश लगाने में सफल साबित नहीं हुई।
  • जन प्रतिनिधियों, राज नेताओं, अधिकारियों और दलालों के भ्रष्टाचार पर नजर रखने के लिए केन्द्रीय एवं राज्य के स्तर पर पर्याप्त निगरानी व्यवस्था हो।
  • कैग के अधिकार क्षेत्र को विस्तृत किया जाये और केन्द्रीय सहायता का कैग द्वारा आडिट अनिवार्य बनाया जाये।
  • जिस धन को जिस कार्य के लिए दिया जाये उसे उसी कार्य में उपभोग किये जाने का प्रमाण लिये जाने को अनिवार्य किया जाये और उसके अन्यथा उपयोग पर यथोचित कार्यवाही के बारे में कानून बनाने पर विचार किया जाये।

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप उपर्युक्त पर गहनता से विचार कर समुचित कार्यवाही करेंगे और उत्तर प्रदेश के विकास का रास्ता प्रशस्त करेंगे।
सादर,

भ व दी य


(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

वायदों को निगलती अखिलेश सरकार

पिछले विधान सभा चुनावों के दौरान वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित समाजवादी पार्टी के तमाम नेता जनता से बड़े-बड़े वायदे करते हुए प्रदेश भर में जनसभायें कर रहे थे। विभिन्न तबकों के वोटों के लिए किए गए इन वायदों पर अखिलेश सरकार खरी नहीं उतरी।
बेरोजगार युवकों को बेरोजगारी भत्ता, किसानों की ऋण माफी, इंटर के विद्यार्थियों को टैबलेट और इंटर पास चुके छात्रों को लैपटॉप देने सरीखे तमाम वायदे किये गये थे। बेरोजगार युवकों को बेरोजगारी भत्ता के नाम पर की गई घोषणा में तमाम ‘किन्तु’ और ‘परन्तु’ जोड़ दिये गये जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश में फैली विकराल बेरोजगारों की फौज में से केवल एक लाख लोगों को बेरोजगारी भत्ता दिये जाने का मामला सामने आया। बाकी लाखों बेरोजगारों को निराशा ही हाथ लगी।
इसी तरह किसानों के कर्जा माफी के नाम पर केवल भूमि विकास बैंक के कर्जों को ही माफ किया गया। चुनावों के दौरान ऋण माफी के वायदे को देखते हुए तमाम किसानों ने अपना कर्जा अदा नहीं किया जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें न केवल उस कर्जे पर ब्याज की अदायगी करनी पड़ी बल्कि तमाम किसानों के खिलाफ बैंकों ने वसूली प्रमाणपत्र जारी कर दिये जिसके कारण तमाम लोगों की जमीनें और ट्रैक्टर आदि नीलाम हो गये।
इंटर के 25 लाख विद्यार्थियों को टैबलेट देने का वायदा किया गया था। दो साल पूरे होने को हैं परन्तु इस वायदे को आज तक पूरा नहीं किया गया। अब पता चला है कि इस योजना के नाम पर जो कदमताल की जा रही थी, उसे भी बंद कर दिया गया है। माध्यमिक शिक्षा विभाग ने अगले साल के बजट के लिये वित्त एवं नियोजन विभाग को भेजे गये अपने बजट प्रस्ताव में इस मद में केवल एक रूपये का प्राविधान करने के लिए कहा है। मात्र एक रूपये में वे कितने छात्रों को टैबलेट दे पायेंगे, यह बड़ा सवालिया निशान है। ध्यान देने वाली बात यह है कि माध्यमिक शिक्षा विभाग मुख्यमंत्री स्वयं सीधे देख रहे हैं और निश्चित रूप से ऐसा उनके निर्देशों पर ही विभाग ने किया होगा।
इंटर पास करने वाले छात्रों को अलबत्ता लैपटॉप बांटने की कवायद की गई। कहा जाता है कि जितने के लैपटॉप नहीं बांटे गये उससे ज्यादा पैसा लैपटॉप बांटने के आयोजनों पर किया गया। जो लैपटॉप बांटे गये वे बहुत ही घटिया क्वालिटी के हैं और जिन्हें यह मिले हैं, वे इसका उचित एवं आवश्यक प्रयोग भी नहीं कर पा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार इन लैपटॉप की खरीद में भी भारी घोटाला हुआ है।
बुनकरों को किये गये तमाम वायदे भी हवा में ही तैर रहे हैं।
केन्द्र सरकार कई सालों से स्कूलों में मध्यान्ह भोजन योजना चला रही है। योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है। खाद्यान्न एवं भोजन पर बनने वाले व्यय का आबंटन केन्द्र सरकार राज्य सरकार को करती है। चौकाने वाली खबर है कि वर्तमान शैक्षिक सत्र में अब तक ग्राम प्रधानों तथा विद्यालयों को न तो खाद्यान्न मुहैया कराया गया है और न ही उसके बनने पर होने वाले व्यय को ही उपलब्ध कराया गया है। जिन ग्राम प्रधानों एवं प्रधानाध्यापकों ने इस आशा में कि देर-सबेर आबंटन मिल ही जायेगा, राशन की दुकान से एडवांड खाद्यान्न उठा कर भोजन बनवा कर बच्चों को मध्यान्न भोजन सुलभ कराया, वे अब परेशान हो रहे हैं क्योंकि कोटेदार राशन के पैसे मांग रहा है और भोजन बनवाने में होने वाला खर्चा तो वे अपने पास से कर ही चुके हैं।
अन्यान्य ऐसे वायदे हैं जो किये गये थे और जिन्हें अखिलेश सरकार लगातार निगलती चली जा रही है। आने वाले लोक सभा चुनावों में जनता के तमाम तबके किये गये वायदों पर जवाब जरूर मांगेंगे।
- प्रदीप तिवारी
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गुरुवार, 30 जनवरी 2014

