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शुक्रवार, 25 जून 2010

अमरीका के दोहरे मापदंड

पिछले दिनों की दो घटनाओं से एक बार फिर उजागर हुआ है कि किस तरह अमरीका दोहरे मापदंड अपनाता है।26 मार्च को दक्षिण कोरिया का एक जहाज डूब गया था जिसमें 46 सेलर (नाविक) भी मारे गये। दक्षिण कोरिया ने तुरन्त ही उत्तरी कोरिया पर आरोप मढ़ दिया कि उसने उस जहाज को डुबा दिया है और युद्ध की भाषा बोलना शुरू कर दिया। आव देखा न ताव, अमरीका ने अपनी फौजों को भी वहां भेज दिया। युद्ध के बादल घिरने लगे और लगने लगा कि उत्तरी कोरिया के विरूद्ध युद्ध अब छिड़ा और तब छिड़ा। गनीमत ही रही कि युद्ध नहीं हुआ। यह था अमरीका का उत्तरी कोरिया के प्रति रूख! इसके बरअक्स एक दूसरा मामला देखें!30 मई को इóायल ने गाजा पट्टी में घेरेबंदी के शिकार लोगों के लिए सहायता सामग्री ले जाते हुए जहाजी बेड़े पर जिसमें सभी लोग निहत्थे थे- हमला कर दिया और अत्यंत मानवीय कार्य में लगे दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतार दिया तो अमरीका ने उसकी निंदा करने से भी इंकार कर दिया।उत्तरी कोरिया ने दक्षिण कोरिया के जहाज को डुबोने के आरोप का खंडन किया था और इस घटना की स्वतंत्र जांच किये जाने की मांग की थी। रूस के राष्ट्रपति ने कोरिया महाद्वीप में तनाव को और अधिक बढ़ने से रोकने के लिए कोरिया की इस मांग पर विशेषज्ञों के एक दल को दक्षिण कोरिया भेजा। अब खबर आयी है कि वह विशेषज्ञ दल डूबे हुए जहाज के मलबे और अन्य उपलब्ध सबूतों की जांच करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा हे कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि उत्तरी कोरिया पर इसका दोषारोपण किया जाये। कोरिया के संबंध में एक प्रमुख रूसी विशेषज्ञ डा. कोन्सटेंटिन अस्मोलोव के अनुसार दक्षिण कोरिया का यह जहाज संभवतः किसी दोस्ताना गोलाबारी की जद में आया। विशेषज्ञ दल के निष्कर्षों के संबंध में आधिकारिक बयान अभी आना बाकी है।
- आर.एस. यादव

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