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शुक्रवार, 25 जून 2010

देश की जरूरत है एक कृषि - आधारित वैकल्पिक आर्थिक नीति

वैश्वीकरण के फलाफल पर आयोजित 2006 के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में शरीक होने के सिलसिले में मुझे चीन के दो बड़े शहर बीजींग और शंघाई में एक सप्ताह बिताने का मौका मिला था। चीन जैसे विशाल देश को समझने के लिये एक सप्ताह का समय कुछ भी नहीं है फिर भी जो बात हमें एक से ज्यादा मर्तबा जोर देकर बतायी गयी, वह यह कि चीन के समक्ष ऊंचा जीडीपी हासिल करने का लक्ष्य नहीं है, प्रत्युत इसके विपरीत चीन अपना वित्तीय स्रोत्र कृषि और देहात के विकास की ओर ज्यादा निवेशित कर रहा है। यह वह समय था जब चीन का जीडीपी दुनिया के सवोच्च शिखर पर कुलांचे मार रहा था। बीजिंग में पुराने बैगोडे खोजने से कहीं-कहीं दिख जाते थे और शंघाई का कहना ही क्या? पुराने शंघाई से अलग अत्याधुनिक नया शंघाई बनाया जा रहा है। नये और पुराने शंघाई के बीच हवाई और जलमार्गों के अलावा समुद्र के नीचे भूमिगत मार्ग भी प्रशस्त हैं। गगनचुंबी बहुमंजिली इमारतें तो इन दिनों बड़े शहरों की शान है, किंतु शंघाई की सड़कों पर बहुमंजिली फ्लाईओवर देखना मेरे लिये सचमुच नया था। चीन की दीवार देखकर जहां प्राचीनता का बोध होता है, वहीं नया शंघाई देखकर उत्तर आधुनिकता का विस्मय होता है।आधुनिक चीन के निर्माता देंग शियाओ पेंग का कहना था कि समाज के सभी वर्गों और तबकों का समान विकास एक साथ नहीं हो सकता। वे मानते थे कि विभिन्न तबकों का विकास आगे-पीछे होगा। आधुनिक चीन की विकास प्रक्रिया में देहात पिछड़ा। फलस्वरूप देहात से शहर की ओर लोग तेजी से भागने लगे। इसलिए चीन के योजनाकार अब देहात की ओर ध्यान दे रहे हैं। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पिछले महाधिवेशन का दिशा निर्देश भी पिछडे़ कृषि क्षेत्र को उन्नत करने का है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए गर्व से बताया कि देश का जीडीपी 7.4 प्रतिशत है, जब कि योरपीय देश और अमेरिका पीछे हैं। उसी रिपोर्ट कार्ड में कृषि क्षेत्र की विकास दर शून्य के नीचे (-)0.7 प्रतिशत दर्ज है, जिसकी कोई कैफियत उन्होंने नहीं दी।भारत का औद्योगिक रूप से सबसे ज्यादा विकसित महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र भूख से क्यों तड़प रहा है? और महाराष्ट्र समेत विकसित प्रदेश कर्नाटक आंध्र और खुशहाल पंजाब के किसान क्यों आत्महत्या करने को विवश हैं? पशुपति से तिरुपति की बहुप्रचारित पट्टी के 700 जिले क्यों माओवादियों के प्रभाव में चले गये, जिसे मुक्त कराने के लिए गृहमंत्री चिंदबरंम सेना तैनाती की मांग करते हैं।देश के 87 करोड़ लोग 20 रुपये से कम पर गुजारा करते हैं तो बढ़ा हुआ जीडीपी का लाभ कहां जा रहा है? आंकड़ों के मुताबिक देश में 30 हजार नये करोड़पति हर साल पैदा हो रहे हैं। करोड़ों की लाश पर कुछेक सैकड़ों अरबपति और खरबपति बन रहे हैं तो जाहिर हे कि संविधान की मूलभूत भावना को दरकिनार करते हुए संपत्ति का संकेन्द्रण कुछेक व्यक्तियों के हाथों में तेजी से हो रहा है।कामरेड ज्योति बसु के निधन के बाद दिल्ली में आयोजित शोकसभा को सम्बोधित करते हुए सीटू महासचिव मुहम्मद अमीन ने (जो पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में सीटू के उपाध्यक्ष हैं) ‘आपरेशन बर्मा’ की कामयाबी का बड़ा ही जीवंत चित्रण किया। यह कामरेड ज्तोति बसु के प्रति सर्वोत्तम श्रद्धांजलि थी। आपरेशन बर्मा भूमि सुधार कार्यक्रम था, जिसके तहत बटाईदारी को कानूनी हक दिया गया। आपरेशन बर्मा के सफल कार्यन्वन से भाकपा (मा) का प्रदेश में विशालजनाधार प्राप्त हुआ। विगत तीस वर्षों से पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार अस्तित्व में है तो इसका श्रेय निश्चय ही कृषि क्षेत्र में हासिल की गयी वाममोर्चा सरकार की कामयाबियों को जाता है।