का० इन्द्रजीत गुप्त- बेदाग छवि, गाँधी जैसी सादगी एवं लोकतान्त्रिक द्रष्टिकोण

पिछले कुछ दिनों में एक हाल में ही प्रकट हुयी पार्टी के नेताओं की सादगी और उसकी उपलब्धियों पर मीडिया ने दर्शकों और श्रोताओं के आँख और कानों को अपने तोता रटंत गुणगान से पाट दिया है. लेकिन अपनी तटस्थता का दाबा करने वाले मीडिया ने कम्युनिस्टों की कुर्बानियों, बलिदानों और सादगी को कभी प्रसारित नहीं किया अपितु जहाँ मौका मिला उन पर कीचड़ ही उछाली. लेकिन आज राष्ट्रीय सहारा ने का. इन्द्रजीत गुप्त पर एक टिपण्णी प्रकाशित कर मीडिया धर्म को निभाया है. उसका यथावत पाठ नीचे दिया जारहा है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीआइ) के नेता इन्द्रजीत गुप्त सिर्फ १९७७-८० को छोड़ कर १९६० से जीवनपर्यन्त सांसद रहे.सबसे वरिष्ठ सांसद रहने के नाते वह तीन बार(१९९६, १९९८, १९९९) प्रोटेम स्पीकर बने और उन्होंने नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ दिलाई.वह सीपीआइ के जनरल सेक्रेट्री रहे. वह आल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के जनरल सेक्रेट्री (१९८०-१९९०) रहे. वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस के अध्यक्ष(१९९८) रहे.और एच.डी. देवगोडा के मंत्रिमंडल में वह (१९९६-९८) गृहमंत्री रहे. उन्हें १९९२ में “आउटस्टैंडिंग पार्लियामेंतेरियां का सम्मान दिया गया. राष्ट्रपति के.आर. नारायण ने उन्हें श्रध्दांजलि देते हुए कहा था कि वह गांधीजी जैसी सादगी, लोकतान्त्रिक द्रष्टिकोण और मूल्यों के प्रति समर्पित व्यक्ति थे. ग्रहमंत्री बनने केबाद भी वह वेस्टर्न कोर्ट के दो कमरों के क्वार्टर में रहते रहे. वे टहलते हुये संसद चले जाते थे. गृहमंत्री बनने पर प्रोटोकाल के नाते उन्हें सरकारी गाड़ी से चलना पड़ा. फिर भी उन्होंने बहुत सी सुविधायें नहीं लीं थीं जो मंत्री होने के नाते उहें मिलती. यहाँ तक कि उन्होंने सुरक्षा गार्ड लेना स्वीकार नहीं किया. वह हमेशा लोगों को होने वाली असुविधाओं का पूरा ख्याल रखते थे. मंत्री रहते हुए भी एअरपोर्ट के टर्मिनल तक वायुसेवा की बस सही जाते थे न कि अपनी गाड़ी से. का. इन्द्रजीत गुप्त कज्न्म १८ मार्च १९१९ को कोलकता में हुआ था. उनके पिता सतीशचन्द्र गुप्त देश के अकाउंटेंट जनरल थे. इन्द्रजीत गुप्त के दादा बिहारीलाल गुप्त आईसीएस थे और बरोदा के दीवान थे.इन्द्रजीत गुप्त की पढ़ाई शिमला, दिल्ली के सेंट स्टीफेंस व किंग्स कालेज और केम्ब्रिज में हुई थी.इंग्लेंड में ही वह रजनीपाम दत्त के प्रभाव में आये और उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली. १९३८ में कोलकता लौटने पर वह किसानों और मजदूरों के आन्दोलन से जुड़ गये. आजादी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी पर तीन बार प्रतिबन्ध लगाया गया और इसके तहत अन्य वाम नेताओं के साथ इन्द्रजीत गुप्त को या तो भूमिगत होना पड़ा या गिरफ्तार. इन्द्रजीत गुप्त का देहान्त २० फरबरी २००१ को ८१ साल की उम्र में हुआ.
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भूतल परिवहन मंत्री,श्रीप्रकाश जायसवाल,मुलायम सिंह और अखिलेश यादव सभी जिम्मेदार हैं जी.टी. रोड की दयनीय दशा के लिए.

भाकपा ने जी. टी. रोड की मरम्मत कराने की मांग उठाई. लखनऊ- ३० जनवरी २०१४, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डॉ० गिरीश ने केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री को पत्र लिख कर राष्ट्रीय राज मार्ग सं० ९१(जी. टी. रोड) की कानपुर और और अलीगढ के बीच दयनीय दशा से अवगत कराया है और इसकी तत्काल मरम्मत कराने की मांग की है. अपने पत्र में भाकपा राज्य सचिव ने भूतल परिवहन मंत्री को बताया है कि उक्त मार्ग अत्यंत जीर्ण- शीर्ण हालात में है. सडक में इतने गहरे गड्ढ़े हो गये हैं कि यह पता ही नहीं लगता कि गड्ढ़ों में सड़क है या सडक में गड्ढ़े. कानपूर और अलीगढ़ के बीच सफर में ६ घंटे लगते थे मगर अब सडक की इस दुर्दशा के चलते ९-१० घंटे लग जाते हैं. अतएव समय एवं ईंधन की भारी वर्बादी होती है. डॉ० गिरीश ने कहा कि यह राष्ट्रीय मार्ग केन्द्रीय मंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल, केंद्र सरकार को समर्थन दे रहे श्री मुलायम सिंह यादव एवं श्रीमती डिम्पल यादव जैसे अति विशिष्ट लोगों के चुनाव क्षेत्रों से गुजरता है. फिर भी यह इस दुर्दशा को प्राप्त है. इसकी सीधी वजह यह है कि इन नेताओं को इस मार्ग से चलने की जरूरत नहीं है. ये मान्य नेतागण हवाई जहाज अथवा हेलिकॉप्टर से यात्रायें करते हैं अतएव उन्हें इसकी फ़िक्र करने की शायद जरूरत नहीं है. हमने इन नेताओं को भी पत्र की प्रतियाँ भेजी हैं और उनसे भी इस सम्बन्ध में त्वरित कदम उठाने की मांग की है, भाकपा नेता ने कहा है. भाकपा ने चेतावनी दी है कि यदि इस मार्ग की फौरन मरम्मत नहीं कराई गयी तो सम्बन्धित नेताओं को इसका खामियाजा लोकसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता है. डॉ० गिरीश, राज्य सचिव, भाकपा, उत्तर प्रदेश.
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शनिवार, 25 जनवरी 2014

भाकपा उ. प्र. कार्यकारिणी की बैठक के फैसले.

