भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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गुरुवार, 10 जून 2010

केरल की राजनीति में नया मोड़

जब केरल कांग्रेस (जे) ने केरल कांग्रेस (एम) के साथ विलय करने का फैसला किया तो कांग्रेस ने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) में शामिल अपने ही घटकों के खिलाफ छींटाकशी करनी शुरू कर दी है। विलय के फैसले से कंाग्रेस में हताशा की स्थिति पैदा हो गयी और प्रतिक्रिया स्वरूप अपने ही घटकों के खिलाफ आरोप लगाना शुरू कर दिया है। केरल कांग्रेस (एम) ने करेल (जे) को अपने साथ विलय करने देने के फैसले को यह कहकर उचित ठहराया कि यह उनका पारिवारिक मामला है।केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारियों की बैठक के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि केरल कांग्रेस (जे) को पिछले दरवाजे से यूडीएफ में शामिल करने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने यह भी कहा कि विलय के कारण केरल कांग्रेस को राज्य विधानसभा की और सीटें देने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने इस मुद्दे पर केरल कांग्रेस (एम) नेता के.एम. मणि से बातचीत करने की बात कही। कांग्रेस यूडीएफ की तुरन्त बैठक बुलाना चाहती है ताकि विलय के बाद उत्पन्न नई परिस्थिति पर चर्चा की जा सके। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चेनितल्ला ने कहा कि वे यह जानना चाहते हैं कि ऐसी क्या परिस्थिति पैदा हो गयी जिससे केरल कांग्रेस (जे) यूडीएफ में शामिल होना चाहती है क्योंकि कई दशक पहले केरल कांग्रेस (जे) ने यूडीएफ से अलग होकर वाम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) से हाथ मिला लिया था।प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि एलडीएफ सरकार में शामिल केरल कांग्रेस (जे) के मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद वह विलय का फैसला कैसे कर सकती है।उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी इस विलय के बिल्कुल खिलाफ है तथा कांग्रेस के इस दृष्टिकोण का सीएमपी, केरल कांग्रेस (जैकब) और केरल कांग्रेस (बीे) ने समर्थन किया है। दूसरी तरफ जेएसएस ने कहा कि यूडीएफ में इस मुद्दे पर बातचीत करने की कोई जरूरत नहीं है। केरल कांग्रेस (एम) के नेता के.एम. मणि ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जोर देकर कहा कि दोनों केरल कांग्रेस का आपस में विलय करने का फैसला केरल कांग्रेस का आपसी मामला है। उन्होंने साफतौर पर कहा कि केरल कांग्रेस के आपसी मामले में कांग्रेस द्वारा दखल देने का प्रश्न ही नहीं उठता।उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के इस कथन का मजाक उड़ाया कि विलय के नाम पर केरल कांग्रेस को विधानसभा की आवंटित सीटों में कोई वृद्धि नहीं की जायेगी। उन्होंने पूछा कि हर समय सीटों के आवंटन की बात करने का अधिकार कांग्रेस को किसने दिया है। उन्होंने पूछा कि कांग्रेस यह क्यों समझती है कि सीटों का आवंटन का अधिकार केवल उसी के पास है तथा दूसरी पार्टियां जितनी भी सीटें मिलेंगी उसी से संतुुष्ट हो जायेंगी। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है एक पक्ष सीटें बांटने वाला है तथा दूसरा पक्ष सीटें लेने वाला है। उन्होंने कहा कि यूडीएफ के पास विधानसभा की जितनी भी सीटें हैं वे सभी यूडीएफ की हैं और यूडीएफ ही सीटों का आवंटन करेगा, न कि कांग्रेस; पार्टियों को उनकी हैसियत के आधार पर सीटें दी जाती हैं।