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गुरुवार, 10 जून 2010

विमर्श - दलित आंदोलन और वर्ग-संघर्ष

दलित आंदोलन की दशा-दिशा के बारे में आजकल जोरो से चर्चा चल रही है। इस चर्चा में भाग लेने वाले लोग प्रायः अपने पक्ष को सही और दूसरे पक्ष को गलत सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। ऐसी चर्चाओं में प्रायः वर्तमान सामाजिक स्थितियों के आधार पर दलित को परिभाषित करने और उसकी सामाजिक हैसियत को आंकने का प्रयत्न किया जा रहा है। दलित-जीवन के ऐतिहासिक परिवेश को प्रायः अनदेखा छोड़ दिया जाता है। यदि इतिहास का सहारा लिया जाता है, तो भी अपनी सुविधानुसार अपने लिए उपयोगी पक्ष को ही उजागर किया जाता है। इतिहास को समग्रता से देखने परखने की दृष्टि के अभाव में दलितों को समग्रता से संबोधित करता दिखायी नहीं देता। खंडित रूप में ही वर्तमान दलित आंदोलन चल रहा है। दलितों के ही उच्च और मध्य स्तर के दलितों की मुक्ति के संघर्ष के रूप में यह सीमित हो गया हैं। इसके स्थान पर सभी स्तर के दलितों के मुक्ति आंदोलन के रूप में दलित-आंदोलन को विकसित करना है। वर्तमान दलित आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह दलित की वर्तमान शोचनीय स्थिति की जड़ों की तलाश नहीं करता। यदि करता है तो भी वह जाति केंद्रित रह जाती है। इसलिए, दलित की जातिगत वर्णगत मुक्ति के रूप में तथा दलित अस्मिता की स्थापना के संघर्ष के रूप में दलित आंदोलन सीमित हो गया है। भूमंडलीकृत समाज में ब्राह्मणीकृत दलितों की दृष्टि से संघर्ष चलाने वाला दलित, असल में गरीब दलितों की निर्धनता, गरीबी और फाकें के कारणों को नजरअंदाज कर रहा है। यदि कोई कारण प्रस्तुत करता है, तो वह जातिगत भेदभाव का है। इसलिए उसका आंदोलन जाति-भेद और छुआछूत से मुक्ति आंदोलन के रूप में संकुचित रह गया है।किसी भी आंदोंलन को रूप देने के से पहले समस्या की एक ऐतिहासिक समझ रखना जरूरी है। इतिहास की सही समझ के बिना कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो सकता। दलित अपनी परंपरा की खोज करते हुए भी इतिहास को सही मायने में देखने, परखने और मूल्यांकन करने का प्रयास करते दिखायी नहीं देता। जातिगत और वर्णगत भेदभाव को ही वह अपने पिछड़ेपन का कारण मानता है। छुआछूत को वह सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। जाति-वर्ण भेद से अपने मन में उपजी हीन-भावना से वह मुक्त होना चाहता है। उसके विचार में, जातिगत भेदभव को मिटाकर वह समाज में मान्यता प्राप्त कर सकता है। इसलिए दलित के सामाजिक एवं साहित्यिक आंदोलों में जाति पर आधारित भेदभाव और छुआछूत को तोड़ने की बात मुखरित दिखायी देती है। विडंबना यह है कि जाति के नाम पर सवर्ण जातियों द्वारा अवर्ण जातियों पर हो रहे अत्याचारों और ज्यादतियों से मुक्ति प्राप्त कर सामाजिक हैसियत प्राप्त करने का स्वप्न देखने वाला दलित ही विभिन्न जातियों के आधार पर संगठित हो रहा है। अपनी जातीय अस्मिता की खोज करने वाला