कामरेड ज्योति बसु के अवकाश ग्रहण के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाममोर्चा सरकार की प्राथमिकता में परिवर्तन आया। वाममोर्चा सरकार ने जिस नयी औद्योगिक नीति की घोषणा की है वह केन्द्र सरकार की आर्थिक नीति से भिन्न कोई विकल्प नहीं है। ऐसा दावा किसी ने किया भी नहीं है। सिंगुर आदि इलाके में उद्योग विस्तार के लिये भूमि अधिग्रहण का विरोध हुआ। फलस्वरूप पिछले लोकसभा चुनावों और हालिया स्थानीय निकाय में चुनाव परिणामों में वाममोर्चा की लोकप्रियता का घटता ग्राफ जाहिर है। इसके लिए ममता को दोष देना बेकार है। ममता विगत पांच दशकों से राजनीति में सक्रिय है। उसे पहले सफलता नहीं मिली तो आज वह क्यों कामयाब हो रही है।निश्यच ही, वैकल्पिक आर्थिक नीति का वामपंथी नारा लोगों को आकर्षित करता है, किन्तु इस वैकल्पिक आर्थिक नीति की ठोस रूपरेखा प्रस्तुत करने की विफलता वामपंथ की वह कमजोरी है जिसके चलते आर्थिक विकास का मनमोहनी मॉडल बेरोकटोक आगे बढ़ता जाता है। यह सही है कि भारत के टेªड यूनियन आंदोलन ने प्रारम्भ से ही नयी आर्थिक नीति का विरोध किया। भारतीय मजदूर वर्ग ने नई आर्थिक नीति के विरुद्ध अब तक 12 राष्ट्रव्यापी हड़तालें की हैं। यही नहीं विगत 5 मार्च को 10 लाख से ज्यादा श्रमजीवी जेल भरने के लिये सड़कों पर उतर आये। आगे फिर एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल की तैयारी चल रही है, जिसमें इंटक, भामस समेत सभी केन्द्रीय टेªड यूनियनें शामिल हैं फिर भी यह प्रतिरोध टेªड यूनियनों की प्रकट सीमाओं के कारण जन आंदोलन का रूप ग्रहण नहीं कर रहा है। इसके लिये देहाती हित का प्रतिनिधित्व करनेवाली राजनीतिक दलों को आगे आना होगा।भारत कृषि प्रधान देश है। देश की 70 प्रतिशत आबादी देहात में रहती है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यह औसत 80 से 90 के पास है। ऐसी स्थिति में वैकल्पिक आर्थिक नीति निश्चय ही कृषि आधारित होगी। किंतु इसके विपरीत देश की वर्तमान आर्थिक नीति के मनमोहनी मॉडल के केन्द्र में कार्पोरेट गवर्नेस है। कार्पोरेट गवर्नेस का सीधा अर्थ है वित्तपूंजी की इजारेदारी कायम करना। वित्तपूंजी की इजारेदारी व्यवहार में छोटी पूंजी और खुदरा व्यापार को लील रही है। साथ ही वित्तपूंजी कृषि क्षेत्र में भी अपने डंक फैला रही है और किसानों को भूमि से बेदखल कर रही है। मजे की बात यह है कि यह सब सरकारी संरक्षण में हो रहा है। उड़ीसा में पोस्को, उत्तर प्रदेश में अंबानी, पं. बंगाल में सिंगुर परिघटनायें इस तथ्य के गवाह हैं, जहां कार्पोरेट घरानों को भूमि पर कब्जा दिलाने के लिये सरकार ने किसानों का दमन किया है।वैश्वीकरण और मुक्त बाजार व्यवस्था में देश-देश के बीच तथा देशों के अंदर घनघोर विसमता और क्षेत्रीय तनाव पैदा किये है। यही नहीं देश के अंदर विभिन्न राज्यों और राज्यों के अंदर जिला-कस्बों के बीच भी इसने आर्थिक टकराव और सामाजिक बिलगाव पैदा किये हैं।यह सुखद संकेत है कि सभी केन्द्रीय टेªड यूनियनों ने आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर इकट्ठे होकर समवेत स्वर में वैकल्पिक आर्थिक नीति बनाने की मांग उठायी है। उम्मीद की जाती है कि श्रमजीवी जनगण की एकता और एकताबद्ध संघर्ष से ऐसी वैकल्पिक आर्थिक नीति का मार्ग प्रशस्त होगा, जिसके मध्य में कृषि क्षेत्र की निर्णायक भूमिका रेखांकित होगी।
- सत्य नारायण ठाकुर

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