अब यह एक सर्वविदत तथ्य हो गया है कि केरल में चर्च आथिरिटी जो पहले एलडीएफ सरकार के खिलाफ मुक्ति संघर्ष चला रहे थे, अब अधीर होने लगे हैं क्योंकि कांग्रेस ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया। चर्च अल्पसंख्यकों के शिक्षा के अधिकार तथा पाठयपुस्तकों में शामिल विषयों को लेकर, जिन्हें वे ईश्वर में आस्था के विरूद्ध मानते थे, वे लोकतांत्रिक वाममोर्चा सरकार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। बिशप और आर्क बिशप की ओर से सरकार विरोधी विषवमन किया जा रहा था लेकिन उनका अभियान उतना जोर नहीं पकड़ पाया जितना वे चाहते थे। अब यह बिल्कुल साफ हो गया है कि चर्च ईश्वर एवं आस्था के नाम पर शिक्षा के वाणिज्यीकरण करने और मुनाफा कमाने के प्रयासों को पूरी तरह समर्थन कर रहा है। चर्च आथिरिटी अपना अभियान कमजोर होते देख एक ऐसी राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते हैं जो उनकी जरूरतों के अनुरूप हो। यही कारण है कि उन्हांेने राज्य में कांग्रेस के विभिन्न संगठनों का विलय एवं उनकी एकता के विचार को आगे बढ़ाया ताकि विलय के बाद कांग्रेस मध्य केरल में एक प्रभावशाली ताकत बन सके और उनके विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करने में वे निर्णायक शक्ति बन सकंे।इस घटनाक्रम से कांग्रेस चिंतित हो उठी क्योंकि वह जानती है कि यदि चर्च अपनी योजना में सफल हो गये तो इससे राज्य में कांग्रेस कमजोर पड़ जायेगी तथा अगले विधानसभा चुनाव में यूडीएफ की सीटें संभवतः कम हो जा सकती हैं। लेकिन चर्च ने केरल कांग्रेस (एम) और केरल कांग्रेस (जे) को हरी झंडी दिखा दी है और इस दिशा में प्रयास तेज हो गये हैं। केरल के उत्तरी हिस्सों में इसी तरह से मिलता-जुलता एक नया प्रयास शुरू हो गया है जिसके तहत इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) अपने अलग हुए गुट आईएनएल को- जो आईयूएमएल से ही एक टूटा हुआ ग्रुप है- अपने में मिलाने की कोशिश कर रही है ताकि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए वह ज्यादा ताकतवर बन सके। इस प्रयास के कारण आईएनएल में फूट पड़ गयी है जो शुरू से ही एलडीएफ का समर्थन कर रही है। इस पृष्ठभूमि में आईयूएमएल केरल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच चल रहे झगड़े के प्रति उदासीनता का रवैया अपनाये हुए है।राज्य में एलडीएफ को कमजोर करने के लिए जिस कदम को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था वही अब यूडीएफ के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया है क्योंकि यूडीएफ के घटक दलों के बीच कटुता दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है तथा खुलकर सामने आ रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता दोनों ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि केरल कांग्रेस (जे) को केरल कांग्रेस (एम) में विलय कराकर यूडीएफ में शामिल करने के बारे में उन्हें कड़ी आपत्ति है। यदि केरल में ईसाई और मुस्लिम संगठन मजहबी संस्थाओं की मदद से अपना अलग शक्तिशाली राजनीतिक दल बनाते हैं तो इसका राज्य में काफी दूरगामी एवं खतरनाक परिणाम होंगे। इससे संघ परिवार के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा हो जायेगी और उसे केरल की राजनीति में पांव पसारने का मौका मिल जायेगा। जो लोग सचमुच में अल्पसंख्यकों का हित चाहते हैं इन घटनाक्रमों से चिंतित हैं। यही कारण है राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ लाने के उद्देश्य से जैसे ही ये प्रयास शुरू किये गये केरल कांग्रेस (जे) और आईएनएल में फूट पड़ गयी। केरल कांग्रेस (जे) और आईएनएल के समर्थकों ने नये प्रयासों के खतरे को समझते हुए दोनों पार्टियों के नेतृत्व के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है।