लखनऊ- २५ जनवरी २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक आज यहाँ सम्पन्न हुई. बैठक की अध्यक्षता का० सुरेन्द्रराम ने की. बैठक में लिए गये फैसलों की जानकारी देते हुये पार्टी के राज्य सचिव डॉ० गिरीश ने बताया कि बैठक में कमरतोड़ महंगाई के खिलाफ ३१ जनवरी को प्रदेश के सभी जिला केन्द्रों पर धरना/प्रदर्शन आयोजित करने का निर्णय लिया गया. इन प्रदर्शनों माध्यम से केन्द्र और राज्य सरकार के महंगाई बड़ाने वाले कदमों को उजागर किया जायेगा. प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को सम्बोधित ज्ञापन जिलाधिकारियों के माध्यम से प्रेषित किये जायेंगे. ज्ञापन में पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृध्दि पर रोक लगाने, प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था पुनः लागू कराने, इन पदार्थों पर राज्य के टेक्सों में कमी कराने, जरूरी वस्तुओं की जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाने तथा जमाखोरी विरोधी अभियान चलाये जाने, बुनियादी सेवाओं का निजीकरण न किये जाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक बनाने, दिल्ली हरियाणा की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिजली की दरें कम किये जाने,सभी तरह की शिक्षण संस्थाओं में ली जारही भारी फीस में प्रभावी कमी किये जाने, दवाओं की कीमतों में कमी लाने तथा निजी अस्पतालों में इलाज की दरें कम कराने की मांग की जायेगी. डॉ० गिरीश ने बताया की गन्ना किसानों की समस्यायों का समाधान कराने तथा सांप्रदायिक ताकतों की साजिशों को विफल करने के उद्देश्य से क्षेत्रीय “एकता रैलियां” आयोजित की जायेंगी. अभी तक १५ फरबरी को मेरठ और २० फरबरी को कुशीनगर में रैलियां आयोजित की जायेंगी. इन रैलियों को पार्टी के राष्ट्रीय एवं प्रांतीय नेतागण भाग लेंगे. मेरठ रैली में मेरठ एवं सहारनपुर मंडलों के जनपद भाग लेंगे जबकि कुशीनगर की रैली में गोरखपुर एवं बस्ती मंडल के जनपद भाग लेंगे. राज्य कार्यकारिणी की बैठक में लोकसभा चुनाव की तैय्यारियों पर भी चर्चा हुई. भाकपा ने वामदलों के साथ मिल कर चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की है. बैठक में उत्तर प्रदेश में १६ लोकसभा सीटों की सूची तैयार कर राष्ट्रीय कार्यकारणी के विचारार्थ अग्रसारित किया गया है. केन्द्रीय कार्यकारिणी की ३१ जनवरी और १ फरबरी को दिल्ली में होने वाली बैठक में अंतिम निर्णय लिया जायेगा. डॉ० गिरीश, राज्य सचिव.
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भाकपा महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन करेगी, एकता रैलियां भी आयोजित की जायेंगी. लोक सभा चुनाव की सूची भी तैयार की गयी.

