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गुरुवार, 10 जून 2010

पोस्को के लठैत

इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि उड़ीसा के मुख्यमंत्री पोस्को के लठैत बने हुए हैं। आखिर उन्होंने पोस्को का नमक खाया है तो नमक तो अदा करंेगे ही। जब सरकार ने दक्षिण कोरिया की इस महाकय बहुराष्ट्रीय निगम को यहां इस्पात कारखाना खोलने के लिए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर दस्तखत किये थे तो उन्होंने असल में पोस्को को राज्य की जमीन, खनिज सम्पदा और पानी को लूटने की इजाजत देने का ही वायदा तो किया था। इसके अलावा उस मेमोरेंडम में रखा ही क्या है?जब किसी एमओयू पर दस्तखत होते हैं तो लक्ष्मी का आदान-प्रदान होता ही है। इसे देश की जनता अब खूब समझती है। लक्ष्मी का ही प्रताप तो है कि केन्द्र सरकार ने भी तमाम कायदे-कानूनों को ताक पर रख पोस्को को परियोजना का हरी झंडी दे दी हैं। अब जब मामला फंस रहा है तो सफाई दी जा रही है कि हरी झंडी कुछ शर्तो के साथ दी गयी थी। जरूरत सफाई देने की नहीं है बल्कि जरूरत पोस्को को लाल झंडी दिखाने की है। यदि के केन्द्र सरकार पोस्को को लाल झंडी नहीं दिखाती तो उसका इसके सिवा कोई मतलब नहीं कि इस मामले में केन्द्र और राज्य सरकार की मिलीभगत है।जिस जमीन को सरकार पोस्को को देना चाहती है वह वनभूमि हैं। और जो आदिवासी लोग सदियों से वहां रहते आये हैं और उस जमीन और जंगल से अपनी रोजी-रोटी कमाते आये हैं वह वहां से उजड़ने को तैयार नहीं। देश का कानून भी यही कहता है वनों की जमीन को इस तरह किसी बहुराष्ट्रीय निगम के हवाले नहीं किया जा सकता, वह चाहे कोई देशी कंपनी हो या विदेशी। देश के सफेदपोश नेता और मंत्रालयों में बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग-वे दिल्ली में बैठे हो या भुवनेश्वर में- वे भले ही बिक गये हों पर वनों और जंगलों में रहकर अपनी गुजर-बसर करने वाले ये गरीब लोग वहां से उजड़ने को तैयार नहीं।अपनी जमीन और अपनी झोपड़ियों को इस लूट से बचाने के लिए वे महीनों से वहां जमे हैं; पोस्को के लोगों को वे वहां नहीं घुसने दे रहे। वे शांतिपूर्वक बैठे हैं। पर उड़ीसा की सरकार अब उन पर गोलियां दाग रही है, उनकी झोपड़ियों पर बुलडोजर चला रही है। सशस्त्र बलों की चालीस से अधिक प्लाटूनें इन आदिवासियों पर हमला करने के लिए भेज दी गयी हैं।
- आर.एस.यादव

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