इस बीच एलडीएफ सरकार में कांग्रेस (जे) के मंत्री को हटा दिया गया है और इस फैसले की सूचना राज्यपाल को दे दी गयी है। मुख्यमंत्री ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि केरल कांग्रेस (जे) के मंत्री ने कैबिनेट मंत्री रहते हुए केरल कांग्रेस (एम) के साथ विलय के नाम पर षडयंत्र रचना शुरू कर दिया था। मुख्यमंत्री ने इस मंत्री के रवैये को ओछा, अशिष्ट एवं अनैतिक बताया। केरल कांग्रेस (एम) और केरल कांग्रेस (जे) के बीच विलय के प्रयास के बारे में जब मीडिया में रिपेार्ट आयी तो एलडीएफ की एक बैठक में भाकपा के राज्य सचिव वेलियम भार्गवन ने इस मुद्दे को उठाया था। भार्गवन ने केरल कांग्रेस (जे) के मंत्री पी.जे. जोसेफ से जानना चाहा था कि विलय के प्रयास के बारे में अखबारों में छपी खबर क्या सही है। जोसेफ ने अखबारों में छपी खबरों को गलत बताया और उसे महज एक कल्पना बताया।भार्गवन ने कहा कि जोसेफ का व्यावहार काफी अशोभनीय एवं अनैतिक है तथा विश्वासघातपूर्ण है। जोसेफ ने कभी भी एलडीएफ की बैठक में इन मुद्दों को नहीं उठाया और न ही कभी यह कहा कि उनकी पार्टी को एलडीएफ से कोई मतभेद है। कैबिनेट के किसी फैसले से उन्होंने कभी असहमति भी नहीं जतायी। यही कारण है कि जिस दिन जोसेफ ने एलडीएफ छोड़ने और कैबिनेट से इस्तीफा देने का फैसला किया केरल कांग्रेस (जे) के नेता एवं कार्यकर्ता कोट्टायाम में जमा हुए और एक सम्मेलन करके जोसेफ को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाने का एक प्रस्ताव पारित किया। इन कार्यकर्ताओं ने एक पार्टी के रूप में काम करते रहने तथा एलडीएफ में बने रहने का फैसला किया। जोसेफ को पार्टी से हटाने के प्रस्ताव में पूछा गया कि ऐसी क्या नई परिस्थिति पैदा हो गयी जिसके कारण केरल कांग्रेस (जे) को एलडीएफ के साथ अपने दो दशक पुराने रिश्ते को तोड़ना पड़ा तथा एलडीएफ के साथ क्या मतभेद थे और यह बात पार्टी कार्यकर्ताओं को क्यों नहीं बतायी गयी। प्रस्ताव में जोसेफ की कार्रवाई की कड़ी निंदा की गयी और इसे अपने राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक साजिश बताया। प्रस्ताव में एलडीएफ में बने रहने के फैसले को दोहराया गया और इसे धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के हित में तथा अल्पसंख्यकों के हित में बताया गया।यूडीएफ के घटकों के बीच केरल कांग्रेस के विलय को छोड़कर विवाद और कटुता तेज होनेे के साथ ही आने वाले दिनों में केरल की राजनीति में एक नया मोड़ आ सकता है।एलडीएफ की अगली बैठक में मोर्चे को शक्तिशाली बनाने तथा अपने संदेश एवं कार्यक्रम के साथ जनता के बीच एकताबद्ध होकर जाने का फैसला किया जायेगा। एलडीएफ सरकार की चौथी वर्षगांठ के अवसर पर एलडीएफ की उपलब्धियों को गिनाया जायेगा और जनता को इन उपलब्धियों के बारे में बताया जायेगा। वर्षगांठ समारोह कुछ ही दिनों में पूरे राज्य में मनाया जायेगा। यूडीएफ में नये घटनाक्रम और इसके खतरनाक नतीजों को लेकर जनता के धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक हिस्से नाखुश हैं क्योंकि धार्मिक एवं मजहबी नेतागण राज्य की राजनीति को प्रभावित करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से प्रयास कर रहे हैं, यह एक ऐसा घटनाक्रम है जिसे आमतौर पर कोई पसंद नहीं करता है।
- बुलु राय चौधरी

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