लखनऊ- २५ जनवरी २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक आज यहाँ सम्पन्न हुई. बैठक की अध्यक्षता का० सुरेन्द्रराम ने की. बैठक में लिए गये फैसलों की जानकारी देते हुये पार्टी के राज्य सचिव डॉ० गिरीश ने बताया कि बैठक में कमरतोड़ महंगाई के खिलाफ ३१ जुलाई को प्रदेश के सभी जिला केन्द्रों पर धरना/प्रदर्शन आयोजित करने का निर्णय लिया गया. इन प्रदर्शनों माध्यम से केन्द्र और राज्य सरकार के महंगाई बड़ाने वाले कदमों को उजागर किया जायेगा. प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को सम्बोधित ज्ञापन जिलाधिकारियों के माध्यम से प्रेषित किये जायेंगे. ज्ञापन में पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृध्दि पर रोक लगाने, प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था पुनः लागू कराने, इन पदार्थों पर राज्य के टेक्सों में कमी कराने, जरूरी वस्तुओं की जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाने तथा जमाखोरी विरोधी अभियान चलाये जाने, बुनियादी सेवाओं का निजीकरण न किये जाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक बनाने, दिल्ली हरियाणा की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिजली की दरें कम किये जाने,सभी तरह की शिक्षण संस्थाओं में ली जारही भारी फीस में प्रभावी कमी किये जाने, दवाओं की कीमतों में कमी लाने तथा निजी अस्पतालों में इलाज की दरें कम कराने की मांग की जायेगी. डॉ० गिरीश ने बताया की गन्ना किसानों की समस्यायों का समाधान कराने तथा सांप्रदायिक ताकतों की साजिशों को विफल करने के उद्देश्य से क्षेत्रीय “एकता रैलियां” आयोजित की जायेंगी. अभी तक १५ फरबरी को मेरठ और २० फरबरी को कुशीनगर में रैलियां आयोजित की जायेंगी. इन रैलियों को पार्टी के राष्ट्रीय एवं प्रांतीय नेतागण भाग लेंगे. मेरठ रैली में मेरठ एवं सहारनपुर मंडलों के जनपद भाग लेंगे जबकि कुशीनगर की रैली में गोरखपुर एवं बस्ती मंडल के जनपद भाग लेंगे. राज्य कार्यकारिणी की बैठक में लोकसभा चुनाव की तैय्यारियों पर भी चर्चा हुई. भाकपा ने वामदलों के साथ मिल कर चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की है. बैठक में उत्तर प्रदेश में १६ लोकसभा सीटों की सूची तैयार कर राष्ट्रीय कार्यकारणी के विचारार्थ अग्रसारित किया गया है. केन्द्रीय कार्यकारिणी की ३१ जनवरी और १ फरबरी को दिल्ली में होने वाली बैठक में अंतिम निर्णय लिया जायेगा. डॉ० गिरीश, राज्य सचिव.
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शनिवार, 11 जनवरी 2014

