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गुरुवार, 10 जून 2010

भोपाल की दूसरी त्रासदी के सबक

भोपाल में यूनियन कारबाईड नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की रसायनिक फैक्ट्री से मिथाईल आइसोसाईनाईड (एमआईसी या मिक) नामक विषैली गैस के रिसाव के कारण हजारों भोपालवासियों के मरने एवं अपाहिज हो जाने के 25 साल से अधिक बीत जाने पर उस जघन्य काण्ड के अभियुक्तों को 7 जून को सजा सुना दी गयी। इस भयावह त्रासदी के अभियुक्तों को केवल दो साल की सजा तथा रू। 1,01,750.00 का जुर्माना किया गया। फैक्ट्री के मालिक को सजा इसलिए नहीं दी जा सकी क्योंकि उसे अमरीका से भारत सरकार ने प्रत्यर्पित नहीं कराया। भोपालवासियों के लिए इस त्रासदी का यह सिला एक दूसरी त्रासदी के समान है। पूरे देश के नागरिक इससे हतप्रभ हैं।यह फैसला इस बात की पोल एक बार फिर खोलता है कि पूंजी राज्यसत्ता एवं उसके घटकों यानी सरकार एवं न्यायपालिका को किस प्रकार निर्देशित एवं नियंत्रित करती है।फैसला सुनाने वाले भोपाल के मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी के पास स्वयं को जायज ठहराने का यह आधार हो सकता है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304-ए में इससे अधिक सजा नहीं दी जा सकती लेकिन क्या सर्वोच्च न्यायालय के उन माननीय न्यायाधीशों को यह नहीं मालूम था कि इस जघन्य घटना में कितने हताहत हुए कि उन्होंने धारा 304 के आरोप को धारा 304-ए में बदल दिया, यह जानते हुए भी कि इस धारा में केवल 2 साल की सजा दी जा सकती है जो ऐसी किसी भी घटना के लिए नाकाफी है। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने तमाम छोटे-मोटे मामलों में यह कहते हुए दखल देने से मना कर दिया कि अगर आरोप साबित नही हुए तो अभियुक्त अधीनस्थ न्यायालय से अंतिम फैसला आने पर बरी हो जायेंगे। क्या सर्वोच्च न्यायालय में सरकारी वकील ने इस दूरगामी फैसले के खिलाफ अपील के लिए अनुशंसा नहीं की थी? सरकार का अपना क्या उत्तरदायित्व था? ये सवाल हैं, जनता जिनका उत्तर चाहती है लेकिन इसके जवाब शायद ही उन्हें कभी मिल सकें।फैसले में हुए अत्यधिक विलम्ब के लिए क्या मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय दोषी नहीं है। भोपाल अधीनस्थ न्यायालयों का कई बार मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने निरीक्षण किया होगा और पुराने लंबित मामलों की समीक्षा के समय इन न्यायाधीशों का विवेक इस मामले की त्वरित सुनवाई और निस्तारण के लिए नहीं मा चला। आखिर क्यों? क्या यह उत्तरदायित्वों से विचलन नहीं था? मध्य प्रदेश राज्य सरकार तथा केन्द्रीय सरकार ने भी कभी भी इस केस के त्वरित निष्तारण की बात नहीं सोची।फैक्ट्रीज एक्ट में सुरक्षा एवं संरक्षा को उचित तरह से लागू न करना अपराध माना गया है जिसके लिए बिना किसी घटना के घटित हुए निर्धारित मानदण्डों का पालन न करने पर पहली बार ही दो साल की सजा का प्राविधान है। इस फैक्ट्री के मालिकों पर शायद ही कभी कोई मुकदमा चलाया गया हो। आखिर अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के खिलाफ सरकारी मशीनरी कैसे कोई कदम उठाती।परमाणु उत्तरदायित्व बिल अब जनता के लिए और अहम हो गया है जो भारत सरकार के अमरीकी सरमायेदारों से रिश्ते उजागर करता है।ये तमाम सवाल हमें आगाह करते हैं कि इस तरह की किसी संभाव्य घटना के लिए देश की दण्ड संहिता में उचित बदलाव किए जायें। इसके लिए जनता के मध्य चर्चा और आन्दोलन की जरूरत है जिससे सरकार को उचित बदलावों के लिए विवश किया जा सके।
- प्रदीप तिवारी

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