दलित सिर्फ छुआछूत से मुक्त होकर सामाजिक मान्यता प्राप्त करना चाहता है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के संस्थापक ब्राह्मणों को गाली देते वक्त भी दलित ब्राह्मणों के बराबर ही होना चाहता है, बल्कि उस शोषणकारी ब्राह्मण्य व्यवस्था को नष्ट करने की बात प्रायः नहीं उभरती। जाति व्यवस्था को तोड़कर एक जाति-रहित व्यवस्था की स्थापना का स्वप्न तक वह नहीं देख पाता। दूसरे शब्दों में कहें, तो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के षड्यंत्र का शिकार होकर उसी के द्वारा निर्धारित संघर्ष ही दलित आज भी चला रहा है। ब्राह्मणों के जातिवाद के शिकंजे में पड़कर, जातिगत गुलाम मानसिकता के कारण, जाति से स्वतंत्र होने की बात तक वह नहीं सोच पाता। यानी मेहनत करने वालों की एकता को तोड़ने के लिए ब्राह्मणों ने जिस जाति-व्यवस्था को स्थापित किया था, उसी व्यवस्था को बरकरार रखकर उसमें ही दलित अपनी जातिगत गरिमा प्राप्त करना चाहता है, अर्थात् जाति से परे होकर दलित सोच भी नहीं पाता। यही दलित आंदोलन की सबसे बड़ी त्रासदी है। ‘मनुस्मृति’ और चातुर्वर्ण्य व्यवस्था पर आक्रमण कर अपनी जाति को सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त कराने के रूप में दलित आंदोलन को सीमित करना उसकी बड़ी कमजोरी है।इतिहास बताता है कि सभी प्रकार के सामाजिक भेदभाव का मूूल आधार अर्थ है। आर्थिक असमानता के मूल में शोषण है। शोषक व्यवस्था का आधार ही विभाजन है। जन समाज को विभिन्न स्तरों में विभाजित कर उसे दुर्बल बनाना उसकी नीति है। अकसर यह माना जात है कि जनता को कई खेमों में विभाजित कर सुगम ढंग से शासन करने की नीति सबसे पहले अंग्रेजों ने अपनायी थी। लेकिन यह धारणा गलत है। जिस समजा में आर्थिक असमानता बनी रहती है, वहां जनता का विभाजन भी बना रहता है। क्योंकि शोषकसत्ताधारी वर्ग अपने अधिकार और उससे हासिल सुख-सुविधाओं को बनाये रखने के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है। दूसरी ओर, जो वर्ग इससे वंचित रहता है, वह उसे प्राप्त करने के लिए निरंतर संघर्ष करता है। सत्ता प्राप्ति से अपने जीवन के बेहतर होने की आकांक्षा में संघर्ष करते रहने वाले वर्ग को दुर्बल बनाकर अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने की कोशिश सत्ताधारी वर्ग करता रहता है। इस वर्ग-संघर्ष को मिटाकर अपने एकछत्र शासन को बरकरार रखने के लिए एक ओर कठोर नियमों के जरिये उसके संघर्ष को दबा दिया जाता है, तो दूसरी ओर जनता के बीच भेदभाव पैदा करके उसे आपस में लड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार किसी भी शोषक का व्यवस्था में मेहनतकश वर्ग को दमन और विभाजन से जोड़कर उसके मुक्ति संघर्ष को नाकाम बना दिया जाता है। इस दृष्टि से देखें, तो सर्वहारा वर्ग के वर्ग संघर्ष को दुर्बल बनाने के लिए ही प्राचीन भारत के सत्ताधारी आर्यो ने जाति-व्यवस्था की रचना की थी। इस ऐतिहासिक समझ के अभाव के कारण ही दलित आंदोलनकारी