वामदलों ने महंगाई बढ़ाने की नीतियों के खिलाफ आन्दोलन का निर्णय लिया

लखनऊ 11 जनवरी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा.), आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक तथा रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के राज्य के पदाधिकारियों की एक बैठक आज यहाँ सम्पन्न हुयी।
बैठक में वामदलों के केन्द्रीय नेतृत्व के आह्वान पर राज्य में महंगाई विरोधी आन्दोलन चलाने की रणनीति पर विचार किया गया। निर्णय लिया गया कि उत्तर प्रदेश में यह आन्दोलन केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों की महंगाई बढाने वाली नीतियों के विरोध में चलाया जायेगा।
बैठक में लिये गये निर्णय के अनुसार वाम दल 15 जनवरी से लेकर 30 जनवरी के मध्य जिलों-जिलों में सभायें, नुक्कड़ सभायें, साईकिल मार्च अथवा पदयात्राएं करके जनता के बीच जायेंगे तथा 31 जनवरी को जिला केन्द्रों अथवा तहसील केन्द्रों पर व्यापक धरने-प्रदर्शन आयोजित करेंगे।
आन्दोलन के अंतर्गत पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि पर रोक लगाने, सरकारी स्तर पर कीमतों के निर्धारण की व्यवस्था फिर से लागू करने, पेट्रोल डीजल आदि पर राज्य सरकार द्वारा लगाये गये करों में कमी कर उन्हें अन्य राज्यों के स्तर पर लाने, जनता को सेवाएं और सब्सिडी देने के काम को आधार कार्ड से न जोड़ा जोड़ने, जरूरी वस्तुओं जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाने तथा जमाखोरी विरोधी अभियान चलवाने, बुनियादी सेवाओं का निजीकरण न किये जाने तथा जो प्राइवेट कम्पनियां सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हुये बुनियादी सेवायें दे रही हैं उनका ऑडिट कराये जाने, सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली को फिर से लागू कराने, महंगाई को नीचे लाने को दिल्ली की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिजली की दरें घटाए जाने, बिजली कम्पनियों का ऑडिट कराये जाने, बिजली का निजीकरण रोके जाने, लाइन हानियाँ एवं बिजली चोरी रोके जाने, सभी स्तरों पर सभी प्रकार की शिक्षण संस्थाओं में लिए जा रहे भारी शिक्षण शुल्कों में प्रभावी कटौती किये जाने, दवाओं की कीमतें घटाए जाने तथा अस्पतालों में मरीजों की लूट रोके जाने आदि मुद्दे उठाये जायेंगे।
बैठक में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश, सहसचिव अरविन्द राज स्वरूप, माकपा के सचिव एस. पी. कश्यप एवं दीनानाथ यादव, फॉरवर्ड ब्लॉक के राज्य महासचिव शिव नारायण सिंह चोहान तथा आरएसपी के सचिव संतोष गुप्ता ने भाग लिया।



कार्यालय सचिव
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शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

