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शुक्रवार, 25 जून 2010

साम्राज्य एवं युद्व

दो दिन पहले मैंने संक्षेप में बताया था कि साम्राज्यवाद नशीली वस्तुओं के सेवन की अत्यंत गंभीर समस्या को हल करने में असमर्थ है जो विश्व भर में लोगों के लिए अनिष्टकारी साबित हो रहा है। आज में एक अन्य विषय पर चर्चा करना चाहता हूं जिसे मैं काफी महत्वपूर्ण समझता हूं।हाल में उत्तर कोरिया की जल सीमा में घटी घटना के बाद उस पर अमरीका द्वारा हमला करने का खतरा पैदा हो गया है। यदि चीनी गणराज्य के राष्ट्रपति संयुक्त सुरक्षा परिषद में इस बारे में किसी समझौते के लिए चल रही चर्चा के दौरान वीटो का इस्तेमाल करते हैं तो उसे टाला जा सकता है।लेकिन एक दूसरी और ज्यादा गंभीर समस्या है जिसका जवाब अमरीका के पास नहीं है और वह है वह बनाया हुआ विवाद जिसमें ईरान को शामिल किया गया है। राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने 4 जून, 2010 को काहिरा में इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ अल-अजहर में जिस तरह का भाषण दिया उससे यह बात साफ नजर आती है। उनके भाषण की कापी प्राप्त होने के बाद मैंने अपनी प्रतिक्रिया में उसके अनेक अंशों का इस्तेमाल किया ताकि उसके महत्व को समझा जा सके। मैं उनमें कुछ का यहां उल्लेख करना चाहूंगा।“हम ऐसे समय में मिल रहे हैं जब अमरीका और विश्व भर में मुसलमानों के बीच काफी तनाव है...”“...उपनिवेशवाद ने अनक मुसलमानों के अधिकार और अवसर छीन लिया तथा शीत युद्ध जिसमें मुस्लिम बहुल देशों को उनकी आकांक्षाओं का ख्याल किये बिना अक्सर प्रॉक्सी के तौर पर इस्तेमाल किया गया...” यह और ऐसे ही अन्य तर्क प्रभावशाली लगे क्योंकि वे एक अफ्रीकी-अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा कहे गये; ये कथन उन स्वयं प्रत्यक्ष सच्चाइयों को दर्शाते हैं जो 4 जुलाई, 1776 के फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र में शामिल हैं।“मैं काहिरा में अमरीका और विश्व भर के मुसलमानों के बीच एक नई शुरूआत करने आया हूं जो आपसी हितों एवं आपसी सम्मान पर आधारित होगा....”“जैसा कि पवित्रव कुरान में कहा गया है, खुदा को याद करो और हमेशा सच बोलो...”“और अमरीका का राष्ट्रपति होने के नाते मैं अपनी यह जिम्मेदारी समझता हूं कि जहां भी नकारात्मक रूढ़िवादी इस्लाम है उसके खिलाफ संघर्ष करूं।”इस प्रकार उन्होंने विवादित मुद्दों पर बोलना जारी रखा जिनका संबंध अमरीका की नीतियों से है।“शीतयुद्ध के मध्य में अमरीका ने ईरान की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गयी सरकार को उखाड़ फेंकने में भूमिका निभायी।”“इस्लामिक क्रांति के बाद से ही ईरान ने बंधक बनाने और अमरीकी सैनिकों एवं नागरिकों के खिलाफ हिंसा की भूमिका निभानी शुरू कर दी।”“इóाइल के साथ अमरीका का घनिष्ट संबंध जगजाहिर है। यहसंबंध टूटने वाला नहीं है।”“अनेक लोग शांति एवं सुरक्षा के ऐसे जीवन के लिए जो उन्हें कभी नसीब नहीं हुआ, वेस्ट बैंक, गाजा एवं पड़ोसी देशों में शरणार्थी शिविरों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।”हम सभी जानते हैं कि आज भी गाजा पट्टी में रहने वाले लोगों पर सफेद फोसफोरस एवं अन्य अमानवीय पदार्थ गिराये जाते हैं जैसा कि नाजी फासिस्ट किया करते थे। फिर भी ओबामा के कथन जीवंत एवं कभी-कभी गंभीर लगते हैं और क्योंकि उन्होंने विश्व के विभिन्न देशों की यात्रा के दौरान अपने ऐसे कथनों को दोहराया।31 मई को विश्व समुदाय यह देखकर चकित रह गया जब गाजा पट्टी से हजारों मील दूर अंतर्राष्ट्रीय जल में करीब एक सौ इóाइली सैनिकों ने हेलीकाप्टरों से उतरकर सैकड़ों निर्दोष एवं शांतिप्रिय लोगों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दी जिसमें प्रेस रिपोर्टों के अनुसार 20 लोग मारे गये तथा अनेक घायल हो गये। जिन लोगों पर हमले किये गये उनमें कुछ अमरीकी भी थे जो अपनी ही मातृभूमि में घिरे हुए फिलिस्तीनियों के लिए राहत सामग्री ले जा रहे थे।