वर्ग-संघर्ष को दुर्बल बनाने के लिए ही प्राचीन भारत के सत्ताधारी आर्यो ने जाति-व्यवस्थ की रचना की थी। इस ऐतिहासिक समझ के अभाव के कारण ही दलित आंदोलकारी वर्ग-संघर्ष का विरोध कर जाति-संघर्ष से जुड़ा हुआ है। किसी भी समस्या को कार्य कारण संबंध के वैज्ञानिक बोध से विश्लेषित करना है। जिसमें यह वैज्ञानिक बोध नहीं होता, वह समस्याओं का सही समाधान नहीं निकल पाता। उसकी लड़ाई नकली होने की संभावना है। अक्सर साम्यवाद ही समस्याओं को इस दृष्टि से विश्लेषित करने में सफल दिखायी देता है।मानव सभ्यता के विकास का इतिहास हमें यह बता देता है कि जंगल में विचरण करके अपना जीवन-यापन करते आदिम मनुष्य के बीच न जाति-भेद था, न वर्ण-भेद। जब मनुष्य ने खेती बाड़ी शुरू की और सामूहिक रूप में बसना प्रारंभ किया, तब से ही एक सामाजिक व्यवस्था शुरू हो जाती है। जब खेती से ज्यादा पैदावार मिलने लगी, तो भविष्य में उपयोगी करने के लिए उसे सुरक्षित भी रखना पड़ा। इसके संरक्षण का दायित्व कुछ लोगों को सौंपना पड़ा। लोगों को आवश्यकता के अनुसार अनाज बांटने का दायित्व भी इनके ऊपर आ गया। कालांतर में खाद्य सामग्रियों के संरक्षण और वितरण को वे अपना अधिकार मानने लगे। साथ ही यह भी दायित्व जैसा बन गया कि दूसरे लोग मेहनत करके अनाज पैदा करें, खजाने में उसे पहुंचा दे और वितरण केन्द से ले जाएं। इस प्रकार, संपत्ति के आधार पर मेहनत का विभाजन होने लगा। फिर भी प्रारंभकालीन समाज में जाति-वर्ण भेद कायम नहीं था, क्योंकि संपत्ति के केंद्रीकरण और उस पर अधिकार स्थापित करने तक समाज में सभी लोग एक जैसे काम करते थे। प्रकृति और मौसम की चपेट से कोई मुक्त नहीं था। जब सभी लोग एक जैसे वर्ग के थे, तो वहां वर्ण-भेद की कोई गुंजाइश नहीं थी। जब संपत्ति-तत्कालीन समाज में खाद्य-सामग्री का केंद्रीकरण होने लगा, तब समाज में आर्थिक असमानता पैदा होने लगी। संपत्ति के संरक्षक शरीरिक मेहनत से मुकर कर सुख-सुविधाओं में लीन होने लगे। घर के भीतर आराम से जीवन बिताने वाले अवकाश भोगियों और प्रकृति से निरंतर संघर्ष कर मेहनत करने वालों के बीच रंग-भेद पैदा हो जाना स्वाभाविक है। मेहनतकश वर्ग की शारीरिक मेहनत का शोषण कर भोग-विलास में लीन सुविधा-भोगियों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को, उनके रंग के नाम, उनकी नौकरी के नाम पर नीचा दिखाने की प्रथा भी शुरू हुई होगी। यानी मेहनतकश वर्ग के संघर्ष को दबाने और दुर्बल बनाने के लिए सत्ताधारी वर्ग द्वारा कालांतर में की गयी साजिश का परिणाम है भारत की जाति-वर्ण-व्यवस्था। भारतीय जनता को टुकड़ों में विभाजित कर उन्हें आपस में लड़कर दुर्बल होने के लिए छोड़ने वाली शोषणकारी वर्ग-व्यवस्था की समझ के बिना जाति-वर्ण-व्यवस्था का उन्मूलन संभव नहीं होगा।