बिजली के दामों में बढ़ोतरी जनविरोधी कदम


उत्तर प्रदेश में बिजली कंपनियों ने राज्य विद्युत नियामक आयोग को जो प्रस्ताव सौंपा है, उसकी मंजूरी मिलने के बाद आम उपभोक्ताओं के बिजली के बिल कम से कम दो गुने अवश्य हो जायंेगे। सभी बिजली कंपनियों ने हो रहे बिजली के दामों में बढ़ोतरी का कारण हो रहे घाटे को बताया है। उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें पहले से ही पड़ोसी राज्यों बिहार, दिल्ली, पंजाब आदि से बहुत ज्यादा हैं।
प्रति किलो वाट फिक्स चार्ज जो इस समय रू. 50/- प्रतिमाह है, उसे बढ़ाकर डेढ़ गुना करने की बात कही गयी है। यह वह चार्ज है जो केवल कनेक्शन ले लेने पर देना पड़ता है, आप बिजली का उपभोग करें या न करें। इतनी शीत लहरी में अगर कहीं आपने हीटर लगा लिया तो आपका मीटर 1 किलो वॉट से ज्यादा का उपभोग दर्शा देगा और आप पर एक बड़ी राशि स्वीकृत लोड से अधिक लोड का उपभोग करने के नाम पर लगा दी जायेगी।
लाईफ लाईन कहे जाने वाले गरीब लोगों के घरों पर लगे 1 किलो वॉट के कनेक्शन के लिए अब 150 यूनिट के बजाय 50 यूनिट कर देने का प्रस्ताव है। 50 यूनिट से तो आज के जमाने में किसी का काम चलता ही नहीं है। इस प्रकार न्यूनतम बिजली की दरें तो किसी पर लागू नहीं होने वाली। 50 यूनिट से ज्यादा खर्च करने पर बिजली कंपनियों की प्रस्तावित दरों के अनुसार 100 यूनिट तक 4 रूपये प्रति यूनिट, 101 से 300 यूनिटों पर 4.50 पैसे प्रति यूनिट, 301 से 500 यूनिट पर 5 रूपये प्रति यूनिट और इससे अधिक पर 5.50 रूपये प्रति यूनिट दाम लिये जायेंगे।
घाटे का कारण होने वाली कथित लाईन हानियां, बिजली कंपनियों में व्याप्त भ्रष्टाचार और निजी बिजली कंपनियों से ज्यादा कीमत पर बिजली खरीदना है। निजी बिजली कंपनियां अधिक कीमत पर बिजली बेचने के लिए अपनी बैलेन्स शीटों में हेरा-फेरी कर रही हैं। इसी तरह पॉवर कारपोरेशन और उसकी तमाम कंपनियां बिजली चोरी तो करवाती ही हैं और भी अनाप-शनाप तरीके से पैसा व्यय किया जाता है जिसको व्यय करने की जरूरत नहीं है। वितरण निगमों का रू. 29,325 करोड़ रूपये बकाया है, इसमें केवल 2600 करोड़ रूपये वसूल लिये जायें तो बिजली कंपनियों का घाटा खतम हो जायेगा। 10 हजार करोड़ रूपये तो केवल उत्तर प्रदेश सरकार पर बकाया हैं। सरकार को इस बकाये को खुद तुरन्त अदा कर देना चाहिए। अगर लाइन हानियों को केवल 11 प्रतिशत कम कर दिया जाये तो कहा जाता है कि 4 हजार करोड़ रूपये की बचत हो जायेगी।