जब ओबामा ने इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ अल अजहर में “ईरान की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गयी सरकार को उखाड़ फेंकने” की चर्चा की तथा उसके तुरन्त बाद कहा, “इस्लामिक क्रांति के बाद से ही ईरान ने बंधक बनाने, अमरीकी सैनिकों एवं नागरिकों के खिलाफ हिंसा में भूमिका निभायी...” तो वे आयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में शुरू हुए उस क्रांतिकारी आंदोलन की बात कह रहे थे, जिसने पेरिस से और बिना किसी हथियार के दक्षिण एशिया में शक्तिशाली अमरीकी सेना को धूल चटा दी थी। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमरीका सोवियत संघ के दक्षिण में स्थित उस स्थान पर अपना एक फौजी अड्डा बनाने के लालच में न पड़ता यह अत्यंत कठिन था।पांच दशक से भी पहले अमरीका ने पूरी तरह लोकतांत्रिक एक अन्य क्रांति को कुचल दिया था जब उसने ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोस्सादेग की सरकार को उखाड़ फेंका था जो 24 अप्रैल, 1951 को प्रधानमंत्री चुने गये थे। उसी साल 1 मई को (ईरान की) सीनेट ने तेल उद्योग के राष्टीयकरण को मंजूरी दे दी जो कि संघर्ष के दौरान उनकी मुख्य मांग थी। उन्होंने कहा था, “विदेशों से कई वर्षों से चल रही हमारी समझौता वार्ता असफल साबित हुई है।”स्पष्टतः उनका आशय बड़ी पूंजीवादी शक्तियों से था जिनका विश्व अर्थव्यवस्था पर वर्चस्व है। ब्रिटिश पेट्रोलियम कंपनी जिसे पहले एंग्लो-ईरानियन आयल कंपनी से जाना जाता था, के अड़ियल रवैये के कारण ईरान ने उसे अपने कब्जे में ले लिया। कंपनी अपनी तकनीकी कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने में असमर्थ थी। इंगलैंड ने अपने कुशल कर्मचारियों को वापस बुला लिया था तथा कल-पुर्जे एवं बाजार पर प्रतिबंध लगा दिया था। उसने ईरान के खिलाफ कारवाई करने के लिए अपनी नौ सेना को भी भेज रखा था। इसके फलस्वरूप ईरान का तेल उत्पादन 1952 के 24.4 मिलियन बैरेल से घटकर 1953 में 10.6 मिलियन बैरेल हो गया। ऐसी अनुकूल परिस्थिति देखकर सीआईए ने वहां सत्ता पलट कर दिया और प्रधानमंत्री मोस्सादेगको हटा दिया जिनका तीन साल बाद निधन हो गया। उसके बाद वहां राजतंत्र स्थापित कर दिया गया और ईरान की सत्ता अमरीका के एक शक्तिशाली सहयोगी के हाथ में सौंप दी गयी।अमरीका ने केवल यही चीज अन्य राष्ट्रों के साथ भी की है। जब से दुनिया के सबसे समृद्ध जमीन पर यह अमरीका देश बना है उसने अपने ही देश के मूल बाशिंदों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जो हजारों वर्षों से वहां रहे हैं या उन लोगों के अधिकार का भी सम्मान नहीं किया जिन्हें ब्रिटिश उपनिवेशवादी वहां गुलाम बनाकर लाये थे।चाहे जो हो, मुझे विश्वास है कि अमरीका के ईमानदर नागरिक इस तथ्य को समझते हैं।राष्ट्रपति ओबामा सच को नुकसान पहुंचाते हुए अनसुलझे विरोधाभासों को पाटने की कोशिश में चाहे सैकड़ों भाषण दें या अपनी सोची-समझी बातों को किसी चमत्कार के होने का सपना देखें, जबकि अनैतिक व्यक्तियों और संगठनों को रियायतें दी जा रही हैं। वे एक ऐसी काल्पनिक दुनिया का खाका भी खीेंच सकते हैं जो केवल उनके दिमाग की फितरत हो सकती है जिसे कि उनकी इस तरह की प्रवृत्तियों को जानने वाले उनके बेईमान सलाहकार उनके भाषणों में डाल देते हैं।दो अपरिहार्य सवाल पैदा होते हैंः क्या ओबामा बिना पेंटागन या इóाइल द्वारा जिनके व्यवहार से पता चलता है कि वह अमरीका के फैसले को नहीं मानता- ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किये बिना दोबारा राष्ट्रपति बन सकते हैं?उसके बाद हमारी धरती पर किस तरह का जीवन रह पायेगा?
- फिडेल कास्ट्रो रूज

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