शोषक व्यवस्था में सत्ताधारी वर्ग धन और अधिकार की दृष्टि से ताकतवर है, जबकि संख्या दृष्टि से अल्पसंख्यक है। मेहनतकश वर्ग धन और अधिकार से वंचित है, जबकि वह समाज में बहुसंख्यक है। यह बहुसंख्यकता ही उसकी ताकत है, शोषक वर्ग में मेहनतकश वर्ग की इस ताकत के प्रति हमेशा डर बना रहता है। वह इस भय से आतंकित है कि मेहनतकश वर्ग एकजुट हो जाएं और उसकी ओर बढ़ जाएं तो अपनी सत्ता को बचाये रखना असंभव है। इसलिए, अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए उसनेसुविधाभोगी जीवन में प्राप्त शिक्षा, ज्ञान और बुद्धि को अशिक्षा और अज्ञान के अंधेरे में पड़े जन-सामान्य के खिलाफ प्रस्तुत किया। ‘मनुस्मृति’ आदि ग्रंथों की रचना द्वारा मेहनतकश वर्ग को विभिन्न वर्णों और जातियों में विभक्त कर, भेदभाव पैदा कर उसके एकजुट होकर संघर्ष करने की संभावना को सत्ता वर्ग ने नष्ट कर दिया। ब्राह्मणवादी सत्ता वर्ग की इस साजिश की समझ के बिना कोई भी दलित आंदोलन मर्म पर आक्रमण नहीं कर सकता और इसलिए ही सफल नहीं हो सकता क्योंकि दलित आज भी, विभाजित कर शासन चलाने वाली सत्ता की साजिश का शिकार है। इसलिए ही ‘दलित-अस्मिता’ का आंदोलन विभिन्न खेमों द्वारा विभिन्न मोर्चों पर चल रहा है। ये आंदोलनकर्ता एक मंच पर आना नहीं चाहते, क्योंकि वे अपनी ‘अस्मिता’ के लिए लड़ रहे हैं। जाति-भेद और छुआछूत के कारण जिस हीन-भावना का शिकार है दलित, वह उस हीनभावना से मुक्ति के लिए अपनी जाति को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता, बल्कि सवर्णों द्वारा प्रदत्त उस ‘हीन-जाति’ की ‘संस्कृति’ का संरक्षण करना चाहता है। असल में वह अपनी जाति को छुआछूत और अवहेलना से मुक्त करा ‘ब्राह्मणत्व’ के स्तर तक पहुंचा कर गर्व का अनुभव ही करना चाहता है। साथ ही, शायद, वह एक ऐसी जाति की कामना भी करता होगा, जो अपने से निम्न हो जिस पर वह अपना शासन चला सके।दलित आंदोलन अक्सर जाति-भेद को ही संबोधित करता है, वर्ग-भेद को नहीं। मानव की भूख, गरीबी, फाके आदि का कारण सिर्फ जाति-वर्ण-भेद नहीं है। इन भेदों को मिटाने मात्र से मनुष्य की रोटी की समस्या दूर नहीं हो जाएगी। मनुष्य की मेहनत को चुराकर आर्थिक दृष्टि से मनुष्य को दो वर्गो में बांटने वाली शोषक व्यवस्था को नष्ट करने पर ही उसकी रोटी की समस्या का हल हो पायेगा। इसलिए समाज के सर्वहारा वर्ग को जाति-वर्ण आदि सारे भेद भावों को भूलकर, एकजुट होकर, धनाधिकार केंद्रित सत्ता पर आक्रमण करना है। राजसत्ता और धर्मसत्ता की मिली भगत का पर्दाफाश कर कार्ल मार्क्स ने यह समझाने की कोशिश की थी कि धर्म मनुष्य के लिए अफीम है, उससे मुक्त हो जाओ। धर्म ने भक्ति के साथ अपने भक्तों को जाति की अफीम भी खिलायी और उन्हें अपना गुलाम बनाया। इस नशे में ही दलित आंदोलकारी आजकल अपने आंदोलन में साम्यवादियों को जगह नहीं देते, बल्कि उन्हें गाली देते हैं। आजकल दलित का संघर्ष शोषक सामंतवादी जमींदारी, पूंजीवादी, साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ है। दलित का संघर्ष मुख्यतः अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए नहीं, बल्कि जातिगत दृष्टि से सामाजिक हैसियत प्राप्त करने के लिए है। इसलिए आरक्षण के जरिये