जनता के तमाम तबकों में उत्तर प्रदेश पॉवर कारपोरेशन, उसके उत्पादन एवं वितरण कंपनियों के साथ-साथ निजी उत्पादन कंपनियों के ऑडिट की मांग उठने लगी है। यानी जनता जानना चाहती है कि बही खातों में जो ब्यौरा दिखाया जा रहा है, वह कितना वास्तविक है और इसमें किसी तरह की गड़बड़ी तो नहीं है। सन 2010 से बिजली कंपनियों के बही खातों का ऑडिट नहीं हुआ है। सनदी लेखाकारों यानी सी.ए. से यह ऑडिट करवाने में कुछ निकलने वाला नहीं है। हमें इन सभी कंपनियों का आडिट सीएजी यानी कैग से करवाने की मांग जोर-शोर से करनी चाहिए। कुछ ही दिनों पहले टेलीकॉम कंपनियों के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा था कि कैग को निजी टेलीकॉम कंपनियों के खातों की जांच करने का हक है। उच्च न्यायालय का कहना है कि चूंकि उनके राजस्व को सरकार के साथ साझा करना होता है इसलिए जनहित में कैग को उनका आडिट करने का अख्तियार उचित है। इस फैसले के अनुसार निजी बिजली कंपनियों का भी कैग से आडिट करवाया जा सकता है जिससे यह पता चल सके कि यह अपनी उत्पादन लागत जितनी दिखा रही हैं, क्या वास्तव में लागत उतनी ही है या ये कंपनियां हेरा-फेरी करके अधिक कीमत पर बिजली बेच रही हैं। खबर है कि उत्पादकों से बिजली खरीद कर उपभोक्ताओं तक पहुंचाने में वितरण कंपनियां खेल करती हैं। बाजार में सस्ती बिजली उपलब्ध होने के बावजूद कुछ खास लोगों से महंगी बिजली खरीदी जाती है। बाद में इसका बोझ दरों के रूप में जनता पर डाला जाता है।
इस बात की भी मांग होनी चाहिए कि सरकार जहां से भी सस्ती बिजली मिले, वहीं से बिजली खरीदे। महंगी बिजली निजी क्षेत्र से खरीदने की कोई जरूरत नहीं है। प्रदेश में 6 रूपये से लेकर पौने आठ रूपये प्रति यूनिट तक की दर से बिजली खरीदने की तैयारी है। शायद ही पूरे देश में किसी राज्य में इस दर पर बिजली खरीदी जा रही हो। आडिट से यह भी पता चलेगा कि इसके पीछे किसका हित है और किसका खेल चल रहा है।
लाईन हानियां दिखाने से लेकर सामानों की खरीद फरोख्त, ठेकों के आबंटन, परिचालन व्यय आदि की गड़बड़ियां भी सामने आ सकती है, इसलिए कंपनियां आडिट से कतराती हैं। आगरा में बिजली के निजीकरण पर महालेखाकार की रिपोर्ट से यह साबित हो चुका है। महालेखाकार ने आगरा में टोरेंट पावर के साथ हुए करार से सरकार को 5348 करोड़ रूपये की चपत लगने का खुलासा किया था। नोएडा में भी बिजली वितरण निजी हाथों में है। वहां भी खेल चल रहा है। आश्चर्य का विषय है कि आगरा में बिजली आपूर्ति करने वाली निजी कंपनी टोरेंट को केवल 2.20 रूपये प्रति यूनिट बिजली दी जा रही है। महंगी बिजली खरीद कर टोरेंट को सस्ते में देना भी बड़ा भ्रष्टाचार का मामला है। आगरा में टोरेंट लाईन हानियों को 48.62 प्रतिशत बता रहा है जोकि पूरे देश का उच्चतम स्तर है। इसके पीछे के खेल को भी उजागर करना जरूरी है।
अब समय आ गया है जब जनता को सड़कों पर उतर कर बिजली की कीमतों में किसी भी बढ़ोतरी का विरोध करने के बजाय सड़कों पर उतर पर बिजली की वर्तमान दरों में कमी की मांग करनी चाहिए और सभी बिजली कंपनियों का आडिट कैग से करवाने पर जोर देना चाहिए।
- प्रदीप तिवारी
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गुरुवार, 9 जनवरी 2014

वामदलों का महंगाई विरोधी आन्दोलन १५ से ३१ जनवरी तक.

पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में वृध्दि एवं महंगाई के खिलाफ उत्तर प्रदेश में भी आन्दोलन छेड़ेगी भाकपा. लखनऊ- ९ जनवरी २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने तय किया है कि वामदलों के केन्द्रीय नेत्रत्व के निर्देशानुसार पार्टी पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में लगातार की जारही मूल्य वृध्दि और कमरतोड़ महंगाई के खिलाफ १५ से ३१ जनवरी तक राज्यव्यापी आन्दोलन छेड़ेगी. भाकपा शीघ्र ही इस सम्बन्ध में राज्य के वामदलों के साथ बैठक भी करेगी. पार्टी के राज्य सचिव मंडल की बैठक के बाद भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने एक बयान में कहा कि कल दिल्ली में सम्पन्न चार वामदलों की बैठक में इन सवालों पर देशव्यापी आन्दोलन छेड़ने का निर्णय लिया गया है. तदनुसार उत्तर प्रदेश में भी व्यापक आन्दोलन छेड़ा जायेगा. भाकपा राज्य सचिव मंडल की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि लगातार बढ़ रही महंगाई के बोझ तले जनता का हर तबका दबा जा रहा है. ऊपर से संप्रग-२ सरकार पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और सीएनजी की कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी कर आग में घी डालने का काम कर रही है. निकट भविष्य में भी कीमतों की इस मार से कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. अतएव अब सडकों पर उतरने के अलाबा कोई रास्ता नहीं है. भाकपा राज्य सचिव मंडल द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि उनका यह आन्दोलन पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों नें बढ़ोत्तरी को रोकने और प्रशासनिक मूल्य बहाल करने सहित कई मांगों पर केन्द्रित होगा. हम जमाखोरी और आवश्यक वस्तुओं के वायदा कारोबार को रोकने की मांग भी करेंगे. हम सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू करने की मांग भी करेंगे. हम मूलभूत सेवाओं के निजीकरण का विरोध करेंगे और उन निजी कम्पनियों का ऑडिट करने की मांग करेंगे जो सार्वजानिक संसाधनों का उपयोग कर मूलभूत सेवाओं की आपूर्ति कर रही हैं. डॉ. गिरीश ने बताया कि उत्तर प्रदेश में भाकपा बिजली की दरों में प्रस्तावित वृध्दि के खिलाफ तथा बिजली की दरें कम करने, बिजली कम्पनियों का ऑडिट कराने एवं लाइन हानि कम करने के सवाल पर पहले से ही अभियान चलाये हुए है. अब महंगाई विरोधी अभियान के साथ इसे और सघन किया जायेगा. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव.
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