शिक्षा और नौकरी हासिल कर मध्यवर्गीय जीवन बिताने वाले दलित को ‘दलित ब्राह्मण‘ कहकर उनका उपहास किया जाता है। स्पष्ट है कि धन ही सामाजिक प्रतिष्ठा और सामाजिक तिरस्कार का आधार है। वर्तमान भूमंडलीकृत दुनिया में यह यर्थाथ और भी प्रखर दिखायी दे रहा है। अतः दलित की लड़ाई की दिशा में परिवर्तन अनिवार्य है। उसकी लड़ाई सिर्फ छूआछूत से मुक्ति की लड़ाई के रूप में सीमित न रहे बल्कि उसकी लड़ाई चौतरफा शोषण के खिलाफ तथा सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक न्याय के लिए भी हो। लेकिन यह लड़ाई अकेले दलित नहीं लड़ सकता क्योंकि सत्ता इतनी ताकतवर है कि आसानी से वह उसकी लड़ाई को तोड़ सकेगी। दूसरी ओर यह यथार्थ भी है कि दलितों के जैसा कष्टमय जीवन बिताने वाले किसान हैं, मजदूर हैं, कर्मचारी हैं, बेरोजगार हैं, बेघर हैं, निर्धन हैं। वे भी अपने-अपने मोर्चे पर लड़ रहे हैं- बेहतर जीवन के लिए, सामाजिक न्याय के लिए। दलित का संघर्ष इनके संघर्ष से अलग नहीं है, क्योंकि ये लोग भी अपनी जिंदगी में दलितों के ही समान अपमान, अवहेलना, पीड़ा, दमन आदि के शिकार हैं। इसलिए नहीं कि वे निम्न जाति के हैं, बल्कि इसलिए कि वे गरीब हैं, निर्धन हैं, समाज के पिछड़े वर्ग हैं।एक विशाल देश को राजनीतिक, धार्मिक एवं आर्थिक वर्चस्व के जरिये अपने कब्जे में रखने वाले एक वर्ग के खिलाफ जब तक सर्वहारा वर्ग का एकजुट संघर्ष नहीं होगा, तब तक अन्य छोटे-मोटे आंदोलन छोटे-मोटे परिवर्तन तो ला सकते हैं, किन्तु बुनियादी तौर पर शोषक व्यवस्था को बदल नहीं सकेंगे। अतः शोषक वर्ग की असली शक्ति की समझ रखने वाला साम्यवादी सिद्धांत ही दलित सहित सर्वहारा वर्ग को एकजुट कर मुक्ति संघर्ष चला सकता है। दुनिया भर के मेहनतकश लोगों से एकजुट हो जाने का जो आह्वान कार्ल मार्क्स ने किया था, उसे समाज के दलित-पीड़ितो को कंठस्थ करना पड़ेगा। एकता में ही शक्ति है। सर्वहारा वर्ग की एकता से ही वर्ग-विभाजित समाज को नष्ट कर समाजवादी समाज की स्थापना संभव है। समाजवादी समाज की कल्पना ही ऐसी है कि उसमें जाति या वर्ण पर आधारित भेदभाव के लिए कोई गुंजाइश न रह पाएगी। ऐसा समाज ही बाद में साम्यवादी समाज में परिणत हो जाएगा। अतः दलित आंदोलकारी के लिए यह ऐतिहासिक समझ अनिवार्य है कि वर्ग विभाजन के बाद भी समाज में वर्ग-जाति विभाजन स्थापित हो गया था। इसलिए वर्ण-जाति भेद को मिटाने मात्र से वर्ग-भेद नहीं मिट जाएगा, सामाजिक न्याय की स्थापना भी नहीं हो जाएगी। शोषण पर आधारित शोषक-शोषित के वर्ग भेद के मिट जाने के साथ ही, उस पर स्थापित जाति-वर्ण-भेद भी मिट सकेगा। जब समाज के सभी नागरिकों को आर्थिक एवं सामाजिक न्याय की प्राप्ति होगी, तब अन्य सभी प्रकार का भेदभाव मिट जाएगा। यानी साम्यवाद के द्वारा ही दलित सहित सर्वहारा वर्ग की मुक्ति साध्य है। अतः दलितों को अपने मुक्ति संघर्ष को व्यापक जन-संघर्ष से जोड़ना पड़ेगा।
- वी.जी. गोपालकृष्णन

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